12 अप्रैल 2016

नन्हे सम्राट, मई 2016. वृक्ष कथा: कौन बढ़ेगा आगे कौन रहेगा पीछे?

नन्हे सम्राट, मई 2016.


वृक्ष कथा: कौन बढ़ेगा आगे कौन रहेगा पीछे?


-मनोहर चमोली ‘मनु’


हमेशा की तरह शहजादा सलीम किसी की मदद कर वापिस तिलस्मी नदी के किनारे आ पहुंचा। रात भर घोड़ पर सवार शहजादा सलीम थक चुका था। वह चाहता था कि भोर होने से पहले वह कुछ पल आराम कर ले। उसने अपने घोड़े को एक पेड़ के तने से बांधा और नदी किनारे आरामदायक घास पर आराम की मुद्रा में लेट गया। कुछ ही क्षणों में उसे नींद आ गई। वहीं अपने नियत समय पर पौ फटते ही समूचा वन क्षेत्र पक्षियों के कलरव से गूंजने लगा। पूरब की ओर क्षितिज लालिमा लिए हुई सुबह होने का संकेत दे चुका था। अचानक शहजादा सलीम का घोड़ा हिनहिनाने लगा। किसी खतरे की आशंका के चलते शहजादा उठ खड़ा हुआ। उसने झट से अपनी तलवार खींच ली। शहजादे ने यहां-वहां देखा लेकिन उसे कोई नहीं दिखाई दिया। वह उनींदी में उठा और नदी की ओर चल पड़ा। वह भूल गया था कि तिलस्मी नदी का जल पीना खतरे से खाली नहीं। वह पानी की छपकी अपने चेहरे पर डालकर तरोताज़ा होना चाहता था। वह जैसे ही नदी के तट पर पहुंचा और जल की ओर झुका ही था कि एक पुरुष स्वर ने उसे रोक दिया। स्वर था-‘‘हे युवक। यह तिलस्मी नदी है। जल को छूना खतरे से खाली नहीं है। मुझे देखो, मैं यहां वृक्ष बना खड़ा हूं। क्या तुम भी वृक्ष बनना चाहोगे।’’

शहजादा ठिठका और दूसरे ही क्षण उसने अपने कदम पीछे खींच लिए। वह बोला-‘‘ओह! थकान ने मेरे सोचने-समझने की ताकत भी छीन ली। मैं तो इस तिलस्मी नदी के स्वभाव को जानता हूं।’’ शहजादा वृक्षों की ओर देखकर बोला-‘‘हे वृक्ष बन चुके पुरुष अपना परिचय दो। यह भी बताओ कि तुम वृक्ष कैसे बन गए? मैं शहजादा सलीम हूं।’’

स्वर ने कहा-‘‘शहजादा सलीम मेरा अभिवादन स्वीकार करें। मैं चतुरसेन हूं। काशीपुर के राजा केशवराज का सलाहकार। मैं किसी बुद्धिमान की तलाश में यहां से गुजरा और प्यास के चलते इस तिलस्मी नदी का जल पीने से बरगद का वृक्ष बन बैठा। मैं जिस समस्या के चलते यहां तक पहुंचा, उसी समस्या के निराकरण के पश्चात ही मुझे वृक्ष रूप से मुक्ति मिल सकेगी।’’

शहजादा सलीम बोला-‘‘आप तो सलाहकार हैं। फिर किसी बुद्धिमान की तलाश क्यो?’’

बरगद के वृक्ष से आवाज आई-‘‘शहजादे। काशीपुर के राजा केशवराज के दो राजकुमार हैं। एक का नाम है उदयराज है। दूसरे का नाम कंवलराज है। काशीपुर के राजा केशवराज किसी एक को राजगद्दी सौंपना चाहते हैं। पिछले एक बरस से उदयराज और कंवलराज काशीपुर के भ्रमण पर थे। जव वे लौटे तो राजमहल के मुख्य मार्ग में आने से पूर्व दोनों के रथ आमने सामने आ गए। दोनों के सारथी एक दूसरे को रास्ता देने क अनुरोध करने लगे। रास्ते से एक को अपना रथ पीछे कर हटना होगा, तभी दूसरा रथ मार्ग पर आगे बढे़गा। दोनों राजकुमार एक दूसरे को रास्ता देने पर अड़ गए। ’’

शहजादा सलीम मुस्कराया। कहने लगा-‘‘फिर क्या हुआ?’’
बरगद के वृक्ष से आवाज आई-‘‘शहजादे। दोनों के रथ आमने-सामने आज भी खड़े हैं। उदयराज और कंवलराज रथ से उतर कर राजमहल जा पहुंचे लेकिन किसी को भी अपना रथ पीछे हटना मंजूर नहीं था। अब राजा केशवराज के समक्ष समस्या यह है कि वह यह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि मार्ग पर खड़े दोनों रथों के किस सारथी को अपना रथ पीछे करना होगा और किसे पहले आगे बढ़ने का सममान मिलेगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘ओह! तो यह वर्चस्व को लेकर प्रतिष्ठा-मान-समामान का प्रश्न बन गया है। मुझे इन दोनों राजकुमार के स्वभाव और विशेषताओं के बारे में विस्तार से बताओ।’’  

बरगद के वृक्ष के भीतर से चतुरसेन ने दोनों राजकुमारों के बारे में शहजादा सलीम को विस्तार से बताया। चतुरसेन ने कहा-‘‘शहजादे सलीम। मुझे यकीन है कि आप मुझे वृक्ष रूप से मुक्ति दिला सकोगे। इस तिलस्मी नदी ने मुझे शाप दिया है कि जब तक राजकुमारों के रथ न्यायसंगत और तर्कसंगत रूप से उन दोनों राजकुमारों के संतुष्ट होने पर आगे बढ़ेंगे तभी मैं वृक्ष काया से अपने असले रूप में आ सकूंगा। जैसे ही यह होगा, मैं चतुरसेन हो जाउंगा और आपके आने पर ही यहां से प्रस्थान करूंगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘आचार्य चतुरसेन। मैं पूरा यत्न करूंगा। आप तो मुझे शुभकामनाएं दें।’’
बरगद का वृक्ष झूम उठा। वृक्ष के भीतर से चतुरसेन बोला-‘‘मैंने जिस तरह से सारी कथा आपको सुनाई है। तत्पश्चात जिस कौतूहल और जिज्ञासा से आपने राजन और राजकुमारों के बारें में विस्तार से जानना चाहा है निश्चित रूप से आप संकरे मार्ग में रुके हुए उन दोनों राजकुमारों के रथ को उचित मान-सममान देकर आगे बढ़ने के लिए बाध्य कर देंगे। अविलंब जाओ। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। आप चतुरसेन का नाम लेंगे तो राजन आपको सीधे निजी कक्ष में बुलाएंगे। मुझे पूरा भरोसा है।’’

दूसरे ही क्षण शहजादा सलीम अपने घोड़े पर सवार था। सलीम का घोड़ा तेज गति से काशीपुर की ओर बढ़ने लगा। 
वही हुआ। शहजादा सलीम महल के द्वार पर पहुंचा ही था कि द्वारपाल ने रोकते हुए पूछा-‘‘हे। अजनबी घुड़सवार आप बिना राजा की अनुमति के राजमहल में प्रवेश नहीं कर सकते। कृपया पहले अपना परिचय दें।’’

शहजादा सलीम बोला-‘‘मुझे चतुरसेन ने भेजा है। मैं तिलस्मी नदी के तट पर बरगद का वृक्ष बन चुके चतुरसेन का मित्र सलीम हूं। समय कम है। मेरी सूचना राजन तक पहुंचा दें। यदि वे मिलना चाहेंगे तो उचित है अन्यथा मैं लौट जाउंगा।’’

द्वारपाल ने दौड़कर सूचना राजा केशवराज को दी। दूसरे ही क्षण महामंत्री दौड़ता हुआ द्वार पर आ पहुंचा। वह बोला-‘‘सलीम। अभिवादन। हमारे राज्य में आपका स्वागत है। राजन अपने शयनकक्ष में ही आपसे मिलना चाहते हैं। चलिए शयनकक्ष के द्वार तक मैं आपको छोड़ सकता हूं।’’ शहजादे का घोड़ा अस्तबल के रक्षक ने अस्तबल तक सुरक्षित पहुंचा दिया। वहीं दूसरे ही क्षण शहजादा सलीम राजा केशवराज के निजी शयनकक्ष में पहुंच गया था। राजा केशवराज ने बड़ी आत्मीयता से स्वागत किया। सारा किस्सा जानकर शहजादा सलीम ने राजन का ढाढस बंधाते हुए कहा-‘‘राजन। कल सुबह दोनों राजकुमारो सहित मुझे आपके राज्य के चारों दिशाओं के चालीस-चालीस प्रबुद्ध नागरिक भी उस संकरे मार्ग पर उपस्थित चाहिए, जो दोनों राजकुमारों के काम-काज से वाकिफ हों।’’ राजा केशवराज बोले-‘‘आप चिंता न करें शहजादे सलीम। सब कुछ आपके अनुसार ही होगा।’’

सुबह हुई तो उसी संकरे मार्ग पर राजकुमार उदयराज और कंवलराज अपने अपने रथ पर सवार हो गए। मंत्री,महामंत्री,राजपुरोहित,महारानी और स्वयं राजा केशवराज भी उस मार्गस्थल पर आ पहुंचे। दोनों सारथी पहले की तरह अपने-अपने रथों पर सवार हो गए। राज्य काशीपुर की चारों दिशाओं से आए नागरिक भी यहां-वहां खड़े हो गए। शहजादा सलीम भी अपने घोड़े पर सवार था। 
शहजादा सलीम ने सारथियों से कहा-‘‘अपने अपने रथ आगे बढ़ाइए।’’

राजकुमार उदयराज का सारथी बोला-‘‘रास्ता संकरा है। एक रथ को पीछे हटकर रास्ता छोड़ना होगा। तभी दूसरा रथ आगे बढ़ सकेगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘तो फिर एक रथ पीछे हटे और दूसरे को रास्ता दे दे।’’
अब कंवलराज का सारथी बोला-‘‘यही तो समस्या है। यही तो तय होना है कि किस राजकंुवर का रथ आगे बढ़े और किस राजकुंवर को अपना रथ पीछे करना होगा। समस्या तो जस की तस बनी है।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘जिस रथ की नक्काशी बेहतरीन है। बहुमूल्य है। उसे आगे बढ़ने दो।’’
स्वर्णकार बुलाए गए। आंकलन किया गया। यह क्या! दोनों ही रथ एक समान मूल्यवान निकले।
शहजादा सलीम बोला-‘‘जो राजकुमार सदाचारी है,उसका रथ आगे बढ़ेगा।’’

राजपुरोहित बुलाया गया। आचार्य बुलाए गए। उनके मूल्यांकन के आधार पर दोनों राजकुमार एक समान सदाचारी पाए गए। 
शहजादा सलीम बोला-‘‘जो आयु में छोटा है, वह बड़े को रास्ता दे। बड़े के रथ को रास्ता दिया जाएगा।’’
महारानी आगे आईं। कहने लगी-‘‘उदयराज और कंवलराज जुड़वा है। वह ठीक एक ही घड़ी में पैदा हुए हैं। रूप, भार और सौंदर्य में भी वे एक समान हैं।’’
शहजादा सलीम ने कहा-‘‘तो ठीक है। अब निर्णय रथ के सारथी करेंगे। पिछले एक मास से दोनों राजकुमार राज्य का भ्रमण कर रहे थे। सारथी पल-पल अपने-अपने राजकुमार के साथ थे। वे ही बताएं कि उनके राजकुमार की क्या खास विशेषता एक राजा के तौर पर वे देखते हैं।’’

राजकुमार उदयराज का सारथी कहने लगा-‘‘मेरे राजकुमार महान हैं। वे शठे शाठ्यं समाचरेत् की नीति का पालन करते हैं। दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करते हैं। भले के साथ भला और बुरे के साथ बुरा करते हैं।’’ उपस्थित जन समुदाय में कुछ ने करतल ध्वनि से राजकुमार उदयराज का पक्ष लिया। 
अब कंवलराज के सारथी ने कहा-‘‘मेरे राजकुमार अच्छे का साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और बुरे के साथ भी अच्छा व्यवहार करते हैं। यह बुरों को भी अच्छा बनाने का सफल प्रयास करते हैं। इन्होंने कई अपराधियों के साथ अच्छा व्यवहार कर उनका मन जीता है।’’ यह क्या! इतना सुनते ही चारो दिशाओं से आई प्रजा कंवलराज के पक्ष में जयकरे लगाने लगी। वहीं दूसरी विचित्र बात यह हुई कि उदयराज ने अपने सारथी को आज्ञा देते हुए कहा-‘‘सारथी। हमारा रथ पीछे करो। आगे बढ़ने का पहला हक भ्राता कंवलराज का है।’’
दूसरे ही पल उदयराज के सारथी ने रथ पीछे हटाया। संकरे रास्ते के एक किनारे पर रथ को खड़ा किया, वहीं राजकुमार कंवलराज के रथ को मार्ग खुला मिला और वह आगे बढ़ता चला गया। 

पूरे प्रकरण की साक्षी जनता शहजादे सलीम को आदर भाव से निहार रही थी। इससे पहले कि राजा केशवराज शहजादे सलीम को धन्यवाद कहते, वह तेज गति से अपने घोड़े पर सवार होकर तिलस्मी नदी की ओर बढ़ चुका था। शहजादा सलीम जानता था कि राजा केशवराज का सलाहकार चतुरसेन बरगद के वृक्ष का रूप त्यागकर अपने मनुष्य रूप में आ चुका होगा। इससे पहले कि तिलस्मी नदी के आस-पास चतुरसेन के साथ कोई और अप्रिय घटना घटे, वह उसे सुरक्षित उस तिलस्मी क्षेत्र से बाहर जो निकालना चाहता था।  
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Manohar Chamoli 'manu'

10 अप्रैल 2016

जनवरी 2016 अपूर्व उड़ान

जनवरी 2016 अपूर्व उड़ान का दूसरा अंक है। आवरण देखते ही बनता है। चित्रांकन एवं ग्राफिक्स आशुतोष के हैं। विशुद्ध रूप से यह आवरण बालमन का ही है। बच्चों की दुनिया से लिया गया है। पतंग आज भी कौतूहल का विषय है। जो उड़ाना जानते हैं और जो नहीं भी। आवरण पत्रिका के नाम से मेल भी खाता है। 60 पेज की बहुरंगीय मासिक पत्रिका में नया साल 2016 का कैलेण्डर भी है। जिसमें तारें ज़मीन पर के दर्शिल को आसानी से पहचाना जा सकता है।

इस अंक में सात कहानियां,पांच कविताएं,दो चित्रकथाएं,छह स्थाई स्तंभ,आठ बच्चों के लिए खेल-खेल में सीखने विषयक गतिविधियां हैं। एक थीम स्टोरी भी है। छह विविध रचनाएं हैं, जिनमें से अधिकतर बाल सुलभ हैं।

संपादकीय सरल है। सहज है, आम भाषा में लिखा गया है। बच्चों से बात करता हुआ नज़र आता है। ठीक भी है। अपूर्व उड़ान ने मान लिया है कि यह पत्रिका बच्चों के लिए है बच्चों के लिए लिखने वालों के लिए नहीं। संपादकीय के बहाने संपादक राजेन्द्र प्रसाद तिवारी कई सारी बातों को आसानी से कह जाते हैं। वह अपनी बात सर्दी से शुरू करते हैं। नये साल की खुशबू भी संपादकीय में है। वहीं वह बच्चों को भारत के बारे में सोचने का सादा सा नज़रिया भी प्रस्तुत करते हैं। वह बच्चों को कमतर नहीं आंकते, न ही कुछ विशेष बनने की अपील करते हैं। वह तो बस इतना ही कहते हैं कि तुम्हारे भीतर प्रतिभा की कमी नहीं है। कहना होगा कि चुलबुली दुनिया के साथ-साथ पत्रिका अपने वैज्ञानिक नज़रिए के साथ बच्चों के मन में गहरी पैठ बनाएगी।

पांच पाठकों की चिट्ठी अंक में हैं। मज़ेदार बात यह है कि पांचों चिट्ठियां बच्चों ने लिखी हैं। कक्षा नौ तक पढ़ने वाले बच्चों के मन की आवाज़ चिट्ठियों में गूंजती है। पवन शर्मा ने अपनी थीम स्टोरी में सेवा के भाव को प्रमुखता दी है। दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चों में सेवा का भाव चरम पर होता है और सबसे अधिक होता है। वह खेल-खेल में ही घर के अंदर ही कई किलोमीटर की यात्रा कर लेते हैं। बिना थके और बिना रुके। पांच युगपुरुषों के परिचय के साथ सेवा का भाव करीने से संजोया गया है। तीन समाचार जो प्रत्यक्ष तौर पर बच्चों से ही जुड़े हुए हैं,शामिल किये गए हैं। एक चित्रकथा विवेकानंद पर गतांक से आगे चल रही है। चित्रकथा के चित्र बालमन के अनुरूप बने हैं। अक्षरों का आकार भी बालमन के अनुसार रखा गया है। मुस्कुराइये के तहत चार चुटकुले हैं। विज्ञान कथा कलैण्डर पर है। इसे जाने-माने बाल साहित्यकार एवं विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने सरल एवं रोचकता के साथ लिखा है।

मंगरूराम मिश्र, शांति अग्रवाल, डाॅ॰ फहीम अहमद, पूर्णिमा वर्मन, विनोद भृंग की कविताएं गुदगुदाती हैं। कहानियों में प्रख्यात बाल साहित्यकार डाॅ॰मंजरी शुक्ला, वरिष्ठ बाल साहित्यकार प्रकाश मनु, प्रख्यात बाल साहित्यकार डाॅ॰ नागेश पांडेय संजय, प्रखर बाल साहित्यकार अरविन्द कुमार साहु, स्कूली बच्चों की दुनिया को कहानी में विषय बनाने वाली बाल साहित्यकार अनीता चमोली ‘अनु’,बढ़ते बच्चों की तेजी से बदलती दुनिया की नब्ज़ पर गहरे हाथ रखने वाले बाल साहित्यकार डाॅ॰ मोहम्मद साजिद खान की नायाब कहानियां शामिल हैं। 

बच्चों ने भी अपने चित्र भेजे हैं। बच्चों की जीवंत फोटो भी पत्रिका में शामिल की गई है। इस तरह से लगभग बीस बच्चे प्रत्यक्ष रूप से इस अंक में जुड़ गए हैं। ज्ञानवर्धक बातें, सरल शब्द पहेली, कहानी पूरी करो, चित्र बनाओं प्रतियोगिता, मुहावरे ढूंढो, जनवरी क्विज़ शामिल हैं। बच्चों को ज्ञान-विज्ञान से हलके से सरलता से परिचित कराने के लिए भी स्तंभ रखे गए हैं। कुल मिलाकर पत्रिका बहुत जल्दी ही एक सशक्त बाल पत्रिका के तौर पर स्थापित होने की सम्पूर्ण क्षमता रखती है।
एक अनाम बाल नाटक भी पत्रिका में शामिल है। 

पवन शर्मा ने जनवरी को बड़े ही रोचक ढंग से बच्चों के लिहाज़ से प्रस्तुत किया है। हुनरमंद चार बच्चों की फोटो के साथ उनका विवरण भी पत्रिका में दिया गया है।

रंग संयोजन बालमन के अनुसार रखे गए हैं। कहीं-कहीं चटकीले रंगों ने आलेखों को मंद कर दिया है। कुल मिलाकर एक-एक पेज पर ध्यान रखने की भरपूर कोशिश की गई है। पत्रिका का कागज उम्दा है। ग्लैज़्ड पेपर वह भी एक-एक पेज रंगीन हैं। आवरण पेज और मोटा है, जिससे पत्रिका लंबे समय तक सुरक्षित रह सकेगी। 

e mail-apoorvudaan@gmail.com

अपूर्व उड़ान मासिक, 384, सेक्टर 36 नोएडा, गौतमबुद्धनगर
 उत्तर प्रदेश। 201301
। संपर्क-0120 4243133
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-मनोहर चमोली ‘मनु’

मोबाइल-09412158688

9 अप्रैल 2016

यादगार बन पड़ा है हिमप्रस्थ का बाल साहित्य विशेषांक child literature

यादगार बन पड़ा है हिमप्रस्थ का बाल साहित्य विशेषांक

-मनोहर चमोली ‘मनु’

साठ बरसों से मासिक पत्रिका हिमप्रस्थ संभवतः निरंतर प्रकाशित हो रही है। यह भी कि इस पत्रिका ने पहली बार वृहद बाल विशेषांक के तौर पर पाठकों के समक्ष अपनी जगह बनाई है। सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग, हिमाचल प्रदेश का यह अंक जनवरी-फरवरी 2016 के रूप में बाल साहित्य विशेषांक के लिए अविस्मरणीय बन गया है। बाल साहित्य के क्षेत्र में यह कई मायनों में मील का पत्थर साबित होगा। हिमाचल प्रदेश से संभवतः यह पहला अवसर होगा जब समग्र रूप से हिन्दी बाल साहित्य पर इतनी विपुल सामग्री एक साथ प्रकाशित हुई है। कविताओं, कहानियों के साथ-साथ यात्रा कथा, बाल नाटक,ग़ज़ल,लघु कथाएं, लोक कथाएं, नीति कथाएं, आलेख, समीक्षाएं शामिल हैं। 

हिमप्रस्थ वैसे तो साहित्यिक पत्रिका के तौर पर मशहूर है। कई अवसरों पर बालमन से जुड़ी रचनाएं भी पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं। इस अंक में बेजोड़ बाल साहित्य यहां संकलित हो गया है। इस बाल साहित्य विशेषांक में 76 से अधिक बाल साहित्यकारों की नवरंगी रचनाओं को एक मंच पर स्थान दिया है। मज़ेदार बात यह है कि 144 पेजों पर यह सामग्री एक साथ आई है और कई प्रसिद्ध बाल साहित्यकारों की उपस्थिति अपनी उत्कृष्ट रचनाओं के साथ हुई है। मोटे तौर पर 21 बाल साहित्यकारों के आलेख शामिल किये गए हैं। एक यात्रा कथा है। दो बाल नाटक हैं। 17 बालसाहित्यकारों की कहानियां हैं। 24 बाल साहित्यकारों की 46 कविताएं हैं। 10 बाल साहित्यकारों की 16 लघु कथाएं,लोक कथाएं और नीति कथाएं शामिल हैं। एक समीक्षा है। 

संपादन इतना लाजवाब हुआ है कि बड़े लेखों और रचनाओं से बचा गया है। ठीक भी है। बहुत जरूरी हुआ तो अधिक स्थान घेरने वाली रचनाएं कम या सबसे बाद में पढ़ी जाती हैं। ऐसे में यदि बाल साहित्य विशेषांक लंबी रचनाओं से अटा पड़ा हो तो उसकी पठनीयता पर सवाल उठने लगते हैं। इस बहाने हम बाल साहित्यकारों को अब यह आत्मसात् कर लेना ही होगा कि लंबी रचनाएं बहुत जरूरत पर ही लिखी जाएं, अब गद्य हो पद्य विधा। वही रचनाएं अधिक पसंद की जाती हैं जो सरल, सुबोध और सहज हों। अनावश्यक विस्तार लेती रचनाएं चाहे कितने ही बड़े या स्थापित रचनाकार की हो, पत्र-पत्रिका में स्थान तो पा लेती हैं लेकिन पढ़ी नहीं जाती। 

पौने दो पेज का संपादकीय एक साथ कई सारी बातें और विमर्श के मुद्दे उठाता है। संपादकीय जहां कल,आज और कल की बात करता है वहीं वह यह भी बताता है कि बचपन-लड़कपन -किशोरावस्था-युवावस्था का फासला कम होता जा रहा है। स्मार्टफोन और इंटरनेट के अधिकाधिक प्रयोग से बच्चों में नकारात्मकता का के आगमन से संपादकीय भी चिंतित है। संपादक वेद प्रकाश जी की संवेदनशीलता का परिचय इस बात से आसानी से लगाया जा सकता है कि वह लिखते हैं-‘आज के बच्चे बेहतर परवरिश में पल रहे हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में उनमें जो कुछ मौलिक था,विशेष था,अनूठा था,वह गायब हो रहा है। वह जो सीख रहे हैं,पढ़ रहे हैं,वह उन्हें मशीनी बना रहा है। बेशक यह उनके जीवन स्तर को सुख-सुविधाओं से सम्पन्न करेगा,लेकिन बहुत कुछ ‘अपना’ छीन भी रहा है।’
बहरहाल सादगी से यह अंक निकला है। कागज की गुणवत्ता संग्रहणीय योग्य है। कवर पेज भी मोटा है। हर रचना के साथ हरसंभव कोशिश की गई है कि एक तो रेखांकन हो। यह और रोचक बन पड़ा है। कवर पेज भी बालमन के अनुरूप है। चूंकि इसमें बालसाहित्य भी है और बाल साहित्यकारों का हिस्सा भी है। विशेषांक है तो आवरण पर और अधिक परिश्रम की अपेक्षा थी। आकार भी बेहतरीन है। फोंट भी आंखों को थकाता नहीं है। सामग्री को पठनीय बनाने के लिए स्थान को बेहद संकुचित नहीं किया गया है। कहीं भी सामग्री ठंूस कर नहीं भरी गई है। 

बाल साहित्यकारों में देवेन्द्र मेवाड़ी, गोविंद शर्मा, अशोक अंजुम, द्विजेंद्र द्विज, रजनीकांत शुक्ल, डाॅ॰ सुशीलकुमार फुल्ल, सुमन शर्मा, डाॅ॰ सुनीता, डाॅ॰ फकीरचंद शुक्ला,मृदुला श्रीवास्तव, अरविंद कुमार साहू, रत्न चंद ‘रत्नेश’, डाॅ॰मंजरी शुक्ला,सुशांत सुप्रिय,प्रकाश मनु, कृष्ण चन्द्र महादेविया, अनंत आलोक, शैलेन्द्र सरस्वती,अंकुश्री, रितेंन्द्र अग्रवाल, नरेन्द्र देवांगन, सुनीता तिवारी, गंगाराम राजी, विनोद ध्रब्याल राही, सुदर्शन वशिष्ठ, उषा छाबड़ा, डाॅ॰दिनेश चमोला ‘शैलेश’,शशिभूषण बडोनी,मंजू महिमा, हेमंत भार्गव, संजय वर्मा,सुमन शर्मा, शादाब आलम, प्रतिभा शर्मा, दिविक रमेश, डाॅ॰ छवि निगम, अभिनव अरुण, डाॅ॰ देशबंधु शाहजहांपुरी,रोचिका शर्मा,कृष्णा ठाकुर ,गोपाल शर्मा,कृतिका ठाकुर,विजयपुरी, कुमार भमौता की रचनाएं शामिल हैं। 

हिमप्रस्थ के इस अंक में सैनी अशेष की पांच लघुकथाएं भी हैं। बाल कविताओं के बहुरंग हिमप्रस्थ में चार चांद लगाते हैं। समकालीन बाल समाज पर पैनी नज़र रखने वाले बाल साहित्यकार जितेश कुमार की दो कविताएं यहां हैं। नवीन हलदूणवी की बहुरंगी दो कविताएं भी शामिल की गई हैं। वरिष्ठ बाल साहित्यकार जयप्रकाश मानस की तीन कविताएं, मनीषा जैन की चार कविताएं, नए तेवर की कविताओं के विशेषज्ञ डाॅ॰ फहीम अहमद के चार खास बालगीत इस अंक को विशिष्ट बनाते हैं। चर्चित बाल साहित्यकार परशुराम शुक्ल की दो कविताएं अपनी विशिष्टता के साथ शामिल हैं। वरिष्ठ बाल साहित्यकार डाॅ॰ प्रत्यूष गुलेरी की पांच खास कविताएं अपनी उपस्थिति और लंबे अनुभव की याद दिलाती हैं। राजीव कुमार ‘त्रिगर्ती’ की तीन कविताएं विविधता लिए हुए है। मशहूर बाल साहित्यकार प्रभुदयाल श्रीवास्तव की दो कविताएं अपने रंग में रंगी हैं। बाल साहित्यकार के चिंतक,आलोचक,समीक्षक और अपनी विशिष्ट रचनाओं के लिए मशहूर डाॅ॰ नागेश पांडेय ‘संजय’ की दो कविताएं अपनी नायाब धमक के साथ अपनी ओर ध्यान खींचती हैं। संजीव कुमार की तीन कविताएं अच्छी बन पड़ी हैं। इसके अलावा तेरह जाने-माने बाल कवियों की कविताएं भले ही एक-एक हैं, लेकिन वह भी अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुए है। कविता,ग़ज़ल और हाइकू को भव्यता के साथ स्थान मिला है।

पुष्पा भारती का लेख ‘बाल साहित्य में रचना होगा नया संसार‘, डाॅ॰ संगीताश्री का लेख ‘चरित्र निर्माण में बालपन के संस्कार, उमा ठाकुर का लेख युवाओ में नैतिक शिक्षा, राजेन्द्र पालमपुरी का लेख बालपन को संवारता साहित्य, भगवती प्रसाद गौतम का लेख कहां खो गया चहकता बचपन, मंजू गुप्ता का लेख आओ! लौटा दें मुस्कराता बचपन, कंचन शर्मा का लेख बच्चों का बदलता स्वभाव व व्यवहार,मनोज चैहान का लेख बालमन को समझना होगा, डाॅ॰रजनीकांत का लेख वर्तमान पीढ़ी की बदलती मानसिकता, वंदना राणा का लेख युवाओं को अनुशासन का पाठ, रमेशचन्द्र मस्ताना का लेख आज का युवा कल का भविष्य, विनोद भारद्वाज का लेख लोक संस्कृति में बालोपयोगी साहित्य, मनोहर चमोली ‘मनु’ का लेख बाल साहित्य में कल्पना और यथार्थ, डाॅ॰ राकेश चक्र का लेख किसी को तो बनना होगा मार्गदर्शक, आशा शैली का लेख रोचक एवं प्रेरणाप्रद हो बाल साहित्य, उमेशचंद्र सिरसवारी का लेख हिंदी बाल कविताओं में राष्ट्रीय चेतना,प्रकाशचंद्र का लेख बाल कविता और भवानी प्रसाद मिश्र, पवन चैहान का लेख वर्तमान समय में बाल पत्रिकाएं एवं साहित्य, प्रो॰योगेशचंद्र शर्मा का लेख विद्या की देवी मां सरस्वती, योगराज शर्मा का लेख स्वस्थ व शिक्षित बचपन पठनीय बन पड़े हैं। 

पुष्पा भारती अपने लेख में लिखती हैं-‘हमें ऐसे बाल साहित्य का निर्माण करना है, जो आज के वर्तमान समाज से बच्चों को जोड़े,पर साथ ही साथ उनमें वह दृष्टि भी पैदा करे जो बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाए। पर यह सब हम अपनी भाषा में उपदेश की शैली में नहीं कर सकते।’
डाॅ॰ संगीताश्री अपने आलेख में एक जगह लिखती हैं-‘हिंदी में, बाल साहित्य को अभी समय की चाल, बच्चों/बालकों की बढ़ती बौद्धिक मांग के अनुसार अपना स्वरूप् निर्मित करना होगा।’ राजेन्द्र ‘पालमपुरी’ का आशावादी लेख पठनीय है। वह लिखते हैं-‘किंतु बच्चों से दूर होते बाल साहित्य के बावजूद आज भी अच्छा साहित्य लिखा जा रहा है। और यह उम्मीद की जा रही है कि देर-सवेर तकनीक की उस चमकीली दुनिया से बच्चों का मोहभंग होगा और किताबें फिर से उनकी संगी-साथी बनकर और उनके नए नायकों की उंगली पकड़कर बचपन की दहलीज से पार उतारने में अपनी विशेष भूमिका अदा करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगी।’

मंजू गुप्ता अपने आलेख में लिखती हैं-‘आज के बच्चों के बचपन में पचपन नज़र आ रहा है। उनमें मस्ती,शरारत,रूठना-मनाना,नादानियां,भोलापन आदि नहीं रहा। उनका बचपन इंटरनेट के इंद्रजाल में फंस कर नेट पिटारे मंे अपनी दुनिया की अच्छाई-बुराई देख रहा है।’

डाॅ॰ राकेश चक्र लिखते हैं-‘जो भी परिवार वर्तमान परिवेश में जितना अधिक सुविधाभोगिता दिखावा और फैशन में डूबा है, वह उतना ही सत् साहित्य और बाल साहित्य से दूर होता जा रहा है।’

उमेश चंद्र सिरसवारी जी ने आजादी के बाद से अब तक बाल साहित्यकारों की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना के स्वर की पड़ताल गहनता से की है। पवन चैहान जी ने बाल पत्रिकाओं और बाल साहित्य के बहाने गहन पड़ताल की है। वह भी बाल साहित्य में वैज्ञानिक चेतना के पक्षधर हैं। योगराज शर्मा बचपन के बहाने अपने लेख में लिखते हैं-‘स्वास्थ्य के साथ शिक्षा भी सभ्य समाज के निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण अंग है।’ देवेंद्र मेवाड़ी का यात्रा कथा बड़ा ही रोचक बन पड़ा है। कहानी और कविताओं को पढ़कर टिप्पणी फिर कभी। कुल मिलाकर यह अंक ऐसा बन पड़ा है कि कोई भी बाल साहित्य प्रेमी इस अंक को अपने संग्रहणीय अंक से या अपनी निजी लाइब्रेरी से अलग नहीं कर सकता। हिमप्रस्थ से उम्मीद की जाती है कि वह इस आगाज़ को बनाये रखे। निरंतर अंकों में नियमित कुछ न कुछ बाल साहित्य सामग्री प्रकाशित करती रहे। 

पत्रिका: हिमप्रस्थ, मासिक
प्रधान सम्पादक: डाॅ॰ एम॰पी॰सूद
वरिष्ठ सम्पादक: यादविन्दर सिंह चैहान
सम्पादक: वेद प्रकाश
एक प्रति: 15 रुपए
सालाना शुल्क: 150 रुपए
पृष्ठ: 144
mail -himparasthahp@gmail.com
सम्पर्क: 0177 2633145, 2830374
मुखपृष्ठ एवं रेखांकन: सर्वजीत
प्रकाशक: निदेशक, सूचना एवंज न सम्पर्क विभाग,शिमला, हिमाचल प्रदेश।
समीक्षक: मनोहर चमोली ‘मनु’, सम्पर्कः 09412158688 
मेलः chamoli123456789@gmail.com

3 अप्रैल 2016

बाल कहानी, 'नया पुराना' : जनसत्ता, 6 March 2016 child literature

'नया-पुराना'

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-मनोहर चमोली ‘मनु’

बीस रुपए का पुराना नोट बटुए के भीतर आया।

उसे किसी ने टोका-‘‘अरे, अरे! जरा हट के। कहां चढ़े जा रहे हो?’’ 

बीस रुपए का एक नया नोट बटुए में पहले से था। वह गुस्से में था। 

पुराने नोट ने पैर पसारते हुए कहा-‘‘चढ़ नहीं रहा हूं भाई। अपने लिए जगह बना रहा हूं।’’
 नया नोट चिढ़ गया। बोला-‘‘उफ ! तुम कितने गंदे हो। मुड़े-तुड़े। दाग-धब्बों से भरे हुए हो। तुम्हारे शरीर पर तो कई छेद हैं। तुमसे से बदबू भी आ रही है। मुझे देखो। एकदम नया हूं। नोट की गड्डी से सीधे यहां आया हूं।’’

पुराना नोट हंसने लगा। नया नोट चैंका। बोला-‘‘हंस क्यों रहे हो?’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘मैं भी कभी नया था। मेरे शरीर में भी तुम्हारी तरह रंगों की खुशबू आती थी। मैं भी कभी करारा था। खूब फड़फड़ाता था। लेकिन याद रखो। तुम भी मेरे जैसे हो जाओगे।’’ 
नया नोट बोला-‘‘मेरे नयेपन से तुम्हें जलन हो रही है। मुझे तुम्हारी तरह नहीं होना है। मैं कई दिनों से इस बटुए में हूं। हमेशा यहीं रहूंगा। समझे तुम।’’

पुराना नोट चुप नहीं रहने वाला था। बोला-‘‘समझ गया। लेकिन तुम्हें भी समझा रहा हूं। माना कि मैं पुराना पड़ चुका हूं, लेकिन तुम्हारी कीमत और मेरी कीमत में कोई अंतर नहीं है।’’ 

बात अभी चल ही रही थी कि बटुए के सभी नोट सहम गए। हाथ का अंगूठा, तर्जनी और मध्यमा उंगली ने बटुए के भीतर झांका। पुराना नोट खींच लिया गया। नए नोट ने राहत की सांस ली और वह आराम से सो गया।

एक दिन अचानक फिर वही बीस रुपए का पुराना नोट बटुए में आ गया। 
नए नोट ने आंखें दिखाते हुए पूछा-‘‘तुम ! फिर आ गए?’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘मैं कहां आया। मुझे तो लाया गया। वैसे भी मुझे घुटन पसंद नहीं है।’’ 
नया नोट बोला-‘‘हैरान हूं। इस आरामदायक जगह में तुम्हें घुटन हो रही है! वैसे इतने दिन थे कहां?’’ 
पुराना नोट पैर पसारते हुए बोला-‘‘सबसे पहले मेरे बदले में दो चाॅकलेट ली गईं। मैं गया गल्ले पर।’’ 
नया नोट बोला-‘‘चाॅकलेट ! गल्ले पर ! ये गल्ला क्या होता है?’’ 
पुराने नोट ने हंसते हुए बताया-‘‘अरे, दुकानों पर हम नोटों के लिए एक गल्ला रखा होता है। हम सब वहां रखे जाते हैं। खैर छोड़ो। मैं गल्ले में रखे नोटों से बात कर ही रहा था कि दुकानदार ने मुझे एक ग्राहक को पकड़ा दिया। ग्राहक ने मुझे अपने बटुए में रख लिया।’’

नया नोट फिर चैंका। बोला-‘‘दुकानदार ! ग्राहक !’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘मुझे तुम पर दया आती है। अरे, हम नोट खरीददारी में बहुत काम आते हैं। हमारे बदले दुकानदार ग्राहकों को सामान देते हैं। जो हम नोटों से सामान खरीदता है, उसे ग्राहक कहते हैं। हद है। तुम्हारा जीना ही बेकार है। इस बटुए में पड़े रहोगे तो दुनिया कैसे देखोगे। अब यह मत पूछना कि दुनिया किसे कहते हैं।’’ 
नया नोट झेंपते हुए बोला-‘‘हां, मैं तो यही पूछने वाला था।’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘हम नोट बनें ही इसलिए हैं कि हम चलें। चलना ही जिंदगी है। मैं हजारों किलोमीटर की यात्रा कर चुका हूं। सैकड़ों शहर घूम आया हूं। अनगिनत बार गिना जा चुका हूं। लेकिन तुम क्या जानों की चलना-ठहरना क्या होता है। सैकड़ा-हजार क्या होता है। यात्रा किसे कहते हैं।’’

नया नोट उदास हो गया। मायूस होकर धीरे से बोला-‘‘बड़े भाई। माफ करना। मैं तो मशीन में छपकर सीधे यहां लाया गया हूं। इस बटुए के अलावा मैंने कुछ देखा ही नहीं। तुम्हारी बातों से तो लगता है कि दुनिया बहुत बड़ी है। अब तुम ही कुछ करो। मुझे भी दुनिया दिखाओ।’’

पुराना नोट बोला-‘‘चिंता मत करो। इस बार मुझे जैसे ही इस बटुए से बाहर खींचा जाएगा। तुम मुझसे चिपके रहना। मैं बहुत चल गया हूं। कमजोर हो गया हूं। एक झटके से मेरे दो हिस्से हो जाएंगे। बस फिर मेरे बदले तुम्हें ही बाहर जाना होगा।’’ 

नया नोट चैंका। बोला-‘‘मैं समझा नहीं।’’ पुराना नोट हंसते हुए बोला-‘‘छोटे भाई। हमारा भी जीवन होता है। मेरे दो हिस्से हो जाने पर मुझे कोई नहीं लेगा। बस फिर बीस रुपए के लिए बटुए से दूसरा नोट निकाला जाएगा। फिलहाल तुम्हारे अलावा इस बटुए में दूसरा बीस का नोट है ही नहीं।’’ नया नोट बोला-‘‘नहीं-नहीं। मेरे लिए तुम भला अपनी जान क्यों दोगे।’’

तभी अंगूठा, तर्जनी और मध्यमा उंगली ने बटुए में झांका।

 यह क्या !  बटुए के सभी नोट बाहर निकाल लिए गए। सभी नोट एक मिठाई की दुकान के गल्ले में जा पहुंचे। बटुए के नोट गल्ले में रखे नोटों के साथ जा मिले। अच्छा हुआ कि पुराने नोट के दो हिस्से नहीं हुए। मैं भी बटुए से बाहर आ गया। बीस रुपए का नया नोट गल्ले में आकर यही सोच रहा था।


॰॰॰ -मनोहर चमोली ‘मनु’

2 अप्रैल 2016

'बंद हुआ हंसना',-मनोहर चमोली ‘मनु’,बाल कहानी,जनसत्ता child literature

बंद हुआ हंसना 

-मनोहर चमोली ‘मनु’

जूते हंसने लगे तो जुराब ने पूछ लिया-‘‘हंस क्यों रहे हो?’’

 बांया जूता बोला-‘‘अपनी हालत तो देखो।’’

 दांये जूते ने इशारा किया-‘‘तुम्हारे भीतर से अंगूठा बाहर झांकने लगेगा। अब तुम पहनने लायक नहीं रहे।’’ जुराब ने खुद को देखा तो परेशान हो गया। जुराब बोला-‘‘दूसरों पर हंसना अच्छी बात नहीं।’’ 
तभी आशमां आई और जुराब पहनने लगी। जुराब के भीतर से अंगूठा झांक रहा था। आशमां ने जुराब उतारा और सुई-धागे से फटी जगह को सिल लिया। जुराब पहनकर उसने जूते पहन लिए।
 जुराब ने जूते से कहा-‘‘देख लो। आशमां ने हमें पहन लिया है।’’ जूते झेंप गए।
एक दिन जूते फिर हंसने लगे। जुराब ने पूछा-‘‘क्या हुआ?’’
 बांया जूता बोला-‘‘अपनी हालत देखो। ढीले हो गए हो। आशमां पहनेगी तो तुम लटककर एड़ी पर झूलने लगोगे।’’ 

जुराब खुद को देखने लगे और उदास हो गए। आशमां आई और जुराब पहनने लगी। दोनों जुराब वाकई पैरों की पिंडलियों से एड़ी पर आ गए। इस बार आशमां ने जुराब नहीं उतारे। वह रबड़बैंड ले आई। उसने जुराब के ऊपरी सिरों पर रबड़बैंड चढ़ा लिए। अब जुराब खिसक नहीं रहे थे। आशमां ने जूते पहने और घूमने चली गई। एक जुराब जूतों से बोला-‘‘देखा लिया ! आशमां ने हमें उतारा नहीं। हमारे ढीलेपन का उपाय खोज लिया गया।’’ जूते बगले झांकने लगे।

एक दिन फिर जूते हंसने लगे। जुराब ने पूछा-‘‘अब क्या हुआ?’’ 
दांया जूता बोला-‘‘खुद को देखो। तुम दोनों एड़ियों से फट चुके हो।’’ 
बांया जूता चिढ़ाते हुए बोला-‘‘अब तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता। आशमां तुम्हें नहीं पहनेगी। देख लेना।’’ 

आशमां आई और जुराब पहनने लगी। एड़ियों से जुराब वाकई फट चुके थे। आशमां ने जुराबों को उलटा। पलटा। कुछ देर सोचा। आशमां ने जुराबों को अच्छी तरह से धोया। सुखाया। रंग-बिरंगे-सुनहरे धागों से जुराबों मंे कड़ाई की। जुराबों में रुई भरी। अब जुराब आशमां के कमरे में सज-धज कर मुस्करा रहे थे। वहीं जूते दरवाजों के पीछे अंधेरे कोने में चुपचाप पड़े थे। अब जूतों ने जुराबों पर हंसना बंद कर दिया। ॰॰॰
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31 मार्च 2016



बाल भास्कर अंक 12 फरवरी 2016 : पूरी कहानी यहां पढ़ी जा सकती है।
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'बस ! एक सेकंड'

-मनोहर चमोली ‘मनु’
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‘‘सृजन। अपनी काॅपिया संभालो।’‘
सृजन कहता-‘‘एक सेकंड। मम्मी।’’
‘‘सृजन। उठो। स्कूल के लिए देर हो जाएगी।’’
सृजन जवाब देता-‘‘एक सेकंड। पापा।’’
‘‘सृजन। कब से खड़ा हूं। जल्दी तैयार हो जाओ। मार्केट नहीं चलना क्या?’’
सृजन चिल्लाता-‘‘एक सेकंड। दादाजी। बस, अभी आया।’’
सृजन जैसे-जैसे बड़ा होता जा रहा था, वैसे-वैसे उसकी आदतों में बदलाव आता जा रहा था। उसकी मम्मी यह सोचकर चुप हो जाती कि बढ़ते बच्चे की आदतों का बदलना स्वाभाविक है। लेकिन सृजन के दादाजी चिंतित थे। वे जानते थे कि नकारात्मक आदतों का जीवन में गहरा असर पड़ता है। वे सही वक्त की प्रतीक्षा में थे। सृजन इन दिनों हर बात को हल्के ढंग से लेने लगा था।
एक बार की बात है। सुबह हो चुकी थी। सृजन सोया हुआ था। मम्मी ने आवाज लगाते हुए कहा-‘‘सृजन उठो। स्कूल नहीं जाना क्या।’’ सृजन ने रजाई में मुँह घुसा लिया। अलसाते हुए बोला-‘‘बस एक सेकण्ड मम्मी। मैं अभी उठता हूँ।’’ सृजन की मम्मी रसोई के काम में जुट गई। उधर सृजन को पिफर से नींद आ गई। आध घण्टे बाद जब मम्मी की आवाज़ उसके कानों में दोबारा पड़ी तो वह अचानक बड़बड़ाते हुए उठा। उसने चिल्लाते हुए कहा-‘‘ओह! शिट्! मम्मी। स्कूल के लिए देर हो गई है।’’ सृजन जैसे-तैसे स्कूल पहुँचा। स्कूल में उसे खूब डाँट पड़ी।
गर्मियों के दिन थे। सृजन मुहल्ले में खेल रहा था। उसकी मम्मी ने कहा-‘‘बेटा। मुझे बाज़ार जाना है। जल्दी से आओ और दूध पी लो। ठंडा हो रहा है।’’ सृजन ने वही रटा-रटाया जवाब दिया-‘‘मम्मी, बस एक सेकण्ड में आया।’’ थोड़ी देर बाद सृजन की मम्मी ने फिर आवाज लगाई-‘‘सृजन। मैं बाजार जा रही हूँ। गैस में दूध रखा है। जब वो उबल जाए तो उसे अलमारी में रख देना।’’ सृजन ने अपनी आदत के अनुसार कहा-‘‘ठीक है मम्मी। आप जाओ। मैं एक सेकण्ड में आया।’’ सृजन खेलता रहा। दूध गैस में उबलता रहा। जब दूध उबलकर गैस में गिरने लगा तो उसकी जलने की गंध चारों ओर फैलने लगी। सृजन रसोई की ओर दौड़ा। तब तक दूध उफनकर एक तिहाई रह गया था। उसका गिलास में रखा दूध बिल्ली पी चुकी थी। काँच का गिलास फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया था। सृजन के दादाजी टहलकर वापिस लौट रहे थे। वे सीधे रसोई में आये तो सारा माजरा समझ चुके थे। वे बोले-‘‘सृजन। तुम रहने दो। झाड़ू ले आओ। काँच के टूकड़े मैं उठाता हूँ।’’
‘‘एक सेकण्ड दादाजी। बस अभी लो।’’ सृजन हाथ से ही उन काँच के टूकड़ों को उठाने लगा। तभी कुछ काँच के टूकड़े उसकी अँगुली में घुस गए। दादाजी बोले-‘‘मैंने कहा था न। पर तुम्हारा ये एक सेकण्ड। अब छोड़ो इसे। पहले डाॅक्टर के पास चलो।’’ दादाजी सृजन को डाॅक्टर के पास ले गए। वापिस लौटते हुए दादाजी सृजन से बोले-‘‘बेटा। समय किसी का इंतजार नहीं करता। मगर तुम घंटो, मिनटों और सेकण्डों का महत्व नहीं समझते। तुम्हें लगता है कि एक सेकण्ड में क्या जाता है।’’ सृजन बोल पड़ा-‘‘हाँ दादाजी। वैसे एक सेकण्ड होता तो बहुत छोटा ही है। एक सेकण्ड एक मिनट का साठवाँ हिस्सा होता है। बस और इससे ज़्यादा क्या।’’ यह सुनकर दादाजी हँस पड़े। बोले-‘‘यही तो। मैं कई दिनों से तुम्हें देख रहा हूँ। एक सेकण्ड कहने में ही एक सेकण्ड बीत जाता है। पर तुम्हारा एक सेकण्ड कभी समय पर पूरा ही नहीं होता। एक सेकण्ड में घड़ी का पेंडुलम एक दोलन कर लेता है। तुमने तो बड़ी आसानी से कह दिया कि एक मिनट में साठ सेकण्ड होते हैं। ज़रा बताना एक दिन में कितने सेकण्ड होते हैं?’’
सृजन का दिमाग चकरा गया। वो चुप ही रहा। दादा जी ने प्यार से समझाते हुए कहा-‘‘औसतन एक दिन में छियासी हजार चार सौ सेकण्ड होते हैं। अगर कोई रेल सौ किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्रतार से चल रही है तो वो एक सेकण्ड में अट्ठाईस मीटर चल देती है। तुम्हारे एक सेकण्ड आलस करने से कुछ नहीं बिगड़ता। शायद तुम ऐसा सोचते हो। मगर एक सेकण्ड में दुनिया में बहुत कुछ हो जाता है।’’ सृजन सिर खुजलाते हुए बोल ही पड़ा-‘‘दुनिया में क्या हो जाता है दादाजी?’’ दादाजी ने मुस्कराते हुए कहा-‘‘बताता हूँ। एक सेकण्ड में दुनिया में औसतन तीन बच्चे जन्म ले लेते हैं। इस तरह एक मिनट में एक सौ अस्सी बच्चे जन्म ले लेते हैं। यानि एक दिन में लगभग दो लाख उनसठ हजार दो सौ बच्चे पैदा हो जाते हैं। यही नहीं एक सेकण्ड में औसतन एक शादी हो रही है। यानि हर दिन लगभग छियासी हजार चार सौ शादियाँ हो रही हैं। अब बोलो। क्या एक सेकण्ड का कोई मतलब नहीं है?’’
‘‘है दादाजी है। मैंने पहले कभी ध्यान नहीं दिया। लेकिन अब मैं ध्यान दूंगा। ये लो। हम घर भी पहुँच गए। सबसे पहले तो मुझे मम्मी से माफी माँगनी है। मेरी वजह से आज दूध उबलकर गिर गया। गिलास भी टूट गया।’’ यह कहते हुए वह रसोई की ओर चला गया।
॰॰॰ 
-मनोहर चमोली ‘मनु’



साहित्य अमृत,बाल-संसार : कहानी. अप्रैल 2016.......... 'न टूटे मन'

साहित्य अमृत,बाल-संसार : कहानी. अप्रैल 2016.......... 'न टूटे मन'
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रक्षिता दौड़ते हुए कुसुम से लिपट गई, ‘‘ममा! आज स्कूल-प्रोग्राम फाइनल हो गए हैं। डांस में मेरा भी सलेक्शन हुआ है। पता है, हमारी क्लास का एक ही प्रोग्राम सलेक्ट हुआ है। होली के अवसर पर ब्राइट स्टार स्कूल फेस्टीवल होगा। बड़ा मजा आएगा।’’ कुसुम ने हँसते हुए कहा, ‘‘बहुत बढि़या। लेकिन अभी तो डेढ़ महीना है।’’ रक्षिता तो अपनी बात कहने को आतुर थी, ‘‘ममा, कुल दस प्रोग्राम हैं। आज से प्रैक्टिस भी शुरू हो गई है। अब सिक्स्थ पीरियड के बाद डेली प्रैक्टिस होगी। पता है, डबल होमवर्क मिलेगा। मस्ती के साथ पढ़ाई भी होगी।’’ यह कहकर रक्षिता ने कपड़े चेंज किए और मुँह-हाथ धोकर होमवर्क करने में जुट गई।
एक महीना बीत गया। फिर एक दिन स्कूल से आते ही रक्षिता ने कहा, ‘‘ममा, फाइनल प्रैक्टिस हो गई है। हम चार परियाँ बनेंगी और चार राजकुमार बनेंगे। क्लास टीचर ने कहा है कि परियाँ सफेद ड्रेस, सफेद जूते और सफेद चुनरी लाएँगी। सफेद मुकुट, वो भी चमचमाता हुआ होना चाहिए और सफेद छड़ी।’’ कुसुम ने सुना तो उसका दिल बैठ गया। दस घरों में काम करने के बदले में जो रुपया मिलता है, उससे महीने भर
का गुजारा ढंग से नहीं हो पाता।
पड़ोसी एंथोनी डिया चर्च जाने से पहले अपना बेबी कुसुम के हाथों सौंप देते हैं। चार घंटे की देखभाल के बदले में हर माह वह दो हजार रुपए की मदद करते हैं। इस तरह मकान किराया, स्कूल फीस, रोटी-कपड़ा, दूध-राशन का खर्च बड़ी मुश्किल से निकलता है। दीवाली से पहले ही वह उनसे दो महीने का एडवांस लेकर काम चला रही थी। अब यह एक और खर्च आ गया। इस सोच को झटकते हुए कुसुम ने कहा, ‘‘चिंता की बात नहीं। इस संडे बाजार चलेंगे। सारा सामान ले आएँगे।’’
दूसरे ही दिन कुसुम ने एंथोनी डिया को सबकुछ विस्तार से बताया तो वे बोले, ‘‘कोई बात नहीं, बच्ची का मन नहीं टूटना चाहिए।’’ रविवार आया तो कुसुम रक्षिता को बाजार ले गई। स्कूल से मिली सूची के अनुसार सबकुछ खरीद लिया गया। रक्षिता ने घर आकर परी की ड्रैस पहन ली। कुसुम ने रक्षिता का माथा चूम लिया, ‘‘वाह! बिल्कुल परी लग रही हो।’’ रक्षिता आँखें मटकाती हुई बोली, ‘‘ममा, मैंने डांस में खूब मेहनत की है। आप मेरा डांस देखने जरूर आना।’’ ‘उस दिन एंथोनी डिया के बेबी की देखभाल कौन करेगा। दस घरों की मालकिनें एक दिन का रुपया काट लेंगी।’ कुसुम यही सोच रही थी। लंबी साँस लेते हुए बोली, ‘‘कौन माँ होगी, जो अपनी बेटी का प्रोग्राम देखने नहीं आएगी। मैं जरूर आऊँगी।’’
होली से एक दिन पहले स्कूल में प्रोग्राम तय हो गया। रक्षिता सुबह पाँच बजे ही उठ गई। एक बार आईने के सामने रिहर्सल करने के बाद वह स्कूल के लिए तैयार हो गई। जाते हुए कहने लगी, ‘‘ममा, ठीक दस बजे आ जाना। लेट मत होना।’’ कुसुम हँसते हुए बोली, ‘‘मैं पाँच मिनट पहले ही आ जाऊँगी।’’
कुसुम ने एक दिन पहले ही आज की छुट्टी के बारे में हर घर में बता दिया था। एंथोनी डिया ने हँसते हुए कहा था, ‘‘कोई बात नहीं, चर्च की सिस्टर बेबी को देख लेगी। स्कूल के प्रिंसिपल मेरे दोस्त हैं। शायद मैं भी आऊँ। जरूर जाओ। बच्ची का मन नहीं टूटना चाहिए।’’ कुसुम ठीक समय पर स्कूल पहुँच गई। प्रोग्राम शुरू हो गया। प्रिंसिपल अपने स्कूल की उपलब्धियाँ गिना रहे थे। फिर कल्चरल प्रोग्राम शुरू हो गए। एक से बढ़कर एक प्रस्तुति मंच पर आती रहीं। तालियों की गड़गड़ाहट से दर्शक हर प्रोग्राम का स्वागत कर रहे थे। घोषणा हुई, ‘‘अब आखिरी प्रस्तुति परियों के देश से।’’
कुसुम की आँखें तो मंच पर अपनी रक्षिता को खोज रही थीं। अचानक उसे ध्यान आया कि रक्षिता तो कह रही थी कि चार परियाँ बनेंगी। लेकिन मंच पर तो तीन परियाँ ही हैं। राजकुमार भी तीन ही हैं। कुसुम किनारे से होते हुए मंच के पीछेवाले हिस्से में जा पहुँची। मंच के बाईं ओर ड्रेसिंग रूम बना हुआ था। कुसुम को देखते ही रक्षिता सिसकते हुए कहने लगी, ‘‘ममा, एक राजकुमार कम हो गया तो एक परी भी कम कर दी गई। मेरी ड्रैस पहनकर दीया डांस कर रही है।’’
कुसुम की आँखें भर आईं। गला रुँध गया। वह कुछ न कह सकी। डांस टीचर कहने लगी, ‘‘डांस फोर पेयर्स में था। एक स्टूडेंट नहीं आया। सारा कॉम्बीनेशन खराब हो गया। मंच पर अब तीन पेयर्स ही डांस कर रहे हैं। दीया की ड्रैस वीक थी तो हमने रक्षिता की ड्रैस उसे पहना दी।’’
‘आपने जो किया। बहुत अच्छा किया। बच्चों की आँखों के आँसुओं का बहना तो आप लोगों के लिए आम बात है।’ कुसुम यह कहना चाहती थी, लेकिन कह नहीं पाई।
घर आकर कुसुम ने रक्षिता से कहा, ‘‘रोते नहीं, क्या पता बिलाल की तबीयत खराब हो गई हो। हो सकता है, उसकी ममा बीमार हो।’’ रक्षिता रोते-रोते चुप हो गई। कहने लगी, ‘‘कल संडे है, बिलाल के घर चलेंगे।’’ दोपहर दो बजे के बाद वे दोनों बिलाल के घर का पता पूछते-पूछते धोबीघाट जा पहुँचीं। दीया रास्ते में मिल गई। रक्षिता को ड्रैस लौटाते हुए बोली, ‘‘रक्षिता, अच्छा हुआ तुम यहीं मिल गई। यह लो, तुम्हारी परी वाली ड्रैस। इस ड्रैस में मेरी फोटो बहुत अच्छी आई हैं। कल स्कूल में दिखाऊँगी।’’
रक्षिता ने चुपचाप ड्रैस ले ली। ड्रैस लेकर वह बिलाल के घर की ओर बढ़ गई। वे दोनों धोबीघाट की झुग्गियों में आ गईं। बिलाल मिल गया। बिलाल की माँ शबीना बीमार थी। होटल की सफेद चादरें धोने-सुखाने का काम पड़ोसियों ने किया था। अब उन चादरों को बिलाल समेट रहा था। बिलाल उन्हें अपने घर में ले आया। कोने में राजकुमार वाली ड्रैस पॉलीथिन में पैक रखी हुई थी।
शबीना बोली, ‘‘मैं बड़ी जतन से यह ड्रैस लाई थी। मैं ही जानती हूँ कि इसका बंदोबस्त मैंने कैसे किया था। दुख इस बात का है कि बिलाल इसे पहन नहीं पाया।’’ बिलाल की दीदी रुखसार चाय बनाकर लाई तो कुसुम और शबीना बातें करने लगीं। कुछ देर बाद अचानक कुसुम को ध्यान आया, ‘‘ये रक्षिता कहाँ चली गई?’’ कुसुम बाहर की ओर दौड़ी। बाहर देखा तो कुछ ही दूरी पर झुग्गी-झोंपड़ी के बच्चे बिलाल और रक्षिता को घेरकर खड़े हैं। कुसुम के पीछे-पीछे शबीना भी चली आई।
इससे पहले कि कुसुम कुछ कहती, बिलाल और रक्षिता का डांस शुरू हो चुका था। दर्शकों का घेरा तोड़कर कुसुम ने देखा कि वे दोनों राजकुमार और परी की ड्रैस पहने हुए थिरक रहे हैं। रुखसार के हाथ पर मोबाइल में वही गाना बज रहा था, जो स्कूल प्रोग्राम में उसने सुना था। बड़े-बूढ़े भी बच्चों की भीड़ देखकर जुटने लगे। डांस जैसे ही खत्म हुआ, तालियों के बीच कोई चिल्लाया, ‘एक बार और...’ रुखसार ने गाना रिपीट किया तो बिलाल और रक्षिता फिर से थिरकने लगे।
तभी धूल उड़ाती हुई एक स्कूल बस वहाँ आकर रुकी। वह बस ब्राइट स्टार स्कूल की थी। बस से एंथोलीन डिया और स्कूल प्रिंसिपल बाहर आए। वह भी सारा नजारा देखकर खुश हुए। गाना खत्म होने से पहले ही झुग्गी-झोंपड़ी के दर्शकों ने हवा में नोट उछालने शुरू कर दिए। एंथोलीन डिया ने कुसुम से कहा, ‘‘
ब्राइट स्टार स्कूल का प्रोग्राम देखने मैं भी गया था। मंच पर रक्षिता को न देखकर मुझे भी हैरानी हुई। समापन के बाद मैंने प्रिंसिपल से बात की। देखो, माफी माँगने के साथ-साथ यह भी कहने आए हैं कि कल ही प्रातःकालीन सभा में सभी कल्चरल प्रोग्राम दोबारा होंगे। पड़ोसी स्कूलों के बच्चे और स्टाफ भी प्रोग्राम देखने आएँगे। स्कूल फंड से सभी को इनाम भी मिलेगा।’’ प्रिंसिपल ने कहा, ‘‘मैंने पूरी रिकॉर्डिंग कल ही देख ली थी, लेकिन बिलाल और रक्षिता का यह प्रोग्राम तो उसमें भी नहीं है। मैं चाहूँगा कि इन दोनों का यह स्पेशल प्रोग्राम सब देखें। एक बात और, इस बस्ती के बच्चे पेरेंट्स सहित प्रोग्राम देखने आएँगे तो मुझे अच्छा लगेगा। हम पूरी कोशिश करेंगे कि अब किसी भी बच्चे का मन न टूटे।’’
सब हाँ में सिर हिला रहे थे। कोई मना क्यों करता! कुसुम और शबीना की आँखें भर आईं। गला रुँध गया। वे क्या कहतीं। वहीं सारी बातों से बेखबर बिलाल और रक्षिता तो दर्शकों के बीच में झूम रहे थे।
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पौड़ी गढ़वाल-246001 (उत्तराखंड)
दूरभाष : 09412158688

9 नव॰ 2015

दीवाली की अगली सुबह नन्हे सम्राट दिसंबर 2015

दीवाली की अगली सुबह

-मनोहर चमोली ‘मनु’


दीवाली से एक दिन पहले की सुबह थी। हर कोई बड़ा उत्साहित था, लेकिन मोहित, हरजीत और इरफान की आंखों में विशेष चमक थी। वह जहां भी जा रहे थे, एक साथ जा रहे थे। आंखों ही आंखों में झांकते और मुस्कराने लग जाते। जाॅन किनसुर ने पूछ भी लिया था-‘‘मैं कई दिनों से देख रहा हूं। तुम तीनों की एक्टीविटी अलग सी हो गई हैं। क्या कुछ चल रहा है तुम्हारे दिमाग में? हमसे भी शेयर करो यार।’’ कुलबिन्दर ने कहा-‘‘ये हमेशा से ऐसे ही हैं। जब भी कोई त्योहार आता है, ये अलग टोली बना लेते हैं। दीवाली आ रही है, इनके दिमाग में कुछ हट कर चल रहा होगा। रहने दो। दीवाली के दिन पता चल ही जाएगा।’’ बात आई गई हो गई।
आज दीवाली है। कुलबिन्दर के साथ जाॅन किनसुर सुबह से ही इन तीनों की निगरानी कर रहे थे। वे इन दोनों को देखते और सिवाय मुस्कराने के कुछ बोल ही नहीं रहे थे। काॅलोनी बहुत बड़ी थी। काॅलोनी की टाइप बिल्डिंगस में मोहित, हरजीत और इरफान चक्कर लगा रहे थे। आंखों ही आंखों में झांकते और मुस्कराने लग जाते। शाम होते-होते तीनों ने काॅलोनी के दो चक्कर लगा लिये थे। अंधेरा होने से पहले वह काॅलोनी के पार्क में बैठे हुए थे।
मोहित ने पूछा-‘‘हरजीत। डंडों का इंतजाम हो गया?’’ हरजीत ने हां में सिर हिलाया। इरफान ने पूछा-‘‘अरे हां। टार्च का?’’ हरजीत बोला-‘‘डोंट वरी। तुसी ये मेरे पे छोड़ दो। दादी के पास जो मोबाइल है, उसकी टार्च पावरफुल है। ये देखो। कल तक मोबाइल मेरे पास ही रहेगा। और दसो।’’ मोहित ने धीरे से कहा-‘‘एक बैग भी तो चाहिए था?’’ इरफान ने कहा-‘‘है मेरे पास।’’
हरजीत बोला-‘‘आज ज्यादा जागने की जुरूरत नहीं है। मस्ती करो और जल्दी सो जाओ। सुबह अंधेरे में उठने के लिए एलार्म लगा लेना। अपने-अपने घर से निकल कर यहीं पार्क में मिलना है। ठीक पांच बजे।’’
इरफान बोला-‘‘पांच नहीं, यार चार बजे करो। पूरी काॅलोनी कवर करनी है। इससे पहले कोई जाग जाए, हमें अपना काम खत्म कर लेना है। किसी ने देख लिया तो।’’ मोहित बोला-‘‘ठीक कहते हो। हमें एक जगह से दूसरी जगह भी तो जाना होगा। इस पार्क को देख रहे हो। बहुत बड़ा है। यहां भी हमें बहुत समय लग जाएगा। वैसे हर जगह स्ट्रीट लाईट्स हैं। हमें ज्यादा दिक्कत नहीं होगी।’’
हरजीत बोला-‘‘सब हो जाएगा। बस दो बंदों से संभलकर रहना होगा। सोनू और साजिद से। उनकी नज़र भी मिस पटाखों पर रहती है। वे भी हर साल सुबह-सवेरे पटाखें खोजने आते हैं। पिछली दिवाली में तो उन दोनों ने मेरे उठाए पटाखे छीन लिए थे। वे दो थे और मैं अकेला। इस बार तो हम तीन है। डंडे हमारे पास रहंेगे ही। मैं तो धुनाई कर दूंगा।’’ मोहित बोला-‘‘ओए रहने दे। हमें किसी से लड़ाई नहीं करनी है। हमें तो आज मिस हुए पटाखे उठाने हैं और चल देना है।’’
हरजीत बोला-‘‘ओके। यार। कल सुबह चार बजे। हैप्पी दीवाली।’’ सब अपने-अपने घर की ओर चल पड़े। दीवाली का धूम-धड़ाका देर रात तक चलता रहा। हरजीत, मोहित और इरफान पटाखों की आवाजें़ सुनते और मन ही मन मुस्कराते। उन्हें पता था कि रात के अंधेरे में कई बार पटाखों को जलाते समय उनकी बाती पर आग नहीं लग पाती और वह बिना जले ही छूट जाते हैं। यही मिस बम-पटाखे तो उन्होंने सुबह उठाने का प्लाॅन किया था। वह भी सबसे पहले। काॅलोनी में तो कई होंगे, जो सुबह-सुबह उठकर मिस पटाखें उठाने के लिए काॅलोनी का चक्कर लगाएंगे। लेकिन वे तो चार बजें उठने वाले हैं वह भी एक साथ। 
भोर हुई। वे तीनों पंहुच गए। इरफान बोला-‘‘किसी को कोई दिक्कत तो नहीं हुई? सबके पास डंडे हैं न? मैं ये दो और ले आया। काॅलोनी में कुत्ते बहुत हैं।’’ हरजीत और मोहित चुप रहे। हरजीत बोला-पार्क के बम बाद में उठाएंगे। पहले टाईप वन में चलो। फिर टाईप टू में जाएंगे और फिर टाइप थर्ड में। समय बचा तो तब टाइप फोर में जाएंगे नहीं तो पार्क में आ जाएंगे।’’ मोहत बोला-‘‘यही ठीक रहेगा।’’
अभी वह टाईप वन के आस-पास के मिस पटाखे खोज-खोज कर बैग में भर रहे थे कि हरजीत बोला-‘‘ओ तेरे की। यह बैग तो भर गया। अब क्या करें?’’ इरफान बोला-‘‘चलो कोई बात नहीं। अपनी ज़ेबें भी भर लेते हैं। चलो जल्दी करो।’’ थोड़ी देर बाद मोहित बोला-‘‘मेरे तो सारे जे़ब भर गए। पटाखें हैं कि मिलते ही जा रहे हैं। अब क्या करूं?’’ यही हाल हरजीत का और इरफान का था। इरफान बोला-‘‘हमें अलग-अलग बैग लाने चाहिए थे।’’ हरजीत बोला-‘‘अब किसी को क्या पता था कि लोगों को पटाखें छुड़ाने भी नहीं आते। यह बैग क्या कम बड़ा है? हम सभी के जेबों में भी पटाखें हैं।’’ मोहित बोला-‘‘ज़रा सोचो। पूरी काॅलोनी में मिस पटाखे कितने होंगे? हम बेकार में अंधेरे में आए। हमसे अच्छे तो वे हैं जो आराम से सोकर जागेंगे और आराम से काॅलोनी का चक्कर लगाएंगे।’’
इरफान बोला-‘‘मैं ऐसा करता हूं। घर लौट जाता हूं। घर के स्टोर में एक बैग रखा है। वह इससे भी बड़ा है। ले आता हूं।’’ मोहित बोला-‘‘ठीक है। हम तीनों चलते हैं। कुत्तों का डर हो सकता है।’’ तीनों इरफान के घर की ओर चल पड़ते हैं। बैग लेकर वह टाईप वन में वापिस लौट आते हैं। कुछ ही देर में वह बैग भी भर ज9ाता है। हरजीत खुश होते हुए बोला-‘‘वाह ! मजा आ गया। हमारा तो यह बैग भी भर गया। इतने पटाखे जमा हो गए है कि हम एक महीने की दीवाली मना सकते हैं। क्यों?’’ इरफान बोला-‘‘देखो यार, हमें एक भी कुत्ता नहीं मिला। चलो वापिस अपने घर चलते हैं। सुबह होते ही फिर पार्क में मिलते हैं।’’
सुबह हुई। तीनों पार्क में आ पहुंचे। पार्क का नज़ारा देखते ही वह हैरान थे। सूरज आसमान में था। लेकिन रात हुई पटाखेबाजी के कारण वह धुंधला दिखाई दे रहा था। 
इरफान बोला-‘‘मोहित। कुछ समझ में आया?’’
मोहित ने कहा-‘‘हां यार। काॅलोनी वालों ने पार्क का सत्यानाश कर दिया। मुझे याद है हमने जून में इस पार्क के किनारे पेड़ लगाए थे। देख रहा हूं कि कल दीवाली के धूम धड़ाकों में वे सारे मुरझा गए हैं।’’ तभी कुलबिन्दर और जाॅन किनसुर भी आ गए। हरजीत बोला-‘‘ये भी पटाखे उठाने आए हैं। अपना प्लान मत बताना।’’ कुलबिन्दर बोल पड़ी-‘‘हम भी तुम्हारे पीछे-पीछे थे। हमसे क्या अपना प्लाॅन छिपाओगे। तुम दो बैग्स भर कर ले गए। हमारे पास तीन बैग्स भरे हुए हैं।’’
जाॅन किनसुर ने कहा-‘‘एक बात तो तय है कि यदि हमारी काॅलोनी का यह हाल है तो इसका मतलब यह है कि पूरे देश में करोड़ों पटाखे मिस हुए होंगे।’’ हरजीत बोला-‘‘जरा सोचो। ये करोड़ों के पटाखों में कितना रुपया खर्च किया गया होगा?’’ मोहित ने कहा-‘‘हां यार। सूरज को देख रहे हो। नौ बजने वाले हैं और ऐसा लग रहा है कि सूरज आज पूरब से आया ही नहीं होगा।’’ जाॅन किनसुर ने कहा-‘‘एक बात नोटिस की तुम सबने? इस काॅलोनी के कुत्ते कहां गए। कल से सब गायब हैं। पटाखों के शोर से उनके कानों का क्या हुआ होगा?’’
इरफान ने कहा-‘‘काॅलोनी के मिस पटाखों के अलावा पटाखों का कचरा देख रहे हो। ये सब क्या है यार। अब देखो। हमने जो पटाखे इकट्ठा किये हैं, उनका क्या करें?’’ मोहित ने कहा-‘‘ये हालत देखकर मुझे नहीं लगता कि हम उन्हें जलाएं।’’ इरफान बोला-‘‘हमारे जलाने न जलाने से क्या होता है। पब्लिक तो जला ही रही है। कान फोड़ू धमाके किसने नहीं सुने कल। पूरी रात शोर ही शोर था।’’
कुलबिन्दर बोली-‘‘हम भी तो पब्लिक का हिस्सा हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि हम सब ठान लें कि पटाखों की दीवाली नहीं खेलेंगे। दीप जलाएंगे। केंडल जलाएंगे। घर की साफ-सफाई करेंगे। क्या हम इतना भी नहीं कर सकते?’’
इरफान बोला-‘‘यार ये आइडिया बुरा नहीं। लेकिन हमने आज सुबह जो पटाखे इकट्ठा किये हैं उनका क्या करें?’’ जाॅन किनसुर बीच में ही बोल पड़ा-‘‘चर्च के फादर कहते हैं। जो चीजें आपकी काम की न हो, वो किसी ओर के काम की हो सकती हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि अगली दीवाली में हम पूरी काॅलोनी वालों को कन्वेंस करें कि जो इस बार के बचे पटाखें हैं,उन्हीं से दीवाली मनाएं। नए पटाखे न खरीदें।’’ कुलबिन्दर ने कहा-‘‘आइडिया बुरा नहीं। हम दो थे। तुम तीन हो। अब हम पांच हो गए हैं। हो सकता है हमारे इस प्लान में कुछ फरेन्डस और जुड़ जाएं। मिलाओ हाथ।’’
तब तक सोनू और साजिद आ गए। सोनू बोला-‘‘हम भी तुम्हारे साथ हैं। यार वाकई। ये पटाखे तो बहुत बुरे हैं। हमारा कुत्ता तो कल से गायब है।’’ साजिद ने कहा-‘‘हमारे घर के दोनों तोत पटाखों के धूल-धड़ाकों से बेसुध पड़े हैं। शायद ही बचेंगे।’’
सबने एक-दूसरे से हाथ मिलाया और अपने घर की ओर चल पड़े। 
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मनोहर चमोली ‘मनु’,भितांई,पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड। मोबाइल-09412158688

नन्हे सम्राट दिसंबर 2015 प्रदूषण रहित नई दीवाली


प्रदूषण रहित नई दीवाली  


मनोहर चमोली ‘मनु’

हर बार की तरह मोतीवन में दीवाली को हर्ष और उल्लास से मनाये जाने की तैयारी शुरू हो गई थी। इसके लिए पीपल के पेड़ के नीचे बैठक बुलाई गई। शेर की तबियत खराब थी। बैठक की अध्यक्षता हाथी कर रहा था। 
हाथी ने चिंघाड़ते हुए कहा-‘‘यह हमारी नाक का सवाल है। मोतीवन हमेशा देर रात तक पटाखे जलाता है। आस-पास के जंगलवासी हमारी दीवाली देखने के लिए आते हैं। हर कोई धूम-धड़ाके से दीवाली मनाएगा।’’
चूहा उठ खड़ा हुआ। बोला-‘‘ये इक्कसवीं सदी है। दीवाली को नये तरीके से मनाने का वक्त आ गया है। क्या जरूरी है कि हम सैकड़ों पटाखे जलाकर ही अपना दम-खम दिखायें। क्या सादगी से दीवाली नहीं मनाई जा सकती? मैं न तो एक पटाखा खरीदूंगा और न ही अपने आस-पास किसी को भी धूम-धड़ाका करने दूंगा।’’ 
यह कहकर चूहा चला गया। बैठक बिना नतीजे के समाप्त हो गई। लोमड़ और सियार दौड़कर शेर की मांद पर जा पहुंचे। उन्होंने बढ़ा-चढ़ाकर बैठक का सारा किस्सा शेर को सुनाया। 
बीमार शेर कराहते हुए चिल्लाया-‘‘’मोतीवन में मेरे आदेश के बिना पत्ता भी नहीं हिलना चाहिए। फिर भला किस की हिम्मत हुई जिसने यह कहलवा दिया कि दीवाली में धूमधड़ाका नहीं होगा। बताओ।’’ राजा शेर सिंह ने दहाड़ते हुए पूछा।
लोमड बोला-‘‘ अभी सारा किस्सा सुनाया तो आपको। ये सब चूहे  का किया-धरा है। वह घर-घर जाकर अफवाह फैला रहा है कि यदि हम दीवाली इसी तरह मनाते रहे तो यह धरती खत्म हो जाएगी। यदि हम बम-पटाखे जलाते रहे तो एक दिन हम सब मर जाएंगे। आप भी।’’
शेर दहाड़ा। उसने आदेश देते हुए कहा-‘‘ ये बात है। ऐसा करो उस चूहे को जिन्दा मेरे सामने पेश किया जाए। अभी के अभी। मैं भी तो सुनूं कि वह पागल क्यों हो गया है। वह कहता क्या है?’’
चूहे ने बैठक में लोमड और रंगी सियार की हंसी उड़ाई थी। कुछ जानवर तो चूहे की बात का समर्थन भी करने लगे थे। लोमड़ और सियार को इसी अवसर की तलाश थी। वह दौड़कर चूहे  को पकड़ कर ले आए। चूहा भी निडर होकर शेर से मिलने चला आया।
रंगी सियार ने शेर से कहा-‘‘ये लीजिए महाराज। यह है आपका गुनहगार। हम सभी का गुनहगार। इसी ने मोतीवन में घूम-घूम कर कहा है कि हमें बम-पटाखे नहीं जलाने चाहिए। यह कहता है कि मोमबत्ती जलाओ। दीये जलाओ। अंधकार को भगाओ। बस। ’’
शेर चूहे को घूरते हुए दहाड़ा-‘‘हम्म। तो तुम हो। पिद्दी भर के चूहे। अरे मूर्ख। दीवाली क्या रोज-रोज आती है? दीवाली साल में एक ही बार तो आती है। मोतीवन में धूम-धड़ाका नहीं होगा तो आसपास के जंगलवासी क्या कहेंगे। क्या हम इतने कंगाल हो गए हैं? तेरे पास बम-पटाखे नहीं हैं, तो क्या हुआ। डरपोक मुझसे ले जाना। ’’
 चूहे ने विनम्रता से जवाब दिया-‘‘ तभी तो कह रहा हूं एक दिन में ही हम अपने मोतीवन का कबाड़ा कर देते हैं। दीवाली सादगी से मनाएंगे तो हमारा मोतीवन और भी खुशहाल हो जाएगा। दूसरी बात यदि महाराज। दीपावली में बम-पटाखे जलाते रहे तो एक दिन ऐसा आएगा कि आप भूखे ही रह जाओगे।’’
शेर उठ खड़ा हुआ। वह चैंकते हुए बोला-‘‘मैं भूखा रह जाऊंगा? कैसे? ये तू क्या अनाप-शनाप बक रहा है। तेरा दिमाग तो नहीं चल गया?’’
चूहे ने कहा-‘‘दीपावली में बम पटाखे जलाने से ध्वनि प्रदूषण होता है। कई छोटे-बड़े जीव-जन्तु तो डर के मारे कई दिनों तक भूखे-प्यासे ही रह जाते हैं। सैकड़ो हैं जिनकी आंखों की रोशनी मंद पड़ जाती है। सैकड़ों के कान हमेशा के लिए बहरे हो जाते हैं। दहशत से कई तो मर भी जाते हैं। आपने देखा कई जानवर तो कई दिनों तक गायब से ही हो जाते हैं।’’
शेर दहाड़ा-‘‘उससे मुझे क्या? कोई दीवाली मनाये न मनाये। डरे न डरे। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। बस पहले तुम तो यह बताओ कि मैं भूखा भला क्यो रह जाऊंगा? दीपावली पर पटाखों के जलाने से मेरी भूख का क्या संबंध है?’’
 चूहे ने कहा-‘‘वही तो बता रहा हूं। आप तो जानते ही हैं कि प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है। मोतीवन के दोनों तालाब का पानी लगातार घट रहा है। इस बार तो बारिश भी नहीं हुई। बम पटाखों से निकलने वाली गैसें और प्रदूषण से उत्सर्जित कार्बन ने ओजोन परत में सुराख कर दिया है। ये सुराख बढ़ता ही जा रहा है। गरमी बढ़ रही है। सर्दियों में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। गर्मियों में गर्मी बढ़ रही है। क्या आप नहीं जानते? जानते हैं न?’’
रंगी सियार बीच में ही बोल पड़ा-‘‘महाराज। ये  चूहा बहुत चालाक है। अब ये आपको कहानी सुनाने लगा है। इसने बैठक में भी कई जानवरों को बहला-फुसला दिया है। इसकी बात मत सुनो। ये कहां की कहां लगा रहा है।’’
लोमड भी रंगी सियार की हां में हां मिलाते हुए कहने लगा-‘‘लगता है यह अपनी जान बचाने का कोई तरीका खोज रहा है। किस्सा-कहानी सुनाने से आपकी भूख का क्या मतलब है?’’
शेर सिंह ने चूहे से कहा-‘‘रुको तो। ये नई-नई बात बता रहा है। अच्छा चूहे ये तो बता कि ये ओजोन परत क्या है? उससे हमारा क्या लेना-देना? तू बात तो दिलचस्प कह रहा है।’’
 चूहे ने बताया-‘‘बताता हूं। हमारे आसमान में एक छतरीनुमा विशालकाय परत है। जिस प्रकार छतरी धूप-बारिश से बचाती है उसी प्रकार ये ओजोन परत सूरज की तीव्र और नुकसान पहुंचाने वाली किरणों को धरती पर आने से रोकती है। लेकिन इस ओजोन परत पर सुराख हो गया है। यह सुराख बढ़ता ही जा रहा है। अब यदि हम सुराख वाली छतरी लेकर घूमेंगे तो बारिश में भीग जाएंगे। इसी प्रकार अब सूरज की तीव्र किरणें उस सुराख से सीधे धरती तक आ रही है। इस कारण धरती पर असाधारण बदलाव दिखाई देने लगे हैं। जिनकी बात मैंने पहले भी की थी।’’
शेर ने पूछा-‘‘बदलाव ! कौन से बदलाव की बात कर रहा है तू?’’
 चूहे ने बताया-‘‘जैसे अधिक गर्मी का होना। अधिक बारिश का होना। सूखा पड़ना या कहीं बाढ़ आना। बेमौसम में बारिश का होना। कहीं बहुत बारिश होना तो कहीं एक बूंद का न गिरना। ’’
शेर ने पूछा-‘‘ओह ! लेकिन यार ये तो बता कि बमपटाखों से ओजोन परत का क्या संबंध है?’’
च्ूहा बोला-‘‘संबंध है तभी तो कह रहा हूं कि बम-पटाखें हम सब के लि खतरनाक हें। बम-पटाखों को जलाते समय इनसे मैग्नेशियम कार्बन मोनो अक्साइड, कापर मैग्नेशियम सल्फर नाइट्रोजन भारी मात्रा में निकलती है। इन गैसों की मात्रा वायुमंडल में बढ़ जाती है। प्रदूषण बढ़ता है और ओजोन परत को नुकसान पहुंचता है।’’
शेर बोला-‘‘हुं। ये बात है। मैं समझ गया। लेकिन मेरे भूखे रह जाने का क्या मतलब है? ये तो बता। ’’
 चूहे ने कहा-‘‘जी बताता हूं। यदि ओजोन परत का सुराख बढ़ता ही जाएगा तो सूरज की किरणे सीधे हम तक बहुत तेजी से पहुंचने लगेंगी। वे किरणें बेहद हानिकारक होती हैं। धरती गर्म से और गर्म हो जाएगी। होती जाएगी। होती जाएगी। हमारा जीना मुहाल हो जाएगा। घास हरे-भरे वृक्ष झुलस कर सूख जाएंगे। बारिश नहीं होगी। शाकाहारी जीव बिना घास-पात के मर जाएंगे। जब शाकाहारी जीव ही नहीं रहेंगे तो आप मांसाहारी भोजन कैसे कर पाएंगे? क्या आप घास खाएंगे। घास भी कहां से खाओगे? जब बारिश ही नहीं होगी तो घास कहां उगेगी। तालाब सूख जाएंगे तो बिना पानी के कितने दिन रहोगे?’’
शेर सिंह गुर्राया-‘‘ ये बात है।  चूहे जी तुम सही कहते हो। आज से तुम मोतीवन के ही नहीं, मेरे भी सलाहकार बनाए जाते हो। आज से तुम मेरे आस-पास ही रहोगे।’’
लोमड बीच में ही बोल पड़ा-‘‘मगर महाराज। आपका सलाहकार तो मैं हूं। मैं आपको हर बार नई से नई सूचना देता रहता हूं। मेरा क्या होगा?’’
शेर सिंह दहाड़ा-‘‘चुप रहो। तुम और रंगी सियार अभी जाओ। समूचे मोतीवन में एक-एक जीव को, एक-एक जंतु को बता दो कि इस बार से दीपावली सादगी से मनाई जाएगी। यही नहीं दीपावली के अवसर पर हम मोतीवन में विशाल वृक्षारोपण के लिए गड्ढे खुदवाएंगे। पौधशाला का निर्माण कराएंगे। बरसात आते ही विशाल वृक्षारोपण किया जाएगा। जाओ। सुनो। बम-पटाखों को जलाने वालों के लिए कड़ी से कड़ी सजा देने का फैसला भी किया जाता है। इसे भी सुना दो।’’
लोमड और रंगी सियार दुम दबाकर मोतीवन की ओर दौड़ पड़े। वहीं दरबारी नये सलाहकार के स्वागत में चूहे के लिए तालियां बजा रहे थे। पीपल के पेड़ के नीचे एक बैठक फिर से बुलाई जाने वाली थी। इस बैठक में नई दीवाली को मनाने की कार्ययोजना बनाने की तैयारी भी शुरू हो गई थी। 
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मनोहर चमोली ‘मनु’,भितांई,पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड।
 मोबाइल-09412158688


दीपावली पर विशेष अब अबसेंट नहीं नन्हे सम्राट दिसंबर 2015

दीपावली पर विशेष: अब अबसेंट नहीं


-मनोहर चमोली ‘मनु’

 दीपावली नजदीक आती तो आर्यन उदास हो जाता। यहां तक तो ठीक था, लेकिन वह दीपावली के बाद तीन-चार दिन स्कूल ही नहीं आता।
नई क्लास टीचर रेहाना ने स्टाॅफ रूम में आर्यन को बुलाया। स्टाॅफ रूम में बुलाना स्टूडेन्टस में सनसनी फैला देता था। आर्यन और मायूस हो गया। वह धीरे-धीरे स्टाॅफ रूम की ओर बढ़ने लगा। उसे पता नहीं था कि खिड़की से टीचर रेहाना ने उसे देख लिया था। उम्मीद से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जब आर्यन स्टाॅफ रूम के अंदर नहीं पहुंचा तो रेहाना टीचर खुद ही बाहर आ गई। आर्यन दरवाजे की ठीक बाहर खड़ा था।
रेहाना ने चैंकते हुए कहा-‘‘बाहर कब से खड़े हो? अन्दर क्यों नहीं आए?’’ आर्यन की आंखें जमीन पर गड़ी रही। रेहाना ने हौले से आर्यन का बांया कांधा छूआ और उसे अंदर ले गई। आर्यन का उदास चेहरा देख, रेहाना ने प्यार से कहना शुरू किया-‘‘आर्यन। आप अच्छे स्टूडेंट हो। मैं इस स्कूल में नई आई हूं। अब मैं स्टाॅफ रूम में उन स्टूडेन्टस को ही बुलाया करूंगी, जो मुझे अच्छे लगते हैं।’’
अभी तक आर्यन जमीन को घूर रहा था। रेहाना की बात सुनकर वह चैंक पड़ा। वह धीरे से बोला-‘‘आप तो नई हो। आपको कैसे पता कि कौन स्टूडेंट अच्छा है?’’
रेहाना को हंसी आ गई। अपनी हंसी को छिपाते हुए वह बोली-‘‘मैं नर्सरी से लेकर अब तक के अटेंडेंस रजिस्टर देख रही थी। आप रेगुलर स्टूडेंट हो। आपकी अटेंडेंस सबसे अच्छी है। लेकिन हर साल दीपावली के आस-पास तुम अबसेंट रहते हो? क्या बात है?’’
आर्यन रेहाना के मुंह पर देखता ही रह गया। वह हैरान था। अब तक किसी ने इस बात पर कहां ध्यान दिया था कि वह दीपावली के आस-पास क्यों अबसेंट रहता है?
‘‘बोलो। आर्यन,क्या बात है? तुम चुप क्यों हो?’’ रेहाना ने पूछा।
आर्यन चुप रहा। उसकी आंखें बड़ी-बड़ी हो गई। वह पलक झपकाना तक भूल गया। रेहाना समझ गई कि यदि वह जोर देगी तो आर्यन की भीग आईं आंखों से आंसू टपकने लगेंगे।
रेहाना ने बात बदल दी। कहने लगी-‘‘कोई बात नहीं। तुम नहीं बताना चाहते तो कोई बात नहीं। बस मैं तुम्हारी अटेंडडेंस से खुश हूं। मैं तुम्हारे लिए एक पेंसिल, एक इरेज़र और एक कटर लाईं हूं। ये लो। इस साल भी तुम्हारी अटेंडेंस बेस्ट होगी तो मैं अच्छा सा गिफ्ट दूंगी। और हां। कुछ भी हो। यदि इस बार दीपावली में तुम अबसेंट नही रहोगे तो मुझे अच्छा लगेगा। अब जाओ।’’
आर्यन दौड़कर अपनी क्लास में जाकर बैठ गया। थोड़ी ही देर में पूरी क्लास को पता चल गया कि रेहाना टीचर ने आर्यन को गिफ्ट में पेंसिल,कटर और इरेजर दिया है। क्यों दिया है? यह किसी को नहीं पता था। 
दीवाली नजदीक थी। आर्यन की उदासी थी कि हर बार की तरह बढ़ती ही जा रही थी। लेकिन पहली बार किसी ने उसके साथ अपनापन दिखाया था। वह अक्सर रेहाना के बारे में सोचता। उसका मन हर बार एक ही बात कहता-‘‘इतने सालों से किसी ने कहां पूछा था कि वह दीपावली के अवसर पर स्कूल आना बंद क्यों कर देता है। कुछ भी हो। इस बार में एक भी दिन अबसेंट नहीं रहूंगा।’’
यही हुआ। वह रोज़ स्कूल आता रहा। कल से दीपावली की छुट्टियां हो रही थीं। रेहाना टीचर ने क्लास में आईं। कहने लगी-‘‘लिसन टू मी। हैप्पी दीपावली। बट केयरफुल। पटाखे पेरेंटस की परसेंस में ही छुड़ाना। ओके? और हां चार दिन की छुट्टियां हैं। इन्ज्वाय यूअरसेल्फ।’’
‘‘यस मैम।’’ आर्यन को छोड़कर सभी स्टूडेंटस जोर से चिल्लाते हुए बोले। रेहाना टीचर ने देखा कि आर्यन सिर झुकाकर उदास बैठा था। रेहाना टीचर अटेंडेंस रजिस्टर लेकर क्लास से बाहर चली आई। 
चार दिनों की छुट्टियों के बाद स्कूल खुला। जिसे देखो वह दीवाली की ही बात कर रहा था। सभी स्टूडेंटस बढ़ा-चढ़ाकर दीवाली में पटाखे छोड़ने की बात कर रहे थे। प्रातःकालीन सभा के बाद जैसे ही क्लास में अटेंडेंस हुई तो रेहाना टीचर ने आर्यन की ओर मुस्कराते हुए देखा। आर्यन का चेहरा फिर भी उदास था। अटेंडेंस हुई। रेहाना टीचर ने कहा-‘‘तो बच्चों। दीपावली को खूब इन्ज्वाय किया होगा। है न?’’
दीपाली खड़ी हुई-‘‘मैम। इस बार तो मैंने बम भी फोड़ा। बड़ा मज़ा आया।’’
रुखसार बोली-‘‘मैम। मेरे अब्बू ने पूरा राकेट बाॅक्स मुझे दे दिया। कुलविन्दर के साथ हमने बोटल में रखकर राकेट आसमान में छोड़े। बड़ा मजा आया।’’
रैहट स्टीक ने बताया-‘‘मैंम। हम सब पहले चर्च गए। उसके बाद फादर ने हम सभी को एक-एक पैकेट अनार बम का भी दिया। वैरी फनी।’’
मोहित ने बताया-‘‘मैम। हरजिन्दर और अनीस मेरे घर पर पटाखे फोड़ने आए थे। मम्मी ने हमारे लिए कई स्वीट डिश बनाई थी। हमने खूब इंज्वाय किया।’’
एक के बाद एक स्टूडेंटस दीपावली के बारे में बता रहे थे। अचानक रेहाना टीचर ने पूछा-‘‘अरे। आर्यन। तुम भी तो बताओ। तुम्हारी दीवाली कैसी रही?’’
कंवलजीत बीच में ही बोल पड़ा-‘‘ये क्या बताएगा मैम। मैं बताता हूं। आर्यन दीपावली नहीं खेलता। ये बम-पटाखों से दूर ही रहता है।’’ यह सुनकर आर्यन की आंखें भर आई। ऐसा लग रहा था कि बस अभी वह रो पड़ेगा।
तभी रेहाना टीचर ने पूछा-‘‘सोनाली। तुम बताओ। तुम्हारी दीवाली कैसी रही?’’
सारिया ने जवाब दिया-‘‘मैम। दीवाली के दिन ही सोनाली के घर में पटाखों से आग लग गई थी। इसके पापा की डैथ हो गई थी। तब से सोनाली के घर में दीवाली नहीं मनाई जाती।’’
रेहाना टीचर ने कहा-‘‘ओह! साॅरी सोनाली। मुझे पता नहीं था। बाई दि वे। हम सभी को त्योहार केयरफुली मनाने चाहिए। ओके। अभी मैं चलती हूं। मौका मिला तो मैं इंटरवल के बाद आप सभी से बात करने आऊंगी।’’ यह कहकर रेहाना टीचर चली गई। दूसरे ही क्षण मैथ्स पढ़ाने के लिए सक्सेना टीचर आ गए थे। 
इंटरवल हुआ तो आर्यन की उदासी कुछ कम हो गई। वह सुबह से ही गहरी सोच में डूबा हुआ था। उसे अपने ऊपर गुस्सा भी आ रहा था। वह बार-बार सोनाली की ओर देख रहा था। सोनाली मैथ्स के टीचर सक्सेना जी के पढ़ाने से पहले ही अपने चेहरे की उदासी दूर कर चुकी थी।
सोनाली को अपनी ओर आता देख वह चैंक पड़ा। साथ में सारिया भी थी। सोनाली ने कहा-‘‘आर्यन। हम सभी हैरान है कि तुम पहली बार दीवाली की छुट्टियों के बाद सीधे स्कूल आ गए। जस्ट इमेजिन। क्या तुम दीवाली मनाने कहीं दूर जाते हो? क्या तुम्हारा गांव कहीं ओर है?’’
तभी वहां कंवलजीत आ गया। वह बोला-‘‘ये कहीं नहीं जाता। कहां जाएगा? इस बेचारे के पास कभी पाकेटमनी तक तो होती नहीं। सही बात तो यह है कि इसकी फीस भी बड़ी मुश्किल से पे होती है।’’
सोनाली ने डांटते हुए कहा-‘‘शटअप। कंवलजीत। तूझे शरम भी है कि नहीं। ऐसे बात करते हैं? फिर मैंने आर्यन से पूछा तेरे से नहीं। समझे।’’
कंवलजीत और जोर से बोल पड़ा-‘‘ओए होए। तूझे काहे को मिर्ची लग रही है? अच्छा। अब समझा। तेरी भी सैमपेथी है आर्यन के साथ न। भूखे-नंगे एक साथ। हाहाहा।’’
सारिया ने बीचबचाव करते हुए कहा-‘‘ये ऐसे नहीं मानेगा। चलो हम सब प्रिंसिपल सर के पास चलते हैं। इस स्टूपिड को मैं पहले भी कई बार वार्निंग दे चुकी है।’’
आर्यन धीरे से बोला-‘‘रहने दो। कंवलजीत ने कौन सा कुछ गलत कहा है।’’ यह कहकर वह क्लास की ओर चला गया। सोनाली ने कहा-‘‘क्लास में क्यों जा रहे हो? अभी तो इंटरवल शुरू हुआ है।’’ यह कहकर वह भी क्लास की ओर चल पड़ी। बाकी स्टूडेंटस खेल में मस्त हो गए।
‘‘आर्यन। साॅरी। मुझे यह सब नहीं पूछना चाहिए था। मेरी वजह से ही वो स्टूपिड़ इतना कुछ कह गया।’’ सोनाली ने आर्यन से कहा। 
आर्यन ने धीरे से जवाब दिया-‘‘अरे नहीं। थैंक्स तो मुझे कहना चाहिए था। अब देखो न, यदि मैं आज स्कूल नहीं आता तो मुझे कैसे पता चलता कि तुम भी दीवाली नहीं मना पाती।’’ यह सुनकर सोनाली ने हां में सिर हिलाया।
आर्यन कहने लगा-‘‘मुझे अच्छा-सा लगा कि मैं अकेला नहीं हूं। देखा जाए तो तुम मुझसे बहुत ज्यादा पावरफुल हो।’’ यह सुनकर सोनाली हंसने लगी। 
आर्यन कहता रहा-‘‘मेरे पापा को आंखों से नहीं दिखाई देता। ममा पैर से विकलांग है। घर का गुजारा बड़ी मुश्किल से चलता है। यही कारण है कि हमारे घर में त्योहार भी ठीक से नहीं मनायें जाते। आस-पास भी हमारे जैसे ही लोग रहते हैं। वो तो स्कूल भी नहीं जाते। कम से कम मैं तो स्कूल आता हूं। लेकिन बम-पटाखों की गूंज मेरे कानों में पड़ती है, तो मैं सोचता हूं कि मैं कब खुशियों भरी दीवाली मनाउंगा।’’
सोनाली ने बीच में टोकते हुए कहा-‘‘ये क्या बात हुई। आर्यन मेरे तो पापा भी नहीं रहे। मेरी दो सिस्टर्स भी हैं। ममा घर में अखबारों को लिफाफे बनाती है। शाॅपकीपर उन्हें खरीदते हैं। इसीसे हमारा खर्चा चलता है। मुझे जितना समय मिलता है, मैं भी ममा की मदद करती हूं। मेरी सिस्टर्स भी हेल्प करती हैं। हम भी इस तरह बम पटाखे छोड़कर दीवाली नहीं मनाते। हम भी हर साल नये कपड़े नहीं बना सकते। हमें पता है कि पूजा-पाठ करके, व्रत रखकर, लक्ष्मी पूजन करने से धन नहीं आता। धन तो मेहनत से कमाया जाता है। लेकिन हम दीया जलाते हैं। हर साल अपने कच्चे मकान की पुताई नहीं कर सकते तो क्या हुआ। उसकी चारों ओर से सफाई तो कर सकते हैं। हम यह करते हैं।’’
यह सुनकर आर्यन चुप रहा। धीरे से बोला-‘‘तभी तो। मुझे देखो। मैं हर साल किसी भी त्योहार के आने से पहले निराश हो जाता हूं। परेशान हो जाता हूं। दीवाली से पहले राखी आई तो मैं रोने लगा। हम दो भाई हैं। अकुल मुझसे छोटा है। सब अपनी बहनों को राखी पहना रहे थे। बदले में भाई अपनी बहनों को रुपए दे रहे थे। एक हम है कि हम दोनों भाईयों की कलाई सूनी रहती है। फिर हम बदले में किसी को रुपए भी कहां दे सकते हैं।’’
सोनाली ने धीरे से कहा-‘‘डोंट वरी। अबकी राखी में मैं तुमहारे हाथ में राखी बांधूंगी। अकुल के भी। आज से तू मेरा भाई हुआ।’’ आर्यन का चेहरा खुशी से चमक उठा। 
आर्यन ने कहा-‘‘ठीक है। अब आगे से हम दीवाली भी साथ मनाएंगे। तू रहती कहां हैं?’’
सोनाली ने बताया-‘‘नहर वाली गली में। सबसे लास्ट में। जहां झोपड़ियां हैं। हमारा कच्चा मकान सबसे लास्ट में है। वहां एक बड़ा पीपल का पेड़ है।’’
आर्यन ने कहा-‘‘वहीं तो जहां एक बड़ा मैदान है। जहां ट्रक खड़े रहते हैं। बच्चे पतंग उडाते हैं।’’ 
सोनाली ने एक दम कहा-‘‘हां-हां। वहीं पे। तू वह जगह जानता है?’’
आर्यन ने कहा-‘‘हां। छुटटी के दिन में नहर पे आता हूं। धोबियों के कपड़े सुखाने में मदद करता हूं। उस दिन मुझे 100 रुपए मिल जाते हैं। नहर वाली गली से पहले जो मुस्तफा धोबी वाली गली है न, वहीं हम रहते हैं। पीली वाली कोठी के पीछे। पुराना मकान है। हम वहां किराये पर रहते हैं।’’ 
सोनाली ने कहा-‘‘हां। हां। मैंने देखी है पीली वाली कोठी। पीली वाली कोठी से पहले जो करयाना स्टोर है। वहां मैं लिफाफे बेचने आती हूं। हर संडे।’’
आर्यन ने कहा-‘‘ये लिफाफे कैसे बनते हैं?’’
सोनाली ने कहा-‘‘वैरी सिंपल। मैं तूझे अभी सिखा देती हूं। तू एक दो दिन हमारे घर आ जा। अलग-अलग साइज के अलग पैसे मिलते हैं। मैं तूझे अकील कबाड़ी की दुकान भी दिखा दूंगी। बस वहां से पुराने अखबार खरीदने हैं। आटे की लेही घर में बनानी है, और हो जाएगा लिफाफे बनाने का काम। सौ लिफाफे के हमें बीस रुपए आसानी से मिल जाते हैं। हम घर में आराम से एक हजार लिफाफे बना लेते हैं। संडे के दिन तो हम दो हजार लिफाफे बना लेते हैं।’’
आर्यन ने कहा-‘‘ठीक है। इस संडे में आता हूं।’’ 
आर्यन संडे को सोनाली के घर गया। अब यह सिलसिला चल पड़ा। आर्यन और सोनाली के परिवार वाले भी इस मेलजोल से प्रसन्न थे। आर्यन के घर में भी लिफाफे बनाने का काम चल पड़ा। आर्यन को आमदनी का यह साधन अच्छा लगा। घर में जो भी लिफाफे बनाये जाते, उन्हें बेचने आर्यन ही जाता। बदले में उसे पांच रुपए मिलते। उसने एक पिगी बैंक खरीद लिया था। अब वह सारे सिक्के पिगी बैंक में जमा करने लगा। 
एक दिन उसने हिसाब लगाया-‘‘साल में तीन सौ पेंसठ दिन होते हैं। अगर तीन सौ दिन के हिसाब से भी मुझे पांच रुपए मिलते रहे, तो यह एक हजार पांच सौ रुपए हो जाएंगे। इस बार की दीवाली मजे में मनाई जाएगी। मैं सोनाली के साथ दीवाली मनाउंगा। बड़ा मजा आएगा।’’ 
वहीं सोनाली भी कुछ ऐसा ही सोच रही थी। वह भी एक-एक रुपया जोड़ रही थी। उसने भी मन बना लिया था कि बरसों से जो त्योहार घर में नहीं मनाया जाता,अब वह आर्यन के सहयोग से मनाया जाएगा। दोनों परिवार साथ-साथ दीवाली मनाएंगे। वह सोच रही थी कि घर में वह अपनी सहेलियों को बुलाएगी। 
सब कुछ ठीक तरह से चल रहा था। एक दिन की बात है। सोनाली ने स्कूल जाते हुए आर्यन से कहा-‘‘दीवाली को एक महीना ही रह गया है।’’
आर्यन ने मुस्कराते हुए कहा-‘‘हां। लेकिन अब मैं दीवाली के दिनों में छुट्टी नहीं करुंगा। इस बार मैम को मैं भी बताउंगा कि मैंने दीवाली कैसे मनाई। क्या तुम मेरे साथ दीवाली मनाओगी?’’ सोनाली ने हां में सिर हिलाया।
आज सब पीछे मुड़-मुड़कर देख रहे थे। सोनाली के साथ-साथ आर्यन भी उनकी क्लास में आई नई स्टूडेंट को देखकर हैरान हो रहे थे। प्रातःकालीन सभा में प्रिंसिपल ने बताया था-‘‘बच्चों। भूकंप की वजह से कई घर तबाह हुए हैं। हमारे स्कूल में भी कुछ बच्चे आएं हैं। यह सब भूकंप में अपना सब कुछ खो चुके हैं। हमें इनकी मदद करनी होगी। जिस क्लास में यह स्टूडेंटस पढ़ेंगे, हम सब उनको कोओपरेट करेंगे।’’
इंटरवल हुआ तो सब मैदान में बैठे हुए थे। रुखसार ने कहा-‘‘ये मिड सेशन में नए स्टूडेंटस स्कूल में आ गए हैं। ये क्या पढ़ेंगे और क्या एग्जाम देंगे?’’
कुलविन्दर बोला-‘‘भूंकम राहत है भई। सुना नहीं तुमने, हमें उनकी हैल्प भी करनी है।’’ रैहट स्टीक ने कहा-‘‘यार! हम क्या हैल्प करेंगे? अपना पाॅकेट मनी इन भूख-नंगों को दे दें क्या?’’ 
मोहित ने कहा-‘‘स्कूल मैनेजमेंट करे। कौन रोकता है?’’ 
कंवलजीत ने देखा कि आर्यन और सोनाली उसकी ओर आ रहे हैं। वह बोला-‘‘आईडिया। ’’आर्यन और सोनाली भी तो उसी केटेगरी के हैं। जिस केटेगरी के कुछ बच्चे हमारे स्कूल में आ गए हैं। यह करेंगे न उनकी हैल्प।’’
यह सुनकर सब हंस पड़े। सोनाली और आर्यन ने एक दूसरे का मुंह देखा और चुपचाप अपनी क्लास में जाकर बैठ गए। 
दीवाली से दो दिन पहले तक तो सब कुछ ठीक था। लेकिन फिर न आर्यन स्कूल आया और न ही सोनाली। दीवाली की छुट्टियां हो गईं। स्कूल खुला तो रेहाना मैडम ने क्लास में कहा-‘‘स्टूडेंटस कैसी रही दीवाली? इससे पहले कि तुम सब वन बाई वन सबको बताओ,मैं आर्यन से पूछना चाहती हूं कि वह दीवाली से पहले दो दिन अबसेंट क्यों रहा। उसके बाद सोनाली बतायेगी कि वो भी अबसेंट थी। क्यों?’’
आर्यन सिर झुकाए खड़ा था। वह धीरे से बोला-‘‘मैम। पिछले एक महीने से मैं लिफाफे बना रहा था। उन लिफाफों को बनाने के लिए समय चाहिए था। स्कूल से जाने के बाद होमवर्क करने के बाद जितना टाईम मिलता था, हम यह काम करते थे। लेकिन दीवाली के अवसर पर हमे हजारों लिफाफे बनाकर देने थे। हमने कमीटमेंट किया था।’’
रेहाना मैडम बोली-‘‘कमीटमेंट तो तुमने भी किया था। यही कि अब तुम अबसेंट नहीं रहोगे? फिर?’’
आर्यन ने कहा-‘‘मैम। हमारी क्लाॅस में पिछले ही महीने दो स्टूडेंटस नए आए हैं।’’
रेहाना ने कहा-‘‘हां। हां। ज़हीना और शैफाली। तो क्या हुआ?’’
आर्यन ने कहा-‘‘मैम। मैंने और सोनाली ने ज़हीना और शैफाली के साथ उन सभी बच्चों के साथ दीवाली मनाई है, जो आपदा राहत कैंप में रह रहे हैं।’’
ज़हीना और शैफाली खड़ी हो गई। वे दोनों एक साथ बोली-‘‘मैम। सोनाली और आर्यन ने पूरे कैंप में सब बच्चों के लिए मिठाई दी। हम सबने मिलकर दीये जलाये। साउंडप्रुफ पटाखे छोड़े।’’
ज़हीना ने बताया-‘‘मैम। इन दोनों ने साल भर से अपनी दीवाली मनाने के लिए जो रुपए अपने पिगी बैंक में जमा किये थे, वो भी हमारे लिए खर्च कर दिये ।हम सबके लिए ये स्कूल बैग्स लाए। काॅपीज़ लाये। कुछ के लिए इन्होंने शूज़ भी खरीदे।’’
रेहाना मैम के साथ-साथ क्लास में तालियां बजने लगी। दरवाजे पर प्रिंसिपल के साथ आपदा राहत कैंप के मैनेजर भी खड़े थे।
प्रिंसिपल ने कहा-‘‘हमने तो कहा था। सोनाली और आर्यन ने कर दिखाया। डीएम सर ने स्पेशल दीवाली गिफ्ट भिजवाएं हैं। सोनाली के लिए भी और आर्यन के लिए भी। हमारे स्कूल को भी दस हजार रुपए की हैल्प भिजवाई है। हमें गर्व है कि सोनाली और आर्यन ने वो कर दिखाया, जिसकी वजह से हमारे स्कूल पर न्यूज टीवी चैनलों पर आने वाली है। बधाई।’’
रेहाना टीचर ने मुस्कराते हुए कहा-‘‘स्कूल मैनेजमेंट भी इन दोनों को पुरस्कृत करेगा?’’
प्रिंसिपल ने कहा-‘‘बिल्कुल। कल प्रातःकालीन सभा में हम सब स्टूडेंटस से अपील भी करेंगे कि त्योहार मनाने का असली कंसेप्ट आर्यन और सोनाली से सीखें। हमारा मन और हमारा मस्तिष्क दया भाव से भरा हो। हम शांत भाव से केवल अपने और अपने परिवार का ही भला न सोंचे। अपने आस-पास भी खुशियां देंखे। यदि आस-पड़ोस में कोई खुश नहीं है तो हम कैसे दीवाली मना सकते हैं? यह हमने इन बच्चों से सीखा। मैं इन्हें सैल्यूट करती हूं।’’
समूची क्लास सोनाली-आर्यन। सोनाली-आर्यन। का नाम पुकार-पुकार कर अपनी खुशी ज़ाहिर करने लगे। वहीं सोनाली और आर्यन की आंखें नम थी। सोनाली ने एक कागज की पर्ची में कुछ लिखा और आर्यन की ओर उछाल दिया।
आर्यन ने पर्ची खोली-‘‘पर्ची में लिखा था। अब अबसेन्ट कभी नहीं।’’
आर्यन ने सोनाली की ओर देखा। बिल्कुल। अब अबसेन्ट कभी नहीं। शायद आर्यन भी यही सोच रहा था। 
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मनोहर चमोली ‘मनु’,भितांई,पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड। मोबाइल-09412158688