14 मार्च 2026

प्रकृति प्रेमी, खेती-किसानी के जानकार, पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील और स्वभाव से शांत चित्त जाय हुकिल मानते हैं कि बेशक जंगल की गहराइयों में चित्तीदार छाया को काया में घारण करने वाला, जल, जंगल और वृक्षों का बाशिंदा गुलदार प्रकृति की अनुपम कृति है। निसंदेह, गुलदार वन्य जीवन के संतुलन की मुख्य कड़ी है।

मनुष्य यूँ ही एक दिन में महाबली नहीं बना। वन्य जीवों से उसके संघर्ष मानव जीवन की शुरूआत से ही हैं। यह संघर्ष कभी खत्म नहीं हो सकता। यह ज़रूरी है कि इसे कम किया जा सकता है। इसके लिए ठोस नीति, रणनीति बनानी होगी। कुशल प्रबन्धन और नियोजन से ही निर्दोष जन हानि को न्यून किया जा सकता है।

गुलदार भी खाद्य शृंखला के संचालन का संवाहक है। गुलदार पारिस्थितिकीय संतुलन, उसके प्रभाव और दृष्टिकोण के लिहाज से भी ज़रूरी जीव है। लेकिन जंगल में उसके शिकार की कमी हो जाने, जंगल में मानव अतिक्रमण से या जंगल से मानव बस्ती में उसका आगमन बढ़ रहा है।

मैन्ईटर जानवर एक बार इंसानी लहू और मांस चख लेता है तो वह अपने प्राकृतिक भोजन के लिए की जाने वाली मशक्कत से भी दूर होता चला जाता है। नरभक्षी को तब इंसान को अपना निवाला बनाना सरल लगता है। वह उसके लिए आसान शिकार हो जाता है।

जब यही आकर्षक जीव नरभक्षी बन जाता है और मानव जीवन खासकर निर्दोष बच्चे या घर की धुरी महिला को अपना निवाला बना लेता है तो दहशत की काली परछाई गाँव-शहर की दिनचर्या को जकड़ लेती है। स्कूल बंद हो जाते हैं। खेत-खलिहान सुनसान हो जाते हैं। आँगन, चौपाल और चबूतरे गोधूलि की बेला से पहले ही सुनसान हो जाते हैं। गुलदार की भोजन सूची में इंसानी रक्त भी शामिल हो जाता है।

हम किसी नरभक्षी गुलदार को मारने का निर्णय लेने में बहुत देर कर देते हैं। नरभक्षी हो चुके एक गुलदार की जान बचाने की वकालत करने से ज़्यादा बेहतर है उन इंसानों की जान बचाना जो निरपराध हैं और उसका भोजन हैं भी नहीं।

तब गुलदार के लिए इंसान एक सरल, आसानी से उपलब्ध शिकार में तब्दील हो जाता है। और तब उस नरभक्षी गुलदार को उसी पारिस्थितिकीय संतुलन साधने के लिए मारना एक बाध्यता हो जाती है। वह जोर देकर कहते हैं कि संघर्ष वहीं से शुरू होता है जब हम नरभक्षी जानवर को उसकी प्रजाति के सामान्य जानवर से अलग नहीं कर पाते। मैन्ईटर जानवर एक बार इंसानी लहू और मांस चख लेता है तो वह अपने प्राकृतिक भोजन के लिए की जाने वाली मशक्कत से भी दूर होता चला जाता है। नरभक्षी को तब इंसान को अपना निवाला बनाना सरल लगता है। वह उसके लिए आसान शिकार हो जाता है। वह बताते हैं कि नरभक्षी हो चुके गुलदार को मानव संघर्ष से हमेशा के लिए हटाना इसलिए भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि साल में कुल इंसानी शिकार करने वाले गुलदारों का योग एक फीसदी से भी कम है। ऐसे में सौ में एक उस गुलदार को हमेशा के लिए मानव जीवन से हटाना इसलिए भी जरूरी है और उससे पारिस्थितिकीय संतुलन में कुछ भी फर्क नहीं पड़ता।

जल्लाद भी कानून तोड़ने वाले दोषसिद्ध अपराधी को फांसी की सजा अपने हाथों से देता है। उसी प्रकार नरभक्षी घोषित हो चुके गुलदार और उसे मार देने के आदेश के बाद शिकारी द्वारा निशाना दागने वाले शिकारी किसी नियम को भंग नहीं करते। 

अल्मोड़ा में जन्मे और अब अपने ननिहाल पौड़ी को ही अपना स्थाई बसेरा बना चुके जाय हुकिल दुनिया की नज़रों में जाने-माने शिकारी हैं। लेकिन उनका मानना है कि वह तो मात्र मैन्ईटर हंटर हैं। वह उन निरपराध इंसानों को उन आदमखोर जानवरों के अवांछित हमलों से मुक्त करते हैं जिनकी वजह से आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

''किसी जीव की मौत प्राकृतिक होनी चाहिए। इंसान और जानवर में यही फर्क है। इंसान के पास भोजन के कई विकल्प हैं। लेकिन मांसाहारी गुलदार जैसे जानवरों को उन्हीं के नज़र से भी तो देखने की ज़रूरत है। वे ज़िन्दा तभी रहेंगे जब वह किसी जीव को अपना भोजन बनाएँगे। गुलदार जैसा जीव ज़िंदा तभी रहेगा जब वह किसी ज़िन्दा जीव का शिकार करेगा। यहाँ यह कहना बहुत ज़रूरी होगा कि इंसान उसकी भोजन सूची में नहीं है।''
-जाय हुकिल

पौड़ी स्थित उनके आवास पर मनोहर चमोली ‘मनु’ से हुई लंबी बातचीत में जाय हुकिल के व्यक्तित्व की कई परतें देखने-समझने को मिली। वह प्रकृति प्रेमी हैं। प्राकृतिक संसाधनों का सीमित लेकिन बेहतर उपयोग करना जानते हैं। पर्यावरण को उसके प्राकृतिक रूप में बने रहने की पुरजोर वकालत करते हैं। उनका मानना है कि जल्लाद भी कानून तोड़ने वाले दोषसिद्ध अपराधी को फांसी की सजा अपने हाथों से देता है। उसी प्रकार नरभक्षी घोषित हो चुके गुलदार और उसे मार देने के आदेश के बाद शिकारी द्वारा निशाना दागने वाले शिकारी किसी नियम को भंग नहीं करते।

जीवों का संरक्षण और मानवीय सुरक्षा में से एक को चुनना पड़े तो कानून का पालन करने वाले मनुष्य के जीवन की रक्षा सर्वोपरि रखना आवश्यक है। मारना आखिरी, कष्टप्रद उपाय बन जाता है। यह क्रूरता नहीं, बल्कि जीवंत समुदाय की रक्षा के लिए उठाया जाने वाला आखि़री कदम है।

क्या किसी जानवर को सुधारने की बजाय मार देना उचित है?

इस सवाल के जवाब में जाय हुकिल विचलित नहीं होते। अपने अनुभवों के आलोक में तार्किक जवाब देते हुए बताते हैं,‘‘इंसान पर कानून का पालन करने की जिम्मेदारी है। गुलदार किसी कानून को मानने वाला जीव नहीं है। हमें प्रकृति के स्वचालित नियम पर चलने वाले गुलदारों से भला क्या दिक्कत हो सकती है? पहाड़ का जनमानस तो पीढ़ीयों से जंगलों के बीच का रहवासी है। गुलदार तो उनके अपने हैं। ऐसा यहाँ का जनमानस मानता भी है। लेकिन परेशानी का सबब वो गुलदार हो जाता है जो अपने प्राकृतिक भोजन के उलट इंसान को अपना निवाला बना डालता है। गुलदार तो किसी इंसान का शिकार करते समय एक पल की भी देरी नहीं करता। यहां तो कई बार नरभक्षी गुलदार को ढेर करने में महीनों लग जाते हैं। तब तक वही गुलदार कई निरपराध इंसानों की जीवन लीला समाप्त कर देता है।’’

हर गुलदार इंसान को अपनी भोजन सूची में नहीं रखता। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब गुलदार आसानी से इंसान को अपना निवाला बना सकता था। लेकिन उसने नहीं बनाया। बूढ़ा, बीमार और भूखा गुलदार तक भी इंसान को देखता रहता है। इंसान उसकी पहुँच में था। बावजूद उसके उसने हमला नहीं किया। क्यों? क्योंकि इंसान को भोजन बनाने का विचार उसका था ही नहीं। पकड़े गए गुलदारों के अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि वह दस-बारह दिन पानी के बिना रह सकता है। कद-काठी के हिसाब से देखें तो सामान्यतः एक गुलदार एक भोजन करने के बाद दस-बारह दिन भूखा भी रह सकता है।

गुलदार को मारना उचित कैसे माना जा सकता है?

इस सवाल के जवाब में जाय हुकिल ठहरते हैं। सोचते हैं। फिर बताते हैं। वह कहते हैं,‘‘जीवों के जीने योग्य यह ज्ञात अकेली धरती है। अंततः जीवों का संरक्षण और मानवीय सुरक्षा में से एक को चुनना पड़े तो कानून का पालन करने वाले मनुष्य के जीवन की रक्षा सर्वोपरि रखना आवश्यक है। मारना आखिरी, कष्टप्रद उपाय बन जाता है। यह क्रूरता नहीं, बल्कि जीवंत समुदाय की रक्षा के लिए उठाया जाने वाला आखि़री कदम है। मैं फिर कहूँगा कि हम किसी नरभक्षी गुलदार को मारने का निर्णय लेने में बहुत देर कर देते हैं। नरभक्षी हो चुके एक गुलदार की जान बचाने की वकालत करने से ज़्यादा बेहतर है उन इंसानों की जान बचाना जो निरपराध हैं और उसका भोजन हैं भी नहीं। मैं अक्सर कहता हूँ कि वन्यजीव प्रेमी और प्राकृतिक न्याय की बात करने वाले इस बात को भी अवश्य समझेंगे कि गुलदार का संरक्षण उसके प्राकृतिक आवास में ही होना चाहिए। जब वह अपने आवास से बाहर आकर मानव बस्तियों में मनुष्यों पर ही हमला करने लगे तो इसे कैसे न्यायसंगत माना जा सकता है? हमें यह समझना होगा कि हिंसक जानवर और आदमखोर जानवर में अन्तर है। आदमखोर हो चुका गुलदार अपराधी है। उसे दूसरा अपराध करने का अवसर देना भी उचित नहीं है।’’

गुलदारों से इंसान को कभी समस्या नहीं रही है। बूढ़े गुलदार तक इंसानों को अपना निवाला नहीं बनाते। पहाड़ में बच्चे क्या और महिलाएँ क्या। जल स्रोत, जंगल, घास, खेत तक में गुलदार मानवीय हलचल देखते रहे हैं। वह चाहें तो आसानी से हर रोज़ इंसान को शिकार बना लें। लेकिन वे ऐसा नहीं करते।

जाय हुकिल बड़ी गंभीरता के साथ दोहराते हैं,‘‘हमें यह समझना होगा कि गुलदारों से इंसान को कभी समस्या नहीं रही है। बूढ़े गुलदार तक इंसानों को अपना निवाला नहीं बनाते। पहाड़ में बच्चे क्या और महिलाएँ क्या। जल स्रोत, जंगल, घास, खेत तक में गुलदार मानवीय हलचल देखते रहे हैं। वह चाहें तो आसानी से हर रोज़ इंसान को शिकार बना लें। लेकिन वे ऐसा नहीं करते। सारा मामला सोच का है। सैकड़ों में किसी एक गुलदार के मन में यह ख़याल आ गया कि चलो इस इंसान को भोजन के लिए आजमाया जाए। एक बात बता दूँ कि हम मनुष्य दोपाया हैं। चौपाया को मारना आसान नहीं होता। वह संतुलन बनाकर बच भी सकते हैं। लेकिन दोपाया तो लड़खड़ाया और चोटिल हो गया। बस, गुलदार के लिए वह आसान शिकार हो गया। ऐसा गुलदार जिसने इंसानी खून चख लिया तो वह उसकी भोजन सूची में नई खुराक शामिल हो गई। आसान भी और सहज उपलब्ध भी। लेकिन यह ख़याल किसी एक गुलदार के ज़ेहन में स्थाई हो गया। यह एक गुलदार अब समस्या है। और हाँ। उसे ज़िंदा पकड़ना आसान नहीं है। पकड़कर नये इलाके में अनुकूलन में वह सहज नहीं होता। गुलदार को पकड़ना फिर उसे छोड़ना और यह मान लेना कि अब वह इंसान पर हमला नहीं करेगा। इंसानी जीवन के साथ जानबूझकर लिया गया जोखि़म हो सकता है।’’


मारना सरल रास्ता है? इस सवाल पर जाय हुकिल अपने अनुभवों के आलोक में बताते हैं,‘‘मैं अड़तालीस आदमखोर गुलदार मार चुका हूँ। एक आदमखोर बाघ भी मार चुका हूँ। आदमखोर को मारना कोई शिकार करना नहीं है। यह कोई शगल नहीं है। खेल नहीं है। जब भी कोई गुलदार किसी इंसान को मारकर खा चुका होता है तब उसके परिजनों के चेहरे देखिए। पास-पड़ोस में रह रहे लोगों की आँखों में दहशत देखिए। नरभक्षी हो चुके गुलदार को प्राकृतिक रूप से रह रहे गुलदारों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह कहना बहुत आसान है कि इंसानों ने उसके इलाके खत्म कर दिए हैं। इंसान जंगल में जाता ही क्यों है? उसका भोजन कम हो गया है। वह घास तो नहीं खा सकता। आँकड़े कुछ भी कहें। लेकिन मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि अकेले उत्तराखण्ड में पाँच हजार से अधिक गुलदार हैं। आधी आबादी मादाओं की है। न्यूनतम प्रजनन क्षमता को लें। न्यूनतम शावक ही ज़िंदा रहते हैं।

यह मान लें तो प्रतिवर्ष न्यूनतम दो हजार गुलदार बढ़ रहे हैं। एक मादा गुलदार अपने जीवनकाल में बारह से पन्द्रह शावक पैदा कर सकती है। फिर उसी के शावकों में पचास फीसदी मादाएं मान लें तो वे स्वयं तीन साल बाद शावक पैदा कर सकती हैं। सोचिए। कितनी बड़ी आबादी गुलदारों की बढ़ रही है। अब गुलदार और मानव संघर्ष के तथ्यों पर आते हैं।

आंकड़ों को ही यदि आधार बना लें तो उत्तराखण्ड बन जाने के बाद यानि सन् 2000 से अब तक 534 इंसान गुलदारों का निवाला बन चुके हैं। इस आधार पर औसत निकालें तो लगभग 22 इंसानी मौते गुलदार के हमले से हुई हैं। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि मैं भी और जानकार भी मानते हैं कि उत्तराखण्ड में कम से कम 5000 गुलदार होंगे। इसमें मादाओं के शावकों को नहीं गिना जा रहा। सीधी सी गणित से यह किसी भी क्षेत्र में रह रहे 100 गुलदारों में से 1 गुलदार के नरभक्षी हो जाने का मामला है। अब आप ही सोचिए कि मानव जीवन को उस नरभक्षी से मुक्त क्यों नहीं कर देना चाहिए? मैं तो कहता हूँ कि एक पल की भी देरी नहीं करनी चाहिए।

जाय हुकिल पिछले बीस सालों से गुलदार के जीवन, उसके स्वभाव और मानव संघर्ष का अध्ययन कर रहे हैं। वह अपने अनुभव के आधार पर सुझाव भी देते हैं। वह कहते हैं,‘‘उत्तराखण्ड मे अभिलेखों में दर्ज 71 फीसदी वन भूमि है। लगभग 20 फीसदी भूमि नागरिकों के पास है। सरकारी, ग्राम समाज, सार्वजनिक भूमि यानी राजस्व भूमि 9 से 10 फीसदी है। इस भूमि का स्वामित्व राज्य सरकार या ग्राम सभा का होता है। इंसानों को गुलदार या अन्य वन्य जीव उन्हीं की नागरिक बस्ती या नागरिकों की निजी भूमि से उठा कर ले जाए तो इससे बुरा जीवन जीने का अधिकार क्या हो सकता है?

अब आप कह सकते हैं कि इंसान सरहद समझता है गुलदार नहीं। तो इसका भी जवाब है। जवाब सीधा और सरल है। उसे वन संरक्षित क्षेत्र में पालिए। पोसिए। उत्तराखण्ड में जिम कार्बेट नेशनल पार्क, राजाजी नेशनल पार्क, नन्दा देवी नेशनल पार्क, वैली ऑफ फ्लावर्स नेशनल पार्क, गंगोत्री नेशनल पार्क, गोविन्द नेशनल पार्क हैं। इन छःह नेशनल पार्कों यानी राष्ट्रीय उद्यानों का क्षेत्र 5000 वर्ग किलोमीटर से अधिक का है। इसके अलावा सात वन्यजीव अभयारण्य भी हैं। केदारनाथ, अस्कोट, बिनसर, सोनानदी, मसूरी, गोविन्द और नन्धौर वन्यजीव अभ्यारण्य का एरिया भी 2600 वर्ग किलोमीटर से अधिक है। इस तरह राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभ्यारण्य, टाइगर रिज़र्व, बफर जोन के साथ भूमि संरक्षित क्षेत्र का सारा भूभाग जोड़ लें तो यह राज्य की दो-तिहाई भूमि हो जाती है। यानी राज्य की लगभग दो-तिहाई भूमि किसी न किसी रूप में वन कानूनों के अधीन है।

इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि आम इंसान के उपयोग हेतु यह प्रतिबंधित है। तो इसके माने क्या? यहाँ ऐसी व्यवस्थाओं की दरकार है कि सभी तरह के वन्य जीवों का पालन-पोषण हो। यह सभी वन्य जीव अपनी इस हद में रहें। यह हद दो तिहाई है! मानव बस्तियाँ-गाँव की भूमि तो 6 फीसदी भी नहीं है! चलिए। थोड़ा उदार होकर सोचें कि खेती, बस्तियाँ, ग्राम-शहर की मानव बसावट को विस्तार देकर सोचें तो यह पन्द्रह फीसदी भी नहीं है। चलिए बीस फीसदी मान लेते हैं। तो अब वन्य जीव के विशेषज्ञ ही बता दें कि 80 फीसदी का भूभाग छोड़कर कोई गुलदार 20 फीसदी में आए और निरपराध को अपना भोजन बना ले तो यह किस सूरत में स्वीकार्य होगा? प्रबन्धन और नियोजन को ठोस बनाना होगा। नीतियाँ धरातल पर मानव कल्याण और उसके जीने के अधिकार का अतिक्रमण क्यों करे?’’

गुलदार को उसकी हद में रख देना काफी होगा? इस सवाल के जवाब में जाय हुकिल कहते हैं,‘‘यह तो फौरी कदम होगा। मांसाहारी और शाकाहारी जीवों की जो भोजन कड़ी है। उसका प्रबन्ध भी तो करना होगा? हमें यह समझना होगा कि वे मानव बस्तियों में आए ही नहीं। हम खतरा ही मोल क्यों लें? देखिए। जैसा पहले भी कहा और फिर कह रहा हूँ कि हर गुलदार इंसान को अपनी भोजन सूची में नहीं रखता।''

वह बताते हैं,‘‘ ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब गुलदार आसानी से इंसान को अपना निवाला बना सकता था। लेकिन उसने नहीं बनाया। बूढ़ा, बीमार और भूखा गुलदार तक भी इंसान को देखता रहता है। इंसान उसकी पहुँच में था। बावजूद उसके उसने हमला नहीं किया। क्यों? क्योंकि इंसान को भोजन बनाने का विचार उसका था ही नहीं। पकड़े गए गुलदारों के अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि वह दस-बारह दिन पानी के बिना रह सकता है। कद-काठी के हिसाब से देखें तो सामान्यतः एक गुलदार एक भोजन करने के बाद दस-बारह दिन भूखा भी रह सकता है। यह सब बातें हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि उन्हें उनकी हद में पर्याप्त भोजन की व्यवस्था भी करनी होगी। मनुष्य तो नियम-कानून से बंधा हुआ है। नियम तोड़ने पर दण्ड और सजा है। लेकिन वन्य जीवों के लिए ऐसा कुछ नियम तो नहीं है। लेकिन कुशल प्रबन्धन और नियोजन से हम मानव के साथ उनके संघर्ष न्यूनतम कर सकते हैं।’’
एक विचार यह भी तो है कि मानव को गुलदार के साथ जीना सीखना होगा। इस पर जाय हुकिल याद दिलाते हैं कि उत्तराखण्ड के साथ-साथ पर्वतीय भू-भाग के बाशिंदे तो गुलदार के साथ सदियों से रह रहे हैं। जी रहे हैं। उन्हें अपना मानते हैं।

वे बताते हैं,‘‘पिछले बीस सालों के अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि इंसान के ज़ेहन में गुलदार जैसे प्राणी देवी-देवताओं की सवारी हैं। मैं एक वाकया बताता हूँ। हमने पिथौरागढ़ के एक गाँव में नरभक्षी गुलदार आने-जाने का मार्ग पहचान लिया। जंगल से मानव बस्ती में आने वाले उसी रास्ते में एक ग्रामीण का घर पड़ता था। मैंने उसे कहा कि तुम्हारे घर की छत से वह नरभक्षी मेरे निशाने पर आ जाएगा। पता है उस ग्रामीण ने हाथ जोड़ते हुए कहा कि नवरात्रे चल रहे हैं। गुलदार की हत्या का पाप मैं नहीं ले सकता। आप किसी पेड़ पर मचान बना लो। तो हम तो रह रहे हैं।''

उनका कहना है,‘‘ मैं हमेशा इस बात को दोहराता हूँ कि पहाड़ के लोगों के लिए जंगली जानवर अनजान नहीं हैं। वे उनके साथ ही जीते हैं और उनके व्यवहार को भी जानते हैं। लेकिन मौजूदा परिस्थितियाँ बदल गई हैं। अब न संयुक्त परिवार रहे और न ही हर परिवार में दस-बारह बच्चे हैं। खेती-किसानी और पशुपालन तक सिमट गया है। गाँव के गाँव तेजी से खाली होते जा रहे हैं। पलायन है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। सुन रहे हैं कि अन्तरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नए गाँव बसाने की बात हो रही है। यह कैसे होगा? हम सदियों से रह रहे अपने पुश्तैनी गाँवों को छोड़ते जा रहे हैं। कहीं-कहीं तो गाँव पाँच-सात परिवारों में सिमट गया है।''
गुलदारों का गाँवों में आना बढ़ गया है? इस सवाल के जवाब में जाय हुकिल बताते हैं,‘‘उत्तराखण्ड का कौन-सा ऐसा शहर है जहाँ गुलदार नहीं देखे जा रहे हैं। घरों के सीसी कैमरों में वह दिन क्या और रात क्या खू़ब चहलकदमी कर रहे हैं। लंगूर, बंदर, जंगली सूअर गाँव में खेती-किसानी चौपट कर चुके हैं। अब जो ग्रामीण किसी तरह गाँव में रहकर जीवन यापन कर रहे हैं उनकी गाय, बकरी और छोटे बच्चों को गुलदार अपना निवाला बना रहा है। पिछले पच्चीस सालों में उत्तराखण्ड में दो हजार से अधिक मामलों में गुलदार ने इंसानों को जख़्मी बना दिया है। गांँव हो या शहर गुलदारों से जान-माल का खतरा बढ़ता ही जा रहा है। आदमखोर गुलदारों द्वारा की गई वारदातो के बाद जब ग्रामीणों से मिलता हूँ तब पता चलता है कि पेट की आग से बड़ी तो जीने की इच्छा है। जीने की इच्छा है तो मौत दिन-रात साये की तरह पीछे पड़ी हो तो कोई क्या करे? गाँव में दहशत के माहौल में कोई कैसे और कब तक रहेगा?’’

वन्य जीवों की प्रकृति-व्यवहार बदल रहा है। जंगल में उनके खुद के संघर्ष भी बढ़ रहे हैं। उनका अपना क्षेत्र यानी दायरा भी बढ़ रहा है। अब समय आ गया है कि वन्य जीवों की सीमा रेखा भी तय हो। इंसानी जीवन की सीमा रेखा में उनका आना ही पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। पशु प्रेम से ज़्यादा इंसानी जीवन है।

उनका कहना है,‘‘नरभक्षी गुलदार घोषित करने और उसे मारने में होने वाली देरी के संबंध में जाय हुकिल कहते हैं,‘‘आज जब हम मार्च दो हजार छब्बीस के दूसरे सप्ताह के तीसरे दिन पौड़ी में बात कर रहे हैं तो यह भी याद रखना ज़रूरी होगा कि गढ़वा लवन प्रभाग की पौड़ी रेंज नागदेव के अंतर्गत पिछले पाँच महीनों में चार इंसान गुलदार का शिकार हो चुके हैं। यह चिंताजनक है। जैसा गुलदार के व्यवहार पर हम पहले भी बात कर चुके हैं तो यह ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि जैसे ही कोई गुलदार इंसान की जान लेता है तो तत्काल उस गुलदार की पहचान कर उसे वहाँ से हटाना होगा। हटाना यानी उसे मार गिराना होगा। वह अपनी ही प्रजाति का दुश्मन हो जाता है।''

कैसे? यदि उसकी शीघ्र सटीक पहचान हीं हुई तो दूसरे गुलदार जो नरभक्षी नहीं हैं उनकी जान पर भी बन आ सकती है। गुस्साएं ग्रामीण कई बार खाद्य सामग्री में जहर मिला देते हैं। मांसाहारी जीव ही नहीं पक्षी भी उस जहरीले भोज्य पदार्थ को खाकर मर जाते हैं। बेकसूर जीव भी मारे जाते हैं। गुलदारों का व्यवहार भी बदल रहा है। अब वह सुबह, दोपहर, शाम और रात को भी आसानी से दिखाई दे रहे हैं। वह मानव हलचल का अभ्यस्त होता जा रहा है। गाड़ियों के हार्न, लाईट, स्ट्रीट लाईट, शादी-ब्याह, समारोह में बज रहे म्यूज़िक सिस्टम से भी वह बौखलाता नहीं है। कबाड़, कूड़ा-करकट, मनुष्य के फेंके गए बासी नमकयुक्त भोजन में वह मुँह मारता हुआ देखा जा रहा है। उसकी फूड हैबिट बदल रही है। यह बेहद, बेहद चिंताजनक है।

जाय हुकिल कहते हैं कि जंगल, जंगल में पानी और पर्याप्त वन्य जीवों की खाद्य शंखला का प्रबंधन और नियोजन चुनौती है। इस पर गंभीरता से योजना बनानी होगी। योजना ही नहीं उस पर ठोस कार्य करने होंगे। हम इंसानों की कार्यशैली बदल रही है। उसी तरह वन्य जीवों की प्रकृति-व्यवहार बदल रहा है। जंगल में उनके खुद के संघर्ष भी बढ़ रहे हैं। उनका अपना क्षेत्र यानी दायरा भी बढ़ रहा है। अब समय आ गया है कि वन्य जीवों की सीमा रेखा भी तय हो। इंसानी जीवन की सीमा रेखा में उनका आना ही पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। पशु प्रेम से ज़्यादा इंसानी जीवन है। फिर वही बात कि हम उस गुलदार की बात कर रहे हैं जो अपनी सीमा रेखा तोड़कर निरपराध इंसानों को अपना भोजन समझने लगा है। ऐसा विचार जिस गुलदार के जे़हन में कौंधा है उसे दूसरा मौका देने का प्रश्न ही नहीं उठता।

आम जन जीवन को आदमखोर गुलदारों से हमेशा के लिए निजात देने वाले जाय हुकिल अर्द्धशतक के निकट पहुँच गए हैं।

कैसा लगता है? इस सवाल पर वह गंभीर हो जाते हैं। वह बताते हैं,‘‘वन्य जीवों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध समुदाय, संस्थाओं, सरकारों, संगठनों की तरह मैं भी वन्य जीवों के स्वाभाविक जीवन जीने का पक्षधर हूँ। एक बाघ और अड़तालीस गुलदारों को हमेशा के लिए हटाने में मुझे हर बार तैयार होना पड़ता है। किसी गुलदार को निशाना बनाने से पहले मैं प्रभावितों के परिवार से मिलता हूँ। जन समुदाय के आक्रोश को समझता हूँ। किसी निरपराध के क्षत-विक्षत शव को देखने की पीड़ा से गुजरता हूँ। तब जाकर मैं अपनी निजी बन्दूक, निजी गोलियाँ तैयार करता हूँ। किसी नरभक्षी हो चुके गुलदार को खोजना, पहचानना और उस पर निशाना दागना आसान नहीं होता है! अपना निजी वाहन, अपनी दिनचर्या को कई दिन उसकी शिनाख़्त में लगाना पड़ता है। बता दूँ कि इस कार्य हेतु किसी तरह का व्यय सरकार या वन विभाग नहीं करता। हाँ! जिस क्षेत्र मे ंहम उस आदमखोर गुलदार को पकड़ने या हमेशा के लिए हटाने का काम करते हैं तो स्थानीय जनता हमारे भोजन की व्यवस्था अवश्य करती है।’’

पूरी बातचीत में जाय हुकिल ने बताया कि मनुष्य यूँ ही एक दिन में महाबली नहीं बना। वन्य जीवों से उसके संघर्ष मानव जीवन की शुरूआत से ही हैं। यह संघर्ष कभी खत्म नहीं हो सकता। यह ज़रूरी है कि इसे कम किया जा सकता है। इसके लिए ठोस नीति, रणनीति बनानी होगी। कुशल प्रबन्धन और नियोजन से ही निर्दोष जन हानि को न्यून किया जा सकता है।
-मनोहर चमोली ‘मनु’

19 अक्टू॰ 2025

लेखक परिचयः मनोहर चमोली ‘मनु’ जन्म: पलाम. टिहरी गढ़वाल.उत्तराखण्ड जन्म तिथि: 01-08-1973 शैक्षिक योग्यता: एम॰ए॰ हिन्दी एवं संस्कृत. बी॰एड॰.विधि स्नातक. पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा (स्वर्ण पदक) गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय.हरिद्वार. रेडियो लेखन में स्नातकोत्तर सर्टिफिकेट। प्रकाशित कृतियाँ: 1. ऐसे बदली नाक की नथ: 2005. पृष्ठ संख्या-20, प्रकाशकः राष्ट्रीय पुस्तक न्यास,नई दिल्ली 2. ऐसे बदला खानपुर: 2006, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः राज्य संसाधन केन्द्र (प्रौढ़ शिक्षा) 68/1,सूर्यलोक कॉलोनी,राजपुर रोड,देहरादून। 3. सवाल दस रुपए का (4 कहानियाँ): 2007, पृष्ठ संख्या- 40, प्रकाशकः भारत ज्ञान विज्ञान समिति,नई दिल्ली। 4. उत्तराखण्ड की लोककथाएं (14 लोक कथाएँ)ः 2007, पृष्ठ संख्या- 52, प्रकाशकः भारत ज्ञान विज्ञान समिति,नई दिल्ली। 5. खुशी: मार्च 2008, पृष्ठ संख्या- 16, प्रकाशकः राज्य संसाधन केन्द्र (प्रौढ़ शिक्षा) 68/1,सूर्यलोक कॉलोनी,राजपुर रोड,देहरादून 6. बदल गया मालवा: मार्च 2008, पृष्ठ संख्या-12, प्रकाशकः राज्य संसाधन केन्द्र (प्रौढ़ शिक्षा) 68/1,सूर्यलोक कॉलोनी,राजपुर रोड,देहरादून 7. पूछेरी: 2009,पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः राष्ट्रीय पुस्तक न्यास,नई दिल्ली 8. बिगड़ी बात बनी: मार्च 2008, पृष्ठ संख्या-12, प्रकाशकः राज्य संसाधन केन्द्र (प्रौढ़ शिक्षा) 68/1, सूर्यलोक कॉलोनी,राजपुर रोड,देहरादून 9. अब बजाओ ताली: 2009, पृष्ठ संख्या-12, प्रकाशकः राज्य संसाधन केन्द्र (प्रौढ़ शिक्षा) 68/1,सूर्यलोक कॉलोनी,राजपुर रोड,देहरादून। 10. व्यवहारज्ञानं (मराठी में 4 कहानियाँ अनुदित,प्रो.साईनाथ पाचारणे): 2012, पृष्ठ संख्या-40, प्रकाशक: निखिल प्रकाशन,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 11. अंतरिक्ष से आगे बचपन: ( 25 बाल कहानियाँ): 2013, पृष्ठ संख्या-104, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-81-86844-40-3 प्रकाशकः विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, 4 डिसपेंसरी रोड,देहरादून। 12. कथा: ज्ञानाची चुणूक (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी, 8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 13. कथा: उलटया हाताचा सलाम (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी, 8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 14. कथा: पुस्तके परत आली (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी, 8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 15. कथा: वाढदिवसाची भेट (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 16. कथा: सत्पात्री दान (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी, 8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 17. कथा: मंगलावर होईल घर (मराठी में अनुदित): 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 18. कथा: सेवक तेनालीराम (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 19. कथा: असा जिंकला उंदीर (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 20. कथा: पिंपलांच झाड (मराठी में अनुदित): 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 21. कथा: खरं सौंदर्य (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 22. कथा: गुरुसेवा (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 23. कथा: खरी बचत (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 24. कथा: विहिरीत पडलेला मुकुट (मराठी में अनुदित): 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 25. कथा: शाही भोजनाचा आनंद (मराठी में अनुदित): 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 26. कथा: कामाची सवय (मराठी में अनुदित): 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 27. कथा: शेजायाशी संबंध (मराठी में अनुदित): 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 28. कथा: मास्क रोबोट (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 29. कथा: फेसबुकचा वापर (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 30. कथा: कलेचा सन्मान (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 31. कथा: सेवा हाच धर्म (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 32. कथा: खोटा सम्राट (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 33. कथा: ई साईबोर्ग दुनिया (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 34. कथा: पाहुण्यांचा सन्मान (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। 35. जीवन में बचपन: ( 30 बाल कहानियाँ)ः 2015, पृष्ठ संख्या-120, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-81-86844-69-4 प्रकाशकः विनसर पब्लिशिंग कम्पनी,4 डिसपेंसरी रोड,देहरादून। 36. उत्तराखण्ड की प्रतिनिधि लोककथाएं (समेकित 4 लोक कथाएँ): 2015, पृष्ठ संख्या-192, प्रकाशकः समय साक्ष्य,फालतू लाइन,देहरादून। 37. रीडिंग कार्ड: 2017, ऐसे चाटा दिमाग, किरमोला आसमान पर, सबसे बड़ा अण्डा, ( 3 कहानियाँ ) प्रकाशक: राज्य परियोजना कार्यालय,उत्तराखण्ड 38. चित्र कथा: पढ़ें भारत के अन्तर्गत 13 कहानियाँ, वर्ष 2016, प्रकाशकः प्रथम बुक्स,भारत। 39. चाँद का स्वेटर: 2012,पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-81038-40-6 प्रकाशक: रूम टू रीड, इंडिया। 40. बादल क्यों बरसता है?: 2013,पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-81038-79-6 प्रकाशकः रूम टू रीड, इंडिया। 41. जूते और मोजे: 2016, पृष्ठ संख्या-24, पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-84697-97-6 प्रकाशकः रूम टू रीड, इंडिया। 42. अब तुम गए काम से: 2016,पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-84697-88-4 प्रकाशकः रूम टू रीड, इंडिया। 43. चलता पहाड़: 2016,पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-84697-91-4 प्रकाशक: रूम टू रीड, इंडिया। 44. बिल में क्या है?ः 2017,पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-86808-20-2 प्रकाशक: रूम टू रीड, इंडिया। 45. छस छस छस: 2019, पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-89202-63-2 प्रकाशक: रूम टू रीड, इंडिया। 46. कहानियाँ बाल मन की: 2021, पृष्ठ संख्या-194, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-91081-23-2 प्रकाशकः श्वेतवर्णा प्रकाशन,दिल्ली 47. पहली यात्रा: 2023 पृष्ठ संख्या-20 आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-5743-178-1 प्रकाशक: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत 48. कथा किलकारी: दिसम्बर 2024, पृष्ठ संख्या-60, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-92829-39-0 प्रकाशक: साहित्य विमर्श प्रकाशन 49. कथा पोथी बच्चों की: फरवरी 2025, पृष्ठ संख्या-136, विनसर पब्लिकेशन,देहरादून, उत्तराखण्ड, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-93658-55-5 विशेष विवरण: ऽ कहानी ‘फूलों वाले बाबा’ उत्तराखण्ड में कक्षा पाँच की पाठ्य पुस्तक ‘बुराँश’ में शामिल। ऽ सहायक पुस्तक माला भाग-5 में नाटक मस्ती की पाठशाला शामिल। ऽ मधुकिरण भाग पांच में कहानी शामिल। ऽ परिवेश हिंदी पाठमाला एवं अभ्यास पुस्तिका 2023 में संस्मरण खुशबू आज भी याद है प्रकाशित ऽ पावनी हिंदी पाठ्यपुस्तक भाग 6 में संस्मरण ‘अगर वे उस दिन स्कूल आते तो’ प्रकाशित। (नई शिक्षा नीति 2020 के आलोक में।) ऽ हिमाचल सरकार के प्रेरणा कार्यक्रम सहित पढ़ने की आदत विकसित करने संबंधी कार्यक्रम के तहत छह राज्यों के बुनियादी स्कूलों में 13 कहानियां शामिल। ऽ राजस्थान, एस.सी.ई.आर.टी द्वारा 2025 में विकसित हिंदी पाठ्यपुस्तक नन्हे कदम में कक्षा पहली में कहानी ‘चलता पहाड़’ सम्मिलित। ऽ राजस्थान, एस.सी.ई.आर.टी. द्वारा 2025 में विकसित हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी सुमन’ में कक्षा तीसरी में कहानी ‘मैं स्कूल कब जाऊँगी’ सम्मिलित। ऽ राजस्थान, एस.सी.ई.आर.टी द्वारा 2025 में विकसित हिंदी पाठ्यपुस्तक की कक्षा चौथी में निबंध ‘इसलिए गिरती हैं पत्तियाँ’ सम्मिलित। ऽ बीस से अधिक बाल कहानियां असमियां और बंगला में अनुदित। ऽ गंग ज्योति पत्रिका के पूर्व सह संपादक। ऽ ज्ञान विज्ञान बुलेटिन के पूर्व संपादक। ऽ पुस्तकों में हास्य व्यंग्य कथाएं, किलकारी, यमलोक का यात्री प्रकाशित। ऽ ईबुक ‘जीवन में बचपन प्रकाशित। ऽ पंचायत प्रशिक्षण संदर्शिका, अचल ज्योति, प्रवेशिका भाग 1, अचल ज्योति भाग 2, स्वेटर निर्माण प्रवेशिका लेखकीय सहयोग। ऽ उत्तराखण्ड की पाठ्य पुस्तक भाषा किरण, हँसी-खुशी एवं बुराँश में लेखन एवं संपादन। ऽ विविध शिक्षक संदर्शिकाओं में सह लेखन एवं संपादन। ऽ अमोली पाठ्य पुस्तक 8 में संस्मरण-खुशबू याद है प्रकाशित। ऽ उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में भाषा के शिक्षक हैं। ऽ वर्तमान में: रा.इं.कॉ.कालेश्वर,पौड़ी गढ़वाल में नियुक्त हैं। विशेष पुरस्कार एवं सम्मान- ऽ राज्य संसाधन केन्द्र,देहरादून उत्कृष्ट साक्षरता सेवा सम्मान वर्ष 2000 ऽ गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय का हिन्दी पत्रकारिता स्नातकोत्तर डिप्लोमा में हरिश्चन्द्र सिंह भाटी स्मृति स्वर्ण पदक 2001 ऽ राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय की दूरस्थ शिक्षा विधा के लिए पाठ्यक्रम निर्माण में लेखक वर्ष 2002 ऽ हरियाणा सामुदायिक वानिकी परियोजना संबंधी मैनुवल सामग्री में लेखक 2006 ऽ एस.सी.ई.आर.टी.उत्तराखण्ड की कक्षा1,2,3 एवं 6 की पाठ्य पुस्तक लेखन में लेखक वर्ष 2005 ऽ एस.सी.ई.आर.टी.उत्तराखण्ड की नवीन पाठ्य पुस्तकों में लेखन, सम्पादन व परिष्करण वर्ष 2009-10 ऽ पं.प्रताप नारायण मिश्र बाल साहित्य सम्मान,उ.प्र.वर्ष 2011ं ऽ बाल प्रहरी,उत्तराखण्ड, बाल साहित्य सम्मान वर्ष 2014 ऽ राष्ट्रीय सेवा योजना,पौड़ी गढ़वाल सक्रिय भागीदारी सम्मान 2014 ऽ एस.सी.ई.आर.टी.उत्तराखण्ड द्वारा गढ़वाली,कुमाउँनी, जौनसारी, रं लोकभाषाओं का प्रथम पाठ्यक्रम निर्धारण में लेखन वर्ष 2016 ऽ पौड़ी गढ़वाल की प्राथमिक कक्षाओ में गढ़वाली भाषा की पाठ्य पुस्तक निर्माण में लेखक वर्ष 2019 ऽ बाल साहित्य और हिन्दी के उन्नयन हेतु सांसद स्थानीय क्षेत्र,गढ़वाल, पुस्तक वितरण सम्मान समारोह वर्ष 2023 ऽ एन.सी.ई.आर.टी.कृत बाल पत्रिका फिरकी बच्चों की रूपरेखा निर्माण में लेखन,संदर्भ व्यक्ति वर्ष 2026 ऽ राजस्थान साहित्य परिषद् टाबर टोली बाल साहित्य सम्मान 2024 सम्पर्कः गुरु भवन, पोस्ट बॉक्स-23 पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल.उत्तराखण्ड 246001.उत्तराखण्ड. मोबाइल एवं व्हाट्सएप-7579111144 ई-मेल: chamoli123456789@gmail.com

19 दिस॰ 2024

बच्चों का देश : रजत जयंती विशेषांक

अनूठा संग्रह बन गया है बालोपयोगी सामग्री का

‘बच्चों का देश’ के बुनियादी पाठक बच्चे हैं। इसे राष्ट्रीय बाल मासिक के नाम से भी जाना जाता है। यह पत्रिका प्रकाशन के पच्चीस साल पूरे कर चुकी है। हालांकि अब इसका जो स्वरूप है, उसमें सभी वय-वर्ग के पाठकों के लिए भी सामग्री है। दीगर बात यह है कि समूची सामग्री को इस तरह से तैयार किया जाता है कि वह पहले-पहल बच्चों को ज़रूर पसंद आए। 


पहला अंक अगस्त, 1999 को प्रकाशित हुआ था। ‘बच्चों का देश’ का छब्बीसवें साल के प्रवेश पर अगस्त-अक्तूबर 2024 का विशेषांक प्रकाशित हुआ है। हालांकि अब इस मासिक पत्रिका का मूल्य तीस रुपए है। मासिक अंक 52 पेज का प्रकाशित होता है। लेकिन यह अंक 100 रुपए का है। पेज संख्या 260 है। 153 पन्नों में तो विशुद्ध रूप से बाल साहित्य प्रकाशित हुआ है। 

यह विपुल साहित्य बच्चों का देश के पूर्व के अंकों से ही लिया गया है। प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से लगभग डेढ़ सौ रचनाएँ इस अंक में शामिल की गई हैं। चित्रों के तो क्या ही कहने हैं। हर चित्र में चित्रकार का नाम भी हो, प्रायः ऐसी परम्परा पूर्व में तो नहीं ही थी। लेकिन इस पत्रिका को उलटते-पलटते ही पता चल रहा है कि शामिल रचनाओं में चित्र अलग-अलग समय में भिन्न चित्रकारों ने बनाए हैं। इस अंक में लगभग दो सौ चित्र हैं जिनमें कम्प्यूटरीकृत, ग्राफिक्स, छाया चित्र, स्कैच, रंगचित्र, रेखांकन भी शामिल हैं। यह बड़ी बात है। 

मोटा-माटी ‘बच्चों का देश’ मासिक में किसी भी अंक में लगभग तीस रचनाकारों को शामिल करने का प्रयास दिखाई देता है। औसतन पच्चीस बरसों का सटीक आकलन संभव नहीं। छोटी-बड़ी तीस रचनाओं को एक अंक में शामिल होने की आदर्श स्थिति मान लें तो लगभग नौ हज़ार रचनाएँ बच्चों का देश में स्थान पाई हैं। संभव है नौ हज़ार रचनाओं के रचनाकार अमूमन बार-बार भी दोहराएँ जाते रहे होंगे। यह पचास फीसदी होंगे तो भी चार-पाँच हज़ार रचनाकार तो इन पच्चीस सालों में इस पत्रिका में प्रकाशित हुए होंगे। सही, सटीक आँकड़ा तो माह-दर-माह प्रकाशित रचनाओं और उनके रचनाकारों को सूचीबद्ध करने से ही सामने आ सकेगा। यह श्रम भगीरथ प्रयास ही कहलाया जाएगा। समय-समय पर अंकों के माध्यम से जो कविता, निबन्ध, चित्रकला, वर्ग पहेली आदि गतिविधियों में विद्यार्थी शामिल होते हैं उन्हें भी जोड़ लें तो यह आँकड़ा बढ़ जाएगा। 

ऐसे में पिछले पच्चीस सालों के लगभग तीन सौ अंकों का प्रकाशन मान लिया जाए तो प्रत्येक अंक से एक रचना शामिल करने की बाध्यता से भी यह अंक निर्मित किया जाता तो तीन सौ रचनाएं शामिल करनी पड़ती। तब तो यह अंक स्वयं में ग्रन्थाकार हो जाता। ऐसे में अधिकाधिक रचनाओं को रजत जयंती विशेषांक में समेट पाना असंभव ही था। किस रचना को शामिल किया जाए? किसे छोड़ा जाए? ऐसा इरादतन भी किया जाना संभव नहीं था। फिर भी संपादकीय टीम ने हर संभव यह प्रयास तो किया ही है कि साल 1999 से 2024 तक के अंकों में चुनिंदा रचनाओं को स्थान देकर नव पाठक एक यात्रा या कहूँ कि एक झलक या एक बानगी पा सकें। इस अंक में शामिल रचनाओं की प्रकृति को देखें तो संपादकीय टीम ने विविधता को आगे रखा। 

मसलन मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दी गई। पशु-पक्षियों से प्रेम और उनकी अस्मिता को ध्यान रखने वाली रचनाओं को शामिल किया गया। मनुष्यता, संवेदनशीलता को सर्वोपरि स्थान देने वाली रचनाएँ पुनः शामिल की गई। अब छोड़ा क्या? चूँकि प्रत्येक अंक ही बालकों को बेहतर नागरिक की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती प्रतीत होती हैं। भारत से प्रेम करने वाली हैं। इस दुनिया से प्रेम करने वाली हैं। सामाजिक बुराईयों का हिस्सा न बनने वाली हैं तो मुश्किल रहा होगा कि क्या छोड़ा जाए। संभव है कि कुछ अंक छोड़ भी दिए गए होंगे। अपवादस्वरूप एक-दो रचनाकारों की एक से अधिक रचनाएँ इस अंक में शामिल हो गई हैं। लेकिन कथ्य और बोध के हिसाब से भी चयन किया गया है। यह संभव है। बहरहाल, इस अंक को पलटने मात्र से चित्रकारों के भाव-बोध, पत्रिका का ले आउट, साज-सज्जा में आए बदलाव की झलक भी मिलती है। इन पच्चीस सालों में रचनाओं के स्तर का भी नमक भर सा ज़ायका भी इस अंक से लिया जा सकता है। मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी पत्रिका ने अपने इतने लंबे समय का ऐसा विशेषांक निकाला हो। अलबत्ता चयनित रचना के साथ मूल अंक का महीना-वर्ष भी प्रकाशित होता तो और भी बेहतर हो जाता। पता नहीं क्यों? पुराने अंकों से रचनाओं को छांटते-चुनते समय माह और वर्ष को अंकित न करने के पीछे क्या उद्देश्य रहा होगा। 

अंक में चालीस पृष्ठों में बाल साहित्य समागम की विस्तृत रपट एवं झलकियाँ हैं। शेष पन्नों पर ही पिछले 25 सालों में छपी सामग्री के कुछ मोती पिरोए गए हैं। बीच-बीच में सुधी पाठकों-हितैषियों-शुभचिन्तकों के विज्ञापन भी हैं। विज्ञापनों के मामलों में बच्चों का देश सतर्क रहा है। वह मुनाफाखोरों, सामाजिक बुराईयों को प्रश्रय देने वालों से विज्ञापन लेती ही नहीं। उपभोक्ताओं की अनिवार्य ज़रूरतों की सेवा प्रदाताओं से यदा-कदा विज्ञापन बच्चों का देश में दिखाई देता है। कहा जा सकता है कि यह पत्रिका व्यावसायिक दृष्टि से बहुत दूर है और केन्द्र में बालहित है। 

जैसा कि पहले भी कहा है कि पूर्व के कुछ स्थाई स्तंभों को भी जगह दी गई है। आवरण में पहले अंक सहित लगभग बीस अंकों के आवरण भी संजोए गए हैं। कहानियां, गीत, कविताएं, महाप्रज्ञ की कथाएं, संस्मरण, होनहार बच्चे, चित्र पहेली, महापुरुषों की जीवनियां, क्या आप जानते हैं? रोचक जानकारियां, चुटकुले, पहेलियां, सुडोकू ,प्रेरक प्रसंग, बच्चों का क्लब, बच्चों को उनके चित्रों के साथ जन्मदिन की बधाईयां भी अंक में शामिल हैं। इसके साथ चित्रकथा, पद्यकथा और बोधकथा से रचनाएं संकलित हैं। इन्हें पहचानों, सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता, क्या कहते हैं मुहावरे, आओ मित्र, चित्र बनाएं, चित्रों में  अन्तर ढूंढिएं, महापुरुषों के विचार, दिमागी कसरत, साहसी बच्चे, व्हाट्सएप कहानी भी शामिल हैं। अणुव्रत का संदेश भी है। रजत जयंती विशेषांक का आवरण बेहतरीन है। बाहर-भीतर कागज़ गुणवत्तापरक है। समूची पत्रिका रंगीन है। बेहतरीन है। अथक प्रयासों से यह अंक पाठकों के सामने आया है। 

इस अंक में शामिल प्रमुख रचनाओं को इस तरह देखा जा सकता है-

सीताराम गुप्ता कृत दिमागी कसरत, साहस की छलाँग-रजनीकान्त शुक्ल, मेघ डाकिया-भगवती प्रसाद गौतम, लगाम-नयन कुमार राठी, आओ ! बदलें कल्पना....-गर्वित बोथरा, कद्दू राजा-डॉ. शशि गोयल, साहस, सत्य और विश्वास-डॉ. मृदुल शर्मा, वीरता का अवतार: सरोजिनी कुलश्रेष्ठ, जीवित पुल-संकेत जैन, हमदर्द रजाई-राजीव गुप्ता,पहेलियाँ-कनकलता रस्तोगी, वन्दे मातरम-प्रमोद दीक्षित ‘मलय’ बच्चे ज्यों बगिया के फूल-कुसुम अग्रवाल, पहला कदम-ओम प्रकाश बजाज,हुई सुबह-डॉ. रामनिवास ‘मानव’, पेड़, नहीं काटो भैया-डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’,पेड़ लगाएँ-रामजीलाल घोड़ेला ‘भारती’, बेटी का दहेज, द्वेष का फल-अंकुश्री,पत्र का असर-दर्शन सिंह आशट,खुशी मिल गई-पद्मा चौगांवकर,कौए ने की मित्रता-राकेश चक्र,बचत भली आदत-गौरीशंकर वैश्य ‘विनम्र’,चिड़िया-माणक तुलसी राम गौड़, शहीद का बेटा-डॉ. चेतना उपाध्याय, नाना के घर जायेंगे-कैलाश त्रिपाठी, फलों के राजा-अश्वनी कुमार पाठक,पेड़ खजूर-डॉ. इन्दु गुप्ता, जादुई दस्ताने-अलका प्रमोद, हैलो मम्मी-सुकीर्ति भटनागर, सेठानी की सीख-गोविन्द भारद्वाज, स्वाद का रहस्य-डॉ. विमला भंडारी, तरकारी का खेल-सुशीला शर्मा, महाप्रज्ञ की कथाएँ, दिल से बातचीत-ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’, नन्हा आर्य-संचय जैन, सेवा की लगन-सावित्री रांका, झूठ का पर्दाफाश-भगवती प्रसाद द्विवेदी, पढ़ाई काम आई -समीर गांगुली, गर्मी से छुटकारा पाओ-शिवमोहन यादव, क्रिकेट की रोमांचक. . .-अनिल जायसवाल, लोरी-डॉ. लता अग्रवाल ‘तुलजा’, बच्चों का देश- उदय मेघवाल ‘उदय’, छाया का राज-डॉ. विष्णुशास्त्री सरल, दिमागी कसरत-प्रकाश तातेड़, देश प्रेम की परिभाषा-डॉ. संगीता बलवंत, चित्र पहेली-सुधा जौहरी, गियरवाली साइकिल-रोचिका अरुण शर्मा,जुगनू भैया-नीलम राकेश, जन्मदिन की बधाई, बन्दर मामा-चक्रधर शुक्ल, खुशियों की सौगात...-डॉ. सतीश चन्द्र भगत, अन्तर ढूंढ़िये, बुरी नजर का असर-डॉ. कुसुमरानी नैथानी, ये बादल क्यों रोते हैं?-रेखा लोढ़ा ‘स्मित’,बादल आए-नीता अवस्थी,बरखा दीदी-महेन्द्र कुमार वर्मा, पंछी हुए फुर्र-मनोहर चमोली ‘मनु’,पौधारोपण-सुनील कुमार माथुर,बूंद-बूंद से भरता घड़ा-उषा सोमानी,संगीत का जादू-कविता मुकेश,बच्चों का क्लब, बचत के बीज-ताराचन्द मकसाने,कलम और कँूची,ऐसे होती बारिश-गुडविन मसीह,जागता गाँव-गोपाल माहेश्वरी,चाचा नसरूद्दीन आफन्ती-सत्यदेव सत्यार्थी,आज यह जाना मैंने-डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी, जब भी सीखो-सुनैना पांडेय, माँ बतलाओ-डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, कोयल-मोहम्मद फहीम, कला के रंग -चित्रेश, जब साँप ने रास्ता काटा-डॉ. दिनेश चमोला, क्या आप जानते हो?,अप्रैल फूल-डॉ. मंजरी शुक्ला, और ठग पकड़े गये-पवित्रा अग्रवाल, रास्ता बताइये-चाँद मोहम्मद घोसी, बड़ा मारने वाला या ....महावीर शर्मा ‘विनीत’, नायक यदुनाथ सिंह-डॉ. वेद मित्र शुक्ल, अम्मा मुझे चुनाव लड़ा दो-जगतपति अग्रवाल, चुटकुले- मोहन सिंह, पहेली की कहानी-श्याम नारायण श्रीवास्तव, क्षमादान-इन्द्रजीत कौशिक,पत्र-नीना सिंह सोलंकी, क्या आप जानते हैं?-प्रीति प्रवीण खरे, नए साल में-अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’, नया साल है-जाकिर अली रजनीश, नया वर्ष नया हर्ष-विनोद चन्द्र पांडेय विनोद, लो चंगों पर थाप पड़ी-डॉ. तारादत्त निर्विरोध, होली-राजा चौरसिया, खिल उठे होली के रंग-डॉ. देशबन्धु शाहजहाँपुरी,कर्तव्य बोध-रूपनारायण काबरा, बेटी की चिन्ता-डॉ. संत कुमार टंडन रसिक, पेड़ न कोई काटे-हरप्रसाद रोशन,पेड़ लगाया-राम गोपाल राही,आवाज का जादू-अरनी रॉबर्ट्स,हार-जीत: डॉ. शील कौशिक,जैसी करनी वैसी भरनी-सत्यदेव सत्यार्थी, कौआ और कोयल-डॉ. भैंरूलाल गर्ग,बन्दर की होली-दीनदयाल शर्मा, अम्मा बतलाती-कृष्ण शलभ, अच्छे बच्चे-डॉ. प्रतीक मिश्र, मोनिया, तू बड़ा आदमी.....पी.के. पांडेय, श्रम की गरिमा-पुष्पेश कुमार पुष्प, कितना आलस्य, महाप्रज्ञ की कथाए,ँ गेहूँ की रोटी-डॉ. श्याम मनोहर व्यास, सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता-प्रकाश तातेड़,अनोखा बन्धन-अरविन्द कुमार साहू, हॉकी का जादू, होनहार बच्चे-शिखर चन्द जैन,मत करना गलती-रमेश चन्द्र पंत, क्या कहते हैं मुहावरे ?-साक्षी जैन, भूल का अहसास-डॉ. रामसिंह यादव, आओ ! बनाएँ कागज से....अरविन्द गुप्ता, गुड्डा गुड़िया-पूरन सरमा, बरखा रानी-डॉ. शिवदेव मन्हास,खुश हो जाता-रावेन्द्र कुमार रवि,संविधान की आत्मा-डॉ. बसन्तीलाल बाबेल, करिश्मा का करिश्मा-महेन्द्र जैन, जल और फल-राजीव सक्सेना,सच की दोस्ती-ज्ञानदेव मुकेश, आओ मित्र, चित्र बनाएँ,अन्तर ढूंढ़िए-देवांशु वत्स, सफाई का सबक-इंजी. आशा शर्मा, हाँ, मैं झूठ बोलूँगा-संगीता सेठी, एकता से श्रेष्ठता की ओर-नेहा गुप्ता, चुप्पी-डॉ. मोहम्मद अरशद खान, सैर चिन्ड्रनश्स पीस पैलेस की,मिस्टर लल्लू लाल-डॉ. फहीम अहमद, । ठवपसपदह म्गचमतपउमदज-राजीव ताम्बे, सान्ता क्लॉज-डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी, जाड़ा आया-सुरेन्द्र प्रसाद गिरि, लक्ष्य...महापुरुषों के विचार, बरसात की रिमझिम-सुधा भार्गव, अब्दुर्रहीम खानखाना: डॉ. राष्ट्रबन्धु , अच्छे बच्चे-चितरंजन भारती, ये बच्चे हैं-डॉ. श्रीप्रसाद, है आराम हराम-घमंडीलाल अग्रवाल, नया सवेरा-शकुन्तला कालरा, सहन करो, सफल बनो-समणी विपुल प्रज्ञा, हमारी माँ-डॉ. दाऊदयाल गुप्ता, चिंता करते क्यों कल की-डॉ. कृपा शंकर शर्मा अचूक, सबसे कठिन मैराथन-मुरली मनोहर मंजुल, डॉ. राधाकृष्णन-डॉ. बाल शौरि रेड्डी, बुलबुल और सोने का पिंजरा-डॉ. महाराज कृष्ण जैन, पुरुषोत्तम दास टंडन-राजेन्द्र शंकर भट्ट, दो दिन मीठे ये बचपन के-डॉ. मनोहर प्रभाकर, नमन हमारा-राजनारायण चौधरी, कागजी नौटिलस-डॉ. परशुराम शुक्ल, आओ हम भी करें दोस्ती-दिविक रमेश, सफलता का रहस्य- गोपालदास नागर, मिट्टी के खिलौने-पवन कुमार वर्मा, आस्था का मंदिर-गोविन्द शर्मा को स्थान मिला है। 

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बच्चों का देश: मासिक 
वर्ष: अगस्त-अक्टूबर 2024  
अंक: रजत जयंती विशेषांक  
पृष्ठ: 260
इस अंक का मूल्य: 100 रुपये
सम्पादक: संचय जैन
सह संपादक: प्रकाश तातेड
प्रकाशक: अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी(अणुविभा), चिल्ड्रन पीस पैलेस, पोस्ट बॉक्स सं: 28, राजसमन्द 313324.राजस्थान
पत्रिका हेतु सम्पर्क: 9414343100, 9351552651

प्रस्तुति: मनोहर चमोली ‘मनु’
सम्पर्क: 7579111144

   


24 अग॰ 2024

राजस्थान के राजसमंद में संपन्न हुआ तीन दिवसीय बाल साहित्य समागम

साहित्यकारों ने माना कि लेखन में नया हो बाल साहित्य 

बाल साहित्य समागम में शिरकत कर रहे साहित्यकारों ने माना कि बच्चों के लिए लिखते समय अतिरिक्त श्रम, एकाग्रता, सतर्कता की महती आवश्यकता होती है। बाल साहित्य का अर्थ यह कदापि नहीं है कि जो मन में आए, कल्पना के नाम पर परोस दिया जाए। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हिन्दी बाल साहित्य की दशा और दिशा, बाल साहित्य यात्रा में बाल पत्रिकाओं की भूमिका, बाल साहित्य रचनाधर्मिता: चुनौतियाँ और समाधान, बाल साहित्य: भावी स्वरूप, चुनौतियाँ और समाधान, बाल साहित्य का पठन-पाठन: समाज व परिवार का दायित्व, आदर्श व्यक्तित्व निर्माण में बाल साहित्य की भूमिका और एक सफल बाल साहित्य रचनाकार होने के मायने सहित कहानी, उपन्यास, कविता, बालगीत, नाटिका एवं एकांकी, संस्मरण व प्रेरक प्रसंग, पहेलियाँ और सामान्य ज्ञान, पारस्परिक भाषा अनुवाद, बाल साहित्य में चित्रांकन जैसे विषयों पर बोलते-सुनते-समझते हुए साहित्यकारों ने स्वीकारा कि साहित्य लेखन कर्म मात्र स्वान्तः सुखाय के ध्येय तक सीमित नहीं है। साहित्य आनन्द की प्राप्ति के साथ-साथ एक जीव से सार्थक मनुष्य बनाने की भूमिका का भी निर्वहन करता है।

मासिक पत्रिका ‘बच्चों का देश’ की रजत जयंती के अवसर पर तीन दिवसीय बाल साहित्य समागम राजस्थान के राजसमन्द पर आयोजित हुआ। अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी ने इस आयोजन में बच्चों का देश में अनवरत् लिखने वाले लगभग 400 रचनाकारों में से देश भर के एक सौ तीस साहित्यकारों को निमंत्रण भेजा था। भारत के ग्यारह राज्यों से पिच्चासी रचनाकारों ने समागम में शिरकत की। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, बिहार, पंजाब, मध्य प्रदेश, हिमाचल, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र और उत्तराखण्ड से अधिक रचनाकारों की उपस्थिति रही।

इससे पूर्व बाल साहित्य समागम का उद्घाटन सत्र भी सार्थक रहा। अणुविभा के अध्यक्ष अविनाश नाहर ने अणुव्रत आचार संहिता का वाचन करते हुए दोहराया कि बतौर मनुष्य हमें सबसे पहले संवेदनशील होने की आवश्यकता है। अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी के प्रमुख कार्यो की भी उन्होंने जानकारी दी। उन्होंने सोसायटी के जीवन विज्ञान, एक्सपीरियंस द रियल हाई, डिजिटल डिटॉक्स, अणुव्रत क्रिएटिव कॉन्टेस्ट, पर्यावरण जागरुकता अभियान सहित अणुविभा द्वारा संचालित कार्यक्रमों की जानकारी दी। उन्होंने साहित्यकारों से कहा कि समाज के लिए विविधतापूर्ण लेखन के लिए भी समाज के नवनिर्माण कार्यों में जुड़ना चाहिए। अविनाश नाहर ने सुझाया कि अणुविभा पर्यावरण, नशा उन्मूलन कार्यक्रमों के प्रति कृत संकल्प है। रचनाओं के माध्यम से भी समाज में पसरती जा रही बुराईयों के बारे में लिखने के लिए भी साहित्यकार अणुविभा से जुड़ सकते हैं। ‘बच्चों का देश’ पत्रिका के संपादक संचय जैन ने सभी उपस्थितों का स्वागत किया। उन्होंने विस्तार से बाल साहित्य समागम के उद्देश्यों और तीन दिनों के समारोह की रूपरेखा साझा की। इस अवसर पर उन्होंने बच्चों का देश के पच्चीस सालों का सफर भी साझा किया। इस अवसर पर पत्रिका के संस्थापक मोहनलाल जैन, प्रथम सम्पादक कल्पना जैन, प्रसिद्ध बाल साहित्यकार बाल शौरि रेड्डी सहित वरिष्ठ साहित्यकारों के योगादान को भी याद किया। प्रबंध संपादक पंचशील जैन ने कहा कि आज बच्चों का देश से लगभग चार सौ साहित्यकार जुड़े हुए हैं। अणुव्रत की पत्रिका और बच्चों का देश से इन पच्चीस सालों में हरिशंकर भाभड़ा, चंदनमल बैद, हीरालाल देवपुरा, गोविंदाचार्य जैसे राजनेता भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े रहे। कई बच्चों-लेखकों को पहली बार प्रकाशन का अवसर बच्चों का देश ने दिया।

सोसायटी के डॉ. महेंद्र कर्णावट ने बाल मनोविज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। जीवन शैली बदल रही है। ऐसे में सामाजिक जीवन और साहित्यिक कर्म भी खास हो चला हैं। साहित्कार पथ-पदर्शक का कार्य करते रहे हैं। वह अपनी दूरदर्शिता से सही मार्ग सुझाते रहते हैं। पूर्व न्यायाधीश डॉ. बसंतीलाल बाबेल ने भारतीय न्याय संहिता और अणुव्रत आचार संहिता में पर्याप्त समानता का उल्लेख किया। उन्होने कहा कि समाज में भाईचारा,बन्धुत्व बनाए रखने के लिए संयम बहुत जरूरी है। अणुव्रत स्वयं में एक उत्कृष्ट जीवनशैली है। अणुव्रत लेखक पुरस्कार से सम्मानित लेखक फारुख अफरीदी ने अणुव्रत के माध्यम से बच्चों मे संस्कारों का बीजारोपण करने की आवश्यकता जतायी। उन्होंने कहा कि सकारात्मकता के जरिए ही समाज आगे बढ़ सकता है। अणुविभा के प्रबंध न्यासी तेजकरण सुराणा ने बच्चों के भविष्य-निर्माण में बाल साहित्यकारों की भूमिका पर विचार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि आज के दौर में पढ़ना वैसे ही कम हो रहा है। लेकिन पढ़ना क्रिया की मांग हमेशा बनी रहेगी। उद्घाटन सत्र में राजसमंद के विद्यालय गांधी सेवा सदन के विद्यार्थियों ने अणुव्रत गीत भी प्रस्तुत किया।

अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी की बाल केंद्रित प्रवृत्तियों पर आधारित सत्र का संयोजन प्रकाश तातेड़ ने किया। अणुविभा के उपाध्यक्ष डॉ. विमल कावड़िया ने जीवन विज्ञान, डॉ. नीलम जैन ने पर्यावरण जागरुकता अभियान, डॉ. राकेश तैलंग ने स्कूल विद ए डिफरेंस, डॉ. सीमा कावड़िया ने बालोदय शिविर, अभिषेक कोठारी ने बालोदय एजुटूर, प्रकाश तातेड़ ने ‘बच्चों का देश’ पत्रिका तथा मोहन मंगलम ने ‘अणुव्रत’ पत्रिका के बारे में दर्शक दीर्घा में उपस्थितों को जानकारी दी। बच्चों का देश’ पत्रिका के सह संपादक प्रकाश तातेड़ ने भी साहित्यकारों को संबोधित किया। पहले ही दिन साहित्यकारों ने चिल्ड्रन’स पीस पैलेस में बाल मनोविज्ञान पर आधारित विभिन्न दीर्घाओं का अवलोकन किया।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हिन्दी बाल साहित्य की दशा और दिशा विषय पर आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार दिविक रमेश ने की। उन्होंने कहा कि बच्चों का साहित्य सिर्फ बच्चों के लिए नहीं लिखा होता। वह हर वय वर्ग का पाठक पढ़ सकता है। अलबत्ता वह इतना सरल हो कि बच्चे भी पढ़ सकें। ऐसा नहीं है कि उसे बेहद सरल ही लिखा जाए। नए शब्दों को भी बच्चे सन्दर्भ के साथ आसानी से ग्रहण कर लेते हैं। आज ज़रूरत इस बात की है कि उपदेशात्मक, और संदेशात्मक बातें पाठक पसंद नहीं करते। साहित्य की विधाओं में इतना रस हो कि उसमें छिपे भाव, अर्थ ग्रहण और संदेश पाठक स्वयं आत्मसात् करें। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है जैसी प्रवृत्ति से बचने की नितांत आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आज के युग में सार्थक, यथार्थ से भरा साहित्य भी लिखा जा रहा है। आज बाल साहित्य को अलग से रेखांकित किया जाने लगा है। यह हमारे लिए प्रसन्नता का विषय है।
एक घण्टा पन्द्रह मिनट संचालित इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार दिविक रमेश ने कहा कि हम हर दिन अद्यतन होते हैं। बाल साहित्य में पहला पाठक अब बेहद सजग है। युवा रचनाकार भी अब सजग हैं। आज के दौर में खूब लिखा जा रहा है। यह बात अलग है कि कैसा लिखा जा रहा है, इस पर भी चिन्तन होना चाहिए। बाल साहित्य के क्षेत्र में ख्यातिलब्ध रचनाकारों ने भी अपनी कलम चलाई है। अब बाल साहित्य को अलग से रेखांकित किया जा रहा है। अब नए भाव-बोध पर बहुत अधिक लिखने की आवश्यकता भी है। आज के दौर में बच्चों के पास पढ़ने-लिखने के कई अवसर हैं। माध्यम भी है। ऐसे में आज के बाल साहित्य को भी स्वयं में नवीन होना चाहिए। बाल साहित्य कई मायनों मंे पाठक के समग्र विकास में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। दिविक रमेश ने कहा कि बाल साहित्य को खासकर हिन्दी पढ़ने-लिखने वाले परिवारों में अब गंभीरता के साथ स्वीकार किया जा रहा है। हाँ ! यह बात भी उचित है कि पाठकों की संख्या के हिसाब से इसे अधिकाधिक तौर पर प्रकाशित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि बच्चों की दुनिया को बेहद संकीर्ण, क्षेत्रीयता के आधार पर सीमित नहीं किया जाना चाहिए। भाषाई तौर पर भी विस्तार से लिखने की जरूरत है। हमें कई क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य को विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करना चाहिए। स्थानीयता से राष्ट्रीयता और फिर वैश्विक स्तर का नजरिया भी बाल साहित्य का हिस्सा होना चाहिए।

इस सत्र में सीताराम गुप्त, दीनदयाल शर्मा, रेखा लोढ़ा स्मित, डॉ. शुभदा पांडेय, इंजीनियर आशा शर्मा, योगीराज योगी, नीना सिंह सोलंकी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने बाल साहित्य की दिशा पर भी गंभीरता से विचार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि बाल पाठकों को कुछ भी परोसने की आदत से बचना होगा। हमें तथ्यात्मक, तार्किकता और वैज्ञानिकता के साथ बाल साहित्य लिखना चाहिए। यदि हम भारत के सन्दर्भ में लिख रहे हैं तो उन वन्य जीवों का भारत की भूमि में दिखाया जाना उचित नहीं है जो यहाँ पाए ही नहीं जाते। उन्होंने कहा कि आज सूचना तकनीक का युग है। बच्चे जानते हैं कि चन्दा कोई मामा नहीं है। वह मात्र एक आकाशीय पिण्ड है। पाठकों को सही जानकारी देने वाला साहित्य लिखा जाए।

वक्ताओं ने यह भी कहा कि बाल साहित्य को कई तरह की विधाओं से सराबोर होना चाहिए। केवल कविता कहानी से काम नहीं चलने वाला है। पाठकों को विविधता से भरी विधाओं से युक्त रोचक साहित्य उपलब्ध कराना चाहिए। वर्तमान में कैसा बाल साहित्य लिखा जा रहा है?
वक्ताओं ने बाल साहित्य के कमजोर पक्षों को भी रेखांकित किया। जीवनी, संस्मरण, यात्रा वृतान्त, आत्मकथ्य, पत्र लेखन, नाटक, एकांकी जैसी विधाओं पर बाल साहित्य लिखने पर वक्ताओं ने जोर दिया। भविष्य के बाल साहित्य पर भी वक्ताओं ने अपनी बात रखी। इस सत्र में निम्नांकित बिन्दुओं पर सभी वक्ता सहमत रहे।

एक-बाल साहित्य सरल हो, वह सभी के पढ़ने के लिए सुलभ हो।
दो-बाल साहित्य अधिकाधिक विधाओं में समान रूप से लिखा जाना चाहिए।
तीन-बचकानी, बेसिर-पैर की कल्पना की अतिरंजना से बाल साहित्य को मुक्त होना चाहिए।
चार-बाल साहित्य को अत्याधुनिक माध्यमों में भी अपनी पैठ बनानी चाहिए।
पाँच-बाल साहित्य को सभी तरह के विषयों को शामिल करना चाहिए।
छःह-साहित्यकारों को चाहिए कि लोकतांत्रिक मूल्यों को, संवेदनशीलता को प्रमुखता से रचनाओं में शामिल करना चाहिए।
सात-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त साहित्य पाठकों के लिए लिखा जाना चाहिए।

पहले ही दिन सायंकालीन सत्र बाल साहित्य में बाल पत्रिकाओं की भूमिका पर केन्द्रित रहा। लेखक, समीक्षक एवं आलोचक डॉ. सुरेंद्र विक्रम ने कहा कि पत्रिकाओं की भूमिका मनुष्यता की यात्रा में बच्चों के लिए टॉनिक का काम करती है। उन्होंने पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बढ़ावा देने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हिन्दी में अब तक ज्ञात पत्रिकाओं की संख्या लगभग 230 के आस-पास है। कुछ पत्रिकाएं समय के साथ बहुत जल्दी बंद हो गई। कुछ पत्रिकाओं ने कई सालों तक नई पौध के व्यक्तित्व के निर्माण में महती योगदान दिया। उन्होंने कहा कि आजाद भारत के बाद साहित्यकारों के समक्ष दूसरी स्थितियां-परिस्थितयां थीं। दासता से मुक्त होकर आजादी मिली थी तो जाहिर है कि रचनाओं में भी वह सब शामिल होना था। साहित्य ने अपने समय के वातावरण को रचनाओं में शामिल किया। आज इक्कीसवीं सदी है। आज लगातार पत्र-पत्रिकाओं से बाल साहित्य बढ़ने की बजाय लुप्त होता जा रहा है। आज का बच्चा सूचनाएं, ज्ञान, जानकारी को भी अल्प समय के लिए चाहता है। आज उसके पास मनोरंजन के कई साधन हैं। पहले ऐसा नहीं था। यही कारण है कि उस दौर में कोई पत्रिका स्वयं में बहुत बड़ा साधन होती थीं। उन्होंने कहा कि बाल पत्रिकाओं ने हमें पाठक बनाया है। संवेदनशील बनाया है। हमारे भीतर बहुत सारे गुणों में वृद्धि पत्रिकाओं की रचनाएं पढ़ने से हुई हैं। आज हमें बालमन के अनुरूप पत्रिकाएं प्रकाशित करनी होंगी।

इस सत्र में अनिल जायसवाल, गोपाल माहेश्वरी, डॉ. इंदु गुप्ता, डॉ. सत्यनारायण सत्य, चक्रधर शुक्ल, हरदेव सिंह धीमान, निमला नगला, यशपाल सिंह यशस्वी, राधा पालीवाल ने भी अपने विचार व्यक्त किए। डॉ॰ इन्दु गुप्ता ने कहा कि बाल-साहित्य का एकमात्र उद्देश्य मात्र बच्चों का मनोरंजन करना और बिना उपदेशात्मक हुए उन्हें सीख दे जाना है। उन्हें दुनिया से रू-ब-रू करवाना है। अच्छे-बुरे में अंतर करना बताना है। प्रकृति से, दुनिया से और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील बनाता है। नैतिक मूल्यों को स्थापित करने हेतु बढ़ावा देना है। सकारात्मक सोच को विकसित करना भी मकसद है। पत्रिकाएं अब तक यह काम बखूबी करती रही हैं। चित्रात्मक कहानियां, नाटक, एकांकी, संस्मरण आदि रोचक होने के कारण मनोरंजन के साथ बौद्धिक विकास, मौलिकता, बच्चों में सृजनशीलता आदि संज्ञानात्मक कौशलों का विकास करता है। चित्रों को देखकर बालमन उनसे समाज को सम्बद्ध कर भावनात्मक संबंध को बढ़ाने की कोशिश करता है। साहित्य भावों, विचारों, घटनाओं, अनुभवों की भाव सहित प्रस्तुति है। विधा कोई भी हो, लेकिन यह बच्चों को कल्पनाशील और रचनात्मक बनाता है। इसमें मनोरंजन, रोचकता व नवीनता तीनों तत्वों का समावेश हो। भाषा सरल और समझने में आसान तथा स्पष्ट होनी चाहिए। बाल-साहित्य में मौलिकता नष्ट न हो। वह क्षेत्रीय जातीय भाषायी कुशलताओं का विकास करे।

सत्र का संयोजन रजनीकांत शुक्ल ने किया। रजनीकांत शुक्ल ने कहा कि यह तय है कि जैसे-जैसे विज्ञान और तकनीक की रफ्तार बढेगी लोगों की एक-दूसरे से दिलों की दूरी बढती जाएगी। हम सभी जानते हैं मन में मानवीय संवेदनाओं की जडें जमने में बचपन की एक महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। बचपन को संस्कारित करने, उनकी रुचियों को परिष्कृत करने और उनके भविष्य को सही दिशा देने में बाल साहित्य के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इक्कीसवीं सदी में बाल साहित्य बहुत ही आवश्यक है। वक्ताओं ने स्वीकार किया कि पत्र-पत्रिकाओं के बंद होने से पाठकों-लेखकों के बीच जो संवाद था वह टूट गया है। संपादक के काम, पत्रों की जिम्मेदारी, पत्रिकाओं की जिम्मेदारी और पुस्तकों के महत्त्व पर भी बातचीत हुई। वक्ताओं ने माना कि देश कोई भी हो, युग कोई भी हो, बाल मन के लिए सैकड़ों पत्रिकाएं चाहिए। दुख इस बात का है कि बाल पाठकों की संख्या के हिसाब से अभी हिन्दी में पत्रिकाएं बहुत कम हैं। इनकी संख्या बढ़नी चाहिए।
रात्रिकालीन सत्र डॉ॰परशुराम शुक्ल की अध्यक्षता में संचालित हुआ। सत्र का संचालन डॉ॰चेतना उपाध्याय ने किया। सत्र से पूर्व साहित्यकारों को सात अलग उप विषयों के साथ आधा घण्टा विमर्श के लिए दिया गया। साहित्यकारों ने अपने-अपने समूह में चर्चा की। डॉ॰दर्शन सिंह आशट के संयोजन में कहानी और उपन्यास पर चर्चा हुई। संतोषकुमार सिंह के संयोजन में कविता और बालगीत पर चर्चा हुई। गुडविन मसीह के संयोजन में नाटिका और एंकाकी पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि भविष्य का बाल साहित्य न सिर्फ सरल, सुलभ और सुगम होना चाहिए बल्कि रोचक, रोमांचक और मनोरंजक होने के साथ साथ पठनीय व सही दिशा देने वाला होना चाहिए। बाल साहित्य लिखते समय बच्चों की आयु वर्ग का विशेष ध्यान रखना चाहिए। भाषा, शिल्प और शैली का भी ध्यान रखना चाहिए। कोरी कल्पना और असार्थकता, तंत्र मंत्र, जादू टोना, अपराध और मारधाड़ से अधिकांशतः बचना चाहिए। विषयवस्तु बालपयोगी, बाल्यावस्था अनुरूप होनी चाहिए। बाल मनोविज्ञान की कसौटी पर खरा होना चाहिए।

डॉ॰ लता अग्रवाल ‘तुलजा’ के संयोजन में संस्मरण और प्रेरक प्रसंग विधा पर चर्चा हुई। चाँद मोहम्मद घोसी के संयोजन में पहेलियाँ और सामान्य ज्ञान पर चर्चा हुई। पदमा चौंगांवकर के संयोजन में पारस्परिक भाषा अनुवाद पर चर्चा हुई। दिलीप शर्मा के संयोजन में बाल साहित्य में चित्रांकन पर चर्चा हुई। तत्पश्चात बड़े समूह में उप सत्रों के संयोजकों ने चर्चा के निष्कर्ष बिन्दु साझा किए। समेकन करते हुए डॉ॰ परशुराम शुक्ला ने कहा कि यह बड़े हर्ष का विषय है कि हर समूह में कई साहित्यकारों ने मिल-बैठकर विधावार कल, आज और कल को ध्यान में रखते हुए चर्चा की। उन्होंने कहा कि लेखन एक कौशल है। यह अभ्यास से और सधता जाता है। लेकिन पाठकों की संख्या के हिसाब से हर विधाओं में हजारों रचनाएँ लिखे जाने की जरूरत है। प्रकाशन की भी आवश्यकता है। पाठकों को ध्यान में रखते हुए भी लिखा जाना और छपने से पूर्व उसकी तटस्थ समीक्षा की जानी जरूरी है। अन्यथा बहुत अनुपयोगी और पाठकों में अरुचि पैदा करने वाली सामग्री भी बहुतायत में प्रकाश में आ रही है। इसे समझने की आवश्यकता है। पहेलियाँ और सामान्य ज्ञान को रोचक तथा नए भाव-बोध के साथ लिखे जाने की आवश्कयता पर बल दिया गया। प्रेरक प्रसंगों और चित्रांकन पर भी अत्यधिक परिश्रम किए जाने, अधिकाधिक नए कहन पर भी जोर दिया गया।

बाल साहित्य के भावी स्वरूप, चुनौतियाँ और समाधान पर भी व्यापक चर्चा हुई। इस सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार समीर गांगुली ने की। उन्होंने कहा कि साहित्य से अधिक फिल्म इंडस्ट्री समृद्ध है। प्रयोगवादी है और नित नए साधनों-तरीकों को इस्तेमाल करती है। साहित्य को भी अब नए कलेवर में आना होगा। अनुवाद का काम भी बड़े स्तर पर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिन्दी का लेखन और सिनेमा भी बहुत पीछे है। हालांकि हिन्दी सिनेमा अन्य भाषाओं, विदेशी सिनेमाओं से प्रेरित होता है और वहाँ से सीखता है लेकिन हिन्दी साहित्य को अभी खुद को इस दिशा में अपडेट करना होगा। इस सत्र का संयोजन कर रहे साहित्यकार अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’ ने कहा कि साहित्य हमें एक जीव से मनुष्य बनाने में सहायता करता है। एक सामाजिक जीव के भीतर मनुष्यता के बीज बोने का काम साहित्य करता है। उन्होंने कहा कि तकनीकी विकास कल कहाँ तक जाएगी? कोई नहीं जानता। यह स्क्रीन युग है। आज समय से पूर्व सब कुछ सार्वजनिक हो रहा है। ऐसे में साहित्य की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि परिपक्व बाँस को मोड़ा नहीं जा सकता। यही बात बच्चों के संदर्भ में है। आज हिंसा, अपराध, कुण्ठा, हताशा, निराशा, आत्मघाती निर्णय तक बच्चे ले रहे हैं। ऐसे में साहित्य एक सखा की भूमिका निभा सकता है। आज के बच्चे तथ्यात्मक तौर पर और सूचनात्मक तौर पर बहुत कुछ जानते हैं। परम्परागत साहित्य से काम नहीं चलने वाला है। चुप रहने और संवादहीनता से भी काम नहीं चलने वाला है। हमें नई पीढ़ी से संवाद करने होंगे। उनके मन की थाह लेनी होगी।

मुंबई क सुप्रसिद्ध साहित्यकार ताराचंद मकसाने ने कहा कि आज ज़रूरत है कि साहित्य पाठक के समक्ष सत्य को लाए। आज भी दशकों पूर्व लेखकों के उद्धरण-कथन हम बार-बार पढ़ते हैं। सुनते हैं और सुनाते हैं। लेखन आने वाले कल के पार देखता है। साहित्य में यथार्थवाद आज पहली जरूरत है। जीवन की समस्याएं भी शामिल हों और समाधान भी साहित्य में हो। उन्होंने कहा कि नई तकनीक आज की जरूरत हैं। उन्हें कोसने से कुछ नहीं होने वाला है।

साहित्यकार कविता मुकेश ने कहा कि यह बात सही है कि साहित्य मनोरंजन और आनंद की प्राप्ति के लिए है। लेकिन यह पाठक की जिज्ञासा बढ़ाए भी और शांत भी करे। आज डिजिटल माध्यमों के प्रभाव से हम बच नहीं सकते। पाठक का उस जाना स्वाभाविक है लेकिन लेखन भी उन माध्यमों में खुद को परिवर्तित करे। लेखकों को चाहिए कि आज के बच्चों की रुचियों के अनुसार लेखन करे। आज वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त साहित्य समय की मांग है। एक ओर बच्चों पर पढ़ाई का दबाव है वहीं रोजगार का संकट का भय भी है। बच्चे बहुत जल्दी वयस्क हो रहे हैं। उसी तीव्रता के साथ हमारा साहित्य भी परम्परागत साहित्य से आगे बढ़े। बाल साहित्य रचते समय कुछ प्रश्न एक साहित्यकार के समक्ष हमेशा होने चाहिए। यह जानना जरूरी है कि बच्चों की उम्र और रुचि क्या है। वे क्या पढ़ना चाहते हैं? उन्हें भविष्य में किस प्रकार की चुनौतियों से दो-चार होना पड़ सकता है। इसके लिए बाल- साहित्य में शिक्षा और मनोरंजन के साथ विविध विषय भी समाहित होने चाहिए। पर्यावरण के प्रति जागरूकता, साहित्य और कला का संयोजन, कल्पना शक्ति को विकसित करना,अनुवाद कार्य द्वारा विश्व भर का बाल-साहित्य बच्चों को उचित दर पर उपलब्ध करवाना। इसके अलावा विभिन्न संस्कृतियों और भाषायों का भी उनके साहित्य में समावेश होना चाहिए। इस तरह आकर्षक, ज्ञानवर्धक, सुरुचिपूर्ण और उद्वेश्यपूर्ण बाल साहित्य द्वारा बच्चों का समग्र विकास संभव है।

डॉ॰ राजवन्त कौर ने पूर्वी पंजाब और पश्चिमी पंजाब के बाल साहित्य पर चर्चा की। उन्होंने गुरुमुखी और शाहमुखी भाषाओं में बाल साहित्य को अभी आरंम्भिक दौर माना। उन्होंने कहा कि भारत की कई भाषाओं का अनुवाद पंजाबी में हो। यह आज की जरूरत है। स्थानीय भाषाओं का और स्थानीय भाषाओं में बाल साहित्य कम ही मिलता है। पाकिस्तान और पूर्वी पंजाब में अभी बच्चों के लिए लेखन आरम्भिक दौर में है।

डॉ॰ उमेशचन्द्र सिरसवारी ने कहा कि अब बच्चों को सीख, नसीहतों और उपदेशों से अटे पड़े साहित्य से कुछ नहीं होने वाला है। साहित्य के नाम पर सूचना, ज्ञान और सामान्य ज्ञान ठूंसने से भी काम नहीं चलने वाला है। बच्चों की पसंद को समझने की आवश्यकता है। सुनील कुमार माथुर ने कहा कि बच्चों के लिए समाचार पत्रों में अब कोई जगह नहीं रही। पत्रिकाएं नाम मात्र की हैं। जो हैं वह डाक से पहुँचती नहीं। दुकानों में अब पत्रिकाएं नहीं मिलतीं। यदि है तो अंग्रेज़ी का बोलबाला है। हिन्दी की स्थिति बेहद खराब है।

कुसुमरानी नैथानी ने कहा कि पुस्तकालय खोले जाने चाहिए। किताबों की महत्ता पर स्कूलों को भी जिम्मेदार बनाना चाहिए। किताबें पढ़ना और कोर्स की किताब पढ़ना में जो बड़ा अंतर है उसे अभियान के तहत सामने लाने की आवश्यकता है।
मंगलकुमार जैन ने कहा कि किताबों का पत्रिकाओं का महत्व कभी कम नहीं हो सकता। लेकिन आज पढ़ने के माध्यम बदल गए है। स्क्रीन पर भी बाल साहित्य लाया जा सके। इस दिशा में भी काम होना चाहिए। उषा सोमानी ने कहा कि खरीदकर पढ़ने की आदत घर से और स्कूल से आ सकती है। यह आज बड़ी चुनौती है।
विकास खन्ना ने कहा कि विविधता से भरी सामग्री आज भी चुनौती है। बच्चों का साहित्य अभी परम्परा से बाहर नहीं निकल पा रहा है। चीज़ों को सिंपल रखना और रोचक बनाना भी बड़ी चुनौती है। फिल्मों की ओर झुकाव ज्यादा है। बच्चों के लिए प्रिंट मीडिया कुछ खास नहीं कर रहा है। भारतीय भाषाओं का साहित्य तो दूर अपनी-अपनी भाषाओं में भी सार्थक लेखन बच्चों के लिए नहीं हो रहा है।

बाल साहित्य का पठन-पाठन: समाज व परिवार का दायित्व विषयक सत्र की अध्यक्षता कर रहीं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ॰ विमला भण्डारी ने कहा कि परिवार समाज की इकाई है। परिवारों से ही समाज बनता है। आज तीन मंजिला मकान हैं लेकिन उन मकानों में किताबों का एक कोना तक नहीं है। घर के बजट में सब कुछ है लेकिन पुस्तकों की खरीद का कोई बजट नहीं है। उन्होंने कहा कि हिन्दी समृद्ध है। हिन्दी में देखा और सुना जा रहा है लेकिन हिन्दी में बस पढ़ा नहीं जा रहा है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में क्लब हैं। किटी पार्टी हैं। उत्सवों का माहौल है बस बच्चों के क्लब नहीं हैं। बच्चों की दुनिया आज मशीनीकृत हो चुकी हैं आज बच्चों को साहित्य से और सामाजिक गतिविधियों में इनवॉल्व करना होगा। संयोजन कर रहे बाल प्रहरी के संपादक उदय किरौला ने कहा कि हम सभी सूचना तकनीक को, बच्चों को कसूरवार ठहरा रहे हैं लेकिन हमें विचार करना होगा कि हम बच्चों के लिए क्या प्रयास कर रहे हैं। क्या हमने उन्हें पढ़ने के मौके दिए? क्या हमने बच्चों के साथ बैठकर उनकी इच्छाएं पूछीं? उन्होंने कहा कि आज भी बच्चे पढ़ना चाहते हैं। उन्हें मौके देने होंगे। उन्हें पढ़ने के विकल्प देने होंगे।
साहित्यकार संगीता सेठी ने कहा कि समाज का दायित्व है कि वह नई पीढ़ी को देखे। उन्हें अपने कार्यों से प्रोत्साहित करे। वैसे देखें तो हम साहित्यकारों को हमारे परिवार में और हमारे मुहल्ले में कितना जानते हैं? क्या हमने बतौर साहित्यकार आस-पास पढ़ने के मौके जुटाए? हमने बच्चों के साथ समय बिताने के कितने अवसर जुटाए? हमें बच्चों से संवाद करना ही होगा। घर में बैठकर हवा में बाल साहित्य लिखने से बात नहीं बनने वाली है। किशोर श्रीवास्तव ने कहा कि अब अतीत को बार-बार कोसने से कुछ नहीं होगा। परिवारों में बच्चों को चुप कराने के तरीकों को देखिए। माँ अपनी बेटी की बेटी को लोरी सुनाएगी। बात करेगी। संवाद अभिनय करेगी। वहीं बेटी अपनी बेटी को मोबाइल पकड़ा देगी। यह अन्तर भी साहित्य से मोह भंग का बड़ा कारण है। साहित्य का प्रचार-प्रसार बढ़ना चाहिए। समाज में कई गतिविधियां जोर-शोर से होती हैं। लेकिन बाल साहित्य के इवेंट क्या होते हैं? गुणवत्ता भी एक बड़ा कारण है। बाल साहित्य बच्चों में ललक जगाए। हर काल अपने समय में उस दौर की पीढ़ी के लिए बेहतर होता है। समय बदलता है तो रंग-ढंग भी बदलता है। यह कहना कि आज के बच्चे पढ़ नहीं रहे हैं, उचित नहीं होगा। समाज में पढ़ने की कितनी गतिविधियां हो रही हैं? कई अभिभावक स्कूली किताब से इतर पढ़ना को वाहियात काम समझते हैं। साहित्य को समाज से जोड़ा जाना जरूरी है।
डॉ॰ सतीशचन्द्र भगत ने कहा कि पढ़ने की आदत समाज में बड़ों से ही आती है। आज पढ़ना कम हो गया है और दृश्य माध्यम बढ़ गए है। लेकिन यह तो तय है कि परिवार-परिवार से जुड़कर पढ़ने की संस्कृति का विकास होना चाहिए। गौरीशंकर वैश्य ‘विनम्र’ ने कहा कि समय के साथ-साथ हमें अपने लेखन में ध्यान देना होगा। घर-परिवार में बच्चों के साथ समय बिताना होगा। उन्हें श्रृव्य,दृश्य के साथ छपी सामग्री भी देनी होगी। खुद भी पढ़ना होगा और पढ़ते-पढ़ते सुनाने की परंपरा भी बढ़ानी होगी। किताब से पढ़ना और स्क्रीन पर पढ़ना में काफी अंतर है। असर में भी अंतर है।
सुशीला शर्मा ने कहा कि घर-परिवार में लोक कथाओं को सुनाने की परंपरा लुप्त होती जा रही है। पहले हर घर में ग्रन्थ थे। पारम्परिक कवियों-लेखकों की रचनाएं कंठस्थ थी। आज ऐसा नहीं है। टीवी ने बहुत सारा समय ले लिया है।
प्रभा पारीक ने समाज की भूमिका को बालकेन्द्रित न होने पर अफसोस जताया। भागमभाग जीवन शैली को बड़ा कारण बताया। उन्होंने कहा कि बालकों को स्कूली शिक्षा से इतर व्यावहारिक ज्ञान देने में बाल साहित्य सदा उपयोगी रहा है। पारिवारिक ढांचे में बदलाव, बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह जिम्मेदारी दादा-दादी, नाना-नानी से अब माता-पिता पर आ गई है। समयाभाव के कारण वह इसे नहीं निभा पा रहें हैं। यह चिन्ता का विषय है और बाल साहित्य इस भूमिका को बेहतर ढंग से निभा रहा है। उन्होंने कहा कि बाल साहित्य बालकों को मनोरंजन के साथ जानकारी, व्यावहारिक, नैतिक समझ देने के लिए आवश्यक है। भविष्य का बाल साहित्य ऐसा हो जो बालकों के मन को गुदगुदाने में सक्षम हो, समय और आयु वर्ग के अनुरूप हो। आज के बदलते परिवेश में बालकों के मस्तिष्क पर भौतिकतावादी सोच हावी हो रही है। वे सुविधा-संपन्नता के अभ्यस्त हो रहे हैं। अतिमहत्वकांक्षी होते जा रहे हैं। कुंठा, आक्रोश, क्रोध और समाज में बाल हिंसा के उदाहरण बढ़ रहे हैं। आज का बाल साहित्य ऐसा हो जो उन्हें लक्ष्य प्राप्ति के प्रयास के लिए प्रेरित करे। सादगी का महत्व समझाए। मनोरंजन करके उनकी मानसिक सोच को सही दिशा देने में मददगार साबित हो।
शिल्पी पाण्डे ने कहा कि बच्चों से ही कैसे उम्मीद करें जब घर में किताबों के लिए कोई जगह नहीं है। किताब पढ़ने की आदत बड़ों में ही नहीं हैं बच्चे भी पढ़ें ऐसा दायित्व निभाने में परिवारों को आगे आना होगा। समशेर कोसलिया ने कहा कि बाल साहित्य अब बच्चों के लिए अभिभावक लगाना चाहते हैं। लेकिन पत्रिकाओं की नियमितता और डाक व्यवस्था बड़ी लचर है। किताबें बांटने और उपहार में देने की बात होनी चाहिए। एक से बढ़कर एक उपहार दिए जा रहे हैं किताबें क्यों नहीं? समाज परिवारों से बनता है। परिवारों में पढ़ना-लिखना केवल कोर्स तक सीमित है।
पाखी जैन ने कहा कि स्कूल में बच्चों को पढ़ने के लिए किताबें मिलनी चाहिए। लक्ष्य मिलना चाहिए। टीचर बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें।
आदर्श व्यक्तित्व निर्माण में बाल साहित्य की भूमिका विषयक सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार गोविन्द शर्मा ने की। उन्होंने कहा कि इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकती कि बाल साहित्य हमारे व्यक्तित्व के निर्माण में सहायतन नहीं करता। करता है। बहुत हद तक हमारा बोलना, सुनना, देखना, अवलोकन करना और संवेदनशीलता साहित्य से बहुत गुणा बढ़ जाती है। हमारी पीढ़ी के साथ-साथ नब्बे के दशक तक भी साहित्य ने हमें गढ़ा। यह सत्य है। पत्रिकाओं को पढ़ने की ललक किस हद तक थी। यह किसी से छिपा नहीं है। वह दौर बहुत सारी पत्र-पत्रिकाओं का था। अखबार दो-तीन दिन बाद मिलता था तब भी पढ़ने की ललक थी। जिज्ञासा थी। आज तौर-तरीके बदल गए हैं। लेकिन छपी हुई सामग्री का पढ़ना आज भी जारी है। इसे बढ़ाने की आवश्यकता है। समाज के साथ-साथ संपादक, अखबार-पत्र-पत्रिकाएं और लेखक के साथ-साथ पाठकों में एक समन्वय था। आज यह सम्बन्ध क्षीण हो गया है। अब बाल साहित्यकार मेला लगने चाहिए। बाल साहित्य पाठक भी बनाता है और धीरे-धीरे मनुष्यता की ओर ले जाता है। समझदारी बढ़ाता है।
वरिष्ठ साहित्यकार राकेश चक्र ने कहा कि जमीन पर जाने की जरूरत है। समय का दान करने की जरूरत है। बच्चों को समय नहीं दे रहे हैं तो कैसे चलेगा? समय होने पर भी बच्चों के लिए माता-पिता के पास समय नहीं है। समय है तो वह टीवी-मोबाइल पर जा रहा है। सारे शौक में पढ़ने के लिए समय निकालना ही होगा। रोचक साहित्य भी रचना होगा।
प्रमोद दीक्षित ‘मलय’ ने कहा कि अवसर और चुनौतियां बाल साहित्य इन दोनों के लिए पाठकों को गढ़त है। आत्मबल बढ़ाता है। बालपाठक ही आगे चलकर साहित्य के पाठक बनते हैं। फिर कमोबेश उन्हीं में से वह लेखक बनते हैं। राजकीय पुस्तकालयों की संख्या बढ़नी चाहिए। पढ़ने की संस्कृति आधारित गतिविधियां बढ़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि लेखन में सीख, प्रवचन एवं उपदेश से बचना जरूरी है। संदेश दूध में मक्खन और गन्ने में मिठास की तरह घुला हो, पाठक स्वविवेक से उचित संदेश ग्रहण कर लेंगे। नकारात्मकता, निराशा, पलायन, कुंठा से बचते हुए सकारात्मक, आशा एवं विश्वास, चुनौतियों से जूझने एवं स्वयं की क्षमताओं से पहचान कराने वाला लेखन हो। वैश्विक चुनौतियों के समाधान, नित नये अनुसंधान एवं मानवजाति पर इसके अच्छे-बुरे प्रभाव पर लेखन हो।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ॰ आर॰पी॰ सारस्वत ने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखकर नया साहित्य रचने की जरूरत है। उनकी जिज्ञासाओं को समझना भी जरूरी हैं विषयों की विविधता भी हो। सरलता, बोधगम्यता के साथ नवीनता आज के साहित्य में चाहिए। आज की चुनौतियों और उनसे पार पाने संबंधी रचनाएं ही नई पीढ़ी का आत्मबल बढ़ाएगी। गोविन्द भारद्वाज ने कहा कि कहानियों में ही निर्माण हैं सकारात्मकता है। साहित्य में श्रृवण, कहन और लेखन होता है। यह हमारे समग्र विकास में सहायक है। कभी व्यावसायिक-मिशनरी पत्रिकाएं थीं। अब धीरे-धीरे सब बन्द हो रही हैं। बुक स्टॉल ही खत्म हो रहे हैं। हमें भी अपने तरीके बदलने होंगे। पढ़ना चाहते हैं बच्चे लेकिन बच्चों तक पत्रिकाओं की पहुँच नहीं है।
देशबन्धु शाहजहाँपुरी ने कहा कि यकीनन साहित्य हमें समृद्ध करता है। साहित्य पढ़कर कई पाठकों का मन बदल जाता है। हाँ ! बच्चों तक साहित्य कैसे पहुँचे? वह कैसे साहित्य पढ़ने के लिए समय निकालें? इनके जवाब खोजने होंगे। किताबें जन्मदिन पर उपहार के तौर पर दी जा सकती है। साहित्य हमें उदार बनाता है।
डॉ॰ विभा शुक्ला ने कहा कि पत्रिकाएं अनवरत् चलनी चाहिए। नई पत्रिकाओं का उदय होना चाहिए। सकरात्मकता के साथ आगे बढ़ना चाहिए। बाल विमर्श होना चाहिए। बच्चों के लिए विविधता से भरा नायाब लेखन लगातार होना चाहिए। छपी हुई बातें मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ती है। बच्चों तक बाल साहित्य पहुँचे इसके लिए साहित्यकारों, प्रकाशकों, शिक्षकों को भी प्रयास करने होंगे। डॉ॰विभा शुक्ला ने कहा कि कई तरह के विमर्श समाज में चलते रहते हैं। बाल विमर्श को भी निरन्तर किए जाने की आवश्यकता है।
साहित्यकार आशा पांडे ओझा ने कहा कि चरित्र निर्माण कोरे आदेशों से नहीं आता। मानव व्यवहार, परिवार और समाज से आता है। मानव व्यवहार को गढ़ने में साहित्य की बड़ी भूमिका है। माँ को बच्चों से संवाद जारी रखने होंगे। अभिभावक बच्चों की जरूरतों को पूरा करते हैं लेकिन किताब एक जरूरत बने। शिक्षकों को पढ़ने के लिए अवसर मुहैया कराने होंगें डॉँ राज गोपाल ने कहा कि बच्चों की संख्या लगातार कम हो रही है। ऐसा कहा जा रहा है। अच्छा रचनाकर्म हो और पहुँच हो तो बच्चे पढ़ना चाहते हैं। मोबाइल-टीवी अपनी जगह है। हमें रोचकता के साथ आगे बढ़ना होगा।
नमिता वैश्य ने कहा कि अभिभावक, शिक्षक, विशेषकर माँ साहित्य को फिर से समाज में लोकप्रिय बना सकती हैं। बच्चों को किताबें दें। उनकी रिकॉर्डिंग की जाए। नए माध्यमों की ओर जाना होगा।
एक सफल बाल साहित्य रचनाकार होने के मायने विषयक सत्र की अध्यक्षता करते हुए मराठी साहित्यकार राजीव ताम्बे ने कहा कि सिर्फ पुरस्कार-सम्मान और पुस्तकों की संख्या के मायने नहीं हैं। यह सफलताएं हो सकती हैं लेकिन सफलताओं की कोई सीमा नहीं है। कुछ नया करूँ। यह रचनाकार का चिन्तन होना चाहिए। सोचना-समझना और बच्चों के लिए नया क्या लिखा लिखूँ? यह चलते रहना चाहिए। बतौर रचनाकार हमारा तो दायरा है। हमारा जो शिल्प है उसे तोड़ने की ज़रूरत है। स्वयं नया सीखने की ललक होनी चाहिए। टैगोर ने बांग्ला में लिखा। टैगोर का लिखा कई भाषाओं में कैसे पहुँचा। रचनाकार को अपनी भाषा, राज्यों की भाषाएं, भारत की भाषाओं में क्या नया लिखा जा रहा है? इस सवाल का जवाब खोजना चाहिए। बच्चों के बारे में लगातार सोचना चाहिए। सरस पाठ कैसे लिखा जाए? इस पर लगातार काम करना होगा। बतौर रचनाकार मैं स्वस्थ हूँ। प्रसन्न हूँ। अच्छी बात है। लेकिन यह काफी नहीं। हमारे आस-पास का समाज भी स्वस्थ और प्रसन्न रहे। उन्हें ऐसा साहित्य दें जो सकारात्मक हो। मनोरंजन से परिपूर्ण हो। सीखने के अवसर लें और दें। हमारे साहित्य से तात्पर्य निकले। तात्पर्य के लिए साहित्य नहीं लिखें। हम बच्चों पर अन्याय न होने दें। अनजान बच्चों से बात करें। उनके नजदीक जाएं। बच्चों के लिए लिखता हूँ लेकिन बच्चों के बीच नहीं जाता। इससे काम नहीं चलने वाला है। बाल केन्द्रित साहित्य भी हो और हम भी हों।
इन्द्रजीत कौशिक ने कहा कि हम जीवन में भी सारगर्भित हों। हम भी उपयोगी हों। हमारी रचना उपयोगी हो। सारगर्भित हो और हमारी जीवन शैली जोड़ने वाली न हो तो कैसे चलेगा। हम रचनाकर्म करते समय पाठकों की छवि को भी ध्यान में रखें। मोबाइल को कोसने से काम नहीं चलेगा। साहित्य मोबाइल के जरिए पढ़ा जाए तो कैसा हो? हमारे रचने की सार्थकता तभी है जब समाज सकारात्मक हो। सब खुशहाल हों। उन्होंने कहा कि इक्कीसवीं सदी में इसकी आवश्यकता और अधिक हो चली है। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के युग में नई पीढ़ी के दिग्भ्रमित होने का खतरा बढ़ गया है। बच्चों का मार्गदर्शन भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। ऐसे में अच्छा बाल साहित्य बच्चों को उपलब्ध करवाना अत्यंत आवश्यक है। बचपन में उचित मार्गदर्शन एवं मूल्यों से परिचित करवाने की भूमिका को अच्छा बाल साहित्य बखूबी निभा पाने में सक्षम हो सकता है।
बाल साहित्यकारों को भी समस्त पूर्वाग्रहों से दूर रहकर बच्चों को तार्किक और मनोरंजन से भरपूर नई सदी के अनुरूप रचनाओं का निर्माण करना चाहिए।
रावेन्द्र रवि ने आंचलिकता और स्थानीय संवादों को प्रमुख माना। उन्होंने कहा कि भाषा बनावटी न हो। प्रचलन की भाषा को शामिल करना होगा। बच्चों की भाषा में लिखना होगा। छपास रोगी से इतर हम बालमन के निकट हों। जीवन से संबंधित अनुभव दर्ज करें। सूक्ष्म अवलोकन करें। हम स्वयं भी संवेदनशील हों और साहित्य भी संवेदना से भरने वाला हो।
डॉ॰शील कौशिक ने कहा कि हमारी अभिव्यक्ति भी मायने रखती है। परिवेश, वातावरण और जुड़ाव हमारे साहित्य को रोचक बनाता है। हम बेसिर-पैर की न लिखे। सूफियाना फितरत, विचित्र, बच्चों को भा जाने वाला साहित्य, विविध विधाओं में लिखा जाए। नए, अलबेले, अलमस्त, विचित्र और नई दृष्टि देने वाले पात्र गढ़ें। उन्होंने कहा कि आज के तकनीक और वैज्ञानिक युग में बालक मोबाइल और सोशल मीडिया के सुपुर्द होकर समय से पहले परिपक्व और जागरूक हो रहा है। हम नए गैजैट्स पर रोक नहीं लगा सकते। लेकिन उनका सदुपयोग करना तो हमारे वश में है। आज गला काट प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अभिभावक बच्चों की ओर समुचित ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। संयुक्त परिवार वाली दादी-दादी, नाना- नानी, बुआ- फूफा, मौसी- मौसा वाली संस्कारशाला खत्म हो चली है। ऐसे में बाल साहित्यकारों की जिम्मेदारी अधिक बढ़ गई है। हमें बदलते परिवेश के साथ बच्चों की रुचि, भावना, भाषा और मनोवृतियों को समझ कर बाल साहित्य लिखना चाहिए। इसके लिए बच्चों के क्रियाकलापों में रुचि रखनी होगी, क्योंकि बालकों की औत्सुक्य और जादुई दुनिया से कटकर हम बाल साहित्य की रचना नहीं कर सकते। हमें नए जमाने के साथ कदमताल करते हुए उनसे आगे की सोच रखनी होगी और विषय संबंधी सार्वभौमिक ज्ञान रखना होगा। हमारी रचनाओं का स्वर उपदेशात्मक न होकर रोचकता से भरपूर और सहज परिचयात्मक होना चाहिए। अपनी रचनाओं में हम अलबेले, अनूठे पात्र लेकर आएँ जो अलमस्त हो और बालकों के मन पर जादू जैसा कुछ कर दें। उनमें नई दृष्टि नई कल्पना की उड़ान हो।
ओमप्रकाश क्षत्रिय ने कहा कि बाल साहित्य एक खिड़की है। पाठक इससे बाहर झांकता है। सोचने-समझने और सवाल करने की आदत बाल साहित्य से बनती है। कहानी विधा को ही लें तो पात्रों के जरिए पाठक गुण-दोष, अच्छा-खराब की परख करता है। अपने अनुभव के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है। कल्पना शक्ति बढ़ती है। बच्चों को जानने में रचनाकार समय दें। उनके बात करे। उन्हें बोलने का अवसर दें।
अर्चना त्यागी ने कहा कि बचपन से ही यदि पढ़ने की आदत विकसित हो जाए तो वह आगे चलकर गंभीर अध्येता भी बनते हैं। सोचने-समझने का नजरिया अलग हो जाता है। सामाजिक सरोकार में अलग तरह की पहचान-भागीदारी बनती है। मिट्टी तो लगभग एक ही है लेकिन खाद-पानी-हवा और प्रकाश जैसा वातावरण हष्ट-पुष्ट वृक्ष बनाता है। साहित्य भी एक खुराक है। बाल मनोविज्ञान के साथ-साथ बदलते वातावरण की परख भी जरूरी है।
कैलाश त्रिपाठी ने कहा कि बालमनोविज्ञान और मनोविज्ञान की समझ का होना आवश्यक है। बालकों का क्या हमारा भी तो साहित्य सर्वांगीण विकास करता है। हमारे मनोविकारों को दूर करता है। सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामुदायिक स्तर पर साहित्य हमें चिन्तनशील प्राणी बनाता है। इसके लिए बतौर रचनाकार हमें और भी जागृत होना पड़ता है।
नयन कुमार राठी ने कहा कि बच्चों की भाषा, स्वभाव, गुण, आदतें पकड़ना जरूरी है। अपने समय को ध्यान में रखने की बजाय वर्तमान समय को ध्यान में रखकर सृजन किया जाना चाहिए। बच्चों को सुनना जरूरी है। उन्हें स्पेस देना जरूरी है। मौके देना जरूरी है। उनकी चिंता करना जरूरी है।
इस सत्र का संचालन कर रही बाल साहित्य की अध्येता एवं रचनाकार नीलम राकेश ने कहा कि मेरी दृष्टि में सच्चा बाल साहित्यकार वही है जो अनुग्रहीत महसूस करे कि देश, समाज, दुनिया की भावी पीढ़ी के चरित्र निर्माण में, उनके जीवन में कुछ योगदान देने का यह महत्वपूर्ण अवसर उसे मिला है या इसके लिए वह चुना गया है! साथ ही साथ उसके अंदर एक लेखक के रूप में यह पाँच गुण भी होने चाहिए। निरंतरता, विषय की नवीनता, बालमन की समझ, बच्चों से सीधा संपर्क और सरल, संप्रेषणीय भाषा। नीलम राकेश ने सुझाया कि एक अच्छा बाल साहित्यकार बनने के लिए एक अच्छा पाठक होना, परकाया प्रवेश, ज्ञान बघारने से बचना, बालक की उम्र के दायरे में रहना और नए-अनछूए विषयों पर लिखना कार्य करते रहना चाहिए।
तीन दिवसीय संगोष्ठी में सत्रों के मध्य रोचका गतिविधियाँ भी रहीं। साहित्यकारों ने चिल्ड्रन’स पीस पैलेस में बाल मनोविज्ञान पर आधारित विभिन्न दीर्घाओं का अवलोकन किया। इस परिसर में शानदार संग्रहालय भी है। मानव समाज को समझने की कई दीर्घाएं हैं। स्वस्थ समाज की परिकल्पना के साथ बाल संसद का नमूना भी है। जहां अभिनय के साथ संसद का अनुभव लिया जा सकता है।
संगोष्ठी के दूसरे दिन सभी साहित्यकारों को टीम के तौर पर राजसमन्द के इकतीस विद्यालयों में भेजा गया। इसे बाल साहित्य संवाद नाम दिया गया। साहित्यकारों ने कक्षा पाँच से लेकर कक्षा 10 तक के विद्यार्थियों के समक्ष अपनी लोकप्रिय विधा में प्रस्तुति दी। इसके साथ-साथ साहित्य में विधाओं की रचना प्रक्रिया साझा की। विद्यार्थियों से संवाद भी किया। विद्यालयों में एक से डेढ़ घण्टा बिताना यादगार रहा। विद्यार्थियों के साथ विद्यालयी शिक्षक-संस्थाध्यक्ष भी आनन्दमयी हो गए। एक साथ एक क्षेत्र में लगभग एक हज़ार विद्यार्थियों के साथ बाल साहित्य संवाद अभिनव प्रयोग रहा। बाल साहित्य संवाद में आदर्श विद्या मन्दिर, हाउसिंग बॉर्ड, कांकरोली, अपेक्स सीनियर सेकण्डरी स्कूल, धोइन्दा सिविलाइजेशन सीनियर सेकेंडरी स्कूल, पीपरड़ा, क्रियेटिव ब्रेन अकेडमी, गुंजोल, गांधी सेवा सदन, राजसमन्द, इन्द्रप्रस्थ पब्लिक स्कूल, एमड़ी, गायत्री पब्लिक स्कूल, धोइन्दा, जवाहर नवोदय विद्यालय, राजसमन्द, जीवन ज्योति पब्लिक स्कूल, पीपरड़ा, लक्ष्मीपत सिंघानिया स्कूल, राजसमन्द, मातेश्वरी विद्या मन्दिर, हाउसिंग बोर्ड, कांकरोली, नवप्रभात उच्च माध्यमिक विद्यालय, एमड़ी, नोबल पब्लिक स्कूल, भावा, आरेन्ज काउण्टी स्कूल, राजसमन्द, प्रगति पब्लिक स्कूल, एमड़ी, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, एमड़ी, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, धोइन्दा, राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, लवाणा, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, पीपरड़ा, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, बोरज, राजकीय बालिका उ. मा. विद्यालय, कांकरोली, राजकीय बालिका उ. मा. विद्यालय, राजनगर, राजकीय विवेकानन्द उ.प्रा. विद्यालय, सूरजपोल, राजकीय बाल कृष्ण उ. मा. विद्यालय, कांकरोली, राजकीय महात्मा गांधी स्कूल, राजनगर, सविता इन्टरनेशनल सेकेंडरी स्कूल, नान्दोली, सविता इन्टरनेशनल स्कूल, राज्यावास, स्मार्ट स्टडी इंटरनेशनल स्कूल, गुंजोल तथा सोफिया पब्लिक स्कूल, भावा, सुभाष पब्लिक स्कूल तथा कांकरोली सनराइज पब्लिक स्कूल, राजनगर शामिल रहे।
तीसरी सुबह साहित्यकारों को राजसमन्द से लगभग चार किलोमीटर की दूर पर स्थित नौ चौकी पाल पर ले जाया गया। यहाँ झील किनारे अणुविभा के साथियों डॉ॰नीलम जैन और देवेन्द्र के नेतृत्व में ध्यान और योग शिविर लगाया गया। बाद में स्थल पर ही लौकी-जीरा-कालीमिर्च युक्त पेय पदार्थ ने समां बाँध दिया।
समापन सत्र भी बालकेन्द्रित रहा। साध्वीश्री डॉ. परमप्रभा जी ने तीनों दिन की समूची प्रक्रिया को विस्तार से जाना। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि धर्मगुरुओं और साहित्यकारों का प्रयास होता है कि बालकों में भारतीयता के संस्कारों का बीजारोपण हों एक स्वस्थ समाज, शांति का समाज बने। इंटरनेट की वजह से आज बच्चों का बचपन खत्म होता जा रहा है। ऐसे में साहित्यकारों का दायित्व बनता है कि वे बच्चों के लिए स्वस्थ, सुसंस्कारित और बहुपयोगी साहित्य रचे। साध्वीश्री लब्धियशा जी ने कहा कि संत, साहित्यकार और सैनिक की त्रिवेणी देश के योगदान में महती भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था कि यदि आपके पास दो डॉलर हैं तो आप एक डॉलर से रोटी खरीदें और दूसरे डॉलर से पुस्तक खरीदें। रोटी आपका जीवन बचाएगी और किताब आपको जीने की कला सिखाएगी। उन्होंने कहा कि ‘बच्चों का देश’ पत्रिका में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए महत्वपूर्ण सामग्री होती है।
अणुविभा के अध्यक्ष अविनाश नाहर ने कहा कि अणुव्रत आंदोलन के तहत अणुविभा की ओर से चौवन प्रकल्प संचालित हैं। उन्होंने साहित्यकारों से साहित्य सृजन के साथ ही अणुविभा के किसी प्रकल्प से जुड़कर अणुव्रत आंदोलन के प्रसार में सहभागी बनने का भी आह्वान किया। तेरापंथ विकास परिषद् के सदस्य पदम् चंद पटावरी ने अणुविभा के संस्थापक व बच्चों का देश के जनक मोहनभाई को याद किया। पच्च्ीस वर्षों पूर्व जिस बीज को बोया गया था वह आज वृक्ष बन गया है। इस पत्रिका के आगे बढ़ने की प्रचुर सम्भावना है। अणुविभा के प्रबंध न्यासी तेजकरण सुराणा ने अपने तीन दिन के अनुभव भी साझा किये। कार्यक्रम का संयोजन बच्चों का देश के संपादक संचय जैन ने किया और आभार ज्ञापन सह संपादक प्रकाश तातेड़ एवं अणुव्रत समिति राजसमंद के अध्यक्ष अचल धर्मावत ने किया। इस अवसर पर साहित्यकार आर॰ पी॰ सारस्वत सहित संभागियों के दल ने अणुव्रत गीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में अणुव्रत लेखक पुरस्कार से सम्मानित फारुख अफरीदी, बच्चों का देश के प्रबंध संपादक पंचशील जैन, भिक्षु बोधि स्थल के अध्यक्ष हर्ष नवलखा, कांकरोली सभ के अध्यक्ष लाभ जी बोहरा, आर के मार्बल के आर बी मेहता, अणुविभा के उपाध्यक्ष डॉ विमल कावड़िया. सहमंत्री जगजीवन चोरडिया, डॉ सीमा कावड़िया सहित बड़ी संख्या में राजसमंद के गणमान्यजन उपस्थित रहे। इस अवसर पर ‘बच्चों का देश’ पत्रिका के संपादक संचय जैन और सह संपादक प्रकाश तातेड़ ने अणुविभा अध्यक्ष अविनाश नाहर को पत्रिका के रजत जयन्ती विशेषांक की प्रति भेंट की। समारोह में अणुविभा अध्यक्ष अविनाश नाहर ने मुख्यालय से जुड़े कार्यकर्ताओं को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। समापन अवसर पर भी प्रतिनिधित्व के तौर पर दिल्ली के दिविक रमेश, भोपाल के परशुराम शुक्ल और लखनऊ के सुरेंद्र विक्रम ने तीन दिवसीय आयोजन को बेहतरीन बताया। सभी ने माना कि जिस सकारात्मक माहौल में यह आयोजन हुआ है। गंभीर और जनोपयोगी चर्चाएं हुई हैं। सार रूप में बीकानेर की संगीता सेठी, भोपाल की लता अग्रवाल, गाजियाबाद के रजनीकांत शुक्ल, उदयपुर की आशा पांडेय और उत्तराखण्ड के मनोहर चमोली ‘मनु’ ने अपने अनुभव साझा किए। समापन सत्र के प्रारम्भ में गायत्री पब्लिक स्कूल धोइंदा के बच्चों ने ‘मैं हूँ बच्चों का देश’ लघु नाटिका का मंचन किया। सब रंगों का समावेश, भारत देश हमारा देश को चरितार्थ करता यह बाल साहित्य समागम हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई। सब धर्म समभाव की झलक भी दिखा गया। कुछ साहित्यकार 15 अगस्त की अल्ल-सुबह आ गए तो आयोजन स्थल पर ही भारतीय ध्वज फहराया भी फहराया गया।

प्रस्तुति: मनोहर चमोली ‘मनु’
सम्पर्क: 7579111144
मेल: chamoli123456789@gmail.com

14 अप्रैल 2024

बाल साहित्य पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है: लोकेश नवानी

बाल साहित्य पर गंभीर चिंतन प्राय होते ही नहीं 


बाल साहित्य मनुष्यता के बीज बोने में अहम भूमिका निभाता है


बाल साहित्य को बचकाना साहित्य या बवाल साहित्य कहने वालों की समझ स्पष्ट करने के लिए कई प्रयास देश भर में हो रहे हैं। दरअसल बाल साहित्य की महत्ता और उसकी प्रासंगिकता को समझने में हिन्दी पट्टी के शिक्षक, अभिभावक और स्वयं पाठक भी अभी गंभीर नहीं हैं। धाद सामाजिक संस्था के साहित्य एकांश लम्बे समय से बाल साहित्य पर केन्द्रित गोष्ठियों का आयोजन करता रहा है। इसी कड़ी में मार्च 2024 के अंत में एक आयोजन स्वयं में यादगार बन पड़ा है।  

उत्तराखण्ड का लोकपर्व फूलदेई के अवसर पर आयोजित बाल साहित्य विमर्श पर सभी ने माना कि आज बाल साहित्य को आधुनिक, वैज्ञानिक और यथार्थवाद का पक्षधर होना चाहिए। धाद के संस्थापक लोकेश नवानी ने सभी का आभार जताते हुए अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि चेतना से समृद्ध होते हुए बाल चेतना से भी समृद्ध होना अच्छा रहा। उन्होंने कहा कि गोष्ठी की सार्थकता यहां दिए गए वक्तव्यों से सफल प्रतीत होती है। 

लोकेश नवानी ट्रांजिस्ट हॉस्टल में धाद की इकाई साहित्य एकांश द्वारा आयोजित फूलदेई कार्यक्रम में बतौर अध्यक्ष बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि सामाजिक पहल बहुत ज़रूरी है। हमें समझना होगा कि गोष्ठी में गंभीर विमर्श बेहद आवश्यक है। आज की गोष्ठी दिशा देती है। हमें समझना होगा कि बच्चों में मनुष्य होने की जिज्ञासा बढ़े। इसकी आवश्यकता है। धाद के विविध कार्यक्रमों में साहित्य एकांश की गतिविधियाँ अलग से रेखांकित होती हैं। कक्षा कोना का गतिविधि भी सफल रही हैं। हमारे आयोजनों में एकाग्रता बढ़नी चाहिए। गंभीर विमर्श के लिए चिन्तन-मनन के साथ सुना जाना भी खास है। आज मनुष्य होने की जिज्ञासा बाल मन में जगे और बनी रहे। इसके प्रयास जरूरी हैं। 

धाद के अध्यक्ष एवं संस्थापक लोकेश नवानी ने कहा कि बाल साहित्य के साथ-साथ बाल साहित्य सुनाना आज आवश्यक हो गया है। चेतना का जो स्तर है वह बढ़ना चाहिए। साहित्यकार वैचारिक दूत होते हैं। वह सच और यथार्थ को आगे बढ़ाते हैं। साहित्य एकांश को चाहिए कि विद्यालयों के प्रधानाचार्यों के साथ भी इस तरह की गोष्ठी हो। सही बात तो यह है कि किताबें पढ़ी जानी चाहिए। देहरादून के जाने-माने साहित्यकार यहाँ हैं। उन्हें बच्चों को कहानियाँ सुनानी चाहिए। लोकेश नवानी ने अपने बचपन के किस्से भी याद किए और कहा कि बाल मन के विस्तार के लिए देहरादून के कम से कम पचास प्रधानाचार्यों के साथ भी किताबों के पढ़ने के लिए आयोजन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि बाल साहित्य कैसा हो? यह विमर्श बहुत जरूरी है। समाज में कई तरह के प्रतिबन्ध बच्चों पर लगाए जाते रहे हैं। जैसे मैं अपनी बात कहूँ कि मनुष्यता के बीज बालमन में बाल साहित्य ही जगा सकता है। बचपन में जंगल में जाने से मना किया जाता था। जब बड़े हुए और जंगल देखा तो नवीन जानकारियाँ मिलीं। आज बच्चों में मौलिक विचार और वैज्ञानिकता का विकास होना चाहिए। बाल साहित्य में यथार्थवाद, मानवता और विकासवाद की बात होनी चाहिए। 

लोकेश नवानी ने कहा कि मेरी अपनी समझ में कोई भी राजा अच्छा नहीं हो सकता। अवाम का शोषण करने वाला राजा भला कैसे हो सकता है! लेकिन राजाओं के भले होने और न्यायप्रियता की कहानियां बहुत हैं। सच की कहानियाँ भी लिखी जानी चाहिए। बाल साहित्य मनुष्यता के बीज बोता है। उन्होंने सुझाया कि साहित्य विचार का विकास करे। वैज्ञानिकता का विकास करे। बाल साहित्य यथार्थ, विज्ञान और मानवता की बात करे। उन्होंने दोहराया कि राजा किसी भी रूप में व्यावहारिक तौर से देखें तो अच्छे नहीं माने जा सकते। किसी भी राजा ने गरीबों का भला नहीं किया। उन्होंने शोषण ही किया। 

विज्ञान ही हमें आगे बढ़ाएगा। बच्चे धर्म और जाति को अपनाते हुए बड़े होते हैं। यदि उन्हें साहित्य नहीं दिया गया तो वह कई तरह की जकड़न के साथ बड़े होते हैं। वहीं साहित्य मनुष्य बनने के लिए प्रेरित करता है। आधी दुनिया की महिलाओं को भी समाज की कहानियाँ लिखनी चाहिए। आज भी लड़कियों के लिए लिखा गया साहित्य कम है। दुनिया की लड़कियों के लिए भी साहित्य लिखा जाना चाहिए। आधी दुनिया भी इस काम को करे। बच्चे की बेहतर मनुष्य की आस्था की बुनियाद बाल साहित्य से ही पड़ सकती है। इतिहास है कि धार्मिक व्यवस्था और धर्म आधारित साहित्य हमें पीछे ले जाता है। 


यही कारण है कि बचपन में ही सब तरह के जाति, धर्म, सामाजिक विद्वेष के बीज बो दिए जाते हैं। बच्चों को जिस तरह के गीत सिखाएंगे वह उन्हें गाएगा। बचपन में जो भर दिया जाता है जीवन भर के साथ चलता है। कितना अच्छा हो कि मानवता के और संवेदनशीलता के गीत बच्चों को सुनवाएँ जाएं। वे उन्हें गाएँ। सुन्दर दुनिया बनाने के लिए बच्चे अहम हैं। वन्य जीवन के शिकार की कहानियों से इतर पशुओं के साथ प्रेम की और उनके साथ संवेदनशीलता की कहानियां लिखी जानी चाहिए। आधुनिक समय की कहानियों को लिखा जाना चाहिए। आज भय भरने की जरूरत नहीं है। चेतना के स्तर को, सामाजिकता और सहभागिता को बढ़ाने की जरूरत है। आज धर्म और जाति-सम्प्रदाय से इतर मनुष्यता की बात होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बच्चे की आस्था में मनुष्यता प्राथमिक हो। यह कैसे होगा? बाल साहित्य से ही यह संभव है। उन्होंने कहा कि हम सब जानते हैं कि बच्चा जो देखेगा, सुनेगा आस-पास जिएगा वह वैसा ही हो जाएगा। सिर्फ मनुष्य बने रहने की कहानियां कौन लिखेगा? लोकेश नवानी ने कहा कि चेतना का प्रगतिवादी स्तर साहित्यकारों में निहित होता है। उन्हें ही आगे आकर सकारात्मक, यथार्थ से भरा साहित्य लिखना होगा। दुनिया को सुन्दर, समृद्ध और खुशहाल बनाने के लिए आगे आना होगा। बच्चों में भय, भूत,जातिवाद और धर्म के बीज बचपन में ग्रहण करवाएं जाते हैं। मनुष्य होने के बीज ग्रहण कराए जाने की आज ज़्यादा आवश्यकता है। मानवीय दृष्टि की आज नितांत आवश्यकता है। 

फूलदेई को समर्पित इस शाम की केन्द्रीय बिन्दु यह रहा कि बच्चों को आधुनिक समय की कहानियाँ सुनवाई जाएं। भय भरने से इतर संवेदनाएँ जगाने का काम हो। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ॰ कुसुम नैथानी ने बाल साहित्य के इतिहास और उसकी आवश्यकता-सार्थकता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बच्चों के वय वर्ग पर भी विस्तार से चर्चा की। डॉ॰ कुसुम नैथानी ने कहा कि समय के साथ-साथ बाल साहित्य भी बदला है। पहले सीख-सन्देश, परी-राजा आदि का साहित्य लिखा जाता रहा है। आज यथार्थ से भरा, आधुनिक समय का साहित्य बच्चों के लिए लिखा जा रहा है। बाल साहित्य की दिशा और दशा पर भी कुसुम नैथानी ने विस्तार से चर्चा की। उन्होंने चंदामामा के आधुनिक भाव-बोध को भी अपने वक्तव्य में रखा। उन्होंने बाल साहित्य की अवधारणा प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिकता की श्रेणी में रखते हुए अपनी बात की। डॉ० कुसुम रानी नैथानी ने कहा की वह साहित्य ही बाल साहित्य जिसे बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखते हुए लिखा गया हो। इसमें रोचक कहानी और कविता प्रमुख हैं। बाल साहित्य बच्चों का मनोरंजन ही नहीं करता अपितु उन्हें जीवन की सच्चाइयों से भी परिचित कराता है। आज का बच्चा कल का भावी नागरिक है। वे जैसा साहित्य पढ़ेंगे, उसी के अनुरूप उनके चरित्र का निर्माण होगा। उन्होंने कहा कि साहित्यकारों की नजर में बाल साहित्य ऐसा होना चाहिए जो बच्चों की जिज्ञासाओं को शांत करे। उनकी रुचियों को परिष्कृत करे। उन्हें सामाजिक तौर पर संस्कारित भी करे। बाल साहित्य का उद्देश्य विश्व कल्याण, विश्व बंधुत्व और मानव को एक अच्छा इंसान बनाने का भी होना चाहिए। इसके अलावा सबको आपस में जोड़ना और एक आदर्श समाज की स्थापना करना भी बाल साहित्य का प्रमुख उद्देश्य है। अच्छा साहित्य बच्चों की दशा और दिशा दोनों को ही बदलने में सक्षम होता है।

गौरतलब हो कि धाद ने दस हजार बच्चों तक पहुँचने का फूलदेई अभियान संचालित किया है। कोना कक्षा के संयोजक गणेश उनियाल ने कहा हमारा प्रयास है कि हम हर बच्चे और हर स्कूल तक पहुंचें। आज के इस विमर्श का उद्देश्य है कि आप सभी के सहयोग से हमें उच्च कोटि का साहित्य बच्चों तक पहुंचाने में मार्गदर्शन मिले। हमारी साहित्यिक जानकारी वह भी बाल साहित्य में कम हो सकती है। हम सामूहिक प्रयासों से आगे बढ़ते रहे। धाद का यही मंतव्य है। उन्होंने कहा कि अपने विस्तार कार्यक्रम के अंतर्गत हमने 2019 में ‘मेरे गांव का स्कूल’ अभियान शुरू किया था। जिसका बहुत अच्छा परिणाम मिला। समाज अपने गांव के स्कूल से जुड़ने के लिए आगे आया। वर्तमान में शहरी और ग्रामीण शिक्षा में बहुत अंतर है। ग्रामीण विद्यालयों में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अभी हाल ही में विद्यालयों की बेहतरी के लिए मेरे गांव का स्कूल मवाधार के नाम से एक नया अध्याय शुरु किया गया है। जिसमें वहां के पूर्व छात्रों व समाज के सहयोग से विद्यालय में आवश्यक संशाधन जुटाने के लिए प्रयास किये जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि सरकार के प्रयासों के साथ ही समाज भी स्कूलों की बेहतरी के लिए आगे आये। एक कोना कक्षा का कार्यक्रम के निरंतर विस्तार के मूल में हमारे सहयोगी एवं विद्यालयों के शिक्षक हैं जिनके सहयोग से हम इसका संचालन कर पा रहे हैं। अभी हमारे पास 47 विद्यालय प्रतीक्षा सूची में हैं। विद्यालयों का यह उत्साह हमारे लिए प्रेरणा दायक है।

इस अवसर पर बाल साहित्य की अवधारणा, उद्देश्य, विचार एवं चुनौतियाँ विषय वक्ताओं के केन्द्रीय विषय रहे। धाद साहित्य एकांश की सचिव कल्पना बहुगुणा ने बताया कि एक कोना कक्षा मे किताबों के चयन की प्रक्रिया निरंतर बेहतर बनाने का प्रयास किया जाता है। हमारा प्रयास बच्चों तक दुनिया की सबसे बेहतरीन पुस्तकें पहुँचाना है। उन्होंने साहित्य एकांश के विविध आयोजनों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि आने वाले समय में साहित्य एकांश साहित्यकारों, बच्चों, अभिभावकों को जोड़ने का कार्य करेगा। कार्यशालाएं संचालित करेगा। कार्यक्रम का संचालन धाद साहित्य एकांश की संयोजक डॉ. विद्या सिंह ने किया। कार्यक्रम मे तन्मय ममगाई, मोनिका खण्डूरी, सुनीता चौहान, सीमा कटारिया, रुचि सेमवाल, डॉली डबराल, मुकेश नौटियाल, कल्पना बहुगुणा, राजीव पंतरी, डॉ॰ उषा रेणु, विष्णु तिवारी, नीलम प्रभा वर्मा, सुधा जुगराण, सत्यानंद बडूनी, उषा चौधरी, सलोनी चौहान, रितिक कुमार, वीरेंद्र डगवाल, डॉ॰ राजेश पाल, इंदु भूषण सकलानी, विजय भट्ट, प्रज्ञा खण्डूरी, आशा डोभाल,इंदुभूषण सकलानी, कांता घिल्डियाल, डॉ॰ रामविनय सिंह, असीम शुक्ल, शिवमोहन सिंह, मनोज पंजनी, उषा झा, अनीता सब्बरवाल, दिनेश सब्बरवाल, राजेश्वरी सेमवाल,शांति प्रकाश जिज्ञासु, सतेन्द्र बडोनी, डॉली डबराल आदि मौजूद थे। 

प्रस्तुति: मनोहर चमोली ‘मनु’
आयोजक: धाद साहित्य एकाँश