9 अप्रैल 2013

बुनियादी शिक्षा में बाल साहित्य की भूमिका

बुनियादी शिक्षा में बाल साहित्य की भूमिका

-मनोहर चमोली ‘मनु’

शैक्षिक जगत से जुड़ा हर संवेदनशील व्यक्ति परिचित है कि किसी भी बच्चे की पाठशाला का पहला दिन कोरा नहीं होता। वह न तो कोरी स्लेट-सा स्कूल आता है। वह कच्चा घड़ा-सा भी नहीं होता और न ही मिट्टी का लौंदा होता है। बच्चा स्वयं में अपना वजूद रखता है। ठीक वैसे ही जैसे हवा का,पानी का, सूरज का, आपका और हमारा वजूद है।
स्कूल के पहले दिन से पूर्व ही औसतन हर बच्चा लगभग चार से पांच हजार शब्दों से परिचित होता है। इन शब्दों की अपने अनुभव से जानी गई समझ और परिभाषा भी उसके पास होती है। वह अपने हम उम्र के कुछ परिचित-अपरिचित सहपाठियों और अपनी आयु से चार-आठ गुना आयु के शिक्षक की बात को आसानी से समझ भी लेता है। इतना सब होने के बावजूद हम उसे पहले ही दिन से लिखना-पढ़ना सिखाने लग जाते हैं। इससे अधिक हैरानी इस बात की है कि कमोबेश अधिकतर शिक्षक यह मान कर चलते हैं कि बच्चे कुछ नहीं जानते। कोरे हैं। अमूमन अधिकतर शिक्षक यह तर्क देते हैं कि बच्चा छोटा है। अपनी कक्षा की किताब ही पढ़ ले, वही बहुत है। बाल साहित्य और पाठ्य पुस्तक के महत्व और भिन्नता से पहले हम यह भी चर्चा कर लें कि जिस बच्चे को हम छोटा समझ रहे हैं, वह अपनी आयु के स्तर से औसतन कितना आकलन स्वयं कर लेता है। 
  • छह माह की आयु का बच्चा औसतन रंग बिरंगे चित्रों वाली किताब देखता है। वह चित्र को देखने की कोशिश करता है। लाल रंग उसे आकर्षित करता है। वह कागज-किताब को छूने का प्रयास करता है।
  • नौ माह की आयु का बच्चा सुनने की गतिविधि को गौर से देखता है। वह गौर से चेहरा देखता है। हर बात को सुनने की कोशिश करता है। यही वह समय है जब अभिभावक उसे यूं ही कुछ न कुछ पढ़ कर सुनाते रहें। वह सुनकर शब्दों को समझने की कोशिश करेगा। यह और बात है कि उससे प्रत्युत्तर की कोशिश नही की जानी चाहिए।
  •  एक साल की आयु का बच्चा किताब-अखबार को छीनने का सफल प्रयास करने लगता है। वह हर किताब-पन्ने-पत्रिकाएं अपनी मुट्ठी मंे कर लेना चाहता है। इस उम्र के बच्चे को छोटी-छोटी कहानियां पढ़ कर सुनाई जानी चाहिए। रंगीन चित्र दिखाने चाहिए। संभव है ऐसा करते समय पन्ने फट सकते हैं। वह फाड़ते समय आ रही ध्वनि से आनंद लेता है। आप पुराने अखबारों से भी यह गतिविधि उसके साथ कर सकते हैं।
  •  दो साल का बच्चा किताबें पसंद करने लगता है। यदि बड़े,स्पष्ट और रंगीन चित्र हैं तो वह इशारा करता है। टूटे-फूटे शब्दों में किताब मांगने की कोशिश करता है। उसे जोर-जोर से पढ़ कर कहानी-कविता सुनाई जानी चाहिए। बच्चे को किताबों से खेलने दीजिए। पुराने रंगीन अखबारों के चित्रों पर अंगुली से इशारा करते हुए बातचीत की जानी चाहिए।
  •  तीन वर्ष की आयु के बच्चे की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। इस उम्र तक आते-आते बच्चा हर चीज को स्वयं जानने की कोशिश करने लगता है। वह हर चीज को छूना चाहता है। वह सुनकर हर बात को अपनी समझ से समझने की कोशिश करने लगता है। यही समय है, जब हम उसे छोटी-छोटी कहानियां कह कर सुनायें। पढ़कर सुनाये। गीत सुनायें। 
  •  चार साल की आयु का बच्चा तो बेहद तीव्रता से इस प्रकृति को, सूरज,चांद,तारों,जीव-जन्तुओं के प्रति जिज्ञासु हो जाता है। उसके पास इनसे संबंधित सैकड़ों प्रश्न होते हैं। उसे ऐसी किताबों से कुछ न कुछ पढ़ कर सुनायें, जिसमें रहस्य हो,रोमांच हो। उसकी कल्पना को और पंख लगें। अच्छे-अच्छे गीतों की ओर इशारा करें। सुनाये। गीतों की व्याख्या करें।
  •  पांच साल की आयु तक आते-आते बच्चा कहानियों को न सिर्फ सुनता है। बल्कि वह कहानियों पर अब प्रश्न करने लगता है। कहानी खत्म हो जाने के बाद उसके पास कहानी से जुड़े पात्रों से संबंधित ढेरों प्रश्न होते हैं। वह कभी खुश होता है तो कभी सोच में पड़ जाता है। उसकी उत्सुकता बढ़ने लगती है। वह बहुत कुछ सुनने,देखने ,जानने और सीखने की दिशा में आगे बढ़ने योग्य हो जाता है।                                                                आइए ज़रा सोचें कि क्या हम अभिभावक अथवा शिक्षक ऐसा करते हैं। क्या हम उपरोक्त वय वर्ग के बच्चों के साथ ऐसी गतिविधिया करते हैं? कमोबेश नहीं। दिलचस्प बात तो यह है कि अभिभावक भी और शिक्षक भी किसी भी आयु के बच्चे को कमतर ही समझते हैं। आखिर क्यों हम बच्चे को समाज का एक हिस्सा मानते हैं? उसे वही सम्मान क्यों नहीं देते, जिसका वह हकदार है। आखिर क्यों हम उसे ‘बच्चा है’ कहकर नजर अंदाज करते रहे हैं? यही कारण है कि बाल साहित्य तो दूर की बात है। हम वाचिक परंपरा का निबाह भी नहीं करते। हमें जो कहानियां-किस्से याद हैं। वह भी हम बच्चों से साझा नहीं करते।
हमें हर रोज उसे एक कहानी सुनानी चाहिए। कहानी में उसकी कल्पना बढ़ती है। वह कहानी सुनते-सुनते नये शब्दों से परिचित होगा। भाषा के निकट जाएगा। मौखिक कहानी सुनाने के बाद आप यह कह सकते है कि यह कहानी आपने किताब से पढ़ कर उसे सुनाई है। किताबों के प्रति बच्चे की रुचि स्वतः ही बढ़ेगी।

पाठ्य पुस्तकों में बाल साहित्य

बुनियादी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों की पाठ्य पुस्तकों में साहित्य नहीं होता। यह कहना ठीक नहीं होगा। लेकिन यह सही है कि बाल साहित्य की मात्रा न्यून है। भाषा की जिन पुस्तकों में साहित्य है भी वह आयु वर्ग के स्तर से व्यवस्थित नहीं है। आज भी गढ़े हुए खजाने, राजा-रानी और परियों-राक्षस की कहानियां भी प्रचलन में हैं। जबकि आज का बालक इक्कीसवीं सदी का है। उसके खेल, उसकी दुनिया में बहुत सारी नई चीज़ें शामिल हो गई हैं। कल्पना का समावेश बाल साहित्य में बेहद जरूरी है। लेकिन कल्पना बाल मन में अनगढ़ छाप न छोड़े। इसका ध्यान रखा जाना जरूरी है। बाल साहित्य के नाम पर सीख और जबरन ठूंसे गए और आदर्शवाद के पाठ अधिक पिरोये गये मिलते हैं।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के आलोक में मुझे भी पाठ्य पुस्तक निर्माण में कार्य करने का मौका मिला। बुनियादी स्कूलों के बच्चों की आयु को देखते हुए बहुत कम पाठ्य पुस्तकें हैं, जिनमें बाल मनोविज्ञान और बाल अभिरुचियों का ध्यान रखा गया है। इसके कई कारण है। उन कारणों पर चर्चा अलग से की जा सकती है। यहाँ इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि भाषा सीखने-सिखाने के मामले में प्राथमिक कक्षाओं में बाल साहित्य की दशा बेहद कमजोर है। हमारे शिक्षक भी कोर्स पूरा कराने की फिक्र में दिखाई पढ़ते हैं। भाषा का शिक्षक प्राय बाल पत्रिकाओं के नाम तक नहीं जानता। जो जानते हैं, उनका कहना है कि हां बचपन में पढ़ी थी। आज बाल साहित्य की दिशा क्या है? क्या-क्या लिखा जा रहा है। इन सवालों के उत्तर अधिकतर शिक्षकों के पास नहीं है।

बच्चे और बाल साहित्य

अक्सर कहा जाता है कि बच्चे का साहित्य से क्या लेना-देना? सही बात तो यही है साहित्य की पहली सीढ़ी बाल जीवन ही है। लोरियाँ क्या हैं? माँ का आँचल साहित्य में झांकने वाला सबसे पहला झरोखा है। स्कूल जाने से पहले ही बच्चे कहानी-किस्सा सुनने और गढ़ने में माहिर होते हैं। काश! कितना अच्छा होता कि बच्चे की पहली पुस्तक उसके घर और उसके बाल जीवन से जुड़ी होती। आयु के आधार पर उसकी पाठ्य पुस्तकें बनी होती। कक्षा के स्तर पर बनी पाठ्य पुस्तकें नई चिंतनदृष्टि से दूर क्यों है? यह विचारणीय प्रश्न है।
बच्चा तो स्कूल में पहले ही दिन अजब-गजब के संसार में पहुंच कर हैरान हो जाता है। बाल साहित्य में आयु के अनुरूप रचना सामग्री होती है। बहरहाल उपरोक्त पांच साल तक बच्चों की खासियतों को ध्यान में रखते हुए हम बाल साहित्य पर विमर्श करते हैं।
  •     बच्चांे के लिए लिखा गया साहित्य ही बाल साहित्य है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उस साहित्य में बच्चों की दुनिया शामिल ही नहीं की जाए। सबसे पहली और अनिवार्य शर्त यही है कि वह जो कुछ भी सुने उसमें खुद को शामिल करने की कल्पना करे।
  •     बाल साहित्य कहीं न कहीं मनोरंजन करता हुआ उसे कल्पना की दुनिया की सैर कराता हुआ अप्रत्यक्ष रूप से उसे सामाजिक प्राणी के रूप में संस्कारित करने वाला तो अवश्य हो। हाँ! उपदेशात्मक और सीख सिखाने जैसी शैली कदापि न हो।
  •     बुनियादी कक्षा की पुस्तकों में चित्रात्मक कहानियां और कविताएं अधिक हों। पढ़ने के लिए सामग्री ज्यादा हो। यह कहानियां शिक्षक पढ़कर बच्चों को सुनाएं।
  •     लिखावट का काम सीखाने की जल्दी नहीं होनी चाहिए। बच्चे सुनना और बोलना दक्षताओं में पारंगत हों। पढ़ना और आखिर में लिखना पर काम हो। समस्या यह है कि भाषा की कक्षा ही सबसे ज्यादा उदासीन और बोझिल होती है। साहित्य तो दूर अधिकतर शिक्षक के चेहरे में तनाव और झुंझलाहट अधिक दिखाई देती है।
  •    भाषा के शिक्षक में यह दबाव नहीं होना चाहिए कि उसकी कक्षा में छात्र लिखना-पढ़ना नहीं सीख पा रहा है। पाठों के अभ्यासों में गतिविधियां अधिक हों। बुनियादी कक्षाओं में चित्राधारित,कविता और कहानी आधारित छोटे-छोटे पाठ हों। मौखिक सवाल-जवाब अधिक हों।
  •   देश-प्रेम जैसी अवधारणा बच्चे के लिए कठिन हैं बच्चे के लिए तो उसका घर-गांव, पड़ोस, दोस्ती ही उसका देश है। मस्ती,खेल,छोटी-छोटी गतिविधियां, रहस्य-रोमांच, फंतासी आधारित कहानियां सुना-सुना कर बच्चों में धैर्य,समझ,लगन और अपनी राय बनाने के योग्य बनाने की कसरत की जानी चाहिए।
  •    गेयबद्ध, तुकांत छोटी-छोटी कविताएं जिन्हें बच्चा सुनते-सुनते खुद भी बोलने लगे। अपनी कल्पनाओं में धीरे-धीरे वह खुद ही कविता में छिपे निहितार्थ समझ लेगा। रहस्यवादी और लंबी कविताएं बुनियादी कक्षाओं में होनी ही नहीं चाहिए।
  •     बाल साहित्य की सहायता से बच्चों के बीच हम उसके घर और परिवेश में जो बेहद भिन्नता नजर आती है, उसे कम कर सकते हैं। बाल साहित्य ही है जो पाठ्य पुस्तकों से इतर बच्चों को खेल-खेल में बहुत सारी अवधारणाओं के प्रति समझ बढ़ाने में सहायक होता है।
  •    बाल साहित्य ही वह सहायक सामग्री है जिसकी सहायता से बच्चे की मौखिक भाषा-शैली संवर सकती है। बच्चों में संवाद अदायगी का विस्तार हो सकता है। प्रश्न करने और खुद उत्तर देने की क्षमता विकसित की जा सकती है। बाल साहित्य के माध्यम से बच्चे कल्पना लोक में जाते हैं। वे निष्कर्ष और विश्लेषण करना सीखते हैं।
  •     यही नहीं कहानी सुनकर वह धीरे-धीरे पुस्तकों के प्रति प्रेम करने लगते हैं। पाठ्य पुस्तकों के पन्ने उलटने लगते हैं। पुस्तक के चित्रों और पाठों को देख-देख कर पढ़ने की ओर उन्मुख होने लगते हैं।
  •     बाल साहित्य विशेषकर कहानी और कविता बच्चों को अनौपचारिक रूप से मात्र मनोरंजन नहीं करती। वह बच्चों में सजगता, आत्मविश्वास, गतिशीलता,सृजनशीलता बढ़ाती है। कहानी के सशक्त पात्रों के माध्यम से वह मानवीय गुणों को आत्मसात् करते हैं और बगैर उपदेश और आज्ञा के बिना अच्छे-बुरे की समझ विकसित कर लेते हैं। 
  •     बाल सािहत्य के चलते बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण स्थापित किया जा सकता है। भाग्यवाद से उन्हें दूर रखा जा सकता है। बच्चों को नयेपन की अनुभूति होती है। साल भर कुछ पाठ्य पुस्तकों को उलट-पलट कर बच्चा उदासीन हो जाता है। पाठ्य पुस्तकों से हट कर बाल साहित्य उनमें कल्पना जगाने का धारदार हथियार है।

कैसा हो बाल साहित्य

    प्राथमिक कक्षाओं के लिए विशेष बाल साहित्य की आवश्यकता है। यह आवश्यकता उसकी पाट्य पुस्तकें पूरी नहीं करतीं। किसी भी राज्य की पुस्तकें तेजी से बदल रही बच्चों की दुनिया के अनुरूप तैयार नहीं की जाती। वर्तमान समय के जीवन-मूल्य, संदर्भ, आदर्श, तोर-तरीके,विषमताएं पाठ्य पुस्तकों का हिस्सा नहीं हो पाती। यह सब बाल साहित्य के जरिए ही बच्चों के सामने आ सकता है। पाठ्य पुस्तकें आज भी पुरातन सोच और दिशा का त्याग नहीं कर पाई है। जबकि बच्चों की दुनिया का हर पहलू बहुत तेजी से बदल चुका है। यह सब बाल साहित्य के माध्यम से रेखांकित हो सकता है। बहुत ही कम पाठ्य पुस्तकें हैं, जो बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए तैयार की जाती हैं। चित्रों के पात्र और बिंब भी अत्याधुनिकता से पाठ्यपुस्तकों में नहीं होते। यह काम बाल साहित्य के पत्र-पत्रिकाएं बखूबी कर सकती हैं।
बच्चों की आयु को ध्यान में रखते हुए हमें बाल साहित्य का चुनाव करना होगा। जैसा कि पहले भी कहा गया है कि शुरूआती कक्षाओं के बच्चों के लिए कविताएं और छोटी-छोटी कहानियां ही शामिल की जानी चाहिए। वह भी अधिकतर मौखिक वाचन के रूप में ही। इसमें शिक्षक को बेहद सक्रिय होना होगा। उसे पढ़कर सुनाना होगा। बच्चे सिर्फ श्रोता के रूप में हिस्सेदारी निभाएंगे। धीरे-धीरे उनका लगाव बाल साहित्य को छूने,उलटने-पलटने से शुरू होकर पढ़ने की ओर भी उन्मुख होगा। शिक्षक के धैर्य की असली परीक्षा यही है कि वह कैसे बाल साहित्य की ओर बच्चों को लाये। यह हुआ तो बच्चे पाठ्य पुस्तकों से भी प्रेम करना सीख जाएंगे। फिर भी कहानी-कविता का चुनाव करते समय हम कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखें। कुछ प्रमुख बातें निम्न हो सकती हैं।
  •  बाल साहित्य सामग्री रोचक हो।
  •  संभव हो तो उस पर चित्र बनाया जा सके। बच्चों को सुनाते समय भाषा शैली सरल हो।
  •  संवाद शैली का ही अधिकाधिक प्रयोग करें।
  • रचना साम्रगी वैज्ञानिक दृष्टिकोण स्थापित करे न कि अंधविश्वास और भाग्यवाद पर आस्था जगाए।
  • रचना सामग्री में बच्चों के परिवेश को समुचित स्थान मिले। 
  • लोक जीवन, मूल्यपरक, सामाजिक मूल्यों के साथ तार्किकता जगाने वाली सामग्री बच्चों को अवश्य भाती है।
  • मनोरंजन बाल साहित्य की अनिवार्य शर्त है। अन्यथा बच्चे कुछ ही दिन में कहानी-कविता सुनने के प्रति उदासीन हो जाएंगे।
  • बाल साहित्य प्रस्तुत करते समय यह भी जरूरी है कि बच्चों को बीच में बोलने-प्रतिभाग करने का अवसर भी दिया जाए। अंत में यह कदापि न पूछा जाए कि बच्चों इससे आपको क्या शिक्षा मिलती है। उपदेशात्मक अंत कदापि न हो। इससे अच्छा यह होगा कि हम कहानी-कविता कैसी लगी? यह पूछें। पात्रों-घटनाओं की चर्चा करें। यदि ऐसा होता तो कैसा होता? इन प्रश्नों से बच्चों की प्रतिक्रियाएं आने दें।
  •  रचना सामग्री बच्चों के मानसिक स्तर के अनुरूप हों। कहीं न कहीं बाल साहित्य बच्चों की पाठ्यपुस्तकों के संबोधों से जोड़े जाने की सामथ्र्य रखता हो।

यह कहना गलत नहीं होगा कि मानव एक सामाजिक प्राणी है। उसे सामाजिक संबंध,सुख-दुख,हंसी-खुशी और हर्ष-विषाद प्रभावित करते हैं। बच्चे भी भविष्य में संवेदनशील प्राणी बन सकें, इसमें स्वस्थ साहित्य महती भूमिका निभाता है। इसकी उपेक्षा देश के लिए ही नहीं विश्व के लिए घातक होती है। ...

-मनोहर चमोली ‘मनु’.पोस्ट बाॅक्स-23,भिताई,पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल 246001

7 अप्रैल 2013

बचपन छीन कर क्या हासिल होगा?

बचपन छीन कर क्या हासिल होगा?

इन दिनों जरा सुबह जल्दी उठिये और सड़क पर आइए। आपको नन्हें-मुन्ने बच्चे चुपचाप कांधे में स्कूल बैग ढोते मिल जाएंगे। आप सोच सकते हैं कि स्कूल जाने का नया सत्र है। बच्चों को नई किताबें मिली हैं। नई यूनिफार्म-नये जूते मिलें हैं। बच्चे नये दोस्तों से मुलाकात करेंगे। इसमें नया क्या है। बच्चों का परिचय जो होने जा रहा है।

मुझे तो इन बच्चों पर तरस आता है। खासकर नन्हें-मुन्ने बच्चे सवा दो साल से लेकर चार साल के बच्चों को देखकर। कुछ बच्चे तो उनींदी आंखों के साथ अस्वाभाविक चाल के साथ कदम बढ़ाते हुए आपको मिल जाएंगे। सोचता हूं कि क्या वाकई हम बच्चों का भविष्य बना रहे हैं? पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि हम बड़े बच्चों के बचपन का गला घोंट रहे हैं। दो से चार साल का बच्चा जिसे मीठे-मीठे सपनों में व्यस्त होना चाहिए था। उसे जबरन-झकझोर कर, अप्राकृतिक-सा दुलार देकर हर रोज उठाया जाता है। कोमल मन में, विकसित हो रहे मस्तिष्क में क्या प्रभाव पड़ता होगा? 

मुझे नहीं पता। मुझे तो इतना पता है कि नन्ही उम्र में स्कूल जाने का दबाव जिंदगी भर रहता होगा। नर्सरी, लोअर केजी, अपर केजी मुझे तो ठीक से इनका क्रम भी याद नहीं है। हम तो सीधे पहली कक्षा में भर्ती हुए थे। सोचता हूं कि क्या आज के बच्चे अपना बचपन भरपूर जी पाते हैं? स्कूल से घर ज्यादा दूर नहीं है। सहपाठियों से हंसी-ठिठोली ही क्या हो पाती होगी। फिर इन बच्चों की अंगुली पकड़े मम्मी-पापा,दादा-दादी और कहीं-कहीं तो नाना-नानी या मामा तक उन्हें नज़रबंद की सी अवस्था में स्कूल ले जाते हैं।

यह अति सतर्कता है या कुछ और? मैं सोचता हूं कि यदि स्कूल की अवधारणा इतनी प्यारी होती तो ये नन्हें-मुन्ने कभी यह नहीं कहते कि पापा सन्डे कब आएगा? ये सन्डे देर से क्यों आता है? स्कूल इतनी सुबह क्यों लगते हैं। स्कूल की छुट्टी का घंटा जल्दी क्यों नहीं लगता? ये ऐसे सवाल हैं जो यह तो पुष्ट करते हैं कि स्कूल बच्चों के लिए घर जैसा नहीं है। मैं उसे जेल तो नहीं कहूंगा। मैं स्कूल को कांजी हाउस भी नहीं कहता। लेकिन स्कूल बचपन को खिलने देने की जगह तो कतई नहीं है। स्कूल इन नन्हें-मुन्ने बच्चों को प्यार-दुलार देने का स्थल तो कतई नहीं है।

मैं खुद नहीं समझ पा रहा हूं कि आखिर हम बच्चों को वो भी बहुत ही कच्ची अवस्था में स्कूल भेजने पर आमादा क्यों हैं? स्कूल जाने की सही उम्र क्या है? यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन बहुत कच्ची उम्र में भेजने के लाभ से ज्यादा मुझे नुकसान अधिक दिखाई देते हैं।

क्या स्कूल बच्चों को तमीज और तहजीब सिखाते हैं? क्या उन्हें ठीक से उठना-बैठना सिखाते हैं? क्या उन्हें जीवन की पढ़ाई सिखाते हैं? यदि आप ऐसा मानते हैं तो फिर घर क्या करता है? मम्मी-पापा का काम क्या है? चलिए मान लेते है कि यदि मम्मी-पापा कामकाजी हैं तो बात संभवतः दूसरी हो सकती है। लेकिन ये कच्ची उम्र के सभी बच्चों के माता-पिता कामकाजी हों, मुझे इसमें संशय है।

चलिए मान लेते हैं कि स्कूल का दर्जा और शिक्षकों का स्तर घर और माता-पिता से अधिक ऊंचा होगा। यदि मान लेते हैं। तो फिर अधिकतर बच्चे खुशी-खुशी स्कूल क्यों नहीं जाते? इन नन्हें-मुन्नों से बार-बार यह कहना कि जो बच्चे स्कूल जाते हैं वह बड़ा आदमी बनते हैं। तुम्हें रिस्पांसेबिल बनना है। स्कूल में ठीक से रहना है। शैतानी नहीं करना है। इसका दूसरा पक्ष यह है कि घर में यह सब नहीं होता। नन्हें-मुन्ने बच्चे गैर जिम्मेदार होते हैं? घर में ठीक से नहीं रहते? घर में शैतानी करते हैं? इतने नन्हें बच्चों से कहना कि अच्छे माक्र्स लाने हैं। यदि ऐसा करोगे तो तुम्हारे लिए चिज्जी लाएंगे। तुम्हें ये देंगे वो देंगे। ये प्रोत्साहन है या प्रलोभन?

अब आते हैं कि कच्ची उम्र में भेजने से मुझे क्या डर सता रहे हैं। 
  • मुझे लगता है कि अधिकतर मामलों में ये नन्हें-मुन्ने बच्चे दबाव सहने के नहीं दबाव में रहने के आदि हो जाते हैं। जो नन्हें बच्चे सात दिन में छह दिन दबाव में रहेगा उसका समग्र विकास कैसे संभव है।
  • पूरी नींद न ले पाने से बच्चे का स्वभाव अधिकतर चिड़चिड़ा हो जाता है।
  •  बचपन की अवस्था की मस्ती,उल्लास,छुटपना-बचपना, नटखटपन ये कुछ मानवीय संवेग हैं जो उम्र पार करने के बाद छूट जाते हैं। बचपन को जीने वाला बच्चा और बचपन से छलांग लगाने वाला बच्चा, दोनों के स्वभाव में क्या अंतर रहता होंगा, कहने की आवश्यकता नहीं है।
  • इतने नन्हें बच्चों को खेलने का अवसर स्कूल नहीं देता। इस अवस्था में जो शारीरिक विकास घर में खेलने-पड़ोस में आने-जाने वो भी बगैर दबाव रहित होता है से इतर स्कूल में शरीर को एक सीट पर कैद कर देने से नहीं होता। बच्चें में आत्मविश्वास कम हो जाता है। मैं कर सकता हूं। मैं कर सकती हूं। यह भावना को तौलने का हुनर कम रहता है।
  • स्कूल साल भर एक ही ढर्रे पर चलता है। शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन अवकाश के प्रति बच्चे कितने उत्साहित रहते हैं। यह किसी से कहां छिपा है। स्कूल का नीरस और एक ही तरह का ढर्रा बच्चें की रचनात्मकता छीन लेता है। वह भी जीवन जीने का एक ही ढब बना लेता है।
  •  जिन बच्चांे का बचपन हम छीन लेते हैं। वे बच्चे जीवन में कुछ भी बन जाएं। लेकिन वे जीवन में कई बार जोखिम उठाने वाला कदम नहीं उठा पाते। कारण? कारण साफ है कि बचपन के वे खेल जिनमें जोखिम उठाना,कौशल विकासित करना,चुनौतियों का सामना करने का मकसद होता है, उन खेलों को बच्चे भूल गए हैं। काश! स्कूल में एक पीरियड बच्चों को कुछ भी कर लेने की छूट देता हो। कुछ भी करने का मतलब वे बैठे रहे या खेलें या बातें करें आदि-आदि।
  • घर संवेदनाओं और भावनाओं का घरौंदा है। घरौंदा इसलिए कि वहा हर रोज कुछ न कुछ घटता है। कभी कोई बीमार होता है तो कभी कोई। मेहमान आते-जाते हैं। घर के सदस्यों मंे जो आत्मीयता होती है,बच्चे उसे महसूस करते हैं। घर में प्रेम,सद्भाव एक दूसरे की परवाह करना होता है। घर में दुख के क्षणों में दुखी होना होता है। सुख के क्षणों में हंसना होता है। घर में बहुत कुछ होता है जो स्कूल में होता ही नहीं। घर में स्वाभाविकता होती है। ये सब बच्चा कब सीखता है? कब जानता है? कब महसूस करता है? बचपन में ही तो। वही बचपन हमने बच्चे के स्कूल बैग में स्कूल भेज दिया है।
  •  मैं अपने छोटे से अनुभव के साथ कह सकता हूं कि आज के बच्चे अकादमिक अव्वल हो सकते हैं। अच्छी जाॅब पा सकते हैं। आराम तलब वाली जिंदगी जी सकते हैं। लेकिन भावनाओं के स्तर पर वे एकाकी हो जाते हैं। उन्हें बड़े होकर बड़े खलने लगते हैं। वे संवादहीन हो जाते हैं। वे उम्र दराज घर के सदस्यों से आत्मीयता नहीं रख पाते। वे न तो दुख जाहिर कर पाते हैं और न ही अपने आनंद में दूसरों को-अपनो को शामिल करना जानते हैं। 
  •  ऐसा बहुत कुछ ये बच्चे बड़ा होकर करने लगते हैं, जो इन्हें नहीं करना चाहते। फिर इन बच्चों के बड़े उन पर झल्लाते हैं। खुद को कोसते हैं। क्यों? मुझे लगता है कि इन सबके पीछे एक ही कारण है, हम कथित बड़ों ने उनका बचपन उनसे छीना है। उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप वे हमसे अपनापन छीनेंगे ही।
  •  यह आलेख आपको डराने के लिए नहीं है। विचार करने के लिए है। यदि बच्चों को उम्र से पहले स्कूल भेजना वाकई जरूरी है तो हम इतना तो कर सकते हैं कि महीने में चार रविवार और कुल जमा साल में बावन रविवार इन नन्हें-मुन्ने बच्चों को उनका बचपन जी भर के जी लेने दें। 
  • और हां। एक बात और, उनके साथ खुद का बचपन भी थोड़ा दोबारा जी लें। बचपन को बचाइए दोस्तों। बचपन की हत्या मत कीजिए।

6 अप्रैल 2013

ये शिक्षा कहाँ ले जाएगी?

ये शिक्षा कहाँ ले जाएगी?

-मनोहर चमोली ‘मनु’

मेरे सहयोगी शिक्षक ने मुझसे कहा-‘‘घर खाली-खाली सा नज़र आ रहा है। कल मैंने घर में रखी किताबें कबाड़ी को बेच दीं। कबाड़ी को सात फेरों मंे वे किताबें ले जानी पड़ीं। पत्नी तो कब से इस कूड़े को हटाने की ज़िद कर रही थी। किताबों से हुई खाली जगह में आसानी से सोफा सेट, कुर्सियां, कूलर, फ्रिज, टी.वी. और वाशिंग मशीन फिट आ गए हैं। फिर भी जगह बच गई है।’’
अध्ययनशील साथी की ये बात चैंकाने वाली थी। वह बोला-‘‘इतनी सारी पत्रिकाएं डाक से मंगाता था। अब इनकी जरूरत ही क्या है। सब कुछ इंटरनेट पर है। एक क्लिक करो और वांछित जानकारी स्क्रीन पर पाओ। धीरे-धीरे सारी पत्रिकाएं इंटरनेट पर आ ही जाएंगी। अखबार इंटरनेट पर हैं। क्या नहीं है इंटरनेट पर? अब घर पर किताबों-पत्र-पत्रिकाओं का ढेर रखना मूर्खता है। ये तो कूड़ा जमा करना हुआ।’’
साथी की ये बात समय की दरकार के साथ शायद ठीक थी। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे जंची नहीं। फिर मैंने खुद को टटोला। अभी एक दशक पहले ही तो मैं भी कई पत्रिकाओं का और किताबों का दीवाना था। लेकिन धीरे-धीेरे मैंने भी तो पत्रिकाएं और किताब खरीदना बंद कर दिया। ये ओर बात है कि पढ़ने की ललक तो नहीं छूटी। तो साथी शिक्षक की बात मुझे अखरी क्यों?
यह बात मेरे आस-पास ही घूमती रही। विचार किया तो फिर से जाना कि मेरे पास भी तो सैकड़ों किताबें हैं। कुछ किताबें तो वर्षों पुरानी हैं। ऐसी कई किताबें हैं जिन्हें मैंने सालों से टटोला तक नहीं। तो क्या वाकई ये किताबें घर में आज कूड़ा हो गई हैं?
कई दिनों तक ये बात मुझे परेशान करती रही। फिर मैंने अपना ध्यान इस बात से हटाने में ही भलाई समझी। बात आई-गई हो गई।
फिर एक दिन वही साथी शिक्षक झल्लाते हुए बोला-‘‘हद हो गई। ये पब्लिक स्कूल भी न जाने बच्चों को क्या शिक्षा दे रहे हैं। आए दिन प्रोजेक्ट-प्रोजेक्ट चिल्लाते रहते हैं। बच्चों के साथ मेरा तो दिमाग ही खराब हो गया है। आए दिन कुछ न कुछ एक्टीविटी कराते रहते हैं। कुछ न कुछ डिमांड करते रहते हैं।’’
मैंने कहा-‘‘अच्छा तो है। बच्चे हरफनमौला बनेंगे। हर एक्टीविटी में अव्वल आएंगे। इसमें परेशानी वाली क्या बात है?’’
साथी शिक्षक बोला-‘‘हम शिक्षक हैं न? हमारा काम बच्चों को पढ़ाना है या उन्हें और उनके मातापिता को कुली बनाना है? अनाप-शनाप होमवर्क देना, वर्कबुक पर काम कराने का क्या तुक है? प्रोजेक्ट पर प्रोजेक्ट बनाने से बच्चे क्या सीख रहे है? स्कूली फंक्शन के नाम पर बच्चों से बेमकसद की खरीदारी करवाने से कौन सी पढ़ाई होती है?’’
उसने बताया कि उसके बच्चे जिस पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं, वहां के हर टीचर विषय में आए दिन प्रोजेक्ट बनवाते हैं। वह प्रोजेक्ट स्कूल में बने या शिक्षक के सहयोग से बने तो बात समझ में आती है। लेकिन घर से बनाकर या बाजार से खरीदकर लाने वाले प्रोजेक्ट से बच्चा क्या सीखेगा? वह भी इस तरह की लत बनाकर कि गूगल में सर्च करो और वहां से डाउनलोड करो फिर अपना प्रोजेक्ट बनाकर स्कूल में लाओ। फिर उनमें बेहतर प्रोजेक्टस को ‘फस्र्ट-सेकण्ड-थर्ड’ का नाम देकर अन्य बच्चों को हतोत्साहित करो। क्या ये है पढ़ाई? यह सब बातें मुझे भी परेशान करने लगी। 
हम सभी साथी बहस में शामिल हुए। अंत में यही निष्कर्ष निकला कि शिक्षक और स्कूल अपने नैतिक और मूल दायित्व से पीछे हट रहे हैं। सूचना और तकनीक का हवाला देकर बच्चों को पहले से परोसी गई जानकारी को कट-पेस्ट कर परोसने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। घर में माता-पिता और बड़े भाई-बहिनों की ऊर्जा भी ऐसे प्रोजेक्ट बनाने में खप रही है। अधिकतर अभिभावकों को लगता है कि ऐसे में बच्चे खुद करके सीख रहे हैं। लेकिन यह तसवीर का आधा और एक पक्षीय पहलू है।
अधिकतर स्कूलों में आज पढ़ाई की अवधारणा ही बदल रही है। परीक्षा में अधिकतम स्कोर करना ही पढ़ाई का मूल मकसद बन गया है। सारा ढांचा ऐसी गतिविधियों में लिप्त दिखाई देता है। व्यावहारिक शिक्षा और समग्र शिक्षा की कोई बात नहीं करता। परीक्षा की पद्वति भी ऐसी बन गई है कि पहले तीन पाठ पढ़िए उनकी परीक्षा दीजिए और उन्हें भूल जाइए। फिर आगे के तीन पाठ पढ़िए,उनकी परीक्षा दीजिए और फिर उन्हें भी भूल जाइए। एक कक्षा के बाद दूसरी कक्षा में जाइए और फिर पहली कक्षा का किया-धरा भूल जाइए। ऐसा कैसे हो सकता है? यह सवाल उठना लाजिमी है। लेकिन खुद व्यवहार में आप किसी भी बच्चे से उसका पूर्व ज्ञान का आकलन करेंगे तो यही पाएंगे। डीजिटल घड़ियां आने से बच्चे पारंपरिक घड़ी में समय देखना नहीं जानते। मौसम के बदलावों की उन्हें जानकारी तक नहीं है। फसल चक्र और अनाज व उनके बीजों की पहचान तो गंवई मानसिकता का प्रतीक हो गए हैं।
बच्चे की बुद्धि का ऐसा विकास क्या समाज के लिए लाभदायक है। बच्चों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के बदले एक दूसरे को पटखनी देने की मानसिकता ज्यादा प्रबल हो रही है। किताबों को उलटना-पलटना और उनके अक्षरों को साक्षात छूकर महसूस करना अलग बात थी। लेकिन गूगल पर सर्च कर उसे भाषा में कन्वर्ट कर उतार लेना समझ बनाता हो। मैं नहीं मानता। तकनीक हमारे काम को सरल करे तो उसका स्वागत कौन नहीं करेगा। लेकिन यदि कोई तकनीक हमें पंगु बना दे। हमारी बुद्धि को कुंद कर दे, तो सवाल खड़े होने स्वाभाविक ही हैं।  

इक्कीसवीं सदी की खूबियों का डंका हम खूब बजा रहे हैं। सूचना-तकनीक की सदी जो है। दुनिया एक गांव जो हो गई है। संचार सुविधाएं पलक झपकते ही हमें दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर की खबरें जो दे रही हैं। इस युग का बच्चा पैदाइशी मेधावी जो दिखाई दे रहा है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने रसोई क्या और स्नानागार क्या? बूढ़े क्या और बच्चे क्या? हर किसी को वस्तुओं और सेवाओं का इतना दीवाना बना दिया है कि हम बाजार के उत्पादों के इशारे पर उठ रहे हैं और जैसे उसी के इशारे पर सो रहे हैं।
बात यहां तक तो पचाई जा सकती है। लेकिन इतना काफी नहीं है। इस सदी का दूसरा दशक तो लंबी छलांग लगाने पर उतारू है। हमारे-आपके बच्चों का एक क्लिक करने का जो नशा छा रहा है। ये न जाने कहां तक ले जाएगा। इंटरनेट ने हमें एक क्लिक करने से भर से जो सुविधाएं मुहैया कराई हैं। उस पर अंगुली नहीं उठाई जा रही है। मेल से सारी सूचनाएं जो इधर-उधर पलक झपकते पहुंच रही हैं। इस सुविधा का विरोध नहीं हो रहा है। चिंता तो सिर्फ इस बात की है कि बच्चों में इंटरनेट का नशा हो या विवशता। यह ऐसे धीमे जहर के रूप में दिमाग को कुंद कर रहा है कि एक समय ऐसा आएगा जब दिमाग कल की बातों-मुलाकातों को भी अपनी याददाश्त से बाहर करता हुआ नज़र आएगा।
आज आम बातचीत में कोई जिज्ञास या सवाल उठाने पर दूसरा कहता है-‘‘गूगल पर सर्च करो न।’’ सर्च करो तो यह बात नहीं कि संबंधित पहलू पर कुछ मिलता ही न हो। लेकिन कई बार इतने सारे लिंक क्लिक करने पर भी आप उस बात को नहीं ढूंढ-खोज पाते जो असल में आपको परेशान कर रही है। फिर लगता है कि अपने किताबी संग्रह में ढूंढते तो अब तक जिज्ञास शांत हो जाती।
अब फिर स्कूली शिक्षा पर आते हैं। रटना कभी सीखना नहीं होता। इसका हम भी विरोध करते हैं कि रटने की पद्वति की वकालत की जाए। लेकिन किसी प्रकरण को सवाल को या समस्या को ठीक से समझना और समझकर उसे अपने जीवन से जोड़ते हुए अपने व्यावहारिक जीवन में आत्मसात् करने के लिए स्थाई करना तो शिक्षा का उद्देश्य होना ही चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। समझ बनाने,करके सीखने और देख-परख कर,सुनकर,समझकर और अवलोकन कर विषयगत अध्ययन करना अलग बात है और डिजीटल रूप में अंतरजाल पर है और उसे काॅपी कर उतार लेना दूसरी बात है।
अब और पीछे जाएं तो यह सवाल भी उठता है कि मानव जीवन बिना किताबों के भी तो था। आने वाले समय में जब सब कुछ डिजीटल हो जाएगा। कागजी सामान बचेगा ही नहीं। तो क्या भावी पीढ़ी का जीना मुश्किल हो जाएगा? नहीं। जीवन चलेगा। लेकिन जो ठोस तरीका अपनाया जाना चाहिए, उस ओर किसी का ध्यान कमोबेश कम ही है। किताबों की जगह डिजीटल किताबों ने ले ली है। चिट्ठी-पत्री की जगह ई-मेल ने ले ली है। युग परिवर्तन है। लेकिन डिजीटल किताबों को पढना तो होगा न? ई-मेल भेजने के लिए लिखना तो होगा न? हाथ का लेखन की-बोर्ड पर चलने वाली अंगुलियों ने ले ली है। लेकिन समझ ने साथ नहीं छोड़ा है। समझ विकसित करने और संवाद के लिए शब्द सामथ्र्य नहीं बदली। लेकिन आज के स्कूल संवाद की जगह रख रहे हैं। बच्चों का शब्द सामथ्र्य बढ़ा रहे हैं? इसमें संशय है। यह मुद्दा व्यापक बहस की गुंजाइश तो रखता है। आप क्या कहते हैं?

4 अप्रैल 2013

दो प्रेरक कहानियां अब मराठी में भी.

दो प्रेरक कहानियां अब मराठी में भी.

मेरी कहानी कंचन का पेड़ का मराठी में अनुवाद

मेरी कहानी कंचन का पेड़ का मराठी में अनुवाद
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अब आप मराठी में भी पढ सकते हैं मेरी कुछ बाल कहानियां --'असा जिंकला उंदीर'

अब आप मराठी में भी पढ सकते हैं मेरी कुछ बाल कहानियां --'असा जिंकला उंदीर'

4 मार्च 2013

तेनालीराम- ''अनमोल'', मार्च 2013. नंदन


                                            अनमोल

कथा: मनोहर चमोली ‘मनु’

एक बार की बात है। राजा कृष्णदेव राय ने दरबारियों से पूछा-‘‘क्या कोई बता सकता है कि सबसे अनमोल क्या है?’’
मंत्री ने चारों ओर नजर दौड़ाते हुए कहा-‘‘महाराज। आपके सिंहासन में जड़े मोती ही सबसे अनमोल हैं।’’ 
राजगुरु ने आंखें बंद करते हुए कहा-‘‘नहीं महाराज। आपका मुकुट ही सबसे अनमोल है। वह बेशकीमती है।’’
सेनापति ने कहा-‘‘मुझे तो लगता है कि महाराज की तलवार ही सबसे अनमोल है।’’
तेनालीराम को मौन देख राजा बोले-‘‘तेनालीराम तुम्हारी क्या राय है।’’
तेनालीराम बोला-‘‘महाराज। इस दरबार में हर वस्तु का मोल है। ये कीमती हैं, लेकिन इनकी उपयोगिता क्षणिक है।’’
पुरोहित ने कहा-‘‘महाराज। तेनालीराम दरबार की मर्यादा लांघ रहा है। इसे सिद्ध करना होगा कि दरबार की हर वस्तु क्षणिक है। तेनालीराम को बताना ही होगा कि फिर सबसे अनमोल क्या है।’’
तेनालीराम ने हाथ जोड़ते हुए कहा-‘‘महाराज। मुझे पर्याप्त समय दिया जाए। सबसे अनमोल क्या है। मैं साक्षात उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूंगा।’’ राजा ने सहर्ष अनुमति दे दी।
कुछ दिनों बाद राजा वन विहार को गए। साथ में मंत्री, राजगुरु, सेनापति, तेनालीराम और पुरोहित भी साथ थे। राजा का काफिला बातों ही बातों में बहुत दूर तक निकल गया। काफिला वन में भटक गया।
रात हो गई। सुदूर एक टीले पर रोशनी दिखाई दी। काफिला रोशनी की ओर चलता गया। अंततः काफिला टीले में जा पहुंचा। घने और निर्जन जंगल में एक आश्रम को देखकर सब चकित थे। आश्रम के मुनि ने सभी का स्वागत किया। शिष्यों ने जैसे-तैसे सभी के रहने-खाने की व्यवस्था कर दी।
सुबह हुई तो राजा ने मुनि का आभार प्रकट किया। शिष्यों ने राजा के काफिले को राजमहल की ओर जाने वाले मार्ग तक पंहुचाया। राजा का काफिला सकुशल राजमहल पहुंच गया।
अगली सुबह दरबार में राजा ने कहा-‘‘यह संतोष की बात है कि वन विहार करते समय हम उस टीले में स्थित आश्रम तक पहुंच गए।’’
तेनालीराम को इसी अवसर की तलाश थी। वह उठ खड़ा हुआ। कहने लगा-‘‘महाराज। यह संतोष ही सबसे अनमोल है। आपने साक्षात देखा कि सुख-सुविधा से दूर अति निर्जन और विषम परिस्थितियों के वातावरण में मुनिवर और उनके शिष्य जीवन यापन कर रहे थे। उनके पास सबसे बड़ी पूंजी संतोष ही तो है। ज़रा सोचिए यदि वे वहां न होते तो हमारा क्या होता।’’
राजा ने कुछ क्षण विचार किया और प्रसन्न मुद्रा में बोले-‘‘तुम ठीक कहते हो तेनालीराम। सचमुच ! इस संसार में सबसे अनमोल संतोष ही है। शेष वस्तुएं प्राप्त कर मनुष्य क्षण भर की प्रसन्नता तो पा सकता है। लेकिन जिसके पास सच्चा संतोष है, वह सभी इच्छाओं से ऊपर रहकर सदैव प्रसन्न रहेगा। वाकई! तुमने अपनी बात सिद्व कर दी है।’’
सभी दरबारी भी तेनालीराम की बात से सहमत हो गए।
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-मनोहर चमोली ‘मनु’


चांद का स्वेटर - मनोहर चमोली ‘मनु’..रूम टू रीड. पहला संस्करण- 2012. 9000 प्रतियां.

चांद का स्वेटर


-मनोहर चमोली ‘मनु’




जाड़ा आया।

सिया मम्मी से कविता सुन रही थी। ‘चंदा मामा दूर के, पुए पकायें पूर के....’                
सिया ने पूछा-‘‘मम्मी। क्या चंदामामा को जाड़ा नहीं लगता?’’।
सिया की मम्मी बोली-‘‘हाँ। लगता है। वो आसमान में अकेला जो है। उसका कोई साथी भी नहीं है।’’
सिया उदास हो जाती है। वह मम्मी की बातें सुनते-सुनते सो जाती है।
एक भेड़ आती है। वह कहती है-‘‘सिया। ये लो। मेरी ऊन। चांद के लिए स्वेटर बुन लो।’’
फिर एक मकड़ी दौड़ कर आती है। वह कहती है- ‘‘मैं जाला बुनती हूँ। मैं चांद के लिए स्वेटर बुन सकती हूँ।’’
और फिर तितली कहती है- ‘‘स्वेटर मुझे दो। मैं उड़कर चांद को स्वेटर दे आऊँगी।’’
सिया ताली बजाती है। उसका सपना टूट जाता है। वह खिड़की खोलती है। आसमान में चाँद मुस्कराता हुआ कहता है-‘‘थैंक्यू मेरी नन्ही दोस्त।’’
सिया खिड़की बंद कर देती है और हंसती हुई रजाई में घुस जाती है।

-मनोहर चमोली ‘मनु’, 

13 फ़र॰ 2013

तलवार नहीं ढाल चाहिए, कथा-मनोहर चमोली ‘मनु’.BALHANS.Feb,1st 2013

तलवार नहीं ढाल चाहिए

कथा-मनोहर चमोली ‘मनु’    

बहुत पुरानी बात है। राजा विजय प्र्र्ताप का जन्मदिन था। समूचा राज्य उनका जन्मदिन मना रहा था। सुबह से ही राजा को षुभकामना देने वालों का तांता लगा हुआ था। धनी और सम्पन्न राजा को कुछ न कुछ उपहार दे रहे थे। षाम होने को थी। अब दरबारी भी राजा को जन्मदिन की बधाई देने लगे।
महारानी ने राजा के कान में कुछ कहा। राजा ने हामी भरते हुए दरबारियों से कहा-‘‘मैं आज बहुत प्रसन्न हूं। जो चाहे मांग लो।’’
फिर क्या था। किसी ने स्वर्ण तो किसी ने रजत मुद्राएं मांग ली। किसी ने मोतियों की माला मांगी तो किसी ने तीर मांग लिया। मंत्री ने तलवार मांगी तो राजा ने अपनी प्रिय तलवारों में से एक उसे दे दी। मंत्री के बाद तो कई दरबारियों ने भी तलवार मांगनी षुरू कर दी। राजा ने सबकी मांग पूरी कर दी।
दरबार में महतो भी था। वह राजा का सेवक था। वह चुपचाप कोने में खड़ा था।
राजा ने कहा-‘‘महतो। तुम भी कुछ मांग लो।’’
महतो ने धीरे से कहा-‘‘महाराज। मुझे तो ढाल ही दीजिएगा।’’
यह सुनकर दरबारी हंस पड़े। सेनापति ने चुटकी लेते हुए कहा-‘‘ लगता है महतो को तलवार उठाने से डर लगता है।’’ हर कोई सेनापति की हां में हां मिलाने लगा।
राजा बोले-‘‘कहो महतो। कुछ और मांग लेते। ये तुच्छ सी ढाल क्यों चाहते हो?’’
महतो ने सिर झुकाते हुए कहा-‘‘महाराज। मेरी आयु भी आपको मिल जाए। लेकिन मैं सोचता हूं कि ये तलवार हमेषा मारने-काटने का ही काम करती है। वहीं ढाल बचाने का काम करती है। वैसे भी बड़े कह गए हैं कि मारने वाले से बचाने वाला भला। तो भला मैं तलवार लेकर क्या करूंगा!’’
राजा समझ गए। मुस्कराते हुए दरबारियों से बोले-‘‘ महतो ठीक कहता है। आप सब तो तलवार उठाकर दुष्मनों से लड़ेंगे। किंतु अवांछित प्रहार से मेरी रक्षा करने वाला भी तो कोई होना चाहिए।’’
 
यह सुनकर दरबारियों के सर झुक गये।
वहीं महारानी ने महतो को अपने गले का हीरों का हार महतो को उपहार में दे दिया। 000

शर्म कैसी -मनोहर चमोली ‘मनु’.Champak.feb 1st 2013

शर्म कैसी

-मनोहर चमोली ‘मनु’ 

मोतीवन में आग लग गई। मलकू लोमड़ और सोलू गधा जान बचाकर चंपकवन में आ गए। शेर सिंह ने सारा किस्सा सुनते हुए कहा-‘‘तुम दोनों चंपकवन में रह सकते हो। तुम्हारे चालचलन को देखते हुए ही तुम्हारे यहां रहने की अवधि बढ़ाई जाएगी। अन्यथा तुम्हें चंपकवन छोड़ना होगा।’’ मलकू लोमड़ और सोलू गधा ने हाथ जोड़े और दरबार से बाहर चले गए।
‘‘यार मलकू। हमें चंपकवन में रहने की इजाजत तो मिल गई। लेकिन हम यहां करेंगे क्या? खाएंगे क्या?’’ सोलू गधा बोला। मलकू लोमड़ ने गरदन झटकते हुए जवाब दिया-‘‘अरे बेवकूफ! जब रहने का बंदोबस्त हो गया है तो खाने का भी हो जाएगा। मैं तो चला नदी में नहाने के लिए। पहले नहाधोकर आराम करुंगा। फिर खाने-पीने की सोचूंगा।’’ यह कहकर मलकू लोमड़ नदी की ओर चला गया।
सोलू गधा चंपकवन की बस्ती में जा पहंुचा। जंबो हाथी सब्जी काट रहा था। सोलू गधा बोला-‘‘मैं आपकी मदद करूं? मैं भी सब्जी काट सकता हूं।’’ यह कहकर वह जंबो हाथी की मदद करने लगा। दोनों ने मिलकर ढेर सारी सब्जी काट दी। जंबो हाथी ने कहा-‘‘लगता है परदेशी हो? अब खाना खाकर ही जाना।’’ दोनों ने मिलकर खाना बनाया और मिलबांटकर खाया। सोलू ने कुछ देर आराम किया फिर वह आगे बढ़ गया।
सोलू ने देखा कि हैरी घोड़ा पीठ पर ईंट लादकर ले जा रहा है। वह हैरी से बोला-‘‘मैं भी ईंट ले जा सकता हूं।’’ सोलू गधा भी अपनी पीठ पर ईंट लादकर ले जाने लगा। डैरी भालू का मकान बन रहा था। दोनों शाम तक पीठ पर ईंट लादकर डैरी भालू के मकान की ओर पहुंचाते रहे। डैरी भालू ने दोनों को कुछ रुपए देते हुए कहा-‘‘ये लो तुम्हारी मजदूरी। आज का काम खत्म। हाथ-मुंह धो लो। फिर खाना खाकर चले जाना। कल जरूर आना। और हां, कल तुम दोनों सुबह, दोपहर और रात का भोजन मेरे साथ ही करोगे।’’ हैरी और सोलू ने डैरी भालू के घर पर स्वादिष्ट भोजन किया। हैरी घोड़ा सोलू को अपने घर ले गया। हैरी ने सोलू से कहा-‘‘तुम मुझे अच्छे लगे। जब तक चाहो मेरे घर रह सकते हो। मैं भी अकेला हूं। एक से भले दो।’’
वहीं मलकू लोमड़ नदी में नहाने घुसा तो सैकी मगरमच्छ ने उसकी टांग पकड़ते हुए कहा-‘‘मुझसे पूछे बिना नदी में कैसे घुस आया। फिर कभी यहां दिखाई दिया तो, समझ लेना।’’ जख्मी मलकू लगड़ाता हुआ नदी से बाहर निकला। रास्ते में उसे एक नारियल दिखाई दिया। उसने नारियल हवा में उछाल दिया। नारियल मधुमक्खी के छत्ते से जा टकराया। गुस्साई मधुमक्खियों ने मलकू लोमड़ को काट खाया। रोता-बिलखता मलकू किसी तरह जान बचाकर एक गुफा में जा छिपा। गुफा में लैपी तेंदुआ आराम कर रहा था। उसने मलकू लोमड़ को जमीन पर पटक दिया। बचता-बचाता मलकू इधर-ऊधर चक्कर काटता रहा।
 मलकू लोमड़ बचा-खुचा और सड़ा-गला मांस खाकर किसी तरह अपने दिन काट रहा था। वह किसी से न तो बात करता न ही किसी से मेलजोल बढ़ाने की कोशिश करता।
एक दिन मलकू लोमड़ चंपकवन के चैराहे पर टहल रहा था। उसने सोलू गधा को एक ढाबे में खाना पकाते हुए देखा। वह हैरानी से बोला-‘‘अरे। सोलू। तुम यहां खाना पका रहे हो? तुम्हें शर्म नहीं आती?’’
सोलू ने मलकू लोमड़ का स्वागत करते हुए कहा-‘‘मुझे खाना खाने में शर्म नहीं आती तो खाना पकाने में कैसी शर्म। क्या तुम्हें खाना अच्छा नहीं लगता? खाना ही तो पका रहा हूं। चोरी तो नहीं कर रहा! मैं इस ढाबे में काम करता हूं। मेरा मालिक मुझे रोटी और कपड़ा देता है।’’ फिर सोलू ने मलकू लोमड़ को ढाबे में भोजन करवाया। छुट्टी लेकर मलकू लोमड़ को हैरी घोड़े से भी मिलवाया। लेकिन मलकू लोमड़ फिर भी अपनी आदत से बाज नहीं आया। वह यहां-वहां खाली भटकता रहा।
दिन गुजरते गए। फिर एक दिन उसे शहर कोतवाल चीता सिंह मिला। चीता सिंह ने मलकू लोमड़ से कहा-‘‘मलकू। तुम्हारे मोतीवन की आग अब बुझ चुकी है। 24 घंटे के अंदर तुम्हें चंपकवन छोड़ देना है। नहीं तो जेल में सड़ने के लिए तैयार रहना। समझे तुम।’’ मलकू हाथ जोड़ते हुए बोला-‘‘जी ठीक है। मैं अपने दोस्त सोलू को अभी खबर कर देता हूं।’’
‘‘उसकी कोई जरूरत नहीं है। सोलू गधा जब तक चाहेगा, चंपकवन में रह सकता है। वह मेहनती है। ईमानदार है। उसे देख-देख कर चंपकवन के कई निठल्ले काम-काज करने लगे हैं। अब तुम यहां से फूटोगे या मैं तुम्हें बाहर तक खदेड़ने का इंतजाम करूं?’’ कोतवाल चीतासिंह ने मलकू लोमड़ से कहा।
आलसी मलकू दुम दबाता हुआ चंपकवन छोड़कर चला गया। 000

12 फ़र॰ 2013

हर दिन है अनमोल  

-मनोहर चमोली ‘मनु’

‘‘अरे चूंचूं ! उठो। देखो। सूरज सिर पर चढ़ आया है। साल भर ऐसे ही सोते रहोगे तो इम्तिहान में क्या खाक पास होओगे। चलो उठो।’’
‘‘क्या दादा जी! सोने दो न। आज तो वैसे भी संडे है।’’
‘‘अच्छा बच्चू। संडे हो या मंडे। दिनचर्या ऐसी होनी चाहिए कि हमें कभी पछताना न पड़े। चलो उठो। नहीं तो मैं तुम्हारे सिर पर एक बाल्टी पानी डाल दूंगा।’’ पानी का नाम सुनते ही चूंचूं चूहा एक झटके में उठ गया। चूंचूं आंख मलता हुआ मुंहहाथ धोकर दादा जी के सामने खड़ा था।
‘‘अब चलो। थोड़ा घूमकर आते हैं। ताजी हवा खाओगे तो दिमाग भी तरो-ताजा हो जाएगा। तब तक तुम्हारे लिए तुम्हारी मम्मी गरमा-गरम नाश्ता बना देगी।’’ चूंचूं के दादा जी ने चूंचूं से कहा। चूंचूं को न चाहते हुए भी दादाजी के साथ घूमने जाना पड़ा। टहलते हुए वे दोनों एक पार्क पर जाकर बैठ गए।
‘‘अच्छा चूंचूं। तुम अभी से परीक्षा की तैयारी क्यों नहीं करते?’’ चूंचूं के दादा जी ने पूछा।
‘‘दादा जी। परीक्षा तो दो महीने बाद होगी। अभी से क्या तैयारी करनी।’’ चूंचूं ने खीजते हुए कहा।
चूंचूं के दादा जी मुस्कराते हुए बोले-‘‘चूंचूं। जरा एक काम करना। सामने वो गुलाब का फूल है न। जरा उसकी चार पंखुड़िया तोड़कर ला सकते हो।’’
चूंचूं चूहा बोला-‘‘क्या दादा जी। आप भी न। ये भी कोई मुश्किल काम है। ये लो। मैं ये गया और ये आया।’’ चूंचूं दौड़कर गया और गुलाब के एक फूल से पंखुड़िया तोड़ कर ले आया।
‘‘ये लो दादाजी। आपने चार पंखुड़ियां मंगाई थी न। मैं आठ ले आया।’’ चूंचूं चूहा अपनी पूंछ हिलाते हुए बोला।
‘‘शाबास। अब एक काम और करो। इन पंखुड़ियों को फिर से उसी फूल में वैसे ही लगा दो, जैसे यह कभी तोड़ी ही नहीं गई हो।’’ दादाजी ने वे पंखुड़िया वापिस करते हुए चूंचूं चूहे से कहा।
चूंचूं ने कहा-‘‘लेकिन दादा जी। ये पंखुड़िया फूल से अलग होकर अब दोबारा उससे जोड़ी नहीं जा सकती।’’
दादाजी ने तपाक से जवाब दिया-‘‘बिल्कुल ठीक। ठीक उसी प्रकार आज का संडे दोबारा वापिस नहीं आ सकता। उसी प्रकार एकएक दिन बीतता चला जाता है। सप्ताह,महीना और फिर दूसरा महीना। फिर पूरा एक साल। यदि तुम हर रोज पढ़ाई पर ध्यान दोगे। अपना सबक रोजा़ना समझ कर पढ़ते रहोगे, तो तुम्हें इम्तिहान के दिन कोई परेशानी नहीं होगी। समझे कुछ।’’
चूंचूं चूहा सिर हिलाता हुआ बोला-‘‘समझ गया दादाजी। आपने सही कहा। अब मैं रोज सुबह जल्दी उठूंगा। रोज पढ़ाई करुंगा। अब घर चलें? नाश्ता बन गया होगा न। ’’
दादा जी ने चूंचूं को गले से लगा लिया।
-मनोहर चमोली ‘मनु’
-कहानी
मेरी उलझन
-मनोहर चमोली ‘मनु’ 
‘‘बड्डन भाई नमस्ते।’’ राखी नेे भाई को फोन किया। बलदेव सबसे बड़ा था। बचपन में उसे प्यार से बड्डन कहते थे। मनोज मंझला था, तो प्यार-दुलार में उसे मुंज्जे कहा जाने लगा। छोटेलाल भाईयों में छोटा था, तो वो छुट्टन हो गया। राखी, राखी ही रही। उसका प्यार का नाम नहीं रखा गया। आखिर वो तीन भाईयों के पीछे जो हुई थी। तब तक शायद घर के बड़े-बूढ़ों का प्यार बंट चुका था।
बड्डन ने राखी की बात का जवाब देते हुए कहा-‘‘नमस्ते-नमस्ते। और....क्या हो रहा है राखी?’’
‘‘बस कुछ नहीं। सब ठीक है। वो...मां तीन दिनों से फोन नहीं उठा रही। तुम्हारी बात हुई?‘‘ राखी ने पूछा।
‘‘अब क्या हुआ उन्हें? सात-आठ दिन पहले तो मेरी बात हुई थी।’‘ बड्डन की झुंझलाती हुई आवाज राखी ने सुनी।
‘‘सात-आठ दिन और आज-कल में फर्क होता है भाई। मां की तबियत ठीक कहां रहती है। जानते तो हो। अब मां फोन नहीं उठा रही है तो मैंने सोचा कि तुम्हें शायद कुछ पता हो। चलो कोई बात नहीं। मैं मुंज्जे को पूछती हूं। नमस्ते भाई।’’
यह कहकर राखी ने फोन रख दिया। राखी की उलझन बढ़ने लगी। अब राखी ने मुंज्जे को फोन किया। मुुंज्जे ने फोन पर पूछा-‘‘हाॅ राखी बोल। कैसी है?’’
‘‘मैं तो ठीक हूं। मां से बात हुई?’’ राखी ने मुंज्जे से पूछा।
मुंज्जे ने याद करते हुए जवाब दिया-‘‘कई दिन हो गए। क्यूं क्या हुआ?’’
‘‘मां तीन दिनों से फोन नहीं उठा रही है। मुझे तो घबराहट हो रही है।’’ राखी ने मन की बात कह दी।
‘‘अरे! तो क्यों परेशान हो रही हो। वहाॅ मौसम गड़बड़ होगा।’’ मुंज्जे ने आसानी से कह दिया।
‘‘नहीं मुंज्जे। मौसम की बात नहीं है। मौसम तो आते-जाते रहते हैं। मुझे तो कुछ गड़बड़ लग रही है। कहीं मां...। मुझे लगता है वो परेशान है। या......’’ राखी ने इतना ही कहा था कि उसके कानों में मुंज्जें की झल्लाहट जोर से आ पड़ी। ‘‘या-वा को छोड़ो। आस-पड़ोस में फोन कर लो।’’
राखी ने भी तत्काल जवाब दिया-‘‘नहीं भाई। माॅ चिढ़ती है न। कहती है कि यहाॅ-वहाॅ फोन मत किया करो।’’ फिर उदासी से और गहरी सांस छोड़ते हुए राखी ने कहा-‘‘अरे। भाई। लोगों को हमारी बात मां तक पहुचाने में दिक्कत जो होती है। जानते तो हो कि गांव में हमारा घर आबादी से थोड़ा दूर है।’’
मुंज्जे को जैसे बात करने में परेशानी हो रही थी। बोला-‘‘अच्छी तरह जानता हूं । तो। क्या करना है? मेरे पास तो छुट्टी भी नहीं है। बड्डन भाई को फोन करती न। शायद उसे पता हो।’’
राखी ने जोर देकर कहा-‘‘पहले उन्हें ही किया था। चलो कोई बात नहीं।’’
फोन पर दोनों चुप हो गए। मुंज्जे को लगा कि कुछ गलत कह गया है वो। कहने लगा-‘‘छुट्टन को फोन किया......? या मैं करूं?’’ राखी ने बात को संभालना चाहा हो जैसे-‘‘नहीं रहने दो। वो यूं ही परेशान हो जाएगा। चलो ठीक है। मैं ही छुट्टन से पूछ लेती हूं। देखती हूं। उसे क्या खोज-खबर है मां की।’’ यह कहकर राखी ने फोन रख दिया।
अब राखी ने छुट्टन का नंबर मिलाया। छुट्टन ने छूटते ही कहा-‘‘ अरे। राखी। मैं जरा पार्टी में हूं यार। बाद में बात कर लें? चल छोड़। मैं थोड़ी देर में काॅल बैक करता हूं। वैसे सब ठीक तो है न?’’ राखी की आवाज गले में रुक गई हो जैसे। उसे लगा कि कहीं उसने किसी ओर का नंबर तो नहीं मिला दिया। खुद को फोन पर संभालते हुए बोली-‘‘सब ठीक है। काॅल बैक करने की तो तू बात मत कर। रहने दे तू। तेरी काॅल बैक आज तक तो कभी नहीं आयी। आज क्या आएगी। सुन तो...तेरी माॅ से बात हुई इन दिनों?’’
उधर जैसे छुट्टन कहीं भीड़ में हो या उसे कहीं जाने की जल्दी हो रही हो। राखी ने मानो मां के बारे में नहीं किसी दूर के पड़ोसी के बारे में पूछ लिया हो। वह लापरवाही से बोला-‘‘नहीं यार। चल ठीक है। मैं करता हूं न तेरे को फोन थोड़ी देर में। ठीक है। तब बात करते हैं।’’ राखी हैलो-हैलो करती रही। उधर छुट्टन की आवाज फोन के स्पीकर पर आनी बंद हो गई। राखी ने अपने मोबाइल को ऐसे घूरा, जैसे मोबाइल में कोई तकनीकी खराबी आ गई हो। राखी जानती थी कि फोन कटा नहीं था, काटा गया था। वह धीरे से कुर्सी पर बैठ गई। मां की पुरानी तसवीर पर जमी धूल को देखने लगी।
धूल केवल चीजों पर नहीं जमती। हमारे रिश्तों में भी जम जाती है। ऐसी धूल जिसे जमता हुआ हम देख रहे होते हैं। लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाते कि उस धूल को हटा सकें। राखी की उलझन बढ़ती ही जा रही थी। उसने खुद से कहा-‘‘बचपन मंे हम ऐसे तो नहीं थे। चारों भाई-बहिन एक-दूसरे का कितना ख्याल रखते थे। चेहरा देखकर और आवाज की लय सुनकर जान लेते थे कि कोई क्यों परेशान है। किसी की चुप्पी को भांपकर जान लेते थे कि किसके मन में क्या चल रहा है। कौन क्या सोच रहा है। घर के सभी बड़ों की आदतों, रुचियों की हमें सटीक जानकारी रहती थी। लेकिन अब ऐसा क्या हो गया है। हम इतने बड़े कैसे और क्यों हो गये हैं? आज क्यों एक-दूसरे की चिंता को भांप नहीं पा रहे हैं? या भांप कर भी उस चिंता में साझेदारी नहीं निभा रहे हैं।’’ राखी ने कुर्सी छोड़ी और टहलने लगी। उसने फिर मां को फोन मिलाया। घंटी लगातार जा रही थी। उसे घंटी का स्वर बनावटी सा लगा।
कई बार हम किसी अपने को याद करते हैं। मोबाइल पर उस अपने का सुरक्षित नाम देखकर बात करना चाहते हैं। फिर नंबर डाॅयल करते हैं तो एक अजीब-सी अनुभूति होती है। कानों पर बजने वाली काॅलर ट्यून हमें बेहद अपनी सी लगती है। ये अपनापन... उसी अपने के फोन के आने पर महसूस नहीं होता, जितना उसे फोन करने से खुद को महसूस होता है। राखी बार-बार मां को फोन मिला रही थी। कान पर सुनाई दे रही मोबाइल टोन... राखी को डरा रही थी। राखी को लग रहा था, जैसे घंटी बार-बार घनघनाते हुए कुछ और ही सुनाना चाहती है। जिसे उसके तीनों भाई सुनना नहीं चाह रहे थे।
राखी ने अपने छोटे बच्चे को सहेली के यहां छोड़ा। पति को मनाया कि मां से शायद ये अंतिम मुलाकात हो। कुछ रुपए और मां की जरूरत का सामान जुटाया। मां की जरूरत का सामान जुटाने में उसे अच्छा-सा लगा। एक ऐसा भाव जो अपने बच्चों के लिए प्यारी चीजे़ं खरीदते समय भी कभी नहीं आया। इन सब झंझावतों में दस दिन और गुजर गए। पौ फटने से पहले ही राखी बस अड्डे पहंुच गई। पहाड़ी गीत उसके कान में बजने लगे। उसे अच्छा लगा। जैसे अपने इलाके में पहुंच गई हो। अचानक उसकी नजर टार्च और पारंपरिक लालटेन पर गयी। दुकानदार बोला-‘‘अब तो टार्च और लाॅलटेन का जमाना नहीं रहा बहन जी। मोबाइल में ही टार्च के बराबर रोशनी होती है। चार्जर वाली टार्च ने तो लालटेन और चिमनी वाले लैंप बाजार से बाहर कर दिये हैं। ये लालटेन भी मेरे पास बरसों से पड़ी है। मैं बिका हुआ सामान वापिस नहीं लूंगा।
राखी ने थोड़ी देर सोचा, फिर कहा-‘‘भैया। दे दो। जब तक बड़े-बूड़ें जिंदा हैं, उनके जमाने की चीजांे में ही उन्हें अपनापन नजर आता है। नई तकनीक के चीज़ें कब धोखा दे दें, कुछ पता नहीं। पर ये पुरानी चीज़ें कभी धोखा नहीं देतीं।’’ दुकानदार ने हां में सिर हिलाया। बस चालक ने हार्न बजाया। राखी बस में बैठ गई। देर शाम तक ही मैं मां के पास पहुंचुंगी। राखी ने सोचा।
पहाड़ी रास्तों में चलने वाली बसें भी पहाड़ी हो जाती हैं। कंडक्टर क्या और चालक क्या। सवारियों से घुल-मिल जाते हैं। पहाड़ के बाजार दो-चार दुकानों वाले भी होते हैं। इन छोटे-छोटे स्टेशनों पर सवारी के कहने से पहले ही बस खुद-ब-खुद थम जाती है। इक्का-दुक्का सवारियां या तो उतरती हैं या चढ़ती हैं। शहर से गांव में पहुंचने वाले बाजारी सामान से बस लदी होती है। कौन सा सामान किसका है, किस दुकान के पास उतारना है। कंडक्टर के साथ-साथ सवारियां भी जानती हैं। एक ही रूट पर चलने वाली बसों में बैठने वाली सवारियां भी रूटीन की ही होती हैं। राखी की तरह ऐसी सवारियां कम ही होती हैं जो सालों बाद बस पर बैठ रहे होते हैं।
राखी ने महसूस किया कि सवारियों से लबालब भरी बस को कोई जल्दी नहीं है। कोई भागम-भाग नहीं। सब साप्ताहिक चक्कर लगाते ही हैं। गांव से नाता नहीं टूटा है। आना-जाना लगा रहता है। साठ से सत्तर फीसदी सवारियां एक-दूसरे को जानती हैं। राजी-खुशी पूछ रही हैं। शहर में तो ऐसा नहीं होता। आॅटो हो या बस या रेल। सवारियां एक दूसरे से कहां बतियाते हैं। इस बस में तो पल भर में सवारियां एक-दूसरे से परिचित हो जा रही हैं। बातों-यादों का सिलसिला चल निकला है। कंडक्टर सहित चालक भी उनकी बातों में आनंद ले रहे हैं।
राखी ने देखा कि गांव-दर-गांव पानी आ गया है। बिजली है। कोर बैंकिंग सेवा देने वाले बैंक खुल गए हैं। छिटपुट दुकानें ही सही, लेकिन शहर की दुकानों में दिखने और बिकने वाला सामान यहां भी बिक रहा है। मोबाइल टाॅवरों से पहाड़ रंगे हुए हैं। बस में हर पांच-सात मिनट में कोई न कोई मोबाइल घनघना रहा है। वो भी कई बार मां का नंबर मिला चुकी है। कानों में घुल चुकी रिंग टोन सुनकर वह उदास हो रही है। राखी सोच रही है कि काश! उसकी मां भी फोन कर उसे पूछती कि बता कहां तक पहुंची है अब। जैसे दूसरी सवारियों के परिजन बार-बार फोन कर के पूछ रहे थे। फिर उसे याद आया कि मां को मोबाइल चार्ज करना भी कहां आता है। नंबर मिलाना भी नहीं। वो तो गांव का कोई उस तरफ आ जाता होगा तो मान-मनुहार कर अपना मोबाइल दिखवा लेती होगी। कई बार तो छाती से चिपका हुआ मोबाइल स्विच आॅफ हो जाता है मां का। कई बार बैटरी लो हो जाती है। राखी यह सब सोच कर मुसकराई, फिर परेशान भी हो गई।
राखी ने इस बार तय कर लिया था कि वो मां को मोबाइल के कई फंक्शन सीखाएगी। दो-तीन दिन रहकर उसकी जरूरत का और सामान खरीदकर घर भर देगी। अपनी सारी उलझनें दूर करके ही वापिस लौटेगी। क्या पता अब कब आना होगा। बस। मां की सेहत ठीक होनी चाहिए। वो कहीं बीमार न हो। उसका मन बार-बार कह रहा था कि सब कुछ ठीक नहीं है। मां को तकलीफ है। अब मां कान भी कम सुनती है। आंख भी कम देखती है। बस लगभग पांच बजे के आस-पास गांव की सड़क के किनारे पर रुकी। राखी ने अपने तीनों नग उतारे। बस आगे निकल गई। धार से नीचे राखी का मायका दिखाई दे रहा था। गांव से दूर उसका बचपन का घर धुंधलाता हुआ दिखायी दिया। जैसे उसे चिढ़ा रहा हो। राखी और उसके भाईयों का बचपन उसी घर में तो बीता था। उसे याद था कि जब वो पिछली बार आई थी तो आसमानी रंग की पुताई कर के गई थी। लेकिन उसे घर का रंग-रोगन गहरे हरे रंग का दिखाई दे रहा था। तभी तो पेड़-पौधों के बीच गौर से देखने पर ही उसे अपना घर दिखायी दिया। अचानक उसे बड्डन, मुंज्जे और छुट्टन की याद हो आयी। कल जब उसने तीनों को फोन कर के बताया कि वो गांव जा रही है। तो तीनों उसे नसीहत देने लगे। ये करना, वो मत करना। ये ले जाना। ठीक से जाना। बस का पता कर लेना। आदि-आदि।
राखी सोचने लगी। कैसे तीनों भाई ये बताना नहीं भूले कि वो मां के एकाउंट में हर महीने एक-एक हजार रुपया डालते हैं। जो नियमित कंप्यूटराइज्ड मां के एकाउंट में चले जाते हैं। छुट्टन ने तो यहां तक कह दिया कि वो इस महीने तक के हिसाब से बत्तीस हजार रुपये भेज चुका है। क्या मां को रुपए भेजना और उसे याद रखना अच्छा है? क्या मां को वक्त-जरूरत पर अपने बच्चों का संग-साथ नहीं चाहिए? क्या कोई मां सिर्फ रुपयों से जीवन काट सकती है? क्या हमारा जीवन इतना अहम् हो गया है कि जिसने हमें जीवन दिया, हम उसके लिए समय न निकाल सकें? राखी इन सवालों का जवाब खुद से पूछती हुई आगे बढ़ रही थी।
जाड़े के दिनों में दिन छोटे हो जाते हैं। रात जल्दी अपने पैर पसार लेती है। दिन की धूप अच्छी लगती है और रात को जल्दी से बिस्तर में घुस जाना भाता है। कई बार रात को नींद उचट गई तो जागते हुए भी बिस्तर छोड़ने का मन नहीं करता। हवा तेज बहने लगी थी। राखी का शरीर कांपने लगा था। उसे पता ही नहीं चला कि वो ठीक अपने घर के दरवाजे के सामने खड़ी है। दरवाजे पर सांकल चढ़ी थी और सांकल पर ताला जड़ा था। राखी खलिहान पर ही पसर गई थी। पैरों में करंट सा दौड़ रहा था। अंधेरा होने को था और मां का कुछ पता नहीं। आस-पास कोई घर भी तो नहीं। वो गांव के रास्ते से नहीं आयी। धार-धार होकर आयी थी। अन्यथा गांव में तो पता चल ही जाता कि मां है कहां। उसने आस-पास नजर दौड़ाई। एक बण्ठा और केतली बाहर थी। लोटा जल से आधा भरा था। पुरानी चप्प्लें, मां की पुरानी साड़ी तार पर बंधी थी।
राखी को यह समझने में देर तो नहीं लगी कि मां सुबह तो यहीं थी। आंगन पर रखे झाडू को देखकर राखी ने अनुमान लगा लिया कि उस झाडू से सुबह साफ-सफाई की गई है। इसका मतलब मां बिस्तर पर तो नहीं है। पर ये भी संभव है कि बहुत बीमार हो और किसी के घर पर लेटी हो और घर की सफाई किसी बच्चे से करवाई हो। तभी खलिहान की ओर आते रास्ते में एक साया सा मंडराया। अब लगभग अंधेरा हो ही चला था। साये को देखकर राखी ने पूछा-‘‘मां?’’
‘‘हां मेरे बच्चे। मैं ही हूं।’’ राखी की मां ने ही कहा। मां दौड़कर आयी और राखी से लिपट पड़ी। राखी को लगा जैसे धूप में सूखाए रजाई-गद्धों की गरमाहट मां की देह से आ रही हो। दोनों फूट-फूट कर रोने लगे। किस बात पर। ये दोनों नहीं जानते थे। जी भर कर रो लेनेे पर अब सिसकियों की बारी थी। सिसकियों के बाद आसंूओं को पोंछने की। फिर नाक में भर आये पानी से चिपकती हुई हवा को संभालने की। मां ने कहा-‘‘चल बेटा। पहले रोशनी करती हूं। कितने सालों बाद आयी मां की याद? है न? तूने कितने फोन किये रे मुझे। सब पता है मुझे। कितनी बार मन किया कि फोन उठा लूं। पर नहीं उठाया। मैं जानती थी, तभी तू आएगी। नहीं तो तेरा शहर और शहर की गृहस्थी कहां छोड़ते तूझे। बस तेरा ही मन करता है मुझसे बात करने को। और कोई नहीं रहा मेरा क्या? वो क्या कहते हैं इसे? मिसस काॅल न?’’ यह कहकर हंसने लगी। फिर बोली-‘‘जल्दी से हाथ-मुंह धो ले। वो पीछे एक गागर और रखी है। घाम से उसमें गरम-गरम सा होगा पानी।’’ यह कहकर उसने जल्दी से चाबी निकाली और दरवाजा खोलने लगी।
राखी ने हाथ-मुंह धोया। वो घर के चारों ओर का मुआयना करने लगी। तभी उसकी मां चाय बना कर ले आयी। अब बाहर घुप्प अंधेरा पसर चुका था। दोनों भीतर वाले कमरे में चले गए। राखी ने कमरे को गौर से देखना चाहा। वो जताना नहीं चाहती थी कि उसे कमरे की एक-एक चीज की टोह लेनी है। एक कोने पर टी.वी. रखा था। जो कभी पहले नहीं था। मां ने कभी फोन पर बताया भी नहीं। एक पुराना रेडियो ही रहता था मां के पास। अब तो टी.वी. के पास ही दूसरा एफ.एम.वाला नया रेडियो भी रखा हुआ था। पुरानी लालटेन एक तार में बंधी थी। मेज पर बैटरी वाली लालटेन रखी थी। बैटरी वाली टार्च भी मौजूद थी।
    मां जैसे सब जान रही थी। बोली-‘‘अब अकेले मन नहीं लगता तो ममता रख गई इस टी.वी.को। अरे। ममता राजू की बहू। वही राजू ....जो तेरी चोटी खींचा करता था। वो तो दिल्ली है। वहीं से ममता के लिए रंगीन टी.वी. ले आया, बस वो इस टी.वी.को यहां रख-छोड़ गई। कहने लगी, घर में पड़ा था, यहां काम आएगा। मैंने पैसों की बात की तो नाराज हो गई। आए दिन आ जाती है। यहीं सो जाती है। मेरा खूब ख्याल रखती है। बड़ी होशियार है।’’
चाय का गिलास हाथ में लिए राखी अब रसोई में चली गई। स्टोव की जगह अब गैस रखी थी। सोलर लालटेन, दो प्रेशर कुकर, तांबे की गागर नई थी। मां भी पीछे-पीछे चली आयी। कहने लगी-‘‘अरे कुछ खास नहीं है तेरी मां के पास। अब रहना है, तो जीना है। जीना है तो खाना है। खाना है तो सामान तो चाहिए न। अब नहीं होता मुझसे। बुढ़ापा भारी है। तीन महीने पहले तक तो गाय थी। कुछ बकरियां भी थीं। सब बेच दिया मैंने।’’ राखी कुछ न बोली। अदरक, काली मिर्च और तुलसी के पत्तों में बनी चाय से उसकी सारी थकान दूर हो गई थी। मां के दोनों कंधों पर हाथ रखते हुए राखी ने धीरे से कहा-‘‘चल मेरे साथ। कब तक अकेली रहेगी यहां।’’
मां ने राखी के सिर पर हाथ रखते हुए कहा-‘‘जब जाना था, तब नहीं गयी। अब नहीं। इस घर में तेरे पिताजी की, तेरी और तेरे भाईयों की ढेर सारी यादें जुड़ी हैं। जब तक चलूंगी..... तब तक चलूंगी। वहां शहरों में शरीर से कौन चलता है। मेरा चलना बंद हुआ तो मेरी सांस भी बंद हो जाएगी। चल.... मैं खाना बनाती हूं। तू थकी होगी। तू टी.वी. देख। यहां सारे चैनल आते हैं। तेरे शहर वाले सारे। मर्जी का देख ले।’’
‘‘नहीं मां। दोनों बनाते हैं न कुछ मिलकर। बातों ही बातों में खाना बन जाएगा।’’ राखी ने कहा। दोनों वहीं रसोई में पटरियों में बैठ गए। राखी ने मां को गौर से देखा-‘‘सत्तर से अधिक वसंत देख चुकी थी उसकी मां। चेहरे और माथे पर झुरिर्यों की कई लाईने एक-दूसरे पर चढ़ गयी थीं। मगर आवाज में झोल नहीं था। कमर झुकी नहीं थी। देह का रंग काला नहीं पड़ा था। चलते-फिरते और उठते-बैठते हड्डियां चरमरा नहीं रही थीं। राखी को लगा कि वो जो सामान शहर से लायी है, मां के लिए अब बेकार है। मां की जरूरतें अब वो नहीं, जो वो सोचती रही है। वो तो जमाने के साथ चल रही है। वो ही अपनी मां से कोसों दूर पीछे रह गई है।
दोनों ने मिलकर खाना बनाया और खाया। बरतन मांजे। दूध पिया। दीवान पर एक साथ लेटे और बातें करते रहें। बातें थीं कि खत्म ही नहीं हो रही थीं। कभी मां शुरू करती तो कभी राखी। देर रात राखी की आंख लग गई। तब जाकर बातों का सिलसिला टूटा। सुबह राखी उठी तो मां चाय बना कर ले आयी थी। घर-आंगन की सफाई कर चुकी थी। खलिहान के पास ही नल लग चुका था। दो गागर ताजा पानी ला चुकी थी। बाहर चूल्हे पर रखे कंटर से भाप निकलने लगी थी। रसोई में सब्जी के पकने की खुशबू बता रही थी कि मां को कहीं जाने की जल्दी है।  राखी ने चाय पी और बिस्तर छोड़ा। गरम किये गए पानी से नहा-धोकर वह तरोताज़ा हो गई। रसोई में गई तो मां रोटियां बना चुकी थी। राखी ने कहा-‘‘ये क्या मां। इतनी सुबह? मैं बना लेती न। अभी तो मैं यही हूं।’’
‘‘मुझे काम पर जाना है। दिन में आऊंगी एक घंटे के लिए। तू भात बना कर रखना। फिर पांच बजे के बाद ही लौटूंगी न।’’ मां ने नजरे बचाते हुए कहा। ‘‘मतलब? इतनी सुबह कहां जा रही है?’’ राखी चैंकी।
‘‘अरे। घर में खाली कब तक बैठना है। गांव में सौ दिन का रोजगार लगा है। सौ रुपये एक दिन के मिलते हैं। दस हजार कम नहीं होते। मेरे लिए काफी हैं। मैं शाम को जल्दी आने की कोशिश करूंगी।’’ मां ने हंसते हुए कहा। राखी को गुस्सा-सा आ गया-‘‘मां कितना पैसा चाहिए तूझे हां? मैं भी कुछ न कुछ तेरे एकाउंट में डालती हूं। तीनों भाई भी हर महीना हजार-हजार रुपया तूझे भेजते हैं। क्या वो सब काफी नहीं है तेरे लिए? हैं?’’
मां पहले तो मुस्कराई फिर उदास हो गयी। धीरे से बोली-‘‘कल तुम लोग पैसा भेजना बंद कर दो तो? तब क्या करूंगी मैं! और फिर मैं यहां किसी से भीख नहीं मांग रही हूं। कमर तोड़ मेहनत करती हूं। सारा गांव जानता है कि मैं किसी से एक पाई भी नहीं लेती। कोई मुझ पर चार पैसे खर्च करता है तो मैं उस पर आठ खरच देती हूं।’’ मां फिर सामान्य हुई। प्यार से बोली-‘‘तू चिंता मत कर। अभी सब ठीक है। जिस दिन शरीर साथ नहीं देगा तो फिर मेरे आठ-आठ हाथ हैं तो। हैं कि नहीं?’’
राखी के पास मां की बातों का अब कोई जवाब नहीं था। राखी सोचने लगी कि मां को औसतन चार हजार रुपये महीना हम लोग भेजते हैं। उन रुपयों का मां करती क्या है। मां की पासबुक देखनी पड़ेगी। मां काम पर जाने लगी। जाते-जाते कह गयी-‘‘दिन में हो सके तो बैंक चली जाना। जहां तुम्हारी बस रूकी थी न, वहीं पास में ही बैंक है। संदूक में पास बुक रखी है। बैंक न जाने कब से नहीं गई हूं। संदूक में दस-एक हजार रुपए हैं। वो जमा कर देना। घर में पैसे रखना ठीक नहीं है।’’
राखी मां के बारे में सोचने लगी। मां शरीर से बुढ़ा गई है लेकिन दिल और दिमाग से चुस्त है। हम लोग मन ही मन में जो कुछ भी सोचते हैं,उसे भांप लेती है। झट से वही बात कह देती है या उसके आगे की बात कह देती है। राखी ने संदूक से पासबुक निकाली। पास बुक में कई महीनों से लेन-देन ही नहीं हुआ था। राखी को विश्वास नहीं हुआ। जमा धनराशि के काॅलम में भाईयों के भेजे गए एक-एक हजार रुपये का विवरण था। राखी दंग रह गई कि मां ने अपने इस खाते से कोई भी निकासी नहीं की है। उसने हिसाब लगाया कि आखिरी एन्ट्री की अंकना तीस माह पहले की है। आखिरी एन्ट्री में दस हजार जमा किये गए थे। कुल जमा धनराशि पैसंठ हजार रुपये थे। राखी खुद हर महीने हजार-दो हजार रुपए भेजती ही है। कम से कम एक लाख बीस हजार रुपए की एन्ट्री अभी दर्ज होनी बाकी है। इस हिसाब से मां के एकाउंट में कम से कम एक लाख पिचासी हजार रुपए तो जमा हैं ही। राखी बड़बड़ाई-‘‘ये मां भी न। मरने के बाद और उलझनें पैदा करेगी। ’’
राखी धम्म से फर्श पर बैठ गई, जैसे पका हुआ आम धरती पर टपक पड़ा हो।000
-मनोहर चमोली ‘मनु’

11 फ़र॰ 2013

नष्ट हो जाएगा सूरज
-मनोहर चमोली ‘मनु’
‘‘अरे! चूंचूं इतनी सुबह? क्या बात है? सब ठीक तो है न?’’मीकू खरगोश ने चूंचूं चूहे से पूछा। चूंचूं चूहा सुबह-सवेरे मीकू के घर जो आ पंहुचा था।
चूंचूं ने जवाब दिया-‘‘बस ऐसे ही आ गया। सुबह-सवेरे हर कोई अपने घर पर मिल जाता है न। सो मिलने चला आया।’’
मीकू हंसते हुए बोला-‘‘अच्छा किया। लेकिन ये तो बताओ कि बात क्या है।’’
चूंचूं सिर खुजलाते हुए बोला-‘‘कई दिनों से एक ही चिंता सता रही है। सूरज अपनी एक तिहाई उम्र काट चुका है। कल क्या होगा, जब सूरज ही न होगा। सोचो। सारी दुनिया में अंधेरा छा जायेगा।’’
यह सुनकर मीकू जोर से हंस पड़ा। बहुत देर तक हंसता रहा। फिर चूंचूं से बोला-‘‘यार चूंचूं। तुमने तो सुबह-सुबह ही हंसा दिया। बहुत समय बाद इतना हंस रहा हूं।’’
चूंचूं ने झेंपते हुए कहा-‘‘मीकू भाई। इसमें हंसने वाली क्या बात है। मैंने क्या गलत कहा। मैं सही कह रहा हूं। सूरज एक दिन वाकई नष्ट हो जाएगा। कसम से।’’
मीकू खरगोश ने सिर हिलाते हुए कहा-‘‘तुम सही कह रहे हो। मानता हूं कि सूरज एक दिन नष्ट हो जाएगा। यह भी सही है कि सूरज अपनी एक तिहाई उम्र काट चुका है। एक दिन वह अपनी दो तिहाई उम्र भी काट चुका होगा। फिर एक दिन ऐसा आएगा कि वह वाकई अपनी सारी उम्र काट चुका होगा और फिर उसका अंत हो जाएगा।’’
‘‘तो फिर। मेरी बात पर तुम्हें इतनी हंसी क्यों आई?’’ चूंचूं ने नाराज होते हुए पूछा।
मीकू ने अपनी हंसी रोकते हुए कहा-‘‘बताता हूं। चूंचूं मेरे भाई। सूरज पांच अरब साल से इस धरती को रोशनी दे रहा है। लेकिन अभी वह दस अरब साल और चमकेगा। अब तुम्हें ये पता होना चाहिए कि एक साल में तीन सौ पैंसठ दिन होते हैं। सौ साल की एक सदी होती है।’’
चूंचूं ने टोकते हुए कहा-‘‘हां-हां। इकाई,दहाई,सैकड़ा,हजार,दस हजार, लाख,दस लाख।’’ यह कह कर चूंचूं चुप हो गया।
मीकू फिर से हंस पड़ा-‘‘चुप क्यों हो गए? आगे बोलो। भूल गए न? दस लाख के बाद एक करोड़, दस करोड़ फिर एक अरब और फिर दस अरब। समझे कुछ।’’
चूंचूं सिर पकड़ कर बैठ गया। सोचते हुए बोला-‘‘ये तो बहुत ज्यादा है। मैं बेकार ही परेशान हो रहा हूं।’’
मीकू ने समझाया-‘‘बिल्कुल अब तुम ठीक समझे। लेकिन तुम क्या जानते हो कि सूरज हमारी पृथ्वी का सबसे निकटतम तारा है। पूरी पृथ्वी में जितनी भी ऊर्जा का उपयोग होता है उसमें अधिकतर ऊर्जा सूरज से ही प्राप्त होती है। मजेदार बात यह है कि सूरज आग का गोला है। लेकिन यह एक गैसीय पिंड है। यानि यह न तो ठोस है न तरल।’’
चूंचूं सिर खुजलाते हुए बोला-‘‘अरे! ये तो मुझे पता ही नहीं था। रोटी के बराबर का सूरज इतना दिलचस्प है! वाकई!’’
मीकू खरगोश ने बताया-‘‘चूंचूं, जिसे तुम रोटी के बराबर समझ रहे हो न। वह बहुत विशालकाया है। सूरज के गोले का व्यास 14,00,000 किलो मीटर है। चैदह लाख किलोमीटर की दूरी की कल्पना करना मेरे वश की बात नहीं है। इसकी विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सूरज को अपनी धूरी पर एक चक्कर लगाने में 25 दिन लग जाते हैं।’’
‘‘अरे बाप रे! वाकई ये तो बहुत ही दिलचस्प जानकारी है मीकू भाई।’’ चूंचूं चूहे ने खुश होते हुए कहा।
मीकू ने कुछ याद करते हुए कहा-‘‘वैसे यह बात सही है कि सूरज एक दिन समाप्त हो ही जाएगा। सूर्य में मौजूद हाइड्रोजन का भंडार हर पल नष्ट होता रहता है और हीलियम बनता रहता है। हाइड्रोजन का यह भंडार एक दिन नष्ट हो ही जाएगा।’’
चूंचूं बोला-‘‘तो इसका मतलब हुआ कि धरती में अंधेरा छा जाएगा?’’
मीकू ने कहा-‘‘बताता हूं कि क्या होगा। हाइड्रोजन खत्म हो जाने पर सूरज फूलने लगेगा। यह ठंडा होकर एक विशालकाय लाल तारा बन जाएगा। सूर्य अपने आकार से ढाई सौ गुना बढ़ जाएगा। बुध, शुक्र और हमारी धरती को वह निगल लेगा। फिर वह सिकुड़ने लगेगा। सूरज में उपस्थित हीलियम  के परमाणु भारी परमाणुओं में बदल जाएंगे। इसके बाद सूरज सिकुड़ने लगेगा। फिर सूरज सफेद तारा बन जाएगा। समय के साथ-साथ इसकी सफेद चमक भी बंद हो जाएगी और यह एक काला पिंड बन जाएगा।’’
चूंचूं की आंखें फैल गई। वह बोला-‘‘अरे बाप रे बाप! फिर क्या होगा? हम कैसे जिएंगे?’’
मीकू हंसने लगा-‘‘अभी से चिंता मत करो। उससे पहले जीने के लिए दूसरी धरती खोज ली जाएगी। ऐसा मेरा विश्वास है।’’
चूंचूं ताली बजाते हुए कहने लगा-‘‘हां। विश्वास पर तो दुनिया कायम है।’’
दोनों हंसने लगे।
000

-मनोहर चमोली ‘मनु’,

30 नव॰ 2012

___________ फुलबगिया, पहला अंक, अक्टूबर 2012...'प्यार की बातें' -मनोहर चमोली ‘मनु’

प्यार की बातें
-मनोहर चमोली ‘मनु’
‘‘मैडम जी, ये अमन बार-बार प्यार-प्यार की बातें सुना रहा है।‘‘ अमन की बगल में बैठी हुई तूलिका ने शिकायत करते हुए कहा। अध्यापिका बच्चों की हाजिरी ले रही थी। चैंक पड़ीं। गुस्से से बोली-‘‘अमन। क्या हो रहा है? खड़े हो जाओ। क्या प्यार-व्यार लगा रखा है। मैं भी तो सुनूं।’’
अमन ने अंगुलियां गिनते हुए बताया-‘‘ मैं तीन से प्यार करता हूं।।’’
‘‘तीन से! कौन तीन?’’ अध्यापिका ने सख्ती से पूछा।
अमन सहम गया। हिचकते हुए कहने लगा-‘‘एक तो गौरेया से। जिसका घोंसला बाहर आंगन में है। मैं उसके बच्चों को दाना देता हूं न। अब वो मुझे देखकर चीं-चीं करते हैं। उसके बच्चे भी मेरा आना सुन लेते हैं।’’
अध्यापिका को हंसी आ गई। वह अपनी हंसी छिपाते हुए मन ही मन मुस्कराने लगी। फिर कड़क आवाज में पूछने लगी-‘‘दूसरे के बारे में भी तो बताओ।’’
अमन ने बताया-‘‘दूसरी गिलहरी है। मैं हर रोज उसे रोटी के छोटे-छोटे टूकड़े देता हूं। मैंने उसका नाम पुच्ची रखा है। पुच्ची कभी-कभी मेरे बैग में आकर छिप जाती है। और न वो अपना खाना जगह-जगह पर छिपाती है।’’
अध्यापिका के अलावा कक्षा के सभी सहपाठी अमन की बात गौर से सुन रहे थे। अध्यापिका ने पूछा-‘‘अब जल्दी से तीसरे के बारे में भी बता दो।’’
‘‘तीसरी तितली रानी है। पहले वो मुझे देखकर उड़ जाती थी। अब नहीं उड़ती। मैं तो बस उसके रंग-बिरंगे पंखों को देखता रहता हूं। उसे छूता भी नहीं हूं। अब तो तितली रानी मुझे देखकर उड़ती भी नहीं। मैं उससे खूब बातें करता हूं।’’ यह कहकर अमन चुप हो गया।
अध्यापिका ने हाजिरी का रजिस्टर बंद कर दिया। सभी बच्चों से कहा-‘‘प्यारे बच्चों अमन का प्यार सच्चा है। सही बात तो यही है कि हम जिसे प्यार करेंगे वो भी हमें प्यार करेगा। ये पेड़-पौधे और पशु-पक्षी भी हमसे प्यार चाहते हैं। अमन के लिए हम सभी ताली बजाएंगे।’’
कक्षा नन्हें हाथों से बज रही तालियों से गूंज उठी। अमन तूलिका को देख रहा था। तूलिका भी जोर-जोर से ताली बजा रही थी। 000

-मनोहर चमोली ‘मनु’

23 नव॰ 2012

बाल भारती, नवम्बर, 2012. बाल कहानी : 'दाना दो गौरेया को.' -मनोहर चमोली ‘मनु’

दाना दो गौरेया को  

-मनोहर चमोली ‘मनु’

    ‘‘दादाजी। आप आंगन में क्यों चावल के दानें बिखेर रहे हो? आंगन गंदा हो जाएगा। इन चावल के दानों को खाने के लिए  चिड़िया आएंगी और जगह-जगह बीट कर दंेगी। जरा सोचिए।  अगर आप रोज दस दाने ही आंगन में बिखेरोगे, तो एक महीने में तीन सौ दाने। इस तरह एक साल में तीन हजार छह सौ दाने बरबाद कर दोगे।’’ अखिल ने कहा। यह सुनकर दादा जी चैंक पड़े। फिर उन्हें हंसी भी आ गई। उन्होंने अखिल का कान प्यार से उमेठते हुए कहा-‘‘वाह! मेरे गुदड़ी के लाल। तुम्हारा दिमाग तो वाकई किसी वित्तमंत्राी की तरह चल़ रहा है। पर मेरे प्यारे बच्चे। जरा आप भी तो सोचिए। इस धरती पर सिर्फ इंसान ही इंसान रह जाएं और पशु-पक्षी समाप्त हो जाएं तो ?’’

    अखिल समझ नहीं पाया। दादाजी की ओर देखकर बोला-‘‘मैं समझा नहीं। चावल के दानों से पशु-पक्षी के समाप्त होने का क्या मतलब है?’’

    दादाजी ने हंसते हुए कहा-‘‘खा गए न गच्चा। मैं बताता हूं। अखिल। समूची प्रकृति में एक खाद्य श्रंखला है। एक जीव दूसरे जीव का भोजन है। यहां तक की घास-पात भी कई जीवों का भोजन है। जो जीव घास-पात खाते हैं। उन्हंे दूसरे जीव खाते हैं। उन दूसरे जीवों को तीसरे जीव खाते हैं।’’

    ‘‘ये तो मैंने भी पढ़ा है। मगर दादाजी। पक्षी नहीं भी रहे तो हमें क्या फर्क पड़ता है?’’ अखिल ने पूछा।

    दादाजी ने जवाब दिया-‘‘ये तुमने अच्छा सवाल पूछा। देखो। मैं आंगन में चावल के जो दाने डालता हूं। वो गौरेया पक्षी के लिए हैं। जब वे चावल के दाने खाती है, तो चहचहाती है। पक्षियों का चहचहाना किसे अच्छा नहीं लगता। अब तुम कहोगे, कि अगर हम चावल न भी दें तो भी पक्षी अपना दाना-पानी कहीं न कहीं से चुग ही लेंगी। फिर हम ऐसा क्यों करें? सुनो। गौरेया पक्षी हमारे  आस-पास रहने वाली चिड़िया है। हमारे घर-आंगन की चिड़िया है। लेकिन हम मनुष्य उसे खत्म करने पर तुले हुए हैं। बेटा। इसे बचाना जरूरी है। नहीं तो आने वाले समय में तुम गौरेया के बारे में सिर्फ किताबों में ही पढ़ पाओगे।’’

    ‘‘गौरेया को बचाना है! गौरेया को क्या होने जा रहा है?’’ अखिल झुंझला गया।

    ‘‘बेटा। अब हम बेहद आधुनिक हो गए हैं न। हमने अपने घरों के आस-पास के पेड़ ही काट दिये हैं। अब चिड़िया अपना घोंसला कहां बनाएंगी?  पहले घरों में छप्पर हुआ करते थे। छज्जे और रोशनदान हुआ करते थे। गौरेया  उनमें अपना घर बना लेती थी। उनका घोंसला हमारे आस-पास ही हुआ करता था। अब हमारे घरों में रोशनदान ही नहीं हैं। अब तो दो-तीन मंजिल वाले मकान बन रहे हैं। अब तुम ही बताओ। बेचारी गौरेया अपना नीड़ कहां बनाए?’’ दादाजी ने पूछा।

    अखिल ने बिना विचार किए जवाब दिया-‘‘ जंगल में बनाए और कहां।’’

    दादाजी झट से बोल पड़े-‘‘बेटा। अब जंगल ही कहां बचे हैं।  सुदूर के जंगल भी सिमटते जा रहे हैं। वैसे भी गौरया बेहद संवेदनशील होती है। उसे हम मनुष्यों के आस-पास रहना अच्छा लगता है।’’

    अखिल ने सोचते हुए पूछा-‘‘पर दादाजी अब तो मुझे गौरेया कभी-कभी ही दिखाई देती है। वे कहां चली गईं हैं?’’

    दादाजी ने गहरी सांस लेते हुए बताया-‘‘बेटा गौरेया ही नहीं, कई पक्षी धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। हमारे देश में पक्षियों की लगभग बारह सौ प्रजातियां हैं। लेकिन कई प्रजातियों के पक्षी सालों से नहीं दिखाई दिए। गौरेया को शोरगुल और कोलाहल पसंद नहीं। दिन-प्रतिदिन ध्वनि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। हमने कीटनाशकों का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। उससे भी गौरेया का जीवन खतरे में पड़ गया है।’’

    ‘‘कीटनाशक तो कीटों को मारने वाली दवाएं हैं न?’’ अखिल ने पूछा।

    ‘‘हां। तुम ठीक समझे। इन कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा उपयोग हो रहा है। यह कीटनाशक दवाएं कई  जीव-जंतुओं के जीवन को नष्ट कर देती हैं। गौरेया जब अंडे देती है, तब उसे प्रोटीन की आवश्यकता होती है। गौरेया के बच्चों को जिंदा रहने के लिए भी  प्रोटीन चाहिए। पक्षियों को प्रोटीन कीटों को खाने से मिलता है। मगर अब वे कीट तो हमने दवा छिड़क कर पहले ही समाप्त कर दिए हैं। जो कीट बचे भी हैं, उन पर कीटनाशक दवाओं का इतना असर होता है कि गौरेया उन्हें खाकर अपनी औसत आयु से बेहद कम जी पा रही है। पर्यावरण संतुलन में पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मगर तुम तो मुझे उनके लिए चावल के कुछ दानें डालने से भी मना कर रहे हो। तो बताओ फिर ये चिड़िया कहां जाएगी? कैसे जिंदा रहंेगी। क्या खाएंगी?’’ दादा जी अखिल से पूछा।

    दादाजी को उदास देखकर अखिल ने  एक पल की देरी नहीं की। वह मायूसी से बोला-‘‘साॅरी दादाजी। मुझे नहीं पता था कि हमारे दो-चार चावल के दानों से  गौरेया का जीवन बच सकता है।  अब ये काम आप मुझ पर छोड़ दो। आज से ही नहीं, अभी से मैं गौरेया को दाना दूंगा। ’’

    ‘‘लेकिन अखिल आंगन गंदा भी तो हो जाता है न। तब।’’ दादाजी ने अखिल को घूरते हुए पूछा।

    ‘‘ओह दादाजी। इसके लिए हम आंगन का एक कोना तय कर लेते हैं। सुबह का समय पक्षियों को दाना देने का सबसे अच्छा समय होगा। फिर मम्मी बाद में आंगन तो साफ करती ही है।’’ अखिल ने उपाय भी सुझा दिया।

    ‘‘यह ठीक रहेगा।’’ यह कहकर दादाजी ने अखिल का हाथ पकड़ लिया। अखिल दादाजी से लिपट गया।


- मनोहर चमोली ‘मनु’., भितांईं, पो0बाॅ0-23.जिला-पौड़ी गढ़वाल.पिन-246001. मोबा0-9412158688.

18 नव॰ 2012

बाल कहानी-'सब हैं अव्वल'. साहित्य अमृत- नवंबर 2012


सब हैं अव्वल

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-मनोहर चमोली ‘मनु’
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काननवन में हँसी-खुशी और धमा-चैकड़ी का माहौल देखकर आस-पास के वनवासी हैरान हो जाते। सुबह से रात होने तक उल्लास और आनन्द की गूँज चारों और सुनाई देती। काननवन में खुशियों का स्कूल जो खुल गया था। स्कूल जाने वालों के व्यवहार में तेजी से बदलाव दिखाई देने लगे। हर माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे थे। यही कारण था कि भालू के स्कूल में पढ़ने वालों का तांता लगा रहता।
क्या छोटा और क्या बड़ा। क्या पशु और क्या पक्षी। क्या मांसाहारी और क्या शाकाहारी। मेढ़क, साँप, चूहा, बिल्ली, शेर, बकरी, हाथी, बंदर, तितली, लोमड़ी, सियार, खरगोश, कुत्ता, गिलहरी और हिरन भी एक ही मैदान में सुबह-सवेरे प्रातःकालीन सभा में हाथ जोड़े खड़े दिखाई देते।
भालू खूब मन लगाकर पढ़ाता। पढ़ने वाले भी मन लगाकर पढ़ाई कर रहे थे। एक-दूसरे की मदद करते। समूह में सीखते। अपनी बातें साझा करते। स्कूल की गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते। सुनने की ललक बढ़ने लगी थी। बोलने की क्षमता में लगातार सुधार हो रहा था। अक्षरों को पढ़ने की गति बढ़ रही थी। हर कोई लिखना सीख रहा था।
सभी के दिन आनंद, मस्ती, उछल-कूद और भाग-दौड़ में गुजर रहे थे। फिर एक दिन अचानक भालू ने कहा-‘‘साल भर हो गया है। अब तुम्हारी परीक्षा होगी। तैयार रहिए।’’
कक्षा में सन्नाटा छा गया।
‘‘परीक्षा ! ये क्या है?’’ मेढक ने सिर खुजलाते हुए पूछा।
भालू को हँसी आ गई। चेहरे पर घबराहट लाते हुए बोला-‘‘परीक्षा ही तुम्हें पास-फेल करेगी। मतलब ये कि तुमने साल भर क्या सीखा। कितना सीखा।’’
अब खरगोश बोला-‘‘लेकिन हम सब तो समझ ही रहे हैं कि हम रोज कुछ न कुछ यहाँ नया सीख रहे हैं। तब भला ये परीक्षा की क्या जरूरत?’’
भालू ने डाँटते हुए कहा-‘‘चुप रहो। मैं पढ़ाता हूं और तुम पढ़ते हो। मैं सीखाता हूं और तुम सीखते हो। अब समय आ गया है कि सब जान लें कि तुम में से अव्वल कौन है?’’
‘‘अव्वल ! ये अव्वल कौन है?’’ छिपकली ने पूछा।
भालू ने बताया-‘‘परीक्षा ही तय करेगी कि तुम सभी में कौन सबसे अधिक होशियार है। साल भर स्कूल में पढ़ाया गया है। सिखाया गया है। समझाया गया है। परीक्षा से तय होगा कि तुम कितने बुद्धिमान बन सके हो। अब घर जाओ और परीक्षा की तैयारी करो। कल तुम्हारी परीक्षा होगी।’’
स्कूल से लौटते हुए सब सोच में पड़ गए। उनके चेहरे चिंता से भर गए। तनाव और भय के कारण वे हँसना-गाना भूल गए। वे एक-दूसरे से बेवजह तुलना करने लगे। निराशा और हताशा से भरा हर कोई एक-दूसरे से दूर-दूर चलने लगा। आज सुबह तक जो नाचते-कूदते स्कूल जा रहे थे, वे स्कूल से लौटते हुए एक-दूसरे को देखकर घबरा रहे थे। परीक्षा ने जैसे उनकी आजादी छीन ली हो। खुशियों की पाठशाला एक झटके में डर की पाठशाला बन गई। हर कोई रात भर सो नहीं सका।
सुबह हुई। सब बुझे मन से स्कूल पहुँच गए।
भालू ने मुस्कराते हुए कहा-‘‘परीक्षा यहीं मैदान में होगी। सब तैयार रहें।’’ हर कोई सिर झुकाए बैठा हुआ था।
भालू ने स्कूल की ऊँची दीवार की ओर देखते हुए कहा-‘‘इस दीवार पर जो चढ़ेगा। वही अव्वल माना जाएगा। सब दीवार की ओर दौड़े। बंदर, गधा और सियार उछलते ही रह गए। छिपकली झट से दीवार पर चढ़ गई।’’
चूहा उदास हो गया। धीरे से बोला-‘‘मेरे जैसे इतनी ऊँची दीवार पर कभी नहीं चढ़ पाएंगे।़’’
भालू ने पीपल के पेड़ की ओर देखते हुए कहा-‘‘इस पेड़ पर चढ़ो।’’ उड़ने वाले पक्षी पलक झपकते ही पेड़ की शाखाओं पर पँख पसारकर बैठ गए। हिरन, मेढक जैसे जीव-जन्तु अपना सा मुंह लेकर खड़े रह गए।
भालू ने फिर कहा-‘‘मैदान के चार चक्कर लगाओ। मैं सौ तक गिनती बोलूंगा। गिनती पूरी होने से पहले चार चक्कर जो लगाएगा वही अव्वल माना जाएगा। दौड़ो।’’
सब दौड़ने लगे। खरगोश, कुत्ता सबसे आगे थे। बेचारा कछुआ सबसे पीछे रह गया।
भालू ने एक नई घोषणा करते हुए कहा-‘‘मैदान के किनारे बड़ा सा पत्थर पड़ा है। हटाओ उसे।’’
हर किसी ने कोशिश की। पत्थर टस से मस न हुआ। हाथी झूमता हुआ आया और उसने पत्थर को सूण्ड से धकेल दिया। एक के बाद एक नई परीक्षा से सब तंग आ गए। हर परीक्षा में एक अव्वल रहता और बाकी मायूस हो जाते।
मधुमक्खी के सब्र का बांध टूट गया। वह बोली-‘‘मैं इस परीक्षा का बहिष्कार करती हूँ। ऐसी पढ़ाई से तो अनपढ़ रह जाना ही अच्छा है। ऐसी पढ़ाई, ऐसा स्कूल और ऐसा शिक्षक मुझे स्वीकार नहीं, जो कक्षा में सहभागिता के बदले गैर बराबरी की भावना विकसित करे। इस पढ़ाई को धिक्कारना ही अच्छा है।’’
मधुमक्खी की बात सबने सुनी। मैदान में सन्नाटा छा गया।
तितली ने मधुमक्खी की बात का समर्थन करते हुए कहा-‘‘मैं भी इस परीक्षा का विरोध करती हूँ।’’
फिर किसी ओर ने भी कहा-‘‘मैं भी।’’
दूर से कोई चिल्लाया-‘‘मैं भी।’’
अब कुछ एक साथ बोले-‘‘हम भी।’’
     फिर क्या था। सब एक साथ चिल्लाए-‘‘हम सब भी।’’
सब भालू की ओर दौड़े। भालू घबरा गया। वह भागकर जंगल में जा छिपा। काननवन का स्कूल बंद हो गया। अब सब प्रकृति से सीखने लगे। अपने अनुभवों से सीखने लगे। तभी से आज तक किसी भी जंगल में कोई स्कूल नहीं लगता। 000
Manohar Chamoli 'manu'