7 अक्टू॰ 2016

पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन बसा है मल्यो की डार में

पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन बसा है मल्यो की डार में

-मनोहर चमोली ‘मनु’

सुपरिचित लेखिका, संस्कृतिकर्मी, एक्टीविस्ट, जनांदोलनकारी गीता गैराला की किताब ‘मल्यो की डार’ महज़ एक रचनाधर्मिता का उदाहरण नहीं है। इस बहा
ने लेखिका बड़ी आसानी से और स्थाई तौर पर पाठक के अंतस में पहाड़ और खासकर पहाड़ी स्त्री के जीवन का समूचा रेखाचित्र अविस्मरणीय ढंग से अंकित करने में सफल हुई है।
160 पेज, डिमाई आकार, सुरक्षित कागज़, उम्दा छपाई, अक्षरों की बुनावट आँखों को भा जाने वाली है। अठारह संस्मरणनुमा रचनाएँ जो रवानगी के साथ-साथ पाठक के मन-मस्तिष्क में आसानी से पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन के आम पात्रों का चित्रण करने में सफल हुई हैं। बचपन को याद करते हुए बचपन का खिलंदड़पन यहां पढ़ने को मिलता है। लोक जीवन के साथ-साथ मास्टर जी का जीवंत चित्रण पूरे रेखाचित्र के साथ उभरा है। यह किताब लेखिका ने अपने जन्म स्थल भट्टी गाँव को समर्पित की है।
उन्हीं के शब्दों में-’भट्टी गाँव के पेड़-पौधों, पौन,पंछियों, ठुल दादी, दादी-दादाजी, माँ,चाचियों और भूली बिसरी सब सहेलियों के लिए जन्हें (जिन्हें) मैं साँस के साथ जीती हूँ।’
'ठीक ही कहती थी दादी हम बस मल्यों की डार ही तो हैं। चरने के लिए मैदानों की तरफ उड़ गए। पर मल्यो तो केवल जाड़े में भावर जाते हैं, घाम तापने। शीत रितु खत्म होते ही अपने डेरों में लौट आते हैं। ये हैं असली प्रवासी। हम खुद को प्रवासी किस मुंह से कहते हैं, हम भगोड़े हैं, भगोड़े, जो एक गए और दुबारा पलट के नहीं लौटे।’
यहां डार का अर्थ,प्रसंग और सन्दर्भ ही बदल गया। वाह! खैर समूची पुस्तक पठनीय है।
अठारह रचनाओं में विविधता है। यादें हैं। बचपन है। भोलापन है। माता-पिता के संस्कार दिखाई देत हैं। परवरिश के तौर-तरीके दिखते हैं। बचपन की मस्ती और मासूमियत में पाठक मुस्कराता है। ऐसे कई अवसर आते हैं कि पाठक भी लेखिका के भीतर जमी गहरी भावनात्मक संवेदनाओं के साथ खुद को खड़ा पाता है।
पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोकजीवन, जीवन के कष्ट, दुःख-दर्द, पीड़ाएँ, रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी दिक्कतें-संकट, भूख, घर में आम रोटी को मयस्सर घरेलू महिलाओं की दिनचर्या, पानी-घास-लकड़ी के साथ जूझता समूचा पहाड़ी जीवन और उसके घेरे में घूमती-घुमाती स्त्री। एक संघर्ष गाथा यहां पढ़ते हुए देखने को मिलती है।
एक हजार छःह सौ मीटर की ऊँचाई से अधिक के पहाड़ी जीवन को करीब से जानने वाला पाठक खुद-ब-खुद लेखिका के साथ यात्रा पर निकल पड़ता है। पहाड़ की फसलें, जंगली फल, खेत, लोकजीवन की रामलीला, गांव के शादी-ब्याह, पहाड़ की परम्पराएं, संगीत, गीत बारात, संस्कृति को लेखिका ने न जाने कब अपनी आंखों से इतना करीब से देखा। ऐसे जीवट और सूक्ष्म अनुभव ही किसी रचनाकार की रचनाओं में प्राण से फूंक देते हैं।
बहुत सारी खासियतों के साथ पाठक को कभी-कभी लेखिका जिद्दी भी दिखाई दे सकती है। कहीं-कहीं लेखिका भी मानवीय दुर्बलताओं के साथ खड़ी दिखती है। यह स्वाभाविक भी है। मास्टर जी अंथवाल के साथ-साथ नजीब दादा हर पाठक को अवश्य भाएगी। दोनों चरित्र समाज के आम चरित्र हैं।
एक ओर मास्टर जी स्कूल का, पढ़ाई का, गांव का पूरा माहौल बदलते हैं तो वहीं गंगा-जमुनी की संस्कृति का प्रतीक बने नजीब दादा समरसता, प्यार-मुहब्बत के पर्याय बन जाते हैं।
भूमिका प्रख्यात कथाकार सुभाष पंत ने लिखी है। उन्हीं के शब्दों में कुछ शब्द-‘जब उस अनचाही ठेट लड़की ने काॅपी पर स्याही से लिखना शुरु किया तो उसकी उंगलियां स्याही से नीली हो गई। बार-बार धोने के बाद भी, वह स्याही छूटती नहीं थी। मुझे लगता है कि वह स्याही उसकी उंगली से अब तक नहीं छूटी। छूट जाती तो ‘मल्यो की डार’ जैसी अनूठी रचना का जन्म नहीं होता।’
बतौर लेखिका गीता गैरोला लिखती हैं-‘जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है हर व्यक्ति अपने बचपन की तरफ बार-बार लौटता है, तो क्या मैं भी उम्र बढ़ने के साथ अपने बचपन की तरफ बार-बार लौटती हूं। बीते हुए लम्हों को फिर से जीने के लिए। नहीं जानती सच क्या है? पर मैंने उन सब यादों को लिखने की कोशिश की है।’
भाषा शैली बेहद सरल सहज है। कहीं-कहीं वह विस्तार लेती है। कहीं भावपूर्ण हो जाती है तो कहीं चुटीले अंदाज में पाठक को एकाग्र रखने में सफल रहती है। पहाड़ी शब्दों से लेखिका ने परहेज नहीं किया है।

सरलता इतनी कि ऐसे लगता है कि पाठक अपने आस-पास ही सारा वृतांत घटता हुआ देखकर पढ़ रहा हो। मल्यो की डार, वहीं पर पड़ा है समय, घने कोहरे के बीच, देवता का खेल, कुणाबूड, मेरे मास्टर जी, प्यारे चक्खू, कोटे की फंकी, नजीब दादा, चैमास, बिजी जा, स्याही की टिक्की, ओ ना मासी धंग, मौसम सुहाना है, एक रामलीला ऐसी भी, सामूहिकता का रिवाज, नखलिस्तान, गांव की तरफ शीर्षक से ही जाना जा सकता है कि इस एक पुस्तक में कितने रंग हैं।
कहन, शैली, भाव और तेवर के कुछ उदाहरण आपकी नज़र-
‘अचानक में ‘उई’ कह कर बैठ गई। उनीन्दी दादी को झकझोर कर बोली,‘‘दादी उठ तू अभी मेरी दो चोटी बना दे, सुबह चोटी बनाने में प्रभात फेरी के लिए देर हो जाएगी।’’ मेरा उतावलापन देा दादा जी जोर से हंसे और बोले, ‘‘बेटा अगर दादी तेरे बाल अभी बना देगी तो रात भर सोने के बाद सुबह तक बाल खराब हो जाएंगे। तू मुझ पर विश्वास करती है न, सो जो। मेरी चखुली (चिड़िया) सुबह तुझे जल्दी से उठा दूंगा। पभात फेरी में सबसे आगे तू ही झंडा उठाकर चलेगी।’’--- ’
‘मैं जब कभी बीमार होती, बड़ी दादी मेरी गुदगुदी पीठ में एक धौल जमा कर कहती,‘‘अरे इस गदोरी का कुछ नहीं होगा। लड़कियां जीने के मामले में बड़ी छित्ती होती हैं।’’---’
‘दूसरे प्रकार के मास्टर ऐसे होते कि मास्टर जी की बेंत हाथों पर पड़ती या पीठ पर, गहरी नीली लकीर उभर आती। पर हम आंखों के आंसू बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर पाते। गलती से आंसू बह गये और मास्टर जी ने देख लिया तो दूसरी बेंत लगनी निश्चित होती।----’
‘उनके हर काम में एक संगीतमय लय और रिदम होती। हम सब उनके चलने-बोलने, गाने-नाचने, काम के तरीकों की नकल करके उन्हें दिखाते। मास्टरजी हमारी नकल पर खूब हंसते और कमी होने पर सुधार करवाते। देखो मैं ऐसे नहीं, ऐसे चलता हूं। ऐसे गाता हूं, ऐसे बोलता हूं।---’
मल्यों टिहरी में मळयो (काले-सांवले जंगली कबूतर) कहलाए जाने वाले से जुड़ा शब्द और उसके साथ डार। मल्यों की डार किताब का शीर्षक चैंकाता है। कभी खेती किसानी में ये जंगली कबूतर अनगिनत झुण्ड के साथ फसल पर टूट पड़ते थे। कोदा,झंगोरा क्या और मुंगरी क्या या फिर खलिहान में रखी फसल क्या। चट कर जाते थे। तब इन्हें डार गाली की तरह देखा जाता था। यह प्रवासी पक्षी के तौर पर देखे जाते हैं। हालांकि ये पक्षी अधिकतर समय पहाड़ में ही बिताते हैं लेकिन घरेलू कतई नहीं है। पाठक मल्यों की डार को इस तौर पर भी आसानी से समझ सकते हैं कि स्वयं लेखिका ने एक जगह उल्लेख किया है-‘जब हम बहनें स्कूल जाती वो कहती ‘‘हे राम। चलगी मेरी मल्यों की डार।’’ उस दिन मल्यो भगाने के बाद मैंने पूछा-‘‘दादी तू हम बहनों को भी तो मल्यो की डर कहती है।’’ ‘‘हां बाबा, बेटियां मल्यों की डार ही होती है। अपने मैत में चार दिन रुकी और फिर चल देती हैं दूसरे मुलुक।’’
पुस्तक मल्यों की डार में आँचलिक शब्दों का वहीं पर कोष्ठक में देना बाधा पहुंचाता है। पाठक संदर्भ के साथ उनके अर्थ खोज लेते हैं। बेहद ठेट शब्दों की सूची नीचे या अंत के एक दो पेजों पर दी जा सकती थी। वहीं के वहीं देने पर कहीं-कहीं पठन के आनंद को कम महसूस किए जाने का अंदेशा होता है।
प्रथम संस्करण अजिल्द, 2015 है। मूल्य दो सौ रुपए है। आवरण चित्र प्रख्यात घुमंतू पत्रकार, छायाकार कमल जोशी जी का है। लेखिका चाहती तो पहाड़ और पहाड़ी जीवन से संबंधित कुछ जीवंत चित्र भी पुस्तक में शामिल कर सकती थीं। यदि कुछ चित्र शामिल होते तो वह चित्र किताब की यात्रा को ओर जीवंत कर देते। बहरहाल कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह किताब पाठकों को एक चिर-परिचित दुनिया में ले जाती है। कई अनुभूतियों का आस्वाद कराती है। ***
पुस्तक : मल्यो की डार
लेखिका : गीता गैरोला
सम्पर्क : 9412051745
मेल : gairolageeta11@gmail.com
मूल्य: 200 रुपए
पेज: 160
प्रकाशक : समय साक्ष्य, 15 फालतू लाइन, देहरादून 248001
दूरभाष : 0135-2658894
॰॰॰

-मनोहर चमोली ‘मनु’भितांई,पोस्ट बाॅक्स-23पौड़ी 246001मेल - chamoli123456789@gmail.com

4 अक्टू॰ 2016

बाल साहित्य संस्मरण रमाशंकर जी के संपादन में

बाल साहित्यकारों के बचपन में झांकती है अतीत के पन्नों से







































-मनोहर चमोली ‘मनु’
साहित्यकारों का बचपन अतीत के पन्नों से बज़रिए डाक मिली। कई क्षेत्रों में निपुण प्रख्यात बाल साहित्यकार रमाशंकर के संपादन में यह पुस्तक इन दिनों बेहद चर्चित है। आवरण राजभगत का है। यह साहित्यकरों के बचपन पर आधारित तीसरा खण्ड है। ज़ाहिर है कि इससे पहले दो खण्ड इसी भव्यता के साथ प्रकाशित हुए हैं।फ्लैप प्रख्यात बाल साहित्यकार उषा यादव ने लिखा है।
वह लिखती हैं-‘हर बचपन एक जैसा नहीं होता। समय तथा परिवेश की ज्यामितिक रेखाएं बच्चे की जीवन-यात्रा का पथ निर्दिष्ट करती हैं। वक़्त और हालात ही बच्चे के मन, उसके सोचने के ढ़ंग, उसके सपनों की उड़ान, उसके हौसलों की बुनियाद और उसकी कार्य शैली को निर्धारित करने वाले कारक हैं।’
इस पुस्तक में पैंतालीस साहित्यकारों का बचपन प्रकाशित हुआ है। अधिकतर बाल साहित्यकारों ने अपना बचपन याद कर उसे करीने से लिपिबद्ध किया है। सौ से अधिक साहित्यकारों का संस्मरणनुमा, आत्मकथात्मक बचपन पढ़ते-पढ़ते पाठक के समक्ष सायास ही रेखाचित्र उभर जाएंगे, इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह कहना जरूरी होगा।नौ पन्नों में रमाशंकर ने अपनी बात रखी है। अपनी बात ही नहीं रखी बल्कि संपादन करते समय वह जिन अनुभवों से गुजरे, साहित्यकारों का लिखा-छपा कहीं भी पढ़ा, उसे उन्होंने अपनी बात में स्थान दिया है।
रमाशंकर जी अपनी बात में लिखते हैं कि बचपन एक दस्तावेज होता है। एक ऐसा दस्तावेज जिसे हर कोई संभाल कर रखना चाहता है। बचपन को संजोजकर रखना हमारी जिमेदारी है। ये हमारे स्वर्णिम अतीत की यादें हमारी पीढ़ियों को प्रोत्साहित करती रहेंगी।अपनी बात में रमाशंक ने गिजूभाई बधेका का भी उल्लेख किया है। वह अपनी बात लिखते-लिखते बचपन के अनुभवों की भी बात करते हैं और आज के बच्चों की दुनिया की भी चर्चा करते हैं।अपनी बात में वे बालस्वरूप राही के एक पत्र की चर्चा भी करते हैं।
बालस्वरूप ने रमाशंकर को लिखा-‘‘तुमहारे लिए लेख लिखते हुए मुझे भी अपना गुजरा हुआ जमाना बहुत याद आया। कभी मुसका दिया, कभी आंखों में आंसू आ गये। बड़े से बड़ा आदमी अपने बचपन को कहां भूल पाता है।’’बाल साहित्य के पुरोधा प्रकाश मनु के पत्र का भी उल्लेख मन की बात में किया गया है।
प्रकाश मनु लिखते हैं-‘‘बाल साहित्य का संबंध बचपन से है और बचपन के बारें में सोचते ही मानो एक जादुई दुनिया के द्वार खुल जाते हैं। बचपन बड़े सपने देखने की उमर है, इसीलिए बचपन बड़ी संभावनाओं का नाम है। हमारा बचपन मानो तय कर देता है कि बड़ै होकर हमें क्या बनना है और क्या कर गुजरना है। इसीलिए सबका बचपन एक जैसा होकर भी बहुत अलग है और इतने आनंदपूर्ण रहस्यों से भरा हुआ कि बचपन की बात छिड़ते ही हम जैसे बहने लगते हैं और समय को कुछ होश ही नहीं रहता।’’
अपनी बात में सुभद्राकुमारी चैहान, महादेवी वर्मा, अमृतलाल नागर, चन्द्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’, शंकर सुल्तानपुरी, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, देवेन्द्र मेवाड़ी सहित छह और बाल साहित्य में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराने वाले साहित्यकारों की महत्वपूर्ण टिप्पणियां शामिल की गई है।
ये संग्रह न सिर्फ बाल पाठकों के लिए उपयोगी है, बल्कि बाल साहित्य में शोध करने वालों के लिए जरूरी है। यही नहीं पैंतालीस बाल साहित्यकार जिनका बचपन यहां जीवंत हो उठा है वे चवालीस बाल साहित्यकारों का बचपन पढ़ सकेंगे। बाल साहित्य में कल, आज और कल के साहित्यकारों के लिए भी यह विविधता भरे समन्दर में डुबकी लगाने जैसा है।फिलहाल तो मैं इसे पढ़कर कहीं हंस रहा हूं तो कहीं कुछ लिखने का मन हुआ जाता है। कहीं मन बेहद भावुक हुआ जाता है। कहीं मन-मस्तिष्क वहां पहुंच जाता है जहां कभी कल्पना भी न की थी।
साहित्यकारों में सन्तोष कुमार सिंह, डाॅ॰ शेषपाल सिंह ‘शेष’, बलराम अग्रवाल, सुभाष नीरव, डाॅ॰ सुनीता, शुकदेव प्रसाद, घमंडीलाल अग्रवाल, कुसुमलता सिंह, डाॅ॰ अमिताभ शंकर राय चैधरी, डाॅ॰ विमला भण्डारी, रेनू चैहान, भगवती प्रसाद द्विवेदी, रमेशचन्द्र पन्त, क्षमा शर्मा, राकेश चक्र, लायक राम मानव, स्नेह लता, कौशल पाण्डेय, डाॅ॰ दिनेश पाठक ‘शशि’, डाॅ॰ हेमन्त कुमार, राजेश उत्साही, अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’, ओमप्रकाश कश्यप, कमलेश भट्ट कमल, हेमन्त यादव ‘शशि’, संजीव जायसवाल संजय, सुधीर सक्सेना ‘सुधि’, डाॅ॰ जगदीश व्योम, डाॅ॰सुरेन्द्र विक्रम, नीलम राकेश, राजीव सक्सेना, डाॅ॰ दिनेश चमोला ‘शैलेश’, कमलेश पाण्डेय ‘पुष्प’, सुरभि बेहेरा, कल्पना कुलश्रेष्ठ, गुडविन मसीह, श्यामसुन्दर श्रीवास्तव ‘चमन’, डाॅ॰ देशबन्धु शाहजहांपुरी, रमाशंकर, मनोहर चमोली ‘मनु’, डाॅ॰ नागेश पाण्डेय ‘संजय’, डाॅ॰ ज़ाकिर अली रजनीश, डाॅ॰ कामना सिंह, डाॅ॰ मो॰ साजिद खान, डाॅ॰ मो॰ अरशद खान का बचपन का अविस्मरणीय बचपन पढ़ा जा सकता है।
उदाहरणार्थ मैं कुछ अंश यहां दे रहा हूं-
एक-‘स्कूल में लकड़ी का एक बक्सा था जिसमें पुस्तकें रखी रहती थीं। प्रधानाध्यापक उसमेंसे पुस्तकें पढ़ने को दिया करते थे। यही स्कूल की लाइब्रेरी कहलाती थीं।
‘दो-‘बच्चों की पंक्तियों में टाट-पट्टी पर बैठना, लिखने की पट्टी रखना, सूखी खड़िया से गुरुजी के द्वारा हिन्दी की वर्णमाला के कुछ अक्षर लिखवाना और फिर पानी में घुली खड़िया से कलम का प्रयोग करके अक्षरों को लिाना पढ़ाई का प्रारभ था।
‘तीन-‘हस्तलेख इतना गन्दा था कि घर और स्कूल दोनों जगह करीब-करीब रोजाना ही पिटाई होती थी। घर पर पिताजी और चाचाजी कान खींचते थे और स्कूल में अध्यापक।’
चार-‘उन दिनों कहकरा अखबारी कागज पर होता था, काली इंक में एक ही रंग में छपी पांच या छह पैसे की पुस्तक आती थी। जो मास्टर ककहरा पढ़ाते थे, वे अपनी मार के लिए बहुत जाने जाते थे। मैं चित्र देखकर अक्षर तो रट चुका था। मगर चित्रों के बगैर अक्षरों की पहचान दिमाग में बैठ नहीं रही थी।
‘पांच-‘मैंने बाज़ भी पाल था! मैं हाथ पर चमड़े का पट्टा लपेटकर उसे बिठाता था। ज़रा भी चूक हो जाती, तो उसके संगीन नुकीले पंजे कलाई में धंस जाते। वह मेरे पास बहुत दिनों तक रहा। उसे पकड़ने और पालने के सारे हुनर मुझे आज भी याद हैं। पर आज ऐसा लगता है जैसे बचपन में मैंने पक्षियों को परेशान करके पाप किया था।
’छह- मां के पास सोने जाती थी, तो वह मेरे ठंडे हाथों को अपने गरम पेट पर रखती थी जिससे कि वे जल्दी गरम हो जाएं। रात में कई-कई बार कंबल और रज़ाई उढ़ाती थी कि कहीं मुझे ठंड न लग जाए। तब कभी नहीं लगता था कि इसमें मां को कितनी परेशानी हो रही होगी।
हम बच्चों की सुविधा के लिए वह हर सुख कुरबान कर देती थी। बल्कि आज तो कोई इस बात को सुनकर चकित हो सकता है कि मैं इतनी बड़ी उम्र तक मां के पास सोती थी।’चाहता तो था कि पैंतालीस साहित्यकारों को पढ़कर सबके बचपन का कोई यादगार अंश यहां आप सभी के समुख रखूं। लेकिन इसमें समय भी लगेगा और पुस्तक को आप तक पहुंचाने की आतुरता रोके नहीं रुक रही है।
संपादक को छोड़कर आप में से यदि कोई मुझे उपर्युक्त अंशों के रचयिता का नाम बता सकेंगे तो मैं भी प्रसन्न हो जाऊँगा और मुझे पता लगेगा कि आप ने भी पुस्तक पढ़ ली है।बहरहाल तीन सौ चार पृष्ठों की यह पुस्तक बाल साहित्यकारों के लिए किसी ग्रन्थ से कम नहीं है। कागज़ की गुणवत्ता अच्छी है। फोन्ट भी बेहतर है। हार्ड बाउंड में पुस्तक है। मूल्य पुस्तक पर 550 अंकित है।कुल मिलाकर इसे अधिकतर पाठक पढ़ना जरूर चाहेंगे।पुस्तक: अतीत के पन्नों से, साहित्यकारों का बचपन
मूल्य: 550 रुपए
पृष्ठ: 304
आकार: डिमाई
संपादन: रमाशंकर
प्रकाशक: लहर प्रकाशन,778,मुट्ठीगंज,इलाहाबाद 211003
॰॰॰-मनोहर चमोली ‘मनु’
मेल-chamoli123456789@gmail.com
मोबाइल-09412158688

19 सित॰ 2016

पत्रकार बनाम विकार

पत्रकार बनाम विकार

-मनोहर चमोली ‘मनु’


मैं लेखकों के सम्मान समारोह में पहुँचा तो वहां बतौर एक पत्रकार मेरा सहपाठी मिला। उसने मुझे पहचान लिया। कई सालों बाद वह मिला। अजनबी शहर था। उससे मिल मैं खुश हुआ। मैंने हैरानी जताई तो वह कहने लगा-‘‘भइए। पत्रकार हूँ। चील की नज़र रखते हैं हम पत्रकार।’’ 

हम एक ढाबे में बैठ गए। मैं लेखक हो गया हूँ। यह जानकर वह खुश हुआ। वह कहने लगा-‘‘सुना है लेखक बड़े काईयाँ होते हैं। क्या यह सही है?’’ मैंने जो तर्क दिए, वह उससे सहमत नहीं था। वह बोल पड़ा-‘‘एक-एक रचना को चार-छह जगह छपवाते हो। क्या यह ठीक है? पुरस्कार-सम्मान के लिए जुगत लगाते हो?’’


मुझे भी मौका मिल गया। मैंने कहा-‘‘एक जमाना था जब प्रिन्ट मीडिया के पत्रकार अपनी ख़बरों के छपने और छप जाने के बाद उन पर होने वाले विमर्श के लिए जाने जाते थे। वो दिन लद गए जब अव्यवस्था पर आधारित किसी भी ख़बर का तत्काल संज्ञान लिया जाता था। तब एक्सक्लूसिव ख़बर पर बाई-लाइन मिला करती थी।’’

यह शब्दावली सुनकर पत्रकार मित्र हैरान था। फिर उसे याद आया कि अपन तो तह तक कि जानकारी रखते हैं। 

मैंने अपनी बात बढ़ाई-‘‘एक बड़े क्षेत्र में अमुक ख़बर का पत्रकार कई दिनों तक जन सरोकारों की लड़ाई का वीर योद्धा माना जाता था। आज स्थिति उलट है। क्यों? कितना कमा लेते हो?’’ 

पत्रकार मित्र के शब्द थे-‘‘आज अख़बार चिथड़ा कंपनी हो चुके हैं। मिशनरी पत्रकारिता बनिए की नौकरी हो गई है। पत्रकार विकार हो गए हैं। गांधी आश्रम का झोला और गांधीगिरी का स्वभाव बीती बात हो चली है। खादी का कुर्ता पत्रकारों के आचरण से मलिन हो गया है। मैं जब आज की ख़बर भेजता हूं तो मुझे वह ख़बर आने वाले कल के अख़बार में मिले न मिले, इसका पक्का पता नहीं रहता। आने वाले कल के साथ सूरज तो आएगा लेकिन मेरी नौकरी का वह दिन भी होगा कि नहीं! यह संशय बना रहता है।’’

मैंने उदासी से पूछा-‘‘लेकिन पत्रकारों की जीवन शैली तो कहती है कि वे बहुत मज़े में हैं !’’

मित्र ने लंबी सांस छोड़ते हुए कहा-‘‘कब्र में मुर्दे का हाल मुर्दा ही जानता है। अधिकतर अख़बार में काम करने वाले पत्रकार तेल पंप में काम करने वाले कार्मिकों से भी बदतर स्थिति में वेतन पाते हैं। ये ओर बात है कि तेल पंप वाला गाड़ियों की टंकियों में तेल भरता तो नज़र आता है। लेकिन हम पत्रकार क्या भर रहे हैं, पता नहीं। अरे! निजी चालकों को मिलने वाला वेतन नहीं मानदेय मिलता है।’’

वह बोलता रहा-‘‘अख़बार मालिक जानते हैं कि कुछ पत्रकार कस्बाई पत्रकारिता करते हुए और प्रेस कार्ड का हवाला देते हुए गल्ले से चीनी ऐवें ही उठा लेते हैं। गेहूं की बोरियां तक उठा लेते हैं। किसी भी होटल में घुस कर जलपान, भोजन और डिनर भी कर लेते हैं। आबकारी विभाग के साथ-साथ कस्बें की अंग्रेजी-देसी की शराब की दुकान से बिना नागा बोतलें उठा लेते हैं। अधिकारियों-पुलिसकर्मियों के साथ रोज-रोज ख़बरों की पड़ताल के बहाने उठना-बैठना कर रोज की चाय आदि वहीं घुप्प कर लेते हैं। पत्रकार वार्ताओं के दौरान पिठाई-सा लिफाफा पकड़ लेते हैं। बार-त्योहार में मिठाई बटोरते हुए चारों ओर दिखाई देते हैं। पहले तो कलम-डायरी मांगते थे। अब पत्रकार विज्ञापन के साथ-साथ व्हाट्स एप और फेसबुक चलाने के लिए इंटरनेट पैक की मांग तक कर लेते हैं।’’

मैंने कहा-‘‘ये तो बढ़िया है।’’

मित्र ने फिर लंबी सांस छोड़ी-‘‘क्या खाक बढ़िया है। क्या हम नहीं जानते कि एक आम आदमी भी अख़बार पढ़ते समय दस में नौ गालियां हम पत्रकारों को देता है। हम जहां से गुजरते हैं। हमारे गुजरने के बाद ही पीठ पीछे वह गालियों की लड़िया जला देता है।’’

मैंने कहा-‘‘मान्यता प्राप्त पत्रकारों की क्या हालत है?’’

मित्र उदास हो गया। कहने लगा-‘‘वहां तो और गफलत है। वे कुछ हैं जो बड़ी मेहनत से स्वतंत्र पत्रकार का तमगा लगाए हुए हैं। अच्छी खबरें बनाते हैं। पर उन ख़बरों पर असर क्या खाक होता है। आजादी के बाद कोई भी पत्रकार अपनी पांच खबर बता दे जिस पर व्यवस्था ने संज्ञान लेकर स्थिति कायापलट कर दी हो। चोरी-चकारी, अपराध, लूट, अपराध, सामाजिक वैमनस्य सब बढ़ा ही तो है। स्वतंत्र पत्रकारों को अब अपनी सदस्यता बचाए बनाए रखने के लिए खूब मशक्कत करनी पड़ती है। सूचना विभाग के साथ-साथ सूबे के राज्य लोक सूचना संपर्क विभाग के आला अफसरों की हंसी के साथ बेमेल हंसना पड़ता है। उनकी हां में हां मिलानी होती है। हां बस रोडवेज में यहां वहां यात्रा करने का कार्ड फोकट का मिला हुआ है बस। कोई मानदेय थोड़े न मिलता है!’’

मैंने पूछा-‘‘लेकिन गली-मुहल्लों से प्रकाशित पत्र-पत्रिका के संपादक क्या और पत्रकार क्या ! गाड़ी-घोड़ा-बंगला, बच्चों को कान्वेंट में पढ़ा रहे हैं। दो से तीन जगह जमीने ली हुई हैं। यह सब कहां से? कैसे?’’

मित्र ठहाके लगाकर हंसने लगा। कहने लगा-‘‘सब भ्रम है। कुछ सच्चाई भी है। अब रहने दो।’’

मैंने मित्रता का वास्ता दिया तो कहने लगा-‘‘हम पत्रकार कमजोर नस पकड़ते हैं। मंत्रियों की, संत्रियों की, बड़े-बडे रसूखदारों की। अधिकारियों की। बस होल ही गोल हो जाता है। प्रभाव में न आया तो ख़बर। प्रभाव में आया तो अपन का अभाव खल्लास।’’

मैंने मज़ाक में कहा-‘‘यदि जिन्हें आप गली-मुहल्ले के पत्रकार कह रहे हो, उनकी संपत्ति की जांच हो जाए तो?’’

मित्र सतर्क हो गया। कहने लगा-‘‘नप जाएंगे। एक बात और हम पत्रकार तभी तक शेर हैं, जब तक हमारे पास पत्रकारिता का तमगा है। जैसे ही हम अख़बार से निकाले जाते हैं तब हम पर कुत्ता भी नहीं भौंकता। और हां जब हम नपते हैं तो पुलिस बाघ बनकर हम पर टूट पड़ती है। जब तक जमानत-छुड़वा-छुड़वाई होती है, तब तक खूब बज पड़ते हैं। अब जिसके बजते हैं वो कहां बतायेगा कि हुजूर आते-आते बहुत देर कर दी। बेचारा कई दिनों तक मलहम-सेक करता है वह भी चुपचाप।’’

मैंने कहा-‘‘तुम कुछ ज़्यादा ही बोल रहे हो। नाम-हाम तो खूब रहती है। आपके बजे क्या?’’

वो इधर-उधर देखते हुए चिल्ला-सा पड़ा। कहने लगा-‘‘क्या खाक नाम-हाम है हमारी ! क्या बकत है हमारी? वो तो अच्छा है कि मुर्दा अपनी मुर्दा-पड़ोसी में यह नहीं जान पाता कि कितने आते हैं और कौन आते हैं। नहीं तो हमारी शवयात्रा में शोकसंतप्त जुटाने वाले जुटाना एक्सक्लूसिव ख़बर जुटाने से कम नहीं।’’

मैं उठकर जाने लगा। मित्र कहने लगा-‘‘यार बुरा मान गए। जैसे कि तुम खुद पत्रकार होंगे। इतना तो बुरा मुझे भी नहीं लग रहा है जो मैं खुद पत्रकार हूं। वो भी बाकायदा पत्रकारिता में नंबर एक के विश्वविद्यालय की डिग्री लेकर प्रशिक्षण पाया हुआ हूं। अगर सूबे के सभी पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता खगाल ली जाए तो अधिकतर हाई-स्कूल-इण्टर फेल पाए जाएंगे।’’

मैंने फिर कहा-‘‘यार। बिना पड़ताल किए कैसे बोल रहे हो? शरम करो।’’

वह हंसा। हंसता ही रहा। कहने लगा-‘‘यूं ही पत्रकारिता को लोकतंत्र का सशक्त स्तंभ नहीं कहा गया। वो दिन लद गए।  आज तो पत्रकारिता करने वाले को संस्कार की नहीं, शिक्षा की नहीं, अध्ययन की नहीं, संयम की नहीं, संतोष की आवश्यकता नहीं। आज तो वह जितना नीचे गिर सकता है, उसे गिरना पड़ता है। तभी तो वह कुछ लिखेगा। बुराई पर लिखने के लिए बुरा भी तो बनना पड़ता है। बुरा भी होना पड़ता है। पत्रकारिता कोई न्यायपालिका तो नहीं है न कि सैकड़ों रातें जागकर, कानूनों की पोथियां पढ़कर उसके द्वार के भीतर के लायक बनना होता है। हर मुकदमें में पढ़ना पड़ता है।’’

वह कुछ याद करता हुआ बोला-‘‘आज तो पत्रकार बाबू सा काम भी नहीं करते। जो छपवाना है, वो लिखकर लाना होता है। चार बजे से पहले लाना होता है। अब ख़बर छपवाने वाले को पहले खुद समझना होता है कि इन्ट्रों क्या होता है। हैडलाइन क्या बनेगी। खबर में क्या, क्यों, कैसे, कौन, कब, कहां किस तरह फिट होगा। चलता हूं। मूड बनाने का वक्त हो गया है। देखता हूं किस दरवाजे खड़ा होना होगा। शाम होते ही पेट जलने लगता है। और हां चाय के पैसे दे देना। क्या जेब में एक लाल वाला गांधी पड़ा है? बच्चे की फीस देनी है कल।’’

उसे पांच-पांच सौ के दो नोट देकर विदा किया। लेकिन मैं अब तक सोच रहा हूं। क्या पीत पत्रकारिता के भी हिस्से हो गए हैं। वैसे मैं जितने पत्रकारों को जानता हूं, उनमें से अधिकतर दूसरी नौकरी में चले गए हैं। रहे-बचे समाज में अपनी हैसियत-इज्ज़्त को बचाते हुए छटपटाते दीखते हैं। कुछ शराबी हो गए हैं। लेकिन ऐसे भी हैं जो आज भी अध्ययनशील हैं। मननशील हैं। सामाजिक अव्यवस्थाओं पर पसीजते हैं। जिनका आज भी रुतबा है। जिन्हें देखकर लोग अदब से सिर झुकाते हैं।

एक पत्रकार मित्र से मिलने उसके घर गया। उसका परिवार ससुराल गया हुआ था। आवाज दी तो वह भीतर से बोला-‘‘चले आओ। खुला है।’’ मैं अंदर गया। देखा साहब बिना दरवाजा बंद किए हग रहे हैं। बदबू से घर सड़ांध मार रहा है। मैंने नाराजगी जताई। कहा-‘‘हद है, दरवाजा तो बंद रखो।’’

वह तपाक से बोला-‘‘बारह घंटे का किया-धरा खुद काहे सुंघूं?’’ 

मैंने उसके घर के सारे पंखें चालू किए। वह कहने लगा-‘‘रहने देता। अगरबत्ती जलाता हूं। क्या करें धन्धा ही ऐसा है। सुबह उठते समाचार में नकारात्मक ख़बरें पढ़ता हूं। नकारात्मक ही भेजता हूं। समाज के प्रति नकारात्मक सोचते-सोचते खुद भी नाकारा हो गया हूं। कभी-कभी अपने पेशे पर शरम आती है और खुद पर भी।’’

मैं क्या कहता। एक जनहित की ख़बर बताने उसके द्वार पर गया था। बताई भी। एक महीने बाद देखा पत्रकार उस संबंधित विभाग के आला अफसर की ही गाड़ी में बाजार में घूम रहा है।

अब तक सोच रहा हूं कि यह मित्र किन पत्रकारों की बात कर रहा था। क्या आप भी पत्रकारों से कुछ वास्ता रखते हैं? यदि हां तो आपका अनुभव क्या कहता है? 
॰॰॰
(विधा: व्यंग्य)
-मनोहर चमोली ‘मनु’,डिप्टी धारा मार्ग,पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड।  

12 अप्रैल 2016

नन्हे सम्राट, मई 2016. वृक्ष कथा: कौन बढ़ेगा आगे कौन रहेगा पीछे?

नन्हे सम्राट, मई 2016.


वृक्ष कथा: कौन बढ़ेगा आगे कौन रहेगा पीछे?


-मनोहर चमोली ‘मनु’


हमेशा की तरह शहजादा सलीम किसी की मदद कर वापिस तिलस्मी नदी के किनारे आ पहुंचा। रात भर घोड़ पर सवार शहजादा सलीम थक चुका था। वह चाहता था कि भोर होने से पहले वह कुछ पल आराम कर ले। उसने अपने घोड़े को एक पेड़ के तने से बांधा और नदी किनारे आरामदायक घास पर आराम की मुद्रा में लेट गया। कुछ ही क्षणों में उसे नींद आ गई। वहीं अपने नियत समय पर पौ फटते ही समूचा वन क्षेत्र पक्षियों के कलरव से गूंजने लगा। पूरब की ओर क्षितिज लालिमा लिए हुई सुबह होने का संकेत दे चुका था। अचानक शहजादा सलीम का घोड़ा हिनहिनाने लगा। किसी खतरे की आशंका के चलते शहजादा उठ खड़ा हुआ। उसने झट से अपनी तलवार खींच ली। शहजादे ने यहां-वहां देखा लेकिन उसे कोई नहीं दिखाई दिया। वह उनींदी में उठा और नदी की ओर चल पड़ा। वह भूल गया था कि तिलस्मी नदी का जल पीना खतरे से खाली नहीं। वह पानी की छपकी अपने चेहरे पर डालकर तरोताज़ा होना चाहता था। वह जैसे ही नदी के तट पर पहुंचा और जल की ओर झुका ही था कि एक पुरुष स्वर ने उसे रोक दिया। स्वर था-‘‘हे युवक। यह तिलस्मी नदी है। जल को छूना खतरे से खाली नहीं है। मुझे देखो, मैं यहां वृक्ष बना खड़ा हूं। क्या तुम भी वृक्ष बनना चाहोगे।’’

शहजादा ठिठका और दूसरे ही क्षण उसने अपने कदम पीछे खींच लिए। वह बोला-‘‘ओह! थकान ने मेरे सोचने-समझने की ताकत भी छीन ली। मैं तो इस तिलस्मी नदी के स्वभाव को जानता हूं।’’ शहजादा वृक्षों की ओर देखकर बोला-‘‘हे वृक्ष बन चुके पुरुष अपना परिचय दो। यह भी बताओ कि तुम वृक्ष कैसे बन गए? मैं शहजादा सलीम हूं।’’

स्वर ने कहा-‘‘शहजादा सलीम मेरा अभिवादन स्वीकार करें। मैं चतुरसेन हूं। काशीपुर के राजा केशवराज का सलाहकार। मैं किसी बुद्धिमान की तलाश में यहां से गुजरा और प्यास के चलते इस तिलस्मी नदी का जल पीने से बरगद का वृक्ष बन बैठा। मैं जिस समस्या के चलते यहां तक पहुंचा, उसी समस्या के निराकरण के पश्चात ही मुझे वृक्ष रूप से मुक्ति मिल सकेगी।’’

शहजादा सलीम बोला-‘‘आप तो सलाहकार हैं। फिर किसी बुद्धिमान की तलाश क्यो?’’

बरगद के वृक्ष से आवाज आई-‘‘शहजादे। काशीपुर के राजा केशवराज के दो राजकुमार हैं। एक का नाम है उदयराज है। दूसरे का नाम कंवलराज है। काशीपुर के राजा केशवराज किसी एक को राजगद्दी सौंपना चाहते हैं। पिछले एक बरस से उदयराज और कंवलराज काशीपुर के भ्रमण पर थे। जव वे लौटे तो राजमहल के मुख्य मार्ग में आने से पूर्व दोनों के रथ आमने सामने आ गए। दोनों के सारथी एक दूसरे को रास्ता देने क अनुरोध करने लगे। रास्ते से एक को अपना रथ पीछे कर हटना होगा, तभी दूसरा रथ मार्ग पर आगे बढे़गा। दोनों राजकुमार एक दूसरे को रास्ता देने पर अड़ गए। ’’

शहजादा सलीम मुस्कराया। कहने लगा-‘‘फिर क्या हुआ?’’
बरगद के वृक्ष से आवाज आई-‘‘शहजादे। दोनों के रथ आमने-सामने आज भी खड़े हैं। उदयराज और कंवलराज रथ से उतर कर राजमहल जा पहुंचे लेकिन किसी को भी अपना रथ पीछे हटना मंजूर नहीं था। अब राजा केशवराज के समक्ष समस्या यह है कि वह यह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि मार्ग पर खड़े दोनों रथों के किस सारथी को अपना रथ पीछे करना होगा और किसे पहले आगे बढ़ने का सममान मिलेगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘ओह! तो यह वर्चस्व को लेकर प्रतिष्ठा-मान-समामान का प्रश्न बन गया है। मुझे इन दोनों राजकुमार के स्वभाव और विशेषताओं के बारे में विस्तार से बताओ।’’  

बरगद के वृक्ष के भीतर से चतुरसेन ने दोनों राजकुमारों के बारे में शहजादा सलीम को विस्तार से बताया। चतुरसेन ने कहा-‘‘शहजादे सलीम। मुझे यकीन है कि आप मुझे वृक्ष रूप से मुक्ति दिला सकोगे। इस तिलस्मी नदी ने मुझे शाप दिया है कि जब तक राजकुमारों के रथ न्यायसंगत और तर्कसंगत रूप से उन दोनों राजकुमारों के संतुष्ट होने पर आगे बढ़ेंगे तभी मैं वृक्ष काया से अपने असले रूप में आ सकूंगा। जैसे ही यह होगा, मैं चतुरसेन हो जाउंगा और आपके आने पर ही यहां से प्रस्थान करूंगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘आचार्य चतुरसेन। मैं पूरा यत्न करूंगा। आप तो मुझे शुभकामनाएं दें।’’
बरगद का वृक्ष झूम उठा। वृक्ष के भीतर से चतुरसेन बोला-‘‘मैंने जिस तरह से सारी कथा आपको सुनाई है। तत्पश्चात जिस कौतूहल और जिज्ञासा से आपने राजन और राजकुमारों के बारें में विस्तार से जानना चाहा है निश्चित रूप से आप संकरे मार्ग में रुके हुए उन दोनों राजकुमारों के रथ को उचित मान-सममान देकर आगे बढ़ने के लिए बाध्य कर देंगे। अविलंब जाओ। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। आप चतुरसेन का नाम लेंगे तो राजन आपको सीधे निजी कक्ष में बुलाएंगे। मुझे पूरा भरोसा है।’’

दूसरे ही क्षण शहजादा सलीम अपने घोड़े पर सवार था। सलीम का घोड़ा तेज गति से काशीपुर की ओर बढ़ने लगा। 
वही हुआ। शहजादा सलीम महल के द्वार पर पहुंचा ही था कि द्वारपाल ने रोकते हुए पूछा-‘‘हे। अजनबी घुड़सवार आप बिना राजा की अनुमति के राजमहल में प्रवेश नहीं कर सकते। कृपया पहले अपना परिचय दें।’’

शहजादा सलीम बोला-‘‘मुझे चतुरसेन ने भेजा है। मैं तिलस्मी नदी के तट पर बरगद का वृक्ष बन चुके चतुरसेन का मित्र सलीम हूं। समय कम है। मेरी सूचना राजन तक पहुंचा दें। यदि वे मिलना चाहेंगे तो उचित है अन्यथा मैं लौट जाउंगा।’’

द्वारपाल ने दौड़कर सूचना राजा केशवराज को दी। दूसरे ही क्षण महामंत्री दौड़ता हुआ द्वार पर आ पहुंचा। वह बोला-‘‘सलीम। अभिवादन। हमारे राज्य में आपका स्वागत है। राजन अपने शयनकक्ष में ही आपसे मिलना चाहते हैं। चलिए शयनकक्ष के द्वार तक मैं आपको छोड़ सकता हूं।’’ शहजादे का घोड़ा अस्तबल के रक्षक ने अस्तबल तक सुरक्षित पहुंचा दिया। वहीं दूसरे ही क्षण शहजादा सलीम राजा केशवराज के निजी शयनकक्ष में पहुंच गया था। राजा केशवराज ने बड़ी आत्मीयता से स्वागत किया। सारा किस्सा जानकर शहजादा सलीम ने राजन का ढाढस बंधाते हुए कहा-‘‘राजन। कल सुबह दोनों राजकुमारो सहित मुझे आपके राज्य के चारों दिशाओं के चालीस-चालीस प्रबुद्ध नागरिक भी उस संकरे मार्ग पर उपस्थित चाहिए, जो दोनों राजकुमारों के काम-काज से वाकिफ हों।’’ राजा केशवराज बोले-‘‘आप चिंता न करें शहजादे सलीम। सब कुछ आपके अनुसार ही होगा।’’

सुबह हुई तो उसी संकरे मार्ग पर राजकुमार उदयराज और कंवलराज अपने अपने रथ पर सवार हो गए। मंत्री,महामंत्री,राजपुरोहित,महारानी और स्वयं राजा केशवराज भी उस मार्गस्थल पर आ पहुंचे। दोनों सारथी पहले की तरह अपने-अपने रथों पर सवार हो गए। राज्य काशीपुर की चारों दिशाओं से आए नागरिक भी यहां-वहां खड़े हो गए। शहजादा सलीम भी अपने घोड़े पर सवार था। 
शहजादा सलीम ने सारथियों से कहा-‘‘अपने अपने रथ आगे बढ़ाइए।’’

राजकुमार उदयराज का सारथी बोला-‘‘रास्ता संकरा है। एक रथ को पीछे हटकर रास्ता छोड़ना होगा। तभी दूसरा रथ आगे बढ़ सकेगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘तो फिर एक रथ पीछे हटे और दूसरे को रास्ता दे दे।’’
अब कंवलराज का सारथी बोला-‘‘यही तो समस्या है। यही तो तय होना है कि किस राजकंुवर का रथ आगे बढ़े और किस राजकुंवर को अपना रथ पीछे करना होगा। समस्या तो जस की तस बनी है।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘जिस रथ की नक्काशी बेहतरीन है। बहुमूल्य है। उसे आगे बढ़ने दो।’’
स्वर्णकार बुलाए गए। आंकलन किया गया। यह क्या! दोनों ही रथ एक समान मूल्यवान निकले।
शहजादा सलीम बोला-‘‘जो राजकुमार सदाचारी है,उसका रथ आगे बढ़ेगा।’’

राजपुरोहित बुलाया गया। आचार्य बुलाए गए। उनके मूल्यांकन के आधार पर दोनों राजकुमार एक समान सदाचारी पाए गए। 
शहजादा सलीम बोला-‘‘जो आयु में छोटा है, वह बड़े को रास्ता दे। बड़े के रथ को रास्ता दिया जाएगा।’’
महारानी आगे आईं। कहने लगी-‘‘उदयराज और कंवलराज जुड़वा है। वह ठीक एक ही घड़ी में पैदा हुए हैं। रूप, भार और सौंदर्य में भी वे एक समान हैं।’’
शहजादा सलीम ने कहा-‘‘तो ठीक है। अब निर्णय रथ के सारथी करेंगे। पिछले एक मास से दोनों राजकुमार राज्य का भ्रमण कर रहे थे। सारथी पल-पल अपने-अपने राजकुमार के साथ थे। वे ही बताएं कि उनके राजकुमार की क्या खास विशेषता एक राजा के तौर पर वे देखते हैं।’’

राजकुमार उदयराज का सारथी कहने लगा-‘‘मेरे राजकुमार महान हैं। वे शठे शाठ्यं समाचरेत् की नीति का पालन करते हैं। दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करते हैं। भले के साथ भला और बुरे के साथ बुरा करते हैं।’’ उपस्थित जन समुदाय में कुछ ने करतल ध्वनि से राजकुमार उदयराज का पक्ष लिया। 
अब कंवलराज के सारथी ने कहा-‘‘मेरे राजकुमार अच्छे का साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और बुरे के साथ भी अच्छा व्यवहार करते हैं। यह बुरों को भी अच्छा बनाने का सफल प्रयास करते हैं। इन्होंने कई अपराधियों के साथ अच्छा व्यवहार कर उनका मन जीता है।’’ यह क्या! इतना सुनते ही चारो दिशाओं से आई प्रजा कंवलराज के पक्ष में जयकरे लगाने लगी। वहीं दूसरी विचित्र बात यह हुई कि उदयराज ने अपने सारथी को आज्ञा देते हुए कहा-‘‘सारथी। हमारा रथ पीछे करो। आगे बढ़ने का पहला हक भ्राता कंवलराज का है।’’
दूसरे ही पल उदयराज के सारथी ने रथ पीछे हटाया। संकरे रास्ते के एक किनारे पर रथ को खड़ा किया, वहीं राजकुमार कंवलराज के रथ को मार्ग खुला मिला और वह आगे बढ़ता चला गया। 

पूरे प्रकरण की साक्षी जनता शहजादे सलीम को आदर भाव से निहार रही थी। इससे पहले कि राजा केशवराज शहजादे सलीम को धन्यवाद कहते, वह तेज गति से अपने घोड़े पर सवार होकर तिलस्मी नदी की ओर बढ़ चुका था। शहजादा सलीम जानता था कि राजा केशवराज का सलाहकार चतुरसेन बरगद के वृक्ष का रूप त्यागकर अपने मनुष्य रूप में आ चुका होगा। इससे पहले कि तिलस्मी नदी के आस-पास चतुरसेन के साथ कोई और अप्रिय घटना घटे, वह उसे सुरक्षित उस तिलस्मी क्षेत्र से बाहर जो निकालना चाहता था।  
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Manohar Chamoli 'manu'

10 अप्रैल 2016

जनवरी 2016 अपूर्व उड़ान

जनवरी 2016 अपूर्व उड़ान का दूसरा अंक है। आवरण देखते ही बनता है। चित्रांकन एवं ग्राफिक्स आशुतोष के हैं। विशुद्ध रूप से यह आवरण बालमन का ही है। बच्चों की दुनिया से लिया गया है। पतंग आज भी कौतूहल का विषय है। जो उड़ाना जानते हैं और जो नहीं भी। आवरण पत्रिका के नाम से मेल भी खाता है। 60 पेज की बहुरंगीय मासिक पत्रिका में नया साल 2016 का कैलेण्डर भी है। जिसमें तारें ज़मीन पर के दर्शिल को आसानी से पहचाना जा सकता है।

इस अंक में सात कहानियां,पांच कविताएं,दो चित्रकथाएं,छह स्थाई स्तंभ,आठ बच्चों के लिए खेल-खेल में सीखने विषयक गतिविधियां हैं। एक थीम स्टोरी भी है। छह विविध रचनाएं हैं, जिनमें से अधिकतर बाल सुलभ हैं।

संपादकीय सरल है। सहज है, आम भाषा में लिखा गया है। बच्चों से बात करता हुआ नज़र आता है। ठीक भी है। अपूर्व उड़ान ने मान लिया है कि यह पत्रिका बच्चों के लिए है बच्चों के लिए लिखने वालों के लिए नहीं। संपादकीय के बहाने संपादक राजेन्द्र प्रसाद तिवारी कई सारी बातों को आसानी से कह जाते हैं। वह अपनी बात सर्दी से शुरू करते हैं। नये साल की खुशबू भी संपादकीय में है। वहीं वह बच्चों को भारत के बारे में सोचने का सादा सा नज़रिया भी प्रस्तुत करते हैं। वह बच्चों को कमतर नहीं आंकते, न ही कुछ विशेष बनने की अपील करते हैं। वह तो बस इतना ही कहते हैं कि तुम्हारे भीतर प्रतिभा की कमी नहीं है। कहना होगा कि चुलबुली दुनिया के साथ-साथ पत्रिका अपने वैज्ञानिक नज़रिए के साथ बच्चों के मन में गहरी पैठ बनाएगी।

पांच पाठकों की चिट्ठी अंक में हैं। मज़ेदार बात यह है कि पांचों चिट्ठियां बच्चों ने लिखी हैं। कक्षा नौ तक पढ़ने वाले बच्चों के मन की आवाज़ चिट्ठियों में गूंजती है। पवन शर्मा ने अपनी थीम स्टोरी में सेवा के भाव को प्रमुखता दी है। दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चों में सेवा का भाव चरम पर होता है और सबसे अधिक होता है। वह खेल-खेल में ही घर के अंदर ही कई किलोमीटर की यात्रा कर लेते हैं। बिना थके और बिना रुके। पांच युगपुरुषों के परिचय के साथ सेवा का भाव करीने से संजोया गया है। तीन समाचार जो प्रत्यक्ष तौर पर बच्चों से ही जुड़े हुए हैं,शामिल किये गए हैं। एक चित्रकथा विवेकानंद पर गतांक से आगे चल रही है। चित्रकथा के चित्र बालमन के अनुरूप बने हैं। अक्षरों का आकार भी बालमन के अनुसार रखा गया है। मुस्कुराइये के तहत चार चुटकुले हैं। विज्ञान कथा कलैण्डर पर है। इसे जाने-माने बाल साहित्यकार एवं विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने सरल एवं रोचकता के साथ लिखा है।

मंगरूराम मिश्र, शांति अग्रवाल, डाॅ॰ फहीम अहमद, पूर्णिमा वर्मन, विनोद भृंग की कविताएं गुदगुदाती हैं। कहानियों में प्रख्यात बाल साहित्यकार डाॅ॰मंजरी शुक्ला, वरिष्ठ बाल साहित्यकार प्रकाश मनु, प्रख्यात बाल साहित्यकार डाॅ॰ नागेश पांडेय संजय, प्रखर बाल साहित्यकार अरविन्द कुमार साहु, स्कूली बच्चों की दुनिया को कहानी में विषय बनाने वाली बाल साहित्यकार अनीता चमोली ‘अनु’,बढ़ते बच्चों की तेजी से बदलती दुनिया की नब्ज़ पर गहरे हाथ रखने वाले बाल साहित्यकार डाॅ॰ मोहम्मद साजिद खान की नायाब कहानियां शामिल हैं। 

बच्चों ने भी अपने चित्र भेजे हैं। बच्चों की जीवंत फोटो भी पत्रिका में शामिल की गई है। इस तरह से लगभग बीस बच्चे प्रत्यक्ष रूप से इस अंक में जुड़ गए हैं। ज्ञानवर्धक बातें, सरल शब्द पहेली, कहानी पूरी करो, चित्र बनाओं प्रतियोगिता, मुहावरे ढूंढो, जनवरी क्विज़ शामिल हैं। बच्चों को ज्ञान-विज्ञान से हलके से सरलता से परिचित कराने के लिए भी स्तंभ रखे गए हैं। कुल मिलाकर पत्रिका बहुत जल्दी ही एक सशक्त बाल पत्रिका के तौर पर स्थापित होने की सम्पूर्ण क्षमता रखती है।
एक अनाम बाल नाटक भी पत्रिका में शामिल है। 

पवन शर्मा ने जनवरी को बड़े ही रोचक ढंग से बच्चों के लिहाज़ से प्रस्तुत किया है। हुनरमंद चार बच्चों की फोटो के साथ उनका विवरण भी पत्रिका में दिया गया है।

रंग संयोजन बालमन के अनुसार रखे गए हैं। कहीं-कहीं चटकीले रंगों ने आलेखों को मंद कर दिया है। कुल मिलाकर एक-एक पेज पर ध्यान रखने की भरपूर कोशिश की गई है। पत्रिका का कागज उम्दा है। ग्लैज़्ड पेपर वह भी एक-एक पेज रंगीन हैं। आवरण पेज और मोटा है, जिससे पत्रिका लंबे समय तक सुरक्षित रह सकेगी। 

e mail-apoorvudaan@gmail.com

अपूर्व उड़ान मासिक, 384, सेक्टर 36 नोएडा, गौतमबुद्धनगर
 उत्तर प्रदेश। 201301
। संपर्क-0120 4243133
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-मनोहर चमोली ‘मनु’

मोबाइल-09412158688

9 अप्रैल 2016

यादगार बन पड़ा है हिमप्रस्थ का बाल साहित्य विशेषांक child literature

यादगार बन पड़ा है हिमप्रस्थ का बाल साहित्य विशेषांक

-मनोहर चमोली ‘मनु’

साठ बरसों से मासिक पत्रिका हिमप्रस्थ संभवतः निरंतर प्रकाशित हो रही है। यह भी कि इस पत्रिका ने पहली बार वृहद बाल विशेषांक के तौर पर पाठकों के समक्ष अपनी जगह बनाई है। सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग, हिमाचल प्रदेश का यह अंक जनवरी-फरवरी 2016 के रूप में बाल साहित्य विशेषांक के लिए अविस्मरणीय बन गया है। बाल साहित्य के क्षेत्र में यह कई मायनों में मील का पत्थर साबित होगा। हिमाचल प्रदेश से संभवतः यह पहला अवसर होगा जब समग्र रूप से हिन्दी बाल साहित्य पर इतनी विपुल सामग्री एक साथ प्रकाशित हुई है। कविताओं, कहानियों के साथ-साथ यात्रा कथा, बाल नाटक,ग़ज़ल,लघु कथाएं, लोक कथाएं, नीति कथाएं, आलेख, समीक्षाएं शामिल हैं। 

हिमप्रस्थ वैसे तो साहित्यिक पत्रिका के तौर पर मशहूर है। कई अवसरों पर बालमन से जुड़ी रचनाएं भी पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं। इस अंक में बेजोड़ बाल साहित्य यहां संकलित हो गया है। इस बाल साहित्य विशेषांक में 76 से अधिक बाल साहित्यकारों की नवरंगी रचनाओं को एक मंच पर स्थान दिया है। मज़ेदार बात यह है कि 144 पेजों पर यह सामग्री एक साथ आई है और कई प्रसिद्ध बाल साहित्यकारों की उपस्थिति अपनी उत्कृष्ट रचनाओं के साथ हुई है। मोटे तौर पर 21 बाल साहित्यकारों के आलेख शामिल किये गए हैं। एक यात्रा कथा है। दो बाल नाटक हैं। 17 बालसाहित्यकारों की कहानियां हैं। 24 बाल साहित्यकारों की 46 कविताएं हैं। 10 बाल साहित्यकारों की 16 लघु कथाएं,लोक कथाएं और नीति कथाएं शामिल हैं। एक समीक्षा है। 

संपादन इतना लाजवाब हुआ है कि बड़े लेखों और रचनाओं से बचा गया है। ठीक भी है। बहुत जरूरी हुआ तो अधिक स्थान घेरने वाली रचनाएं कम या सबसे बाद में पढ़ी जाती हैं। ऐसे में यदि बाल साहित्य विशेषांक लंबी रचनाओं से अटा पड़ा हो तो उसकी पठनीयता पर सवाल उठने लगते हैं। इस बहाने हम बाल साहित्यकारों को अब यह आत्मसात् कर लेना ही होगा कि लंबी रचनाएं बहुत जरूरत पर ही लिखी जाएं, अब गद्य हो पद्य विधा। वही रचनाएं अधिक पसंद की जाती हैं जो सरल, सुबोध और सहज हों। अनावश्यक विस्तार लेती रचनाएं चाहे कितने ही बड़े या स्थापित रचनाकार की हो, पत्र-पत्रिका में स्थान तो पा लेती हैं लेकिन पढ़ी नहीं जाती। 

पौने दो पेज का संपादकीय एक साथ कई सारी बातें और विमर्श के मुद्दे उठाता है। संपादकीय जहां कल,आज और कल की बात करता है वहीं वह यह भी बताता है कि बचपन-लड़कपन -किशोरावस्था-युवावस्था का फासला कम होता जा रहा है। स्मार्टफोन और इंटरनेट के अधिकाधिक प्रयोग से बच्चों में नकारात्मकता का के आगमन से संपादकीय भी चिंतित है। संपादक वेद प्रकाश जी की संवेदनशीलता का परिचय इस बात से आसानी से लगाया जा सकता है कि वह लिखते हैं-‘आज के बच्चे बेहतर परवरिश में पल रहे हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में उनमें जो कुछ मौलिक था,विशेष था,अनूठा था,वह गायब हो रहा है। वह जो सीख रहे हैं,पढ़ रहे हैं,वह उन्हें मशीनी बना रहा है। बेशक यह उनके जीवन स्तर को सुख-सुविधाओं से सम्पन्न करेगा,लेकिन बहुत कुछ ‘अपना’ छीन भी रहा है।’
बहरहाल सादगी से यह अंक निकला है। कागज की गुणवत्ता संग्रहणीय योग्य है। कवर पेज भी मोटा है। हर रचना के साथ हरसंभव कोशिश की गई है कि एक तो रेखांकन हो। यह और रोचक बन पड़ा है। कवर पेज भी बालमन के अनुरूप है। चूंकि इसमें बालसाहित्य भी है और बाल साहित्यकारों का हिस्सा भी है। विशेषांक है तो आवरण पर और अधिक परिश्रम की अपेक्षा थी। आकार भी बेहतरीन है। फोंट भी आंखों को थकाता नहीं है। सामग्री को पठनीय बनाने के लिए स्थान को बेहद संकुचित नहीं किया गया है। कहीं भी सामग्री ठंूस कर नहीं भरी गई है। 

बाल साहित्यकारों में देवेन्द्र मेवाड़ी, गोविंद शर्मा, अशोक अंजुम, द्विजेंद्र द्विज, रजनीकांत शुक्ल, डाॅ॰ सुशीलकुमार फुल्ल, सुमन शर्मा, डाॅ॰ सुनीता, डाॅ॰ फकीरचंद शुक्ला,मृदुला श्रीवास्तव, अरविंद कुमार साहू, रत्न चंद ‘रत्नेश’, डाॅ॰मंजरी शुक्ला,सुशांत सुप्रिय,प्रकाश मनु, कृष्ण चन्द्र महादेविया, अनंत आलोक, शैलेन्द्र सरस्वती,अंकुश्री, रितेंन्द्र अग्रवाल, नरेन्द्र देवांगन, सुनीता तिवारी, गंगाराम राजी, विनोद ध्रब्याल राही, सुदर्शन वशिष्ठ, उषा छाबड़ा, डाॅ॰दिनेश चमोला ‘शैलेश’,शशिभूषण बडोनी,मंजू महिमा, हेमंत भार्गव, संजय वर्मा,सुमन शर्मा, शादाब आलम, प्रतिभा शर्मा, दिविक रमेश, डाॅ॰ छवि निगम, अभिनव अरुण, डाॅ॰ देशबंधु शाहजहांपुरी,रोचिका शर्मा,कृष्णा ठाकुर ,गोपाल शर्मा,कृतिका ठाकुर,विजयपुरी, कुमार भमौता की रचनाएं शामिल हैं। 

हिमप्रस्थ के इस अंक में सैनी अशेष की पांच लघुकथाएं भी हैं। बाल कविताओं के बहुरंग हिमप्रस्थ में चार चांद लगाते हैं। समकालीन बाल समाज पर पैनी नज़र रखने वाले बाल साहित्यकार जितेश कुमार की दो कविताएं यहां हैं। नवीन हलदूणवी की बहुरंगी दो कविताएं भी शामिल की गई हैं। वरिष्ठ बाल साहित्यकार जयप्रकाश मानस की तीन कविताएं, मनीषा जैन की चार कविताएं, नए तेवर की कविताओं के विशेषज्ञ डाॅ॰ फहीम अहमद के चार खास बालगीत इस अंक को विशिष्ट बनाते हैं। चर्चित बाल साहित्यकार परशुराम शुक्ल की दो कविताएं अपनी विशिष्टता के साथ शामिल हैं। वरिष्ठ बाल साहित्यकार डाॅ॰ प्रत्यूष गुलेरी की पांच खास कविताएं अपनी उपस्थिति और लंबे अनुभव की याद दिलाती हैं। राजीव कुमार ‘त्रिगर्ती’ की तीन कविताएं विविधता लिए हुए है। मशहूर बाल साहित्यकार प्रभुदयाल श्रीवास्तव की दो कविताएं अपने रंग में रंगी हैं। बाल साहित्यकार के चिंतक,आलोचक,समीक्षक और अपनी विशिष्ट रचनाओं के लिए मशहूर डाॅ॰ नागेश पांडेय ‘संजय’ की दो कविताएं अपनी नायाब धमक के साथ अपनी ओर ध्यान खींचती हैं। संजीव कुमार की तीन कविताएं अच्छी बन पड़ी हैं। इसके अलावा तेरह जाने-माने बाल कवियों की कविताएं भले ही एक-एक हैं, लेकिन वह भी अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुए है। कविता,ग़ज़ल और हाइकू को भव्यता के साथ स्थान मिला है।

पुष्पा भारती का लेख ‘बाल साहित्य में रचना होगा नया संसार‘, डाॅ॰ संगीताश्री का लेख ‘चरित्र निर्माण में बालपन के संस्कार, उमा ठाकुर का लेख युवाओ में नैतिक शिक्षा, राजेन्द्र पालमपुरी का लेख बालपन को संवारता साहित्य, भगवती प्रसाद गौतम का लेख कहां खो गया चहकता बचपन, मंजू गुप्ता का लेख आओ! लौटा दें मुस्कराता बचपन, कंचन शर्मा का लेख बच्चों का बदलता स्वभाव व व्यवहार,मनोज चैहान का लेख बालमन को समझना होगा, डाॅ॰रजनीकांत का लेख वर्तमान पीढ़ी की बदलती मानसिकता, वंदना राणा का लेख युवाओं को अनुशासन का पाठ, रमेशचन्द्र मस्ताना का लेख आज का युवा कल का भविष्य, विनोद भारद्वाज का लेख लोक संस्कृति में बालोपयोगी साहित्य, मनोहर चमोली ‘मनु’ का लेख बाल साहित्य में कल्पना और यथार्थ, डाॅ॰ राकेश चक्र का लेख किसी को तो बनना होगा मार्गदर्शक, आशा शैली का लेख रोचक एवं प्रेरणाप्रद हो बाल साहित्य, उमेशचंद्र सिरसवारी का लेख हिंदी बाल कविताओं में राष्ट्रीय चेतना,प्रकाशचंद्र का लेख बाल कविता और भवानी प्रसाद मिश्र, पवन चैहान का लेख वर्तमान समय में बाल पत्रिकाएं एवं साहित्य, प्रो॰योगेशचंद्र शर्मा का लेख विद्या की देवी मां सरस्वती, योगराज शर्मा का लेख स्वस्थ व शिक्षित बचपन पठनीय बन पड़े हैं। 

पुष्पा भारती अपने लेख में लिखती हैं-‘हमें ऐसे बाल साहित्य का निर्माण करना है, जो आज के वर्तमान समाज से बच्चों को जोड़े,पर साथ ही साथ उनमें वह दृष्टि भी पैदा करे जो बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाए। पर यह सब हम अपनी भाषा में उपदेश की शैली में नहीं कर सकते।’
डाॅ॰ संगीताश्री अपने आलेख में एक जगह लिखती हैं-‘हिंदी में, बाल साहित्य को अभी समय की चाल, बच्चों/बालकों की बढ़ती बौद्धिक मांग के अनुसार अपना स्वरूप् निर्मित करना होगा।’ राजेन्द्र ‘पालमपुरी’ का आशावादी लेख पठनीय है। वह लिखते हैं-‘किंतु बच्चों से दूर होते बाल साहित्य के बावजूद आज भी अच्छा साहित्य लिखा जा रहा है। और यह उम्मीद की जा रही है कि देर-सवेर तकनीक की उस चमकीली दुनिया से बच्चों का मोहभंग होगा और किताबें फिर से उनकी संगी-साथी बनकर और उनके नए नायकों की उंगली पकड़कर बचपन की दहलीज से पार उतारने में अपनी विशेष भूमिका अदा करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगी।’

मंजू गुप्ता अपने आलेख में लिखती हैं-‘आज के बच्चों के बचपन में पचपन नज़र आ रहा है। उनमें मस्ती,शरारत,रूठना-मनाना,नादानियां,भोलापन आदि नहीं रहा। उनका बचपन इंटरनेट के इंद्रजाल में फंस कर नेट पिटारे मंे अपनी दुनिया की अच्छाई-बुराई देख रहा है।’

डाॅ॰ राकेश चक्र लिखते हैं-‘जो भी परिवार वर्तमान परिवेश में जितना अधिक सुविधाभोगिता दिखावा और फैशन में डूबा है, वह उतना ही सत् साहित्य और बाल साहित्य से दूर होता जा रहा है।’

उमेश चंद्र सिरसवारी जी ने आजादी के बाद से अब तक बाल साहित्यकारों की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना के स्वर की पड़ताल गहनता से की है। पवन चैहान जी ने बाल पत्रिकाओं और बाल साहित्य के बहाने गहन पड़ताल की है। वह भी बाल साहित्य में वैज्ञानिक चेतना के पक्षधर हैं। योगराज शर्मा बचपन के बहाने अपने लेख में लिखते हैं-‘स्वास्थ्य के साथ शिक्षा भी सभ्य समाज के निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण अंग है।’ देवेंद्र मेवाड़ी का यात्रा कथा बड़ा ही रोचक बन पड़ा है। कहानी और कविताओं को पढ़कर टिप्पणी फिर कभी। कुल मिलाकर यह अंक ऐसा बन पड़ा है कि कोई भी बाल साहित्य प्रेमी इस अंक को अपने संग्रहणीय अंक से या अपनी निजी लाइब्रेरी से अलग नहीं कर सकता। हिमप्रस्थ से उम्मीद की जाती है कि वह इस आगाज़ को बनाये रखे। निरंतर अंकों में नियमित कुछ न कुछ बाल साहित्य सामग्री प्रकाशित करती रहे। 

पत्रिका: हिमप्रस्थ, मासिक
प्रधान सम्पादक: डाॅ॰ एम॰पी॰सूद
वरिष्ठ सम्पादक: यादविन्दर सिंह चैहान
सम्पादक: वेद प्रकाश
एक प्रति: 15 रुपए
सालाना शुल्क: 150 रुपए
पृष्ठ: 144
mail -himparasthahp@gmail.com
सम्पर्क: 0177 2633145, 2830374
मुखपृष्ठ एवं रेखांकन: सर्वजीत
प्रकाशक: निदेशक, सूचना एवंज न सम्पर्क विभाग,शिमला, हिमाचल प्रदेश।
समीक्षक: मनोहर चमोली ‘मनु’, सम्पर्कः 09412158688 
मेलः chamoli123456789@gmail.com

3 अप्रैल 2016

बाल कहानी, 'नया पुराना' : जनसत्ता, 6 March 2016 child literature

'नया-पुराना'

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-मनोहर चमोली ‘मनु’

बीस रुपए का पुराना नोट बटुए के भीतर आया।

उसे किसी ने टोका-‘‘अरे, अरे! जरा हट के। कहां चढ़े जा रहे हो?’’ 

बीस रुपए का एक नया नोट बटुए में पहले से था। वह गुस्से में था। 

पुराने नोट ने पैर पसारते हुए कहा-‘‘चढ़ नहीं रहा हूं भाई। अपने लिए जगह बना रहा हूं।’’
 नया नोट चिढ़ गया। बोला-‘‘उफ ! तुम कितने गंदे हो। मुड़े-तुड़े। दाग-धब्बों से भरे हुए हो। तुम्हारे शरीर पर तो कई छेद हैं। तुमसे से बदबू भी आ रही है। मुझे देखो। एकदम नया हूं। नोट की गड्डी से सीधे यहां आया हूं।’’

पुराना नोट हंसने लगा। नया नोट चैंका। बोला-‘‘हंस क्यों रहे हो?’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘मैं भी कभी नया था। मेरे शरीर में भी तुम्हारी तरह रंगों की खुशबू आती थी। मैं भी कभी करारा था। खूब फड़फड़ाता था। लेकिन याद रखो। तुम भी मेरे जैसे हो जाओगे।’’ 
नया नोट बोला-‘‘मेरे नयेपन से तुम्हें जलन हो रही है। मुझे तुम्हारी तरह नहीं होना है। मैं कई दिनों से इस बटुए में हूं। हमेशा यहीं रहूंगा। समझे तुम।’’

पुराना नोट चुप नहीं रहने वाला था। बोला-‘‘समझ गया। लेकिन तुम्हें भी समझा रहा हूं। माना कि मैं पुराना पड़ चुका हूं, लेकिन तुम्हारी कीमत और मेरी कीमत में कोई अंतर नहीं है।’’ 

बात अभी चल ही रही थी कि बटुए के सभी नोट सहम गए। हाथ का अंगूठा, तर्जनी और मध्यमा उंगली ने बटुए के भीतर झांका। पुराना नोट खींच लिया गया। नए नोट ने राहत की सांस ली और वह आराम से सो गया।

एक दिन अचानक फिर वही बीस रुपए का पुराना नोट बटुए में आ गया। 
नए नोट ने आंखें दिखाते हुए पूछा-‘‘तुम ! फिर आ गए?’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘मैं कहां आया। मुझे तो लाया गया। वैसे भी मुझे घुटन पसंद नहीं है।’’ 
नया नोट बोला-‘‘हैरान हूं। इस आरामदायक जगह में तुम्हें घुटन हो रही है! वैसे इतने दिन थे कहां?’’ 
पुराना नोट पैर पसारते हुए बोला-‘‘सबसे पहले मेरे बदले में दो चाॅकलेट ली गईं। मैं गया गल्ले पर।’’ 
नया नोट बोला-‘‘चाॅकलेट ! गल्ले पर ! ये गल्ला क्या होता है?’’ 
पुराने नोट ने हंसते हुए बताया-‘‘अरे, दुकानों पर हम नोटों के लिए एक गल्ला रखा होता है। हम सब वहां रखे जाते हैं। खैर छोड़ो। मैं गल्ले में रखे नोटों से बात कर ही रहा था कि दुकानदार ने मुझे एक ग्राहक को पकड़ा दिया। ग्राहक ने मुझे अपने बटुए में रख लिया।’’

नया नोट फिर चैंका। बोला-‘‘दुकानदार ! ग्राहक !’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘मुझे तुम पर दया आती है। अरे, हम नोट खरीददारी में बहुत काम आते हैं। हमारे बदले दुकानदार ग्राहकों को सामान देते हैं। जो हम नोटों से सामान खरीदता है, उसे ग्राहक कहते हैं। हद है। तुम्हारा जीना ही बेकार है। इस बटुए में पड़े रहोगे तो दुनिया कैसे देखोगे। अब यह मत पूछना कि दुनिया किसे कहते हैं।’’ 
नया नोट झेंपते हुए बोला-‘‘हां, मैं तो यही पूछने वाला था।’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘हम नोट बनें ही इसलिए हैं कि हम चलें। चलना ही जिंदगी है। मैं हजारों किलोमीटर की यात्रा कर चुका हूं। सैकड़ों शहर घूम आया हूं। अनगिनत बार गिना जा चुका हूं। लेकिन तुम क्या जानों की चलना-ठहरना क्या होता है। सैकड़ा-हजार क्या होता है। यात्रा किसे कहते हैं।’’

नया नोट उदास हो गया। मायूस होकर धीरे से बोला-‘‘बड़े भाई। माफ करना। मैं तो मशीन में छपकर सीधे यहां लाया गया हूं। इस बटुए के अलावा मैंने कुछ देखा ही नहीं। तुम्हारी बातों से तो लगता है कि दुनिया बहुत बड़ी है। अब तुम ही कुछ करो। मुझे भी दुनिया दिखाओ।’’

पुराना नोट बोला-‘‘चिंता मत करो। इस बार मुझे जैसे ही इस बटुए से बाहर खींचा जाएगा। तुम मुझसे चिपके रहना। मैं बहुत चल गया हूं। कमजोर हो गया हूं। एक झटके से मेरे दो हिस्से हो जाएंगे। बस फिर मेरे बदले तुम्हें ही बाहर जाना होगा।’’ 

नया नोट चैंका। बोला-‘‘मैं समझा नहीं।’’ पुराना नोट हंसते हुए बोला-‘‘छोटे भाई। हमारा भी जीवन होता है। मेरे दो हिस्से हो जाने पर मुझे कोई नहीं लेगा। बस फिर बीस रुपए के लिए बटुए से दूसरा नोट निकाला जाएगा। फिलहाल तुम्हारे अलावा इस बटुए में दूसरा बीस का नोट है ही नहीं।’’ नया नोट बोला-‘‘नहीं-नहीं। मेरे लिए तुम भला अपनी जान क्यों दोगे।’’

तभी अंगूठा, तर्जनी और मध्यमा उंगली ने बटुए में झांका।

 यह क्या !  बटुए के सभी नोट बाहर निकाल लिए गए। सभी नोट एक मिठाई की दुकान के गल्ले में जा पहुंचे। बटुए के नोट गल्ले में रखे नोटों के साथ जा मिले। अच्छा हुआ कि पुराने नोट के दो हिस्से नहीं हुए। मैं भी बटुए से बाहर आ गया। बीस रुपए का नया नोट गल्ले में आकर यही सोच रहा था।


॰॰॰ -मनोहर चमोली ‘मनु’

2 अप्रैल 2016

'बंद हुआ हंसना',-मनोहर चमोली ‘मनु’,बाल कहानी,जनसत्ता child literature

बंद हुआ हंसना 

-मनोहर चमोली ‘मनु’

जूते हंसने लगे तो जुराब ने पूछ लिया-‘‘हंस क्यों रहे हो?’’

 बांया जूता बोला-‘‘अपनी हालत तो देखो।’’

 दांये जूते ने इशारा किया-‘‘तुम्हारे भीतर से अंगूठा बाहर झांकने लगेगा। अब तुम पहनने लायक नहीं रहे।’’ जुराब ने खुद को देखा तो परेशान हो गया। जुराब बोला-‘‘दूसरों पर हंसना अच्छी बात नहीं।’’ 
तभी आशमां आई और जुराब पहनने लगी। जुराब के भीतर से अंगूठा झांक रहा था। आशमां ने जुराब उतारा और सुई-धागे से फटी जगह को सिल लिया। जुराब पहनकर उसने जूते पहन लिए।
 जुराब ने जूते से कहा-‘‘देख लो। आशमां ने हमें पहन लिया है।’’ जूते झेंप गए।
एक दिन जूते फिर हंसने लगे। जुराब ने पूछा-‘‘क्या हुआ?’’
 बांया जूता बोला-‘‘अपनी हालत देखो। ढीले हो गए हो। आशमां पहनेगी तो तुम लटककर एड़ी पर झूलने लगोगे।’’ 

जुराब खुद को देखने लगे और उदास हो गए। आशमां आई और जुराब पहनने लगी। दोनों जुराब वाकई पैरों की पिंडलियों से एड़ी पर आ गए। इस बार आशमां ने जुराब नहीं उतारे। वह रबड़बैंड ले आई। उसने जुराब के ऊपरी सिरों पर रबड़बैंड चढ़ा लिए। अब जुराब खिसक नहीं रहे थे। आशमां ने जूते पहने और घूमने चली गई। एक जुराब जूतों से बोला-‘‘देखा लिया ! आशमां ने हमें उतारा नहीं। हमारे ढीलेपन का उपाय खोज लिया गया।’’ जूते बगले झांकने लगे।

एक दिन फिर जूते हंसने लगे। जुराब ने पूछा-‘‘अब क्या हुआ?’’ 
दांया जूता बोला-‘‘खुद को देखो। तुम दोनों एड़ियों से फट चुके हो।’’ 
बांया जूता चिढ़ाते हुए बोला-‘‘अब तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता। आशमां तुम्हें नहीं पहनेगी। देख लेना।’’ 

आशमां आई और जुराब पहनने लगी। एड़ियों से जुराब वाकई फट चुके थे। आशमां ने जुराबों को उलटा। पलटा। कुछ देर सोचा। आशमां ने जुराबों को अच्छी तरह से धोया। सुखाया। रंग-बिरंगे-सुनहरे धागों से जुराबों मंे कड़ाई की। जुराबों में रुई भरी। अब जुराब आशमां के कमरे में सज-धज कर मुस्करा रहे थे। वहीं जूते दरवाजों के पीछे अंधेरे कोने में चुपचाप पड़े थे। अब जूतों ने जुराबों पर हंसना बंद कर दिया। ॰॰॰
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