17 अक्टू॰ 2016

स्थानीय से वैश्विक उपहार है 'ब्रेसलेट' BRACELET : SP SEMWAL by- Manohar hamoli 'manu'

स्थानीय से वैश्विक उपहार है 'ब्रेसलेट'


ज्ञान विज्ञान संस्कृतिकर्मी, शिक्षाविद् एवं लेखक एस॰पी॰ सेमवाल का पहला कहानी संग्रह ‘ब्रेसलेट’

-मनोहर चमोली ‘मनु’
हाल ही में ज्ञान विज्ञान संस्कृतिकर्मी, शिक्षाविद् एवं लेखक एस॰पी॰ सेमवाल का पहला कहानी संग्रह ‘ब्रेसलेट’ प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की सभी कहानियां पढ़ते समय अलग-अलग देशकाल की यात्रा पाठक आसानी से कर लेता है। ब्रेसलेट सहित अन्य पांचों कहानियां का आस्वाद अलग आनंद देता है। कुछ कहानियां बार-बार पढ़ने की मांग करती है।
ब्रेसलेट की सभी कहानियों में कमोबेश संवाद कम हैं। विवरणात्मक और व्याख्यात्मक शैली का कथाकार ने अधिकाधिक प्रयोग किया है। यही कारण है कि कुछ कहानियां में कथाकार का निजी अनुभव झलकने लगता है। कथाकार ने हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी, उर्दू, देशज शब्दों के साथ आंचलिक शब्दों का भी प्रयोग किया गया है।
ब्रेसलेट में अधिकतर वर्णनात्मक शैली का उपयोग किया गया है। संवाद कम ही हैं। बेहद लंबे वाक्य हैं। अनुच्छेद भी बहुत लंबे-लंबे हैं। सत्रह, इक्कीस, सत्ताइस और इकतीस लाइनों का एक-एक अनुच्छेद भी कहानियों में हैं। चार, पांच, छह, सात और आठ-आठ लाइनों के एक-एक वाक्य भी है। संभव है कि पाठक इतने लंबे अनुच्छेदों और लंबी-लंबी लाइनों के वाक्यों को तन्मयता के साथ पढ़ने में असहज हो सकते हैं। वैसे चुटीले संवाद भी हैं तो विचारात्मक भाव भी कहानियों में अनायास ही आ जाते हैं। एक कहानी में छोटी-छोटी और कहानियों की कथावस्तु भी देखने को मिलती है। दो-तीन अवसरों पर अंग्रेजी के शब्द नहीं पूरे वाक्य शामिल कर लिए गए हैं। वहीं उसी के साथ उसका हिंदी अनुवाद कोष्ठक में दिया गया है। यह गैर जरूरी लगता है।
स्वयं कथाकार एक गंभीर पाठक हैं। स्थानीय से लेकर विश्व साहित्य के वे अध्येता हैं। लेकिन वे कहानियों में अति साहित्यिकता के मोह को नहीं छोड़ सके हैं। हर कहानी में एक-दो नहीं बीस से अधिक ऐसे शब्दों का इस्तेमाल वे करते हैं जिनके विकल्प में सरल और आम बोलचाल के शब्द उनके निजी शब्दकोश का हिस्सा हैं।
’ब्रेसलेट’ में उन्होंने निस्तब्धता, स्वर्गिक, अधिवासी, प्रवृत्त्यिां, प्रत्युत्तर, अद्र्धांश, विन्यास, द्विविमीय, अनावृत, अग्रभाग, त्रिवीमीय, रोमांटिसिज़्म, अविच्छिन्न, सर्वसमावेशी, फासिज्म, निर्लिप्त, अवलम्बन, क्रन्दन, संक्षिप्त, निष्प्राण जैसे शब्दों का प्रयोग किया है।
‘युद्धमशीन‘ में उन्होंने वितृष्णा, अद्वितीय, एडवाइज़्ड, मनश्चिकित्सिक, उपहासपूर्ण दृष्टि, परिस्थितिजन्य, सन्देहास्पद, इन्टैरोगेशन, निरुद्ध, केन्द्रित जैसे कई शब्दों का प्रयोग किया है। ‘कथावाचक‘ में मंदस्मिति, दुखान्तयुक्त, अन्तर्गुम्फित, सौन्दर्यशास्त्र, विसर्जित, सरफैसियल इम्पैक्ट, एक्सटेम्पोर, प्रागैतिहासिक, पुर्नजन्म शब्द आए हैं।
‘एक वर्जित शोक गीत‘ में आत्माभिमानी, सम्मोहक, उत्पत्ति, रक्ताभ, प्रतिध्वनियां, मिश्रित, प्रदूषणमापक, लिपिबद्ध, उच्छवास आदि शब्द हैं।

‘पुस्तकालयाध्यक्ष का एक दिन‘ में प्रतिष्ठित, दुःस्वप्न, स्मृतिलोप, चेतनाशून्य, अपरिभाषित, स्पंदनहीन, यन्त्रवत्, अभीष्ट,सप्ताहान्त,गन्धमिश्रित, आर्तनाद जैसे शब्द हैं। ’शुक्रिया’ में नित्यकर्म, रूपान्तिरित, भ्रमित, प्रविष्ट, विद्रुप, भग्नावशेष, रक्तरंजित, अवसन्न, दुष्प्रचार, रक्तस्राव, पुनस्र्थापित, पुनर्नवा आदि शब्द हैं।

कथाकार एस॰पी॰ सेमवाल हर कहानी में एक ऐसे पात्र का रेखाचित्र खींचने में सफल हुए हैं जिसे पाठक पढ़ते हुए अपनी आंखों से अपने आस-पास महसूस करता है। प्रत्येक कहानी अपने देशकाल, वातावरण और परिस्थितियांे के चलते यथार्थ की कहानियां बन पड़ी हैं।
ब्रेसलेट को आज की भी कहानी कहा जा सकता है। काॅलेज का माहौल और समाज में बनती-बिगड़ती अमन-चैन और सांप्रदायिकता की स्थिति पुरानी बात नहीं लगती।
युद्धमशीन भले ही कई देशों के मध्य हुए युद्ध के आलोक में ध्यान खींचती है। लेकिन यह कहानी हमेशा समसामयिक रहेगी। मनुष्यों के साथ-साथ राज्य भी अपने को शक्तिशाली, दूसरे को कमजोर बनाने के साथ पड़ोसी और शक्तिशाली बन रहे देशों में जासूसी उनके नागरिकों के साथ की जाती रहीं बदसलूकियों से आए दिन अखबार भरे पड़े रहते हैं। कहीं न कहीं ये कथा युद्ध के मारक असर पर उसी राज्य के देशवासियों के दृष्टिकोण को समझने की ओर इशारा भी करती है।

कथावाचक को हर पाठक अपने समय के सन्दर्भ में देख सकता है। हिंदुस्तान में तो भीड़तंत्र को कहीं भी बरगलाया जा सकता है। धर्मान्धता और आस्तिकता वोट बैंक के साथ बहुत बड़ा व्यवसाय भी है। आदित्य ने यह कर दिखाया। एक वर्जित शोक विशुद्ध रूप से उत्तराखण्ड के लोकजीवन और यहां के हालातों पर कसता व्यंग्य भी है। कैसे और क्यों हम आज भी ठाकुर का कुआं ढो रहे हैं। यह अस्सी फीसदी पढ़ी-लिखी जनता के होने के बाद भी कायम क्यों हैं। कथाकार की यह कहानी बेहद विचलित कर देती है।

पुस्तकालयाध्यक्ष का एक दिन एक अजीब तरह की कहानी है जो कहीं न कहीं एक साथ कल, आज और कल के मनकों की पिरोई गई माला है। इसे विज्ञान गल्प के आस-पास देखा जा सकता है। इस बहाने पीढ़ीयों और समाज के अंतर को बेहद काल्पनिकता के साथ कहानी हमें 2021 के दर्शन कराती है।
शुक्रिया कहानी नए पुराने ठेकेदारों के साथ सुक्खी और तेरह साल का समझदार बच्चा जो बाद में बाल सुधारगृह की तीन साल की जीवन यात्रा के बाद कुछ ओर ही बन गया। आज के से ही हालातों पर यह कहानी हमारे आस-पास ऐसे अपराधी बन चुके बालकों की ही कहानी लगती है।
ब्रेसलेट 17 पेज की कहानी है। पात्रों में जतिन एक प्रगतिशील नौजवान है। कला, साहित्य और संस्कृति में गहरी नज़र रखता है। सामाजिक सरोकारों से उसका गहन रिश्ता है। वहीं माधव एक कट्टरपंथी विचारधारा का का पोषक है। संजय समृद्ध परिवार का सदस्य है। मध्यस्थ भाव रखता है। हर विचारधारा के फौरी तौर पर गुण-दोष देखने वाला, हर ओर सामंजस्य बिठाने वाला है। ज़ेबा हसन को दिया गया बे्रसलेट कहानी में तीव्र अन्त पैदा करने में सफल हुआ है। नियाज़ हसन एक तरक्क़ी पसंद इंसान हैं। कहानी युवावस्था, काॅलेज-हाॅस्टल के दिनों के आस-पास केन्द्रित है। सामाजिक समरसता के प्रयास कहानी के माध्यम से हुए हैं। धार्मिक, जातीय, नस्लीय भावों पर भी कथाकार ने इस कहानी के माध्यम से इशारा किया है। इसी कहानी में लंबे-लंबे वाक्य हैं। 
एक वाक्य पढ़िए -

अपनी विशिष्ट वास्तुकला के साथ, जो शहर ही नहीं राज्य के इस प्रतिष्ठिता काॅलेज की अन्य पुरानी इमारतों में भी प्रतिबिंबित होती थी, के साथ सामने इस छोर से उस छोर तक फैले हरे-भरे सुप्रबंधित लाॅन, उसके आगे पंक्तिबद्ध अशोक वृक्ष और छात्रावास की चहारदीवारी के बाहर शहर की ओर जाती सड़क से दो हिस्सों में बंटा बर्च वृक्षों का जंगल, जिसे इसी काॅलेज के एक वृक्षमित्र प्रोफेसर के एकदशकीय वृक्षारोपण अभियान के तहत यत्पूर्वक रोपा और विकसित किया गया था, पतझड़ के मौसम में कोलतार पुती सड़क और जंगल के बीच गिरे और गिरने को प्रतीक्षारत इस वृक्ष के पत्ते दोपहर की धूप में अपनी पीली रंगत के साथ इस तरह चमकते मानो किसी ने इस धरती पर सोना बिखेर दिया हो।(पेज 17 दूसरा अनुच्छेद: ‘ब्रेसलेट’)
दूसरी कहानी युद्ध मशीन है। यह कहानी 10 पेज की है। स्मिथ युवा तुर्क है। छात्रों का अगुवा। एमआईटी का परास्नातक। ओजस्वी वैचारिक भाषण देने वाला अमेरिका में एक महीने से बंद है। विकसित और विकासशील देशों के मध्य जो गैरबराबरी है। युद्ध ताकत के लिए या बेहतरी के लिए? यह सवाल कहानी में शिद्दत से आया है। कहीं न कहीं यह कहानी इस ओर भी इशारा करती है कि कैसे युद्ध को आगे कर कोई देश दूसरे देश को बरबाद कर सकता है।
इस कहानी में भी एक लंबे वाक्य का उदाहरण पढ़िए-
इस्पात के उस मज़बूत दरवाज़े की बग़ल में एक फीट लंबी और पांच इंच चैड़ी एक स्लिट बनी हुइ्र्र थी, पूरी जेल में सबसे खतरनाक हमलावर या मानिसिक असंतुलन से ग्रस्त कैदियों को बाहर ले जाने के लिए यह तरीका सबसे कारगर माना जता था कि कैदी दरवाज़ा खुलने से पहले अपने हाथ उस स्लिट से बाहर रखे जिनमें हथकड़ी पहना कर फिर दरवाजा खोलकर कैदी को बाहर निकाला जो और इस तरह सुरक्षाकर्मियो पर हमले की संभावना कम की जा सके। (पेज 34 पहला अनुच्छेद: युद्ध मशीन)
तीसरी कहानी कथावाचक है। यह 13 पेज की कहानी है। आदित्य जो कथावाचक बनता है और फिर एक भरी सभा में संत आदित्य महाराज का चोला उतारकर फेंक देता है। ये कहानी भी युवाओं के भीतर अपार उर्जा, क्षमता को प्रदर्शित करती है। आदित्य बहुमुखी प्रतिभा का धनी है। साहित्य, कला, संस्कृति और रंगमंच का जीवन में कितना महत्व है, यह इस कहानी में अच्छे से आया है। एक पात्र जो यहां मुख्यमंत्री का निजी सचिव है, उसकी गतिविधियां पाठक में गुस्सा पैदा करने में सफल हुई हैं।
 इस कहानी में भी एक लंबे वाक्य का उदाहरण पढ़िए-
मसलन सती का अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर अग्निकुंड में देह विसर्जित करना, शिव का दक्ष के खण्डित सिर की जगह बकरे का सिर प्रत्यारोपित करना और सती के शव को लेकर शोक संतप्त होकर ब्रहमाण्ड का चक्कर लगाना फिर समाधिस्थ हो जाना, इस नसबके बाद कामदेव का उनके त्रिनेत्र से भस्म हो जाना और शिव का वरदान कि द्वापर युग में कामदेव श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के रूप में और रति बाणासुर की पुत्री उषा के रूप में जन्म लेंगे और उनका पुनः मिलन होगा। (पेज 46-47 तीसरा अनुच्छेद: कथावाचक)

संग्रह की चैथी कहानी एक वर्जित शोकगीत है। यह कहानी 21 पेज की है। पहाड़, पहाड़ का परिवेश, यहां का लोक जीवन, यहां की विषमता अच्छे से आई है। एक प्रेम कथा जिसमें जात-बिरादरी हावी हो गई और दोनों को मार दिया गया। आज भी ठाकुर के कुएं की याद दिलाता है। यह कहानी कहीं सारी कहानियों के साथ पूरे प्रवाह में पाठकों को बांधे रखने में सहायक हुई है।

इस कहानी में एक लंबा वाक्य वाक्य पढ़िए-
दिन भर इस इलाके के सौन्दर्य, नीचे गांव के खेतों को छूकर बहती पहाड़ी नदी की हवा के साथ जुगलबंदी करती कल्लोल पीले माल्टो और सन्तरो के बोझ से दबे-दबे पेड़ों वाले घरों के आंगन केलोे के वृक्षों की हरियाली से ढके पनघट तक जाने वाले रास्ते और ऊपर बुरांश की लाली से दहकते जंगल और खेतों के पुश्तो पर इस छोर से उस छोर तक पीले फंयूली के फूलों के इस मंत्रमुग्ध कर देने वाले नज़ारे के बाद रात के लज़ीज खाने ने हमें ऐसे स्वर्गिक अनुभव से साक्षात्कार करवा दिया था जिसकी हम शहर में कभी सपने में भी उममीद नहीं कर सकते थे। (पेज 60 पहला अनुच्छेद: एक वर्जित शोकगीत)
संग्रह की पांचवी कहानी पुस्तकालयाध्यक्ष का एक दिन है। यह कहानी 16 पेज की है। भौतिकी का पूरा प्रभाव। विज्ञान फंतासी का-सा प्रभाव दिखता है। विष्णु पंढारकर का पात्र उभरकर सामने आता है। यह कहानी बाप-बेटे के संबंधों और दस साल के काल्पनिक अंतराल में आए बदलाव का भी चित्रण करता है। यह लीक से हटकर कहानी है। चमक-दमक, बड़ापन दिखाने की ठसक इस कहानी में दिखाई गई है।
 इस कहानी में भी एक लंबा वाक्य पढ़िए-
उसने फिर आंखें बंद कर जंग लगा लोहे का गेट थाम लिया और अपने भीतर एक गहरी गले को सूखी लकड़ी की तरह सुखा देने वाली प्यास महसूस की, उस पेय के विज्ञापन को देखने के बाद या एक अनजाने दौर तक की निश्चेतना की स्वाभाविक परिणति के तौर पर। (पेज 78 दूसरा अनुच्छेद: पुस्तकालयाध्यक्ष का एक दिन )
संग्रह की छठी कहानी शुक्रिया है। 20 पेज की यह कहानी बाल अपराधी और समाज के कथित ठेकेदारों का बखूबी चित्रण करती है। कैसे यह समाज किसी को भी अपराध की दुनिया में धकेलता है। एक अलग सा वर्णन करती यह कहानी विचारणीय प्रश्न उठाने में सफल हुई है। इस कहानी में भी कुछ लंबे वाक्य हैं।

एक उदाहरण पढ़िए-

उसके अतीत से अनजान तमाम बस्ती के लोग इसी बात पर सुकून कर लेते कि उसी की बदौलत उनके बेबस मायूस बच्चे उसकी दी हुइ्र चाॅकलेट या चाबी वाली कार या ढोलक बजाते जोकर के सााथ घर भर में खुषियों के मारे किलकिला रहे हैं और यह भी कि किसी बीमारी या लाचारी के मारे मर्द या औरत के हाथ में बिना गिने रुपये धर दे इस उममीद के बिना कि वे रुपये उसे वापस भी मिल पाएंगे या नहीं। (पेज 94 दूसरा अनुच्छेद: शुक्रिया)

लंबे वाक्यों से गुजरता हुआ पाठक पीछे के सन्दर्भ को जोड़ते हुए आसानी से आगे नहीं बढ़ पाता। फिर भी इन छह कहानियों में बहुत कुछ ऐसा है, जिसे बार-बार पढ़ने से बार-बार अलग सा स्वाद मिलता है। 

आप भी पढ़िए -

‘ब्रेसलेट’ कहानी से
एक-‘ताज़ा हवा को झोंका गर्मियों भर चादर तान कर सोते उस कमरे की आंखों से मानो नींद के जाले बहाकर ले गया।’
-दो- ‘बच्चों की वास्तविक ज़रूरते पूरी करने की बजाय उनकी अनाप-शनाप फरमाइशें पूरी की जाती हैं, जिससे समाज में अपनी समृद्धि और ठसक का सिक्का जमाया जा सके।’
-तीन-जो चीज़ आप बना नहीं सकते, उसे नष्ट करना आपका अधिकार भी नहीं।’
-चार-‘वह जतिन और माधव के द्विध्रुव के बीच एक निरन्तर संक्रमणशील न्यूट्रिनों की तरह डोलता रहता।’
-पांच-धुरविपरीत वैचारिक आधार के बावजूद दोनों एक ही कमरे में साथ-साथ रह रहे थे तो लगता है कि इनकी स्थिति नाभिक में अवस्थित प्रोटोनों के बीच इलैक्ट्रोनों का स्थानांतरण जिस तरह उन्हें बांधे रखता है, संजय इसी भूमिका के तहत इन दोनों को जो शायद उसकी अनुपस्थिति में छिटक कर दूर जा सकते थे, उन्हें साथ रखने की वजह बन गया था।’
छह-उसे लगता वह खुद से ही उकता गया है, वह हवा में, पेड़ों के जुदा रंगों में फूलों में और बादलों में बनने, बिगड़ने वाली असंख्य आकृतियों में नयापन ढूंढने की कोशिश करता लेकिन अगले ही पल वे उसे बासी और नीरस लगते लगते।’
सात-ऐसा कुछ करना होगा तो पहले हमें खुद के भीतर ही संबल और सहारा तलाश करना पड़ेगा संजय, ये लड़ाई है जो खुद की ताकत और हौसले से जीती जाती है।
आठ- लेकिन चीज़ें हमेशा हमारी आकांक्षा और मंशा के अनुरूप घटित होतीं तो शायद दुनिया सभी इंसानों के लिए या तो बेहद खुबसूरत जगह होती या एकरस, उबाऊ होती, कौन जाने?
नौ-गलियों में बस कुछ अवारा कुत्ते घूम रहे थे जो इसलिए बच गए कि उनका कोई नाम-पता और जात नहीं थी।
‘युद्ध मशीन’ कहानी से-
एक-किसी बात पर हंसते हुए उसके शरीर का ऊपरी हिस्सा भी एक बार दोलन करने लगता था।
दो-किन्तु अदालत स्मिथ एवंत माम सामाजिक कार्यकर्ताओं को सुझाव देती है कि वे युद्ध एवं शांति को एक निरपेक्ष परिघटना के तौर पर देखने के बजाय यह गौर करें कि किन्ही परिस्थितियों में जब जनतंत्र को, राज्य की जिनता के हितों को और जीवन को ख़तरा हो तो युद्ध एक अप्रिय अनिवार्यता के तौर पर सामने आता है।
कथावाचक कहानी से-
एक-जसविन्दर का ख़्याल दर्द के समन्दर में डूबी याद की एक लहर की तरह उसके ह्दय में उभर आया।
दो-उसके गालों के हल्के क्यूपिड सुनहरी धूप में कत्थई हो उठे।
तीन- वह हैरान होता कि यह कथा कितने युगों तक फैली हुई है और साथ ही यह भी सोचता कि भले ही इसकी रचना में विलक्षण कल्पनाशीलता झलकती है लेकिन ये तर्क और वैज्ञानिक मेधा को भी कुंठित करती है। मसलन सती का अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर अग्निकुण्ड में देह विसर्जित करना, शिव का दक्ष के खण्डित सिर की जगह बकरे का सिर प्रत्यारोपित करना........।
चार-हां और जरूरत के इस हिसाब किताब को तू प्यार समझता है? जिसे तुम प्यार समझते हो बहुत मामलों में वह अधिकार की भावना को व्यक्त करता है। वह मेरा है या मेरी है इस अहं की भावना को तुष्ट करता है। जिस पर दुनिया की नज़र है वो मेरे पहलू में है इस पागलपन में है।
‘एक वर्जित शोक गीत‘ कहानी से-
एक-यह गोधूलि की बेला ही थी जिसने मुझे जैसे शहर में रहने, शहर को समझने का दावा करने वाले शख़्स को कुछ ही लमहों में महसूस करा दिया कि शानदार चमचमाती टैªफिक लाइट की लाल,हरी और पीली लाइटों,शाॅपिंग माॅल्स, एलीट काॅलोनी, पांच सितारा होटल, पांच सितारा ख्याति के निजी स्कूल जहां शिक्षा के सिवा सब कुछ दर्शनीय होता है के बाहर भी एक दुनिया है, जीवन है।
दो-उनके बछड़ों ने अपनी ज़रूरत भर अपनी मांओं के थन से दूध पा लिया था और अब ग्वालिनें अपने घर के लिए अपने घुटनों के बीच दबाए घड़ों में उनका दूध उतार रही थीं। हर बकरी और भेड़ अपने भरे पेट के साथ चरागाह से लौटी थी।
‘पुस्तकालयाध्यक्ष का एक दिन’ कहानी से-
एक- उसने फिर आंखें बंद कर जंग लगा लोहे का गेट थाम लिया और अपने भीतर एक गहरी गले की सूखी लकड़ी की तरह सुखा देने वाली प्यास महसूस की, उस पेय के विज्ञापन को देखने के बाद या एक अनजाने दौर तक की निश्चेतना की स्वाभाविक परिणति के तौर पर।
दो- यह शहर भी उन्हीं पात्रों की मानिंद अपना होते हुए भी उसे बेगाना, दूसरे ग्रह का सा महसूस हुआ।
तीन- इसका दूसरा अभिप्राय था कि इस नश्वर जीवन की सच्चाई के बरअक्स वह अपने पति से पहले दुनिया से कूच कर जाए, मुझे यह क़तई बेतुका लगता है कि स्त्रियां अपने पति के दीर्घ जीवन की कामना करें, इसलिए इस देश में महिलाओं की औसत उम्र पुरुषों से कम है। भई अगर दुनिया से जाना ही है तो मैं पहले जाना चाहूंगा या हद से हद तुम्हारे साथ।
चार-अब उसके ह्दय से भावना के सभी स्थूल और सूक्ष्म तत्व अतीत की मधुर, कटु या तिक्त स्मृतियां, उसके जीवन की सार्थकता का बोध, निराशा और उत्साह सब कुछ जैसे भाप बन कर उड़ रहे थे।
‘शुक्रिया‘ कहानी से-
एक-काम से घर लौटते लोगों से अटी-सिटी बसों, रिक्शों, कारों और दुपहिए वाहनों ने सड़क का जैसे दम घोंट दिया हो।
दो-यहां से गुज़रने पर नाली पर बैठकर नित्यकर्म निपटाते नंग-धडंग बच्चे इस कैनवास पर चित्रित पेन्टिंग का अभिन्न हिस्सा थे।
तीन-इसी स्कूल में अपने बालों में दो चोटियों पर सुखऱ् रिबन के गुलाब लगाए कन्धे पर बस्ता रखे स्कूल जाती वो लड़की, जिसे देखकर उसकी ज़ुबान तालू से चिपक जाती। वो अम्बियां और नीम की दातुन इकट्ठा करना और क़स्बे में उन्हें बेचकर पांचेक रुपए के साथ अपनी आंखों में चमक लिए घर लौटना।
चार-इस व्यवस्था की अमानवीय विशालकाया मशीन में यह किशोर गृह तो एक कूड़ाघर की तरह था, जहां वो अपने इस्तेमाल की गई चीज़ों और अपनी ग़लतियों से बिगड़ गई चीज़ों को फेंककर सुकून से रह सकती थी। अनवरत्-याथवत्। लेकिन ये बेजान चीज़ों का कूड़ाघर नहीं था, वो व्यवस्था के शिखर पर बैठै सत्तासीनों को तब एहसास होता जब इसी कूड़ाघर से हाथों में वो हथियार लेकर बाग़ी बन इन्हीं की नीव हिलाने लगते।
पांच-नये निज़ाम ने पूरी दुनिया में मुनाफा़ख़ोर पूंजी के बड़ै प्रचारतंत्र के हुंआ-हुआं से प्रभावित होकर एलान कर दिया कि पुराने तरीक़े अब काम नहीं वाले।
छह-लहूलुहान होकर फर्श पर गिरे दिलीप की हैरत भरी आंखें उसकी ओर टंगी हैं। मृत्यु से एक क्षण पहले उन आंखों में ख़ामोशी के साथ हज़ारों सवाल तैर रहे हैं।
कुछ कहानियों में कथाकार ने कहानी के मध्य ही कोष्ठक में शब्दों और वाक्यों का तर्जुमा हिन्दी में दिया है। इसी तरह कुछ आंचलिक शब्दों का उपयोग कर वहीं उसका हिन्दी में अर्थ दिया गया है। इसे इस तरह कहानी के बीचोंबीच नहीं दिया जाना चाहिए। यह पाठक के कहानी के स्वाद में बाधा पहुंचाता है। इसे आखिरी पन्ने पर दिया जा सकता था, या नीचे बाॅटम पर अलग से रेखांकित किया जा सकता था। या नहीं भी देने से काम चल जाता।
मुझे लगता है कि कहानी भी एक गीत की मानिंद होती है। कहानी अपना अर्थ देने में सक्षम होती है। जैसे-जैसे गीत की एक-एक पंक्ति आगे बढ़ती है, वह अपने आगे-आगे उसके मायने को साथ लेकर चलता है। उदाहरण के लिए किसी भी आंचलिक गीतों को ले लीजिए। भोजपुरी हो या गढ़वाली। गीतकार ने ठेठ आंचलिक शब्दों का उपयोग गीतों में किया है। सुनने वाला और गाने वाला भी उन गीतों में आए उन वाक्यों, शब्दों-अपरिचित शब्दों के अर्थ स्वयं खोजता है। तलाशता है। पता करता है। साहित्य खोजबीन की यात्रा भी है। गढ़वाल और कुमाऊं के कई गीतकारों ने गीतों में आंचलिक शब्दों को उपयोग किया है। उनकी व्याख्या नहीं की है। व्याख्या पाठक करता रहे। पूछे। इससे दो फायदे होते हैं। लोक धर्म भी बचा रहता है और शब्द मरते नहीं। 
शब्दों को सन्दर्भ के साथ जोड़कर देखने,परखने और बरतने की आदत बनी रहती है।

मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि कथाकार का उद्देश्य साफ है। वह अपनी कथाओं के माध्यम से पाठक को झकझोरना चाहते हैं। वे समस्या रखते हैं। हालातों का बखूबी चित्रण करते हैं। समाधान नहीं जुटाते। समाधान की ओर प्रेरित करते हैं। उत्प्रेरक का काम करते हैं। वे सवाल-दर-सवाल खड़ा करते हैं। वे पाठक को तनाव देते हैं। बेचैन करते हैं। हर कहानी इस बात की ओर इशारा करती है कि जिस समाज में हम रह रहे हैं उसमें मानवता भी हो। नैतिकता भी हो। इंसानियत भी हो। हम इंसान को तरजीह दें न कि किसी के पद और उसकी मिल्क़ीयत को। इन कहानियों के पात्रों में अलग-सी छटपटाहट दिखाई देती है। आक्रोश दिखाई देता है। तनाव दिखाई देता है। पात्रों के माध्यम से समाज में जो नहीं होना चाहिए, उसका भी उल्लेख किया गया है। पात्रों के सहारे रचनाकार एक समतामूलक समाज चाहते हैं। पात्रों के सहारे गैर बराबरी से उपजा असंतोष भी बेहतरीन ढंग से रेखांकित हुआ है।
समय साक्ष्य प्रकाशन के क्षेत्र में तेजी से उभरता हुआ उत्तराखण्ड का अग्रणी प्रकाशक बन रहा है। लेकिन इस पुस्तक के प्रकाशन में कुछ लापरवाहियां दिखाईं देती हैं। स्वयं प्रकाशक को अपनी ओर से पुस्तक के ले आउट पर ध्यान देना चाहिए था। पेज संख्या 02, 06, 10, 16 और 112 खाली छोड़ दिए गए हैं। खाली पेज अखरते हैं। आवरण चित्र किसका है? इसका उल्लेख नहीं है। कागज बेहतरीन है। फोन्ट भी अच्छा है। आंखों का कष्ट नहीं देता। चंद्रबिन्दु को बरतने में लापरवाही खूब दिखाई देती है। कुछ जगह अंग्रेजी के शब्द फोंट बदलने से गड़बड़ा गए हैं।
आशा की जाती है कि इस संग्रह को पाठक बहुत पसंद करेंगे।

॰॰॰ -मनोहर चमोली ‘मनु’
Mobil-0941218688
--------------------------------
पुस्तक: ब्रेसलेट
पेज संख्या: 112
मूल्य: 120
आकार: डिमाई (अजिल्द)
प्रकाशक: समय साक्ष्य, 15 फालतू लाइन, देहरादून
मेल: mailssdun@gmail.com

फोन: 0135-2658894

लेखक: एस॰पी॰ सेमवाल
सम्पर्क: 11 मन्दाकिनी एन्कलेव,डिफेंस काॅलोनी,देहरादून
मोबाइल: 9758502569
मेल:spsemwalgvs@gmail.com
-------------------------

BRACELET : SP SEMWAL 

by- Manohar hamoli 'manu'

7 अक्टू॰ 2016

पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन बसा है मल्यो की डार में

पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन बसा है मल्यो की डार में

-मनोहर चमोली ‘मनु’

सुपरिचित लेखिका, संस्कृतिकर्मी, एक्टीविस्ट, जनांदोलनकारी गीता गैराला की किताब ‘मल्यो की डार’ महज़ एक रचनाधर्मिता का उदाहरण नहीं है। इस बहा
ने लेखिका बड़ी आसानी से और स्थाई तौर पर पाठक के अंतस में पहाड़ और खासकर पहाड़ी स्त्री के जीवन का समूचा रेखाचित्र अविस्मरणीय ढंग से अंकित करने में सफल हुई है।
160 पेज, डिमाई आकार, सुरक्षित कागज़, उम्दा छपाई, अक्षरों की बुनावट आँखों को भा जाने वाली है। अठारह संस्मरणनुमा रचनाएँ जो रवानगी के साथ-साथ पाठक के मन-मस्तिष्क में आसानी से पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन के आम पात्रों का चित्रण करने में सफल हुई हैं। बचपन को याद करते हुए बचपन का खिलंदड़पन यहां पढ़ने को मिलता है। लोक जीवन के साथ-साथ मास्टर जी का जीवंत चित्रण पूरे रेखाचित्र के साथ उभरा है। यह किताब लेखिका ने अपने जन्म स्थल भट्टी गाँव को समर्पित की है।
उन्हीं के शब्दों में-’भट्टी गाँव के पेड़-पौधों, पौन,पंछियों, ठुल दादी, दादी-दादाजी, माँ,चाचियों और भूली बिसरी सब सहेलियों के लिए जन्हें (जिन्हें) मैं साँस के साथ जीती हूँ।’
'ठीक ही कहती थी दादी हम बस मल्यों की डार ही तो हैं। चरने के लिए मैदानों की तरफ उड़ गए। पर मल्यो तो केवल जाड़े में भावर जाते हैं, घाम तापने। शीत रितु खत्म होते ही अपने डेरों में लौट आते हैं। ये हैं असली प्रवासी। हम खुद को प्रवासी किस मुंह से कहते हैं, हम भगोड़े हैं, भगोड़े, जो एक गए और दुबारा पलट के नहीं लौटे।’
यहां डार का अर्थ,प्रसंग और सन्दर्भ ही बदल गया। वाह! खैर समूची पुस्तक पठनीय है।
अठारह रचनाओं में विविधता है। यादें हैं। बचपन है। भोलापन है। माता-पिता के संस्कार दिखाई देत हैं। परवरिश के तौर-तरीके दिखते हैं। बचपन की मस्ती और मासूमियत में पाठक मुस्कराता है। ऐसे कई अवसर आते हैं कि पाठक भी लेखिका के भीतर जमी गहरी भावनात्मक संवेदनाओं के साथ खुद को खड़ा पाता है।
पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोकजीवन, जीवन के कष्ट, दुःख-दर्द, पीड़ाएँ, रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी दिक्कतें-संकट, भूख, घर में आम रोटी को मयस्सर घरेलू महिलाओं की दिनचर्या, पानी-घास-लकड़ी के साथ जूझता समूचा पहाड़ी जीवन और उसके घेरे में घूमती-घुमाती स्त्री। एक संघर्ष गाथा यहां पढ़ते हुए देखने को मिलती है।
एक हजार छःह सौ मीटर की ऊँचाई से अधिक के पहाड़ी जीवन को करीब से जानने वाला पाठक खुद-ब-खुद लेखिका के साथ यात्रा पर निकल पड़ता है। पहाड़ की फसलें, जंगली फल, खेत, लोकजीवन की रामलीला, गांव के शादी-ब्याह, पहाड़ की परम्पराएं, संगीत, गीत बारात, संस्कृति को लेखिका ने न जाने कब अपनी आंखों से इतना करीब से देखा। ऐसे जीवट और सूक्ष्म अनुभव ही किसी रचनाकार की रचनाओं में प्राण से फूंक देते हैं।
बहुत सारी खासियतों के साथ पाठक को कभी-कभी लेखिका जिद्दी भी दिखाई दे सकती है। कहीं-कहीं लेखिका भी मानवीय दुर्बलताओं के साथ खड़ी दिखती है। यह स्वाभाविक भी है। मास्टर जी अंथवाल के साथ-साथ नजीब दादा हर पाठक को अवश्य भाएगी। दोनों चरित्र समाज के आम चरित्र हैं।
एक ओर मास्टर जी स्कूल का, पढ़ाई का, गांव का पूरा माहौल बदलते हैं तो वहीं गंगा-जमुनी की संस्कृति का प्रतीक बने नजीब दादा समरसता, प्यार-मुहब्बत के पर्याय बन जाते हैं।
भूमिका प्रख्यात कथाकार सुभाष पंत ने लिखी है। उन्हीं के शब्दों में कुछ शब्द-‘जब उस अनचाही ठेट लड़की ने काॅपी पर स्याही से लिखना शुरु किया तो उसकी उंगलियां स्याही से नीली हो गई। बार-बार धोने के बाद भी, वह स्याही छूटती नहीं थी। मुझे लगता है कि वह स्याही उसकी उंगली से अब तक नहीं छूटी। छूट जाती तो ‘मल्यो की डार’ जैसी अनूठी रचना का जन्म नहीं होता।’
बतौर लेखिका गीता गैरोला लिखती हैं-‘जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है हर व्यक्ति अपने बचपन की तरफ बार-बार लौटता है, तो क्या मैं भी उम्र बढ़ने के साथ अपने बचपन की तरफ बार-बार लौटती हूं। बीते हुए लम्हों को फिर से जीने के लिए। नहीं जानती सच क्या है? पर मैंने उन सब यादों को लिखने की कोशिश की है।’
भाषा शैली बेहद सरल सहज है। कहीं-कहीं वह विस्तार लेती है। कहीं भावपूर्ण हो जाती है तो कहीं चुटीले अंदाज में पाठक को एकाग्र रखने में सफल रहती है। पहाड़ी शब्दों से लेखिका ने परहेज नहीं किया है।

सरलता इतनी कि ऐसे लगता है कि पाठक अपने आस-पास ही सारा वृतांत घटता हुआ देखकर पढ़ रहा हो। मल्यो की डार, वहीं पर पड़ा है समय, घने कोहरे के बीच, देवता का खेल, कुणाबूड, मेरे मास्टर जी, प्यारे चक्खू, कोटे की फंकी, नजीब दादा, चैमास, बिजी जा, स्याही की टिक्की, ओ ना मासी धंग, मौसम सुहाना है, एक रामलीला ऐसी भी, सामूहिकता का रिवाज, नखलिस्तान, गांव की तरफ शीर्षक से ही जाना जा सकता है कि इस एक पुस्तक में कितने रंग हैं।
कहन, शैली, भाव और तेवर के कुछ उदाहरण आपकी नज़र-
‘अचानक में ‘उई’ कह कर बैठ गई। उनीन्दी दादी को झकझोर कर बोली,‘‘दादी उठ तू अभी मेरी दो चोटी बना दे, सुबह चोटी बनाने में प्रभात फेरी के लिए देर हो जाएगी।’’ मेरा उतावलापन देा दादा जी जोर से हंसे और बोले, ‘‘बेटा अगर दादी तेरे बाल अभी बना देगी तो रात भर सोने के बाद सुबह तक बाल खराब हो जाएंगे। तू मुझ पर विश्वास करती है न, सो जो। मेरी चखुली (चिड़िया) सुबह तुझे जल्दी से उठा दूंगा। पभात फेरी में सबसे आगे तू ही झंडा उठाकर चलेगी।’’--- ’
‘मैं जब कभी बीमार होती, बड़ी दादी मेरी गुदगुदी पीठ में एक धौल जमा कर कहती,‘‘अरे इस गदोरी का कुछ नहीं होगा। लड़कियां जीने के मामले में बड़ी छित्ती होती हैं।’’---’
‘दूसरे प्रकार के मास्टर ऐसे होते कि मास्टर जी की बेंत हाथों पर पड़ती या पीठ पर, गहरी नीली लकीर उभर आती। पर हम आंखों के आंसू बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर पाते। गलती से आंसू बह गये और मास्टर जी ने देख लिया तो दूसरी बेंत लगनी निश्चित होती।----’
‘उनके हर काम में एक संगीतमय लय और रिदम होती। हम सब उनके चलने-बोलने, गाने-नाचने, काम के तरीकों की नकल करके उन्हें दिखाते। मास्टरजी हमारी नकल पर खूब हंसते और कमी होने पर सुधार करवाते। देखो मैं ऐसे नहीं, ऐसे चलता हूं। ऐसे गाता हूं, ऐसे बोलता हूं।---’
मल्यों टिहरी में मळयो (काले-सांवले जंगली कबूतर) कहलाए जाने वाले से जुड़ा शब्द और उसके साथ डार। मल्यों की डार किताब का शीर्षक चैंकाता है। कभी खेती किसानी में ये जंगली कबूतर अनगिनत झुण्ड के साथ फसल पर टूट पड़ते थे। कोदा,झंगोरा क्या और मुंगरी क्या या फिर खलिहान में रखी फसल क्या। चट कर जाते थे। तब इन्हें डार गाली की तरह देखा जाता था। यह प्रवासी पक्षी के तौर पर देखे जाते हैं। हालांकि ये पक्षी अधिकतर समय पहाड़ में ही बिताते हैं लेकिन घरेलू कतई नहीं है। पाठक मल्यों की डार को इस तौर पर भी आसानी से समझ सकते हैं कि स्वयं लेखिका ने एक जगह उल्लेख किया है-‘जब हम बहनें स्कूल जाती वो कहती ‘‘हे राम। चलगी मेरी मल्यों की डार।’’ उस दिन मल्यो भगाने के बाद मैंने पूछा-‘‘दादी तू हम बहनों को भी तो मल्यो की डर कहती है।’’ ‘‘हां बाबा, बेटियां मल्यों की डार ही होती है। अपने मैत में चार दिन रुकी और फिर चल देती हैं दूसरे मुलुक।’’
पुस्तक मल्यों की डार में आँचलिक शब्दों का वहीं पर कोष्ठक में देना बाधा पहुंचाता है। पाठक संदर्भ के साथ उनके अर्थ खोज लेते हैं। बेहद ठेट शब्दों की सूची नीचे या अंत के एक दो पेजों पर दी जा सकती थी। वहीं के वहीं देने पर कहीं-कहीं पठन के आनंद को कम महसूस किए जाने का अंदेशा होता है।
प्रथम संस्करण अजिल्द, 2015 है। मूल्य दो सौ रुपए है। आवरण चित्र प्रख्यात घुमंतू पत्रकार, छायाकार कमल जोशी जी का है। लेखिका चाहती तो पहाड़ और पहाड़ी जीवन से संबंधित कुछ जीवंत चित्र भी पुस्तक में शामिल कर सकती थीं। यदि कुछ चित्र शामिल होते तो वह चित्र किताब की यात्रा को ओर जीवंत कर देते। बहरहाल कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह किताब पाठकों को एक चिर-परिचित दुनिया में ले जाती है। कई अनुभूतियों का आस्वाद कराती है। ***
पुस्तक : मल्यो की डार
लेखिका : गीता गैरोला
सम्पर्क : 9412051745
मेल : gairolageeta11@gmail.com
मूल्य: 200 रुपए
पेज: 160
प्रकाशक : समय साक्ष्य, 15 फालतू लाइन, देहरादून 248001
दूरभाष : 0135-2658894
॰॰॰

-मनोहर चमोली ‘मनु’भितांई,पोस्ट बाॅक्स-23पौड़ी 246001मेल - chamoli123456789@gmail.com

4 अक्टू॰ 2016

बाल साहित्य संस्मरण रमाशंकर जी के संपादन में

बाल साहित्यकारों के बचपन में झांकती है अतीत के पन्नों से







































-मनोहर चमोली ‘मनु’
साहित्यकारों का बचपन अतीत के पन्नों से बज़रिए डाक मिली। कई क्षेत्रों में निपुण प्रख्यात बाल साहित्यकार रमाशंकर के संपादन में यह पुस्तक इन दिनों बेहद चर्चित है। आवरण राजभगत का है। यह साहित्यकरों के बचपन पर आधारित तीसरा खण्ड है। ज़ाहिर है कि इससे पहले दो खण्ड इसी भव्यता के साथ प्रकाशित हुए हैं।फ्लैप प्रख्यात बाल साहित्यकार उषा यादव ने लिखा है।
वह लिखती हैं-‘हर बचपन एक जैसा नहीं होता। समय तथा परिवेश की ज्यामितिक रेखाएं बच्चे की जीवन-यात्रा का पथ निर्दिष्ट करती हैं। वक़्त और हालात ही बच्चे के मन, उसके सोचने के ढ़ंग, उसके सपनों की उड़ान, उसके हौसलों की बुनियाद और उसकी कार्य शैली को निर्धारित करने वाले कारक हैं।’
इस पुस्तक में पैंतालीस साहित्यकारों का बचपन प्रकाशित हुआ है। अधिकतर बाल साहित्यकारों ने अपना बचपन याद कर उसे करीने से लिपिबद्ध किया है। सौ से अधिक साहित्यकारों का संस्मरणनुमा, आत्मकथात्मक बचपन पढ़ते-पढ़ते पाठक के समक्ष सायास ही रेखाचित्र उभर जाएंगे, इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह कहना जरूरी होगा।नौ पन्नों में रमाशंकर ने अपनी बात रखी है। अपनी बात ही नहीं रखी बल्कि संपादन करते समय वह जिन अनुभवों से गुजरे, साहित्यकारों का लिखा-छपा कहीं भी पढ़ा, उसे उन्होंने अपनी बात में स्थान दिया है।
रमाशंकर जी अपनी बात में लिखते हैं कि बचपन एक दस्तावेज होता है। एक ऐसा दस्तावेज जिसे हर कोई संभाल कर रखना चाहता है। बचपन को संजोजकर रखना हमारी जिमेदारी है। ये हमारे स्वर्णिम अतीत की यादें हमारी पीढ़ियों को प्रोत्साहित करती रहेंगी।अपनी बात में रमाशंक ने गिजूभाई बधेका का भी उल्लेख किया है। वह अपनी बात लिखते-लिखते बचपन के अनुभवों की भी बात करते हैं और आज के बच्चों की दुनिया की भी चर्चा करते हैं।अपनी बात में वे बालस्वरूप राही के एक पत्र की चर्चा भी करते हैं।
बालस्वरूप ने रमाशंकर को लिखा-‘‘तुमहारे लिए लेख लिखते हुए मुझे भी अपना गुजरा हुआ जमाना बहुत याद आया। कभी मुसका दिया, कभी आंखों में आंसू आ गये। बड़े से बड़ा आदमी अपने बचपन को कहां भूल पाता है।’’बाल साहित्य के पुरोधा प्रकाश मनु के पत्र का भी उल्लेख मन की बात में किया गया है।
प्रकाश मनु लिखते हैं-‘‘बाल साहित्य का संबंध बचपन से है और बचपन के बारें में सोचते ही मानो एक जादुई दुनिया के द्वार खुल जाते हैं। बचपन बड़े सपने देखने की उमर है, इसीलिए बचपन बड़ी संभावनाओं का नाम है। हमारा बचपन मानो तय कर देता है कि बड़ै होकर हमें क्या बनना है और क्या कर गुजरना है। इसीलिए सबका बचपन एक जैसा होकर भी बहुत अलग है और इतने आनंदपूर्ण रहस्यों से भरा हुआ कि बचपन की बात छिड़ते ही हम जैसे बहने लगते हैं और समय को कुछ होश ही नहीं रहता।’’
अपनी बात में सुभद्राकुमारी चैहान, महादेवी वर्मा, अमृतलाल नागर, चन्द्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’, शंकर सुल्तानपुरी, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, देवेन्द्र मेवाड़ी सहित छह और बाल साहित्य में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराने वाले साहित्यकारों की महत्वपूर्ण टिप्पणियां शामिल की गई है।
ये संग्रह न सिर्फ बाल पाठकों के लिए उपयोगी है, बल्कि बाल साहित्य में शोध करने वालों के लिए जरूरी है। यही नहीं पैंतालीस बाल साहित्यकार जिनका बचपन यहां जीवंत हो उठा है वे चवालीस बाल साहित्यकारों का बचपन पढ़ सकेंगे। बाल साहित्य में कल, आज और कल के साहित्यकारों के लिए भी यह विविधता भरे समन्दर में डुबकी लगाने जैसा है।फिलहाल तो मैं इसे पढ़कर कहीं हंस रहा हूं तो कहीं कुछ लिखने का मन हुआ जाता है। कहीं मन बेहद भावुक हुआ जाता है। कहीं मन-मस्तिष्क वहां पहुंच जाता है जहां कभी कल्पना भी न की थी।
साहित्यकारों में सन्तोष कुमार सिंह, डाॅ॰ शेषपाल सिंह ‘शेष’, बलराम अग्रवाल, सुभाष नीरव, डाॅ॰ सुनीता, शुकदेव प्रसाद, घमंडीलाल अग्रवाल, कुसुमलता सिंह, डाॅ॰ अमिताभ शंकर राय चैधरी, डाॅ॰ विमला भण्डारी, रेनू चैहान, भगवती प्रसाद द्विवेदी, रमेशचन्द्र पन्त, क्षमा शर्मा, राकेश चक्र, लायक राम मानव, स्नेह लता, कौशल पाण्डेय, डाॅ॰ दिनेश पाठक ‘शशि’, डाॅ॰ हेमन्त कुमार, राजेश उत्साही, अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’, ओमप्रकाश कश्यप, कमलेश भट्ट कमल, हेमन्त यादव ‘शशि’, संजीव जायसवाल संजय, सुधीर सक्सेना ‘सुधि’, डाॅ॰ जगदीश व्योम, डाॅ॰सुरेन्द्र विक्रम, नीलम राकेश, राजीव सक्सेना, डाॅ॰ दिनेश चमोला ‘शैलेश’, कमलेश पाण्डेय ‘पुष्प’, सुरभि बेहेरा, कल्पना कुलश्रेष्ठ, गुडविन मसीह, श्यामसुन्दर श्रीवास्तव ‘चमन’, डाॅ॰ देशबन्धु शाहजहांपुरी, रमाशंकर, मनोहर चमोली ‘मनु’, डाॅ॰ नागेश पाण्डेय ‘संजय’, डाॅ॰ ज़ाकिर अली रजनीश, डाॅ॰ कामना सिंह, डाॅ॰ मो॰ साजिद खान, डाॅ॰ मो॰ अरशद खान का बचपन का अविस्मरणीय बचपन पढ़ा जा सकता है।
उदाहरणार्थ मैं कुछ अंश यहां दे रहा हूं-
एक-‘स्कूल में लकड़ी का एक बक्सा था जिसमें पुस्तकें रखी रहती थीं। प्रधानाध्यापक उसमेंसे पुस्तकें पढ़ने को दिया करते थे। यही स्कूल की लाइब्रेरी कहलाती थीं।
‘दो-‘बच्चों की पंक्तियों में टाट-पट्टी पर बैठना, लिखने की पट्टी रखना, सूखी खड़िया से गुरुजी के द्वारा हिन्दी की वर्णमाला के कुछ अक्षर लिखवाना और फिर पानी में घुली खड़िया से कलम का प्रयोग करके अक्षरों को लिाना पढ़ाई का प्रारभ था।
‘तीन-‘हस्तलेख इतना गन्दा था कि घर और स्कूल दोनों जगह करीब-करीब रोजाना ही पिटाई होती थी। घर पर पिताजी और चाचाजी कान खींचते थे और स्कूल में अध्यापक।’
चार-‘उन दिनों कहकरा अखबारी कागज पर होता था, काली इंक में एक ही रंग में छपी पांच या छह पैसे की पुस्तक आती थी। जो मास्टर ककहरा पढ़ाते थे, वे अपनी मार के लिए बहुत जाने जाते थे। मैं चित्र देखकर अक्षर तो रट चुका था। मगर चित्रों के बगैर अक्षरों की पहचान दिमाग में बैठ नहीं रही थी।
‘पांच-‘मैंने बाज़ भी पाल था! मैं हाथ पर चमड़े का पट्टा लपेटकर उसे बिठाता था। ज़रा भी चूक हो जाती, तो उसके संगीन नुकीले पंजे कलाई में धंस जाते। वह मेरे पास बहुत दिनों तक रहा। उसे पकड़ने और पालने के सारे हुनर मुझे आज भी याद हैं। पर आज ऐसा लगता है जैसे बचपन में मैंने पक्षियों को परेशान करके पाप किया था।
’छह- मां के पास सोने जाती थी, तो वह मेरे ठंडे हाथों को अपने गरम पेट पर रखती थी जिससे कि वे जल्दी गरम हो जाएं। रात में कई-कई बार कंबल और रज़ाई उढ़ाती थी कि कहीं मुझे ठंड न लग जाए। तब कभी नहीं लगता था कि इसमें मां को कितनी परेशानी हो रही होगी।
हम बच्चों की सुविधा के लिए वह हर सुख कुरबान कर देती थी। बल्कि आज तो कोई इस बात को सुनकर चकित हो सकता है कि मैं इतनी बड़ी उम्र तक मां के पास सोती थी।’चाहता तो था कि पैंतालीस साहित्यकारों को पढ़कर सबके बचपन का कोई यादगार अंश यहां आप सभी के समुख रखूं। लेकिन इसमें समय भी लगेगा और पुस्तक को आप तक पहुंचाने की आतुरता रोके नहीं रुक रही है।
संपादक को छोड़कर आप में से यदि कोई मुझे उपर्युक्त अंशों के रचयिता का नाम बता सकेंगे तो मैं भी प्रसन्न हो जाऊँगा और मुझे पता लगेगा कि आप ने भी पुस्तक पढ़ ली है।बहरहाल तीन सौ चार पृष्ठों की यह पुस्तक बाल साहित्यकारों के लिए किसी ग्रन्थ से कम नहीं है। कागज़ की गुणवत्ता अच्छी है। फोन्ट भी बेहतर है। हार्ड बाउंड में पुस्तक है। मूल्य पुस्तक पर 550 अंकित है।कुल मिलाकर इसे अधिकतर पाठक पढ़ना जरूर चाहेंगे।पुस्तक: अतीत के पन्नों से, साहित्यकारों का बचपन
मूल्य: 550 रुपए
पृष्ठ: 304
आकार: डिमाई
संपादन: रमाशंकर
प्रकाशक: लहर प्रकाशन,778,मुट्ठीगंज,इलाहाबाद 211003
॰॰॰-मनोहर चमोली ‘मनु’
मेल-chamoli123456789@gmail.com
मोबाइल-09412158688

19 सित॰ 2016

पत्रकार बनाम विकार

पत्रकार बनाम विकार

-मनोहर चमोली ‘मनु’


मैं लेखकों के सम्मान समारोह में पहुँचा तो वहां बतौर एक पत्रकार मेरा सहपाठी मिला। उसने मुझे पहचान लिया। कई सालों बाद वह मिला। अजनबी शहर था। उससे मिल मैं खुश हुआ। मैंने हैरानी जताई तो वह कहने लगा-‘‘भइए। पत्रकार हूँ। चील की नज़र रखते हैं हम पत्रकार।’’ 

हम एक ढाबे में बैठ गए। मैं लेखक हो गया हूँ। यह जानकर वह खुश हुआ। वह कहने लगा-‘‘सुना है लेखक बड़े काईयाँ होते हैं। क्या यह सही है?’’ मैंने जो तर्क दिए, वह उससे सहमत नहीं था। वह बोल पड़ा-‘‘एक-एक रचना को चार-छह जगह छपवाते हो। क्या यह ठीक है? पुरस्कार-सम्मान के लिए जुगत लगाते हो?’’


मुझे भी मौका मिल गया। मैंने कहा-‘‘एक जमाना था जब प्रिन्ट मीडिया के पत्रकार अपनी ख़बरों के छपने और छप जाने के बाद उन पर होने वाले विमर्श के लिए जाने जाते थे। वो दिन लद गए जब अव्यवस्था पर आधारित किसी भी ख़बर का तत्काल संज्ञान लिया जाता था। तब एक्सक्लूसिव ख़बर पर बाई-लाइन मिला करती थी।’’

यह शब्दावली सुनकर पत्रकार मित्र हैरान था। फिर उसे याद आया कि अपन तो तह तक कि जानकारी रखते हैं। 

मैंने अपनी बात बढ़ाई-‘‘एक बड़े क्षेत्र में अमुक ख़बर का पत्रकार कई दिनों तक जन सरोकारों की लड़ाई का वीर योद्धा माना जाता था। आज स्थिति उलट है। क्यों? कितना कमा लेते हो?’’ 

पत्रकार मित्र के शब्द थे-‘‘आज अख़बार चिथड़ा कंपनी हो चुके हैं। मिशनरी पत्रकारिता बनिए की नौकरी हो गई है। पत्रकार विकार हो गए हैं। गांधी आश्रम का झोला और गांधीगिरी का स्वभाव बीती बात हो चली है। खादी का कुर्ता पत्रकारों के आचरण से मलिन हो गया है। मैं जब आज की ख़बर भेजता हूं तो मुझे वह ख़बर आने वाले कल के अख़बार में मिले न मिले, इसका पक्का पता नहीं रहता। आने वाले कल के साथ सूरज तो आएगा लेकिन मेरी नौकरी का वह दिन भी होगा कि नहीं! यह संशय बना रहता है।’’

मैंने उदासी से पूछा-‘‘लेकिन पत्रकारों की जीवन शैली तो कहती है कि वे बहुत मज़े में हैं !’’

मित्र ने लंबी सांस छोड़ते हुए कहा-‘‘कब्र में मुर्दे का हाल मुर्दा ही जानता है। अधिकतर अख़बार में काम करने वाले पत्रकार तेल पंप में काम करने वाले कार्मिकों से भी बदतर स्थिति में वेतन पाते हैं। ये ओर बात है कि तेल पंप वाला गाड़ियों की टंकियों में तेल भरता तो नज़र आता है। लेकिन हम पत्रकार क्या भर रहे हैं, पता नहीं। अरे! निजी चालकों को मिलने वाला वेतन नहीं मानदेय मिलता है।’’

वह बोलता रहा-‘‘अख़बार मालिक जानते हैं कि कुछ पत्रकार कस्बाई पत्रकारिता करते हुए और प्रेस कार्ड का हवाला देते हुए गल्ले से चीनी ऐवें ही उठा लेते हैं। गेहूं की बोरियां तक उठा लेते हैं। किसी भी होटल में घुस कर जलपान, भोजन और डिनर भी कर लेते हैं। आबकारी विभाग के साथ-साथ कस्बें की अंग्रेजी-देसी की शराब की दुकान से बिना नागा बोतलें उठा लेते हैं। अधिकारियों-पुलिसकर्मियों के साथ रोज-रोज ख़बरों की पड़ताल के बहाने उठना-बैठना कर रोज की चाय आदि वहीं घुप्प कर लेते हैं। पत्रकार वार्ताओं के दौरान पिठाई-सा लिफाफा पकड़ लेते हैं। बार-त्योहार में मिठाई बटोरते हुए चारों ओर दिखाई देते हैं। पहले तो कलम-डायरी मांगते थे। अब पत्रकार विज्ञापन के साथ-साथ व्हाट्स एप और फेसबुक चलाने के लिए इंटरनेट पैक की मांग तक कर लेते हैं।’’

मैंने कहा-‘‘ये तो बढ़िया है।’’

मित्र ने फिर लंबी सांस छोड़ी-‘‘क्या खाक बढ़िया है। क्या हम नहीं जानते कि एक आम आदमी भी अख़बार पढ़ते समय दस में नौ गालियां हम पत्रकारों को देता है। हम जहां से गुजरते हैं। हमारे गुजरने के बाद ही पीठ पीछे वह गालियों की लड़िया जला देता है।’’

मैंने कहा-‘‘मान्यता प्राप्त पत्रकारों की क्या हालत है?’’

मित्र उदास हो गया। कहने लगा-‘‘वहां तो और गफलत है। वे कुछ हैं जो बड़ी मेहनत से स्वतंत्र पत्रकार का तमगा लगाए हुए हैं। अच्छी खबरें बनाते हैं। पर उन ख़बरों पर असर क्या खाक होता है। आजादी के बाद कोई भी पत्रकार अपनी पांच खबर बता दे जिस पर व्यवस्था ने संज्ञान लेकर स्थिति कायापलट कर दी हो। चोरी-चकारी, अपराध, लूट, अपराध, सामाजिक वैमनस्य सब बढ़ा ही तो है। स्वतंत्र पत्रकारों को अब अपनी सदस्यता बचाए बनाए रखने के लिए खूब मशक्कत करनी पड़ती है। सूचना विभाग के साथ-साथ सूबे के राज्य लोक सूचना संपर्क विभाग के आला अफसरों की हंसी के साथ बेमेल हंसना पड़ता है। उनकी हां में हां मिलानी होती है। हां बस रोडवेज में यहां वहां यात्रा करने का कार्ड फोकट का मिला हुआ है बस। कोई मानदेय थोड़े न मिलता है!’’

मैंने पूछा-‘‘लेकिन गली-मुहल्लों से प्रकाशित पत्र-पत्रिका के संपादक क्या और पत्रकार क्या ! गाड़ी-घोड़ा-बंगला, बच्चों को कान्वेंट में पढ़ा रहे हैं। दो से तीन जगह जमीने ली हुई हैं। यह सब कहां से? कैसे?’’

मित्र ठहाके लगाकर हंसने लगा। कहने लगा-‘‘सब भ्रम है। कुछ सच्चाई भी है। अब रहने दो।’’

मैंने मित्रता का वास्ता दिया तो कहने लगा-‘‘हम पत्रकार कमजोर नस पकड़ते हैं। मंत्रियों की, संत्रियों की, बड़े-बडे रसूखदारों की। अधिकारियों की। बस होल ही गोल हो जाता है। प्रभाव में न आया तो ख़बर। प्रभाव में आया तो अपन का अभाव खल्लास।’’

मैंने मज़ाक में कहा-‘‘यदि जिन्हें आप गली-मुहल्ले के पत्रकार कह रहे हो, उनकी संपत्ति की जांच हो जाए तो?’’

मित्र सतर्क हो गया। कहने लगा-‘‘नप जाएंगे। एक बात और हम पत्रकार तभी तक शेर हैं, जब तक हमारे पास पत्रकारिता का तमगा है। जैसे ही हम अख़बार से निकाले जाते हैं तब हम पर कुत्ता भी नहीं भौंकता। और हां जब हम नपते हैं तो पुलिस बाघ बनकर हम पर टूट पड़ती है। जब तक जमानत-छुड़वा-छुड़वाई होती है, तब तक खूब बज पड़ते हैं। अब जिसके बजते हैं वो कहां बतायेगा कि हुजूर आते-आते बहुत देर कर दी। बेचारा कई दिनों तक मलहम-सेक करता है वह भी चुपचाप।’’

मैंने कहा-‘‘तुम कुछ ज़्यादा ही बोल रहे हो। नाम-हाम तो खूब रहती है। आपके बजे क्या?’’

वो इधर-उधर देखते हुए चिल्ला-सा पड़ा। कहने लगा-‘‘क्या खाक नाम-हाम है हमारी ! क्या बकत है हमारी? वो तो अच्छा है कि मुर्दा अपनी मुर्दा-पड़ोसी में यह नहीं जान पाता कि कितने आते हैं और कौन आते हैं। नहीं तो हमारी शवयात्रा में शोकसंतप्त जुटाने वाले जुटाना एक्सक्लूसिव ख़बर जुटाने से कम नहीं।’’

मैं उठकर जाने लगा। मित्र कहने लगा-‘‘यार बुरा मान गए। जैसे कि तुम खुद पत्रकार होंगे। इतना तो बुरा मुझे भी नहीं लग रहा है जो मैं खुद पत्रकार हूं। वो भी बाकायदा पत्रकारिता में नंबर एक के विश्वविद्यालय की डिग्री लेकर प्रशिक्षण पाया हुआ हूं। अगर सूबे के सभी पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता खगाल ली जाए तो अधिकतर हाई-स्कूल-इण्टर फेल पाए जाएंगे।’’

मैंने फिर कहा-‘‘यार। बिना पड़ताल किए कैसे बोल रहे हो? शरम करो।’’

वह हंसा। हंसता ही रहा। कहने लगा-‘‘यूं ही पत्रकारिता को लोकतंत्र का सशक्त स्तंभ नहीं कहा गया। वो दिन लद गए।  आज तो पत्रकारिता करने वाले को संस्कार की नहीं, शिक्षा की नहीं, अध्ययन की नहीं, संयम की नहीं, संतोष की आवश्यकता नहीं। आज तो वह जितना नीचे गिर सकता है, उसे गिरना पड़ता है। तभी तो वह कुछ लिखेगा। बुराई पर लिखने के लिए बुरा भी तो बनना पड़ता है। बुरा भी होना पड़ता है। पत्रकारिता कोई न्यायपालिका तो नहीं है न कि सैकड़ों रातें जागकर, कानूनों की पोथियां पढ़कर उसके द्वार के भीतर के लायक बनना होता है। हर मुकदमें में पढ़ना पड़ता है।’’

वह कुछ याद करता हुआ बोला-‘‘आज तो पत्रकार बाबू सा काम भी नहीं करते। जो छपवाना है, वो लिखकर लाना होता है। चार बजे से पहले लाना होता है। अब ख़बर छपवाने वाले को पहले खुद समझना होता है कि इन्ट्रों क्या होता है। हैडलाइन क्या बनेगी। खबर में क्या, क्यों, कैसे, कौन, कब, कहां किस तरह फिट होगा। चलता हूं। मूड बनाने का वक्त हो गया है। देखता हूं किस दरवाजे खड़ा होना होगा। शाम होते ही पेट जलने लगता है। और हां चाय के पैसे दे देना। क्या जेब में एक लाल वाला गांधी पड़ा है? बच्चे की फीस देनी है कल।’’

उसे पांच-पांच सौ के दो नोट देकर विदा किया। लेकिन मैं अब तक सोच रहा हूं। क्या पीत पत्रकारिता के भी हिस्से हो गए हैं। वैसे मैं जितने पत्रकारों को जानता हूं, उनमें से अधिकतर दूसरी नौकरी में चले गए हैं। रहे-बचे समाज में अपनी हैसियत-इज्ज़्त को बचाते हुए छटपटाते दीखते हैं। कुछ शराबी हो गए हैं। लेकिन ऐसे भी हैं जो आज भी अध्ययनशील हैं। मननशील हैं। सामाजिक अव्यवस्थाओं पर पसीजते हैं। जिनका आज भी रुतबा है। जिन्हें देखकर लोग अदब से सिर झुकाते हैं।

एक पत्रकार मित्र से मिलने उसके घर गया। उसका परिवार ससुराल गया हुआ था। आवाज दी तो वह भीतर से बोला-‘‘चले आओ। खुला है।’’ मैं अंदर गया। देखा साहब बिना दरवाजा बंद किए हग रहे हैं। बदबू से घर सड़ांध मार रहा है। मैंने नाराजगी जताई। कहा-‘‘हद है, दरवाजा तो बंद रखो।’’

वह तपाक से बोला-‘‘बारह घंटे का किया-धरा खुद काहे सुंघूं?’’ 

मैंने उसके घर के सारे पंखें चालू किए। वह कहने लगा-‘‘रहने देता। अगरबत्ती जलाता हूं। क्या करें धन्धा ही ऐसा है। सुबह उठते समाचार में नकारात्मक ख़बरें पढ़ता हूं। नकारात्मक ही भेजता हूं। समाज के प्रति नकारात्मक सोचते-सोचते खुद भी नाकारा हो गया हूं। कभी-कभी अपने पेशे पर शरम आती है और खुद पर भी।’’

मैं क्या कहता। एक जनहित की ख़बर बताने उसके द्वार पर गया था। बताई भी। एक महीने बाद देखा पत्रकार उस संबंधित विभाग के आला अफसर की ही गाड़ी में बाजार में घूम रहा है।

अब तक सोच रहा हूं कि यह मित्र किन पत्रकारों की बात कर रहा था। क्या आप भी पत्रकारों से कुछ वास्ता रखते हैं? यदि हां तो आपका अनुभव क्या कहता है? 
॰॰॰
(विधा: व्यंग्य)
-मनोहर चमोली ‘मनु’,डिप्टी धारा मार्ग,पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड।  

12 अप्रैल 2016

नन्हे सम्राट, मई 2016. वृक्ष कथा: कौन बढ़ेगा आगे कौन रहेगा पीछे?

नन्हे सम्राट, मई 2016.


वृक्ष कथा: कौन बढ़ेगा आगे कौन रहेगा पीछे?


-मनोहर चमोली ‘मनु’


हमेशा की तरह शहजादा सलीम किसी की मदद कर वापिस तिलस्मी नदी के किनारे आ पहुंचा। रात भर घोड़ पर सवार शहजादा सलीम थक चुका था। वह चाहता था कि भोर होने से पहले वह कुछ पल आराम कर ले। उसने अपने घोड़े को एक पेड़ के तने से बांधा और नदी किनारे आरामदायक घास पर आराम की मुद्रा में लेट गया। कुछ ही क्षणों में उसे नींद आ गई। वहीं अपने नियत समय पर पौ फटते ही समूचा वन क्षेत्र पक्षियों के कलरव से गूंजने लगा। पूरब की ओर क्षितिज लालिमा लिए हुई सुबह होने का संकेत दे चुका था। अचानक शहजादा सलीम का घोड़ा हिनहिनाने लगा। किसी खतरे की आशंका के चलते शहजादा उठ खड़ा हुआ। उसने झट से अपनी तलवार खींच ली। शहजादे ने यहां-वहां देखा लेकिन उसे कोई नहीं दिखाई दिया। वह उनींदी में उठा और नदी की ओर चल पड़ा। वह भूल गया था कि तिलस्मी नदी का जल पीना खतरे से खाली नहीं। वह पानी की छपकी अपने चेहरे पर डालकर तरोताज़ा होना चाहता था। वह जैसे ही नदी के तट पर पहुंचा और जल की ओर झुका ही था कि एक पुरुष स्वर ने उसे रोक दिया। स्वर था-‘‘हे युवक। यह तिलस्मी नदी है। जल को छूना खतरे से खाली नहीं है। मुझे देखो, मैं यहां वृक्ष बना खड़ा हूं। क्या तुम भी वृक्ष बनना चाहोगे।’’

शहजादा ठिठका और दूसरे ही क्षण उसने अपने कदम पीछे खींच लिए। वह बोला-‘‘ओह! थकान ने मेरे सोचने-समझने की ताकत भी छीन ली। मैं तो इस तिलस्मी नदी के स्वभाव को जानता हूं।’’ शहजादा वृक्षों की ओर देखकर बोला-‘‘हे वृक्ष बन चुके पुरुष अपना परिचय दो। यह भी बताओ कि तुम वृक्ष कैसे बन गए? मैं शहजादा सलीम हूं।’’

स्वर ने कहा-‘‘शहजादा सलीम मेरा अभिवादन स्वीकार करें। मैं चतुरसेन हूं। काशीपुर के राजा केशवराज का सलाहकार। मैं किसी बुद्धिमान की तलाश में यहां से गुजरा और प्यास के चलते इस तिलस्मी नदी का जल पीने से बरगद का वृक्ष बन बैठा। मैं जिस समस्या के चलते यहां तक पहुंचा, उसी समस्या के निराकरण के पश्चात ही मुझे वृक्ष रूप से मुक्ति मिल सकेगी।’’

शहजादा सलीम बोला-‘‘आप तो सलाहकार हैं। फिर किसी बुद्धिमान की तलाश क्यो?’’

बरगद के वृक्ष से आवाज आई-‘‘शहजादे। काशीपुर के राजा केशवराज के दो राजकुमार हैं। एक का नाम है उदयराज है। दूसरे का नाम कंवलराज है। काशीपुर के राजा केशवराज किसी एक को राजगद्दी सौंपना चाहते हैं। पिछले एक बरस से उदयराज और कंवलराज काशीपुर के भ्रमण पर थे। जव वे लौटे तो राजमहल के मुख्य मार्ग में आने से पूर्व दोनों के रथ आमने सामने आ गए। दोनों के सारथी एक दूसरे को रास्ता देने क अनुरोध करने लगे। रास्ते से एक को अपना रथ पीछे कर हटना होगा, तभी दूसरा रथ मार्ग पर आगे बढे़गा। दोनों राजकुमार एक दूसरे को रास्ता देने पर अड़ गए। ’’

शहजादा सलीम मुस्कराया। कहने लगा-‘‘फिर क्या हुआ?’’
बरगद के वृक्ष से आवाज आई-‘‘शहजादे। दोनों के रथ आमने-सामने आज भी खड़े हैं। उदयराज और कंवलराज रथ से उतर कर राजमहल जा पहुंचे लेकिन किसी को भी अपना रथ पीछे हटना मंजूर नहीं था। अब राजा केशवराज के समक्ष समस्या यह है कि वह यह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि मार्ग पर खड़े दोनों रथों के किस सारथी को अपना रथ पीछे करना होगा और किसे पहले आगे बढ़ने का सममान मिलेगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘ओह! तो यह वर्चस्व को लेकर प्रतिष्ठा-मान-समामान का प्रश्न बन गया है। मुझे इन दोनों राजकुमार के स्वभाव और विशेषताओं के बारे में विस्तार से बताओ।’’  

बरगद के वृक्ष के भीतर से चतुरसेन ने दोनों राजकुमारों के बारे में शहजादा सलीम को विस्तार से बताया। चतुरसेन ने कहा-‘‘शहजादे सलीम। मुझे यकीन है कि आप मुझे वृक्ष रूप से मुक्ति दिला सकोगे। इस तिलस्मी नदी ने मुझे शाप दिया है कि जब तक राजकुमारों के रथ न्यायसंगत और तर्कसंगत रूप से उन दोनों राजकुमारों के संतुष्ट होने पर आगे बढ़ेंगे तभी मैं वृक्ष काया से अपने असले रूप में आ सकूंगा। जैसे ही यह होगा, मैं चतुरसेन हो जाउंगा और आपके आने पर ही यहां से प्रस्थान करूंगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘आचार्य चतुरसेन। मैं पूरा यत्न करूंगा। आप तो मुझे शुभकामनाएं दें।’’
बरगद का वृक्ष झूम उठा। वृक्ष के भीतर से चतुरसेन बोला-‘‘मैंने जिस तरह से सारी कथा आपको सुनाई है। तत्पश्चात जिस कौतूहल और जिज्ञासा से आपने राजन और राजकुमारों के बारें में विस्तार से जानना चाहा है निश्चित रूप से आप संकरे मार्ग में रुके हुए उन दोनों राजकुमारों के रथ को उचित मान-सममान देकर आगे बढ़ने के लिए बाध्य कर देंगे। अविलंब जाओ। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। आप चतुरसेन का नाम लेंगे तो राजन आपको सीधे निजी कक्ष में बुलाएंगे। मुझे पूरा भरोसा है।’’

दूसरे ही क्षण शहजादा सलीम अपने घोड़े पर सवार था। सलीम का घोड़ा तेज गति से काशीपुर की ओर बढ़ने लगा। 
वही हुआ। शहजादा सलीम महल के द्वार पर पहुंचा ही था कि द्वारपाल ने रोकते हुए पूछा-‘‘हे। अजनबी घुड़सवार आप बिना राजा की अनुमति के राजमहल में प्रवेश नहीं कर सकते। कृपया पहले अपना परिचय दें।’’

शहजादा सलीम बोला-‘‘मुझे चतुरसेन ने भेजा है। मैं तिलस्मी नदी के तट पर बरगद का वृक्ष बन चुके चतुरसेन का मित्र सलीम हूं। समय कम है। मेरी सूचना राजन तक पहुंचा दें। यदि वे मिलना चाहेंगे तो उचित है अन्यथा मैं लौट जाउंगा।’’

द्वारपाल ने दौड़कर सूचना राजा केशवराज को दी। दूसरे ही क्षण महामंत्री दौड़ता हुआ द्वार पर आ पहुंचा। वह बोला-‘‘सलीम। अभिवादन। हमारे राज्य में आपका स्वागत है। राजन अपने शयनकक्ष में ही आपसे मिलना चाहते हैं। चलिए शयनकक्ष के द्वार तक मैं आपको छोड़ सकता हूं।’’ शहजादे का घोड़ा अस्तबल के रक्षक ने अस्तबल तक सुरक्षित पहुंचा दिया। वहीं दूसरे ही क्षण शहजादा सलीम राजा केशवराज के निजी शयनकक्ष में पहुंच गया था। राजा केशवराज ने बड़ी आत्मीयता से स्वागत किया। सारा किस्सा जानकर शहजादा सलीम ने राजन का ढाढस बंधाते हुए कहा-‘‘राजन। कल सुबह दोनों राजकुमारो सहित मुझे आपके राज्य के चारों दिशाओं के चालीस-चालीस प्रबुद्ध नागरिक भी उस संकरे मार्ग पर उपस्थित चाहिए, जो दोनों राजकुमारों के काम-काज से वाकिफ हों।’’ राजा केशवराज बोले-‘‘आप चिंता न करें शहजादे सलीम। सब कुछ आपके अनुसार ही होगा।’’

सुबह हुई तो उसी संकरे मार्ग पर राजकुमार उदयराज और कंवलराज अपने अपने रथ पर सवार हो गए। मंत्री,महामंत्री,राजपुरोहित,महारानी और स्वयं राजा केशवराज भी उस मार्गस्थल पर आ पहुंचे। दोनों सारथी पहले की तरह अपने-अपने रथों पर सवार हो गए। राज्य काशीपुर की चारों दिशाओं से आए नागरिक भी यहां-वहां खड़े हो गए। शहजादा सलीम भी अपने घोड़े पर सवार था। 
शहजादा सलीम ने सारथियों से कहा-‘‘अपने अपने रथ आगे बढ़ाइए।’’

राजकुमार उदयराज का सारथी बोला-‘‘रास्ता संकरा है। एक रथ को पीछे हटकर रास्ता छोड़ना होगा। तभी दूसरा रथ आगे बढ़ सकेगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘तो फिर एक रथ पीछे हटे और दूसरे को रास्ता दे दे।’’
अब कंवलराज का सारथी बोला-‘‘यही तो समस्या है। यही तो तय होना है कि किस राजकंुवर का रथ आगे बढ़े और किस राजकुंवर को अपना रथ पीछे करना होगा। समस्या तो जस की तस बनी है।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘जिस रथ की नक्काशी बेहतरीन है। बहुमूल्य है। उसे आगे बढ़ने दो।’’
स्वर्णकार बुलाए गए। आंकलन किया गया। यह क्या! दोनों ही रथ एक समान मूल्यवान निकले।
शहजादा सलीम बोला-‘‘जो राजकुमार सदाचारी है,उसका रथ आगे बढ़ेगा।’’

राजपुरोहित बुलाया गया। आचार्य बुलाए गए। उनके मूल्यांकन के आधार पर दोनों राजकुमार एक समान सदाचारी पाए गए। 
शहजादा सलीम बोला-‘‘जो आयु में छोटा है, वह बड़े को रास्ता दे। बड़े के रथ को रास्ता दिया जाएगा।’’
महारानी आगे आईं। कहने लगी-‘‘उदयराज और कंवलराज जुड़वा है। वह ठीक एक ही घड़ी में पैदा हुए हैं। रूप, भार और सौंदर्य में भी वे एक समान हैं।’’
शहजादा सलीम ने कहा-‘‘तो ठीक है। अब निर्णय रथ के सारथी करेंगे। पिछले एक मास से दोनों राजकुमार राज्य का भ्रमण कर रहे थे। सारथी पल-पल अपने-अपने राजकुमार के साथ थे। वे ही बताएं कि उनके राजकुमार की क्या खास विशेषता एक राजा के तौर पर वे देखते हैं।’’

राजकुमार उदयराज का सारथी कहने लगा-‘‘मेरे राजकुमार महान हैं। वे शठे शाठ्यं समाचरेत् की नीति का पालन करते हैं। दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करते हैं। भले के साथ भला और बुरे के साथ बुरा करते हैं।’’ उपस्थित जन समुदाय में कुछ ने करतल ध्वनि से राजकुमार उदयराज का पक्ष लिया। 
अब कंवलराज के सारथी ने कहा-‘‘मेरे राजकुमार अच्छे का साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और बुरे के साथ भी अच्छा व्यवहार करते हैं। यह बुरों को भी अच्छा बनाने का सफल प्रयास करते हैं। इन्होंने कई अपराधियों के साथ अच्छा व्यवहार कर उनका मन जीता है।’’ यह क्या! इतना सुनते ही चारो दिशाओं से आई प्रजा कंवलराज के पक्ष में जयकरे लगाने लगी। वहीं दूसरी विचित्र बात यह हुई कि उदयराज ने अपने सारथी को आज्ञा देते हुए कहा-‘‘सारथी। हमारा रथ पीछे करो। आगे बढ़ने का पहला हक भ्राता कंवलराज का है।’’
दूसरे ही पल उदयराज के सारथी ने रथ पीछे हटाया। संकरे रास्ते के एक किनारे पर रथ को खड़ा किया, वहीं राजकुमार कंवलराज के रथ को मार्ग खुला मिला और वह आगे बढ़ता चला गया। 

पूरे प्रकरण की साक्षी जनता शहजादे सलीम को आदर भाव से निहार रही थी। इससे पहले कि राजा केशवराज शहजादे सलीम को धन्यवाद कहते, वह तेज गति से अपने घोड़े पर सवार होकर तिलस्मी नदी की ओर बढ़ चुका था। शहजादा सलीम जानता था कि राजा केशवराज का सलाहकार चतुरसेन बरगद के वृक्ष का रूप त्यागकर अपने मनुष्य रूप में आ चुका होगा। इससे पहले कि तिलस्मी नदी के आस-पास चतुरसेन के साथ कोई और अप्रिय घटना घटे, वह उसे सुरक्षित उस तिलस्मी क्षेत्र से बाहर जो निकालना चाहता था।  
***
Manohar Chamoli 'manu'

10 अप्रैल 2016

जनवरी 2016 अपूर्व उड़ान

जनवरी 2016 अपूर्व उड़ान का दूसरा अंक है। आवरण देखते ही बनता है। चित्रांकन एवं ग्राफिक्स आशुतोष के हैं। विशुद्ध रूप से यह आवरण बालमन का ही है। बच्चों की दुनिया से लिया गया है। पतंग आज भी कौतूहल का विषय है। जो उड़ाना जानते हैं और जो नहीं भी। आवरण पत्रिका के नाम से मेल भी खाता है। 60 पेज की बहुरंगीय मासिक पत्रिका में नया साल 2016 का कैलेण्डर भी है। जिसमें तारें ज़मीन पर के दर्शिल को आसानी से पहचाना जा सकता है।

इस अंक में सात कहानियां,पांच कविताएं,दो चित्रकथाएं,छह स्थाई स्तंभ,आठ बच्चों के लिए खेल-खेल में सीखने विषयक गतिविधियां हैं। एक थीम स्टोरी भी है। छह विविध रचनाएं हैं, जिनमें से अधिकतर बाल सुलभ हैं।

संपादकीय सरल है। सहज है, आम भाषा में लिखा गया है। बच्चों से बात करता हुआ नज़र आता है। ठीक भी है। अपूर्व उड़ान ने मान लिया है कि यह पत्रिका बच्चों के लिए है बच्चों के लिए लिखने वालों के लिए नहीं। संपादकीय के बहाने संपादक राजेन्द्र प्रसाद तिवारी कई सारी बातों को आसानी से कह जाते हैं। वह अपनी बात सर्दी से शुरू करते हैं। नये साल की खुशबू भी संपादकीय में है। वहीं वह बच्चों को भारत के बारे में सोचने का सादा सा नज़रिया भी प्रस्तुत करते हैं। वह बच्चों को कमतर नहीं आंकते, न ही कुछ विशेष बनने की अपील करते हैं। वह तो बस इतना ही कहते हैं कि तुम्हारे भीतर प्रतिभा की कमी नहीं है। कहना होगा कि चुलबुली दुनिया के साथ-साथ पत्रिका अपने वैज्ञानिक नज़रिए के साथ बच्चों के मन में गहरी पैठ बनाएगी।

पांच पाठकों की चिट्ठी अंक में हैं। मज़ेदार बात यह है कि पांचों चिट्ठियां बच्चों ने लिखी हैं। कक्षा नौ तक पढ़ने वाले बच्चों के मन की आवाज़ चिट्ठियों में गूंजती है। पवन शर्मा ने अपनी थीम स्टोरी में सेवा के भाव को प्रमुखता दी है। दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चों में सेवा का भाव चरम पर होता है और सबसे अधिक होता है। वह खेल-खेल में ही घर के अंदर ही कई किलोमीटर की यात्रा कर लेते हैं। बिना थके और बिना रुके। पांच युगपुरुषों के परिचय के साथ सेवा का भाव करीने से संजोया गया है। तीन समाचार जो प्रत्यक्ष तौर पर बच्चों से ही जुड़े हुए हैं,शामिल किये गए हैं। एक चित्रकथा विवेकानंद पर गतांक से आगे चल रही है। चित्रकथा के चित्र बालमन के अनुरूप बने हैं। अक्षरों का आकार भी बालमन के अनुसार रखा गया है। मुस्कुराइये के तहत चार चुटकुले हैं। विज्ञान कथा कलैण्डर पर है। इसे जाने-माने बाल साहित्यकार एवं विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने सरल एवं रोचकता के साथ लिखा है।

मंगरूराम मिश्र, शांति अग्रवाल, डाॅ॰ फहीम अहमद, पूर्णिमा वर्मन, विनोद भृंग की कविताएं गुदगुदाती हैं। कहानियों में प्रख्यात बाल साहित्यकार डाॅ॰मंजरी शुक्ला, वरिष्ठ बाल साहित्यकार प्रकाश मनु, प्रख्यात बाल साहित्यकार डाॅ॰ नागेश पांडेय संजय, प्रखर बाल साहित्यकार अरविन्द कुमार साहु, स्कूली बच्चों की दुनिया को कहानी में विषय बनाने वाली बाल साहित्यकार अनीता चमोली ‘अनु’,बढ़ते बच्चों की तेजी से बदलती दुनिया की नब्ज़ पर गहरे हाथ रखने वाले बाल साहित्यकार डाॅ॰ मोहम्मद साजिद खान की नायाब कहानियां शामिल हैं। 

बच्चों ने भी अपने चित्र भेजे हैं। बच्चों की जीवंत फोटो भी पत्रिका में शामिल की गई है। इस तरह से लगभग बीस बच्चे प्रत्यक्ष रूप से इस अंक में जुड़ गए हैं। ज्ञानवर्धक बातें, सरल शब्द पहेली, कहानी पूरी करो, चित्र बनाओं प्रतियोगिता, मुहावरे ढूंढो, जनवरी क्विज़ शामिल हैं। बच्चों को ज्ञान-विज्ञान से हलके से सरलता से परिचित कराने के लिए भी स्तंभ रखे गए हैं। कुल मिलाकर पत्रिका बहुत जल्दी ही एक सशक्त बाल पत्रिका के तौर पर स्थापित होने की सम्पूर्ण क्षमता रखती है।
एक अनाम बाल नाटक भी पत्रिका में शामिल है। 

पवन शर्मा ने जनवरी को बड़े ही रोचक ढंग से बच्चों के लिहाज़ से प्रस्तुत किया है। हुनरमंद चार बच्चों की फोटो के साथ उनका विवरण भी पत्रिका में दिया गया है।

रंग संयोजन बालमन के अनुसार रखे गए हैं। कहीं-कहीं चटकीले रंगों ने आलेखों को मंद कर दिया है। कुल मिलाकर एक-एक पेज पर ध्यान रखने की भरपूर कोशिश की गई है। पत्रिका का कागज उम्दा है। ग्लैज़्ड पेपर वह भी एक-एक पेज रंगीन हैं। आवरण पेज और मोटा है, जिससे पत्रिका लंबे समय तक सुरक्षित रह सकेगी। 

e mail-apoorvudaan@gmail.com

अपूर्व उड़ान मासिक, 384, सेक्टर 36 नोएडा, गौतमबुद्धनगर
 उत्तर प्रदेश। 201301
। संपर्क-0120 4243133
--------------------------------

-मनोहर चमोली ‘मनु’

मोबाइल-09412158688