28 मई 2017

स्कूली शिक्षा के बदलते परिदृश्य में अध्यापन-कर्म की भूमिका

स्कूली शिक्षा के बदलते परिदृश्य में अध्यापन-कर्म की भूमिका

-मनोहर चमोली ‘मनु’

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय,बेंगलूरु के साथ सहयोगी संस्था अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली के तत्वाधान में तीन दिवसीय वार्षिक संगोष्ठी कश्मीरी गेट,दिल्ली के निकट स्थित अम्बेडकर विश्वविद्यालय के सभागार में सम्पन्न हुई।

23 मई से आरंभ हुई शैक्षिक मुद्दों पर हिन्दी में संभवतः ऐसी विहंगम वार्षिक संगोष्ठी पहली बार आयोजित हुई। इसे शिक्षा के सरोकार-1 नाम दिया गया। स्कूली शिक्षा के बदलते परिदृश्य में अध्यापन कर्म की रूपरेखा केन्द्रीय विषय रहा।
उद्घाटन अवसर पर अम्बेडकर विश्वविद्यालय के उप कुलपति श्याम मेनन ने कहा कि आज मनुष्य की सफलता उसके वेतन से तय हो रही है। आज हालात ऐसे हैं कि बहुत कुछ अकल्पनीय और अप्रत्याशित घटता है तो ऐसे वर्ग के बारे में सोचना पड़ता है कि ये वर्ग कहां पढ़ा होगा। क्या आज स्कूल यह सीखा रहे हैं कि बस अपनी परवाह करें। दूसरों के बारे में मत सोचें। परीक्षाओं को भी देखिए तो ऐसा लगता है कि सोचना मना है। जो सवाल सोचने पर बाध्य करता है उसे छोड़कर आगे बढ़ना मुनासिब समझा जाने लगा है। समय ऐसा आ गया है कि निर्देशों का अनुपालन करना ही नियति बन गया है। अपना विवेक लगाने की आवश्यकता नहीं है। सवाल करना या सन्देह करने का भाव नहीं रखना है। तेरह मिनट के अपने संबोधन में श्री मेनन ने सभागार में उपस्थितों को सोचने के लिए बाध्य कर दिया। उन्होंने कहा कि यह सोचने का वक्त आ गया है कि हम किस ओर जा रहे हैं। हमारा पढ़ा हुआ मनन करने के लिए नहीं है। भूलने के लिए है। क्या यह सही है?
प्रख्यात शिक्षावद् रोहित धनकर ने अपने बीस मिनट के संबोधन में कई रेखांकित की जाने वाली बातों की ओर इशारा किया। उन्होंने अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के उद्देश्यों पर विस्तार से प्रकाश भी डाला। उन्होंने कहा कि समानता का भाव स्थापित करना और न्यायपूर्ण समाज के लिए अपना योगदान करना ही विश्वविद्यालय का प्रमुख उद्देश्य है। उन्होंने सरोकारों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि सोचना, सीखाना-सीखना, दुनिया को समझना, गैर बराबरी का विरोध करना आज की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हर संवेदनशील को शिक्षा की गुणवत्ता में विकास की बात करनी होगी। हमारा स्पष्ट मानना है कि हमें भारतीय भाषाओं में काम करने की आवश्यकता है। उन्होंने इस संगोष्ठी के उद्देश्यों पर भी विस्तार से बात की।
प्राध्यापक मनोज कुमार ने कहा कि हम अधिकतर मामलों में पूर्व धारणाओं के आधार पर ही बातें करते हैं। हमें चीज़ें जैसी दिखती हैं हमें लगता है कि यह ऐसी ही हैं। जबकि ऐसा अक्सर होता भी नहीं। हमें यह पता होना चाहिए कि हमें क्या पता नहीं है। हमें अपने अनुभवों पर आश्वस्त नहीं होना चाहिए। हमें तैयार रहना चाहिए कि हमें हमारे अनुभवों को भी चुनौती मिल सकती है। हमें व्यवस्थित चिंतन भी करना चाहिए। शिक्षक की पहचान के साथ-साथ मुक्ति का भाव, जन्म आधारित पहचान, लिंगाधारित पहचान, पेशेवर पहचान, अर्जित पहचान के साथ भी हमारी पहचान के कई कारक और कारण हो सकते हैं। हमें उन विशेष बातों पर जो शेष में नहीं हैं, उन पर सोचना चाहिए। अम्बेडकर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक मनीष जैन ने सबका आभार जताया। उन्होंने कहा कि यह एक यात्रा है जो आरंभ हुई है। दूर-दराज से आए शोधकर्ताओं के पेपर जताते हैं कि शिक्षा की दिशा और दशा पर कई हैं जो सोचते हैं। इस सत्र का संचालन सहायक प्राध्यापक, अम्बेडकर विश्वविद्यालय,दिल्ली ने किया।
ज्ञान के सृजन हेतु शिक्षण पेपर एस॰सी॰ई॰आर॰टी॰उत्तराखण्ड के शिक्षक प्रशिक्षक एस॰के॰गौड़ ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मिल.जुलकर ज्ञान के निर्माण की कला विद्यालयों में उनका प्रयोग तथा अध्यापन.कर्म में बदलाव पेपर प्रतिभा कटियार अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेाशन देहरादून ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षक अपने कामों से नई छवि गढ़ रहे हैं जो कि सिर्फ कक्षा या स्कूल तक सीमित नहीं है। भले ही शिक्षण का पेशा उन्होंने किन्हीं अन्य वजहों से चुना हो लेकिन इस पेशे में आने के बाद इस काम की गरिमा और सन्तुष्टि का अनुभव हुआ है। उनके लिए किताबेंए पाठ्यक्रम सीमा नहीं है। वो पुरानी तमाम मान्यताओंए धारणाओं को तोड़ रहे हैं और नई गढ़ रहे हैं। ये शिक्षक कक्षा में जाकर अपनी तमाम चिन्तानओंए उलझनों को भूल जाते हैं। वो बच्चों से संवाद करके तय करते हैं कि आज बच्चों के मन का मौसम कैसा है यानी आज पढ़ाने की कौन सी तरकीबए कौन सी जुगत लगाई जानी चाहिए। कक्षा का माहौल आनंद लेने वाला बनानाए सीखने की उत्सुकता बच्चों के मन जगाने का काम शिक्षक करते हैं।
बाल केन्द्रित प्रक्रियाओं में शिक्षक की भूमिका पेपर देहरादून की प्राथमिक शिक्षिका ताहिरा खान ने प्रस्तुत किया। साथी सहयोगी अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन,देहरादून के वर्तुल ढौडियाल रहे। उन्होंने कहा कि स्वयं की मान्यताओं पर बारण्बार प्रश्न करना सबसे बड़ी चुनौती थी क्यूँकि मेरी नज़र में शिक्षक की पूरी परिभाषा ही बदल रही थी। उपयुक्त पठन सामग्री की कमी एक चुनौती थी। सभी समूहों को एक साथ कार्य करवाने में चुनौती आई। मैंने बच्चों को एक दूसरे की मदद करनेए समूह में कार्य करने और एक दूसरे के काम को जांचने के लिए प्रेरित किया जिसके कारण मैं सभी समूहों का एक साथ संचालन कर पाती हूँ ।
पाठ-योजनाः दार्शनिक व वास्तविक समझ पेपर विद्याभवन शिक्षा सन्दर्भ केन्द्र, उदयपुर की नेहा यादव ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कोठारी आयोग से अभी तक शिक्षक प्रशिक्षण के क्षेत्र में शिक्षक की स्कूल के लिए तैयारी को शिक्षा में गुणवत्ता के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। अलग.अलग समय पर शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम से सम्बंधित चिन्तारओं व उन्हें सुधारने के तरीकों पर काम किया गया है। उदाहरण के लिएए पाठ योजनाए यह शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम का एक अभिन्न व महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। पूरे प्रशिक्षण के दौरान यह दैनिक दिनचर्या रहती है जो शिक्षक प्रशिक्षक को एक भावी शिक्षक के रूप में तैयार करती है। पाठ्यचर्या नवीनीकरण के लिए शिक्षक.शिक्षाए राष्ट्रीय फोकस समूह का आधार पत्र यह समझने में मदद करता है कि किस प्रकार पाठ योजना ज्ञान और पाठ्यचर्या सम्बन्धी पूर्व अवधारणाओं को बिना बदले मात्र एक औपचारिक दिनचर्या भी बन कर रह सकती है या यह शिक्षा के नवाचार की समझ के साथ समझ के विकास की और भी ले जा सकती है।
तकनीकी कक्षा से आई॰एस॰ओ॰प्रमाणित पाठशाला तक-सुपर टीचर का विलाप पेपर किशोर दरक ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि श्राज्य सरकार के शैक्षिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान परिषद्श् ;ैब्म्त्ज्द्ध और श्जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थानश् ;क्प्म्ज्द्ध फिलहाल रचनात्मक बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। शिक्षकों से यह अपेक्षा है कि वह अपने स्कूलोंको श्बवदेजतनबजपअपेजश् स्कूलों में बदल दें और अपने छात्रोंको विशिष्ट तारीख से पूर्व श्प्रगतश् करवाएँ। सारे स्कूलों और अध्ययन कक्षाओंको श्डिजिटलश् बनाना भी अब अनिवार्य हैं। ज्‍यादातर उद्योगों में एवं कॉर्पोरेट कम्पनियों में गुणवत्ता का निर्देशक माना जाने वाला श्आईण्एसण्ओण्श् प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए अब स्कूल भी भारी संख्या में और गंभीर प्रयत्न कर रहे है।
शिक्षक की अहर्ता और अनर्हता पर कुछ सवाल पेपर एकलव्य,होशंगाबाद के अमित ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जिनके पास शिक्षा की पेशेवर डिग्री और अधिकांशतया स्नातक की डिग्री भी नहीं होती। इसके बावजूद वे नवाचारी शिक्षा का एक उल्लेखनीय नमूना पेश करते हैं। लेकिन साथ ही अकादमिक समझ को लेकर उनकी सीमाएँ हैं। व्यवहार और प्रयोग अच्छी तरह से करने के बावजूद वे इसके सैद्धान्तिक पक्षों की समझ कम रखते हैं।
एक मसला इस पद्धति के नीति में आ जाने का भी है। अगर हम ये मान लें कि पेशेवर डिग्री को अहमियत देने के बदले उच्च गुणवत्ता के सघन प्रशिक्षण के जरिए अच्छे शिक्षक बनाएँ जा सकते हैं जो कम समय देंगेए कम पैसा लेंगेण्ण्ण् तो फिर हम संविदा शिक्षकों के बने रहने और पूर्णकालिक नियमित शिक्षक के गैर.ज़रूरी होने को सैद्धान्तिक स्वीकृति प्रदान करते हैं।
शिक्षकों के पेशवर विकास के लिए संचालित मंचों के माध्यम से क्षमता विकास पेपर अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन,उत्तराखण्ड के सदस्य शोध समूह विपिन,प्रतीक व अनानास ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में ऐसी बहुत सी नीतियाँ एवं क्रियान्वयन सम्‍बधी कठिनाइयाँ है जिनके चलते इन मासिक बैठकों को अकादमिक बैठकों के रूप में स्थापित करना एक चुनौतीभरा कार्य है. जिसमें संकुल समन्वयकों का नियमित अकादमिक क्षमतावर्धनए संकुल को लाइब्रेरी तथा लैब से सुसज्जित करनाए राष्ट्रीयध्राज्य स्तर पर संकुल समन्वयकों के कार्यदायित्व पर पुनःविचार करना आदि कारक शामिल हैं।
नव उदारवाद काल में विद्यार्थी शिक्षकों से अपेक्षाएं पेपर दिल्ली विश्वविद्यालय की छाया साहनी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षक प्रशिक्षण का एक अहम अंग स्कूेली पद्धित क्रम होता हैद्य इसके अर्न्तकगत बीण्एलण्एडण् छात्राएँ तीन महीने के लिएम्युवनिसिपल प्राइमरी स्कूाल में जाती हैंऔर एक महीने के लिए मिडिल स्कूहल में जाती हैं। मैं एक शिक्षक.प्रशिक्षिका होने के कारएा पिछले 20 सालों से बीण्एलण्एडण् की छात्राओं का अवलोकन करनेके लिएइन स्कूेलों में जाती रही हूँद्य छात्राएँ अपनीपठन योजना और पठन चिन्त न मेंकई मुद्दोंपर चर्चा परकरती हैंद्य इसके अलावा वेस्कू ल संस्कृूतिए अध्याापन कार्य और स्कू ली व्यिवस्थान पर अक्सरर परस्पतर बातचीत करती हैंद्य इन चर्चाओं में छात्राएँ इन मुद्दों का वर्णन करती हैंजिसमें स्कूएल के अध्याूपक उनसेपढ़ानेके अतिरिक्त अन्य् कार्यों मेंहाथ बटानेकी अपेक्षा रखतेहैंद्य उदाहरण के तौर पर अकस्माँत उन्हें 9 वीं और 10 वीं कक्षा में प्रस्थानपित अध्याकपक की भूमिका में भेज दिया जाता है। छात्राएँ न तो इस कार्य को करने के लिए सक्षम होती हैं और ही उन्हेंं पठन योजना बनाने का समय मिल पाता है।
शिक्षा व्यवस्था एक महाभारत पेपर अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन,अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड के लोकेश ठाकुर ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि छात्रों के अधिगम के आकलन और मूल्यांकन हेतु प्रभावी नीतियों का प्रयोग कर बच्चों के सीखने.सिखाने की प्रक्रिया को बेहतर बनाना। हमारे देश में जहाँ शिक्षा को पेपर पास करने के लिए ही देखा जाता है आकलन एक बेहद गंभीर चीज देखती है। कई बच्चे तो एग्जाम के डर से ही स्कूल छोड़ देते हैं और कई लोग पूरी जिंदगी अपना मूल्य उस डिग्री के आधार पर करते हैं जिसके लिए उन्होंने जी तोड़ मेहनत की थी। एक शिक्षक का काम होता है वह आकलन और मूल्यांकन को प्रभावी बनाए ताकि बच्चे सिर्फ नम्बर गेम में ना फंस कर अपनी क्रिटिकल थिंकिंग का विकास भी कर सकें।
अध्यापक बनने की प्रक्रिया पेपर अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन,टोंक, राजस्थान की अनुपमा तिवाड़ी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यदि शिक्षक को प्राथमिक स्तर की कक्षाएँ पढ़ानी हैं तो वह बच्चों को बेहतर तरीके से कैसे समझे घ् बच्चों को कहानीए कविताएँ सुनने और खेल खेलना पसन्‍द होता है और ये करवाने से बच्चे क्यादृक्या सीख रहे होते हैं इसके पीछे के सिद्धान्तों को समझना एक शिक्षक के लिए जरूरी है। प्रशिक्षण के दौरान भावी शिक्षकों को कुछ तरीकेए टिप्स नहीं पकड़ाए जाने चाहिए नहीं तो वे उन्हें ही अन्तिम बाइबिल मान बैठ जाते हैं जबकि ज्ञान में संशोधन की हमेशा गुंजाईश रहती है। इसलिए शिक्षकों के साथ इस प्रकार का काम होना चाहिए कि वे स्वयं करके सीखने वाले शिक्षक बन सकेंए वे अपने सिद्धान्‍त गढ़ सकें और फिर उन्हें लगातार परिष्कृत करने के लिए भी तैयार हो सकें। प्रशिक्षण शिक्षक में एक आत्मविश्वास भरेए उसे कर दृ कर के सीखने के मौके दें। प्रशिक्षण का उद्देश्य सिखाने वाले से ज्यादा लगातार सीखने वाला व्यक्ति तैयार करने वाला होना चाहिए। जब सीखने वाला व्यक्ति होगा तो वह स्वयं सिखाने के न जाने कितने तरीके स्वयं ईजाद कर लेगा।
शिक्षा वृत्ति और अस्मिता पेपर शरद चन्द्र बेहार ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा विमर्श और शिक्षा व्यवस्था दोनों में बुनियादी मान्यता है कि हर शिक्षकए प्रत्येक विद्यार्थी की निपुणताए अलग पहचानए अलग अस्मिता को ध्यान में रखने की जरूरत नहींए उन्हें विद्यार्थी और शिक्षक के समूह या श्रेणी में मानकर एकरूप विचार और व्यवस्था का शिकार उन्हें बना सकते हैं। सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों को एक ही लाठी से हांका जा सकता है। क्या यह उसकी विशिष्टता को मारकर एक साँचे में ढालने की कोशिश नहीं हैघ्
जवाब में इसे सरासर गलत ठहराकर बताया जा सकता है कि शिक्षकों के उप.समूहों को माना जाता हैए विद्यार्थियों के वंचित होनेए समाज के हाशिये में होने के तथ्यों को भी तवज्जो देकर विचार भी होता हैए व्यवस्था में जगह देने की कोशिश भी होती है।
पर मुख्य आरोप और शिकायतें तो यह हैं कि हर इंसान की अस्मिता को ध्यान में नहीं रखा जाता। इस पर निरुत्तरता हैए निःसहायता है। फिर भी बचाव है कि जब करोड़ों की शिक्षा पर विमर्श हैए उनके लिए व्यवस्था चलानी है तो हर व्यक्ति की विशिष्टता का कैसे ध्यान रखा जा सकता है। अपराध तो स्वीकार हैए पर क्षम्य है क्योंकि कोई और व्यावहारिक विकल्प नहीं है। एकरूपता व्यावहारिकता के लिए अनिवार्य है।
अध्यापक शिक्षा में ज्ञान का संयोजन पेपर अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय,बेंगलूरु के रोहित धनकर ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सायास शिक्षा अनिवार्यतः सौद्द्येश्य भी होती है इस लिए उसके आयोजन में जो सिखाना है और जिस तरह से सिखाना है इसकी योजना भी अनिवार्यतः शामिल होती है। कोई सचेत कर्म निरुउद्देश्‍य नहीं हो सकताए और उद्देश्‍य होने भर से ही उन्हें प्राप्त करने के साधान और तरीकों की धारणा अपने आप बनाने लगाती है। शिक्षा के साथ भी यही होता है।उद्देश्‍य प्राप्ति के लिए साधनों और तरीकों की जो योजना बनाई जाती है उसे ही हम शिक्षाक्रम कहते हैं।
शिक्षा के उद्देश्‍यों की व्यापकताए वैविध्य और दूरगामिता को देखते हुए उन उद्देश्‍यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक ज्ञानए मूल्य और दक्षताओं का चुनाव और उनका संयोजन ;क्रम और विषयों में बंटवाराद्ध एक अनिवार्य और जटिल शैक्षिक उपक्रम बन जाता है। इसकी जटिलता में और इजाफा हो जाता है जब मानवीय.ज्ञानए मूल्यों और दक्षताओं के परासए वैविध्यए और गहराई पर भी सोचना पड़े। इसी के चलते हर स्तर का शिक्षाक्रम एक बेहद जटिल संरचना होती है। इतनी जटिल की कई बार शिक्षा में सोचने.लिखने वाले लोग इस नतीजे पर पहुँचते हैं की इस काम में दिशा दे सकने वाले कोई समय.सिद्ध और सर्वमान्य सिद्धान्‍त हो ही नहीं सकते। ;कृष्ण कुमाररूॅींज पे ूवतजी जमंबीपदहघ्द्ध। दूसरी तरफ ऐसा लेखन भी बहुतायत में मिलता है जो इसी तरह के सिद्धान्‍तों के निरूपण की गंभीर और श्रम.साध्य कोशिश करता है। ;ज्लसमतरू ज्ीम ठंेपब च्तपदबपचसमे व िब्नततपबनसनउ ंदक प्देजतनबजपवदए च्मजमते - भ्पतेजरू ज्ीम स्वहपब व िम्कनबंजपवदए ठवनतकपमनरू च्तपदबपचसमे वित तमसिमबजपदह वद जीम बनततपबनसनउद्ध कुछ हद तककृपूर्णतः नहींकृयह भेद शायद सिद्धान्‍त क्या चीज है इस की समझ के भेद के कारण हैं। चाहे जो होए किसी भी शिक्षाक्रम के निर्माण में कुछ मूल सिद्धान्‍तों और मान्यताओं का उपयोग तो होता ही है। नहीं तो शिक्षाक्रम पर न बात हो सकती है न वहस। सब कुछ मनमाना ;ंतइपजतंतलद्ध हो जाएगा और मनमाना होने पर बात उसकी चलती है जिसके पास ताकत हो। लाठी जिसकी भैंस के नियम पर कुछ हद तक बंदिश लगाने का तरीका किन्ही सिद्धान्‍तों पर पहुँचाना ही है।
शिक्षक,शिक्षण और समाज पेपर आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल,भोपाल की वर्षा श्री ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अध्यापक और छात्र दोनों ही अपने.अपने समाज के हिस्से होते हैं और जब वे कक्षा में आते हैं तो दोनों ही अपने साथ अपने समाज ;विचारधाराए धारणाए पूर्वाग्रहए मूल्य व मान्यताएँ आदिद्ध को लेकर आते हैं। शिक्षक.छात्र के बीच संवाद में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस समस्या को सम्बोधित किए बगैर हम अध्यापक की सामाजिक भूमिका को नहीं समझ सकते। आधुनिक समाज में हर जगह शिक्षा एवं अध्यापक दोनों को भारी नियम.कानूनों से नियन्त्रित किया जाता है। जिसके कारण शैक्षिक प्रक्रिया और उसमें अध्यापक की भूमिका और इन नियम.कानूनों के बीच हमेशा एक तनाव रहता है। इस तनाव की प्रकृति को समझे बिना हम अध्यापक और अध्यापन की प्रक्रिया को नहीं समझ सकते।
स्कूली शिक्षा में विज्ञान शिक्षक को शैक्षिक समर्थन पेपर होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण से जुड़े उमेश चैहान ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मेरे स्कूल के पास एक माली अपनी बाड़ी में सब्जियाँ उगाता था। मैंने पौधों में प्रजनन अध्याय के प्रयोग के लिए इस माली से अनुमति ले ली थी। मालिक का बेटा मेरा विद्यार्थी भी था।एक दिन बड़े सबेरे छात्रों के साथ हम गिलकी के फूलों में परागण प्रयोग करने हेतु गए तो माली ने सहज ही पूछ लिया गुरुजी ये कद्दू की बेल में फल क्यों गिर रहे हैंघ् क्या उंगली बताने से कद्दू में फल गिर जाते हैं घ्मैंने अपना फैसला बदला गिलकी की जगह कद्दू के फूलों में परागण क्रिया करने की तैयारी कर ली। परागण क्रिया के बाद सभी बच्चों ने परागित मादा फूलों साथ ;परागित हैं पर्ची डालकरद्ध पालिथीन की थैली से ढँककर बाँध दिया।इस प्रयोग के बाद सबने परागित फूलों को खूब उंगली बताई। अगले सप्ताह जब हमारी टीम अपने प्रयोगों का परिणाम देखने के लिए बाड़ी में पहुँची तो सभी परागित फूलों में बड़े.बड़े कद्दू बन गए थे। छात्र अपने प्रयोगों की सफलता पर प्रसन्न थे। इस प्रयोग से हमने उंगली बताने से कद्दू का फल गिर जाता है इस अंधविश्वास को दूर किया। दरअसल कद्दू के फूल घण्टीत नुमा होते हैंएजिन में बरसात का पानी भर जाने से परागण क्रिया सफल नहीं होती और अपरागित मादा फूल बेल से गिर जाते हैं।
ये प्रयोग तो कुछ उदाहरण हैं।इनके जैसे अनेक अंधविश्वासों को बढ़ावा देने वाली घटनाओं को संगम केन्द्रल की मासिक बैठकों में चर्चा करके उनकी वास्तविकताओं को जानने का प्रयास किया जाता रहा है।
अध्यापक बनने की प्रक्रिया और मेरे अनुभवों में बनता अध्यापक पेपर दिल्ली विश्वविद्यालय के शचीन्द्र आर्य ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अपने भीतर शिक्षक बनने की इच्छा का निर्माण होने से पहले मैं हिन्‍दी भाषा के साहित्य का छात्र थाए जिसके पास इस दुनिया को देखने समझने के कुछ औजार उन्हीं जगहों से निर्मित हो रहे हैं। हम ष्विखंडनष् से दुनिया को समझने की कोशिश शुरू कर चुके हैं। मतलब समाज को उसके सम्पूर्ण में समझने से पहले उसके कई हिस्से करना सीखना सीख रहे हैं। हमें इस बात को भी रेखांकित करना होगा के सिर्फ इतना ही नहींएयह निर्मितियों परिवारए हमारा परिवेशए के बीच लगातार आकार ले रही होंगी।
इसी मध्य वह क्षण आता हैए जब इसी पृष्ठभूमि के साथ हम ष्अध्यापकष् के रूप में खुद को देखना शुरू करते हैं। यहीं कहीं हम ष्शिक्षणष् को एक पेशे के रूप में देखते हैं और ष्शिक्षकष् बनने के लिए किसी औपचारिक संस्थान में दाखिल होते हैं। यहाँ निर्धारित पाठ्यक्रम हमें औपचारिक रूप से शिक्षक के रूप में हमें बुनना शुरू करता है। यह औपचारिक प्रशिक्षण क्यों जरूरी हैए इसकी एक औपनिवेशिक पृष्ठभूमि के अलावे सवाल के रूप में पूछे जाने लायक सवाल है कि जो ऐसे निर्धारित पाठ्यक्रम से नहीं गुजरतेए वह अध्यापक के रूप में खुद को किस तरह देखते हैंघ् क्या हममें किसी तरह के अंतर्द्वंद नहीं पैदा नहीं हुए होंगेघ् हम जिन समाजों से निकल कर उन शैक्षिक विचारों को किस तरह जज्‍ब कर रहे होंगेघ् क्यों उन विचारकों को हमारे अध्यापक बनने के लिए अपरिहार्य माना गया होगाघ्
प्रशिक्षण, शिक्षण एवं चिन्तन का अभ्यास पेपर दिल्ली विश्वविद्यालय की शोधार्थी स्नेहलता गुप्ता एवं पूजा बहुगुणा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वास्तव में बच्चों के साथ गुजरा समय और उस पर अध्यापकका आत्मचिंतन;त्मसिमबजपअम ज्ीपदापदहद्धउसेएक अपेक्षित अध्यापक बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभातानजर आता है। साथ ही बच्चों के साथ काम में आने वाले चुनौतियों के वक्त अध्यापक को मिलने वाला सहयोग और आसपास का सपोर्ट सिस्टम भी इसमें अहम भूमिका तो निभाता ही है।
वर्तमान समय में शिक्षण पर अध्यापकों का दलित शिक्षार्थियों के प्रति रवैया पेपर अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलूरु की प्रज्ञा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षक सैद्धान्तिक रूप से शिक्षार्थी के पारिवेशिक अनुभवों को कक्षा में सीखने.सिखाने और कक्षा के बाहर भी स्कूल के व्यवस्था में उनके अनुभवों को शामिल करने की बात करते हैं लेकिन उन्हें व्यावहारिक कक्षागत प्रक्रियाओं और स्कूल की व्यवस्था में लाने में असमर्थ दिखाई देते हैं। और अन्य स्कूल के क्रियाकलापों जैसे.समान जाति के बच्चों का कक्षा में साथ बैठनाए साथ खाना और साथ खेलना और उच्च कक्षा के बच्चों का स्कूल में दोपहर का भोजन इसलिए नहीं करना कि बर्तन में सभी जाति के बच्चे खाते हैं। इस अवलोकन के विश्लेषण से पता चलता है कि स्कूल यथास्थिति को चुनौती देने में भी असमर्थ दिखाई देता है।
शिक्षा, शिक्षण संस्थान और शिक्षक के संकेतों का विश्लेषण पेपर जेएनयू के शोधार्थी दलजीत अमी ने प्रस्तुत किया।
शिक्षक शिक्षा के सन्दर्भ में एक नई सोच पेपर टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुम्बई की शोधार्थी तनीषा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षक हर एक दिन अपने बच्चों के साथ कुछ.न.कुछ सीखता है। परन्तु शिक्षक शिक्षा के औपचारिक ढाँचे में शिक्षक दो तरीके से शिक्षा ग्रहण करता है। एक. सेवा पूर्व ;प्रोफेशनल डिग्री लेते समय़द्धए दूसरेए जब शिक्षकीय पेशे आ जाता है यानी इन सर्विस। हम इन दोनों को अलग.अलग नहीं देख सकते हैं पर अक्सर ऐसा देखा जाता है कि शिक्षक की पूर्व सेवा और सेवा में शिक्षा में अन्तनर पाया जाता है जैसे कि एक शिक्षक बीण्एडण्एबीण्एलण्एडण् या डीण्एडण् करके विद्यालय में प्रवेश करता हैप् एक सवाल तो यही उठता है कि क्या हम एक ही शिक्षक उपाधि पर केंद्रित हों या फिर इन सभी उपलब्धियों के पाठ्यक्रम पर ध्यान देंप् इस बात से हम केवल अपना ध्यान शिक्षक शिक्षा के पाठ्यक्रम पर केन्द्रित कर सकते हैं क्योंकि इन्हीं से शिक्षण के सिद्धान्तों की स्थापना कैसे होती है उस बात का अन्दाशजा लगाया जा सकता हैप्हमारा एकमात्र लक्ष बच्चों की शिक्षा और शिक्षक के स्वयं की पेशेवर छवि की ओर केन्द्रित है तो शिक्षक जो शिक्षा ग्रहण करता है वे बच्चे की और साथ ही स्वयं के समग्र विकास की ओर खास तौर पर केन्द्रित हो जो कि बीण्एडण्एबीण्एलण्एडण् आदि उपलब्धि बहुत ही खुशी से सम्मलित कर रहे हैं।
कक्षा में बच्चों की भाषाओं को शामिल करने का महत्व और उसकी उपयुक्त प्रक्रिया पेपर अम्बेडकर विश्वविद्यालय की शिवानी नाग ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शैक्षिक अवधारणाओंकी नींव बच्चों को रटा कर नहीं बल्कि उन्हें उनके अनुभवों से जोड़कर ही स्थापित की जा सकती हैंए तब हम यह भी समझ पाएँगे कि इस पूरी प्रक्रिया में भाषा की भूमिका कितनी महत्वपूर्णहै। अपने अनुभवों के बारे में सोचने या उन्हें व्यक्त करने के लिए भाषा की ही जरूरत पड़ती हैए और अगर वह भाषा जिसमें एक 4.5 साल का बच्चा अपने अनुभवों को जीता हैए कक्षा से बाहर कर दी जाएए तो शैक्षिक अवधारणाओं को उनसे जोड़कर उनकी नींव रख पाना लगभग नामुमकिन सा हो जाएगा। पर बच्चों की भाषा का महत्व समझना इस बात को सुनिश्चित नहीं करता कि यह समझने वाले शिक्षक यह भी जानते होंगे की बच्चों की भाषा का प्रयोग किस तरह किया जाए। यह लेख एक प्रयास है शिक्षकों का ध्यान. बच्चों की बोल चाल की भाषा की शैक्षिक उपयोगिता और उसके उपयुक्त इस्तेमाल की ओर केन्द्रित करने का।
सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों का उद्यम के प्रति दृष्टिकोण पेपर हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय,कांगड़ा की प्रकृति भार्गव ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षण.प्रक्रियाए शिक्षक तथा विद्यार्थी के पारस्परिक संबंधों से निर्धारित होती है। कक्षा की शैक्षिक प्रक्रियाएं तब और आधिक प्रासंगिक हो जाती हैं जब उन कक्षाओ में समाज के वंचित वर्गो के विद्यार्थी बड़ी संख्या में सम्मिलित होते हैं। सम्प्रतिए सरकारी शिक्षण संस्थाओं का महत्त्व और आधिक प्रासंगिक ही गया है जो हाशिये पर खड़े व्यक्ति के लिए एक मात्र अवलंबन है। कक्षा का वातावरण शिक्षक के व्यवहारए विद्यार्थियों की सामाजिक.आर्थिक पृष्ठभूमि तथा अथ्यापन प्रक्रिया द्वारा निर्मित होता है। शिक्षकों की सामाजिक पृष्ठभूमि तथा उनका उद्यम के प्रति दृष्टिकोणए शिक्षकों के शैक्षिक व्यवहार को निर्धारित करने में योगदान करते हैं। आधुनिक समय में जटिल सामाजिकए राजनैतिक एवं आर्थिक संबंधों के कारण शैक्षिक उद्यम की प्रतिष्ठा में अत्यधिक ह्रास हुआ है तथा शिक्षक को एक कामचलाऊ उपकरण के रूप में देखा जा रहा है। शिक्षकों के व्यव्हार को निर्धारित करने वाले अन्य महत्वपूर्ण कारक प्रचलित सामाजिक मान्यताएँ यथा जातिगत एवं साम्प्रदायिक भेदभावए स्त्रियों के प्रति समाज का दृष्टिकोण तथा आर्थिक असमानता है।
अध्यापक की पहचान पेपर शोधार्थी अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन,जयपुर राजस्थान की अनुराधा जैन ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कक्षा तीन में शुभम् के पिताजी की स्टेशनरी की दुकान हैए उसकी दुकान के सामानों की सूची बनबानाए आसपास कौन.कौन सी दुकानें हैं। इसी प्रकार सानिया के पापा की मिठाईयों की दुकान हैए दिव्यांषी की मम्मी एवं पापा छपाई का काम करते हैं। कुछ इसी तरह की बातों और संवादों ने मुझे मदद की बच्चोंं को हिन्दी भाषा सिखाने में। शिक्षक की छवि के लिए बच्चोंम एवंशिक्षक के बीच की दूरी का कम होना आवश्यदक हैए बच्चे निःसंकोच अपनी बात बिना भय के कह सके।
अध्यापक की पहचान पेपर अध्यापिका सोहगपुर,मध्यप्रदेश की सुनीला मसीह ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अध्यापक की पहचान कैसेए कब कहाँ या कौन करेगाए यह गंभीर प्रश्न है। अध्यापक होने का क्या अर्थ हैघ् अध्यापक की योग्यता का मापदण्डह कौन तय करेगाघ् पाठ्यक्रम से जुड़ी डिग्रीए प्रशिक्षण प्राप्त शिक्षक ही एक योग्य अध्यापक होगाए यह कहना उचित होगा या नहींघ् आज यह प्रश्न है कि एक अध्यापक की पहचान कौन सुनिश्च्तिकरेगाघ् विद्यार्थीए पालकए समाज या शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारीगण।
एक अध्यापक ही स्व.मूल्यांकन करेए आत्म.चिंतन व आत्म.विश्लेदषण करके अपनी पहचान बना सकता है। ऐसे कठिन विषय को अपने अनुभवों के आधार पर प्रस्तुत करके मैं एक अध्यापक की स्वयं की पहचान को प्रस्तुत करने का प्रयास करती हूँ।
शिक्षक की आत्मछवि एवं जनछवि का द्वंद पेपर जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान बागेश्वर उत्तराखण्ड के केवलानन्द काण्डपाल ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि विद्यालयोंए विशेषकर सरकारी विद्यालयों में अधिकांश बच्चे सामाजिक एवं आर्थिक रूप से अपवंचित वर्गों से आते हैं और इनमें से बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे बच्चों का है जो प्रथम पीढ़ी ;थ्पतेज ळमदमतंजपवदद्ध के अधिगमकर्ता हैं। यदि इन बच्चों की शैक्षिक जरूरतों को संवेदनशीलता के साथ संबोधित नहीं किया गया तो इनके बहिष्क;रण का जोखिम अभी भी बना हुआ है। इस संवेदनशीलता के विविध आयाम हैंए इसमें लैंगिक मुद्देए सांस्कृतिक एवं भाषायी मुद्दे सहित वे सभी मुद्दे आ जाते हैं जो बच्चे को शिक्षा की मुख्य धारा में समावेशन में एक बड़ी बाधा सृजित करते हैं। शिक्षक से सन्दिर्भित एक महत्वपूर्ण मुद्दा मनोबल ;डवतंसमद्ध से सम्बमन्धित है। मनोबल वह मनःस्थिति है जिसमें एक शिक्षक तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद अपने प्रयासों को सतत् रूप से जारी रखने की आन्तरिक प्रेरणा प्राप्त कर सके।
विगत कुछ दशकों से समाज शिक्षकों को एक विशेष नजरिये से देखने लगा हैए उसके मन में अन्य वेतन भोगी सरकारी नौकर के समान शिक्षकों की छवि बनती जा रही है। शिक्षक अपने सेवाकाल में आत्मछवियों के विभिन्न पड़ावों से होकर गुजरता है। साथ ही साथ शिक्षक की आत्मछवि एवं जन छवि का द्वन्द चलता रहता है। कार्य करने की परिस्थितियाँ एवं कार्य करने का प्रेरक वातावरण से एक विशेष मैट्रिक्स की निर्मिति होती है।
विद्यालयी शिक्षक का चयन: मानकता एक मिथक पेपर दिल्ली विश्वविद्यालय के विनोद कुमार कंवरिया ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षकों के चयन पर यदि प्रकाश डाला जाए तो आम तौर पर इन्हें राज्य सरकार के निदेशालयोंए स्वायतशासी निकायों या फिर विशेष अधिकार प्राप्त बोर्डए परिषदों या समितियों द्वारा चयनित किया जाता है। सतही तौर पर सरल.सा दिखने वाला शिक्षकों के चयन का मुद्दा वास्तव में बड़ा ही क्लिष्टए पेचीदा एवं गहरा है। ये तब और अधिक विशिष्ट हो जाता है जब बाद में इन शिक्षकों का मूल्यांकन इनके द्वारा पढ़ाये गए शिक्षार्थियों का किसी मानक निकाय द्वारा एक समान मानक पर मूल्यांकन के आधार पर किया जाता है एवं इस आधार पर उनकी तुलना की जाती है। क्या सम्पूर्ण देश में एक जैसे शिक्षक चयनित किए जा सकते हैं घ् क्या इतने सारे संस्थान विभिन्न श्रेणियों में एक जैसे शिक्षकों का चयन करते हैं घ् क्या एक ही संस्थान एक जैसे शिक्षकों का चयन करता है घ् क्या एक ही संस्थान एक श्रेणी में भी एक जैसे शिक्षकों का चयन करता है घ् मानकीकरण के इस दौर में इन प्रश्नों का गहन विश्लेषण एवं इन पर ठोस अध्ययन करने की आवश्यकता है।
शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों का सच: अनुभवात्मक विश्लेषण पेपर नीरज प्रिया ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा व शिक्षकए दोनों की गुणवत्ता शिक्षाविद्ए अभिभावकोंए मनोविज्ञानिकों एवं नीति निर्माताओं में विशेष चिन्ताक व मनन का विषय रहा है। शिक्षा की गुणवत्ता शिक्षकों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है जबकि शिक्षकों की गुणवत्ता में शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन शिक्षण संस्थानों का अकादमिक व गैर.अकादमिक दोनों ही वातावरण भावी शिक्षकों की गुणवत्ता को तय करने में अपना.अपना योगदान देते हैं। शिक्षक शिक्षा एक आसान विषय नहीं है और सभी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान इस विषय के साथ न्याय नहीं कर पाते हैं। इस प्रशिक्षण कार्य में तरह.तरह की समस्याओं व चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
शिक्षकों का नवाचारी प्रशिक्षण और विद्यालयों में परिणामी बदलाव पेपर दूरस्थ शिक्षा राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण परिषद बिहार के निदेशक एस ए मुईन ने प्रस्तुत किया। साथ ही शिक्षण कर्म की आम धारणा और शिक्षक -शिक्षा में दशकों में व्याप्त तदर्थवाद पेपर अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन रायगढ़, छत्तीसगढ़ के गुरुप्रसाद शर्मा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि समाज में गिरती शिक्षक की साख के पीछे शिक्षक और शिक्षण के बारे में कई तरह की प्रचलित धारणाएँ हैं। इन धारणाओं में से शिक्षक के बारे में यह धारणा कि कोई भी पढ़ा.लिखा इंसान पढ़ाने का काम कर सकता हैए अधिक प्रबल दिखता है। यह धारणा समाज के आम जन में ही नहीं बल्कि सरकारी दृष्टियोंए निर्णयों और पहल.कदमियों में भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होती रही है। इसने न केवल शिक्षण कर्म के महत्व को घटाया हैए बल्कि अपवादों को छोड़ दें तो इस कर्म को चुनने वालोंके लिए भी कम मेहनत वाला काम बना दिया है। कुछ लोगों के लिए यह अतिरिक्त आमदनी का स्रोतहोसकता है तोकुछ के लिए ष्हारे को हरि नामष्। सरकार द्वारा शिक्षक की नियुक्ति हो या किसी के द्वारा अपने जीवन में शिक्षण पेशे का चुनावयइन दोनों ही मामलों में यह धारणा जड़ के रूप में काम करती है।
इस धारणा को तोड़ने या बदलने का काम शिक्षक शिक्षा भी नहीं कर पाती है। क्योंकि इस कार्य से जुड़े लोगोंके पास भी संभवतः वांछित दृष्टिए समझ और दायरे से बाहर सोच पाने की क्षमता और प्रेरणा नहीं होती है। क्योंकि आज भी शिक्षक शिक्षा संस्थानों में न तो पर्याप्त शिक्षक प्रशिक्षक है और न ही उन्हें स्कूली कक्षा में अध्यापन का अनुभव। इन शिक्षक प्रशिक्षकों का भी कई पदों पर तबादला होता रहता है। वे शिक्षक शिक्षा संस्थानों में खुद को दरकिनार.सा महसूस करते हैं। कहीं.कहीं तो बिल्कुल अस्थायी तौर पर समय.समय पर आस.पास के शिक्षकों को बुलाकर प्रशिक्षक का काम लिया जाता है। यदि छत्तीसगढ़ का उदाहरण लें तो पूरे राज्य में मात्र दो ऐसे सरकारी संस्थान है जहाँ बी॰ एड॰ की पढ़ाई होती हैय बाकी निजी संस्थानों पर निर्भरता बरकरार है।
हिन्दी साहित्य में शिक्षक किरदारों की जनछवियों व आत्मछवियां पेपर अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड के खजान सिंह ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षक व शिक्षकीय प्रोफेशन के प्रति हिन्‍दी साहित्य की अनेक साहित्यक विधाओंए लोक आख्यानोंए लोक साहित्यए दृष्टान्तोंए व्यक्तिगत संस्मरणोंए में किस तरह से शिक्षक किरदारों व शिक्षकीय प्रोफेशन का मान सम्मानए रवैयेए जनछवियाँ व आत्मछवियाँ निरुपित की गई हैं या उभरकर आती हैं।
इसकी सामाजिक राजनैतिकए आर्थिकए सांस्कृतिक सन्दर्भ में गहरी विवेचना व व्याख्या होगी। इस व्याख्या का स्वरूप समझने हेतु यह उद्धरण समीचीन होगा मसलन ष्कामायनी एक पुनर्विचारष् पुस्तक की प्रस्तावना में गजानन माधव ष्मुक्तिबोधष् लिखते हैं कि ष्ष्हमारा जीवन त्रिकोणात्मक है। उसकी एक भुजा हमारे बाह्यजगत यानि मानव सम्बन्धों के विशिष्ट क्षेत्र और जगत के विभिन्न जीवन मूल्यों और आदर्शों के बीच से होती हुईए उस छोर तक पहुँच जाती है। जिसे हम देश व जाति की राजनीतिकए सामाजिक स्थिति कह सकते हैं। जो स्थिति मानव इतिहास के विकास के एक विशेष स्तरए विशेष अवस्था का नाम हैं। इस त्रिकोण की दूसरी भुजा हमारा व अन्तरंग जीवन है जो अन्तर जीवन बाल्यकाल से ही वाह्य क्रियाओं और रूपों को आत्मसात करता हुआ उस बाह्य के विरूद्ध या अनुकूल प्रतिक्रियाएँ करता हुआए उन प्रतिक्रियाओं के विभिन्न संवेदनात्मक पुंज बनाता हुआए उन पुंजों के सहारे जीवन का विकास करता हुआएउस जीवन ज्ञान के सहारे स्वयं को बाह्य से मिलाने और बाह्य कोअपने से मिलाने अर्थात उस बाह्य के साथ स्वयं को द्वन्द्व रूप में या सामंजस्य रूप मेंए इन दो स्थितियों के संगत.असंगत सम्मिलित रूप में स्थापित करनेए बाह्यों की काट.छाँटकर उसे अपने अनुरूप बनाने का प्रयत्न करता रहता है।
अन्तर्निहित इच्छाएँ जो मूलतः आत्मरक्षा और आत्मविकास की बुनियादी वृतियों से संचालित परिचालित होती रहती हैए उनकी तृप्ति के तथा बाह्य से सामजस्य की स्थापना की दुविधा किन्तु एकीभूत प्रयत्न मानवीय स्वभाव का ही धर्म है। मनुष्य के अन्तर जीवन का इतिहास बाह्य द्वारा दिएगए तत्वों से बना होता है।मनुष्य द्वारा संचालित जो अनुभव होते हैं उनका एक पक्ष अभ्यांतर और एक पक्ष बाह्यगत होता है। अनुभव में जो प्रवृतियाँ परिलक्षित होती है वहा अनुभवों का आत्मपक्ष है। अनुभव के अन्तर्गत जो बिम्बए भावए विचारए प्रस्तुत होते हैं वे बाह्य के सम्पादित संशोधित रूप हैं। हमारे जीवन के इस त्रिभुज की आधार रेखा हमारी अपनी चेतना है। वह चेतना उपर्युक्त दो भुजाओं के बिना अपना स्वरूप और आकार ही स्थापित नहीं कर सकती। इन दोनों में से यदि एक भी लुप्त हो तो चेतना का कोई अर्थ ही नहीं रहता। हमारा अन्तरजीवन और उसका क्रम अपने बाह्य परिवेशऔर परिस्थिति से आववयविक सम्बंध रखता है। और दोनों अन्तर एवं बाह्य से एकीभूत होकर हमारा जीवन बनाते हैं।
शिक्षण को कैसे समझें? यह पेपर अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन,जयपुर,राजस्थान के जीतेन्द्र ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि इस देश में औपचारिक शिक्षा की जो स्थिति है और जिस तरह की तैयारी से शिक्षक बनते हैं उसमें शिक्षण कार्य को समझने और उस अपेक्षा को पूरा करने का जरूरी प्रयत्न नहीं होता। अधिकांश लोग दृ शिक्षा से जुड़े भी और आम जन भीए शिक्षण को एक ऐसा कार्य मानते हैं जिसे कोई भी कर सकता है जिसे किसी विषय पर कुछ पकड़ है। पूर्व प्राथमिक कक्षाओं में तो विषय की समझ होना भी कोई आधार नहीं माना जाता। इस कारण बड़ी संख्या में लोग इसे पार्ट.टाइम काम के रूप में भी करते दीखते हैं।
मानक भाषा और संस्कृति का मुहाफिज़ अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय,बेंगलूरु के प्राध्यापक हिमांशु एवं मनोज कुमार का रहा। इसे प्रस्तुत किया मनोज कुमार ने। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषा के शिक्षकों की स्थिति कुछ विशिष्ट है। स्कूल या विश्विद्यालय की जरूरी डिग्रियाँ उसके पास भी हैंए लेकिन उसका किस प्रकार के ज्ञान पर दावा हैघ् क्या भाषा का उसका जो ज्ञान है वह उस भाषा को बोलने वाले अन्य लोगों के ज्ञान से कुछ विशिष्ट हैघ् क्या उस ज्ञान की नए समाज के लिए कोई उपादेयता हैघ् इन प्रश्नों के बने बनाए उत्तर नहीं हैंए लेकिन आमतौर पर भाषा शिक्षक का दावा होता है कि उसे मानक भाषा का ज्ञान है और उसे उस भाषा के साहित्य का भी ज्ञान है। उसके अनुसार साहित्य के इस ज्ञान का सांस्कृतिक मूल्य है और यह उसका दायित्व है कि वह विद्यार्थियों के भाषिक.सांस्कृतिक व्यवहार को मानक व्यवहार से विचलित नहीं होने दे। भाषा शिक्षक के प्राधिकार का मुद्दा एक ओर भाषा के मानकीकरण से जुड़ा हुआ है तो दूसरी ओर उस भाषा के साहित्य के कैनन निर्माण से। स्वीकृत साहित्यिक कैनन के मुहाफ़िज के रूप में भी वह अपनी भूमिका तलाशता है।
भारत में भाषाओं के मानकीकरण की प्रक्रिया उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी की शुरुआती दशकों तक चलीए जबकि बीसवीं सदी के आख़िरी दशक तक आते.आते शिक्षा के सार्वभौमिकीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई। शिक्षा के सार्वभौमिकीकरण के कारण अलग.अलग सामाजिक समूहों के स्कूल में आने से स्कूल का परिवेश और ज्यादा बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक हुआ है। साथ ही पाठ्यचर्या में इस बात पर बल दिया जाने लगा है कि बहुभाषिकता परेशानी नहीं हैए बल्कि सीखने.सिखाने के लिए एक प्रकार का संसाधन है। ऐसा लगता है कि भारतीय भाषा के शिक्षक बहुभाषिकता को. खासकर अगर वह बहुभाषिकता आसपास की अमानक भाषाओं के स्कूल में ष्घुसपैठष् से बनी है दृ को सिर्फ अध्यापन की दृष्टि से ही चुनौती नहीं मानते हैंए बल्कि उससे उनका प्राधिकार भी संकटग्रस्त होने लगता है।
औपनिवेशिक भारत में व्यवस्थिकरण का शिक्षाशास्त्र, शिक्षक और चुनौतियां पेपर दिल्ली विश्वविद्यालय के विकास गुप्ता ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि गिजुभाई के कार्यों व विचारों में और भी बहुत कुछ है जिसपर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। मिसाल के लिएए बच्चों के लिए सबसे बेहतर शिक्षा पद्धति की उनकी खोज ने उन्हें बाल.केन्द्रित शिक्षण की उनकी परिकल्पना के अनुरूप सबसे उपयुक्त शिक्षक के निर्माण के तौर.तरीकों के बारे में सोचने और कार्यवाही करने के लिए प्रेरित किया। गिजुभाई के सरोकार सिर्फ शिक्षण पद्धतियों से नहीं जुड़े थे बल्कि उनका दायरा शिक्षकोंए उनकी पेशेवर स्थिति व विकासए सामाजिक हैसियत और प्रशिक्षण तक फैला हुआ था। जैसा कि हम देखेंगे स्कूली शिक्षकों की निम्न सामाजिक हैसियत और पेशेवर पिछड़ेपन के प्रति गिजुभाई बेहद चिंतित थे।
भाषा शिक्षण: शिक्षकों की तैयारी पेपर रजनी द्विवेदी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सीखने.सिखाने की प्रक्रिया का एक अहम मुद्दा है भाषाध्एँ और उनका शिक्षण।भाषा और उसके शिक्षण के बारें में उपलब्ध शोधोंए उनके निष्कर्षोंए इस सन्दर्भ में होने वाली चर्चाओं व विमर्शों तथा दस्तावेजों तथानीतियों में भी इससे सम्बंधित मुद्दों को रेखांकित करने तथा इस सम्बन्ध में सेवापूर्व व सेवारत प्रशिक्षणों के अन्तर्गत कदम उठाने की बहुत बातें होती हैं। लेकिन इन सबके बावजूद भाषा शिक्षण की स्थिति में सुधार ना के बराबर है।वैसे तो भाषायी क्षमता के आकलन के लिए बहुत अच्छे साधन भी उपलब्ध नहीं हैंए किन्तु जिनकी चर्चा है और जो व्यापक स्तर पर किए जाते हैं उनमें एक असर की रिपोर्ट है। असर का अध्ययन यद्यपि बहुत सीमित है फिर भी उसके अवलोकनों पर दृष्टि डालने से चिन्ताजनक परिस्थिति सामने आती है। असर 2014 के अनुसार कक्षा दो में एक तिहाई बच्चे ऐसे हैं जो वर्ण भी नहीं पहचान पाते और यह संख्या पिछले कुछ सालों मेंबढ़ी ही है घटी नहीं इसी तरह कक्षा पाँच में लगभग 50ः बच्चे ऐसे हैं जो कक्षा दो के स्तर का टेक्स्ट भी नहीं पढ़ पाते।बात अपनी भाषा की हो अथवा द्वितीय भाषा की दोनों ही मामलों में यह सत्य है कि लगभग 10.12 वर्ष स्कूल में गुजारने के पश्चात भी बच्चे भाषा नहीं सीख पाते।
अध्यापक और अलग दौर पेपर जामिया मिलिया इस्लामिया के फराह फारूक़ी तथा अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के अनिल सेठी ने प्रस्तुत किया।
पेशेवर शिक्षक का बनान: अर्थ और एक संभावित प्रक्रिया पेपर मधुलिका झा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में शिक्षा की बदहाली और तकनीक के विकास को देखकर हम शिक्षक विहीन कक्षा की कल्पना चाहे करने लगे होंए पर सच तो यह है कि स्कूली शिक्षा में बेहतरी का कोई भी प्रयास शिक्षक को साथ लिए बिना संभव नहीं है। शिक्षक सीखने.सिखाने की प्रक्रिया में निर्जीव पाठ्यक्रम और जीवंत शिक्षार्थी के बीच की वो मानवीय कड़ी हैए जो किसी माली की तरह हर शिक्षार्थी को उसके अनुरूप सीखने और पल्लवित होने के लिए आवश्यक वातावरण मुहैया कराकर उनके सीखने में योगदान दे रहा होता है। इसीलिए आवश्यक हो जाता है कि यह कड़ी अपने आप में इतनी सक्षम हो कि पाठ्यक्रमए शिक्षार्थी और ज्ञानार्जन की प्रकिया में उभरने वाले तनावों और चुनौतियों को न सिर्फ स्वयं झेल सकेए बल्कि बच्चों को सीखने.सिखाने की इस यात्रा में सहयात्री मानते हुए उन्हें भी चुनौतियों का सामना करनेए निर्णय लेने और उन निर्णयों की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार होने में वांछित मदद कर सके। शिक्षक की ऐसी भूमिका पाठ्यवस्तुए बच्चे के संज्ञानात्मक स्तर और सिखाने की प्रक्रिया के ज्ञान की मांग करती है। यह ज्ञान किसी के पास स्वतरू ही नहीं आ जाता है। इसके लिए एक खास तरह की समझ का निर्माण और लगातार तैयारी से गुजरने की जरूरत होती है।इसी सन्दर्भ में शिक्षक को एक पेशेवर के तौर पर देखे जाने और उसका दर्जा देने की मांग उभरती हैए जिसमें यह निहित है कि शायद एक पेशेवर शिक्षक अपने कार्यक्षेत्र में आने वाली चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर सकता है और शिक्षा में बेहतरी के प्रयासों में सक्रिय योगदान दे सकता है।
शिक्षण-शास्त्रीय जड़त्व और शिक्षक प्रशिक्षण मुम्बई सीईआईएआर टाटा इंस्टिटयूट आॅफ सोशल साइंस के अजय कुमार सिंह ने प्रस्तुत किया।
अध्यापक बनने की प्रक्रिया एकलव्य ,शाहपुर,मध्यप्रदेश के घनश्याम तिवारी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक के दौरान शिक्षक शिक्षा पर काफी काम किया गया खासकर छत्‍तीसगढ़ मेंए इसके अलावा मध्‍यप्रदेशए राजस्‍थानए दिल्‍ली आदि राज्‍यों में कुछ.कुछ प्रयास किए गए। इन प्रयासों में मुख्‍यतरू डीण्एडण् में इस्‍तेमाल होने वाली शिक्षण सामग्री व शिक्षक प्रशिक्षण ;सेवा कालीन व सेवा पूर्वए दोनों तरह केद्ध प्रमुख हैं। शिक्षा का अधिकार लागू होने के चलते राज्‍य सरकार ने भी स्‍कूलों में प्रशिक्षित शिक्षक की कमी को पूरा करने में डीण्एडण् को अनिवार्य किया।
शिक्षकों के पेशवर विकास की प्रक्रिया में सेवापूर्व एवं सेवाकालीन शिक्षक शिक्षा पाठ्यक्रमों एवं उनके क्रियान्वयन पर एक नज़र पेपर अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, देहरादून की प्रिया जायसवाल ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्रके लिए सुयोग्य नागरिक तैयार करने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।और शिक्षा के नीति निर्माण और नियोजन के लिए पहली जिम्मेदारी नीति निर्माणकर्ताएशिक्षाविद एवं प्रशासक की है औरइनके द्वारा निर्मित शिक्षायोजना को स्कूलों में ले जाने वाली सबसे सबल कड़ी है सुयोग्य शिक्षक।
इस बात की नितान्‍त आवश्यकता है कि शिक्षक अपनी पेशेवर पहचान को मजबूत करेए अपनी अस्मिता को पहचाने। एक शिक्षक के शिक्षक बनने कि तैयारी और उसका व्यवसायिक विकास बहुत ही महत्वपूर्ण हैप् शिक्षक उन सभी शैक्षिक संसाधनों से सुसज्जित है जो उसे अपनी भूमिका का निर्वहन करने में सक्षम बनाते हैं जिसमें उनकी शैक्षिक एवं व्यावसायिक योग्यताए सेवापूर्व परीक्षण और विभिन्न स्तरों पर किए जाने वाले सेवाकालीन प्रशिक्षण के प्रावधान शामिल हैं। लेकिन विभिन्न प्रयासों के बावजूद भी धरातल पर अपेक्षित परिणाम स्कूलों में नहीं दिखाई दे रहे हैं जिसकी जवाबदेहीशिक्षकों की मानी जातीहै। क्या इसके लिए मात्र शिक्षक को ही जिम्मेदार ठहराया जाए या उन कारणों को भी टटोला जाए जो इस हेतु जिम्मेदार हैं। इस सम्‍पूर्ण चक में जो महत्वपूर्ण पक्ष है वह है शिक्षकों की तैयारी जिसमे हमारे सेवापूर्व शिक्षक प्रशिक्षण भी शामिल हैंए और जिस तरह यह प्रक्रिया चल रही है वह स्वयं में प्रश्न चिह्न है। विभिन्न आयोगों व नीतियों में शिक्षक शिक्षा पर चिन्‍ताएँ जाहिर की जाती रही हैं जिसमें शिक्षकों के व्यवसायीकरण पर जोरए शिक्षक.शिक्षा पाठ्यचर्या में सुधारए समेकितपाठ्यक्रमए शोध एवं नवाचार आदि शामिल हैं। परन्‍तु इन सभी अनुशंसाओ पर हम कितना बढ़ पाए हैं उसे भी विश्लेषित किए जाने की आवश्यकता है
प्रारम्भिक अध्यापक शिक्षा में प्रभावी शिक्षण अभ्यास अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन,दिल्ली के निमरत खंदपुर ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यवसाय में प्रवेश से पहले एक लंबे समय की तैयारी अनिवार्य है। एक शिक्षक के विकास के लिए भी सीमित समय की प्रारम्भिक शिक्षा और उसके बाद समय.समय पर सेवारत अध्यापक शिक्षा का प्रावधान किया गया है। शिक्षण अभ्यास प्रारम्भिक अध्यापक शिक्षा का एक अहम हिस्सा है। शिक्षण अभ्यास छात्र अध्यापक के लिए व्यावसायिक जीवन की पहली झलक नहीं है। उसके पहले भी एक छात्र के रूप में उन्होंने अपने शिक्षकों का कई सालों तक अवलोकन किया होता है। साथ ही मेंए वह अपने अध्यापक शिक्षा कार्यक्रम की कक्षाओं में भी कई मुद्दों पर विचार करते हैं। इस के आधार पर उनके मन में शिक्षा और शिक्षण को ले कर कुछ अवधारणाएँहैं। परन्तुष जब वह एक शिक्षक के रूप में विद्यालय का हिस्सा बनते हैंए इन अवधारणाओंमें बदलाव आता है।
साथ ही में एक द्वंद उठता है.जो कुछ उन्होंने अध्यापक शिक्षा के कार्यक्रम की कक्षाओं में अब तक जाना है और जो विद्यालया की हकीकत है दृ इन दोनों के बीच का एक द्वंद। शिक्षण अभ्यास का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य कक्षा के सैद्धान्तिक ज्ञान और विद्यालय में अभ्यास के बीच जुड़ाव स्थापित करना। साथ हीए शिक्षण अभ्यास छात्र अध्यापक में एक समेकित दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास है। परन्तु ए शिक्षण अभ्यास को केवल एक औपचारिकता के नज़रिये से ष्पूराष् किया जाता है। अध्यापक शिक्षा के कार्यक्रमों की अवधि तो बढ़ा दी गई हैए पर पूरे विश्वास से यह नहीं कहा जा सकता है कि इस अधिक समय में शिक्षण अभ्यास में कुछ सुधार आ सकेगा। अगर शिक्षण अभ्यास की प्रक्रिया के लिए ध्यान से योजना नहीं बनाई जाएए तो छात्र अध्यापकों के लिए शिक्षण एक उद्देश्यविहीन अनुष्ठान की तरह होगा दृ उनका ध्यान बच्चों और शिक्षण.अधिगम की बारीकियों पर ना जाकरए ष्आज के कार्यष् से जुड़ी विधि तक सीमित होगा।
विज्ञान शिक्षक बनने की प्रक्रिया: एक विचारात्मक लेखा जोखा पेपर दिल्ली विश्वविद्यालय की युक्ति शर्मा एवं नेहा मलिक ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षण का हरेक पहलूए जिसमें अनुदेशात्मक विधिए विषय सामग्री और मूल्यांकन ये सभी शिक्षक के विश्वासए मान्यताओंए अनूभूतियों और अपेक्षाओं प्रभावित करती है। इन सभी विश्वासोंए स्व.धरणाओंए अनूभूतियों और अपेक्षाओं के बनने में शिक्षण प्रशिक्षण संस्थान महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिक्षक प्रशिक्षुओं के विज्ञान शिक्षक बनने की प्रक्रिया में उनके स्वयं का विकासए उनके पहले से बने विचारों और अनुभूतियों से प्रभावित होता है। यह पर्चा लेखकों के स्वयं के शिक्षण संस्थान में एक शिक्षक होते हुए भावी शिक्षकों के साथ लगातार जुड़े रहने के दौरान उपजे अवलोकन और चिंतन पर आधरित है। उन शिक्षक प्रशिक्षुओं से बातचीत के दौरान यह पाया गया कि ष्विज्ञान शिक्षकष् के बारे में उनके पास पहले से कुछ निश्चित मापदण्डश बने हुए हैं।
जैसेए अधिकतर का यह मानना है कि विज्ञान में ज्यादातर अवधारणाओं की समझ का विकास उसे ष्सरलष् करके किया जा सकता है। जो यह दर्शाता है कि वे विज्ञान की अवधारणाओं की प्रकृति को ही जटिल मानते हैं तथा उनके अनुसार विज्ञान शिक्षक की भूमिका इसके सरलीकरण की है। शिक्षक प्रशिक्षु यह साफ मानते हैं कि विज्ञान एक जटिल और अमूर्त अवधरणाओं से मुख्यतया भरा पुंज है जिसे प्रमाण व साक्ष्य की अपेक्षाए व्याख्या द्वारा समझाया जाता है। शिक्षक प्रशिक्षुओं के अमूर्त सिद्धान्तोंु के विकास को ध्यान देनाए ये इंगित करता हैए कि वे विज्ञान की गतिमान प्रकृति को आत्मसात नहीं कर पाए हैं। उनका यह विचार कि विज्ञान शिक्षक की भूमिका. विज्ञान के सिद्धान्तोंि और प्रदत्तों को छात्रों के लिए बोधगम्य बनाना.हमें उनकी विद्यार्थियों और विज्ञान शिक्षण को लेकर कुछ मान्यताओं की ओर इशारा करती है। शिक्षक प्रशिक्षु किसी भी सिद्धान्तं को स्पष्ट और सरल बनाने हेतु ष्डायग्रामष् को काफी महत्त्वपूर्ण मानते हैं। वे विद्यार्थियों द्वारा प्रतिरूपण के निर्माण को नजरअंदाज कर देते हैं। माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों में जिज्ञासा विकास को महत्व दिया जाता है परन्तुह इसका निपटारा भी वहीं कक्षा में ही कर दिया जाता है। पाठ्य पुस्तकों से अवधरणाओं को पढ़ना स्वीकार्य नहीं माना जाता है और वे इसे व्यर्थ मानते हैं। शिक्षक प्रशिक्षुओं से ज्यादा पड़ताल करने पर यह पता चला कि वे विज्ञान सीखने की प्रक्रिया में पढ़ने और लिखने को विज्ञान सीखने के लिए ज्यादा आवश्यक नहीं मानते हैं।
अध्यापक जीवन की दुरभिसंधियां पेपर मंडल शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान दिल्ली की शारदा कुमारी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हमें विश्वा स करना होगा कि सभी बच्चोंन में सीखने.सिखाने की अपार संभावनाएँ हैं। पढ़ना.लिखना सीखना किसी वर्ग विशेष के बच्चों की बपौती नहीं है। प्रथम पीढ़ी के माता.पिता वाले बच्चेम या झुग्गीा.झोपड़ी में बसर करने वाले बच्चेर सभी पढ़ना सीख लेते हैं। बेशर्ते हम सीखने के परिवेश का सृजन करने में संकोच न करें।
हमें स्वीीकार करना होगा कि सभी बच्चेव मानवीय गरिमा के अधिकारी हैं।
ष्अरे बच्चे् ही तो हैं इनका क्या घ्ष् कहकर हम बच्चोंक की मानवीय गरिमा को ठेस नहीं पहुँचा सकते।
गुणवत्ता हेतु प्रयासरत अध्यापक शिक्षा संस्थाओं के प्रति भविष्य के अध्यापकों का अभिमत पेपर रतनलाल कंवरलाल पाटनी गल्र्स काॅलेज,किशनगढ़ राजस्थान के मितेश जुनेजा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अध्यापक शिक्षा के माध्यम से भविष्य के अध्यापकों की प्रभावी तैयारी के साथ.साथ सेवारत अध्यापकों के पेशेवर विकास को उचित दिशा प्रदान की जाती है। इसी द्विमुखी आयाम के माध्यम से शिक्षा और शैक्षिक वातावरण को प्रभावी बनाया जाता है। जब यह कहा जाता है कि भारत का भविष्य उसके कक्षा कक्षा में बन रहा है तो यह भी सरलता से समझ में आता है कि शिक्षक ही भारत के निर्माण की सशक्त धुरी है और शिक्षकों के प्रयासों से शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ और सार्थक बनाया जा सकता है। इससे यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि शिक्षाए समाज और राष्ट्र के मध्य गहरा सम्बन्ध है। अध्यापक शिक्षा को इसी आधार पर शिक्षा के दो प्रमुख स्तरों उच्च और विद्यालय शिक्षा दोनों के मध्य धुरी के रूप में विद्यमान कहा जा सकता है।
एक शिक्षक कौन है? सामाजिक रूपरेखा में बदलाव का एक निरीक्षण अम्बेडकर विश्वविद्यालय की आरुषि कथूरिया ने प्रस्तुत किया।
आदर्श और हकीकत के द्वंद में उलझा हुआ शिक्षक का पेशा ,कालाढूंगी,नैनीताल,उत्तराखण्ड के अध्यापक दिनेश कर्नाटक ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अगर शिक्षक का पेशा परिवारए राज्य तथा समाज के लिए इतना अधिक महत्वपूर्णहै तो इतने महत्वपूकार्य के लिए समाज के सबसे योग्य लोगों को इसमें आनाचाहिए। यह राज्यए परिवार और समाज की नजरों में सबसे प्रतिष्ठित पेशा होनाचाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं है। ऐसा क्यों है कि इतने महान और महत्वपूर्णपेशे में प्रथम वरीयता के रूप में कोई नहीं जाना चाहता।99 फीसदी लोगइंजीनियरए मैनेजरए डॉक्टर या कोई अफसर न बन पाने के बाद मजबूरी में शिक्षकबनते हैं। मजबूर और असफल लोग क्या सफल लोगों का पथप्रदर्शन कर सकते हैं।
यथार्थ और यथार्थ की दूरियां हरियाणा के ज्ञान विज्ञानकर्मी शीशपाल ने प्रस्तुत किया। शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशालाओं में पाठ्यचर्या,पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा का महत्व पेपर हिमांशु श्रीवास्तव ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भाषा शिक्षक का काम अन्य शिक्षकों से कुछ अधिक ही बनता है। भाषा का काम एक विषय से कुछ अधिक इसलिए है क्योंकि हम भाषा के माध्यम से चिन्त्न.मनन भी करते है। यानी हमारी अधिकतर अवधारणाएँ शायद भाषा में ही बनती हैं। इसके अतिरिक्त भाषा का सम्बसन्ध‍ साहित्य से भी है। अतः साहित्य का परिचय शिक्षक को हो ऐसी भी अपेक्षा रहती है। पहले ही एन सी एफ में प्राथमिक शिक्षक से वार्तालाप करनेए वर्णन करने एवं कथावाचन की बात लिखी गई है। यह भी कहा गया है कि मौखिक संवाद पहला कदम हैए पढ़ने.लिखने की बात उसके बाद होनी चाहिए। मिडल स्तर के शिक्षक से इसी एन सी एफ में यह अपेक्षा की गई है कि वह बच्चों में मौलिकता एवं सर्जनात्मकता का विकास करे। नवीं एवं दसवीं में तो साहित्यिक रचनाओं का आस्वादन करने की योग्यता विकसित करने की बात लिखी गई है। आगे लिखा गया है कि भाषा शिक्षण इस तरह से हो कि बच्चों में गहरे विश्ले्षण की क्षमता विकसित हो। यहाँ स्कूली पत्रिका के प्रकाशन तक की बात की गई है।
शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशालाओं में पाठ्यचर्याए पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा का महत्वरू हमारे औजार असल में कितने दुरूस्त हैंघ् रू हिमांशु श्रीवास्तव विज्ञान शिक्षकों की मौजूदा प्रशिक्षण प्रक्रिया पर अगर एक नजर डालें तो पता चलता है कि ज्यादातर प्रशिक्षणों में सब ज्‍यादा जोर रहता है विषयवस्तु की समझ को पुख्ता करने पर। कुछ प्रशिक्षणों में विज्ञान करने की प्रक्रिया का एक अनुभव देने पर भी जोर दिया जाता है और कोशिश की जाती है कि शिक्षक विज्ञान विषय की प्रकृति के बारे में भी कुछ समझ बना पाएँ। मसलन विज्ञान को एक ऐतिहासिकए सामाजिकए सांस्कृतिक उद्यम के तौर पर समझ पानाए विज्ञान में किसी भी बात को परम सत्य ना माननाए वगैरह। बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने की जरूरत पर भी थोड़ी.बहुत बातचीत होती ही है।
शिक्षक प्रशिक्षण व अवधारणात्मक समझ पेपर रमा कान्त अग्निहोत्री ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि पूरी शिक्षा व्यवस्था में ही पूरी तरह से बदलाव आना चाहिए। स्कूल बेहतर होने चाहिए। हर बच्चे को एक ही तरह के स्कूल में जाने का अवसर मिलना चाहिए चाहे वह बच्चा गरीब परिवार का हो या अमीर काय चाहे ऊँची जाति का हो या सामान्य जाति काय चाहे सामाजिक दृष्टिकोण से वह शरिरिक या मानसिक रूप से एक आदर्श सामाजिक छवि में खरा उतरता हो या नहीं। एक समावेशी स्कूल का निर्माण करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इसी तरह यह भी आवश्यक है कि अध्यापक को मिलने वाली सुविधाओं में सुधार हो। उन्हें बेहतर वेतन मिले और उन्हें अपना काम करने की पूरी आजादी हो। बच्चों को मिलनेवाली पठन सामग्री इस बात पर आधारित हो कि बच्चे कैसे सीखते हैं और कैसे नए ज्ञान का निर्माण करते हैं और किस प्रकार वे संसार के एक जिम्मेदार नागरिक बन सकते हैं न कि इस बात पर कि उन्हें एक परीक्षा पास करनी है।
यदि आप यह सब सुनिशित भी कर दें तो भी शायदयह सम्भव न हो कि बच्चों को ऎसी शिक्षा मिल पाए जिससे वह किसी भी विषय पर तर्कसंगत वहस कर पायें और उससे से कुछ अधिक सीख पायें जो उन्हें स्कूल में पढ़ाया गया है। इस बात पर भी प्रश्नचिंह है कि क्या जो उन्हें स्कूल में पढाया गया वह वे समझ सके और क्या उनके अध्यापक उन बातों के बारे में स्पष्ट अवधारणात्मक समझ रखते हैं। शायद ये विद्यार्थी कभी जिम्मेदार नागरिक न बन पायें और न ही किसी दूसरे व्यक्ति या समाज के प्रति संवेदनशील हो सकें। हमारी आज की शिक्षा का जोर तो केवल इस बात पर है कि कैसे अच्छे नंबर लिए जाएँ और कैसे अच्छी नौकरी मिले।
शिक्षण कर्म का स्वरूप: व्यापक परिप्रेक्ष्य असकला जिला सरगुजा की पुष्पा सिंह ने प्रस्तुत किया।
फर्ज़,हर्ज़ और मर्ज़ शिक्षक मुकेश मालवीय ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सरकारी शालाओं के शिक्षकों में अपने मुख्य काम के प्रति भारी उदासीनता है।बच्चों और उनके पालकों तथा प्रशासन का वजूद इतना कमजोर है कि शिक्षकों में न पढ़ाने की निरंकुश स्वछन्दता पनपने लगती है।
फिर भी कुछएक शिक्षक पढ़ाते हैं . तीन तरह की वजह से रू फर्जएहर्ज और मर्ज
1ण् फर्ज रूकुछ थोड़े से शिक्षक हैं जो शिक्षण कर्म को फर्ज समझते हैं। नैतिकता और मूल्यों का अनुसरण करने वाले ये शिक्षक अफसरों और युवा साथियों के उपहास और कोप को सहते हुए अपने कर्म मे लगे रहते हैं। इनके सिखाने पढ़ाने के अपने नियम कायदे हैंए जैसे भय और कंठस्थीकरण आदि।
2ण् हर्ज रूदूसरे समूह में वे शिक्षक हैं जो हर्ज या डर की वजह से गैरशिक्षकीय काम करते हुए भी अपना शिक्षकीय काम अच्छे से करते हैं। सरकारी शिक्षा विभाग में डर की व्यवस्था पहले कई स्तरों पर थी जिससे जबाबदेही तय होती थी। परअब आसपास डर और जिम्मेदारी की प्रेरणा का नितांत अभाव है।
3ण् मर्ज रूतीसरे समूह में वे शिक्षक हैं जिन्हें सीखने.सिखाने का मर्ज होता है।ये शिक्षक अपने शिक्षण में प्रयोगधर्मी दृष्टिकोणए विविधताए शिक्षा की नयी बातों को अपनाते हैं इनके पास दो तरह की योग्यता है ;1द्ध व्यंक्तिगत योग्यणता ;2द्ध शिक्षकीय योग्य ता।
तीसरे समूह के शिक्षक अपने निर्णय खुद लेने का विवेकरखते हैं। इनमें वैचारिकसंपन्नयता और संवेदनशीलता होती है।
शिक्षक होने की दुविधा दिल्ली के शिक्षक मुरारी झा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मैंने कुछ जटिल सवालों को समझने की कोशिश जरूर की है। ये सवाल हैं किएबदलते आर्थिक एवं सामाजिक परिवेश में जहाँ कोई माता.पिता अपने बच्चे को शिक्षक नहीं बनाना चाहता हैए एक शिक्षक किस प्रकार अपने लिए एक पहचान बनाता हैघ् एक शिक्षकए शिक्षक है या नौकरशाही के ढाँचे का अंतिम पायदान घ् और ऐसे कई सवालए लेखए उत्तर कम और सवाल ज़्यादा उत्पन्न करते हैं। हमारे छात्र हमसे उत्तरों की अपेक्षा किए बैठे रहते हैं और हम हैं कि उन्हें सवाल पे सवाल दिए जाते हैं ।
शिक्षक होने के मायने पेपर अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय,बेंगलूरु के हृदयकान्त दीवान ने प्रस्तुत किया।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षक की भूमिका पेपर दिल्ली नगर निगम की अध्यापिका एवं एमफिल छात्रा रंजना ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य एक सजगए सचेत व सशक्त नागरिक तैयार करना है। ऐसा नागरिक जो विवेकशील होए जो विभिन्न मुद्दों व विषयों की समझ रखता हो और सीखने व पढने में रूचि रखता होए जो विवेकपूर्ण निर्णय लेने में परिपक्व हो आदि। शिक्षा व्यवस्था की संरचना के अंतर्गत बच्चों के साथ सीधे तौर पर शिक्षक ही जुड़ता हैए उनसे अंतरूक्रिया करता है। वह न सिर्फ विभिन्न विषयों से बच्चों को अवगत कराता है अपितु उसके सर्वांगीण विकास के लिएभी कार्यरत रहता है। इसी के साथ शिक्षा व्यवस्था में अन्य कुछ प्रशासनिक ढाँचे स्थापित किए गए हैं जिनकी भूमिका शिक्षक के कार्यों में मदद करने की है जिसे सपोर्ट सिस्टम का नाम दिया जाता है जिसके सुचारू रूप से कार्य करने से शिक्षक और भी अधिक प्रभावी रूप से कार्य करने में सक्षम होता है। इस सपोर्ट सिस्टम का सही प्रकार से कार्य न करने पर शिक्षक के प्रमुख कार्य यानी कक्षा में शिक्षण.अधिगम प्रक्रिया बाधित होती है जिसका सीधा असर बच्चों की सीखने की प्रक्रिया व उनके अकादमिक प्रदर्शन पर पड़ता है।
समकालीन शैक्षिक परिदृश्य में अध्यापक की भूमिका पेपर सोनिका चैहान ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि व्यावसायिक कौशल को बढ़ाने के छलावे के तहतअध्यापन की जटिल धारणा को एक सरल और अमानवीय प्रक्रिया से कम कर दिया गया है। शिक्षकों को उनकी स्वतंत्रता और अधिकार को सीमित करने के बजाय सशक्तएपरावर्तक और महत्वपूर्ण पेशावरों के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए शिक्षकों के लिए अपनी आवाज उठाने और पेशेवरों के रूप में एक सामूहिक एजेंसी बनाना आवश्यक हो जाता है।
आदर्श बालक की छवियां पेपर निधि गुलाटी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जिसतरह बच्चों को एक समाज में देखा जाता हैए समझाजाता हैए और व्याखित कियाजाता हैए यह समाज के बारे में भी हमें काफी कुछ समझ देता है। यह परचा इसीराजनीतिक चेतना को संबोधित करता है।इसमें शामिल है इन अन्योक्तियों औरअभिप्रयायों को सुलझानाए और कुरेदना जिससे बचपनए शिक्षा और लोक.सम्मितसंस्कृति का सम्बन्ध समक्ष रखता है।
शिक्षक विकास: शिक्षकों के साथ मिलकर काम करना पेपर अज़ीम प्रेमजी फाउण्उेशन ऊधमसिंह नगर उत्तराखण्ड के कमलेश चंद्र जोशी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शैक्षिक व्यवस्था में शिक्षकों के सतत विकास के लिए मुख्य मंच सर्व शिक्षा अभियान या डायट द्वरा आयोजित शिक्षक प्रशिक्षण ही होते हैं। शिक्षकों के येप्रशिक्षणएकढर्रे के आधार पर ही संचालित होते हैं।शैक्षिक व्यवस्था के द्वरासेवारतशिक्षक प्रशिक्षण के अंतर्गत शिक्षक विकास काजो मानक प्रतिरूप अपनाया जाता है। वह कैसकेड मॉडलपर आधारित ही होता है जिसमें शिक्षकों के प्रशिक्षणों ष्ऊपर से नीचेष् पहुँचाया जाता है जिसकी गुणवत्ता सवालों के घेरे में रहती है। इसकी नकोईठोस पूर्व तैयारी होती है न ही कोई प्रशिक्षण के उपरांत की। इस प्रकार यह साल में एक की जाने वाली गतिविधि का रूप ही ग्रहण कर पाती हैं और शिक्षकों में कोई सीखने की उत्सुकता नहीं जगा पाती।इनप्रशिक्षणों के अंतर्गतएक व्यवहारवादी नजरिया ही दिखलाई पड़ता है जिसमेंशिक्षकोंतक ज्ञान पहुँचाने का ही नजरिया रहता है ।इन कारणों सेसेवारत शिक्षक प्रशिक्षण एकष्पूरी कर दी जाने वाली गतिविधिष् के रूप में हीरह जाता है और शिक्षकों के लिए कक्षा की प्रक्रियाओं के स्तर पर कोईअर्थपैदा नहींकर पाता। एनसीएफटीई.2009 के अनुसारइन प्रशिक्षणों की गुणवत्ता बनाने के लिए जरूरी है कि इन प्रशिक्षणों मेंउनके स्कूल के अनुभव शामिल हों। इसके साथ प्रशिक्षण प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जहाँ वे अपने विश्वासोंए मान्यताओंए कक्षागत व्यवहारों पर खुद से गहन विचार कर पाएँ।
शिक्षण में लचीलापन और बच्चों की मुखर होती आकांक्षाएँ रू प्रमोद दीक्षित ष्मलयष् सह.समन्वयक ;हिन्दी भाषाद्धएब्लॉक संसाधन केन्द्र नरैनीए जिला बांदाएउप्र ने कहा कि तैयारी करके कक्षा में जाना शुरू हुआ और तब मैंने पाया किसी पाठ को मैं कितने तरीकों से बच्चों के सामने रख सकता हूँ। यह सब करते हुए मैं बच्चों को समझते हुए अनायास उनके समीप चला जा रहा था और बच्चे भी मुझमें अपना अक्स देखने लगे थे। भाषाई भ्रम तोड़ने में ष्बच्चे की भाषा और अध्यापकष् ने सार्थक भूमिका निभाई। तब समझ पाया कि शिक्षक को बच्चे द्वारा उसके परिवेश से सीखे गए भाषा ज्ञान को स्कूल से जोड़ना होगा। उसके कोमल मन में सूचनाएँ ठूसने से बचना होगा। ष्ष्स्कूल में दाखिल होने तक बच्चे अपनी मातृभाषा की बुनियादी संरचनाओं पर अच्छा खासा अधिकार पा चुके होते हैं। पाँच वर्ष का बच्चा संदेशों को कार्य में बदलना जानता है। बच्चे के आसपास जो कुछ हो रहा होता हैए वह उसे अपनी सोच.विचार की छलनी से छान कर अपने भाषा.संयत्र का हिस्सा बना लेता है।
अब और चुनौतीपूर्ण हो गया है अध्यापन कर्म पेपर राजकीय हाईस्कूल भितांई,पौड़ी गढ़वाल,उत्तराखण्ड के शिक्षक मनोहर चमोली मनु ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि बदलाव समय की माँग है। लेकिन हर बदलाव पिछले बदलाव को सिर के बल उलटने के लिए होने लगें तो उससे नवाचारी अध्यापन कर्म छूटने लगता है। अध्यापन केवल कक्षा कक्ष तक सीमित रहने वाला कर्म नहीं है। वह स्कूल में प्रातःकालीन स्थल से लेकर छुट्टी का घण्टात बजने तक सीमित नहीं है। वह एक.दो साल में परिणाम देने वाला प्रगति.पत्र नहीं है। वह मात्र साल की परीक्षा लेने वाले मूल्यांकन पर केन्द्रित नहीं है। वह हर उस बच्चे की भाषा और उसकी समझ के विस्तार के साथ.साथ विद्यार्थियों के सामाजिक क्षेत्र में सकारात्मक व्यवहार पर भी केन्द्रित है। वह बच्चे के घरए पड़ोस और वय वर्ग में किए जा रहे व्यवहार पर भी केन्द्रित है।
गणित अध्यापक के रिफ्लेक्शन पेपर दिल्ली विश्वविद्यालय की हनीत गांधी व रुचि गर्ग ने प्रस्तुत किया।
राजनीति और समतावादी शिक्षा व्यवस्था: एक तुलनात्मक नजरिया पेपर अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के अमन मदान ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षक अपना काम एक व्यापक शैक्षणिक एवं सामाजिक व्यवस्था के बीच खड़ा हो कर करता है। यह परिवेश है जो कुछ हद तक तय करता है कि क्या शिक्षक अपने काम के बोझ के नीचे दबा जा रहा है या उसे कुछ नया करने और सोचने का मौका मिलता है। क्या शिक्षक को अच्छी चतम.ेमतअपबम ट्रेनिंग मिलती है कि नहीं। क्या शिक्षक को समाज में सम्मान मिलता है या उसे एक कम पैसे और कम इज्ज्त वाले पेशे का मुलाजिम माना जाता है। शैक्षणिक और सामाजिक व्यवस्था काफ़ी हद तक इस पर प्रभाव डालती है कि क्या शिक्षकों सिर्फ उच्च सामाजिक समूहों के बच्चों को ही योग्य बना पाते हैं या क्या वे दबाये गए सामाजिक समूहों के बच्चों को भी उन के बराबर लाकर खड़ा कर पाते हैं।
अध्यापक की तैयारी पेपर भोपाल अज़ीम पे्रमजी फाउण्डेशन की भारती पंडित ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अध्यापक की तैयारी बहुत मायने रखती हैक्योंकि इन सारी अपेक्षाओं के बरअक्स हमारे देश में शिक्षक शिक्षा विशेषतः सेवा पूर्व शिक्षक शिक्षा के प्रारूप को देखें तो स्थिति बड़ी ही जटिल दिखाई देती है। शिक्षक शिक्षा डीएडऔर बीएड इन दो उपाधियों के अंतर्गत संचालित की जाती है। इनके पाठ्यक्रम और अंतरण के तरीकों पर नजर डाली जाए तो ये अध्यापकों के वास्तविक जगत की तैयारी से पूरी तरह से असंबंधित दिखाई देते हैं जो कि जमीनी वास्तविकताओं से उनका परिचय नहीं कराते। यही स्थिति सेवाकालीन शिक्षक शिक्षा की भी है। ऐसे में इस क्षेत्र में कुछ ठोस प्रयास किए जाने अत्यंत आवश्यक हैं।
दूसरा दशक में आवासीय शिक्षण शिविर के अनुभव पेपर फलौदी, जोधपुर के मुरारी थानवी ने प्रस्तुत किया।
शिक्षक अधिगम केन्द्रों की स्थापना हेतु पहल पेपर छत्तीसगढ़ अजीम प्रेमजी फाउण्डेशन के सुरेश कुमार साहू, जयकिशन और नीरज राणा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षकों की तैयारी को शिक्षा प्रणाली से संबन्धित विभिन्न नीति दस्तावेज व अध्ययन रेखांकित करते रहें हैं। शिक्षक समुदाय स्वयं भी वर्तमान में प्रचलित प्रणालियों की खामियों को इंगित करते हुये बेहतर व्यवस्था की जरूरत महसूस करते रहे हैं। इनमें मुख्यतरू श्प्रशिक्षणश् केन्द्रित पद्धति में एकतरफा संवादए कक्षाओं की परिस्थितियों से सामंजस्य न होनाए तदर्थ प्रकृतिए ऐसे मंच की कमी जहाँ शिक्षक आपस में मिलकर अकादमिक मुद्दों पर चर्चा कर सकें व संसाधनों की कमी है। इनको ध्यान में रखकर अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन ने शिक्षण अधिगम केन्‍द्र के स्थापना की कल्पना की। इसका आधार शिक्षकों का स्वैच्छिक भागीदारीए शिक्षकों के आसानी से पहुँच वाले स्थानएवं समय परए जहाँ शिक्षक विद्यालय समय उपरांत आ सकते हैं।
शिक्षा के उद्देश्य: अध्यापक का नज़रिया पारुल कालरा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अध्यापकों के अनुसार चरित्र निर्माणए सामाजिक जिम्मेवारीए स्थानीय ज्ञानए स्वायत्तताए बुनियादी क्षमताओं को महत्वपूर्ण शिक्षा के उद्देश्य है। अध्यापकों की अभिव्यक्ति में गौर करने वाली बातें सामने आई। उनका अर्थात शिक्षा का उद्देश्यों से वयस्क बनाने की तैयारी में था। अध्यापकों ने शैक्षिक उद्देश्यों को सिर्फ तकनीकी कौशल तक ही सीमित नहीं माना था अपितु उसमें नैतिक मूल्योंए सामाजिक योगदानए जिम्मेवार एवं स्वायत जीव बनने की परिकल्पना भी शामिल थी। अध्यापक के अनुसार यह जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है क्योंकि यह दीर्घकालिक तथा आवर्ती उद्देश्य हैं। अध्यापकों ने मनन एवं चिंतन कर पाना एक अहम गुण बताया और इस बात पर जोर दिया कि बच्चा सहीए गलत की पहचान कर पाए। दूसरा एक महत्वपूर्ण अवलोकन अध्यापकों की बातों में नजर आया कि उनके उद्देश्या सांस्कृतिक रूप से सन्निहित हैं। शैक्षिक उद्देश्यों के बारे में चर्चा करते समय उन्होंने ऐसी विशेषताओं और गुणों की बात की जो भारतीय संस्कृति में निहित हैं। अध्यापकों ने सकारात्मक सोचए सामाजिक जिम्मेवारीए कल्याणए मेहनती होनाए सच बोलना को बहुत जोर दियाए जिसके तहत उन्होंने पंचतंत्र की कहानियों के उदाहरण लिए। अध्यापकों ने शैक्षिक व्यवस्था पर उपनिवेशवाद का और पश्चिमी सभ्येता का असर होने के कारण आत्मविश्वास एवं प्रतिष्ठा एक महत्वपूर्ण उद्देश्य कहा। तीसरा अवलोकन अध्यापकों की बातों में यह नजर आया कि उनके लिए बुनियादी क्षमताओं के साथ साथ उच्च क्रम के उद्देश्य भी अर्थपूर्ण हैं। शैक्षिक उद्देश्य उनके लिए बहु आयामी हैं नाकि एकल आयामी हैं।
प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षक छात्र संबंध पेपर टाटा इंस्टीटयूट आॅफ सोशल साइंसेस, हैदराबाद की निशा राजकुमार बुटोलिया ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि फ़िलहाल मै अपने पाँच वर्षीय बच्चे के लिए एक ऐसा स्कूल ढूँढ रही हूँ जहाँ वह सुरक्षित महसूस कर सके। वैसेही सहजता से रहेए बोलेए खेलेए सीखेए पूछेए विवाद करे जैसा वह घर पर करता है। उसे एक अच्छी शिक्षक मिल जाए जो उसके बाल मन को समझेए उसको समझाए और उसे प्रोत्साहन दे।
अक्सर मैंने लोगोसे सुना है कि स्कूल एक अलग ही तरह की जगह होती हैए वह घरजैसीतो होही नहीं सकती। उन लोगों का मानना है किस्कूल का दायित्व है कि वे आगेआने वाले जीवन की तैयारी करवाएँ। पन्द्रह . बीस साल बाद बच्चे जब बड़े हो जाएँगे तब उनसे क्या अपेक्षित होगा इसके आकलन पर तय होता है कि आज इन बच्चों के साथ क्या.क्या कराया जाए। आज इस बच्चे के लिए क्या जरूरी हैए इसका बचपन कैसा हैघ् यह क्या सोचता हैघ् इसके क्या सवाल हैं घ् इसको किसमें रुचि है घ् इसको किन.किन बातों में मजा आता हैघ् क्या इन सब के लिए पाठशालाओं में कोई जगह हैघ्
अभिभावक की नजर में अच्छे शिक्षक की परिकल्पना पेपर टाटा इंस्टीटयूट सोशल साइंसेस की ऋचा गोस्वामी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों की भूमिका प्रमुख है। वे तय करते हैं कि बच्चे कौन से स्कूल में जाएँगेए स्कूल के अलावा किस तरह के और निवेश जैसे ट्यूशनए उन पर किए जाएँ और वे कहाँ तक शिक्षा प्राप्तक करें। इस कारण से अभिभावकों की शिक्षकों के प्रति धारणा और उनसे अपेक्षाएँ समझना रुचिकर और ज्ञानवर्धक होगा। अभिभावकों के हिसाब से एक अच्छे शिक्षक का क्या अभिप्राय हैघ् शिक्षकों के बारे में बातचीत करते वक्त वे किस तरह की उपमाओं का प्रयोग करते हैं और यह उनके प्रति अपेक्षाओं को कैसे प्रभावित करती हैंघ् एक अच्छे स्कूल की संकल्पना में शिक्षक को वे कितना अहम मानते हैंघ्
भारत में अध्यापन कर्म व उसमें बदलाव पेपर गणेशपुर प्राथमिक शाला उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड की रेखा चमोली ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि विद्यालयों में अध्यापक बच्चों को अधिकाँश समय नियंत्रित करते हुए समय गुजारते हैं। ज्ञान को एक स्थाई उत्पाद मानते हुए बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि वे किताबों में लिखे संदर्भों को बिना सवाल किए याद करलें। अधिकाँश विद्यालयों कि प्राथमिक कक्षाओं में स्वर और व्यंजनों को याद करने और लिखने में बच्चे घण्टोंो बिताते हैं और कोई भी व्यक्ति जो विद्यालय के बाहर से गुजर रहा हो वह पहाड़ों कि आवाज सुन सकता है। विडम्बना यह है कि अधिकाँश लोग भी इसी को शिक्षा मानते हैं। मैंने अपने अनुभव में शिक्षा अधिकारियों को बच्चों से पहाड़े पूछते और सामान्य ज्ञान के सवाल पूछते और बच्चों के द्वारा अपेक्षित उत्तर न देने पर शिक्षिका की ओर संदेह कि नजरों से देखते पाया है। स्कूली अध्यापकों को शिक्षित करने वाले अध्यापक भी कुछ इसी तरह का आचरण करते हैं। हालांकि कुछ शिक्षिकाएँ ऐसी भी हैं जो बच्चों से अथाह प्रेम के चलते उन्हें विविध प्रकार कि पठन सामग्री उपलब्ध करवाती हैं ताकि बच्चों में किताब पढ़ने की रुचि का विकास हो। साथ ही बच्चों के साथ उनके सामाजिक एवं भौतिक परिवेश के बारे में बातचीत करते हुए उनका ध्यान विभिन्न सामाजिक एवं भौतिक घटनाओं के पीछे के कार्य कारण संबंधों को समझने कि और भी ले जाती हैं।
पढ़ना सीखने की प्रक्रिया में अध्यापक की बदलती भूमिकाएं दिल्ली के शिक्षक अक्षय दीक्षित ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि आज भी शिक्षक के काम को एक पंक्ति में बताना हो तो यही बताया जाता है कि टीचर का काम है पढ़ाना। ष्पढ़ानाष् ही शिक्षक की पहचान बन गया है और पढ़ाने की शुरुआत ष्पढ़नाष् सिखाने से होती है।प्राथमिक स्तर के शिक्षक का तो पहला काम ही माना जाता है ष्पढ़नाष् सिखाना।सैकड़ों सालों से शिक्षक बच्चों और कभी.कभी बड़ों को भी ष्पढ़नाष् सिखाने की कोशिश किए जा रहे हैं और बच्चे ष्पढ़नाष् सीखते चले जा रहे हैं।इसके बावजूदए हैरानी की बात है कि अधिकतर शिक्षण कला सिखाने वाले संस्थानों में भावी शिक्षकों को यह बताया ही नहीं जाता कि बच्चों को पढ़ना कैसे सिखाया जा सकता है।ऐसे में वे पढ़ना कैसे सिखाते हैंघ्
भारत में अध्यापन कर्म व उसमें बदलाव पिपरिया,मध्य प्रदेश के शिक्षक मनोहर लाल पटेल ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि एक अध्यापक शाला में लगभग 6 घण्टे अपने विद्यार्थियों के साथ बिताता है। वह स्वयं भी सीखता और सिखाता भी है। अध्यापक की सीखने व सिखाने की क्रिया निरन्त र चलती है। शाला के बाहर भी स्वयं के परिवारए मोहल्ला समाज व नगर में उसके पास सीखने व सिखाने के विशाल भण्डािर हैं। योजनाबद्ध तरीके से अपने अन्द र संचित ज्ञान के भण्डा र को निःस्वार्थ होकर बाँटने का गुण उसे दूसरे लोगों से अलग करता है। शिक्षा वह धन हैए जो कभी खत्म नहीं होता बल्कि जितना बाँटों उतना ही बढ़ता है। उन्होंने कहा कि एनसीएफ 2005 में ष्ष्बस्ते का बोझष्ष् कम करने का प्रयास किया गयाए किन्तु क्या बस्ते का बोझ कम हुआघ् अध्यापक के उपर पाठ्यक्रम को समय सीमा में पूरा करने का बहुत दवाब होता है। इस दवाब के कारण अध्यापक एक दिन में एक अध्याय को पूरा करने का प्रयास करते हैं।
शिक्षण में अपनानी होगी मल्टी सेन्सरी अप्रोच पेपर विद्या भवन,उदयपुर के गिरीश शर्मा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि बच्चों को नहीं पढ़ाने के पीछे शिक्षकों की मानसिकता हो सकती है। आठवीं तक न रोकने की नीति को गलत समझा गया और बच्चे को उसके भाग्य भरोसे छोड़ दिया। जबकि दूसरी ओर पढ़ाने में खामी की बात करें तो कक्षाओं में शिक्षण एक तरफा और पाठ्यपुस्तक केन्द्रित हो गया है। विद्यार्थियों की कक्षा में भौतिक उपस्थिति तो होती है किन्तु शारीरिक और मानसिक रूप से अनुपस्थित रहते हैं और एक मात्र ज्ञानेन्द्री ष्सुननेष् का उपयोग होता है। बालकों के सीखने को सुनिश्चि त करने के लिए विशेष प्रयासों की आवश्य कता है। इसमें विद्यार्थियों का जुड़ाव बहुत महत्वपूर्ण है।
भारत में शिक्षकों की पेशेवर पहचान पेपर दिल्ली विश्वविद्यालय की राधिका मेनन ने प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी बेहद संतुलित,सारगर्भित,व्यवस्थित,क्रमबद्धित होते हुए भी बेहद प्रभावशाली रही। एक घण्टा दिन के भोजन और दो दिन आधा घण्टा चाय व एक दिन पन्द्रह मिनट चाय के समय को निकाल लें तो कुल तीन दिनों में सहभागियों-श्रोताओं ने बाईस घण्टे पन्द्रह मिनट चर्चा में भाग लिया।
बता दें कि आयोजकों के पास कुल 180 पेपर तैयार करने का फौरी मसविदा पहुंचा था। जिनमें से 116 पेपर पढ़ने के लिए तैयार मान लिए गए। वह तैयार भी हुए। अंततः प्रस्तुतियों के लिए 100 पेपर चयनित किए गए थे। जिनमें से भौतिक तौर पर मंच पर 73 पेपरों की प्रस्तुतियां हुईं। विभिन्न सत्रों में मंच पर 107 चेहरों को स्थान मिला। वहीं कुल सत्रों की प्रस्तुतियों के बाद 200 से अधिक सार्थक सवाल सहभागियों-श्रोताओं ने प्रस्तोताओं से पूछे। तीनों दिन सुनने आने वालों के लिहाज़ से तथ्यों को आंकड़ा देखंे तो यह भी दिलचस्प रहा। पेपर प्रस्तुत करने वालों की संख्या के अलावा दोनों सभागारों की संख्या जोड़ लें तो हर दिन औसतन दो सौ श्रोता बने रहे। सहभागी साथियों में लगभग बीस ऐसे शोधकर्ता थे जिन्हें संगोष्ठी में सहभागी होने का मौका भी मिला, भले ही उन्होंने प्रस्तुतियां नहीं दीं। अम्बेडकर विश्वविद्यालय के बीस से अधिक विद्यार्थियों ने स्वयसेंवी भावना से तीन दिन अपने आप को प्रस्तुत किया हुआ था। संगोष्ठी आयोजन समिति में दिनेश मडगांवकर,हृदयकांत दीवानए
मनीष जैन मनोज कुमार
रोहित धनकर रंजना राजेश उत्साही
शिवानी नाग की बात न हो तो अधूरा होगा। ये कभी परदे के आगे होते तो कभी परदे के पीछे। ये न होते तो शायद इतना अच्छा अवसर इतने अच्छे तरीके से सम्पन्न न होता।
कुछ सुझाव:
एक-एक तो सारे सत्र एक ही हाॅल में हों।
दूसरा-क्षेत्रीय सेमिनार भी हों।
तीसरा-समयबद्धता तो रहे ही लेकिन कई बार बहुत कम समय भी बहुत कम ही हो जाता है। कई सत्र समय की अधिकता के कारण नीरसता की ओर बढ़ जाते हैं।
चार-यह अच्छी बात है कि पढ़े जाने वाले पेपर का मसविदा सहभागियों को पंजीकरण के वक्त ही मिल गया था। लेकिन इस बात की पुख़्ता आश्वस्ति हो जाए और समग्र लेख सबको मिल जाते तो सोने पे सुहागा हो जाता।
पांच-संभव है कि आयोजक एक बार फिर सहभागियों से इन्हें फिर से संपादित करने के लिए कहें। यह तय है कि हिंदी में पढ़े जाने और समझे जाने वाले इतने गहरे और जरूरी आलेख,शोध अनुभव समग्रता के साथ कहीं छपे ही नहीं हैं। यदि इन्हें पुस्तक का आकार दिया जाए तो बेहतर होगा।
छःह-सवाल करने वाले सहभागियों को भी यह चेताने की जरूरी है कि मंच पर बैठे प्रस्तोताओं को पता तो चले कि आप प्रश्न पूछ रहे हैं या अपनी टिप्पणी या विचार व्यक्त कर रहे हैं।
सात-मेरे जैसे कई रहे जो कईयों से पहली बार मिले। मैं रोहित धनकर, राजेश उत्साही,हार्डी, श्याम मेनन, मनोज कुमार जी से बात करना चाहता था लेकिन तीन दिन कब बीते पता ही नहीं चला। एक सत्र एक घण्टे का ऐसा होता कि उसमें कुछ न होता और हम सब सहभागी आपस में बात करते। सेल्फी खींचते। एक-दूसरे का परिचय लेते।
आठ-एक समय में दो-दो सत्रों का अलग-अलग जगह पर संचालित होने का मकसद था लेकिन मेरे जैसे ऐसे कई थे जो दोनों अलग-अलग स्थलों पर सत्रों को सुनना चाहते थे।
नौ-मसविदा सौ ही छपे थे। जबकि दो सौ से अधिक सहभागी आते रहे और जाते रहे। मेरे कई साथियों ने कहा था कि यार छपी सामग्री की एक-एक काॅपी लेते आना। हालांकि हमने आयोजक समिति से कहा और उन्होंने हमारी बात रख भी ली कि यह स्वीकृति देकर कि हम जिन किसी के भी मेल देंगे वह आरंभिक विचारों की बानगी 168 पेज की बुकलेट की पीडीएफ काॅपी सभी को भेज देंगे।
दस-आस-पास किसी एक छोटे से दर्शनीय स्थल में आने-जाने की मस्ती टाइम भी होना चाहिए था। वह चाहे छह बजे के बाद ही होता। हम सभी को लाने-ले-जाने के लिए एक पूरी बस थी। उसका थोड़ा सा और उपयोग हो जाता।
(अभी है...)
-मनोहर चमोली
राजकीय हाईस्कूल भितांई,पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड
मोबाइल-07579111144

16 मई 2017

मैं, बाल लेखन और वैज्ञानिक नज़रिया

मैं, बाल लेखन और वैज्ञानिक नज़रिया


-मनोहर चमोली ‘मनु’


अपनी लेखन यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूँ कि एक दैनिक अखबार में मेरा एक पत्र काॅलम में पत्र छपा था जो डाक देर से मिलती है पर आधारित था। तब मैं कक्षा बारह का छात्र था। बस यहीं से मैंने लिखना आरंभ किया था। काॅलेज पत्रिकाओं में भी लिखा। अख़बारों में संपादकीय पेज पर पत्र काॅलम ने शब्दों को विस्तार दिया। याद करता हूं तो पाता हूं कि इसके बाद जन ज्ञान पत्रिका ने मेरे लेखन को बेहद विस्तार दिया। इसके लिए मैं राकेश पंत जी एवं पंकज बिष्ट जी का नाम कभी क्यों कर भूल सकता हूँ। उजाला नवसाक्षरों की मासिक पत्रिका ने भी मुझे स्थान दिया। फिर तो जैसे लिखने के लिए एक के बाद एक स्टेशन मिलते रहे। मैं एक यात्री की मानिंद उन स्टेशनों पर उतरता रहा। फिर यात्रा करता फिर दूसरे स्टेशन पर चढ़ता फिर अगले स्टेशन पर उतर जाता। नवसाक्षर लेखन ने मुझे सरल लेखन की ओर बढ़ाया। इसके लिए उत्तराखण्ड का राज्य संदर्भ केन्द्र हमेशा याद रहेगा। जनवाचन आंदोलन के तहत दो किताबों का आना और भी सुखद रहा। धीरे-धीरे यह समझ में आया कि लेखन तो मानदेय भी दिलाता है। नवसाक्षर साहित्य माला के तहत पांच-छह किताबें आईं। लेखन कार्यशालाओं में जाने का खूब अवसर मिला। इन कार्यशालाओं में एक साल आया। 

1997। कुछ लेखन कार्यशालाओं में बाल साहित्यकार कृष्ण शलभ एवं अश्वघोष जी भी बतौर लेखक रहे। इन दोनों ने मुझे कई बार कहा-‘‘बाल साहित्य के क्षेत्र में आओ। वहां बच्चों के लिए कारगर लिखने वाले कम ही हैं।’’ इधर मुकेश यादव जी एवं सुशील उपाध्याय की नज़र मुझ पर पड़ी। इन्होंने मुझे रुड़की से पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के लिए सलाह दी। इन्हीं दोनों की वजह से मैंने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार से पत्रकारिता का कोर्स किया। वहां मुझे स्वर्ण पदक मिला। मुकेश यादव जी ही थे जिन्होंने मुझे सीधे राष्ट्रीय अखबार राष्ट्रीय सहारा का रुड़की से संवाददाता काम करने का मौका दिलाया। दस साल पत्रकारिता में रुड़की से बहुत कुछ सीखा। रुड़की से मैंने ओमप्रकाश नूर जी के साथ गंग ज्योति साक्षरता पत्रिका का संपादन किया। यह हमने दो साल से अधिक प्रकाशित की। बहुत कुछ सीखा। इसी बीच ज्ञान विज्ञान बुलेटिन जगमोहन चोपता के साथ संपादित की। यहा ज्ञान विज्ञान बुलेटिन के आरंभिक दो साल से अधिक का संपादन ही मुझे वैज्ञानिक दृष्टिकोण की ओर ले गया। खूब लिखा। कहानी, नाटक, कविताएं, लेख, संस्मरण, व्यंग्य भी लिखे। आकाशवाणी के लिए नाटक लिखे। झलकियां लिखी। आकाशवाणी के अनिल भारती जी और विनय ध्यानी जी का सहयोग खूब रहा। इसी दौरान वर्ष 2000 में सार्वजनिक विद्यालयों की पाठ्यपुस्तक लेखन कार्यशाला में शिरकत करने का मौका मिला। वहां मैंने महसूस किया कि वाकई अध्यायों के तौर पर कक्षावार बहुत कुछ सार्थक पठन सामग्री खोजने से भी नहीं मिलतीं। बस यहीं से प्रेरणा मिली। अंततः 2005 से बच्चों के लिए साहित्य लिख ही रहा हूँ। बच्चों के लिए पहली बीज बना पेड छपी़। यह कहानी थी। संभवतः इसका प्रकाशन वर्ष 1997 था। बच्चों का साहित्य लिखते हुए मैंने कहानी को ही अपनी विधा बना लिया। जैसा पहले कहा कि यूँ तो कविताएँ,संस्मरण,नाटक,आलेख, फीचर, व्यंग्य भी लिखे हैं। लेकिन वर्ष 2005 से अमूमन बच्चों के लिए कहानियाँ ही लिखता हूँ। 

मैंने हमेशा स्वयं को आज भी छात्र समझा है। चन्दामामा, नंदन और चंपक से पढ़ने की आदत बनी। काॅमिक्स का भी खूब योगदान रहा। अध्ययन तो आज भी जारी है। इसे प्राथमिकता में रखने का प्रयास रहता है। वर्ष 2005 से अध्यापन कर रहा हूँ तो पढ़ना-पढ़ाना दैनिक गतिविधि है ही। पढ़ने-पढ़ाने से लिखने के लिए खुराक मिलती है। नित नए आयाम दिमाग में कौंधते हैं। जितने कौंधते हैं उतने कागज़ में जो नहीं उतर पाते। हर साल हर कक्षा में नई पौध आती है। नए विचारों के साथ, ऊर्जा भरे बच्चे। संभावना लिए बच्चे। फिलहाल कक्षा छह से दस में पढ़ने वाले बच्चों के सम्पर्क में हूं। लेखन का स्रोत भी यही बच्चे होते हैं। मुझे तो यह लगता है कि शिक्षण ही एक मात्र ऐसा व्यवसाय है जो किसी को भी व्यावहारिक लेखक बनाने की क्षमता रखता है। बच्चों के साथ पढ़ने-पढ़ाने के समय एक बात हमेशा मन में आती है। वह है पुस्तकें। बच्चों के बहुत कम ही पुस्तकें हैं जो कोर्स के तौर पर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के आलोक में तैयार हुई हैं। उन्हें अपवाद मान लूं तो कह सकता हूं कि नहीं। वैसे तो पाठ्यपुस्तकों की अपनी सीमाएं होती हैं। विवशता भी। वे अक्सर आनंद देने में असफल ही होती दिखाई देती हैं। आम धारणा यही है कि पाठ्यपुस्तकें सूचना, ज्ञान, जानकारी देने वाली होनी चाहिए। वे उपदेश से भरी होनी चाहिए। शिक्षाप्रद होनी चाहिए। जबकि मेरा मानना है कि वे इससे पहले पढ़ने की ललक जगाने वाली होनी चाहिए। ऐसी पुस्तकें हों जिनमें बच्चों के स्वर हों। बच्चों की दुनिया उन पुस्तकों में हो। उनकी दुनिया का चित्रण उनमें हो। बच्चों को उनके अनुभवों को विस्तार देने के अवसर उनमें हों। सवालों का जवाब देने की बजाय पाठ्यपुस्तकें बच्चों के भीतर सवाल करने की आदत विकसित करने वाली हों। अधिकतर पुस्तके पहले पेज से धार्मिक ग्रन्थ अधिक लगती हैं। मिथकों से भरी कहानियां और वर्णन पुस्तकों में होना ही नहीं चाहिए। अनुमान और कल्पना के नाम पर बच्चों में बेवजह के डर जगाती सामग्री पुस्तक में न हों। यदि कोई पाठ्य पुस्तक किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देती हो, ऐसे ही चित्रों से अटी पड़ी हो तो यह भयावह है। अंधविश्वास, पाखण्ड, भाग्यवाद को स्थापित करने वाले पाठ घातक हैं। बच्चों के स्कूल से इतर भी बहुत अच्छा कुछ पढ़ने के लिए नहीं मिल रहा है। इधर कुछ पत्रिकाएं हैं जिन्होंने बच्चों के लिए पठनीय सामग्री देनी आरंभ की हैं। रूम टू रीड, एनसीईआरटी, प्रथम, तूलिका, चकमक, प्लूटो जैसे नाम कुछ ही हैं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, चिल्ड्रन बुक्स आदि कुछ पत्रिकाएं हैं जो बच्चों के लिए जरूरी तत्वों को ध्यान में रखते हुए प्रकाशित हो रही हैं। मैं आनंद को सबसे जरूरी तत्व मानता हूं जो पढ़ने के लिए सबसे पहले चाहिए। यही वह तत्व है जो पढ़ने की ललक पैदा कर सकता है। पढ़ने को बचाए रख सकता है। आनंद। मस्ती की अनुभूति पहला अनिवार्य तत्व हो। बालपाठ्यक्रम में यही मूल और अनिवार्य तत्व अधिकतर गायब है। हाशिए पर है। अनिवार्य रूप से बच्चों के स्वर होने चाहिए। बच्चों की दुनिया को शामिल करते हुए अधिगम के रास्ते पर ले जाया जाना चाहिए। भाषा सरल हो। सहज हो। प्रवाहमय हो। सीख,सन्देश,उपेदश सुझाते आदर्श वाक्यों से इतर ऐसी रचना सामग्री पाठ्यक्रम में हो जो बच्चों की अस्मिता का सम्मान करती हो। बच्चों को सम्पूर्ण व्यक्तित्व मानने का बोध कराने वाली सामग्री से बना पाठयक्रम हो।

इसके बाद मैं कल्पना शीलता के साथ विज्ञान को लेखन में जरूरी समझता हूं। विज्ञान यानि विशिष्ट ज्ञान। इसे भौतिक-रसायन के खोल से बाहर रखकर समझने की आवश्यकता है। विज्ञान को तथ्यों की पढ़ाई मान लेना ही इसके साथ सबसे बड़ा अन्याय है। विज्ञान कुछ रसायनिक पदार्थों के प्रयोग तक सीमित नहीं है। इस ब्रह्माण्ड के ज्ञात सीमित तथ्यों को रट लेना भर विज्ञान नहीं है। विज्ञान का अध्ययन तो हमें जिज्ञासु बनाता है। जिज्ञासु बनाए रखता है। विज्ञान ही तो है जो हमारी जिज्ञासाओं को शांत करता है और फिर अनवरत् जिज्ञासु बनाए रखने की ललक भी पैदा करता है। विज्ञान ही तो है जो हमे कल,आज और कल की जानकारी भी देता है। विज्ञान का फलक बड़ा है। वह हमें भाईचारा, लोक कल्याण और सामाजिक भी बनाता है। उदाहरण के लिए कल के मानव यहां-वहां धूप में यूं ही विचरण किया करते थे। पेड़ों की छांव में खड़े हुए होंगे तो छांव की अहमियत का पता चला होगा। तेज धूप के प्रभाव से बचने का उपाय खोजना आरंभ किया होगा। विशिष्ट जानकारी हासिल की होगी और छतरी का आविष्कार हुआ होगा। धूप-बारिश से बचाव की आवश्यकता ही आविष्कार का कारण बनी। एक व्यक्ति का आविष्कार लोकोन्मुखी बना। आज हमें समझना होगा कि विज्ञान नज़र और उसके असर पर केन्द्रित होता है। 

मैं अपने आस-पास देखता हूं कि स्कूलों में भी और घर में भी विज्ञान के दायरे को समेट कर रखा हुआ है। मनुष्य महाबली कैसे बना? जवाब है विज्ञान के सहारे ही उसने अपनी सोच-समझ को विस्तार दिया। अन्य जीवों से वह आज श्रेष्ठ जीव बन गया है। मानव से पहले भी सैकड़ों जीव इस दुनिया में पैदा हुए और काल के गाल में समा गए। जो हैं भी वे अपने विकास के क्रम में गतिअनुसार बहुत पीछे हैं। मानव की प्रगति में विज्ञान सबसे धारदार और असरदार हथियार है। हम सब यह जानते ही हैं कि हमारे सर्वांगीण विकास में विज्ञान की भूमिक सर्वोपरि है। लेकिन फिर भी विज्ञान को पढ़ना और वैज्ञानिक नज़रिए को जीवन मंे उतारना दो अलग बातें हैं। आज भी विज्ञान विषय को अधिकतर तथ्यों और आविष्कारों का अंग माना जाता है। आज भी अधिकतर छात्र विज्ञान तो पढ़ रहे हैं लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जीवन में उतारने वाले छात्रों की संख्या बेहद कम है। समाज में विज्ञान का ठोस एवं क्रमिक अध्ययन का ठीक उलट परिणाम पसरा पड़ा है। वैसे तो विज्ञान के अध्ययन के ठोस एवं स्पष्ट उद्द्ेश्य हैं। जिन्हें मैं इस तरह से समझना चाहता हूँ-एक-हमें अपने आस-पास घट रही घटनाओं को गौर से देखने का सलीका आ जाता है।दो-गौर से देखने के सलीके के साथ उन घटनाओं के कारणों का अनुमान लगाने लगते हैं। तीन- अनुमान लगाने के साथ सही या गलत तक पहुँचने से पहले उत्पन्न परिस्थितियों की जांच करने लगते हैं। चार-जांच के कई तरीकों के बाद निकले निष्कर्षों से अपने नज़रिए में बदलाव लाते हैं। तो यह कहा जा सकता है कि यदि हमारे मन-मस्तिष्क में संदेह करने की आदत नहीं है। हमारे सोचने के ढंग में जानने की आदत विकसित नहीं है। जानने के साथ मानने के बीच की यात्रा में पुष्टि के लिए स्वयं के प्रयास नहीं हैं। असफलताएं फिर प्रयास फिर असफलताएं फिर सफलता की मशक्कत नहीं है तो हम विज्ञान के उद्देश्यों से परे हैं। खुद करके समझना ही विज्ञान का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। यह कौन नहीं जानता। 

बच्चों की स्कूली किताबें हो या स्कूल से बाहर उन्हें मिल रहा साहित्य हो। वह बहुत कम है जो बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करता हो। बच्चों से पहले तो बड़ों में ही अमूमन वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित नहीं है। यही नहीं विज्ञान पढ़ाने वाले अध्यापकों में (सब नहीं) भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित नहीं है। दरअसल हम बहुत कुछ अनुकरण से सीखते हैं। घर-परिवार-पड़ोस का अनुकरण हम पर हावी रहता है। बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टि तो बचपन से जगाने की जरूरत है। लेकिन वही तो जगाएगा जो खुद इसका पक्षधर हो। हम बच्चों के सामने मिथकों,अंधविश्वासों का ढेर जमाए रखते हैं। यह ढेर इतना विशाल है कि उसके पीछे खड़ा अटल विज्ञानरूपी सूरज का प्रकाश धूमिल हो गया लगता है। ऐसे कई उदाहरण मेरे समक्ष हैं जिन्हें सुनकर आम जानकार भी माथा पीट लेगा। ऐसे विज्ञान के परास्नातक छात्र हैं जो आज भी तंत्र-मंत्र, जादू-टोने,मिथक,अंधविश्वास के घेरे से बाहर नहीं हैं। आज ही बताएं। जुलाई-अगस्त के महीने में सांपों का बिल से निकलना आम बात है। ऐसे में किसी विद्यालय में विज्ञान पढ़ाने वाला अध्यापक छात्रों से साँप को मरवा दे और यह कहे कि इसकी आंखों को गोबर से ढक दो अन्यथा मादा सांप मरे हुए सांप की आंखों में देखकर मारने वालों को डस लेगी। जब शिक्षक ही सूर्यग्रहण जैसी खगोलीय घटना को देखना बुरा मानता हो। जब शिक्षक ही यह मानता हो कि जंगल में लगने वाली आग से आने वाली वनस्पिति और बेहतर होगी तो आप समझ सकती हैं कि बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहां से पनपेगा। यही स्थिति हमारे घरों में भी है। जब हम पूजा-पाठ में प्रतिदिन दो-दो घण्टे बिताते हों। दिन विशेष में हमारे बहुत सारे काम वर्जित हों। दिनों के हिसाब से हमारा भोजन हो रहा हो। समय के हिसाब से हमारा यात्रा करना, बाहर निकलना होता हो तो वैज्ञानिक नज़रिए की उम्मीद करना बेमानी है। सुनी-सुनाई बातों पर सालों से यकीन करने की नियति हमारी आदत है। जैसा चला आ रहा है उसे वैसा ही हम बच्चों में हस्तांतरिक कर रहे हैं तो वैज्ञानिक फैलाव की गति धीमी तो रहेगी ही। 

यह इतना कठिन भी नहीं है। हमें सबसे पहले बच्चों के विचारों को सुनना होगा। यह हमारा पहला काम हो। दूसरा उनके नज़रिए का सम्मान करना दूसरा काम हो। उनके अनुभव और उनकी समझ को वैज्ञानिक विश्लेषण की कसौटी पर कसने के अवसर देना तीसरा बड़ा काम हो। उन्हें खुद खोजने और प्रयोग करने का मौका देना चैथा बड़ा काम है। इसके लिए तमाम गतिविधियां है जो की जानी लाभदायक हो सकती हैं। विद्यालय इन गतिविधियों को कराने का सबसे सरल और कारगर प्लेटफार्म है। मसलन विद्यालय के आस-पास पनपे घरेलू पौधों की सहायता ली जा सकती है। कुछ पौधों को चुना जा सकता है। कुछ को पानी देना और कुछ को पानी न देने वाली गतिविधि बेहद सरल और लाभप्रद है। बच्चों को हर रोज की गतिविधि नोट करने का अभ्यास कराया जा सकता है। अब तो मोबाइल आम साधन है। हम हर रोज के फोटोग्राफ्स ले सकते हैं। इसी तरह दो पौधों को ले सकते हैं। एक विद्यालय परिसर में लगा हो और दूसरे को हम गमले में कक्ष के भीतर रख दें। बच्चों से कहें कि दोनों में आ रहे बदलाव को बीस से तीस दिन तक देखें। नोट करे और अपने अनुभव लिखें। छात्र अपने अनुभव से समझना, जानना और मानकर सीखना अधिक पसंद करते हैं। 

अध्यापकों की भूमिका भी इसमें सबसे खास और जरूरी हो जाती है। प्रातःकालीन सभा से लेकर छुट्टी का घण्टा बजने तलक कई ऐसे अवसर आते हैं जब हम छात्रों के साथ विज्ञानपरक रुचि जगाने का काम करते हैं। यहां तक कि खेल में भी समूचा विज्ञान छिपा है। मध्याह्न भोजन में भी हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण की दर्जनों बातें कर सकते हैं। हाथ धोने का विज्ञान हो या बैडमिन्टन खेलते समय हवा के रुख का शटल पर प्रभाव हो या अन्य विषय हों। हमारा मकसद स्पष्ट होता है। आज जब नागकन्या, अवतार, राक्षस, डायन, भूत-प्रेत जैसे धारावाहिकों की बाढ़ आ गई है। ज्योतिष में नफा-नुकसान बताने वाले बाबा सुबह-सुबह टीवी पर आ धमकते हैं। ऐसे समय में सत्य-असत्य की परख में बच्चों को समर्थ बनाना ही आज की पढाई है। जल स्रोतों-गदेरों में घटती जल धारा की चर्चा को बदलते मौसम के साथ-साथ ग्लोबल वार्मिंग तक ले जाना आसान है। धरती में पाए जाने वाले हर जीवों की महत्ता केंचुए से लेकर सांप-चूहे तक ले जाई जाती है। यह बताना कि कुछ कीड़े-मकौड़े जहरीले क्यों हैं? उनसे सावधान रहना ठीक है। उन्हंे मारना ठीक नहीं। वे कहीं न कहीं हमारे मित्र हैं। हमारे जिन्दा रहने के लिए उनका जिंदा रहना भी जरूरी है। चूहों का विद्यालय में आना आम बात है। चूहों की वजह से सांप का आना स्वाभाविक है। कहीं न कहीं विद्यालय में बन रहा भोजन और उसका भण्डारण विद्यालय में जमा हो रहा कूड़ा-करकट चूहों को बुलाने में सहायक है। यदि ये दोनों का उचित रख-रखाव ओर निपटारा हो तो संभव है कि चूहों का रहन बदल जाए। चूहा ऐसा जीव है जिसे बेवजह भी कुतरने को कुछ न कुछ चाहिए। कागज और विद्यालयी सामग्री उनके लिए सरल माध्यम बन जाती है। चूहों की गंध पाकर सांप आते हैं। कोई भी घटना, स्थिति और समस्या के पीछे कोई न कोई कारण है। हम उन कारणों का पता लगाने की ओर छात्रों को अग्रसर करें। कारणों का पता लगाकर निष्कर्ष के तौर पर समाधान भी छात्र खोज लेते हैं। 

मेरा स्पष्ट मानना है कि यह काम अध्यापक वर्ग बखूबी कर सकता है। मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वैज्ञानिक तथ्य और जानकारी देना मेरा काम नहीं है। कला भी अपने आप में विज्ञान है। रंगों का संयोजन और चित्रांकन भी अपने आप में सधा हुआ विज्ञान है। इसके लिए कोई तय वादन नहीं है। यह तो देशकाल और परिस्थिति के अनुसार स्वतः ही हो जाता है।  कई बार प्रातःकालीन सभा में बच्चे जो सामान्य ज्ञान के प्रश्न साझा करते हैं वहीं से वैज्ञानिक नज़रिए के आलोक में हमें अपनी बात कहने का मौका मिल जाता है। हमारा प्रयास होता है कि हम कुछ ऐसी चर्चा आरंभ करें जिसके बाद छात्र सोचें और समझने के लिए और अध्ययन करें। मसलन अपने आस-पास के कीड़े-मकोड़ों की दैनिक गतिविधियों को देखने का काम दे देते हैं। विद्यालय परिसर में मौसमवार पौधों-पेड़ों में आ रहे परिवर्तनों को गौर से देखने-समझने का काम दे देते हैं। सर्दी-गर्मी-बरसात से हम पृथ्वी और सूर्य पर चर्चा करने लगते हैं। गर्मियों में पत्तों के झुलसने की बात हो या नया अंकुरित कोई नन्हा पौधा हो। इनका दैनिक अध्ययन करना अपने आप में दिलचस्प गतिविधि है। एक हरी पत्ती के सूख जाने की पूरी प्रक्रिया मज़ेदार है। थर्मामीटर से प्रत्येक सप्ताह का तापमान आंकने की गतिविधि से बच्चे बहुत कुछ सीखते हैं। तुलना करना, आंकड़ों को इकट्ठा करना। जोड़-घटाओ। तापमान का घटता-बढ़ता क्रम वे समझ पाते हैं। हाल ही में एक समाचार प्रातःकालीन सभा में एक छात्रा ने पढ़कर सुनाया-‘अब समुद्र में शहर बसाएगा अमेरिका।’ हमने इस बहाने दो देशों के बच्चों के परिवेश,वातावरण,शिक्षा-दीक्षा पर प्रकाश डालने का अवसर मिल गया। हमने यह चर्चा की कि क्यों कुछ राष्ट्र सूचना,तकनीक,प्रौद्योगिकी और विकास में बहुत उन्नत हैं। वहीं कुछ राष्ट्र बेहद पिछड़े हुए हैं। हमने इसे स्कूल केन्द्रित किया। बाल केन्द्रित किया। एक और वे राष्ट्र जो आज भी धर्म, ज्योतिष, आस्था, अंधविश्वास, कुरीतियों, सामाजिक कुपरंपराओं, जादू-टोनों की जकड़न में हैं वहां के बच्चों में भी इन जड़ताओं का असर रहेगा। वहीं दूसरी ओर जहां बचपन से ही बालमन को उन्नत सुविधाओं और तकनीकीयों का लाभ मिल रहा है वह वयस्क होकर राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। ऐसा नहीं है कि बच्चों में तुलनात्मक अध्ययन करने की समझ नहीं होती। होती है वह अपनी कक्षा में भी अपना आकलन स्वयं कर लेते हैं। अपने घरों में अपने भाई बहिनों के साथ अपनी स्थिति का अंदाजा उन्हें होता है। वे पास-पड़ोस के परिवारों की तुलना अपने परिवार से बखूबी कर लेते हैं। तो फिर वे अपने ज़ेहन में खोजी प्रवृत्तियों को शामिल क्यों नहीं कर सकते? कर सकते हैं। यह पहल, यह रास्ता उन्हें बड़े ही तो सुझाएंगे। 

मैं यह भी नहीं कहता कि आज विज्ञान शिक्षण में सुधार नहीं आया है। बहुत कुछ विज्ञान की कक्षाओं में हो रहा है। बहुत बदलाव देखने को मिल रहे हैं। विज्ञान शिक्षण में परिवर्तन आए हैं। हालांकि ये परिवर्तन नाकाफी हैं। गति बेहद धीमी है। विविधता भरे विकल्पों को बढ़ाने की आवश्यकता है। आज मोबाइल एप्स हैं। गूगल जैसे कई सर्च इंजन हैं। इनकी सुविधा है। विज्ञान आधारित वीडियों,चित्रों सहित लिखित सामग्री का विपुल भण्डार अंतरजाल पर उपलब्ध है। यू-ट्यबू जैसे सुविधा है। व्हाट्स ऐप में तो सैकड़ों ग्रुपस हैं जिनके माध्यम से विज्ञान शिक्षण और सरल तथा प्रभावी हो गया है। वीडियों काॅलिंग के जरिए विज्ञान विशेषज्ञों से सीधे बातचीत कराना संभव हो गया है। प्रयोगशालाओं का प्रचलन बढ़ा है। विज्ञान हमारे हाथ में आ गया है। हालांकि विज्ञान को कॅरियर के तौर पर अपनाने का प्रतिशत लगातार घट रहा है। इंजीनियरिंग-चिकित्सा-तकनीकी क्षेत्रों की ओर छात्रों का आकर्षण अब भी बना हुआ है। यह स्वयं में हैरानी की बात है। 

बहुत सारी बातों का मैंने यहां उल्लेख किया है। लेकिन बच्चों से ही बात न हो तो सब व्यर्थ है। यह कहना तो बनता ही है कि छात्रों को हमेशा क्या,कैसे,क्यों,कौन,कब और कहां से जूझते रहना चाहिए। यह छह सवाल हैं जिनसे जवाब पाने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। प्राकृतिक हो या मनुष्यजनित। सभी घटनाओं,बातों, समस्याओं और परेशानियों के कुछ न कुछ कारण हैं। कारण है तो उनके समाधान भी हैं। उन समाधानों तक पहुंचने का माध्यम ही विज्ञान है। छात्रों का मौन रहना वैज्ञानिक नज़रिए की मौत है। संतुष्ट हो जाना थक जाना है। थकान हमेशा निराशा की ओर ले जाती है। वहीं प्रकृति न तो मौन है और न ही संतुष्ट। वह तो आशा का संचार करती है। अहा! धरती कितना देती है! यह वाक्य सनद रहना चाहिए। प्रकृति को तभी तो माँ कहा जाता है। माँ से कुछ नहीं सीखा तो क्या सीखा। सीखने का एक भी अवसर न जाने दें। जी हाँ। आपसे भी यह कहना तो बनता है कि आप पाठक, अध्यापक, अभिभावक, समाज के जिम्मेदार नागरिक आदि के तौर पर जैसे भी स्वयं को देख रहे हैं आज वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अपने व्यवहार की जरूर पड़ताल करेंगे। करेगें न?
 ॰॰॰

लेखक परिचय: मनोहर चमोली ‘मनु’: ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ और ‘पूछेरी’ पुस्तकें नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुई हैं। ‘चाँद का स्वेटर’ और ‘बादल क्यों बरसता है?’ ‘अब तुम गए काम से’, ‘चलता पहाड़,’‘जूते और मोजे’ सहित पांच पुस्तके ‘रूम टू रीड’ से प्रकाशित हुई हैं। बाल कहानियों का संग्रह ‘अन्तरिक्ष से आगे बचपन’ उत्तराखण्ड बालसाहित्य संस्थान से पुरस्कृत। बाल साहित्य में वर्ष 2011 का पं॰प्रताप नारायण मिश्र सम्मान मिल चुका है। जीवन में बचपन’ बाल कहानियों का संग्रह बहुचर्चित। बाल कहानियों की पच्चीस से अधिक पुस्तकें मराठी में अनुदित होकर प्रकाशित। उत्तराखण्ड में कहानी ‘फूलों वाले बाबा’ कक्षा पाँच की पाठ्य पुस्तक ‘बुराँश’ में शामिल। दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में हिन्दी की सहायक पुस्तक में नाटक ‘मस्ती की पाठशाला’ शामिल। हिमाचल सरकार के प्रेरणा कार्यक्रम सहित पढ़ने की आदत विकसित करने संबंधी कार्यक्रम के तहत छह राज्यों के बुनियादी स्कूलों में 13 कहानियां शामिल। बीस से अधिक बाल कहानियां असमियां और बंगला में अनुदित। उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में शिक्षक हैं। 
सम्पर्क: भितांई, पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल. 246001.उत्तराखण्ड. मोबाइलः09412158688.
ई-मेल: chamoli123456789@gmail.com

27 जन॰ 2017

Nandan child magzine feb 2017 manohar chamoli manu

'छोटी जो बड़ी वो'

-मनोहर चमोली ‘मनु’


रिनछिन के पेंसिल बाॅक्स में मिटनी, छिलनी और पेंसिल थी। रिनछिन ने दो और नई पेंसिल खरीदी। नई पेंसिलों को भी उसने बाॅक्स में रख दिया। एक नई पेंसिल बोली-‘‘मैं लाली हूं। ये हरियन हैं। आज से हम भी इस बाॅक्स में रहेंगे।’’

मिटनी ने जवाब दिया-‘‘स्वागत है। ये छिलनी है।’’

बाॅक्स की पेंसिल बोली-‘‘मैं नीलू हूं। कभी मैं भी तुम्हारी तरह नई थी। इतनी ही लंबी। आज देखो। मैं मिटनी की तरह छोटी हो गई हूं।’’
 यह कहकर नीलू सुबकने लगी। तभी रिनछिन ने लाली और हरियन को बाॅक्स से बाहर निकाला। छिलनी की मदद से उन्हें छिला और फिर बाॅक्स में रख दिया। बाॅक्स में वे सब अभी बातें कर ही रहे थे कि रिनछिन ने बाॅक्स खोला। लाली को बाहर निकाला। लाली से अपना होमवर्क पूरा किया। फिर उसने हरियन की मदद से ड्राइंग बनाई।

होमवर्क करने के बाद उसने लाली और हरियन को पेंसिलबाॅक्स में रख दिया। नीलू सिसकने लगी। कहने लगी-‘‘मैं अब यहां नहीं रहूंगी। रिनछिन मुझे अपने हाथ में नहीं लेगी तो मेरा यहां क्या काम। इस बार जैसे ही बाॅक्स खुलेगा, मैं छिटककर बाहर आ जाऊंगी।’’ छिलनी और मिटनी ने नीलू को समझाया। लेकिन वह नहीं मानी।

सुबह नीलू को मौका मिल ही गया। अचानक रिनछिन के हाथ से बैग क्या छूटा, पेंसिल बाॅक्स खुल गया। नीलू छिटककर किसी काॅपी के बीच में जा छिपी। रिनछिन ने स्कूल में नई पेंसिल से काम किया। इंटरवल के बाद पांचवा पीरीयड ड्राइंग का था। आसमां और सुहानी ने रिनछिन से ड्राइंग करने के लिए पेंसिलें मांगी। रिनछिन ने लाली और हरियन को दे दिया। संयोग से ड्राइंग पीरीयड के बाद पढ़ाई नहीं हुई। स्टूडेंट्स मस्ती करते रहे।
छुट्टी होने पर रिनछिन आसमां और सुहानी से अपनी पेंसिलें लेना भूल गई। घर लौटकर रिनछिन को देर रात याद आया कि सुबह अंग्रेजी, गणित के साथ-साथ हिन्दी में होमवर्क मिला है। उसने बैग खोला और होमवर्क करने बैठ गई। यह क्या! बाॅक्स में पेंसिल नहीं थी। रिनछिन ने स्कूल बैग उलट दिया। काॅपी किताबों के साथ नीलू भी बाहर आ गई। रिनछिन ने नीलू को चूमते हुए कहा-‘‘थैंक्यू। आज दोनों नई पेंसिल तो स्कूल में ही छूट गईं। तुम न होती तो मैं होमवर्क ही नहीं कर पाती। कल स्कूल में डांट भी पड़ती।’’
नीलू रोने लगी-‘‘अब मेरी जरूरत ही कहां हैं। अब मैं किसी काम की जो नहीं रही।’’ रिनछिन चैंकी। फिर नीलू को सहलाते हुए बोली-‘‘तुम आकार में जितनी घटोगी, तुम्हारी उम्र उतनी ही बड़ी मानी जाएगी।’’
नीलू ने चैंकते हुए पूछा-‘‘वो कैसे?’’
रिनछिन ने हंसते हुए जवाब दिया-‘‘सीधी सी बात है। तुमसे जितना काम लिया जाएगा, तुम उतनी घिसोगी। जब घिसोगी तो छीली जाओगी। छीली जाओगी तो आकार छोटा होगा ही।’’
नीलू सोचने लगी। रिनछिन ने बताया-‘‘नई पेंसिल तो लगभग पचास किलोमीटर लंबी लाइन खींचेगी। वहीं तुमने तो यह सफर तय कर ही लिया है। नई पेंसिल बार-बार घटने के लिए छीली जाएगी। वहीं तुमने छीले जाने की बहुत सी पीड़ा सहन कर ली है।’’ नीलू चुपचाप सुनती रही।
रिनछिन ने कहा-‘‘नई पेंसिल को पहली बार सारे अक्षर और संख्याओं को बनाना सीखना होता है। वहीं तुमने हजार-हजार बार उन अक्षरों को और संख्याओं को बनाया है। क्या नहीं बनाया?’’ नीलू क्या जवाब देती। वह चुप ही रही।
रिनछिन ने हंसते हुए बोला-‘‘याद करो, कई बार तुम्हारी वजह से किए गए स्कूल और होमवर्क में मुझे शाबासी मिली है। ऐसे कई मौके आए हैं जब तुम्हारी बनाई ड्राइंग में मुझे इनाम मिले हैं। मेरी कई काॅपियों पर तुम्हारा लिखा हुआ काम है। तुम मेरी दोस्त हो। सहयोगी हो।’’ यह सुनकर नीलू गर्व से भर गई। अब वह खुशी से होमवर्क करने के लिए तैयार थी। 
॰॰॰mobile -09412158688.7579111144

-मनोहर चमोली ‘मनु’,गुरु भवन, निकट: डिप्टी धारा, पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड।

31 दिस॰ 2016

Folk and child literature लोक और बाल साहित्य manohar chamoli manu

लोक और बाल साहित्य 


-मनोहर चमोली ‘मनु’


उत्तराखण्ड का बाल साहित्य भी कला, संस्कृति और परंपरा की तरह अनूठा है। बेजोड़ भी है। यह लिखित से अधिक मौखिक-वाचिक परंपरा में अधिक समृद्ध रहा है। तब, जब पढ़ने का रिवाज़ ही खतरे में बताया जा रहा है। तब, जब वर्तमान उत्तराखण्ड के लोगों के बराबर एक और समाज अपने लोकजीवन सहित उत्तराखण्ड से बाहर रह रहा है। तब, जब उत्तराखण्ड में रह रहे बाशिंदांे में अधिकतर अंग्रेजियत के पक्षधर होते जा रहे हैं। ऐसी स्थितियों में कौन नहीं जानता कि अंग्रेजी ने जहां-जहां अपने पैर पसारे हैं, उसने मूलतः वहां का लोक और विश्वास तो लुप्त किया ही है। यह भी सही है कि उत्तराखण्ड का लोक इसीलिए भी खास और अनोखा है क्योंकि इस सर जमीं का लंबा चैड़ा इतिहास तो है ही साथ ही विदेशी संस्कृति का जनमानस किसी न किसी तौर पर यहां से जुड़ा रहा है।  
उत्तराखण्ड का रहा-बचा अधिकतर प्राचीन बाल साहित्य ज़बानी है और वह समय के साथ-साथ लुप्त होता जा रहा है। यह चिन्ता की बात है। अब तक लोक परंपरानुसार आंचलिक भाषाओं के अधिकाधिक प्रयोग से वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है, लेकिन अब यह भी पुरानी घुमन्तु पीढ़ीयों के गुजरने के साथ बीते समय की बात होता जा रहा है। 

हम सब जानते हैं कि ऋगवेद में उत्तराखण्ड हिमालय के इतिहास एवं संस्कृति के अल्प संकेत मिलते हैं। इसे सात सिन्धु प्रदेश मानने वालों का कहना है कि यही आर्यो का देश रहा है। शतपथ ब्राह्मण में इस प्रदेश का इतिहास एवं संस्कृति का सन्दर्भ मिलता है। शकुन्तलोपाख्यान भी इसी क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है। केदारखण्ड और मानसखण्ड का संबंध इसी भूमि से है। बौद्धों के पालि साहित्य का प्रभाव इस क्षेत्र में रहा है।राजतरंगिणी (1148 ई॰) में केदारमण्डल का उल्लेख मिलता है। विदेशी प्रभाव जिसमें खासकर चीनी, मुगल, यूरोपीय-पुर्तगाली यात्रियों का प्रवेश भी वहां के साहित्य को यहां लेकर आया। यही कारण है कि उत्तराखण्ड को साहित्य की उर्वरा भूमि कहा गया है। लोक साहित्य में वीर गाथाएं, लोक कथाएं और लोकगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी वाचिक परंपरा के अनुसार हस्तांतरित होता रहा है। 

आम तौर पर उत्तराखण्ड में पढ़ने-लिखने का माध्यम हिंदी भाषा ही रही है। राज-काज की भाषा का प्रभाव भी रहा तो राजे-रजवाड़ों की संस्कृति, आचार-व्यवहार और परम्राएं, तीज-त्योहार भी कथा-कहानियों का हिस्सा रहे हैं। सब जानते हैं कि उत्तराखण्ड का उल्लेख पुराणों में मिलता है। अंग्रेजों से पूर्व अनेक वंशजों का शासन राज्य के कई हिस्सों में रहा है। आबाद और गैर आबाद रहन-सहन के कारण भी यहां का लोक साहित्य वाचिक परंपरा के कारण हस्तांतरित होता रहा। श्रुत परंपरा के आधार पर संकलित साहित्य आगे बढ़ता रहा। देशकाल, परिस्थितियों और वातावरण पर दृष्टि डालने वाले मानते हैं कि सातवीं शताब्दी के पूर्व का लोकजीवन भी कथा-कहानियों में सुनने को मिलता है। जानकार बताते हैं कि कहानियों में इतनी विविधता है कि समग्रता से अध्ययन करने पर भी इसके आरंभ का सिरा पकड़ में नहीं आता। पुराणों की छाप तो इन कहानियों में मिलती ही है। इसके साथ-साथ राजा-रजवाड़ों का परिवेश भी कहानियों में शामिल है। पीढ़ी दर पीढ़ी वाचिक परंपरा के आधार पर सुनी जाती रहीं कहानियों के शिल्प और प्रवाह पर ध्यान देने से पता चलता है कि प्राचीन कहानियों में विदेशी लोक जीवन की महक भी मिलती है। 

कहानियों में इतने भाव, बोध, संवेग और संघर्ष शामिल हैं कि लगता है पहाड़ का लोक जीवन और लोक साहित्य का अध्ययन करने के लिए वर्षों का समय चाहिए। वृहद अनुसंधान के लिए चुनौतियां स्वीकार करने के लिए युवा साहस चााहिए। जीवन संघर्ष, युद्ध, वृहद प्रकृति, विदेशियों का आगमन, कृषि, वन्य जीव, पालतू पशु, राजशाही, राजदरबारी जीवन, विवाद, कचहरी, अपराध, आंदोलन, बेगारी, लूटपाट, राहजनी, हिमालय, सर्दी, गर्मी, बरसात पर बाल साहित्य-सा सुनने-पढ़ने को मिल जाएगा। जानकार मानते हैं कि हिंदी साहित्य जितना पुराना है, उतना ही पुराना बाल साहित्य है। 

पिछले एक शतक से ही साहित्य से बाल साहित्य को अलग करके देखने का नज़रिया बना है। अन्यथा प्राचीन समय में साहित्य से ही समय के अनुसार बाल मन को सुनाए जाने वाले लोक साहित्य से ही बच्चों का मनोरंजन किया जाता रहा है। मनोरंजन के साथ-साथ बच्चों में नैतिकता, साहस और आज्ञाकारिता का भाव भरने वाला लोक साहित्य भी मिलता है। जिसे बाल साहित्य के खांचे में भी रखा जा सकता है। उत्तराखण्ड के लोक साहित्य में बहुत सारा साहित्य बाल साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। भले ही इन रचनाओं का जन्म जिस काल के लोक ने किया हो, उन्होंने विशुद्ध रूप से बच्चों के मनोरंजनार्थ ये न रचा हो। लेकिन यह उतना ही प्राचीन है जितना मानव। यही कारण है कि लोक साहित्य में ऐसा साहित्य भी है जिसमें बालपन केन्द्र में है। दिलचस्प बात यह है कि इसे अधिकतर लोक कथा, लोक गाथाओं, वीर गाथाओं, लोकगीतों के तौर पर ही देखा जाता रहा है। ऐसा साहित्य विपुल मात्रा में है जिसकी छाप ग्रन्थों, पुराणों, पंचतंत्र, वेताल पचीसी, तिलस्म, भूत-प्रेत-डायन, परी, अंधविश्वास से मेल खाता प्रतीत होता है। लेकिन यह हमारे बीते लोक का हिस्सा है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता। जैसे चिट्ठी-पत्री बीते समय के हमारे लोक का हिस्सा रही है। आज वह नई सूचना तकनीक के आने से धीरे-धीरे हमारे गीतों, रोजमर्रा के हिस्सों से लुप्त होने लगी है। अब कोई यह नहीं कहता कि चिट्ठी लिखना। चिट्ठी भेजना। लेकिन क्या आगामी समय का समाज चिट्ठी-पत्री और डाकिया की कभी बात नहीं करेगा? 

समय के साथ-साथ पुरातन परंपरा का प्रवाह भले ही आज मंद हो गया हो। दूसरे शब्दों में थम गया हो या लुप्त हो गया हो। लेकिन वह बीते कल का हिस्सा तो माना ही जाएगा। यह भी तय है कि साधारण बच्चों के लिए साधारण जनजीवन के ताने-बाने में रचा लोक साहित्य ही बाल साहित्य ही है। आज बाल साहित्य की समझ यह भी इंगित करती है कि वह साहित्य बाल साहित्य कहां है जो बच्चों को बड़ा होने की दिशा में सहायक न हो। दिलचस्प बात यह है कि लोक कथाएं हों या बाल साहित्य, सभी में आदिकाल से अब तक के जीवन की छाप दिखाई देती है। उत्तराखण्ड का साहित्य इसीलिए भी विशिष्ट हो जाता है कि अब तक सुना और पढ़ा जाने वाला लोक साहित्य अन्य अंचलों में भी थोड़े बहुत संशोधन के साथ सुनने-पढ़ने को मिल जाता है। उत्तराखण्ड में लोक बाल साहित्य मौखिक है और अभी भी जिन्दा है। बस उसे संग्रहीत करने की आवश्यकता है। जहां यह भी सत्य है कि गांव-दर-गांव उजड़ते जा रहे हैं। लेकिन आज भी पहाड़ की संस्कृति और लोक का बहुत अधिक हिस्सा सामुदायिकता, सहभागिता और वाचिक परंपरा के चलते रहा-बचा है। 

समूची संस्कृति के अध्ययन के लिए यहां के लोक साहित्य का वृहद अध्ययन जरूरी हो जाता है। अभी तक उत्तराखण्ड के बाल साहित्य का समग्र रूप से लिखित संकलन नहीं हो सका है। घर-घर जाकर पाण्डुलिपियों को इकट्ठा करने का काम करना होगा। बड़े-बुजुर्गो के साथ बैठकर इसे सुनना होगा। कुछ लोरियां सुनने-पढ़ने को मिलती हैं। लोक कथाएं पढ़ने को मिलती हैं। लेकिन लोक बाल कथाओं का तो संकलन करना होगा ! बाल गीत असंख्य हैं। लेकिन लोक बाल गीतों का संकलन भी एक बड़ा काम होगा। बहुत सी लोरियों और लोकगीतों में भी बाल वर्णन मिलता है। लोक साहित्य में अप्रत्यक्ष तौर पर बच्चों को प्रकृति से प्रेम करने, पशु-पक्षियों से प्रेम करने, गलत संगत न करने पर अधिक बल दिया गया है। इस हेतु परियों, चुडै़लों, डायनों, भूतों और निरंकुश राजाओं का सहारा भी लिया गया है। बच्चों को बुराईयों से दूर रखना सबसे बड़ा मकसद नज़र आता है। इसके साथ-साथ मेहनत करने, सच्चाई का साथ देने, बड़ों का आदर करने, खेती-बाड़ी करने आदि पर जोर दिया गया है।

एक बात तो निश्चित है कि उत्तराखण्ड में श्रुति एवं स्मृति का अधिकाधिक प्रयोग होता रहा है। रचनाएं सैकड़ों की ज़बान से सुनती-सुनती बनती-बिगड़ती नए-नए रूप में आगे बढ़ती रही। यह आज तक जारी है। मुझे लगता है कि लोककथाओं और लोक साहित्य से बाल साहित्य को छांटा जा सकता है। इसे काल खंड के स्तर पर भी किया जा सकता है। यह भी संभव है कि यदि देशकाल और समय का आभास न हो रहा हो तो कथावस्तु के आधार पर हम इसे अलग श्रेणियों में बांट सकते हैं। मसलन रीति-रिवाज, खान-पान, अंधविश्वास, परंपरा, लोक जीवन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और यथार्थपरक बाल साहित्य तो अलग किया ही जा सकता है।         

गढ़वाल, कुमांऊं, जौनसार, बधाण, रवांई जौनपुर आदि क्षेत्रों में ‘तीलू रौतेली‘, ‘पंथ्या दादा‘, ‘रामी-बोराणी’ जैसे सच्चे प्रसंगों का अविस्मरणीय इतिहास है। लोककथाओं जैसे-‘चल तुमड़ी बाटे-बाट‘, ‘काफल पाको-मिन नि चाखो’ को याद करते हुए उसमें बाल मनोविज्ञान और बाल मनोव्यवहार के साथ-साथ बच्चों के साथ बड़ों के व्यवहार की पड़ताल नए सिरे से की जा सकती है। इस तरह का कोई विशेष और ठोस अध्ययन प्रकाश में नहीं आया है, जिसके आधार पर कहा जा सकता हो कि उत्तराखण्ड में बाल साहित्य की लिखित शुरूआत कब, कैसे और कहां से हुई है। 

पढ़ने-लिखने की समृद्ध परंपरा के बावजूद भी उत्तराखण्ड में बाल साहित्य को बचकाना साहित्य-फूहड़ साहित्य मानने वालों की कमी नहीं हैं। अपढ़ों का साहित्य कहने वाले इस बात से अनजान हैं कि बाल साहित्य रचना प्रौढ़ साहित्य की ही तरह है। बाल साहित्य अधिक परिश्रम मांगता है। बाल साहित्य को बचकाना साहित्य मानने वालों में अधिकतर वे हैं, जिन्होंने न स्वयं बाल साहित्य पढ़ा है न ही बच्चों को वे बाल साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करते दिखाई देते हैं। दिलचस्प बात यह है जब उनसे पत्र-पत्रिकाओं के बारे में चर्चा करेंगे तो पाएंगे वे दो-तीन पत्रिकाओं के नाम के अलावा कुछ भी नहीं बता सकंेगे। आखिरी बार बाल साहित्य कब पढ़ा? यह सवाल पूछे जाने पर वे इधर-उधर की बात करते नज़र आएंगे।

बाल साहित्य को प्रकाशित करने वाले पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो उत्तराखण्ड के अलमोड़ा से प्रकाशित नटखट सबसे प्राचीन बाल पत्रिका प्रकाश में आती है। हालांकि इसका एक भी अंक उपलब्ध नहीं है। बच्चों का नज़रिया, बच्चों का अख़बार, बाल प्रहरी, बाल बिगुल, सितारों से आगे बचपन, अंकुर आदि के अलावा कुछ संस्थाएं हैं जिन्होंने अनियतकालिक बाल पत्रिका-पत्र के सीमित अंक प्रकाशित किए। उत्तराखण्ड के बाल साहित्यकारों की रचनाओं में परीकथाएं, गुलीवर की यात्राएं, एलिस इन वंडरलैण्ड की छाप अधिक दिखाई पड़ती है। कई रचनाकार अभी भी लोककथाओं के फाॅरमेट से बाहर नहीं निकल सके हैं। वे आज भी साठ के दशक के बच्चों की मानिंद आज के बच्चों के लिए बाल साहित्य रच रहे हैं। यह हैरानी की बात है। हालांकि उत्तराखण्ड में उत्तराखण्ड बाल कल्याण साहित्य संस्थान, बाल साहित्य संस्थान, अल्मोड़ा, रूम टू रीड, प्रथम, भारत ज्ञान विज्ञान समिति, रूलक जैसी संस्थाओं ने बालसाहित्य विमर्श आरंभ किया है। इस विमर्श में बालसाहित्य को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से रचने की वकालत भी की गई है।

आज भी अधिकतर बाल साहित्यकार बच्चों के स्तर का लेखन करने में सक्षम नहीं हैं। वे उपदेश देने, बच्चों को सूचना और ज्ञान देने, आदेश और नसीहत देने से अधिक नहीं सोच पाए हैं। वह बच्चों को सदाचारी बनाने, आज्ञाकारी बनाने और राष्ट्र का सच्चा नागरिक बनाने पर तुले हुए हैं। अधिकतर बाल साहित्यकार मानते हैं कि बच्चों को आदर्शवादी बातें बताना ही बालसाहित्यकार का ध्येय होना चाहिए।

आज का समय सूचना तकनीक का है। तीन साल के बच्चे भी जानते हैं कि पेड़ चल नहीं सकते। ट्रेन को टाटा करने का फायदा नहीं क्योंकि वह टाटा के बदले टाटा नहीं कह सकती। वे जानते हैं कि चांद मामा नहीं हो सकता। फिर क्यो न हमारा बाल साहित्य दिशा देने वाला हो। बेहतर जीवन की बात करने वाला हो। बच्चों की दुनिया से जुड़ी बातें बाल साहित्य में हो। बच्चे जो पढ़ना चाहते हैं। बच्चे जो जानना चाहते हैं। साहित्य भी उसी के आस-पास रहे। बच्चों को गड़ा खजाना मिल सकता है। अलादीन का चिराग भी हो सकता है से इतर यथार्थ जीवन से परिचित कराया जाए। आखिरकार उसे इस यथार्थ जीवन में ही बड़ा होना है। फिर क्यों झूठी दुनिया उसे परोसी जाए?

हिंदी बाल साहित्य का लिखित आरंभ भारतेंदु युग से माना जाता है। उत्तराखण्डवासियों का पढ़ने-लिखने का माध्यम हिन्दी है। यही कारण है कि हम हिन्दी बाल साहित्य के आस-पास ही बाल साहित्य के विमर्श पर बात नए प्रतिमानों के हिसाब से बाल साहित्य की पड़ताल कर सकते हैं। उत्तराखण्ड में प्राचीन समय से लिखने वाले बाल साहित्यकारों का कालक्रम भी व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। आजादी से पहले और आजादी के बाद का बाल साहित्य व्यवस्थित किया जाना चाहिए। आजादी के बाद गौरा पंत शिवानी की बाल कहानी अल्मोड़ा से निकलने वाली बाल पत्रिका नटखट में छपी थी। मृणाल पाण्डे, रमेश चन्द्र शाह का बाल साहित्य पढ़ने को मिलता है। सत्तर और अस्सी के दशक की पीढ़ी से आज के बाल साहित्यकारों की लंबी सूची है। लोक जीवन के साथ-साथ यथार्थपरक बाल साहित्य रचनाकारों में अश्वघोष, अरुण बहुखंडी, अनीता चमोली ‘अनु’, आशा शैली, उमा तिवारी, उषा कटियार, कृष्ण शलभ, कमलेश जोशी ‘कमल’ कालिका प्रसाद सेमवाल,खुशाल सिंह खनी, गरिमा, जगदीश पंत, जगदीश जोशी, जीवन सिंह दानू, देवेन्द्र मेवाड़ी, दिनेश लखेड़ा, दीवान नगरकोटी, डाॅ॰ नन्द किशोर हटवाल, नवीन डिमरी ‘बादल‘, पुष्पा जोशी, प्रबोध उनियाल, प्रीतम अपच्छयाण, प्रमोद तिवारी, पंकज बिष्ट, प्रेम सिंह पापड़ा, प्रेमवल्लभ पुरोहित ‘राही’,पंकज बिष्ट, भगवत प्रसाद पाण्डेय, बद्री प्रसाद वर्मा ‘अनजान’, महावीर रंवाल्टा, मनोहर चमोली ‘मनु’ मदनमोहन पाण्डेय, मंजू पांडे ‘उदिता’, महेन्द्र ध्यानी, मथुरादत्त मठपाल, मनोज पांडे, मुकेश नौटियाल, महेन्द्र सिंह राणा, महेन्द्र प्रताप पाण्डे, माया जोशी, माया पांडे, रमेश चन्द्र  पन्त, रश्मि बड़थ्वाल, रतन सिंह किरमोलिया, रतनसिंह जौनसारी’, राजेश्वरी जोशी, राज सक्सेना ‘राज’, रावेन्द्र रवि, लक्ष्मण सिंह नेगी, रेखा रौतेला, विष्णुदत्त शास्त्री, विनिता जोशी वीरेन्द्र खंकरियाल, विमला जोशी, शशांक मिश्र ‘भारती’, हरिमोहन ‘मोहन’, खेमकरन सोमन, डाॅ॰ दीपा कांडपाल, डाॅ० नन्द किशोर हटवाल, डाॅ॰ महेन्द्र सिंह पांडेय, डाॅ॰ दिनेश चमोला शैलेश, डाॅ० उमेश चमोला, डाॅ॰ सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी,  डाॅ॰ यशोदा प्रसाद सेमल्टी, डाॅ० रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’  डाॅ० प्रभा पन्त, दयाशंकर नौटियाल, प्रकाश चन्द्र जोशी, बालेन्दु बडोला, भाष्करानंद डिमरी,  रमेश चन्द्र पंत, राजेश्वरी जोशी, शेरजंग गर्ग, शशि भूषण बडोनी, शांति प्रकाश ‘जिज्ञासु’,शशि शर्मा, संतोष किरौला, सरोजिनी कुकरेती, हंसा बिष्ट प्रमुख हैं।

उत्तराखण्ड के बाल साहित्यकारों को चाहिए कि वह साक्षरता दर में बेहतर स्थिति का लाभ उठाए। पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बचाए और बनाए रखने के लिए बेहतर बाल साहित्य का निर्माण करे। नए भाव बोध का साहित्य रचे। आखिर हम कब तक पचास के दशक के विषय, प्रकरण और प्रतीकों का इस्तेमाल करते रहेंगे। आए दिन हमारे साधन बदल रहे हैं फिर बाल साहित्य क्यों न बदले? ॰॰॰ 

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