23 जून 2019

‘शैक्षिक दख़ल’

शिक्षकों के साथ कदम मिलाती शैक्षिक दख़ल
-मनोहर चमोली ‘मनु’
शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों का साझा मंच ‘शैक्षिक दख़ल’ का नवीनतम अंक प्रकाशित हो चुका है। ही डाक से मिला। आवरण का रंग संयोजन बेहतरीन है। आवरण के साथ ही पत्रिका के सभी रेखांकन छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित केन्द्रीय विद्यालय की कक्षा आठ में पढ़ रही छात्रा अनुष्का दत्ता ने तैयार किए हैं। आवरण (भीतर) में ‘बच्चे खेल रहे हैं’ अर्थपूर्ण कविता है। यह कविता भले ही शहरी और कस्बाई बस्ती के जीवन की झांकी का प्रतिनिधित्व करती है। 
लेकिन इस दुनिया में बच्चों की ध्वनि है। बच्चों की आवाज़ें हैं। 

कविता की कुछ पँक्तियाँ-
‘अपेक्षाओं के बोझ से हो फुरसत
मिले थोड़े समय में 
मानवता के खिलाफ साजिशों के विरुद्ध
कूदते,फांदते,नाचते,गाते
कभी बारिश से गले मिलते
कभी फूलों संग मुस्काते
कभी देख नवीन सपने
स्वयं से बतियाते
ये नन्हें गात
सभ्यता के अंतस्तल में 
आशा के बीज बो रहे हैं!
कि बच्चे खेल रहे हैं!‘
आवरण अन्तिम के भीतरी पेज पर वसंत सकरगाए की कविता ‘बचा हुआ होमवर्क’ ने स्थान पाया है। कुछ पँक्तियाँ-
‘सोचो, इसलिए सोचो
कि तपिश की इन तमाम लकीरों के पार
तुम्हें नया सूरज लोचना है
और यह तुम जो देख रहे हो ना!
चंद के चेहरे पर
ज़िन्दगी न होने का दाग
इसे भी तुम्हें ही पों़छना है़’

बर्तोल्त ब्रेख्त की कविता ‘सीखों अपना इतिहास’ अन्तिम आवरण (बाहर) प्रकाशित हुई है। कविता का एक अंश-
‘मेरा बेटा मुझसे पूछता है
क्या मुझे इतिहास सीखना चाहिए?
इससे क्या होगा,मैं कहना चाहता हूँ
अपना सिर धरती से सटाए रखना सीखो
शायद तुम जिंदा बच जाओ।
हां गणित सीखो, मैं कहता हूँ
अपनी फ्रेंच सीखो
सीखो अपना इतिहास!’

तीनों कविताओं में बच्चों की ध्वनि है। सीखने-सीखाने और समझने-समझाने का भाव भी है। अपने अनुभव और अपनी सोच को हासिल करने की छटपटाहट है। नीतिपरक सीख-सन्देश जैसा कुछ नहीं है। कविताओं में बच्चों की दुनिया है। बच्चों के स्कूली जीवन की ध्वनियाँ हैं।
पच्चीस से अधिक महत्वपूर्ण रचना सामग्री इस अंक में हैं। अभी चित्रों का संयोजन आकार और सामग्री के साथ भरा-पूरा पाने की गुंजाइश रखता है।यह अच्छी बात है कि कहीं भी कोई भी रचना-सामग्री ठूंसी हुई प्रतीत नहीं होती। पढ़ने की ललक में रुकावट नहीं बनती। इस बार अभिमत में सात महत्वपूर्ण पाठकों का दृष्टिकोण प्रकाशित हुआ है। मीनाक्षी रयाल,इन्द्र लाल वर्मा, गिरीश चंद्र पांडेय सीधे छात्रों से जुड़े हुए पाठक हैं। राजाराम भादू, सीमा संगसार, रंजीत रविदास, भास्कर चैधुरी भी अनुभव से उपजे भाव प्रकट करते हैं। अभिमत में पाठकों के बयान और टिप्पणियां बताती हैं कि पत्रिका का असर धीरे-धीरे अपना रंग जमा रहा है।
संपादक महेश पुनेठा जी का संपादकीय हर बार की तरह इस बार भी केन्द्रीय विषय के कई आयामों को खोलता है। वे इस बार भी सकारात्मकता और सामूहिकता को सीखने-सीखाने की कुंजी मानते हैं।
वह एन॰सी॰ई॰आर॰टी॰ की पाठ्य पुस्तकों के संबंध में शिक्षकों के हवाले से कहते हैं-‘अधिकतर शिक्षकों की शिकायत रहती है कि नई किताबें बेकार हैं। इन किताबों में बहुत कम विषयवस्तु है। जितनी सूचनाएं व तथ्य पुरानी किताबों में होती थीं,उतनी इनमें नहीं है। अभ्यास प्रश्न भी बहुत कम हैं। साथ ही प्रश्नावली में दिए गए प्रश्नों के उत्तर पाठ में नहीं मिलते हैं। गतिविधियां बहुत अधिक दी गई हैं। क्रमबद्धता का अभाव है। भाषा क्लिष्ट है। ...’
वे इसके कारण भी सुझाते हैं। 
वे लिखते हैं-
‘दरअसल अब तक शिकायत करने वाले अधिकांश शिक्षकों ने न नई पाठ्यपुस्तकों के शुरुआत में शिक्षकों के लिए लिखे गए पन्ने को पढ़ा है, न एन॰सी॰एफ॰ 2005 के मूल दस्तावेज व एनसीईआरटी द्वारा तैयार किए गए आधारा पत्रों को समझा है न ही उन्हें इनके इस्तेमाल के लिए कोई ठोस प्रशिक्षण दिया है।’

प्रारम्भ के तहत महेश पुनेठा जी एक बार पुन शिक्षा के दस्तावेजों के मर्म का अनुभवों के साथ जोड़त्े हुए हम सबके लिए उपलब्ध कराया है। यह कहना गलत न होगा कि संपादकीय में एनसीएफ 2005 के मार्गदर्शक सिद्वान्तों का और शैक्षिक आधार पत्रों का शानदार चित्रण है।
’और अंत में’ नियमित द्वय संपादकीय ‘कैसा हो, अगर पाठ्यपुस्तकें ही न हों?’ के बहाने दिनेश कर्नाटक ने उन शिक्षकों को नई दृष्टि देने की कोशिश की है जो पाठ्य पुस्तक को ही सीखने-सीखाने का एकमात्र औजार मानते हैं। वे लिखते हैं-
‘पाठ्यपुस्तक की समस्या यह है कि शिक्षक और विद्यार्थी दोनों उसे ‘पवित्र पुस्तक’ मानकर साधने में लगे रहते हैं। इस प्रक्रिया में न प्रश्न उठते हैं और न ही खोज होती है। वे उसकी सहायता से आजाद नहीं होते, बल्कि उसके दायरे में कैद हो जाते हैं।’
दिनेश कर्नाटक शैक्षणिक संदर्भ,नवम्बर-दिसम्बर 2017, के साथ-साथ उदयन वाजपेयी, हाइडेगर के हवाले से कई महत्वपूर्ण बातें पाठ्यपुस्तक,शिक्षक,शिक्षार्थी और कक्षा-कक्ष के संबंध में रेखांकित करते हैं। 
वे आगे लिखते हैं-

‘पाठयपुस्तक केन्द्रीयता शिक्षक,विद्यार्थी,शिक्षा के सरोकारों तथा देश-समाज के लिए काफी नुकासनदायक है। वर्षों तक एक जैसी पाठ्यपुस्तक को पढ़ाने से शिक्षक धीरे-धीरे ऊबने लगते हैं। उनके शिक्षण में एकरसता आने लगती है। उन्हें लगने लगता है कि ज्ञान इतना ही होता है तथा उन्हें अपने विषय के बारे में और पढ़ने की आवश्यकता नहीं है।’
वे इस संपादकीय शीर्षक पर केन्द्रित महत्वपूर्ण बातें भी साझा करते हैं। वे लिखते हैं-
‘यदि प्रत्येक कक्षा के लिए पाठ्यक्रम तो हो मगर पाठ्यपुस्तकें न हों तो कैसी स्थित बनेगी? शिक्षक तथा विद्यार्थी पुस्तकालय,प्रयोगशाला तथा आस-पास मौजूद संसाधनों के द्वारा पाठ्य सामग्री तैयार करेंगे। उदाहरण के कलिए कक्षा सात का हिन्दी पाठ्यक्रम करुणा के मूल्य से बच्चों को परिचित कराना चाहता है ता शिक्षक और छात्र करुणा विषयक कहानी को पुस्तकालय में खोजेंगे। सामाजिक विज्ञान में बच्चों को न्यायपालिका से परिचित कराना है तो वे पुस्तकालय से संविधान तथा न्याय संबंधी किताब निकालकर उससे नोट्स लेंगे। विज्ञान में गुरुत्वाकर्षण समझना है तो प्रयोगशाला में सहायक सामग्रियों से समझने की कोशिश करेंगे।’
इस अंक में फेसबुक परिचर्चा ‘क्या पाठ्यपुस्तक तथ्यों तथा सूचनाओं से भरी होनी चाहिए? पर शामिल की गई। चैंतीस टिप्पणियां शामिल की गई हैं। एक समय में इस पूरी परिचर्चा को पढ़ते हैं तो कई सारे मत सामने आते हैं और एक शिक्षक को शिक्षण और समझ के साथ अपने नियोजन को नए सिरे से समझने का अवसर मिलता है। पूरी परिचर्चा मननीय है।
इस अंक में प्रख्यात शिक्षाविद और कथाकार प्रेमपाल के साथ विस्तारित बातचीत को जगह मिली है। शिक्षक और पत्रिका के संपादक महेश पुनेठा ने बीस बिन्दुओं सहित कई गूढ़,ज़रूरी और समसामयिक शैक्षिक सवालों के जवाब जुटाए हैं। पूरी बातचीत प्रभावी है। रोचक है और अंतस में छटपटाहट पैदा करती है। पाठ्यपुस्तक के काम, पाठयपुस्तक की सार्थकता, समझ के विस्तार में उसकी भूमिका, पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा, पाठ्यपुस्तक के ढांचे में बदलाव, सूचना,तथ्य और सीखने की ओर उन्मुख कराती पुस्तकों में भेद,पाठ्यपुस्तकों की संरचना, भाषा की पुस्तकों की स्थिति, पाठ्यपुस्तक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसे मुद्दों पर सार्थक बातचीत इस अंक में है।
इस अंक में दिनेश भट्ट की कहानी सीलू मवासी का सपना प्रकाशित हुई है। मध्य प्रदेश के भोपाल के जनजातियों के आस-पास की यह कहानी शिक्षक,शिक्षा और छात्रों के आपसी रिश्तों के इर्द-गिर्द घूमती है। ऐसे बच्चों के लिए ऐसी किताब जो मुख्यधारा की भाषा से इतर उनकी अपनी भाषा में हो। मवासी भाषा में किताब लिखने की आवश्यकता से लेकर उपजी बातें कहां तक पहुँचती हैं? इसके लिए कहानी की यात्रा में सहभागी बनना लाज़िमी है। हाँ, बीच-बीच से कुछ एक संवाद ये हैं-
बच्चे ने खट जवाब दिया-‘‘काकू गोगोय डोय सेन ऊ।’’
वह केवल दो शब्दों का अर्थ निकाल पाया। काकू याने मछली और डोय याने तालाब।

॰॰॰
‘‘सर, मैं यह चाहता हूं कि अनुभवहीन तथ्यों को प्रदेश के शिक्षकों पर न थोपा जाए। मैं बहु-कक्षा शिक्षण वाले स्कूलों और शिक्षकों की वस्तुस्थिति बताना चाहता हूं ताकि बनाया गया मसैदा यथार्थपरक हो।’’

॰॰॰
जैसे ही उसने कार स्टार्ट की,हैडमासाब दौड़े आए थे-‘‘सर,ये सीलू सर के दो हजार रुपये के यात्रा-भत्ता बिल लेते जाइए,किताब लिखते समय के हैं। कोई अधिकारी निकालने को तैयार नहीं है। संभव हो तो निकलवा दीजिएगा।‘‘

गौरतलब में सीएन सुब्रह्मण्यम का लेख ‘इतिहास शिक्षण यानि ऐतिहासिक नजरिया विकसित करना’ पठनीय है। आरंभ में ही असरदार बात वे लिखते हैं-पाठ्यपुस्तक निर्माण के दो सिरे हैं। एक सिरे पर वे लोग हैं जो कि इतिहास के पेशे में अंग्रणी लोग हैं तो दूसरे सिरे पर वे लोग हैं जो बच्चों को इतिहास पढ़ाते हैं।’’
वे रेखांकित करते हैं कि अच्छी पुस्तक का बनना और अच्छी शिक्षण सामग्री बनना में अन्तर होता है। लेख में वे लिखते हैं-इतिहास शिक्षण का ज़्यादा बेहतर तरीका यह होगा कि आप बच्चे को तर्क करने का मौका देते हैं, उनके सामने सिर्फ एक सवाल ही उठाकर छोड़ देते हैं कि आपको क्या लगता है-ऐसा क्यों हुआ होगा?
लेख में आगे पढ़ते हैं-कुछ लोग आरंभिक स्तर पर इतिहास शिक्षण में जटिलता की बात करते हैं, इस बारे में कहना चाहूंगा कि बच्चे इससे भी जटिल विचारों को पकड़ लेते हैं और अपना लेते हैं।
नंद किशोर आचार्य का लेख ‘इतिहास: मनुष्य जाति की प्रयोगशाला’ भी शानदार लेख है। यह सीधे कक्षा-कक्ष में लाभदायक है। वे शुरुआत भी शानदार तरीके से करते हैं-मैं यह समझता हूं कि अभी हम इतिहास नहीं पढ़ा रहे हैं। अभी हम केवल कुछ विवरण बता रहे हैं और उन विवरणों के पीछे एक चयन-दृष्टि भी काम करती है। क्योंकि सारे विवरण आप नहीं बता सकते हैं, इसलिए एक खास दृष्टि से खास तरह के समाज या व्यवस्था के लिए शिक्षार्थी को तैयार करना चाहते हैं। उस दृष्टि से इतिहास के तथ्यों का चयन होता है और उसी दृष्टि से तथ्यात्मक विवरण उनको बता दिए जाते हैं। 
आगे लेख में पढ़ते हैं-अभी हम इतिहास की अतीतजीविता की तरह पढ़ाते हैं-जबकि इतिहास भविष्य दृष्टा है। उसे भविष्य दृष्टा की दृष्टि से पढ़ाया जाना चाहिए, न कि अतीतजीविता की दृष्टि से।

आगे लेख में पढ़ते हैं-इतिहास,दरअसल, मनुष्य जाति की प्रयोगशाला है, उस प्रयोगशाला में वह कुछ प्रयोग करता है। जिनमें से कुछ सफल होते हैं, कुछ असफल होते हैं।
प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्ण कुमार का लेख ‘पाठ और पुस्तकें’की एक-एक पंक्ति पठनीय ही नहीं मननीय भी है। वे लिखते हैं-पाठ्यपुस्तकें सामान्य पुस्तकों से भिन्न होती हैं,क्योंकि उसके भीतर जानकारी या साहित्य नहीं पाठ होते हैं। स्कूल के संदर्भ में पाठ का एक ही अर्थ होता है-सीख,जो कभी-कभी शिखा के पर्यायवाची की तरह इस्तेमाल की जाती है। 
एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक कृष्ण कुमार लिखते हैं-

‘स्कूल के दायरों में सीखों का स्रोत पाठ्यपुस्तकें होती हैं,क्योंकि प्रत्यक्ष अनुभवों की गुंजाइश बहुत कम होती है। वर्णमाला से लेकर विाान तक सबकुछ पाठ की इकाइयों में बंटा और बंधा होता है।’
वे बताते हैं-‘अनुभव की गतिमा तभी स्वीकारी जा सकती है, जब व्यक्ति को गरिमा दी जाए। जिस समाज में व्यक्ति के लिए गरिमा क्या,करुणा की भी गुंजाइश न हो,वहाँ अनुभव की स्वतंत्र सत्ता नहीं हो सकती।’ मात्र चार अनुच्छेदों का अतुलनीय आलेख, सभी के लिए पठनीय।
‘पाठ्यपुस्तक की प्रासंगिकता’ के जरिए डाॅ॰ इसपाक अली तर्कपूर्ण नज़रिया सामने लाते हैं। 
आरंभ ही चिंतनीय है-

‘जिस समाज में छपे हुए अक्षर शब्द वेद वाक्य की तरह स्थापित हो उस समाज में पाठ्यपुस्तक की भूमिका काफी बढ़ जाती है। बच्चों का पाठ्यपुस्तकों में इतना अटूट विश्वास होता है कि उससे अलग कोई भी सत्य-असत्य उनके लिए असत्य ही होता है।’
यानि छात्र पाठ्यपुस्तक को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं। वे यशपाल समिति के हवाले से कहते हैं कि बच्चे के दिन प्रतिदिन के जीवन और पाठ्यपुस्तकों की विषयवस्तु के बीच की दूरी भी ज्ञान को बोझ में बदल देती है। इतिहास,पंथ और भाषा के नज़रिए को रेखांकित करते हुए आलेख कई सवाल भी उठाता है।
कालू राम शर्मा का नजरिया ‘मात्र पाठ्यपुस्तक पर सवार होकर पढ़ना-लिखना संभव नहीं’ अनुभव और बातचीत के आधार पर तैयार हुआ लगता है। एक ज़रूरी और शिक्षकों के शिक्षण में सुधार के सुझाव देता लेख एनसीएफ 2005 के नजरिए को भी सामने रखता है।
वे लिखते हैं- यों पाठ्यपुस्तकों को लेकर बच्चों और शिक्षकों में जो दृष्टिकोण पैदा हो चुका है वह यह कि इनका कक्षा में इस्तेमाल प्रश्न-उत्तर लिखवाने व परीक्षा पास करने भर के लिए है। दरअसल, यह नियति बनाई जा चुकी है। 
वे लिखते हैं- पाठ्यपुस्तकों में बच्चों के अलगाव काप्रमुख कारण है, बच्चों के मनोविज्ञान का ख्याल करके इनकी रचना नहीं की जाती। दरअसल, पाठ्यपुस्तकों का पूरा जोर इस बात पर होता है िकवे बच्चों को खुद से ज्ञान रचने के बजाय ज्ञान की घुट्अी पिताली हैं। पाठ्यपुस्तकों की भाषा बच्चों के संदर्भ व उनके स्तर से परे की होती है। किताबें बच्चों पर भरोसा नहीं जताती कि वे एक सीखने वाले, सोचने वाले, तर्कशील व खोजने वाले के रूप में जन्म लेते हैं।’

वे सुझाते हैं-‘यहां शिक्षक की भूमिका अहम है। शिक्षक की भूमिका सीखने में सहयोगी की है न कि हर चीज़ वह बच्चों में थोपे। बेशक, शिक्षक से अपेक्षा है कि बच्चे चित्र को देखें व उन्हें बातचीत के मौके उपलब्ध कराए। बच्चे जो भी कुछ कह पाएं अपनी भाषा में उसे स्वीकार किया जाए।’ वे रिमझिम 1 के आलोक में पाठ्यपुस्तक की खूबियों पर भी चर्चा करते हैं। 
सविता प्रथमेश के नजरिए में ‘पाठ्य पुस्तकों की भाषा और ग्राह्यता’ के बहाने शिक्षक, शिक्षा और अधिगम पर महत्वपूर्ण बातें शामिल हो सकी हैं। लेख छत्तीसगढ़ के राज्य शिक्षा बोर्ड के अनुभवों से समृद्ध हुआ है। प्रो॰कृष्ण कुमार के हवाले से भी लेख आगे बढ़ता है। आलेख की अलग-अलग अनुच्छेदों से कुछ बातें ये हैं-

‘ पाठ्यपुस्तकें आम पुस्तकों से सामग्री की दृष्टि से ही अलग नहीं होती हैं, बल्कि इसका पाठक वर्ग भी निश्चित होता है और उसका मानसिक स्तर भी एक हद तक निश्चित ही होता है। इस दृष्टिकोण से पाठ्यपुस्तकों की महत्ता और भी बढ़ जाती है।’
पाठ्यपुस्तकों की भाषा पर जीवंत अनुभव के सिलसिले में लेख में आता है-‘ग्यारहवीं के जीवविज्ञान के छात्रों का कहना था कि राज्य द्वारा विकसित पुस्तक उनकी समझ से परे है। कारण क्लिष्ट,कठिन और हिंदी के निहायत ही अप्रचलित शब्दों का प्रयोग। एक सिरे से पुस्तक पढ़ने पर नज़र आता है कि ये अंग्रेजी वर्जन का महज अनुवाद ही है। वह भी एक कठिन अनुवाद।’
‘भाषा,विकास और अवरधारणा विकास एक दूजे से गहराई से जुड़े हुए हैं। विचार और भाषा एक-दूसरे के पूरक हैं। भाषा जब ग्रहणीय होती है, तब विचार उत्पन्न होते हैं। जब तक विद्यार्थी भाषा नहीं समझेगा वह उससे तादात्म्य स्थापति नहीं कर सकेगा। विचार उत्पन्न होना तो दूर की बात है। एक उत्तम पाठ्यपुस्तक की विशेषता ही होती है कि वह भाषिक आवश्यकताओं के अनुरूप होती हैं।’ कक्षा-कक्ष में नवाचार के प्रतिबद्ध शिक्षक के लेख अलग से पहचाने जाते हैं। विज्ञान विषय की किताब और उनके प्रकरण के साथ-साथ भाषा की सरलता और सहजता पर भी यह आलेख केन्द्रित है। इसे जरूर पढ़ा जाना चाहिए।
बच्चों के साथ शिक्षा और उनकी समझ से आगे बढ़कर काम करते रहना हर किसी के वश की बात नहीं। लेकिन कमलेश जोशी हर समय वैज्ञानिक जागरुकता जगाने के साथ-साथ बच्चों के मध्य निरन्तर उपस्थित रहते हैं। ‘बच्चों के करने के लिए बहुत कुछ’ आलेख में उन्होंने अपने अनुभवों के साथ बच्चों की दुनिया को भी शामिल किया है। वह लिखते हैं-अगर हम हिंदी की किताब देखते हैं तो उसमें अभ्यास के लिए इतनी गतिविधियां दी गई हैं कि बच्चे को खुद से वे सारी चीज़ें करवाई जाए तो उसको अलग से हिंदी का व्याकरण पढ़ाने की जरूरत ही नहीं है। लेकिन इसके लिए हमें यह भाव छोड़ना पड़ैगा कि हमें सब कुछ आता है और बच्चे कुछ नहीं जानते।’
एनसीईआरटी की किताबों के आलोक में वे आगे लिखते हैं-‘ये किताबें बच्चों को अपने आस-पास के समाज से जुड़ने के अवसर उपलब्ध कराती हैं। उनकों इस चीज़ का बोध भी कराती है कि जिस प्रकृति और समाज में वे रह रहे हैं, उसके प्रति भी उनके कुछ कत्र्तव्य होते हैं, जिन्हें उनको जाने-अनजाने निभाना ही होता है।’
शिक्षा के सरोकारों में निरन्तर अपनी आवाज बुलंद करते डाॅ॰ केवलानंद काण्डपाल ने कक्षा छःह के लिए सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक पर केन्द्रित लेख ‘कक्षा में पाठ्यपुस्तक का उपयोग कैसे हो?‘ में लिखा है-‘अब हम शिक्षकों पर निर्भर है कि पाठ्यपुस्तक की केन्द्रयीता की अनैच्छिक स्थिति में कम से कम पाठ्यपुस्तकों को कक्षा-कक्ष में इस प्रकार से बरतें,उपयोग में लायें जिससे बच्चे के ज्ञान,कौशल एवं मूल्यों-अभिवृत्ति में अधिकतम संभव बदलाव लाया जा सके।’
उन्होंने सामाजिक विज्ञान के सन्दर्भ में पड़ताल को आगे बढ़ाया। उन्होंने कक्षा छह की पाठ्यपुस्तक ‘सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन-1’ के सन्दर्भ में विस्तार से व्यावहारिक बातों की ओर इशारा किया है। काण्डपाल जी लिखते हैं-पुस्तक में चार थीम को ध्यान रखकर निर्मित किया गया है। विविधता, सरकार, स्थानीय सरकार एवं प्रशासन और आजीविकाएं।
वे आगे बताते हैं कि पुस्तक को बरतने के बारे में भी विस्तार से बताते हैं। पाठ की शुरुआत, पाठ के बीच में प्रश्न और अभ्यास, अभ्यास, कथानकों का उपयोग, छवियों का उपयोग,भाषा में जेंडर संवेदनशीलता और अन्य साधनों का उपयोग के आधार पर पुस्तक को खगालते हुए मिलते हैं। मुझे यह लगता है कि किसी भी विषय की पाठ्यपुस्तक को हमें इस आधार पर देखना ही चाहिए। अभिभावकों को भी।

उनका तीव्र आग्रह बेहद असरदार है-
‘अध्यापक पाठ्यपुस्तक से हटकर भी सोच सकें, इसके लिए दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहला-इस बात की स्पष्ट समझ कि पाठ्यपुस्तक केवल एक सुविधाजनक साधन है,जिसमें बच्चों से क्या-क्या सीखने की अपेक्षाएं हैं, उन बातों से सम्बंिन्धत विषय सामग्री का व्यवस्थित तरीके से किया गया एकत्रीकरण है और यह अन्तिम भी नहीं है। बहुत बार इससे बाहर भी जाकर अध्यापक को सामग्री एकत्रित करनी पड़ेगी, जुटानी पड़ेगी,विकसित करनी पड़ेगी। दूसरा-अध्यापक को इस बारे में निरंतर सचेत रहना होगा कि विषय की पाठ्यचर्या के लक्ष्य क्या हैं? पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक में संकल्पनात्क अंतर है? शिक्षक की इस बारे में समझ से बच्चों के अनुभवों को कक्षा-कक्षा प्रक्रिया में शामिल होने की संभावनाएं बलवती होती हैं।’
एनसीईआरटी की विज्ञान की कक्षा छह से आठ की पाठ्यपुस्तकों पर केन्द्रित एक और महत्वपूर्ण लेख डाॅ॰निर्मल कुमार न्योलिया का है। ‘कसौटी पर एनसीईआरटी की विज्ञान पाठ्यपुस्तकें’ वैज्ञानिक नज़रिये और संकल्पनाओं पर गहरी बात करता नज़र आता है। जैसा पहले भी कहा गया है कि कक्षा-कक्ष में छात्रों के साथ सीखने-सीखाने की प्रक्रिया में रत अध्यापक का दृष्टिकोण शिक्षाविदों और नीति-नियंताओं से नायाब लगता है। इस आलेख को पढ़कर भी इस बात की पुष्टि होती है। वे एनसीएफ 2005 के हवाले से बहुत सारी ज़रूरी बातें-मान्यताओं को हमारे सामने रखते हैं। वे लिखते हैं-‘एनसीएफ ने ऐसी विज्ञान शिक्षा जो बच्चों के प्रति,जीवन के प्रति और विज्ञान के प्रति ईमानदार हो,को सही माना है।’
न्योलिया जी सवाल उठाते हैं-‘जो भी इस लेख को पढ़ें, कभी फुर्सत में जरूर यह जानने काप्रयास करें कि उनके आस-पास के विद्यालयों में विज्ञान पढ़ रहे बच्चे किसी भी स्थानीय समस्या का वैज्ञानिक हल ढूंढने में सक्षम रहे हैं?’
और अंत में वे लिखते हैं-विज्ञान विषय की सीमाएं यह भी हैं कि प्रत्येक संकल्पना में 6 वैधताओं को सम्मिलित किया जा सके। विषयवस्तु की प्रकृति में बदलाव से यह सम्भव हो सकता है।’ वे 6 वैधताओं का भी उल्लेख लेख में हो जाता तो बेहतर होता।
अनुपमा तिवाड़ी का लेख ‘पाठ्यपुस्तक की समस्याओं को खोजने की कुंजी’ मौजूदा शिक्षा की स्थिति पर सोचने को बाध्य करता है। वह लिखती हैं कि शिक्षा में ये शार्टकट रास्ता, जो हम अपनाते हैं, वह हमारे सीखने में बाधक बन जाता है। इसमें सीखने की जिज्ञासा नहीं है, चुनौती नहीं है,खोजने की तड़प नहीं है। इसमें स्वयं को समृद्ध करना नहीं है।’
स्वयं की निजी अनुभवों से सराबोर यह आलेख पठनीय है। वे साल्व्ड औरअनसाल्वड परिपाटी की भी बात करती हैं। एक्सीलेंट, पासबुक वाले प्रचलन पर भी इस लेख में विचारणीय बिन्दु शामिल हैं। निजी स्कूलों की अव्यावहारिकता भी इस लेख में पढ़ने को मिलती है। कुंजी के प्रचलन पर चर्चा भी असरदार है। अनुपमा लिखती हैं-‘अब लिखने का मापदंड अंक प्रणाली पर आधारित है तो इस बौद्धिक युग में बच्चे, ज्यादा से ज्यादा अंक प्राप्त करने की जुगत करते दिखाई देते हैं।’
प्रतिभा कटियार का आलेख ‘एक पाठ्यपुस्तक जिससे दिल लग जाए’ एनसीईआरटी की कक्षा 3 की हिंदी की पाठ्यपुस्तक का अध्ययन कर बना है। वैसे भी प्रतिभा साहित्यसेवी है और सार्वजनिक शिक्षा और शिक्षकों से गहरे से जुड़ी हुई हैं। रिमझिक भाग तीन पाठ्यपुस्तक की आवरण से लेकर पाठों की चर्चा, पाठों के आधार पर आई विधाओं पर भी उन्होंने विस्तार से चर्चा की है। वे लिखती भी हैं-‘आमतौर पर पाठ्यपुस्तकों को देखने,उठाने और पढ़ने का मन और मौसम अलग ही होता है। कोर्स की किताब यानि कोई काम,समय की पाबंदी के साथ कोर्स को पूरा करने की जिम्मेदारी जैसा कुछ। लेकिन एनसीईआरटी ने पाठ्यपुस्तकों को पाठ्यपुस्तकों वाली बोरियत से बचाने का प्रयास किया है। किताब की साज-सज्जा बाल मन को आकर्षित करती है। ऐसी कि टीचार जो पढ़ने को कहें या न हें बच्चे किताबों से लिपते रहें।’
लेख में पाठ्यपुस्तकों के चित्र और पाठ में निहित कथावस्तु पर पैनी नज़र से पड़ताल की गई है। प्रतिभा लिखती हैं-इनत माम पाठों को पढ़ते हुए कतई महसूस नहीं होता कि कोई पाठ पढ़ रहे हैं। हर पाठ का रचना संसार शरारतों,कल्पनाओं,आसपास की दुनिया की बातों से जोड़ते हुए हैं। पाठ के बाद पाठ का मजा और बढ़ना शुरू होता है। सवाल, सवाल की तरह नहीं शरारत की तरह हैं या बातचीत करते हुए मजे लेते हुए एक-दूसरे की बातें सुनने-जानने को लेकर हैं। हर पाठ के बाद की रोचक गतिविधियां बच्चों को उनके परिवेश , उनके जीवन, उनके लोक की भाषा और मजेदारी से जोड़ने वाली हैं। कक्षा के सभी बच्चो को जोड़ने वाली हैं। बच्चों के भीतर की हिचक,संकोच को तोड़ने वाली और बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी के लिए उकसाने वाली है।
अंत में वे बहुत ही गहरी बात लिखती हैं-‘वैसे रिमझिम है तो कक्षा-3 के बच्चों की पाठ्यपुस्तक लेकिन बड़ों को भी इसमें खूब मजा आता है। यात्राओं में भी इसे साथ रखने की सलाह मैंने दोस्तों को दी है। इसकी कहानियों और कविताओं ने मुझे कई और कहानियों तक भी पहुंचाया है।’
डाॅ॰दिनेश जोशी ने पाठ्यपुस्तकों को शिक्षक की जिम्मेदारी की ओर से देखने का प्रयास किया है। उनका लेख ‘शिक्षक की भूमिका तथा पाठ्यपुस्तकें’ हर तरह के शिक्षक को पढ़ना ही चाहिए।

डाॅ॰ दिनेश जोशी 5 आधारभूत बातों को रेखांकित करते हैं, जिसमें वे मानते हैं कि किसी भी अध्यापक को यह काम तो करने ही चाहिए। वह लेख में हिंदी शिक्षण को दो भागों में बांटकर देखते हैं। एक-हिन्दी को सीखना,समझना,अभिव्यक्त करना और व्यक्तित्व तथा जीवन के विकास में इसका योगदान। दो-परम्परागत परीक्षाओं को पास करना और अंक प्राप्त करना। नौकरी के लिए आवश्यक बना दिए गये बच्चों के परीक्षा-परिणाम के अंतर्गत।
इस लेख में वे हिन्दी पढ़ाने के लिए कक्षा अनुसार और विद्यार्थी अनुसार योजना बनाने पर जोर देते हैं। स्वयं के अनुभवों को साझा भी करते हैं। इस लेख में दिनेश एनसीईआरटी की हिंदी की पाठ्यपुस्तकों में हासिल अवसरों पर भी बात करते हैं।
वे लिखते हैं-हिंदी की पुस्तकों में उपलब्ध अवसर तो अपार हैं, उन्हें तलाश कर यथाशक्ति उपयोग करने की ज़रूरत है। समयानुसार बदलाव और सुधार की आवश्यकता तो हर क्षेत्र में रहती है। दिनेश अपनी कक्षा-कक्षों में जो गतिविधियां कराते हैं उनका भी उल्लेख करते हैं। उनकी अपनी विकसित की गई गतिविधियों में हमें भी पूछना है एक रजिस्टर है। जिसमें छात्र उन सवालों को दर्ज़ करते हैं जो वे पूछना चाहते हैं। दूसरा रजिस्टर है मन की बात। बच्चे इसमें मन की बात लिखते हैं। तीसरी पेटिका है जिज्ञासा समाधान। इस में बच्चे हिंदी विषयक प्रश्न पर्चियां डालकर पूछते हैं। इस तरह दस गतिविधियों का उल्लेख इस लेख में है। यह भी सभी शिक्षकों को पढ़ना ही चाहिए।
इस अंक में एक संक्षिप्त सर्वे भी है। आपको कौन सी पाठ्यपुस्तक पसंद है? दस छात्रों ने अपनी पसंदीदा पाठ्यपुस्तक के बारे में लिखा है। इस सर्वे में नैनीताल के राजकीय इंटर काॅलेज गहना के छात्रों ने भाग लिया। यह भी एक शानदार गतिविधि है। क्या हमने भी अपने छात्रों से पूछा है कि उन्हें कौन-सी पाठ्यपुस्तकें अच्छी लगती है? और क्यों?
सीमा भाटिया की लघुकथा सत्यमेव जयते भी इस अंक में है। हिंदी की पाठ्यपुस्तकों,सामाजिक विज्ञान,विज्ञान के साथ-साथ गणित,संस्कृत,अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तकों पर भी चर्चा आती तो बेहतर होता। लेकिन रचना-सामग्री और लेख जुटाना और उससे पहले प्रतिबद्धता के साथ ससमय भेजना इन दिनों स्वंय एक चुनौती बन गया है। भीतर के आवरण में सुभाष चंद्र सिंह की कविता ‘बच्चे खेल रहे है’ के साथ चित्र का संयोजन किसी लम्बवत् चित्र के साथ और बेहतर हो बन पड़ता। मसलन भीतर झूला झूलती बालिका वाला चित्र इस कविता में फैलाव ले सकता था। अनुष्का ने इस अंक के लिए चैदह (एक चित्र दो बार प्रकाशित हुआ है) चित्र बनाए है।। इस अंक का काग़ज़ आवरण के काग़ज़ सहित बेहतरीन है। पत्रिका को दीर्घायु बनाने के लिए यह अच्छी सोच का परिचायक है।
मुझ तक यह शनिवार को बज़रिए डाकघर पहुँच गया था। लेकिन मैं उसे आज सुबह ही हासिल कर सका। रविवार का समय मुफ़ीद रहा। पत्रिका को समय दे सका और तात्कालिक टिप्पणी आपकी नज़र कर रहा हूँ। वहीं बात कि यह महज़ चैंसठ पेज की छमाही पत्रिका ही नहीं है। शामिल रचना सामग्री और लेख प्रायः ऐसे जुटते हैं कि जब भी मन करे पत्रिका के अंकों को टटोला जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहूं तो यह एक तरह से संदर्भ सामग्री का डाइजेस्ट बनती जा रही है। मुझे लगता है कि शैक्षिक दख़ल समिति को अपने सभी अंकों को दस अंक क्रमवार एक साथ एकाकार डाइजेस्ट के तौर पर संकलित भी करना चाहिए। यह साल की कालिकचक्र रस्मअदायगी मात्र नहीं है। पत्रिका में पाठक के लिए बौद्धिक खुराक के साथ चेतना के स्तर पर कुछ औजार और हथियार शामिल हैं। यह कहना ठीक ही होगा कि वे शिक्षक जो पत्रिका से जुड़े हैं आद्योपांत इसे पढ़ते हैं। समझते हैं। गुनते हैं और अपने अनुभवों में अन्य साथी शिक्षकों के अनुभवों को जोड़कर कक्षा-कक्ष में बदलाव लाते हैं तो यकीनन वे नवाचार के मामलें में उन शिक्षकों से एक कदम आगे हो जाते हैं जिनके पास इस पत्रिका का मंच मुहैया नहीं है। तो आइए, इस बहाने हम और आप भी शैक्षिक दखल के साथ शैक्षिक हस्तक्षेप में सहभागी बनें।
पत्रिका: शैक्षिक दख़ल
संपादक: महेश पुनेठा-दिनेश कर्नाटक
मूल्य: 50
पेज: 64
वर्ष: 7
अंक: 14,जुलाई 2019
संपादकीय पता: शैक्षिक दख़ल समिति,
द्वारा महेश पुनेठा, शिव कालोनी, न्यू पियाना, पोस्ट आॅफिस डिग्री काॅलेज, पिथौरागढ़ 262502 उत्तराखण्ड 
मेल: punetha.mahesh@gmail.com
dineshkarnatak12@gmail.com

सम्पर्क: 9411707470,9411793190,9411347601
॰॰॰
-मनोहर चमोली ‘मनु’

व्हाट्स एप सम्पर्क -7579111144

15 अप्रैल 2019

भारत की एक पाती बापू के नाम : 7

 पूजनीय बापू को मेरा प्रणाम स्वीकार हो। मैं कुशल ही हूँ और आपकी कुशलता चाहता हूँ। पत्र लिखने का खास कारण यह है कि मैं भीतर ही भीतर जर्जर होता जा रहा हूँ। लगातार आबादी बढ़ने से मुझमें मैले का अंबार समाता जा रहा है। मैं इस बात से इतना परेशान नहीं हूँ। मैले के निपटारे और उससे जुड़ी समस्याओं की लुंज-पुंज व्यवस्था देखकर मन आहत है।
आदरणीय बापू। सात दशक पहले जंगल-पानी कोई समस्या ही नहीं थी। तब जंगल भी थे और पानी भी था। मैले का निस्तारण उस समय इतनी बड़ी समस्या नहीं थी। इसे लेकर तौर-तरीके भी सहज थे। हम जैसे-जैसे आधुनिक होते गए, वैसे-वैसे ये जंगल-पानी से निपटारा एक बड़ी समस्या बन गई है।

बापू अब तो सीवर लाइनें हैं। मेरे लोग घर में शौच कर लेते हैं। शौच के नाम पर जंगल की सैर बीते कल की बात हो गई है। अब योग का ही सहारा है। मेरे भीतर मल-मूत्र के लाखों गड्ढे हैं। हजारों सीवर की नालियाँ हैं। इन सीवर लाईनों की सफाई करते वक़्त मेरे ही दो से तीन मजदूर सीवर की सफाई करते वक़्त काल के गाल में समा जाते हैं। हर साल मेरे लगभग बाईस हजार मजदूर सीवर में सफाई के दौरान मर जाते हैं।
बढ़ती मौतों को ध्यान में रखते हुए मेरी सबसे बड़ी अदालत ने इन मजदूरों के काम की पड़ताल समझीं। पाँच साल पहले आदेश दिया था,‘‘सीवर में सफाई के दौरान हुई मजूदर की मौत पर परिवार को एक लाख रुपए दिए जाएँ।’’ इस आदेश के बाद तो हालात और बदतर हो गए हैं। मेरे राज्यों ने स्थाई मजदूरों की व्यवस्था ही बंद कर दी। न रहेगा बांस,न बजेगी बांसुरी।
कहने को तो बापू मेरे पास राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग है। लेकिन मेरे इस आयोग के पास आम आँकड़े तक नहीं है। यदि आप मुझसे पूछें कि मेरे कितने मजदूर सीवर की सफाई का काम करते हैं? मेरे कितने मजदूर कहाँ-कहाँ,कब-कब और कितने-कितने मौत के शिकार हुए हैं? बापू मैं नहीं बता सकूँगा।

आप तो स्वच्छता अभियान के अगुवा रहे हैं। अपने मल की स्वयं सफाई के पक्षधर रहे हैं। और अब आपके इस भारत में क्या हो रहा है? जानना नहीं चाहेंगे? मनुष्य ही मनुष्य के मल-मूत्र में डूबता-उतरता है। गहरे सीवर में जाता है। सुरक्षा के इंतजाम के अभाव में दम घुटता है और कई बार ये मनुष्य नहीं मानवता को काल निगल लेता है। ये है सबको जीने का हक़? एक ओर एक सासंद प्रत्याशी चुनाव मैदान में लड़ने के लिए पिचहत्तर लाख रुपए खर्च कर सकता है वहीं दूसरी ओर मल-मूत्र की सफाई को जुटे मजदूरों की मौत पर एक लाख रुपए मुआवजा भी नहीं मिलता?
इसका हल क्या है बापू? क्या सफाई कर्मचारियों की जान बचाना आतंकवाद के नाम पर अरबों रुपए के लड़ाकू विमान खरीदने से महँगा है?
उम्मीद है कि आप कोई समाधान निकालेंगे।
आपका अपना,
भारत

॰॰॰
पत्र लेखक: मनोहर चमोली ‘मनु’
Photo-google

11 अप्रैल 2019

पाखण्ड, दंभ, छद्म लोकहितता छिपाए नहीं छिपा पा रहे हैं

भारत की एक पाती बापू के नाम  : 6

-मनोहर चमोली ‘मनु’

मेरे आदरणीय बापू ! सादर अभिवादन। 

काश ! आप भी फेसबुक पर होते ! देख पाते कि मेरे लोगों में कई पाखंडी बन चुके हैं। धूर्त हैं। मक्कार हैं। कूढ़मग़ज़ हैं। दो हजार उन्नीस आते-आते ये घास-पात की तरह बढ़ चुके हैं। आप अच्छे पाठक रहे हैं। पर आपकी पाठकीयता भी कुंद हो जाती। 

जनवरी से अब तक इन पाखंडियों और कथित भक्तों की आए दिन चस्पा पोस्टों के चार-एक वाक्य ही आप पढ़ते और छोड़ देते। आपकी नज़र भी मन्द पड़ जाती। इनकी पोस्टों को देखते ही आप या तो चश्मा साफ करने लग जाते या आँखें मूँद लेते। 


मैं कैसा हूँ ? बताता हूँ। मैं इन अपनों की राजनीतिक, सामाजिक, सामुदायिक, सांस्कृतिक और नितांत व्यक्तिगत स्वार्थपरक पाॅलिटिक्स देख रहा हूँ। इनका कथित जनपक्षधरता का चोला उतरता हुआ देख रहा हूँ। इनकी मूर्खता पर हँसता नहीं हूँ। दुःखी हो जाता हूँ। 
क्यों? वह इसलिए कि ये जान-समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इनका असली व्यक्तित्व सार्वजनिक हो रहा है।

या तो इन्हें क़तई लाज नहीं है। या यह जान ही नहीं पा रहे हैं कि ये साफ पहचाने जा रहे हैं। या ये चाहते हैं कि इन्हें अच्छे से जान-समझ लिया जाए। कुछ हैं जो तटस्थता का आवरण ओढ़े हुए हैं। लेकिन इनके भीतर भरा जातिवाद जोर मार कर बाहर आ रहा है। इनके क्षुद्र निजी सरोकार उद्घाटित हुए जा रहे हैं।

 वे पाखण्ड, दंभ, छद्म लोकहितता छिपाए नहीं छिपा पा रहे हैं। मैं रोज़ कुछ को आपस में लड़ते-भिड़ते देख रहा हूँ। गाली-गलौज का गॅ्राफ तो रोज का पारा है। जो लगातार चढ़ रहा है।

बापू आप सोच रहे होंगे कि ये अचानक हुआ? नहीं। नब्बे के दशक से ये सुलगता हुआ साल 2019 में आग का रूप ले चुका है। मैं अपनों में ही जैसे बेग़ाना हो गया हूँ! सबसे ज़्यादा दुःख मुझे मेरे शिक्षकों और लेखकों के कार्य व्यवहार को देखकर हो रहा है! मुझे सभी शिक्षकों से शिकायत नहीं है। कुछ से है। ये कुछ भले ही ‘थोड़े’ होंगे। पर हैं। इनमें समधर्म-समभाव है ही नहीं। ये दूसरों की गरिमा का सम्मान करना नहीं जानते। दूसरों को क्या सिखाएँगे। मुझे संशय है। ये ‘ट्रोल’ हो गए हैं। जो जिन्दगी भर शिक्षण कार्य करते रहे, उनकी ट्रोल भरी टिप्पणिया पढ़कर सोचता हूँ कि इन्होंने अपने छात्रों को समाज में कहाँ ले जाकर रख दिया होगा? सोचकर ही थर्रा जाता हूँ।

और, बापू लेखकों की तो मत ही पूछिये। लेखकों में ऐसे लेखक भले ही कम होंगे पर हैं। वे शरीर में एक फोड़े की तरह हैं। जिन्हें छेड़ा जाए चाहे-अनचाहे सहलाया जाए, वह बढ़ता ही है। कई बार पूरी देह को सड़ाने के लिए एक फोड़ा ही काफी होता है। ये लेखक, जिनकी मैं बात कर रहा हूँ, आज तलक सामन्ती सोच से बाहर नहीं निकल पाए हैं। ये आज भी तंत्र-मंत्र, पूजा-आरती के उपासक बने हुए हैं। बना करें पर पूरी दरिया को एक रंग में रंगने की तो कोशिश न करें। दकियानूसी सोच से लबरेज इनके संवाद और भाव, मेरे संविधान को चिन्दी-चिन्दी किए जा रहे हैं। अब संविधान की बात आपसे करना शायद ठीक न होगा। काश ! आप मेरे संविधान को लागू होता हुआ देख पाते ! या कि आपने संविधान की उद्देशिका ही पढ़ ली होती। फिलहाल तो इन शिक्षकों-लेखकों को देखकर मन विचलित हो रहा है। वे जो या तो भेड़चाल के मुरीद हैं या भीड़ का हिस्सा होते जा रहे हैं। 

क्या करूँ? लिखना।


शेष आपके जवाब मिलने पर,

आपका अपना ही,

भारत।

॰॰॰
पत्र लेखक: मनोहर चमोली ‘मनु’

9 अप्रैल 2019

मैं दुनिया की तीसरी महाशक्ति बनने जा रहा हूँ !

मैं दुनिया की तीसरी महाशक्ति बनने जा रहा हूँ !

भारत की एक पाती बापू के नाम  : 5

-मनोहर चमोली ‘मनु’

श्रद्धेय बापू ,
सादर अभिवादन स्वीकार कीजिएगा। मैं यहाँ कुशल से हूँ। आपकी कुशलता चाहता हूँ। पत्र लिखने का ख़ास कारण यह है कि हाल-फ़िलहाल मैं आपके सपनों का भारत तो नहीं बन पाया हूँ। हाँ, यह भी सच है कि राम राज्य की अवधारणा का अंश मात्र भी मेरी देह में नहीं आ सका है। मैं और मेरे लोग कितने स्वार्थी हो गए हैं? कहने की आवश्यकता भी नहीं है। मुझे ही ले लीजिए। आपकी हत्या के 71 साल बाद पत्र लिख रहा हूँ। आपके सत्य, अहिंसा और प्रेम के सिद्धान्त तिल का ताड़ बन चुके हैं। लगातार झांसों (झांसी से इसका कोई लेना-देना नहीं है) और जुमलों के बोझ से मैं दबा जा रहा हूँ।
श्रद्धेय बापू , लिखते हुए भी लाज आ रही है कि इन इकहत्तर सालों में जो विकास हुआ होगा, सो हुआ होगा। मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता। लेकिन, इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि मेरे लोग मति भ्रमित अधिक होते जा रहे हैं। वे स्वयं के विवेक का इस्तेमाल नहीं करते। आप तो ख़ूब कहा करते थे कि झूठ के पांव नहीं होते। लेकिन आज, जिस झूठ को बार-बार परोसा जाए, दिखाया जाए, बोला जाए, वह ‘झूठ’ सच मान लिया जाता है। सच की आवाज़ झूठ की चिल्लाहटों में दब जाती है। उसका दम घुट जाता है। और झूठ? वह तो बड़ी बेशर्मी से हावी हो जाता है।
वैसे, इन इकहत्तर सालों में मेरे हिस्से भी ख़ूब उपलब्धियाँ आई हैं। आप जब थे, तब भी दुश्वारियाँ कम न थीं। लेकिन, तब आप भी और मेरे लोग भी, कमियों का ठीकरा गोरों के सिर पर फोड़ दिया करते थे। पर गोरों की सरकार तो अगस्त सन् 1947 से पूर्व ही हमेशा के लिए यहाँ से सात समन्दर पार चली गई थी। 72 सालों से तो मुझ पर, मेरे ही लोग राज कर रहे हैं। अब मेरे मतदाताओं पर एक ओर रोग लग गया है। वे अपनी ही चुनी सरकारों को बेदम बताने पर तुले हैं। कोई सरकार कई मुद्दों पर विफल हो सकती है। लेकिन, हर दूसरी सरकार को बड़ी रेखा खींचनी चाहिए। अपने आप छोटी रेखा छोटी हो जाएगी। पहले से खींची रेखा को कुरेदने, खुरचने और मिटाने को उपलब्ध्यिां नहीं माना जा सकता है।
लिखता चलूँ कि मैं दुनिया में आकार के हिसाब से सातवें नंबर पर हूँ। मेरे अपनों में कई हवाबाज़ हैं। गप्पी हैं। कपोल- कल्पनाओं को हवा देते हैं। यह संगति का असर है। दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री मेरे खाते में हैं। बापू , इसे बाॅलीवुड कहा जाता है। दुनिया में सबसे ज़्यादा फिल्में मेरे यहाँ बनती हैं।़ आप तो जानते हैं कि दुनिया को गणित का शून्य मैंने ही दिया था। उसके बाद दुनिया के महान गणितज्ञों में दूसरा मेरे यहाँ पैदा हुआ हो, याद नहीं आ रहा है। आपको याद आए तो लिख भेजना। वैसे बापू आपके बाद दूसरा कोई बापू जैसा नहीं ही हुआ है। ये मुझे याद आएगा तो अगले पत्र में लिखूंगा।
पूज्य बापू , आपको याद होगा, आजादी के समय में मेरे 18 फीसदी लोग ही पढ़े-लिखे थे। आज 75 फीसदी लोग पढ़े-लिखे हैं। आप चिंता न करें बापू। सन् 2085 में मेरा हर युवा ग्रेजुएट हो जाया करेगा। बीते साल तलक मात्र छःह करोड़ बच्चे ही तो स्कूलों तक नहीं पहुँच पाए थे ! वैसे, बापू पढ़ाई-लिखाई अब चिन्ता का विषय नहीं रह गई। आज मेरे सौ में बीस पुरुष ही अनपढ़ रह गए हैं। सौ में पैंतीस महिलाएं ही तो अनपढ़ रह गई हैं। क्या यह विकास नहीं? मात्र 45 साल बाद हमारी साक्षरता दुनिया की औसत साक्षरता के बराबर हो जाएगी।
वैसे बापू गौरव का विषय यह तो है ही कि कुकुरमुत्तों से अधिक हमारे यहाँ निजी स्कूल हैं। एशिया में सबसे अधिक शिक्षण संस्थाएँ भारत में हैं। यह बड़ी बात नहीं? मैं इस बात से अक्सर परेशान हूँ कि दुनिया में सबसे अधिक अनपढ़ मेरे यहाँ हैं। सबसे ज़्यादा मूक-बधिर मेरे यहाँ हैं। सबसे ज़्यादा बच्चों के अपहरण मेरे यहां होते हैं। महिलाएं सबसे ज़्यादा हिंसा की शिकार मेरे यहां होती हैं। सबसे अधिक दिव्यांग मेरे यहाँ हैं। क्या पता विकलांगों को दिव्यांग कह देने भर से यह प्रतिशत कम हो जाए !
बापू , मैं आज भी सबसे ज़्यादा केले दुनिया के देशों को भेजता हूँ। कभी एक रुपए के दर्जन केले मिलते थे। आज साठ रुपए दर्जन बिकता है। मैं दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश हूँ। चुनाव में सबसे अधिक खर्च भी मेरे यहाँ हो रहा है। मैं हैरान हूँ कि एक ओर एक तिहाई लोग भर पेट भोजन नहीं कर पा रहे हैं वहीं दूसरी ओर दुनिया में सबसे ज़्यादा सोना मेरे लोग ही खरीदते हैं। खरीद रहे हैं। गंगा-जमुनी संस्कृति मेरी थाती रही है। यह भी सच है कि सबसे अधिक त्योहार मैं ही मनाता हूँ। सबसे अधिक छुट्टियाँ मेरे यहाँ होती हैं।
वैसे बापू गौरव की बात यह भी है कि मेरे अपने अमेरिका में वैज्ञानिक हैं। नासा में तो छत्तीस फीसदी वैज्ञानिक भारतीय हैं। ये ओर बात है कि उन्होंने मेरे लिए क्या किया? मैं नहीं जानता। आप तो राष्ट्रपिता हैं। आपके नाम पर मेरे यहाँ जितनी सड़कें हैं उससे अधिक सड़कों के नाम विदेशों में हैं। आप दुनिया में भी स्वीकार्य हैं। चरक ने आयुर्वेद को चिकित्सा में हजारों साल पहले पहचान दी थी। लेकिन मेरे ही अपने अंग्रेजी शराब की दुकान पर और अंग्रेजी दवाखाना पर भरोसा करते हैं। मेरे नीति-नियंता विदेशी डाॅक्टरों पर अधिक एतबार करते हैं। अकेले अमेरिका में अड़तीस फीसदी डाॅक्टर भारतीय हैं। यहाँ मेरे लोग सरकारी डाॅक्टर नहीं बनना चाहते। गली-मुहल्लों में डाॅक्टरी की दुकान खोले बैठे हैं। मेरे सीने में दुनिया का सबसे लम्बी रेल पटरी हैं। रेल के कर्मचारी भी मेरे यहाँ सबसे अधिक हैं। बावजूद इसके लगभग दो लाख पद रेलवे विभाग में खाली हैं।
बापू , मेरे लोग पशु प्रेमी भी हैं। गौ हत्या के नाम पर मेरे बेकसूर नागरिकों को विदेशी नहीं मारते। मेरे अपने ही मारते हैं। पर दूसरा सच यह भी है कि पाँच करोड़ से अधिक बंदरों को शरण भी मैंने ही दी हुई है। आदरणीय बापू । मैं कर्ज़ में भी डूबा हुआ हूँ। दिसम्बर 2017 में मुझ पर 495 बिलियन अमेरिकी डाॅलर कर्ज है। यह बढ़ता ही जा रहा है। उधार लेकर घी पीना निन्दनीय माना जाता था। लेकिन आज सारी अर्थव्यवस्था उधार पर टिकी है। भारत से अलग हुआ पाकिस्तान तो चीन के कर्ज़ तले दबा पड़ा है। मेरी सरकार की बात करूँ तो हालात बद से बदतर हुए जा रहे हैं। साल 2014 में सरकार पर कुल कर्ज 54,90,763 करोड़ था। यह कर्ज़ जनवरी 2018 में बढ़कर 82 लाख करोड़ रुपए हो गया। इन पाँच सालों में यह लगभग पचास फीसदी और बढ़ गया है।
बापू फिर भी, मेरे कान यह सुन-सुन कर पक गए हैं कि मैं दुनिया की तीसरी महाशक्ति बनने जा रहा हूँ ! सुनकर अच्छा-सा लगता है। लेकिन भीतर ही भीतर डर भी जाता हूँ कि कहीं कोई मुझे और मेरे लोगों को गुमराह तो नहीं कर रहा है? सच क्या है? आप कुछ समझ-जान पाए हों तो बताइएगा।
आपके प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में,
आपका अपना,
भारत
॰॰॰
पत्र लेखक: मनोहर चमोली ‘मनु’

8 अप्रैल 2019

एक पाती सखा के नाम



सँभल जा यार अब भी वक़्त है !

-मनोहर चमोली ‘मनु

मेरे बेवड़े दोस्त ! कैसे हो? यह पूछने का मन भी कहाँ है? भारी मन से तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूँ। कैसे लिखूँ कि कैसे हो? कल तो ऐजेन्सी में तुमने मुझे भरी-दुपहरी छप्पन गालियाँ दे दीं। तुम इतने टल्ली थे कि दुपहिया पे बैठ भी न पाए। वो तो भला हो रक्का का,जो अपने दोस्त की सहायता से तुम्हें अपनी बाइक पर बिठा ले गया और घर छोड़ आया।

मैं समझ सकता हूँ कि रक्का और उसके दोस्तों ने भी ज़िंदगी में ऐसी गालियाँ नहीं सुनी होगी, जो तुमने रास्ते भर उन्हें दी होगी। आशा ही नहीं, पूरा भरोसा है कि वे दोनों किसी बेवड़े की अब कभी मदद नहीं करेंगे। 
ख़ैर जो हुआ-सो हुआ। तुम्हें इससे क्या? तुम्हें तो पता ही है कि कोई न कोई ढोकर ले ही जाएगा। अच्छा हुआ ! ये मैं कैसे कह सकता हूँ?

तुम नाम के नहीं स्वभाव के भी धीरज हो। शांत स्वभाव। हमेशा मुस्कराते रहते हो। बहुत ज़रूरत पर ही मुख खोलते हो। पर हलक़ में एक ढक्कन उतरता नहीं कि तुम शोले के बीरू हो जाते हो ! कमाल है ! मैं आज तक समझ नहीं पाया कि तुम असल में बीरू तो नहीं, जो गऊ बने रहने का स्वाँग करता है. लालपरी के उतरते ही असली रूप में आ जाता है? होश में रहते हुए तो कभी बताओगे नहीं, जब सरूर में होंगे, तभी पूछूँगा। पर तुम्हें भी कैसे दोष दूँ? जब घर का मुखिया ही होश-ओ-हवास में बहकने लगे तो तुम किस खेत की मूली हो?
तुम्हारे हवाले से काॅलेज का साथी दयाराम शर्मा याद आ गया। वो नंबर एक का नशेड़ी था। हाँ, मुझे देखकर भाग खड़ा होता। उसे पता था कि मैं उसके हाथ से सिगरेट छीन जो लूँगा।
एक दिन का वाक़या है। मैंने उसे रंगे हाथ पकड़ लिया। वो झल्ला उठा। बोला,‘‘मैं सिगरेट किसी के बाप की नहीं पीता। न चोरी करता हूँ।’’
मैं सन्न ! उलटे पाँव लौट आया था। फिर, उसका रास्ता अलग हो गया था। सामने मुझे देखता, तो रास्ता बदल देता। फिर एक दिन, पता चला कि दयाराम शर्मा दून अस्पताल में भर्ती है। मिलने गया, तो हरे बिस्तर पर लेटा था। मुझे देखते ही उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े। उसकी माँजी स्टील की उलटी थाली से टँकित अस्पताली स्टूल पर बैठी थी। पहचानती ही थी। बोलीं,‘‘तेरा दोस्त कहता है कि यदि दोस्ती न टूटती तो टी॰बी॰ न जकड़ती।’’
बहरहाल, दयाराम शर्मा ठीक तो हो गया, पर नशा उसे ले डूबा। नशा तो हर चीज़ का बुरा होता है। तुम अच्छे इंसान हो। पर संगत बुरों की है। इन दिनों देखो,आम चुनाव 2019 की ही चर्चा है। अच्छे लोग भी गलत दलों में घुसे बैठे हैं। बुरे लोग भी अच्छे दलों में हैं। एक मछली से कहाँ तालाब गन्दा हुआ करता है?
अब वैसे तो हर कोई कहता है कि अच्छी सेहत के लिए शराब से बचना चाहिए। ये शराब आपको बरबाद कर देगी। ये वो लोग भी कहते नहीं थकते जो घर में बार खोले हुए बैठे हैं। ये वो लोग भी कहते हैं जो चैकीदार बने फिरते हैं। ये वो लोग भी कहते हैं जिन्होंने घर-बार छोड़ रखा है। ये बात वे भी कहते हैं जिनका गला तर है।
कल दुपहरी का मामला याद करता हूँ तो मुझे मेरा सहकर्मी शंकरलाल दूबे याद आ रहा है। नंबर एक का चुटकुलाबाज़। द्वीअर्थी बात करने वाला। दाढ़ी उसके चेहरे पर अच्छी नहीं लगती थी। पता नहीं, वह दाढ़ी क्यों रखता था? ड्रामेबाज अलग था। लच्छेदार बातों से सबका मन मोह लेता।
सालाना परीक्षा के दौरान मानो आम चुनाव आ जाते थे। सबसे गाढ़ी दोस्ती कर लेता। वही गाढ़ी दोस्ती, उसके परचे हल करवा देती। साल-दर-साल पास होता चला गया। आज चाय की दुकान खोले बैठा है। थकी हुई चाय बनाता है। पर ऐसा जुमलेबाज है कि उसका खोखा ग्राहकों से भरा रहता है। 
उसका सब कुछ अच्छा है। पर चढ़ाने के बाद 'स' को 'श' और 'श' को 'स' बोलने लगता है। हथेलियाँ पीटने लगता है। बाँया हाथ हवा में ऐसे लहराता है जैसे सुदर्शन चक्र धारण कर लिया हो। बुड़बक कहीं का।

मैं भी क्या ले बैठा? भला शराबबंदी से शराब बंद हो सकती है? मेरे कहने से तुम शराब बंद कर दोगे? अब अपनी कथित देव भूमि को ही ले लो। अकेले इस सूबे में सालाना 2650 करोड रुपए की शराब हलक़ से नीचे उतारने का लक्ष्य है। पूरे भारत में शराब से सालाना कमाई अरबों में हैं। जहाँ शराब पूरी तरह से बन्द है, वहाँ कदम-कदम पे मिल जाती है।
मेरे दोस्त। हम सब जानते हैं कि शराबी (सराबी नहीं) रोगी हो जाता है। ऐसे रोगी जो शराब की लत में हैं। हर साल मरते हैं। कितने? 33,00000 लाख ! शराबी वाहन भी चलाते हैं। सड़क हादसों में मारे जाने वालों में 1,38,000 लोग शराबी होते हैं। गाड़ियों की दुर्घटनाओं में 40 फीसदी शराबी वाहन चालकों की वजह से होती है। कुल आत्महत्याओं में आधी आत्महत्याओं में नशा प्रमुख कारण बना हुआ है।
प्यारे दोस्त ! फ़कीरों का क्या है? वो तो झोला उठाकर कहीं भी चल देंगे। उनका क्या? आगे नाथ न पीछे पगहा। लेकिन तुम्हारे साथ तो ऐसा नहीं है। बुजुर्ग माता-पिता तुम्हारे साथ है। पत्नी है। तीन बच्चे हैं। तुम्हारे पास सब कुछ है।
तुम हो कि पीकर कहते हो,‘‘मेरे पास सराब है!’’ गलत बात है। झांझ उतर जाए तो पेंट की जेब में यह पत्र मिलेगा।
मैं जानता हूँ और मानता भी हूँ कि शराब बुरी है। शराबी नहीं। मैंने शराबी जैसे भावनात्मक,मददगार और साहसी अशराबी नहीं देखे। शराब यदि ख़राब होती तो पूरी दुनिया से इसका खात्मा हो चुका होता। उन देशों में भी ख़ूब पी जाती है जहाँ साक्षरता दर उच्च है। उन देशों में भी ख़ूब प्रचलित है जो दुनिया के तीन बड़े शक्तिशाली देश हैं। एक बात और है, शराब में धुत्त आदमी कभी भी दूसरे के घर का दरवाज़ा नहीं खटखटाता। वह दूसरे की बीवी को अपनी बीवी कभी नहीं कहता। वह कभी दस रुपए के चक्कर में सौ रुपए नहीं गंवाता। शराबी को आप चोर नहीं कह सकते।
अभी पिछले महीने 25 फ़रवरी 2019 की ही तो बात है। असम में ज़हरीली शराब पीकर 140 चाय बागान मजदूर काल के गाल में समा गए। पता है वहां ये जहरीली शराब 10 रुपए लीटर मिल रही थी। अब सोचिए। दिन भर कमर तोड़ मेहनत करने वाले 10 रुपए की टुच्ची शराब में अपनी जीवन लीला समाप्त कर गए। इन परिवारों के पीछे लगभग 1000 लोग कमाऊ मुखिया के बाद कैसे दिन काट रहे होंगे? सोचकर भी नींद उड़ जाती है।
मैं मानता हूँ कि शराबियों से अधिक खराब तो पतित हैं। भ्रष्ट आचरण वाले खराब हैं। लफ़्फ़ाज़ खराब हैं। झांसा देने वाले टुच्चे हैं। झूठे सपने दिखाने वाले अधिक खराब हैं। सरकार को कोसने वाले खराब हैं। पर फिर भी मैं यह तो कहूँगा ही,''शराब दवाई भी तो नहीं है।'' वरना बाबा रामदेव शराब को भी अपना उत्पाद काहे नहीं बना देता? बोलो?
कल और आज आकस्मिक अवकाश की एप्लीकेशन तुम्हारे दफ़्तर में दे आया था। कल नहा-धोकर ड्यूटी चले जाना। दाँत साफ कर लेना। जेब में इलायची रख लेना। अब क्या लिखूँ। अगली बार गाली दोगे तो रिकाॅर्डिंग कर लूंगा। यू-ट्यूब में अपलोड कर दूंगा। और हाँ। ये बात-बात पे रोने जैसी शक्ल बनाने की ज़रूरत नहीं है।
तुम्हारा दोस्त
***

पत्र लेखन : मनोहर चमोली ‘मनु’

बापू काश ! आपने आम चुनाव देखे होते !

बापू काश ! आपने आम चुनाव देखे होते ! 

भारत की एक पाती बापू के नाम  : 4

-मनोहर चमोली ‘मनु’

आदरणीय बापू जी,
सादर प्रणाम। आशा है सानंद होंगे। मैं अपनी क्या कहूँ? आप जब जीवित थे, तब मेरा जनमानस एक ही भाव में सराबोर था। आजादी हासिल करने का भाव ही सर्वोपरि था। आपकी आँखों के सामने गोरे देश छोड़कर चले गए थे।

बापू । अब याद करता हूँ तो पाता हूँ कि आपने आजाद भारत का पहला आम चुनाव कहाँ देखा? अच्छा हुआ कि आपने भारतीय चुनाव नहीं देखे। 
हालांकि, ये पाँच साल में एक बार आता है और जमकर दल एक-दूसरे से बेहतर बताते हुए जनता की अदालत में जाते हैं। आपको बताते हुए मुझे हर्ष की अनुभूति तो हो ही रही है कि इन दिनों मेरे मतदाता लोकसभा चुनाव 2019 में सहभागी बन रहे हैं। सत्रहवीं लोकसभा का गठन 23 मई 2019 को मतगणना के बाद ही हो सकेगा।

बापू , पत्र लिखने का खास कारण यह है कि इस बार भी कई दिग्ग़जों के टिकट कटे हैं। कई हैं, जिन्हें दल-बदल का तमगा मिला है। कई हैं, जो फिर से घर वापिस हो आए हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। कई हैं जो दो-दो सीटों पर खड़े हैं। इस बार भी चुनाव आयोग पर पक्षपातपूर्ण रवैया का आरोप लग रहा है।
प्रिय बापू । आपको बताते हुए मन बेहद दुःखी है। इस बार भी कई दलनिष्ठ, आस्थावान और कर्मठ भारी मन से हमेशा के लिए लोकसभा के दरवाजे को अलविदा कह चुके हैं।
वैसे परम्परा रही है कि लोकसभा में चार-पाँच-छःह बार अनवरत् जीत कर आए सांसद स्वयं अपनी बढ़ती उम्र का हवाला देकर स्वयं ही हाथ जोड़कर मतदाताओं से चुनाव न लड़ने की असमर्थता जता देते हैं। लेकिन इस बार तो हद ही हो गई।
एक उदाहरण देता हूँ। तीस साल संसदीय राजनीति में सक्रिय सांसद को खुद ही कहना पड़ा कि शीर्ष नेतृत्व मेरी जगह पर दूसरे नाम पर विचार कर ले। मैं चुनाव नहीं लड़ रही हूँ। ऐसा कहलवाया गया। क्या इसे सम्मानजनक विदाई कहेंगे?
छिहत्तर साल का उदाहरण देना गलत है। आज के दौर में युवा भी आलसी हो सकते हैं। बुजुर्ग भी कार्यशैली के हिसाब से युवा तुर्क माने जा सकते हैं। कितना अच्छा होता कि चुस्त और सक्रियता से बाहर हो चुकों को ही मार्गदर्शक नेता माना जाता।
मैं इस बात से भी दुःखी हूँ कि भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे हैं जो सीधे चुनाव जीतकर नहीं आते और मंत्री बन जाते हैं। कुछ ऐसे हैं जिन्होंने अपना पिण्ड दान तक कर दिया है लेकिन कमान संभाले हुए हैं। कुछ ऐसे हैं जो साधु-बाबा-साध्वी-सन्यासी बने हैं और राजनीतिक रसूखी में आकण्ठ डूबे हुए हैं। कुछ ऐसे हैं जिनकी सामाजिक-पारिवारिक मान-मर्यादा संदिग्ध हैं। वे नसीहतें देते फिरते हैं। कुछ ऐसे हैं जिन पर हत्या, आगजनी, बलात्कार जैसे संगीन अपराध आरोपित हैं।
कुछ ऐसे हैं, जो नचैये हैं, गवैये हैं। कथा वाचक हैं। नट हैं, नटनी हैं। (इसका अर्थ यह नहीं है कि ये योग्य नहीं हैं। मेरा मक़सद कला,साहित्य और संस्कृति के मर्मज्ञों को राजनीति से बाहर रखने का कतई नहीं है) 
वैसे बापू , हमारा संविधान बेहद लोकतांत्रिक है। बहुत कम अयोग्यताएँ रखी हुई हैं जिसकी वजह से कोई चुनाव न लड़ पाए। अच्छी बात है। लेकिन नए पत्ते आने से कौन रोक सकता है। पर पुराने पत्तों की समयापूर्व छंटाई क्या ठीक है?

आठ-आठ बार लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे दिग्गजों को कह दिया गया कि अब आप राजनीति में अयोग्य हो चुके हैं। आपकी जगह दूसरों को दी जा रही है। लगातार छःह,सात और आठ बार सांसद रह चुके नामचीनों को अचानक बोझ मान लेना, कहा तक उचित है? वे एक दिन में ही उम्रदराज़ हो गए? यह मुझे बेहद नागवार गुजर रहा है।
बापू । आप भी तो बुजुर्ग रहे हैं। पैदल चलते रहे हैं। आपकी गतिशीलता और कर्मठता किसी से छिपी नहीं रही। किसी को टिकट की दावेदारी करने से रोकना लोकतांत्रिक है? विवादितों को फिर से टिकट देना न्यायसंगत है?
बापू , मैं जानता हूँ आप इस पत्र को पढ़कर हैरान होंगे। आपके पास मेरे सवालों का जवाब भी कहाँ से होगा? जानता हूँ कि आपने हद दर्जें की गिरी राजनीति का सामना जो नहीं किया है। सत्य,अहिंसा और प्रेम के सि़द्वान्त चुनाव में कहाँ कारगर होते हैं? लेकिन मैं भी क्या करूँ? ऐसे मुश्किल समय में मुझे आप बहुत याद आए। सो आपको पत्र लिख दिया।
सादर, शेष फिर कभी।

आपका अपना
भारत
॰॰॰
पत्र लेखन: मनोहर चमोली ‘मनु’

#महात्मा गांधी



पाप और अत्याचार की जननी है शराब

भारत की एक पाती बापू के नाम  : 3


आदरणीय बापू । मेरा प्रणाम आप तलक पहुँचे। आशा है सानंद होंगे। मैं यहाँ पर कुशल पूर्वक हूँ। यह लिखने का मन नहीं है।
आप अक्सर कहते थे,‘‘शराब पाप और अत्याचार की जननी है।’’ लेकिन बापू मेरे कई जिलों में आपके नाम से प्रेक्षागृह बने हुए हैं। उन्हीं प्रेक्षागृहों में शराब के ठेकों के टेण्डर हर साल होते हैं। आपके चित्र पीछे लगा रहता है और आगे कुर्सियों पर आला अफ़सर बैठकर शराब के ठेकों के ठेकेदार तय कर रहे होते हैं।

प्रिय बापू ! कहते हैं कि शराब बेचकर राज्यों को राजस्व मिलता है। वह राजस्व विकास के कामों पर खर्च होता है। पर बापू मैं आपकी नैतिकता को याद करता हूँ। आप तो कहते थे,‘‘पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।’’ यहाँ तो ठीक उलट स्थिति है। शराब पर प्रेम बरसाया जा रहा है और शराबियों पर लाठी भांज दी जाती है। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। यह कहाँ चरितार्थ हो रही है?
बापू। जैसे-जैसे दिन ढलता है मेरा दिल बैठता चला जाता है। अब तो दिन-रात का अन्तर भी कहाँ रह गया है? ऐसे कई महानगर हैं जो कभी सोते ही नहीं। ऐसी हजारों शराब की दुकानें हैं जिनके किवाड़ के पट कभी बंद नहीं होते। हैरानी तो इस बात की है कि इन शराब की दुकानों में आने वाले किसी मन्दिर,मस्जिद,गुरुद्वारे और चर्च के अनुयायियों से कम नहीं हैं। कुछ तो ऐसे हैं कि जिनकी सुबह शराबखाने से ही शुरू होती है। ऐसे भी हैं जिनकी रात की सुबह कभी होती ही नहीं।
बापू जब आप जीवित थे तो नशा मुक्ति की ख़ूब बात किया करते थे। तब मेरे लोगों में एक ही जुनून था-दासता से मुक्ति। वह मिल गई। लेकिन शराब की गुलामी में मेरे लोग जकड़ते जा रहे हैं। शराब के प्रचलन को जैसे सामाजिक स्वीकृति मिल गई हो।
बापू आप तो कहते थे कि आदर्श रामराज्य की तरह आपके सपनों के भारत में जनता को पोषक भोजन मिले। सम्मानजनक जीवन निर्वाह के अवसर मिले। सेहत में सुधार हो।
बापू आपके नशा मुक्ति अभियान को ध्यान में रखते हुए मेरे संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद सेंतालीस में साफ उल्लेख किया है। वह यह है-राज्य अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कत्र्तव्यों में मानेगा और राज्य,विशिष्टतया मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के, औषधिय प्रयोजनों से भिन्न, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा।’
मुझे दुःख के साथ लिखना पड़ रहा है कि बापू ऐसा कोई प्रयास धरातल पर नहीं दिखाई देता। आपने कहा था,‘‘जो राष्ट्र शराब की आदत का शिकार है, उसके सामने विनाश मुँह बायें खड़ा है। इतिहास में इसके कितने ही प्रमाण हैं कि इस बुराई के कारण कितने ही राष्ट्र मिट्टी में मिल गए।’’ लेकिन बापू मुझे दुःख है कि हम इतिहास से भी सबक नहीं लेना चाहते।
आजादी के इकहत्तर साल बाद भी मैं मलेरिया से मुक़्त नहीं हो पाया हूँ। आपने एक बार कहा था,‘‘मद्यपान एवं अन्य नशीले पेयों का व्यसन अनेक दृष्टियों से मलेरिया एवं ऐसे ही अन्य रोगों से उत्पन्न व्याधि से भी बुरा है। क्योंकि जहाँ मलेरिया आदि से केवल शरीर को ही क्षति पहुंचती है वहां मद्यपान से शरीर एवं आत्मा दोनों ही क्षतिग्रसत होते हैं।’’
बापू ,जब आप ज़िन्दा थे तब मेरे नागरिक छत्तीस करोड़ थे। आज ये एक सौ पचास करोड़ होने वाले हैं। यदि सौ के सिर पर चोट लगी है तो बीस से अधिक चोटें शराब की वजह से लगती हैं। सौ में पैंतीस आत्महत्या का कारण शराब होती है। चालीस फीसदी दुर्घटनाएं शराब के नशे की वजह से होती हैं। हर साल मेरे तेंतीस लाख नागरिक शराब की वजह से दम तोड़ देते हैं। सड़क हादसों में शराब की वजह से हर साल एक लाख अड़तीस हजार नागरिक मारे जाते हैं। पति द्वारा घरेलू हिंसा के मामलों में सत्तासी फीसदी मामलों में शराब प्रमुख वजह है।
बापू , काश ! मैं भी इंसानों की तरह शराब चख सकता। मैं भी देखता कि इस शराब में ऐसा क्या है कि मेरे अधिकतर राज्यों का राजस्व इस पर निर्भर होता जा रहा है। मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूँ कि आज अरबों रुपए का राजस्व यदि शराब से इकट्ठा हो रहा है तो उस रुपयों से किया गया विकास मुझे क्यों नहीं दिखाई दे रहा? आपको दिखाई दिया तो मुझे भी बताना।
आपका प्रिय 
भारत
***
पत्र लेखक: मनोहर चमोली ‘मनु’

 #महात्मा गांधी

इकहत्तर साल बाद भी मैं पूर्ण साक्षर नहीं

इकहत्तर साल बाद भी मैं पूर्ण साक्षर नहीं  

भारत की एक पाती बापू के नाम  : 2


आदरणीय बापू ! जय हिंद। 
आशा है आप सानंद होंगे।
 मैं और मेरे लोग आपको अक्सर याद करते हैं। दुनिया के शांतिप्रिय लोग भी आपको अक्सर याद करते हैं। मेरे लोग तो दो अक्तूबर को हर साल गांधी जयंती मनाते हैं। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि दुनिया ने आपको बीसवीं सदी का युग पुरुष माना है। ये ओर बात है कि मेरे ही अपने कुछ सिरफिरे आपके सत्य, अहिंसा और प्रेम के सिद्वान्तों को बीते जमाने की बात कहते हैं। बापू ! मैं शर्मिन्दा हूँ।

पत्र लिखने का खास कारण यह है कि आपकी हत्या के चैवन साल बाद ही सही पर मैं आपका एक सपना पूरा कर सका। आप अक्सर कहा करते थे,‘‘भारत का विकास तभी होगा जब भारत पढ़ेगा। लिखेगा।’’
आपके जाने के दो साल बाद मुझ भारत का अपना एक लिखित संविधान बना। आपके रहते हुए उस पर काम हो रहा था। आपके सुझाव मेरे संविधान का अहम् हिस्सा हैं। लेकिन मैं शर्मिन्दा हूँ कि आपका एक सपना साकार करने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ा। इस संशोधन से पहले पिचासी संशोधन हुए। छियासीवां संशोधन कर अब मेरे वे सभी बच्चे जिनकी उम्र छःह से चौदह साल है वे निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा पा सकेंगे।
प्रिय बापू निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार लागू हुए सोलह साल हो चुके हैं। इसके बावजूद अभी भी मेरे लाखों बच्चे शिक्षा से कोसों दूर हैं। आप अक्सर कहते थे-‘सामाजिक उन्नति के लिए शिक्षा का योगदान महत्वपूर्ण है।‘
इस बात को समझने में मुझे आधी सदी लग गई। मैं शर्मिन्दा हूँ। कारण बताता हूँ। शिक्षा आम आदमी की पहुँच में हो। यह बात जानने और समझने के बावजूद भी सार्वजनिक शिक्षा के लिए स्थापित सार्वजनिक स्कूल तेजी से बंद हो रहे हैं। कुकरमुत्तों की तरह गाँव क्या और शहर ! क्या जो निजी स्कूल खुल गए हैं वह तेजी से बढ़ रहे हैं। सरकारी स्कूल दम तोड़ रहे हैं। मैं इस बात से परेशान हूँ कि चालीस लाख से अधिक भारतीय दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते। ऐसे में पाँचवी दर्जा की पढ़ाई से पहले हर महीने कम से कम एक हजार रुपए बतौर स्कूल फीस कैसे जुटाई जाती होगी?
ऐसे कौन-से कारण हैं और क्यों हैं कि हमारे सार्वजनिक स्कूल दम तोड़ रहे हैं? आप कहते रहे,‘‘शिक्षा ऐसी हो जो छात्रों को स्वावलंबी बनाये। शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो।’’ लेकिन बापू . . . मैं शर्मिन्दा हूँ। यहाँ हर दूसरा अभिभावक अंग्रेजी को सब कुछ मान बैठा है। मानवीय गुणों के विकास की बात तो किताबी ही रह गई। मुझे आजाद करने वाले रणबांकुरों ने कहाँ सोचा था कि आजादी के बाद मेरी बागडोर उन लोगों के हाथ में चली जाएगी जो बड़े घरानों की बात करेंगे। मुनाफे की बात करेंगे। वे लोग मेरा भाग्य विधाता बनेंगे जिन्होंने कभी एक वक़्त की भूख तक न सहन की हो। हाशिए पर रहने वाले और हाशिए पर चले जाएँगे! मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।
आपके सपनों के इस भारत की हालत दयनीय है। ऐसी ठोस योजनाएं नहीं बन सकीं कि शिक्षा का सार्वभौमिकीकरण हो सके। आजादी के इकहत्तर साल बाद भी मैं पूर्ण साक्षर नहीं हो सका हूँ। अब तो मुझे भी लगने लगा है मुझे अनपढ़ बनाए रखने की एक छिपी कोई साजिश तो नहीं !
मुझे मालूम है कि मेरा यह पत्र पढ़कर आप फिर से चिन्ता करने लगेंगे। आपको चिन्तित होना भी चाहिए। क्या पता ! आपकी चिन्ता इक्कीसवीं सदी के नीति-निर्धारकों की चिन्ता बने।
शेष फिर कभी।

आपका भारत। 
॰॰॰-

पत्र लेखन: मनोहर चमोली ‘मनु’

 #महात्मा गांधी