13/10/2017

दूर तलक जा सकती है बाल किलकारी की आवाज़ info@kilkaribihar.org, publication@kilkaribihar.org

दूर तलक जा सकती है बाल किलकारी की आवाज़

-मनोहर चमोली ‘मनु’

‘बाल किलकारी’ के दो अंक एक साथ डाक से मिले। बच्चों की मासिक पत्रिका ‘बाल किलकारी’ प्रकाशित हो रही है। इसे किलकारी बिहार बाल भवन, राष्ट्रभाषा परिषद परिसर प्रकाशित कर रहा है। 
2017 के माह जुलाई और अगस्त के अंक शानदार हैं। आवरण मन को भाते हैं। ये ओर बात है कि आवरण के चित्र साभार इंटरनेट लिए गए हैं। आवरण बच्चों की दुनिया का प्रतिनिधित्व करते हैं। स्तम्भ ‘तुम्हारी रचना‘ के चार पेज बच्चों के बाल मन का सम्मान करते हुए रंगीन हैं। उम्मीद जगाते हैं कि ये पत्रिका भविष्य में बहुरंगी हो जाएगी। स्तम्भ ‘तुम्हारी ‘पेन्टिंग‘ सीधे बच्चों की आवाज़ों को स्थान देता है।

पत्रिका के भीतर झांकने का झरोखा आंखों को थकाता नहीं है। यह पेज आसानी से बताता है कि पत्रिका 48 पेज की है। चिट्ठी-पत्री में पाठकों के पत्र शामिल होते हैं। नियमित स्तम्भों में कार्टून का पन्ना पवनटून के जिम्मे है। बच्चों के लिहाज से एक महीने एक ही कार्टून हो तो ज्यादा असरदार होगा। जुलाई के अंक में ही चार-चार कार्टून एक पेज में दे दिए गए हैं। वे भी आकार में असमान। अक्षरों का आकार दस से कम। कार्टून चित्र से ज़्यादा प्रभावी होते हैं यदि उसमें भाषा का उपयोग सांकेतिक हो तो बेहतर वर्णनात्मक हो तो कार्टून कैसा? 
कहानियां चार से छह शामिल हो रही हैं। यह अच्छा संकेत है। कविताएं भी तीन से आठ के मध्य शामिल हो रही हैं। पत्रिका विज्ञान को भी अच्छा खासा महत्व दे रही है। या तो विज्ञान कथा ज़रूर रहेगी या विज्ञान के प्रयोग को स्थान मिल रहा है। समझो-बूझो, शब्द पहेली, चुटकुले, पहेली, एक अधूरी कहानी पूरी हुई, जीव-जंतु, जानकारी, रोचक, सिनेमा, दुनिया-जहान और बापू कथा नियमित काॅलम हैं। कागज़ 70 जीएसएम से कम नहीं है। पत्रिका की उम्र लंबी रहेगी। चित्रांकन उमेश शर्मा के हैं। अधिकतर चित्र हाथ से स्कैच किए हैं। ये बेहतर है। कंप्यूटर में बने-बनाए चित्र बच्चों को वो काल्पनिकता नहीं दे पाते। पेज ले आउट जहां दो काॅलम में बन रहे हैं वे पाठक के ज़्यादा करीब हो जाते हैं। जिसे सीधे पाठय पुस्तक के तौर पर रखा जा रहा है वह पेज न तो भाता है उसे पढ़ने में पाठक की आंखें थकती हैं। ये अच्छी बात है कि पत्रिका सिनेमाई जगत को बच्चों की नज़र से देखने का प्रयास करती नज़र आती है। चुटकुलों में अभी वह स्तर आने की संभावना दिखाई पड़ती है जो बच्चों में स्वस्थ मनोरंजन करें। 

इन अंकों को देखकर-पढ़कर पता नहीं चल पा रहा है कि ये कब से प्रकाशित हो रही है। वर्ष का और अंक के क्रम का उल्लेख संभवतः इसलिए भी नहीं है कि डाक पंजीयन और पत्रिका का विधिक पंजीयन की प्रक्रिया चल रही होगी। इस माह पत्रिका में रचनाएं किस रचनाकर की हैं यह पन्ने उलटने से पता चलता है। संभवतः रचनाकारों के नाम रचना के साथ दें तो पाठकों को अधिक सहूलियत होती है। रचनाकारों को भी और भविष्य में पुराने अंकों को देखने की आवश्यकता पड़े तो यह पेज बहुत मदद करता है। यह अच्छी बात है कि बाल किलकारी इस बात को बखूबी समझ रही है कि पत्रिका की रचनाएं बच्चों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है न कि रचनाकार की फोटो और पते-सम्पर्क आदि। पाठक यदि चाहे तो पत्रिका से सम्पर्क कर लेखकों के पते और अधिक विवरण मांग सकता है। कम से कम बच्चों की पत्रिका में रचनाकारों के बड़े-बड़े माॅडलिंग टाइप के चित्र देने का जो चलन चल पड़ा है उसके पीछे बालमन की उथली समझ ही सामने आकार लेती है। 
पत्रिका कहीं भी जबरन ठूंसी सामग्री पेश नहीं करती। भारी-भरकम सामग्री नहीं है। पेजों को खुला-खुला रखा गया है। दो अंकों को देखकर यह इशारा साफ मिलता है कि भविष्य में यह पत्रिका परम्रागत बाल साहित्य से हटकर नए प्रतिमान गढ़ेगी। हालांकि फिलहाल के अंकों में भी आदर्शवाद है। बड़ों का बड़ापन वाला नज़रिया भी दिखाई देता है लेकिन धीरे-धीरे आधुनिक भाव-बोध और यथार्थ की रचनाओं को जैसे-जैसे अधिक स्थान मिलेगा वैसे-वैसे ही उपदेशात्मक,आदेशात्मक और आदर्श से भरी रचनाएं सिमट जाएंगी। 
पत्रिका को पढ़ते हुए, पलटते हुए स्पष्ट आभास होता है कि इसके प्रकाशन में व्यक्ति नहीं समूह जुड़ा हुआ है। ये ओर बात है कि पत्रिका में तीन-चार नाम जरूर हैं लेकिन इसे मूर्त रूप देने में एक सामूहिकता, सहयोग और सामुदायिकता की खुशबू पाठक महसूस कर सकते हैं। बाल किलकारी के बहाने यह कहना भी सही होगा कि बच्चों की पत्रिका के लिए व्यक्तिवादी निजी सोच लम्बे समय तक नहीं चल सकती। इसके लिए तो परामर्श, सहयोग और सामूहिकता ही चाहिए। 
एक बात तो तय है कि बाल किलकारी को यह जल्दी समझना होगा कि वह बच्चों को सूचनात्मक जानकारी देना चाहती है या स्कूली बच्चों को पाठ्य पुस्तक की एक और सहायक सामग्री या पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए विशिष्ट सामग्री की पत्रिका देना चाहेगी। बाल किलकारी को यह समझना होगा कि एक ओर पढ़ने के विभिन्न माध्यम सूचना तकनीक के दौर में आ चुके हैं। जानकारी और ज्ञान बढ़ाने के कई तरीके आज उपलब्ध हैं। ऐसे में छपी सामग्री की ओर बच्चों की ललक बनाना पहला मक़सद होगा तो सामग्री में सूचना, जानकारी और ज्ञान भरने के इरादों से इतर मस्ती, मनोरंजन और आनंद देने के ध्येय को बढ़ाना होगा।  
कुल मिलाकर मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि यह पत्रिका बाज़ार में उपलब्ध और सदस्यता आधारित पत्रिकाओं में विशिष्ट पहचान बना ही लेगी। शीघ्र-अतिशीघ्र इस पत्रिका से जुड़ने को अधिकतर रचनाकार आतुर होंगे और पाठकों, शिक्षकों और अभिभावकों को भी बाल किलकारी अपनी टीम का हिस्सा बनाने में कामयाब होगी।
पत्रिका: बाल किलकारी
मूल्य: 20 रुपए
पेज: 48
परिकल्पनाः ज्योति परिहार
सम्पादक: शिवदयाल
सम्पादन: राजीव रंजन श्रीवास्तव
प्रकाशक: किलकारी, बिहार बाल भवन, सैदपुर,पटना 80004 बिहार
सम्पर्क: 9835224919,746387822 
मेल: info@kilkaribihar.org,
publication@kilkaribihar.org 
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-मनोहर चमोली ‘मनु’ 

03/10/2017

संस्मरण बचपन का : कुछ तो बात है children life

कुछ तो बात है 

-मनोहर चमोली मनु’

स्कूल जाने के पहले दिन की इतनी ही याद है कि मेरा पहला शिक्षक एक अध्यापिका थी। बच्चे टाट-पट्टी पर बैठे हुए थे। मुझे भी वहीं बैठना था। अध्यापिका के माथे पर पूर्णमासी के चाँद सरीखी, बड़ी-सी लेकिन सूर्ख लाल बिन्दी चमक रही थी। सिर के बीचों-बीच लंबी माँग करीने से निकाली गई थी। माँग में लाल सिन्दुर दूर से ही चमक रहा था। अध्यापिका के हाथ हलके से हिलते तो चुड़िया खनखनाती हुई बज रही थीं। अध्यापिका ने रंग-बिरंगी साड़ी पहनी हुई थी। पैरों में चमकीली पाजेब भी उनके चलने पर बज उठती।  
मैं घर से स्कूल कैसे गया? मेरे साथ कौन था? मैंने पहला अक्षर कैसे और कब सीखा था? मैंने पढ़ना कैसे सीखा? इन सवालों का जवाब मैं नहीं दे सकूँगा। कारण? कुछ भी याद नहीं। हाँ। इतना जरुर याद है कि स्कूल जाने से पहले मैं अपने दो बड़े भाईयों को स्कूल जाते हुए देखता था। शायद उन्हें स्कूल जाते हुए देखकर, मेरे मन में विद्यालय की केाई प्यारी-सी छवि बन गई होगी। 
शायद यही कारण रहा होगा कि मैं भी अपने दोनों बड़े भाईयों की तरह बिना चीखे-चिल्लाए और रोए स्कूल जाने के लिए सहर्ष तैयार हो गया हूँगा। विद्यालय में मेरी पहली पिटाई कब हुई? यह भी याद नहीं है। हाँ। इतना जरूर याद है कि मुझे अक्षर ज्ञान कराने वाली स्कूल में दो अध्यापिकाएँ थीं। हैडमास्टर सरदार थे। उनकी पगड़ी हर रोज रंग बदल देती थी। लेकिन वह केवल कक्षा पाँच को ही पढ़ाते थे। 
छोनों अध्यापिकाओं के बच्चे भी हमारे सहपाठी थे। अक्सर हमारी अध्यापिकाएँ पिटाई की शुरुआत अपने बच्चों से ही करती थीं। कई बार तो ऐसा होता था कि सुबह बड़ी अध्यापिका अपने बच्चों को पीटती तो मध्यांतर के बाद छोटी वाली अध्यापिका अपने बच्चों पर टूट पड़तीं। मुझे अच्छे से याद है कि दोनों अध्यापिकाएँ जब पीटती थीं तो इतना पीटती थीं कि उनकी कलाई पर पहनी रंग-बिरंगी चूड़िया जिनमें हरी और लाल ज्यादा होती थीं, टूट जाया करती थीं। कई बार चूड़ियाँ टूटते समय या तो उनके हाथों को जख़्मी कर देती थीं या जिसकी पिटाई हो रही है उसके गाल, कान, गले आदि में चूड़ियों के टूकड़ों से छिटपुट घाव हो जाया करते थे। 
विद्यालय में मेरी पहली पिटाई कब हुई थी? यह भी याद नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि मेरी स्कूल में पिटाई ही नहीं हुई। हुई है। लेकिन मैं अन्य सहपाठियों की तरह अधिक नहीं पीटा गया हूँ। उन दिनों बुनियादी स्कूल में अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती थी। मैंने अंग्रेजी के वर्ण कक्षा छह में जाकर सीखे। फिर भी बुनियादी स्कूल सज़ा का केन्द्र था। मन-मस्तिष्क में यह गहरे पैठ गया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, स्कूल तो जाना ही पड़ेगा। मैंने स्कूल न जाने का कभी बहाना नहीं बनाया। यह मुझे याद है। 
हमारा स्कूल बहुत दूर था। अक्सर देर से स्कूल पहुँचने वाले छात्रों की प्रातःकालीन सभा में ही पिटाई हुआ करती थी। सजा देने से पहले देर से आने छात्रों की अलग से लाईन बन जाती थी। प्रातःकालीन सभा की समाप्ति पर देर से आने वालों को छोड़कर अन्य छात्र अपनी-अपनी कक्षाओं में चले जाते थे। सज़ा देने की जिम्मेदारी हैडमास्साब की हुआ करती थी। वह इस बहाने कभी हथौड़े (स्कूल का घण्टा बजाने वाला लकड़ी का हथौड़ा) से सिर पर गुठली बना दिया करते थे। दो-दो लड़कियों की चुटिया बाँधकर गोल-गोल घुमाते थे। रिंगाल (बाँस की एक जंगली प्रजाति) की बेंत से कभी हाथों में तो कभी पुटठों पर पिटाई होती थी। लड़कों को मुर्गा बनाकर उनकी पीठ पर ईंट रख दी जाती थी। यदि ईंट गिर गई तो फिर बेंत से पिटाई हुआ करती थी। सबसे मारक पिटाई कण्डाली से होती थी। कण्डाली को बिच्छू घास भी कहा जाता है। हाथों और पैरों में इस घास को छुआया जाता था। कण्डाली के काँटे शरीर में चुभ जाते थे। जिस पर कण्डाली लगती थी, वह सूसूसूसू की आवाज निकालता। झनझनाहट तो कई बार चैबीस घण्टे तक रहता था।  
अध्यापिकाएँ तो थप्पड़ों और मुक्कों से पिटाई किया करती थी। कभी-कभी वे तर्जनी और अनामिका के बीच पेंसिल रखकर जोर से दबाया करती थीं। तब अंगुलियों में तीव्र दर्द हुआ करता था। हम सब बुनियादी स्कूलों में टाट पट्टी पर ही बैठा करते थे। एक सज़ा यह भी हुआ करती थी कि खड़े रहो। मध्यांतर तक भी लगातार खड़ा रहना अजीब सा लगता था। यदि दीवार के सहारे पीट टेक ली तो मुर्गा बनने की दूसरी सजा मिल जाया करती थी। 
कक्षा एक से पाँच तक का बुनियादी स्कूल नए प्रवेशित बच्चों को देखा-देखी बहुत कुछ सीखा देती है। वरिष्ठ छात्रों को पीटता देख कर नवागंतुक छात्र तो वैसे ही सहम जाते थे। तब यही मनावैज्ञानिक तरीका था कि बड़ी कक्षाआंे के एक-दो बच्चों को पीट दो,छोटी कक्षा के बच्चे खुद-ब-खुद चुप हो जाएँगे। 
मेरे बुनियादी स्कूल में कक्षा एक और दो के छात्रों को एक साथ बिठाया जाता था। कक्षा तीन और चार के छात्रों को एक साथ और कक्षा पाँच के छात्र दूसरी कक्षा में बिठाए जाते थे। उन दिनों समूचा स्कूल दो या तीन कक्षों में ही सिमटा होता था। सुबह का घण्टा बजने से स्कूल की छुट्टी का घण्टा बजने तलक स्कूल प्रांगण में बहुत कुछ ऐसा घटता था, जो सबके सामने घटता था। कक्षा पाँच के छात्रों की पिटाई हो रही है तो कक्षा चार से लेकर कक्षा तीन के छात्र भी सतर्क हो जाया करते थे। कक्षा एक और दो के बच्चे आँखें फाड़-फाड़कर देखते थे। मानो किसी खेल का सीधा प्रसारण देख रहे हों। मुझे लगता है कि दब्बू, डरपोक, संकोची, अंतर्मुखी बच्चे स्कूल में अग्रेतर छात्रों के साथ घट रही घटनाओं से सबक ले लिया करते हैं। मैं भी ऐसा ही करता था। बावजूद उसके सज़ा मुझे भी मिलती थी।  
एक दिन देर से आने वाले छात्रों की पिटाई हो रही थी। मैं कक्षा से उचक कर देख रहा था। हैडमास्साब की नज़र मुझ पर पड़ गई। वे दौड़ते हुए आए और सीधे मेरे सिर पर हथौड़े की एक चोट की। चोट बहुत तेज तो न थी, लेकिन सिर पर एक गुठली तो बन ही गई थी। मुझे याद है कि वह मध्यांतर के बाद तक भी वह गुठली सिर पर कायम रही। एक बार की बात है। मध्यांतर हुआ। उन दिनों क्रिकेट खेल देखना रोमांचकारी अनुभव हुआ करता था। दो बड़ी कक्षाओं के सहपाठी मुझे अपने साथ मैच दिखाने ले गए। हम मैच देखने में इतना रम गए कि समय का आभास ही नहीं रहा। उन दिनों कलाई घड़ी भी आम नहीं हुआ करती थी। सूरज के ढलने और उगने के हिसाब से समय का अनुमान लगाया जाता था। दौड़-दौड़ कर स्कूल पहुँचे तो स्कूल में छुट्टी हो चुकी थी। हमारे बस्ते भीतर ही कैद हो गए थे। घर पहुँचे तो खूब डाँट पड़ी। अगले दिन स्कूल तो जाना ही था। स्कूल में पूरा दिन मुर्गा बना रहा। मध्यांतर में भी हम मुर्गा बना रहे। कमर और घुटनों में दर्द कई दिनों तक रहा। 
एक दिन हैडमास्साब नहीं थे। दूसरी अध्यापिका भी नहीं थीं। कक्षा पाँच को छोड़कर अन्य कक्षाएँ एक साथ बैठी थीं। हम छात्रों की बातचीत शोरगुल में बदल गई। फिर कलम, लंच बाॅक्स और किताबें हम एक-दूसरे पर उछालने लगे। हम टाटपट्टी में कक्षावार लाईन से बैठे हुए थे। मेरे आगे बैठे सहपाठी ने दूर बैठी किसी छात्रा के पिता का नाम लेकर उसे चिढ़ाया। छात्रा ने चिढ़कर छोटा सा पत्थर मेरे सहपाठी को निशाना बनाकर फेंका। ठीक मेरे आगे बैठा सहपाठी झुक गया। परिणामस्वरूप पत्थर मेरी बाँयी आँख के ठीक ऊपर माथे पर जा लगा। 
‘‘खून-खून!’’ मेरा सहपाठी चिल्लाया। दो-तीन बच्चे अध्यापिका को बुला लाए। मेरी आसमानी कमीज और खाकी पैण्ट में खून की बूँदे टपक-टपक कर उन्हें बदरंग बना चुकी थी। अध्यापिका आईं। अध्यापिका ने मुझे पकड़कर पानी की टंकी के नीचे खड़ा कर दिया। मेरा सिर धोया। अपने साड़ी के पल्लू से मेरा सिर पोंछा। माँ की तरह दुलारा। खून था कि रुक ही नहीं रहा था। अध्यापिका दौड़कर किसी डाॅक्टर से रुई, डिटाॅल और पट्टी ले आईं। मेरी मरहम-पट्टी की। 
मध्यांतर हुआ। अध्यापिका ने मुझे अपने घर से लाए पराँठा और मेथी-सौंप की खुशबू से भरा आम का आचार खिलाया। सब कुछ सामान्य होने के बाद सब अपनी-अपनी कक्षा में चले आए। उस छात्रा को अध्यापिका ने दूसरे कमरे में बुलाया। उसकी खूब पिटाई हुई। वह जोर-जोर से चिल्ला रही थी। रो रही थी। मुझे अजीब सा लग रहा था। पिट वो रही थी और डर मैं रहा था। घर जाकर मेरी पिटाई तय है। मैं यही सोच रहा था। लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ। घरवालों को मेरी आँख बच जाने से संतोष था। उस दिन के बाद शायद ही उस छात्रा ने मेरे साथ कभी बात की हो। लेकिन मेरे आगे बैठने वाला वह सहपाठी उस छात्रा को कई दिनों तक चिढ़ाता रहा। कहता रहा-‘‘ले। पत्थर दूँ। लगा निशाना। लगा-लगा।’’ कक्षा पाँच में पहुँचा तो हैडमास्साब का फरमान सुना-‘‘सब निब वाले पैन से ही लिखेंगे। किसी के पास डाॅट पैन होगा तो मैं उठा कर फैंक दूँगा।’’ वे ऐसा ही करते। यदि कोई डाॅटपैन से लिखता हुआ दिखाई देता तो वे सबके सामने पैन के दो टूकड़े कर दिया करते थे। 
एक दिन हैडमास्साब स्कूल में नहीं थे। हमारी कक्षा खाली थी। खाली दिमाग शैतान का घर होता ही है। किसी छात्र ने निब के पैन से स्याही छिड़क दी। मेरी कमीज पर उसके धब्बों ने विचित्र सा आकार बना दिया। मुझे गुस्सा आया। मैंने अपना पैन निकाला और जोर से छिड़क दिया। उसके धब्बे दूर तक नहीं जा पाए। तभी मेरे दूसरे सहपाठी ने अपनी हथेली में स्याही की शीशी रख ली। वह एक टाँग पर चलने लगा। शीशी प्लास्टिक की थी। वह लुढ़ककर दूसरे सहपाठी के सिर पर जाकर फैल गई। स्याही गले से कालर और फिर कमीज की यात्रा पर चल पड़ी। मैंने वह स्याही की शीशी उसके काॅलर से निकालने की कोशिश की ही थी कि हैडमास्साब आ गए। 
बस फिर क्या था। उन्होंने आव न देखा ताव और मुझ पर बरस पड़े। सिर पर, गले में,  गालों में, कानों पर चटाचट थप्पड़ों की बारिश से मैं अपने घुटनों पर जाकर सिमट गया। तभी स्याही से भीगा छात्र बोला-‘‘सरजी। ये नहीं, वो था।’’
हैडमास्साब का हाथ हवा में ही रुक गया। जो होना था, वो तो हो चुका था। मैं पीटा जा चुका था। हैडमास्साब के होंठो के किनारों पर सफेद थूक जम चुका था। उनकी सांसें जोर-जोर से बाहर आने का आतुर थी। बड़ी-बड़ी आँखें लिए वह कक्षा से बाहर निकल गए। फिर बेंत लेकर आए। पहाड़ा पूछने के बहाने से फिर उस दिन समूची कक्षा न जाने कितनी बार पिटी। मैं फिर पीटा गया। कक्षा छह के लिए मुझे दूसरे स्कूल में भर्ती कराया गया। यहाँ आकर जैसे हम एक ही दिन में बहुत बड़े हो गए थे। हमें बैठने के लिए स्टूल और डैस्क जो मिले थे। हिन्दी पढ़ाने के लिए एक नई अध्यापिका आईं। वे जैसे ही श्यामपट्ट पर लिखने के लिए चाॅक घुमाती, सहपाठी हूहूहूहू की आवाजें़ निकालते। मैडम झट से छात्रों की ओर मुड़ती, ताकि हूहूहूहू करने वाले को पहचाना जा सके। ये रोज की बात होती। तब बगल की कक्षा के गुरुजी आते और सबको डाँट पड़ती। तब जाकर कुछ देर पढ़ाई शुरू होती। 
एक दिन मैडम ने पढ़ाया। अब श्यामपट्ट पर लिखाने की बारी थी। वे जैसे ही श्यामपट्ट की ओर बढ़ी। सहपाठी चिल्लाए। तभी मेरे दाँयी ओर बैठे सहपाठी ने अपने बाँए हाथ के अँगूठे और तर्जनी से मेरी दाँयी जाँघ पर तीव्रता से चूँटी काटी। मैं उठकर चीखा। मैडम ने समझा मैं भी हूहूहूहू करने वालों में शामिल हूँ। वो तेजी से मेरी ओर बढ़ी। मैडम के हाथ में डॅस्टर था। वही डस्टर मेरे सिर पर दे मारा। मैंने प्रहार वाली जगह पर दोनों हथेलियाँ रखी और सीट पर झुक गया। ‘धम्म। धम्म।’ तीन-चार मुक्के मेरी पीठ पर जा पड़े। गुस्से में तमतमाई मैडम सीधे स्टाॅफ रूम में चली गई। ऐसे कई किस्से हैं, जब मैं अकारण भी पीटा गया। 
दो-दो साल बड़े दो भाई के बाद में तीसरा था। मेरी छोटी बहिन मुझसे दो साल छोटी थी। मुझ पर दो भाईयों की निगाहें हमेशा रहती थीं। मेरी निगाह अपनी छोटी बहिन पर रहती थीं। यही कारण था कि पढ़ना भले ही अरुचिकर रहा हो, पढ़ने स्कूल जाना मजबूरी थी। अन्यथा मेरा वश चलता तो मैं भी औरों की तरह स्कूल जाते समय किसी पेड़ या झाड़ी में जा छिपता और छुट्टी के समय घर लौटता। मेरा वश चलता तो मैं भी कभी पेट दर्द, तो कभी दाँत दर्द का बहाना बनाता। मेरा वश चलता तो बीच-बीच में स्कूूल से बंक मार लिया करता। 
यह सब तो हो नहीं सका। लेकिन हर रोज स्कूल जाते समय यह डर तो बना रहता था कि कहीं आज स्कूल में पिटाई न हो जाए। पिटाई से बचने के लिए हर वादन में सतर्क रहना बेहद कठिन काम था। यह सब कारण स्कूल में बेमज़ा के परिणाम ही तो थे। काश ! स्कूल आनंददायी होते। आज भी अपवादस्वरूप स्कूल सज़ा देने के स्थल हैं। अधिकतर मामलों में ऐसी सज़ाएँ उसे दी जाती है, जो उन सजाओं को पाने के लिए ज़िम्मेदार ही नहीं होता। ऐसी सजा जो किसी एक को मिलनी थी, समूची कक्षा को मिलती है। ऐसी सज़ा जो बेहद सूक्ष्म हो सकती थी, लेकिन वृहद रूप में मिलती है। अपवादस्वरूप आज भी पूरी दुनिया में स्कूल ही ऐसा केन्द्र है, जहाँ दुनिया के समूचे अभिभावकों के संभवतः नब्बे फीसद बच्चे पढ़ते हैं। अभिभावक की नज़र में आज भी स्कूल उनकी आस्था का केन्द्र हैं। उन्हें लगता है कि उनका पाल्य स्कूल में घर के बाद सबसे ज्यादा सहज और सुरक्षित है। उन्हें लगता है कि उनका पाल्य बहुत कुछ स्कूल में ही सीख सकता है। लेकिन अधिकतर स्कूल आज भी स्कूल को सज़ा देने के भयावह केन्द्र के रूप में पाल-पोस रहे हैं। कुण्ठा पाल लेना सीखने का केन्द्र है। अत्याचार को चुपचाप सहन करने का अभ्यास केन्द्र है। चुप्पी साध लेने का प्रशिक्षण स्कूलों में ही दिया जाता है। आत्मकेन्द्रित हो जाने का घोल यहीं पिलाया जाता है। तमाम खतरे पाल्यों के मन-मस्तिष्क में जाने-अनजाने में ही सही स्कूल से ही प्रवेश कर लेते हैं। यह तमाम अमिट निशान फिर जिन्दगी भर शरीर का, मन का और स्वभाव का साथ देते हैं। अपने अनुभवों के आधार पर तो अब मैं यही कहूँगा कि विद्यालय में छात्रों को किसी भी प्रकार सजा नहीं दी जानी चाहिए। सजा को पहले विकल्प में तो कतई नहीं लिया जाना चाहिए। यह अन्तिम विकल्प भी नहीं है। न जाने कितने बालमन सज़ा पाने के बाद कभी जीवन के विद्यालय में सफल न हुए होंगे। सज़ा कभी सफलता का मार्ग नहीं सुझाती। उलट कई ग्रन्थियाँ बनाने को बाध्य करती है।
मुझे मेरे स्कूली जीवन में जब-जब सजा मिली। जिस प्रकार की भी सजा मिली। भले ही मैं गलती पर था। जब मैं गलती पर नहीं था, तब भी। मैं घण्टों मिली जा चुकी,भुगती जा चुकी सजा के बारे में सोचता रहता था। कई-कई दिनों तक वह समूचा चित्र मेरी आँखों के सामने घूमता रहता था। सजा का वाकया बार-बार सोचकर मैं म नही मन कुढ़ता था। खुद पर खीजता था। मेरा बहुत अनमोल समय जाया हुआ होगा। मैं आज जो कुछ हूँ, उससे इतर मैं जो कुछ हो सकता था, उसके पीछे स्कूल में मिली सजा ही जिम्मेदार है। काश ! प्रत्येक स्कूल के एक-एक कक्षा कक्ष में अत्याधुनिक कैमरे लग जाएँ। प्रत्येक स्कूल की एक-एक गतिविधि सार्वजनिक होनी चाहिए। ताकि दुनिया का कोई भी शिक्षक जानबूझकर या अनजाने में बालमन के कोमल मन-मस्तिष्क को ठेस न पहुँचाए। 
सोचता हूँ यदि दुनिया का हर स्कूल जाने वाला बच्चा हड़ताल कर दे तो क्या होगा? दुनिया का हर स्कूल जाने वाला छात्र हमेशा के लिए स्कूल की ओर पीठ कर ले तो क्या होगा? दुनिया जीते-जी मर जाएगी। सोचता हूँ कि स्कूल में मिलने वाली सजा ने न जाने कितने बचपन की परोक्ष रूप से हत्या कर दी होगी। संभवतः कहीं भी, किसी के पास स्कूल में मिलने वाली सजा के परिणामों का लेखा-जोखा नहीं है। 
विद्यालय तमाम सज़ाओं का पोषण केन्द्र है। लेकिन विद्यालय का कोई विकल्प नहीं है। आज भी विद्यालय में बच्चे समूह में सीखते हैं। भिन्न परिवार, पड़ोस और स्थलों के भिन्न-भिन्न बच्चों के बीच रहकर ही तो एक छात्र संघर्ष करता है। सीखता है। समझता है। सहभागिता, सहयोग, प्रेम, सहिष्णुता, भाईचारा आदि यहीं तो सीखता है। यही कारण है कि आज भी एक-एक विद्यालय चाहे वह कैसा भी है। कहीं भी है। भले ही वह मज़ा का केन्द्र नहीं बन पाया है, लेकिन एक-एक स्कूल की मौन बरसों से खड़ी दीवारें यही तो कहती हैं-‘‘कुछ बात तो है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।’’ ॰॰॰ 

लेखक परिचय: मनोहर चमोली ‘मनु’: ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ और ‘पूछेरी’ पुस्तकें नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुई हैं। ‘चाँद का स्वेटर’ और ‘बादल क्यों बरसता है?’ पुस्तके रूम टू रीड से प्रकाशित हुई हैं। बाल कहानियों का संग्रह ‘अन्तरिक्ष से आगे बचपन’ उत्तराखण्ड बालसाहित्य संस्थान से पुरस्कृत। बाल साहित्य में वर्ष 2011 का पं॰प्रताप नारायण मिश्र सम्मान मिल चुका है। बाल कहानियों का दूसरा संग्रह ‘जीवन में बचपन’ प्रकाशनाधीन है। बाल कहानियों की पच्चीस से अधिक पुस्तकें मराठी में अनुदित होकर प्रकाशित। उत्तराखण्ड में कहानी ‘फूलों वाले बाबा’ कक्षा पाँच की पाठ्य पुस्तक ‘बुराँश’ में शामिल। उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में भाषा के शिक्षक हैं। सम्पर्क: भितांई, पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल.246001.उत्तराखण्ड. मोबाइलः09412158688. 

26/09/2017

नंदन: अक्तूबर 2017. childeren litrature,nandan

 ‘टाॅफी के बदले'

-मनोहर चमोली ‘मनु’

स्कूल के बांई ओर एक ही दुकान थी। माही ही इस ‘माही कार्नर‘ दुकान पर बैठा करते थे। बच्चों को जरूरत की चीज़ें ‘माही कार्नर‘ में मिल जाया करती थीं। एक दिन हिया ने एक रबर मांगा तो माही ने रबर के साथ एक टाॅफी दे दी। हिया चैंकी-‘‘ये टाॅफी!‘‘ माही ने हंसते हुए कहा-‘‘एक रुपया जो नहीं है।’’ हिया ने कहा-‘‘लेकिन मुझे टाॅफी नहीं चाहिए।’’ माही ने मुंह बनाया-‘‘तो चार रुपए खुले दो न।’’ हिया ने रबर और टाॅफी उठाई और अपनी क्लास में आ गई।


एक दिन फिर ऐसा ही कुछ हुआ। हिया ने दस रुपए दिए। माही ने एक पेंसिल, एक रबर और एक कटर दिया। दो टाॅफिया भी दे दीं। हिया ने कहा-‘‘माही अंकल, मुझे टाॅफी नहीं चाहिए।’’ माही ने चिढ़ाते हुए कहा-‘‘दो रुपए खुले नहीं हैं।‘‘ हिया ने सामान लौटाते हुए कहा-‘‘आप हमेशा बचे रुपयों के बदले टाॅफी दे देते हो।’’ माही ने डांटते हुए कहा-‘‘तुम्हें सामान लेना है कि नहीं? ये लो अपना दस रुपया। मुझे आठ रुपए दो।’’ हिया सोच में पड़ गई। फिर चुपचाप सामान के साथ टाॅफियां उठाईं और स्कूल चली आई। 

एक दिन की बात है। इंटरवल था। सब अपना टिफिन खोल ही रहे थे। तभी स्टालिना गुस्से में अंदर आई। बोली-‘‘दो रुपए का चूरन चाहिए था। चूरन के लिए पांच रुपए खर्च करने पड़े। ये देखो, तीन रुपए की टाॅफियां। माही अंकल बचे रुपए नहीं देते। टाॅफियां पकड़ा देते हैं।’’ बातों ही बातों में हिया ने भी पुराने किस्से सुनाए। फिर तो एक के बाद एक कई सहपाठियों ने ऐसा ही कुछ बताया। हिया ने सबको पास बुलाया। खुसर-पुसर हुई। फिर सब जोर से हंसने लगे। सबने खाना खाया और मैदान में खेलने चले गए।


कई दिन बीत गए। फिर एक दिन निपुण, अनवर, स्टालिना, जाकिर, धनजीत, इसरत, दक्ष, गोकरण और ताहिरा माही की दुकान पर आ पहुंचे। हिया के हाथों में एक डिब्बा था। वह टाॅफियों से भरा हुआ था। हिया ने काउंटर पर टाॅफिया बिखेर दीं। माही ने चैंकते हुए पूछा-‘‘ये क्या है?’’ हिया ने कहा-‘‘टाॅफिया हैं।’’ धनजीत ने बताया-‘‘माही अंकल, गिन लो। पूरी एक सौ बीस हैं।’’ अब इसरत बोली-‘‘इनके बदले में एक सौ बीस रुपए दे दीजिए।’’ निपुण ने कहा-‘‘माही अंकल, ये टाॅफियां आपने ही हमें दी हैं। बस, हमने इन्हें खाया नहीं है। इकट्ठा करते रहे। अब आपको लौटाने आए हैं।’’ जाकिर ने कहा-‘‘हम बता सकते हैं कि हमने कब-कब आपसे क्या-क्या खरीदा है। हम बता सकते हैं कि बचे रुपयों के बदले आपने कब-कब किसे कितनी टाॅफिया दीं हैं।’’ 

गोकरण ने नोटबुक दिखाते हुए कहा-‘‘ये देखो। हमने एक-एक टाॅफी का हिसाब लिखा हुआ है।’’ यह सुनकर माही चैंक पड़ा। फिर तुरंत जैसे नींद खुली हो। चीखते हुए कहा-‘‘निकलो यहां से। बिका हुआ माल वापिस नहीं होता।’’

बच्चे शोर मचाने लगे। प्रिंसिपल सामने से आ रही थीं। स्कूली बच्चों को देखकर प्रिंसिपल भी दुकान में आ गईं। हिया ने सारा किस्सा बताया। माही ने प्रिंसिपल से कहा-‘‘ऐसे थोड़े न होता है। मैं ये बिकी हुईं टाॅफिया वापिस नहीं ले सकता।’’ हिया ने कहा-‘‘माही अंकल, हमने आपसे कभी टाॅफियां नहीं खरीदीं। आपने हमें दीं। वो भी हमारे बचे हुए रुपयों के बदले दीं हैं।‘‘ 

प्रिंसिपल हंसते हुए हिया से बोलीं-‘‘चलो कोई बात नहीं। मैं तुम्हें एक सौ बीस रुपए दे देती हूं। तुम ये टाॅफियां क्लास में बांट देना। आगे से तुम सब उस दुकान से ही सामान खरीदना, जो बकाया रुपए वापिस करती हो। मैं सभी क्लास टीचर्स से कहूंगी कि वे यह बात सब बच्चों को बता दें। अब यहां से चलो।’’ यह सुनकर माही ने कहा-‘‘नहीं, मैडम। ऐसा मत करिए। मैं सारी टाॅफिया वापिस ले लेता हूं। लेकिन, मैं एक-दो रुपए कहां से लाऊं? मुझे भी तो खुले पैसे चाहिए। मेरे बारे में भी तो सोचिए।’’

प्रिंसिपल सोचते हुए बोलीं-‘‘हम महीने की पन्द्रह तारीख को फीस लेते हैं। बहुत सारी रेजगारी इकट्ठा हो जाती है। मैं सभी टीचर्स को कह दूंगी। वे आपको हर महीने खुले रुपए दे दिया करेंगे। वैसे सवाल नियत का है। समस्या है तो समाधान भी होता है। आपको समझना चाहिए कि इन बच्चों ने आपको समझाने के लिए धीरज से काम लिया है। आपको इनकी योजना से समझ लेना चाहिए कि बच्चे भी सही-गलत में अंतर कर लेते हैं।’’ यह सुनकर माही ने सिर झुका लिया। 

एक सौ बीस रुपए लेकर बच्चे स्कूल आ गए। इंटरवल हुआ। बच्चों ने गोकरण की नोटबुक से मिलान किया। रुपए बांटने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। ॰॰॰
नंदन: अक्तूबर 2017.

-मनोहर चमोली ‘मनु’, गुरु भवन, निकट डिप्टी धारा, पोस्ट बाॅक्स-23, पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड। सम्पर्कः 9412158688.7579111144

17/07/2017

बाल प्रहरी balprahri child magzine

बाल पत्रिका: ‘बाल प्रहरी’ के बहाने
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    -manohar chamoli 'manu'

बच्चों की त्रैमासिक पत्रिका बाल प्रहरी जल्दी ही अपने प्रकाशन के पन्द्रहवें साल पूरे कर रही है। सबसे पहले संपादक सहित इस पत्रिका से जुड़े रचनाकारों और बच्चों को बधाई देनी आवश्यक है। यह सोचने पर ही मन रोमांचित होता है कि जब इस पत्रिका का प्रवेशांक निकला होगा तब आठ साला बच्चें आज भारत के नागरिक हो चुके होंगे। यानि उन्हांेने पहला मत देने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त कर लिया होगा।

    अब यह तो शोध का विषय हो सकता है कि प्रवेशांक से लेकर अब तक प्रकाशित बाल प्रहरी की रचना सामग्री ने कितने बच्चों की जीवन धारा ही बदल दी होगी। या यह भी कि यदि वे बच्चे बाल प्रहरी न पढ़ते तो क्या उनके समग्र व्यक्तित्व के निर्माण की स्थिति कुछ ओर न होती? यह भी संभव है कि बाल प्रहरी में लिखते-लिखते कुछ बच्चे अब काॅलेज की पत्रिका और पत्र-पत्रिकाओं में भी लिख रहे होंगे।


   मैं याद करता हूं तो पाता हूं कि मेरे पास कमोबेश बाल प्रहरी का प्रत्येक अंक संग्रहीत होगा। कुछ दिनों से मैं लगातार इस पत्रिका के बारे में सोच रहा था। मेरे मन-मस्तिष्क में बाल प्रहरी को लेकर कुछ खूबियां कौंध रही हैं। सबसे पहले तो मैं उन्हें बांटना चाहूंगा।
  •     एक तो पिछले 11 वर्षों में बाल प्रहरी ने फौरी तौर पर बच्चों की दुनिया को समझने वाले रचनाकारों को एक मंच दिया है। ऐसा मंच जो बगैर किसी धड़े और लाग लपेट के सहजता से हर किसी को अपनाता है।


ऽ   यह भी कि शायद ही किसी बाल रचनाकार को और रचनाकार को बाल प्रहरी ने निराश किया होगा। नवीनतम अंक में नहीं तो आगामी अंकों में रचना छप जाने के प्रति हर रचनाकार आश्वस्त सा रहता ही है।

ऽ    हर अंक में लगभग 100 रचनाकारों (बच्चों भी रचनाकार हैं।) को पत्रिका में स्थान मिलता है। विभिन्न प्रतियोगिताओं से पढ़ाकू बच्चे और उनके अभिभावक जुड़ते हैं। बड़े अपने मित्रों को बतातें फिरते होंगे कि हमारी रचना बालप्रहरी में छपी है और बच्चों के अभिभावक फूल न समाते होंगे कि उनके बच्चे पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे है।

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अब मैं आता हूं बाल प्रहरी पिछले दस सालों में यदि कुछ कड़े नियम अपनाती। कुछ ठोस मानदण्ड बनाती। पत्रिका को एक खास स्थान देने के लिए लीक से हटकर प्रकाशन की योजना पर काम करती तो कुछ विशिष्ट स्थान पत्रिका का बन जाता।

रचनाकारों से-
______________खुद को शामिल करते हुए और खुद भी अपने पर लागू करना चाहूंगा। बालप्रहरी को टटोलते हुए पाया कि अक्सर इसको भेजी गई रचना या तो छपी-छपाई होती है या फिर जिसकी कहीं कोई उम्मीद न छपने की हो, उसे हम लोग बाल प्रहरी में भेजते हैं? ऐसा क्यों? ऐसा भी नहीं है कि छपी-छपाई सामग्री को नहीं भेजा जाना चाहिए।  लेकिन पता नहीं क्यों? मुझे अधिकतर अंकों में रचनाएं लचर लगीं। अब संपादक जी ने तो इसलिए छाप दी कि कहीं मनोहर बुरा न मान जाए। एक तो तीन महीनें तक इंतजार करो और भी अंक में स्थान न मिले।

ऽ    मैं मानता हूं कि हर पत्रिका संपादक के बिना भी छप सकती है। जैसे भी छपेगी पर छपेगी। लेकिन कोई भी पत्रिका बिना रचनाकारों ने नहीं छप सकती। एक सामान्य पत्रिका है। वह अपने यहां तैनात कार्मिकों से ही रचनाएं तैयार कर लेते है। इंटरनेट से काफी पेस्ट कर लेते हैं। छप रही है। बिक रही है। लेकिन स्तर लगातार घट रहा है। हम भले ही बाल प्रहरी को साल में एक रचना भेजे। लेकिन वह ऐसी हो जिसे हम स्वयं भी दमदार, असरदार और भरपूर प्यार करते हों।

ऽ    मैं नीचे कुछ रचनाओं का उल्लेख बगैर उस रचनाकार का नाम लिए बिना करना चाहूंगा, जो मुझे एक पाठक के तौर पर भी और बच्चों के लिहाज से भी लचर और कम प्रभावशाली लगी। मैं फिर दोहराना चाहूंगा कि यह आलेख मेरा निजी है। नितांत अपने अनुभव के आधार पर है। इसका मकसद किसी को आहत करना भी नहीं है। हां मैं इतना चाहता हूं कि यह पत्रिका 11 के बाद 21 फिर 31 ही नहीं 111 वे वर्ष में भी प्रवेश करे। सो मेरे मन की बात को सकारात्मक दृष्टिकोण से लेंगे तो मुझे भी प्रसन्नता होगी।

ऽ    बहुत से रचनाकार अभी भी पशु-पक्षियों की कहानियों में ही अटके पड़े हैं। मैं भी अभी तक पशु-पक्षियों पर आधारित कहानियां लिखने के फारमेट से खुद को मुक्त नहीं कर पा रहा हूं। इसे जितना जल्दी हो सके हमें बदल देना चाहिए। हां। इसका मतलब यह नहीं कि पशु -पक्षियों की कथाएं ही न लिखी जाएं । लेकिन आशय मात्र इतना है कि या तो उनकी मूलतः जो आदतें और व्यवहार हैं जो वे कर सकते हैं। उस पर आधारित हों तो चलेगा। मैं अपनी बात कहता हूं। मेरा साढ़े तीन साल का बेटा एक दिन मेरे द्वारा सुनाई जा रही कहानी पर बीच में ही मुझे टोकता है और कहता है कि पेड़ बोलते कहां हैं। उसने कैसे चिड़िया के थप्पड़ मार दिया। मैं अवाक्। हां बंदर और चिड़िया वाली एक कथा है। जिसमें बंदर बाद में चिड़िया का घोंसला तोड़ देता है। भले ही उन दोनां में कथाकार ने संवाद दिखाए है लेकिन बंदर ऐसा कर सकता है वह चिड़िया का घांेसला तोड़ सकता है। मैं यह भी नहीं कहता कि अमूर्त चीज़ों में मानवीकरण नहीं किया जा सकता। लेकिन तभी जब दूसरा कोई विकल्प नहीं हो। ऐसा करना जरूरी हो। हर कथा को अति काल्पनिकता की चादर से क्यों कर ढका जाए?

ऽ    बाल पत्रिका में बहुत सारा घाल-मेल दिखाई पड़ता है। हो सकता है यह मात्र मेरी दृष्टि हो। कई पाठकों को यह बहुत पसंद आ सकती है। मैं खुद भी कहता हूं कि शायद ही कोई दूसरी पत्रिका होगी जो बच्चों के लिए और बच्चों को इतना सारा स्थान देती हो। मैं आंचलिकता का पक्षधर हूं। लेकिन इस पत्रिका में आंचलिकता को भी बच्चों के स्थाई स्तंभ में शामिल किया जा सकता है। मैं तो यह कहूंगा कि बच्चों के लिए यानि जिन 10 या 12 जो भी तय हो, उनके रचनाकार बच्चे ही हों। वह पत्रिका के आरंभिक एक चैथाई पेज हो सकते हैं। मध्य के हो सकते हैं। या फिर अंत के हो सकते हैं। एक चैथाई हिस्से से इतर सारे पेजों पर सामग्री बच्चों के लिए हो लेकिन उसे बड़े तैयार करें। इससे जो यह कहते हैं कि बालप्रहरी अभी तक अपनी दिशा भी तय नहीं कर पाई है, उनका मुंह बंद हो जाएगा। वे दस या बारह पेज जिनमें बच्चों की लिखी रचनाएं,पेंटिंग आदि होंगी, उनसे साफ झलकेगा कि बच्चे कैसा लिख रहे हैं। क्या लिख रहे हैं। बच्चों की रचनात्मकता, प्रतिस्पर्धा, सृजनात्मकता, साहस आदि सब कुछ यहां आ जाए।

ऽ    समग्रता के साथ देखें तो बाल प्रहरी में लगभग 30 पेजों में गुणवत्तापरक,मननीय,अथपूर्ण रचना सामग्री को स्थान दिया जा सकता है। लेखों का प्रतिशत कम किया जाना चाहिए। आखिर यह बाल पत्रिका बच्चे क्यों पढ़ें? यह सोचना होगा। क्या हम इसे भी ज्ञान की पत्रिका बनाना चाहते हैं? सूचनात्मक जानकारी देना पत्रिका का मकसद है? क्या पाठ्य पुस्तकें और अंतरजाल सूचनाओं और ज्ञान का खज़ाना नहीं रह गई हैं? क्या बाल पत्रिका भी बच्चों में एक ओर ऐसी सामग्री परोस कर देने वाली पत्रिका बन रही है, जिसे बच्चे अपनी स्कूूली शिक्षा का हिस्सा समझे?


 ऽ  कुछ पत्रिकाएं रचना सामग्री की प्रासंगिकता पर बहुत ध्यान देती हैं। उनका अधिकतर ध्यान इस बात पर रहता है कि किस तरह की सामग्री को कितना स्थान देना है। वह रचनाओं के उनके रचनाकार के कद से कभी नहीं छापते। वह अप्रासंगिक विषयों पर आई रचनाएं चाहे कितने बड़े लेखक ने भेजी हो, नहीं छापते तो नहीं छापते। 

ऽ  आज जरूरत इस बात की है कि अपरिहार्य स्थिति को छोड़कर आम तौर पर भाग्यवादी रचनाएं जो भाग्य को स्वीकार करती हैं, उन्हें हतोत्साहित किया जाए। राजा-रानी का आधार मानकर बुनी रचनाओं को अधिकतर हतोत्साहित किया जाए, बशर्ते कहानी में राजा-रानी को पात्र न बनाया जाए तो कहानी कहानी नहीं होगी। इसी तरह भूत,प्रेत,चुड़ैल,डायन आदि को अधिक स्पेश देती हुई कहानियों को अब हतोत्साहित किए जाने की महती आवश्यकता है। आखिर हम क्यों कर नहीं सीधे बच्चों की दुनिया से ही पात्र उठाएं। बच्चो की वास्तविक दुनिया के इर्द-गिर्द कथावस्तु रखें।

ऽ  मैं मानता हूं कि जब भले ही पत्रिका अव्यावसायिक नहीं है, तो क्या हुआ? मुनाफा नहीं कमाया जा रहा है, बाकी सभी श्रम तो पत्रिका में लग ही रहा है। वह भी पाठक तक पहुंचने से पहले उतनी उर्जा खर्च करवा रही है जितना कोई प्रतिष्ठित या व्यावसायिक पत्रिका। तब क्यों नहीं आवरण से लेकर कागज और छपाई तक की गुणवत्ता को ध्यान में रखा जाए।

 ऽ  बाल प्रहरी को लें तो फोन्ट तो अच्छा है लेकिन शायद यह बोल्ड किया हुआ है। या वह बुनावट में मोटा है। हां फोन्ट का आकार सही है। पाठक इसके आवरण पर अब अत्याधुनिकता का असर देखना जरूर चाहेंगे। 


ऽ  मेरी तरह यदि आप भी कुछ अंकों पर सरसरी निगाह डालेंगे तो संभव है आप भी मेरी कुछ बातों से सहमत होंगे। मसलन जुलाई-सितम्बर 2009 का अंक देंखे तो पाते हैं कि इसमें कुल 12 कहानियांे को और 21 कविताओं को और 05 लेखों को स्थान मिला है। जैसा पहले भी कहा गया है कि आवरण सहित 52 पृष्ठों में यह विधाएं ही अधिकतर अंकों में स्थान पाती हैं। डायरी,संस्मरण,बाल नाटक,रिपोर्ताज,यात्रा संस्मरण(बच्चों द्वारा लिखित) को भी खूब जगह दी जा सकती है। इसी तरह जनवरी-मार्च 2008 के अंक में 09 कहानियां,19 कविताएं,06 लेख प्रकाशित हुए हैं। अप्रैल-जून 2012 के अंक में 10 कहानियां,23 कविताएं और 08 लेख प्रकाशित हुए हैं। जनवरी-मार्च 2013 के अंक में 09 कहानियां, 28 कविताएं और 05 लेख प्रकाशित हुए हैं। जुलाई-सितम्बर 2014 के लेख में 8 कहानियां, 24 कविताएं और 11 लेख छपे हैं। इसी तरह अक्तूबर-दिसम्बर 2014 के अंक में 07 कहानियां, 21 कविताएं और 15 लेख प्रकाशित हुए हैं।

आंकड़ों के हिसाब से यह रचनाकारों को स्थान देने के मामले में रोचक है। लेकिन यह सभी रचनाएं क्या बच्चों के लिहाज से और विधा के हिसाब से गुणवत्तापरक है? क्या अधिकतर पाठकों के मन में पैठ बनाने के लिए मुफीद हैं? मुझे नहीं लगता कि संपादक जी को यदि कोई रचना बतौर संपादक अच्छी नहीं लगी और बालमन के अनुसार भी जमी नहीं तो वह कड़ा निर्णय लेकर उसे प्रकाशनार्थ अस्वीकृत कर देते होंगे। जनसहयोग से प्रकाशित और सबको जोड़कर साथ ले चलने की भावना के तहत ऐसा करना मुश्किल होता होगा। लेकिन कल जब बालप्रहरी का मूल्यांकन होगा। होना ही है, तब पत्रिका किस तरह से निकल रही है? कैसे निकल रही है? यह बातें गौण हो जाएंगी और पत्रिका में छपी रचनाओं के आलोक में पत्रिका की रेटिंग होगी।


मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि अच्छी रचना क्या होती है और बुरी रचना क्या होती है? लेकिन नए भाव-बोध-सौन्दर्य तथा बच्चों की दुनिया से जुड़ी रचना भला किसे पसंद न आएगी? मुझे लगता है कि बाल प्रहरी के साथ-साथ अधिकतर पत्रिकाओं में आज भी चालीस साल से चले आ रहे प्रतीकों,शीर्षकों यहा तक कि रचनाओं में निहित कथ्य-भाव भी बार-बार पुराने संदर्भों के साथ चले आ रहे हैं। पिसे हुए आटे को फिर से पीसने की परंपरा चली आ रही लगती है जैसे।


ऽ  अब चाहे कुछ भी हो, बाल प्रहरी को दीर्घायु बने रहने के लिए वह भी इस तरह का जीवन की पाठक बेसब्री से प्रतीक्षा करें, के लिए कुछ कड़े निर्णय लेने ही पड़ेंगे। मानता हूं और जानता भी हूं कि यह मुश्किल काम होगा,पर असंभव नहीं।ऽ वे निणर्य निम्नवत हो सकते हैं। यह सुझावात्मक निर्णय सभी के हित में होंगे।

मसलन-

S अब देखिए समय बदल गया है। अब जब ग्रीटींग कार्ड की जगह एस.एम.एस आ गए हैं। नव वर्ष हो या उपहार का समय या बर्थडे। अब बने बनाए बाज़ारी उपकरण हावी हैं। हाथ से बनाने ग्रीटींग कार्ड पर बात करना हास्यास्पद है। यदि यह कौशल है तो भी आज के बच्चे इसे क्यों कर सीखेंगे। एक उदाहरण देता हूं। मैं अपने बच्चों के लिए लट्टू खोज रहा था। हाथ से घुमाने वाले और डोर वाले घूमर भी। लेकिन नहीं मिले। वे तो संपादक,कवि एवं संस्कृतिकर्मी का श्री राजेश उत्साही जी का भला हो। जिन्होंने ठेठ उदयपुर से वो भी किसी साथी की मदद से पहले जुटाए फिर मुझे कोरियर से भेजे। इस समूची प्रक्रिया में दो माह गुजर गए। प्रासंगिकता बनी हुई है तब भी यह देखना होगा कि कितना स्पेस देना है। यदि सामग्री देना जरूरी ही है।

ऽ    भारत की अर्थव्यवस्था पर आलेख बाल प्रहरी में। फिर वही बात कि आखिर पत्रिका का मकसद क्या है। क्या किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कराना या कोर्स में सहायता करना बालप्रहरी का मकसद है। आंशिक है भी तो कितना स्पेस देना है। एक अंक में ऐसे बोझिल,नीरस,उबाऊ और आनंद से इतर के आलेख कितने देने हैं, क्यों देने है? प्रस्तुति कैसे होगी। भाषा भी तो बालमन के अनुरूप हो !

ऽ    वर्ग पहेली क्यो? यदि जरूरी है तो बच्चों की उम्र, उनकी रुचियों के अनुरूप तो हो। किसी पाठक,प्रशंसक ने बनाई हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इतनी कठिन हो कि दस फीसद बच्चे भी उसे हल न करे। हम सब जानते हैं कि पत्रिकाओं की प्रतियोगिताओं में कुल बच्चे कितना सहभाग करते हैं। क्या कोई ऐसा आंकड़ा है जिससे पता चल सके कि इन पत्रिकाओं में दी जाने वाली प्रतियोगिता में सर्कुलेशन के स्तर पर हर क्षेत्र के बच्चे रुचि लेते हैं? शायद नहीं। यदि इनका प्रतिशत बेहद कम है तो ऐसी प्रतियोगिताओं का कोई तुक नहीं। या फिर बालमन के विषय से जुड़ी माथापच्ची हो।

ऽ    बाल प्रहरी समाचार को ही ले लें। चार पेज पर यह छपता है। लेकिन बच्चों से अधिक बड़ों को इनमें स्थान है। बाल सहित्य समाचार हैं,बाल साहित्यकार समाचार हैं, बालमन से जुड़े समाचार हैं, यह तय करना होगा।

ऽ    व्यक्तित्व,जीवन परिचय भी लीक पर चल रहे हैं। कितना अच्छा हो कि यह बालमन और बचपन पर केंद्रित हो। हम बच्चों से ही यह अपेक्षा क्यों करते हैं कि वह महात्मा गांधी जैसा बनंे। टेरेसा बने। यदि ऐसा होता तो दूसरा गांधी और दूसरी टेरेसा या लता तो कोई नहीं बना। फिर इस तरह की सामग्री क्या बच्चों पर एक तरह से अत्याचार नहीं है? कोई राष्ट्रपति बना, कोई प्रधानमंत्री बना है तो कोई न्यायाधीश बना है, तो उससे बच्चों को क्या लेना देना? हम क्यों बच्चों को समय से पहले बड़ा बनाने पर तुले हुए हैं। वह जो बनेगा उसे उस पर छोड़ दो। या फिर किशोर तो हो जाने दो।

ऽ    मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि कितना भी संपन्न परिवार हो। कितने ही जागरुक परिवार हों। अभिभावक हों। हम साल में कितनी बार सैर-सपाटा करते हैं। अरे। अपना गांव,कस्बा,नगर और शहर तो ठीक से देखा-जाना नहीं। चले हैं साहब बच्चों को दुनिया की सैर कराने। दर्शनीय स्थलों की जानकारी देंगे। भला क्यों? यदि देनी है तो फिर ऐसी दी जाए कि जिसमें बच्चों को मज़ा आए। आज भी बच्चे ज़ू-चिड़ियाघर देखना पसंद करते हैं। दूसरी ओर तो मुझसे एक बच्चे ने कहा कि चिड़ियाघर तो जानवरों पर अत्याचार है। इन्हें यहां कैद किया हुआ है। मुझे फिर वन्य जीव,विलुप्तता, बढ़ती शहरी आबादी पर उसे लेक्चर देना पड़ा। फिर भी मैं जानता हूं कि उसे अपने सवाल का ठीक से जवाब नहीं मिला। गूगल सब उपलब्ध कराता है। बच्चे बखूबी स्मार्ट फोन यूज़ कर लेते हैं। हमारी पाठ्यपुस्तकें यही काम कर रही हैं। सूचनाओं और जानकारियों का अभाव पहले ही नहीं है। फिर पत्रिका भी यही काम करे तो बेचारे बच्चे अपना सिर न पीट लें।

ऽ    मोबाइल टाॅर है खतरनाक। यह जानकारी दी गई है। लेकिन इसका बच्चों से क्या लेना देना? मोबाइल टाॅवर न तो बच्चे लगा रहे हैं न ही बच्चों के घरों पर लग रहे है। बच्चों के साथ साथ सभी के लिए मोबाइल जरूरी हैं। लेकिन क्या बच्चे मोबाइल टाॅवर न लगने के लिए आंदोलन करेंगे? आखिर इस लेख की यहां क्या आवश्यकता है?


  •  जुलाई-सितम्बर 2014 का अंक पढ़ा। संपादकीय में लिखा गया है कि ‘पिछले 10 सालों में सबसे अधिक सहयोग नन्हे दोस्तों का मिला है।’ यह बात महत्वपूर्ण है। तो क्यों न बाल प्रहरी में बच्चों की लिखी सामग्री (यदि बाल साहित्यविशेषज्ञ यह कहते हैं कि अक्सर बच्चों की लिखी सामग्री में साहित्यिक विधाओ का पुट नहीं होता।) से अधिक बच्चों के लिए उपयोगी सामग्री की अधिकता हो?ऽ इसी अंक में जयप्रकाश भारती जी के बारे में दिया गया है। यही नहीं उनकी कुछ कविताएं भी दी गई हैं। यह अच्छी बात है। इधर कई अन्य पत्रिकाओं में पत्रों में भी देखता हूं कि दिवंगत दिग्गजों के विशेषांक निकाले जाते हैं। उन विशेषांकों में मौजूदा साहित्यकार दिवंगत की शान में कसीदे गढ़ते दिखाई देते हैं। संस्मरण लिखते हैं। लेकिन कितना अच्छा हो कि ऐसी सामग्री से अधिक उस दिवंगत दिग्गज की रचनाओं को ढूंढ खोजकर पाठकों के लिए एक विशेषांक निकले।
  •  ऽ इसी अंक में रिक्टर स्केल के बारे में दिया गए है। अब फिर यह कि इसे देने का मतलब समझ में नहीं आ रहा।ऽ इसी अंक में एक कहानी है वर्षा। सोनू ने अपनी मां से पूछा कि वर्षा क्या होती है। मां कहती है कि पापा से पूछ लेना। खैर कहानी के अंत में बच्चे पर्यावरण मित्र बनने का संकल्प ले लेते हैं। यह कहानी सूचनात्मक कहानी-सी भी नहीं लगती है। 
  • ऽ इसी अंक में एक कहानी है बख्शीश। सर्दियों में मीनू नंगे पांव पाठशाला जा रहा है। रघु काका उसे जूते देना चाहते हैं। नीनू यह कहकर मना कर देता है कि वह बख्शीश नहीं लेगा। रघु के यह कहने पर कहानी खत्म होती है कि काश! सभी बालक मीनू जैसे होते। अब यह कहानी समस्या तो उठाती है। पर समाधान नहीं देती। अंत भी इतना आदर्शात्मक की हजम नहीं होता। हो सकता है कि कुछ फीसद बच्चे इस तरह के प्रस्ताव पर ऐसा ही कहेंगे। लेकिन गरीब और लाचारी को उसी हाल पर छोड़ देने का अंत देती कहानी पता नहीं क्यों कुछ अधूरापन दे जाती है। हम बच्चों की आदर्श स्थिति परोसना क्यों चाहते हैं?
  • ऽ एक कहानी इसी अंक में है। भोला भालू और चालाक बंदर। बंदर भोला भालू को चकमा देता है और उसके आलू खा जाता है। भालू बंदर भी उसे सबक सिखाता है। ईंट का जवाब पत्थर से देना टाइप का संदेश इस कथा से स्ािापित हो रहा है। जब चालाक बंदर दूसरी बार भोला भालू को चकमा देना चाहता है और उसे ही शर्मसार होना होता है तो भालू फिर भोला कहां से हो गया। 
  • ऽ इसी अंक में नीदरलैंड की सैर का आलेख है। अब इस तरह के आलेखों के बारे में पहले ही चर्चा हो चुकी है। 
  • ऽ इस अंक में संस्मरण भी छपा है। एहसास। संस्मरण ऐसी विधा है,जिसे हर बार आना चाहिए। एक नहीं बल्कि कई। यह भी हो सकता है कि बच्चों के स्थाई स्तंभों में भी इसे शामिल किया जा सकता है। यह एहसास नाम से प्रकाशित संस्मरण की भाषा शैली अच्छी तो है। लेकिन बच्चों की पत्रिका में ऐसे संस्मरण प्रकाशित हों, जो बच्चों को जाने-अनजाने में भा जाएं। यहां हीरा प्रथम श्रेणी से पास हुआ। दिल्ली में रोजगार के लिए गया और फिर वहीं का हो गया। उसे जानी-मानी कंपनी में नौकरी मिल गई। अब हीरा अपने परिवार के साथ दिल्ली में खुश है। यह क्या दर्शाता है? जो घर-गांव में रह गए हैं। हीरा उनसे बेहतर है? जो पलायन कर गए,वे हीरो? सुखी जीवन की यही परिभाषा है? क्या संस्मरण के तौर पर जो भी रचना सामग्री आए,वह छापी जाए? आखिर किसी रचना सामग्री का बालमन पर क्या असर पड़ेगा। यह कौन सोचेगा?ऽ इसी अंक में एक कहानी है भविष्यवाणी। दो भाई थे। दोनों ज्योतिषी थे। एक ने कहा राजा का पुत्र होगा। दूसरे ने कहा पुत्री होगी। राजा ने कहा कि जिसकी भविष्यवाणी सही होगी उसे इनाम दिया जाएगा। यह तो तय है कि या तो पुत्र होगा या पुत्री? भविष्यवाणी और ज्योतिष कांड। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रचार-प्रसार में बाधक है। ऐसा नहीं है कि किसी भी अंक में यही सब कुछ है। कुछ अच्छी कहानियां भी हैं लेकिन इनकी संख्या कम है।
  • ऽ अधिकतर अंकों में कविता लिखो प्रतियोगिता, निबंध प्रतियोगिता, कहानी लिखो प्रतियोगिता, सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता, अंक पहेली, सुडोकू, चित्र पहेली, पहेलिया, वर्ग पहेली, शब्द पहेली,दिमागी कसरत आदि। इतनी सारी प्रतियोगिताएं हर अंक में देकर कहीं ऐसा तो नहीं कि बाल प्रहरी भी बच्चों को गलाकाट प्रतियोगिता की दौड़ में दौड़ाने के प्रयास में लगी है? जैसा पहले भी कहा जा चुका है, क्या वाकई में किसी बाल पत्रिका में यह प्रतियोगिताएं अधिकतर बच्चों को शामिल करती हैं? क्या पत्रिका में शामिल यह प्रतियोगिताएं कहानी,कविता और अन्य विधाओं में प्रकाशित रचनाओं से अधिक लोकप्रिय होती हैं?
  •  ऽ इस बहाने मैंने अन्य बाल पत्रिकाएं भी इस निगाह से टटोली। संपादकों के पास भी लचर रचनाएं आना स्वाभाविक है। कारण? कारण यही है कि जब चारों ओर से बच्चे इसी तरह की रचनाओं से लबरेज पत्रिकाओं को हाथ में लेंगे तो उन्हें आदत पड़ ही जाएगी। हम बड़े भी इसी आदत का शिकार हैं। सूचनात्मक लेखन पढ़ा है तो ऐसा ही लिखेंगे। कंडीशनिंग हो गई है। आज की पीढ़ी के साथ भी हम यही करें? यहां-वहां से पढ़कर,उतारकर, सुनकर ऐसी रचनाएं बाल प्रहरी में भारी संख्या में भेजी जा रही होंगी तो यह स्वाभाविक ही है।  क्या इसे मौलिक लेखन कहा जाएगा? क्या इसे रचनात्मक लेखन कहा जाएगा?ऽ लोककथाएं खूब छप रही हैं। अच्छी बात है। लेकिन भाषा? भाषा तो बच्चों के अनुकूल हो। 
  • कुछ कहानियां इस तरह से प्रारंभ होती हैं-‘दीपक एक होनहार छात्र था। अभाव में पला था।’ कहन अच्छा है लेकिन आज के संदर्भ में इस तरह की व्याख्यात्मक शैली से अच्छा है यह संवाद में आ जाए तो बेहतर। दूसरा उदाहरण- ‘एक गांव में एक बहुत ही सीधा आदमी था। उसे बुद्धू मियां कहते थे।’ ये सीधा आदमी और उसे बुद्धू मान लेना ! हम कहीं कुछ बातें स्थापित तो नहीं कर रहे? अब स्थापित क्या हो रहा है? कि गांव में ही सीधे लोग रहते हैं? जो सीधे होते हैं उन्हें लोग बुद्धू कहते हैं। कि सीधा होना अच्छा नहीं? ये सीधा क्या होता है? एक उदाहरण और देखिए-एक आदमी था। उसके पास एक अशरफी थी। उसे अचानक रुपयांे की आवश्यकता पड़ी। आगे कहानी में बढ़ते हैं तो बात खुलती चली जाती है। दाने-दाने को मोहताज़ आदमी के पास अशरफी हो और पैसे न हो। यदि अभाव वाला हो तो वह अशरफी को रुपयों मंे बदलेगा ही न! कहानी तो कहानी है। पर कहानी में सिर-पैर तो होगा न। कोई लयबद्धता तो होगी न। बच्चों के लिए कहानी है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि कुछ भी कह दो। कुछ भी लिख दो। कहानी पढ़ने के बाद कहानी क्या दिशा दे रही है। यह कौन सोचेगा?
  • ऽ एक लेख की बानगी देखें-हमारे देश में क्रिकेट एक बुखार की तरह है। हर गली,मोहल्ले एवं खेल के मैदान में यह खेल होता है। अब सवाल उठता है कि खेल अच्छा है या बुरा? सचिन तेंदुलकर जैसे कई इस बुखार में लिप्त हुए होंगे न। 
  • ऽ ‘आज मोनू के पापा टोमी बंदर को वेतन मिला।’ अब बंदर भी नौकरी करने लगे और उन्हें भी करेंसी की जरूरत आन पड़ी। ऐसा ही- जामुन का एक पेड़ था। उसमें लारी नाम की एक मधुमक्खी रहती थी। मेरी समझ में भी बहुत बाद में आया कि जानवरों के नामकरण क्यों? क्या वह अपने मूल नाम से ही कहानियों में नहीं आ सकते?ऽ एक कहानी और देखिए-दो बार ऐसी स्थिति आ गई कि सोनू को स्कूल से निकाल दिया गया।’ इस तरह के वाक्य थोड़े से भी चंचल बच्चों में हीन भावना भर देते हैं। इस तरह के कथन से बचना चाहिए। यह निकालना क्या होता है? 
  • ऽ एक आलेख कितना अलंकृत-सा और पढ़ने में अपने शब्दों की वजह से बोझिल-सा हो गया लगता है-‘कड़कती सर्दियों में पर्णविहीन पेड़ उदास सा खड़ा बसंत के आने के दिन गिन रहा था। इसमें ये और शब्द आए हैं-विहंग,तन,प्रगाढ़,पुलकित,कृतज्ञ,निष्ठुरता,क्रम आदि।’ क्यों हम अति साहित्यिक हो जाएं? क्या यह स्वतंत्र वाचन या यूं कहूं कि पढ़ने का आनंद में बाधक नहीं। क्यों हम बड़े जो कुछ भी बच्चों के लिए लिखते हैं उसमें ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते जैसा बच्चों को पसंद हो। मतलब इतना ही है कि आम बोलचाल की भाषा हमारी रचनाओं में क्यों नहीं होती?
  • और अंत में - मैं जानता हूं कि यदि आरंभ से लेकर अंत तक बालमन के हितों को ध्यान में रखकर मेरे मन की उपर्युक्त बातों को सकारात्मक लिया जाएगा, तो न ही संपादक महोदय, बाल प्रहरी टीम-परिवार और बाल प्रहरी के नियमित रचनाकार भी कम से कम मेरी इस नज़र को किसी पूर्वाग्रह के साथ नहीं जोड़ेंगे। रही बात बच्चों की, तो कमोबेश उन्हें अभी तक स्वतंत्र तौर पर सोचने की आज़ादी हम बड़ों ने दी कहां है? उम्मीद की जानी चाहिए कि बाल पत्रिका ही नहीं और भी बाल पत्रिकाओं से जुड़े संपादकीय साथी,अग्रज और जानकार उचित तर्को पर कान देंगे। 
  • जल्द नहीं तो एक एक कर मैं अन्य बाल पत्रिकाओं को भी अपनी नज़र से देखना चाहूंगा। मैं अपने साथियों से भी अनुरोध करुंगा कि वे भी सकारात्मक दृष्टि के साथ पत्रिकाओं की समीक्षा करेंगे। मैं अभी खुद ही अच्छा पाठक बनने की प्रक्रिया में हूं। बाल साहित्यकार तो दूर की बात है। मैं अभी खुद ही कहानी की समझ को समझ रहा हूं। उम्मीद करूंगा कि जानकार मेरा भी मार्गदर्शन करेंगे।
  • सभी को सादर,
  • -मनोहर चमोली ‘मनु’
  • 09412158688

01/07/2017

वह, जो कभी शहर था ! nainital

वह, जो कभी शहर था !

-मनोहर चमोली ‘मनु’

जी हाँ। शहर होना कंक्रीट का होना भर नहीं है। शहर का स्वभाव होता है। उसका खुश होना, अपने बाशिंदों पर हाथ रखना भी होता है। शहर अपने वासियों को सभी मौसमों का अहसास दिलाता है। रोजी-रोटी के साथ संवेदनाएं भी शहर देता है। यही कारण है कि इंसान कहीं भी जाता है लौट-लौट कर अपने शहर आता है। मैं नैनीतालवासियों से पूछना चाहता हूं जो शहर से बाहर हैं (पूरी आधी के आधे शहर से बाहर रहते हैं) क्या वे अब बार-बार अपने शहर आना चाहते हैं? 
 मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या जब भी वे नैनीताल आते हैं, शहर की हालत और हालात देखकर पसीज पड़ते हैं। मैं उन नैनीतालवासियों से भी पूछना चाहता हूं कि जो किसी भी हालत मंे शहर को छोड़कर बाहर नहीं बसे। क्या वे दिल पर हाथ कर कह सकते हैं कि वे बारह महीनों में बारह सप्ताह भी सुकून से सांस लेते हैं? मैं उन सभी से पूछना चाहता हूं कि इस शहर से मिलने और इस शहर से विदा होते हुए इत्मीनान-सा कुछ रहता है? हर शख़्स जो यहां का है और यहां दूसरी बार घूमने ही सही आता है वह अजीब सी बेचैनी लिए हुए क्यों आता है। इस शहर के हाथ-पैरों से दूर होती सड़क पर पहुंचते ही वह राहत भरी सांस क्यों लेने लगता है? 


बहरहाल हाल ही में मुझे नैनीताल में पांच रातें बिताने का मौका मिला। यह पहला अवसर नहीं था। मैं पिछले सत्रह सालों में छह से सात बार नैनीताल गया। मैं सिर्फ नैनी झील के लबालब न भरे रहने की वहज से बेचैन नहीं हूँ। यात्रा सीजन से इतर भी नैनीताल सांस लेता है। यात्रा सीजन से इतर भी नैनीताल की नैनीझील बेचैन रहती है। लेकिन इस बार नैनीताल शहर अपनी बेचैनी बार-बार बता रहा था। मैं अक्सर मोहन चैहान जी का सहयात्री रहता हूँ। वे संवेदनशील आदमी हैं। शिक्षक हैं। जन सरोकारों की अच्छी समझ के यात्री हैं। एक-दूसरे की मदद को हमेशा तत्पर रहते हैं। अपने से अधिक दूसरे का ख़्याल रखने वाले मोहन चैहान जी के साथ रहना मुझे सहज लगता है। इस बार अपरिहार्य कारणों से हम देहरादून से एक ही समय पर चले लेकिन अलग-अलग साधनों की यात्रा करते हुए चले। हल्द्वानी वे मुझसे चालीस मिनट बाद पहुंचे। मैं और वह हल्द्वानी से भी नैनीताल आधे घण्टे के अंतराल पर पहुंचे। लौटते समय हम नैनीझील से अलग हो गए। मैं मनोधर जी के साथ राज्य की परिवहन बस से लौटा तो उन्हें अकेले ही काठगोदाम जाना पड़ा। वहां से वह रेल से देहरादून पहुंचे। मैं कोटद्वार होता हुआ पौड़ी आ गया। मोहन चैहान जी एवं मनोधर नैनवाल जी का उल्लेख यहां इसलिए कर रहा हूं कि हमने कुछ समय नैनीताल में साथ-साथ बिताया। नैनीझील बरसात में लबालब भर जाएगी। लेकिन हम जो शहर का अधूरापन वहां से देखकर लौट रहे हैं वह शायद ही पूरा होगा। 

कुमाऊँ विश्वविद्यालय के मानव संसाधन विकास केन्द्र के अतिथि कक्षों में मैं और मोहन चैहान सहयात्री रहे। सुबह और शाम हमने नैनीताल शहर का जायजा लिया। एक शाम महेश बवाड़ी, महेश पुनेठा, गिरीश पाण्डेय प्रतीक, रेखा चमोली, मोनिका भण्डारी, मोहन चैहान, चिन्तामणि जोशी, दिनेश कर्नाटक लगभग सात किलोमीटर पैदल चलते हुए शहर को नीचे छोड़कर ऊंचाई में भी गए।

वर्ष 2011 के अनुसार नैनीताल शहर की आबादी इकतालीस हजार है। भारत को झीलों का जिला कहा जाता रहा है। लेकिन यह तब कहा जाता था जब इसके साठ ताल हुआ करते थे। इसका परगना छखाता यानि षष्टिखात है। साठ ताल। नयनी से नैनी हुआ और कहते हैं कि नैनी झील को तालों की आँख कहा जाता रहा है। यह झील विहंगम दृश्य के तौर पर कभी आँख का आकार लिए दिखाई देती थी। नैनीताल हिमालय की कुमाऊँ पहाड़ियों की तलहटी में बसा हुआ है। यह 1938 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। माना जाता है कि नैनी झील की परिधि तीन किलोमीटर की है। ताल की लम्बाई कभी एक हजार तीन सौ साठ मापी गई है। इसकी चैड़ाई चार सौ साठ मापी गई है। नैनी झील आरंभिक परिधि में पन्द्रह मीटर है तो अधिकतम गहराई एक सौ छप्पन मीटर मापी गई है। जानकार बताते हैं कि गर्मियों में कभी इसका तापमान 23 डिग्री से अधिक नहीं जाता था। लेकिन पिछले कुछ सालों में तीस डिग्री से अधिक भी तापमान महसूस किया गया है। इसी तरह सर्दियों में तो बर्फ की आमद से शून्य डिग्री से नीचे रहता ही रहा होता था। सर्दियों में जहां अधिकतम तापमान दस-ग्यारह ही रहता था अब वह सत्रह तक आ पहुंचता है। हालांकि बदलते मौसम का प्रभाव पर्यटकों पर नहीं पड़ा है। पर्यटक अब तो सालाना दिनों में ही आते हैं। कभी मई-जून और अक्टूबर-दिसंबर बेहद आमद हुआ करती थी। अब तो पर्यटक सिर उठाए कभी भी आ जाते हैं। अच्छी बात है। लेकिन आवत-जावत ही जी का जंजाल बन जाए तो, दुश्वारियां है कि बढ़ती जाती हैं। आस-पास काफल,बांझ,बुरांश,चीड़,देवदार, मोरपंखी के वृक्ष खूब रहे हैं। लेकिन अब सघन वन के पेड़ांे ने भी खुली हवा में सांस लेना शुरू कर दिया है। 

हम दो दिन तीन दिनों से देहरादून से नैनीताल जाने के माध्यम पर बात कर रहे थे। मोहन चैहान जी का काठगोदाम तक रेल से आरक्षण था। मुझे नहीं मिला। अंत समय तक मेरा जाना संशयपूर्ण था। शिक्षक साथी मनोधन नैनवाल जी ने संपर्क किया तो हम दो हो गए। हाईटैक बस से से हम दोनों ने हल्द्वानी तक आरक्षण करा लिया। महेन्द्र राणा प्रताप अंतराज्यीय बस अड्डा देहरादून में शिक्षक साथी रेखा चमोली, मोनिका भण्डारी, कमलेश जोशी मिल गए। मदन मोहन पाण्डे सहित गिरिश सुन्द्रियाल भी मिल गए। एक से भले दो के बाद हम अब सात हो गए थे। हम सुबह छह बजे हल्द्वानी पहुंच गए। हल्द्वानी से नैनीताल जाने के लिए बस में आम किराया पेंसठ रुपए है। टैक्सी वालो से बात की तो कोई तीन हजार तो कोई दो हजार रुपए मांगने लगा। हल्द्वानी से नैनीताल की दूरी लगभग चालीस किमी है। खैर हमने साझा टैक्सी की तो भी हमें एक हजार रुपए देने पड़े। वहीं मोहन चैहान जी अकेले एक टैक्सी लेकर नैनीताल पहुंचे तो उन्हें पांच सौ रुपए देने पड़े। यही नहीं एक साथी को वापसी में काठगोदाम आना था दो घंटे पहले बेतहाशा जाम लग गया। ऐसा माहौल बना कि उन्हें एक हजार पांच सौ रुपए देकर टैक्सी से मात्र सत्रह किलोमीटर की यात्रा की यह कीमत चुकानी पड़ी। हमारी सुनिए। हम सब वापसी के लिए इतनी चिन्ताकुल हो गए कि कार्यक्रम के समापन और विदाई का भी आनंद न ले सके। मोहन चैहान जी की वापसी काठगोदाम से रेल से थी। हमें यात्रा ऐसे करनी थी कि हम किसी तरह नजीबाबाद रात के दो बजे से पहले पहुंच जाएं। ताकि हमें दिल्ली से पौड़ी आने वाली बसें मिल जाएं। हम अतिथि ग्रह से पैदल चल पड़े। रास्ते में देखा कि वाकई जाम लगा है। बस अड्डे तक पहुंचना ही भारी हो गया। ये तो अच्छा हुआ कि हम तीनों के पास एक एक नग ही था। हम अभी मल्ली ताल के ऊपरी छोर पर ही पहुंचे थे कि हमे एक रिक्शा वाला जाता हुआ दिखाई दिया। मैंने उसे पुकारा तो वह कुछ आगे जाकर रुक गया। रिक्शा स्टैण्ड में भी रिक्शा करने के लिए भीड़ जमा थी। हम रिक्शा वाले के पास लपक कर पहुंच गए। हम पहले भी एक सुबह रिक्शा से बस स्टैण्ड तक का जायजा ले चुके थे। हमें पता था कि दस रुपए एक सवारी का है। फिर भी उतरते वक़्त हमने चालीस रुपए उसे दिए। हम नैनीताल बस अड्डे पर चार बजकर पांच मिनट पर पहुंच चुके थे। मोहन चैहान जी को बस में दिक्कत होती है और अब उन्हें काठगोदाम तक ही जाना था। हमने उन्हें काठगोदाम के लिए जाने को कह दिया और मैं और मनोधर नैनवाल जी बस अड्डे के बुकिंग काउंटर पर जा पहुंचे। सारी बातों को देखते समझते हमने तीन रोडवेज की बसों के हालात देख लिए थे जो हल्द्वानी तक गई तो लेकिन बसों में भेड़-बकरियों की तरह चढ़ती सवारी और उनपर लाठी भांजते पुलिस के दो जवानों को देखकर हमारा दिल तो बैठ गया। 


हम दोनांे ने चार बजकर बीस मिनट पर नैनीताल से हरिद्वार रोडवेज बस में अपनी सीट पक्की करा ली। भवाली से भवाली डिपों की हमारी बस को छह बजे नैनीताल आना था। हमारी सीट उन्नीस और बीस थी। हमारे पास डेढ़ घण्टे से अधिक का समय था। हम दोनों ने बुकिंग काउंटर पर बैठे युवक से प्यार के दो बोल बोले तो उसने हमारे दोनों बैग रखने स्वीकार कर लिए और हम नैनी झील की ओर चल पड़े। थोड़ी देर आगे तक ठंडी सड़क की ओर गए। भवाली मार्ग पर हमने चाय भी पी। सुलभ शौचालय पानी विहीन था फिर भी जैसे-तैसे फारीग हुए। इस बीच भवाली से जो भी बसें आतीं उस पर चढ़ने के लिए यात्रियों की मारा-मारी देखते ही बनती थी। हमारा लक्ष्य तो अपनी बस नंबर 3253 पर ही था। हमने योजना बनाई कि एक हमारे दोनों बैग का ध्यान रखे और दूसरा इस बस को खोजते हुए भवाली मार्ग की ओर चल पड़े। मैंने जाना तय किया। लगभग एक किलोमीटर आगे चलते हुए यह बस मिल ही गई। यह भी जाम में फंसी हुई थी। मैंने टिकट दिखाकर कंडक्टर से दरवाजा खुलवाया। मनोधर जी को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। वे भी हम दोनों के एक-एक बैग उठाते हुए बस की ओर आ गए। सात बजकर बीस मिनट पर किसी तरह से हम नैनीताल से रवाना हुए। यह बस भी भेड़-बकरियों की तरह यात्रियों से ठूंसी जा चुकी थी। 

इस पूरी यात्रा को बिन्दुवार रखना चाहता हूं।

एक-नैनीताल सपिरवार या एक से अधिक बैग लेकर आने वाला यात्री कमोबेश दोबारा यहां पैर नहीं रखता।

दो-जिज्ञासु,घुमक्कड़ी स्वभाव वालों से अधिक यहां मौज-मस्ती करने वाले युवा अधिक आने लगे हैं। जिन्हें न शहर के स्वभाव से कोई लेना-देना है और न ही सैलानियों की मूल प्रवृत्ति से उन्हें कोई मतलब है। 

तीन-धनाढय कथित पर्यटक अपनी एसी गाड़ियों में आते हैं, वे हल्द्वानी से आगे चढ़ते हुए बेतहाशा रुपया लुटाते हैं। उन्हें भी दूसरे की परेशानी से कोई लेना देना नहीं होता। वे रात बिताने के लिए और भोजन करने के लिए पटाखों पर दौलत खर्च करने वाली शोखबाज़ी दिखाने का एक भी अवसर नहीं चूकते।

चार-2011 से ऐसे पर्यटकों की आमद बेतहाशा बढ़ी है जिन्हें नैनीझील के पास सेल्फी लेना और झील में नौकायन का आनंद लेना ही आता है। यह दो काम कर लेने के बाद उन्हें लगता है कि वे गंगा नहा चुके। 
पांच-रिक्शा चालकों में पूरी ईमानदारी देखी जाती है। वे शाम छह से नौ रिक्शा नहीं चला सकते। सुबह से लेकर शाम तक वे यहां-वहां दौड़ते मिलेंगे। रिक्शा के रेट तय हैं। कोई ख़बीस ही होगा जो पर्यटकों से ज़्यादा पैसे वसूलेगा। बेचारे वीआईपीज़ को भी ठेलते हैं। 

छह-दवा लेनी हो या फोटो स्टेट करानी हो। यह काम नैनीताल में जोखि़म भरा है। हां दूसरे शौक करने हों तो उसके माध्यम खूब मिल जाएंगे और अवसर भी और ऐजेंट भी। 

सात-पन्नी पैक्ड दूध ग्यारह बड़े ट्रक आते हैं। दो-तीन दूध बेचते अस्थाई दुकानदारों ने बताया कि इन दिन चालीस हजार लीटर दूध नैनीताल में आ रहा है। अब मुर्गों, बकरों और मदिरा का अंदाज़ा लगा लें।

आठ-सुबह सात बजे से पहले नैनी झील के आस-पास कूड़ा बटोर रहे दो युवकों से बात की तो वे बोले-‘‘काहे परेशान कर रहे हो। नौ बजे से पहले ये कूड़ा समेटना है। फुरसत ना है।‘‘ मैंने देखा कि कूड़ादान पलटते और उन्हें बोरों में भरते हुए ऐसे नौजवान बीस-एक थे। कूड़े में हड्डिया और बोतले अधिक थीं। सिगरेट के ठूंठ तो अनगिनत थे।

नौ- सुबह-सुबह सड़क के दोनों ओर चाय-खोमचे वालों का अंबार लगा देखा। चाय,नाश्ता मुहैया कराते ये अस्थाई रेहड़ी-ठेली वाले धन्य है। सुविधा शुल्क देने के बाद ये हजारों पर्यटकों के राम बने हुए हैं। उनके लिए जो गफलत में ही सही नैनीताल तो आ गए लेकिन रात को मंहगे होटलों में न तो रुक सके और न ही वहां के मंहगे भोजन का आंनद ले सके। पूछने पर पता चला कि ये सब अस्थाई दुकानदार नौ बजने से पहले ही खिसक लेंगे। नही ंतो स्थानीय प्रशासन लट्ठ अलग पेलेगा और सारा सामान ज़ब्त भी कर लेगा। मोहन चैहान जी चाय पीते नहीं। अपन ने दो दिन सुबह की यही चाय पी। बातों ही बातों में पता लगाया तो पता चला कि एक रेहड़ी ठेली वाला सुबह के दो-तीन घंटों में दो से तीन हजार की चाय-चाय ही बेच डालता है। जी हां केवल चाय। 

दस-राज्य का उच्च न्यायालय शांत ही दिखाई दिया। लेकिन वह केवल कड़े निर्णय ही सुनाता है। अमल दरामद तो सरकार करती है। सुना है कि नैनीझील को भी गंगा की तरह एक जीवित व्यक्ति मानकर उसे बचाने की बात चल रही है। पर क्या गंगा की रक्षा हो रही है जो झील की रक्षा हो सकेगी?

ग्यारह-साथियों ने भी बताया और हमने भी देखा स्थानीय लोगों ने एक घर हल्द्वानी भी बनवा लिया है। वे आस-पास अपने पैतृक गांवों मे ंचले जाते हैं। पर्यटकों के आवत-जावत हो-हल्ले के आदी स्थानीय या तो मूक रहते हैं या खुद को कूल रखने के लिए अस्थाई पलायन कर जाते हैं। 
बारह-घर भी पेइंग गेस्ट और घरनुमा होटल में तब्दील हैं। सूखाताल सहित कई जगह पर पार्किंग हैं। आदमी कम और गाड़ियां ही गाड़िया देखनी हैं तो सुबह टहलने आ जाइए या शाम के समय भ्रमण कीजिए। इस बोलते शहर को चिल्ल पौं करते हुए आप अपने कान भींच लेंगे।

तेरह-नैनीताल का जंगल कभी नगर पालिका प्रशासन के नियंत्रण मंे था। अब वह वन विभाग के पास है। वृक्षा रोपण होता दिखाई देता है लेकिन एक छोटा से जंगल को किशोर होने में ही साठ बरस लग जाते हैं। अब साठ बरस पुराना जंगल बड़ी सफाई से बूढ़ा किया जा रहा है। 

चैदह-नैनीताल हाईकोर्ट से लेकर मल्ली ताल के अधिकतर अस्थाई नाले पक्के कर दिए हैं। कहीं भी पानी जमीन में रिसता नहीं। सब ढलान की वजह से नैनीझील की ओर बढ़ता दिखाई देता है पर कहां जा रहा हैं यहा सब जानते हैं पर मानते नहीं।

पन्द्रह-चारों ओर कूड़ा ही कूड़ा। नैनीताल में घुसते ही और नैनीताल से बाहर जाते हुए नाक में सडांध घुसती है। वह स्थानीय जनों की देन नहीं कथित पयर्टकों के द्वारा फैलाई गंदगी है। पैदल चलना मुश्किल हो जाता है। सीजन जब पीक पर होता है तो आपको स्थानीय सब्जी,फल और उत्पाद ढूंढे नहीं मिलेंगे। हां भुट्टा तीस रुपए में एक जरूर मिल जाएगा। विलासितापूर्ण भोज्य पदार्थ कहीं भी मिल जाएंगे। 

सोलह-नैनीताल में सब कुछ दिखाई देता है बस नहीं दिखाई देते स्थानीय लोग। स्थानीय वस्तुएं। मुझे तो स्थानीय नैनीताल भी नहीं दिखाई दिया। ग्लोबल नैनीताल देखना है तो वह कहीं भी बैठकर देखा जा सकता है। फिर मेरे जैसा कोई यहां बार-बार क्यों आना चाहेगा।

सत्रह-बस,जीप,टैक्सी से यात्रा कर यहां पहुंचे लोग कहते हैं कि बहुत समय जाम ने खा लिया। अच्छा होता अपनी गाड़ियां लेकर आते। निजी गाड़ियां लेकर आए लोगों से बात करें तो वह कहते कि पका दिया। अच्छा होता जो अपनी गाड़ी लेकर नहीं आते। 

अठारह-मैं सोच रहा हूं कि हर साल हजारों पर्यटक यहां आ रहे हैं। दस में नौ पर्यटक कहते हैं कि दोबारा नहीं आएंगे। फिर भी भीड़ हैं कि छंट नहीं रही। सैर-सपाटा नैनीताल का प्राण है। यदि प्राण है तो यह कमाया धन जा कहां रहा है?

और अंत में पूर्व की यात्राओं में मैंने जिस शहर से संवाद किया था। जिस नैनीताल की सड़कर पर चलते हुए मुझे रमणीक स्थल का अहसास हुआ था। जिस नैनीताल की झीलों की मछलियां टुकुर-टुकुर मेरी आंखों में झांककर मेरा स्वागत करती थी। जिस नैनीताल के चीड़-देवदार-बांझ-बुरांश के पेड़ों की नायाब सुगंध दिल और दिमाग को ठंडक पहुचाती थीं, जिस नैनीताल के भुट्टे में यहां की मिट्टी का स्वाद मिला था। जिस नैनी झील में विचरण करते चप्पू जल को चूमता हुआ हमें भी रोमांटिक करता था, आज वह सब स्थितियां घबराई हुई सी मिलीं। जैसे कह रही हों-‘‘हमें हमारे हाल पर छोड़ दो। अब मत आना यहां तुम।’’

(यह आलेख दिनांक 25 से 28 जून 2017 पढ़ने-लिखने की संस्कृति की ओर....विषयक संगोष्ठी के दौरान नैनीताल प्रवास के दौरान हल्द्वानी-नैनीताल के शिक्षक साथियों, पर्यटकों एवं दुकानदारों से हुई बाचतीत एवं स्वयं के अवलोकन के आधार पर तैयार किया गया है। यह किसी शोध एवं ठोस तथ्यों पर आधारित नहीं है। )

-मनोहर चमोली ‘मनु’


  

28/06/2017

चार दिवसीय शिक्षक समागम में ‘पढ़ने-लिखने की संस्कृति बढ़ाने की ओर....’ child literature

पूरा दिन एक-दूसरे के बारे में बताया

-मनोहर चमोली ‘मनु’

नैनीताल स्थित कुमाऊँ विश्वविद्यालय के मानव संसाधन विकास केन्द्र में राज्य भर के उत्साही,रचनाधर्मी एवं ऊर्जावान शिक्षक चार दिवसीय शिक्षक समागम में ‘पढ़ने-लिखने की संस्कृति बढ़ाने की ओर....’ विषय पर बातचीत करने के लिए जुट गए हैं।

समागम का आरंभ अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन के साथी भास्कर उप्रेती ने किया। सुबह का सत्र बारह बजे से पूर्व आरंभ हुआ। उन्होंने कहा कि अक्सर सोचा जाता रहा है कि पढ़ने-लिखने वाले शिक्षक साथी एक साथ कहीं बैठें। पढ़ने-लिखने की संस्कृति की ओर विषय पर बात करें। अपने अनुभव साझा करें। एक दूसरे को सुनेंगे। क्या पढ़ना चाहिए। पढ़ने की आदत बनी रहे, इस पर विचार करेंगे। भविष्य की दिशा तय करेंगे।
भास्कर उप्रेती ने कहा कि हम सब देखते हैं कि सूबे में शिक्षक पदों में बंटे हैं। उन्हें बुनियादी शिक्षक, माध्यमिक शिक्षक, प्रवक्ता उच्च शिक्षा का शिक्षक आदि नामों से जाना जाता है। बहुत बड़ी खाई दिखाई देती है। उस खाई को पाटने की आवश्यकता है। जैसा माहौल बना रहा है, इस दौर में अस्तित्व के संकट से गुजरना भी आज शिक्षक के लिए चुनौती है। उच्च शिक्षा से लेकर बुनियादी शिक्षा के मध्य एक-दूसरे से बहुत शिकायतें हैं। धारणाएं हैं। इन्हें समझने की जरूरत है।

कुमाऊँ विश्वविद्यालय के प्रदीप जोशी जी ने कहा कि इस संगोष्ठी का मक़सद और तरीका नायाब है। वातावरण और व्यक्तित्वों में आम संगोष्ठी से इतर की खुशबू साफ महसूस की जा सकती है। उन्होनंे कहा कि बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा के रचनाशील शिक्षकों से संवाद करने का यह सुनहरा अवसर है। ज़ाहिर सी बात है कि बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। उन्होंने कहा कि आज जब छात्र की निर्भरता गूगल के भरोसे है, ऐसे में किताबों से दोस्ती की बात करना खास है। हर अपने चारों ओर देखते हैं तो पाते हैं कि विद्यालयों के पुस्तकालय वीरान हैं। छात्र उस ओर जाते ही नहीं। पाठ्य पुस्तकों की ओर भी छात्रों का रूझान नहीं है। हम आईपेड पर ही निर्भर हो रहे हैं। किताब का पढ़ना एक जीवंत अनुभव है। यह रिश्ता सूचना तकनीक के उपकरणों में बन ही नहीं सकता। आज छात्र कारपोरेट जगत की ओर बढ़ रहे हैं। पढ़ने की आदत खत्म हो गई है। उन्होंने उल्लेख किया कि नैनीताल में नारायण बुक केन्द्र हुआ करता था। आज वह बीते जमाने की बात हो गई है।

उत्तराखण्ड का इतिहास और वर्तमान भी पढ़ने-लिखने का केन्द्र के तौर पर विख्यात है। समूची दुनिया जानती है कि हमारे सूबे के लोगों में पढ़ने-लिखने की आदत है। लेकिन यह आदत अब नई पीढ़ी में तेजी से छूट रही है। इसे बनाए और बचाए रखना होगा। स्नातक ओर स्नातकोत्तर के छात्र भी नहीं पढ़ रहे हैं। फेसबुक और व्हाटस एप पर हम नई पीढ़ी को देख रहे हैं। हम कुछ मिलकर काम कर सकते हैं। आपस में बात करना, विचारों को बांटना और माथापच्ची करना बहुत जरूरी है।

प्रदीप जोशी ने कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए विचार वह भी नया विचार ही हमारी पूंजी है। नया विचार ही तो समाज को लाभ देता है। विचार ही महत्वपूर्ण है। विचार से आगे और उससे बड़ा कुछ नहीं है। आज तो विचारों को उत्पाद के तौर पर देखा जा रहा है। युवाओं की क्षमताओं को हम विकसित नहीं कर पा रहे हैं। इस युवा शक्ति का उपयोग करना पहली चुनौती हो गया है। ज्ञान कौशल और व्यवहार। इनमें सामंजस्य नहीं दिखाई देता।

अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन के खजान सिंह ने संस्था की स्थापना, मक़सद, काम करने के तरीकों पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि सूबे में हम एक दशक से काम कर रहे हैं। हम गैर लाभकारी संगठन है। हमारा मकसद है कि हम भारत के संविधान के मूलभूत सिद्वान्तों के आधार पर शिक्षक-शिक्षा को समझें। हम न्यायपूर्ण समताधारित समाज के निर्माण में संलग्न हैं। संवैधानिक मूल्यों के साथ काम करना ही हमारा तरीका है। खजान सिंह ने कहा कि हम शिक्षा के उद्देश्यों को देखें तो उसका एक बड़ा मक़सद विवेकशील नागरिक तैयार करना के तौर पर दिखाई देता है। हम क्या हर कोई भारतीय चाहता है कि हर भारतीय में भारतीयता हो। वह तर्क के साथ काम करे। वह अपने भीतर संवेदनशीलता को बनाये रखे। बचाए रखे। हम चाहते हैं कि हर नागरिक विवेकशील निर्णय लेने की क्षमता रखे। वह अपने रोजगार को आगे बढ़ाए। हम सब संवेदनशील हों। कोई भी पेशा अपनाएं पर उसके कर्म को संवेदनशीलता के साथ करें। कौशल के साथ अपना जीवन यापन कर सकें। हर कोई कल्याणकारी कार्य की ओर अग्रसर हो।

खजान सिंह ने कहा कि काम करते-करते यह भी समझ बनी कि सतत्,व्यापक और टिकाऊ काम करने से ही बेहतर परिणाम नज़र आएंगे। हम सभी को ऐसी टीम का हिस्सा बनना होगा जो शिक्षा में समाज के हित में बेहतर काम कर सके। शिक्षा, मनोविज्ञान, समझ के साथ काम करने का भाव जे़हन में रखने वाले समर्पित लोगों की टीम में शामिल होना ही चाहिए।

उन्होंने अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन के प्रसार और काम करने के तरीकों पर विस्तार से बात रखी। सात राज्यों में काम के फैलाव पर भी चर्चा की। सूबे में हरिद्वार को छोड़कर सभी बारह जिलों में शिक्षकों के साथ काम करने के अनुभवों को भी उन्होंने साझा किया। उन्होंने शिक्षकों की भागीदारी, उनकी जरूरतें, उनके दुख-दर्द, उनकी समस्याओं पर भी बात करने की आवश्यकता बताई।

खजान सिंह ने कहा कि सार्वजनिक शिक्षा में काम करने वाले शिक्षक अपने-अपने क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उन्हें एक मंच पर आना आवश्यक है। उनका एक साथ होना जरूरी है। ऐसे शिक्षक साथी जो पढ़ने-लिखने का काम करते हैं वह उत्तराखण्ड में अधिक हैं। लेकिन तब और संगठित तरीके से हमें एक-दूसरे के सहयोग की जरूरत है। अपने विचार को गहरे से साझा करने की जरूरत है। हमें एक दूसरे के सार्थक काम को आगे बढ़ाने की जरूरत है। यह आयोजन पहला है। इसके आलोक में हम नए विचार के साथ आगे की योजना भी बनाएंगे।

खजान सिंह ने कहा कि हमें एक समूह के तौर पर दिखाई देना चाहिए। समूह की ताकत दिखाई भी देती है। हम परिवर्तन भी समूह के माध्यम से ही कर सकते हैं। इकाई से समूह अधिक कारगर होता है। विचारशील व्यक्तियों का समूह ही दुनिया बदल सकते हैं। समूह की ताकत हम सब जानते हैं। समूह के साथ पढ़ने-लिखने वाले आगे बढ़ेंगे तो सार्थक काम कर सकते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि हमारे पास बैठने का मंच हो। विचार को आगे बढ़ाने के लिए केन्द्र हांे। बड़े बदलाव छोटे-छोटे समूहों से ही आरंभ होते हैं। पढ़ने-लिखने की संस्कृति कैसे आगे बढ़े। इस पर बात करेंगे। हम अपने व्यावसायिक मुद्दों पर भी चर्चा करेंगे। हम अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को भी साझा करेंगे। हम अपने बारे में बताएंगे।
एक सहभागी शिक्षक ने सवाल भी किया। सवाल था कि सरकारी स्कूल हैं। वहां पैसा सरकार लगा रही है। हम क्यों सम्पूर्ण शिक्षा की बात नहीं करते हम क्यों शिक्षा को निजी और सार्वजनिक खांचों में बात करते हैं?

खजान सिंह ने सवाल का जवाब देते हुए कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य ऐसे दो मुद्दे हैं, जिनकी जिम्मेदारी राज्य की होनी चाहिए। यह और सुदृढ़ होनी चाहिए। ये दो क्षेत्र हैं जिन्हें दुकान चलाना और मुनाफा कमाना से नहीं जोड़ा जा सकता है। निजी क्षेत्र तो मुनाफा कमाने के लिए हैं। हम सार्वजनिक शिक्षा को प्रमुख स्थान इसलिए भी देते हैं क्योंकि आज भी यहां से निकले छात्र ही पूरे समाज को संभाले हुए हैं। उन्होंने कहा कि यही सार्वजनिक शिक्षा है जहां एक स्थाई शिक्षक अपने सेवा काल में तीन से पांच हजार छात्रों को कक्षाओं में पढ़ाता है। उनके जीवन को गढ़ने में सहायक होता है। यही कारण है कि हम सार्वजनिक शिक्षकों के साथ काम करने को ही प्राथमिकता के साथ लेते हैं।

इसके बाद उपस्थित सहभागियों ने अपना परिचय दिया। स्यूएाी मल्ली,चमोली से आए घनश्याम ढौंढियाल ने अपना परिचय दिया। उन्होंने कहा कि मैं कक्षा कक्ष की शिक्षा को नए स्तर पर ले जाने के लिए प्रयास करता हूं। नवाचार पर भरोसा करता हूं। शिक्षा बहते पानी की तरह है। वह ठहरेगी तो ठहरे हुए पानी की तरह सड़ जाएगी। यही कारण है कि हम गतिविधि आधारित शिक्षण करते हैं। खेल-खेल के माध्यम से छात्रों के साथ पढ़ने-पढ़ाने का काम करते हैं।  
  
   डायट बागेश्वर से आए केवलानन्द काण्डपाल ने कहा कि बच्चों के साथ और बच्चों को पढ़ाने वाले बुनियादी शिक्षकों के साथ काम करता हूं। पढ़ने-पढ़ाने की गतिविधियों में शामिल रहता हूं। मुझे सरकारी शिक्षा पर भरोसा है। सरकारी शिक्षा ही कारगर है। वही समाज के लिए मुफीद है। अनुभवों को लिखकर प्रकाशनार्थ भेजता रहता हूं। पढ़ता रहता हूं।

द्वाराहाट से आईं अध्यापिका अनीता प्रकाश ने कहा कि आरंभ से ही लिखने-पढ़ने का शौक रहा है। दो किताबों के संग्रह आए हैं। एक कहानी संग्रह आया है। मेरे अध्यापन कार्य के बारे में ठीक से मेरी छात्राएं बताएंगी। पढ़ने-पढ़ाने का शौक है।

पौड़ी से आई अनीता ध्यानी ने कहा कि प्राथमिक से लेकर जूनियर में पढ़ाती रही हूं। साहित्य का शौक रहा है। इन दिनों संकुल समन्वय हूं। कोशिश करती हूं कि अपनी अभिव्यक्ति को शब्द दूं। पढ़ने के लिए समय निकालना चाहती हूं।  
ऊधमसिंह नगर से आए प्रियंवद ने कहा कि भाषा का विद्यार्थी हूं। पढ़ने का शौक है। घूमने के साथ-साथ सुनने का शौक है।  

गंगाणी,नौगांव,उत्तरकाशी से आए ध्यान सिंह रावत ने कहा कि विषम परिस्थितियों में पढ़ाई की है। पढ़ाया है। अपने अध्यापकों को याद करता हूं। दिल से मन से पढ़ाते थे। हर बच्चे को ध्यान में रखते थे। दूरस्थ काम किया तो लोक को करीब से जाना। एनसीएफ 2005 के काम का विस्तार अपने विद्यालय में किया। शैलेष मटियानी पुरस्कार प्राप्त शिक्षक ध्यान सिंह रावत ने कहा कि मेरे पढ़ाए हुए बच्चों ने मेरा सम्मान किया तो वह बड़े बड़े सम्मानों से बड़ा सम्मान है।

टिहरी से आए मोहन चैहान ने कहा कि उत्तकाशी का रहने वाला हूं। चैदह सालों से बच्चों के बीच काम कर रहा हूं। अक्सर सोचता हूं और इसी दिशा में काम करता हूं कि मैं बच्चों के लिए क्या कर सकता हूं। रचनात्मक अध्यापक जो भी काम करते हैं उनके लिए एक मंच हो। हम अपने क्षेत्र में महीने में एक बार बैठते हैं। अपने अनुभव साझा करते हैं। छात्रों के लिए क्या करें, यही सोचते हैं। सोचते ही नहीं उस दिशा में काम करते हैं।
पौड़ी से आए मनोहर चमोली ने कहा कि वह अक्सर असंतुष्ट रहते हैं। असहमति रखता हूं तो चाहता हूं कि छात्र भी सवाल करें। असहमति को प्रकट करें। समझ का विस्तार अपने ढंग से करें।

चिन्यालीसौड़, उत्तरकाशी से आईं मोनिका भण्डारी ने कहा कि मैं महसूस करती हूं कि विज्ञान और गणित से बच्चे हमेशा से जूझते रहे हैं। बच्चे नहीं पढ़ रहे हैं। इसके कई कारण हैं। बुनियादी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों से हम ज्यादा उम्मीद करते हैं। हम पता नहीं क्यों भूल जाते हैं कि वह अपने साथ बहुत कुछ लेकर आता है। हम उसे पहले ही दिन से लिखने पर बाध्य करने लगते हैं। हम उन्हें स्थान दें। उसे संवाद करने दें। बच्चों से बात करने का मौका हम कम ही देते हैं। हम बच्चों से दूरी क्यों चाहते हैं? सबसे बड़ी समस्या है संवादहीनता है। उन्होंने कहा कि हमारा तरीका कई बार गलत होता है। हम बच्चों को अपने पास बुलाते हैं। हम बच्चों के पास कम जाते हैं। आज भी विद्यार्थियों में जेण्डर दिखाई देता है। अपना अनुभव सुनाते हुए उन्होंने कहा कि इंटरवल होता है तो बच्चियां केवल बातें कर रही मिलती हैं। तीन-चार ये खेलती क्यों नहीें। छात्राएं भी खेलें। उनके साथ हमें समय देना होगा।

उन्होंने कहा कि हर जगह लड़कियां बैठी हुई दिखाई देती हैं। मैं हमेशा सोचती हूं कि लड़कियां खेलती क्यों नहीं? संवादहीनता है। बच्चों को तैयारी करने के लिए उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। हम बच्चों के साथ सहभागी बनें। किशोरों की समस्याएं भी लेकर बच्चे स्कूल में आते हैं। हमें उनके साथ समय बिताएं। उनसे बात करें। गणित की समस्या है। गणित को और सरल ढंग से पढ़ाने के लिए हमें सोचना होगा।

गणेशपुर उत्तरकाशी से आईं रेखा चमोली ने कहा कि स्कूल बहुआयामी है ठीक है स्कूल दक्षताएं सीखाने के लिए है। स्कूल को एक यह काम भी करना चाहिए। आगे चलकर जीवन जीने का सलीका भी तो स्कूल ही देगा। दुनिया में काम करने का सलीका भी स्कूल की जिम्मेदारी है। स्कूल बाहरी दुनिया से जुड़ा हुआ क्यों नहीं होना चाहिए। हमें समझना होगा कि अपने साथियों के साथ कैसे काम करें। बाहर कैसे काम करें। हमारी संवेदनशीलता कहां चली गई? अगर स्कूल में वे बातें नहीं हो रही हैं जो घर में समाज में नहीं हो रही हैं तो  हमें वह सब साझा करना होगा जो बच्चों को घर में और परिवार में और समाज में नहीं मिल रही है। बच्चे एक दूसरे को समझते हंैं। मिलकर काम करते हैं। सवाल करते हैं। वे मदद करते हैं। शाम को ये जानने की कोशिश करती हूं कि मैंने आज क्या किया। और मैं क्या कर सकती हूं।

महाविद्यालय की शिक्षिका स्वाति मेलकानी ने अपने परिचय में लोहाघाट का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस विश्वविद्यालय से पढ़ी हूं। इस शहर की हूं। मुझे लगता है कि बच्चों में पढ़ने की धुन है। विज्ञान पढ़ाते समय वृक्षों की उपयोगिता को बच्चे अपने सन्दर्भ से समझते हैं। बताते हैं। बच्चों ने हमें बताया और सीखाया। मुझे लगता है कि शिक्षण ही एक रास्ता है जहां रहकर हम बच्चों को गहराई से समझ सकते हैं।

पौड़ी से आए कमलेश जोशी ने कहा कि वह मौलिक विज्ञान के शिक्षक हैं। 
विज्ञान का कोई सूत्र भी मौलिक प्रकृति से आया है। खुले परिवेश से आया है। हमारे पास जो बच्चा है वह भी खुली प्रकृति से आता है। पूर्व ज्ञान की समझ हमारे बच्चों में अधिक रहती है। किताबें उनकी तरह नहीं गढ़ी नहीं गई हैं। हमें उसके ज्ञान और समझ को आगे बढ़ाना होता है। सोशल मीडिया के तौर पर एक नया माध्यम है उसका मैं भी उपयोग करता हूं। चुनौतियां हैं लेकिन उनका सामना सकारात्मक तरीके से ही हो सकता है।  
उत्तरकाशी से आए राजेश जोशी ने कहा कि विज्ञान का शिक्षक हूं। प्राथमिक से माध्यमिक में आ गया हूं। आज हालत यह है कि दो टीचर हैं और दो ही बच्चे हैं। लेकिन आज भी ऐसे स्कूल हैं जहां बच्चे बहुत अधिक हैं। मैंने धीरे-धीरे काम किया। बच्चों से बातचीत की। शिक्षक से पहले में फार्मा का छात्र रहा। जानकार रहा। तो अपने अनुभवों के आधार पर दवाई देने लगा। इस काम ने मेरे विद्यालय में छात्र संख्या बढ़ाने में सहयोग किया। छोटे-छोटे बच्चों का भी आना शुरू हुआ। ऐसे विद्यालय में भी रहा जहां दो शिक्षक हैं और 152 छात्र रहे हैं। हम यह समझ लें कि हम ही नहीं बच्चों को समझते हैं बल्कि बच्चे भी हमें समझते हैं। हमें कक्षा कक्ष में और स्कूल में कोई सीमा रेखा नहीं खींचनी है बल्कि दायरे को तोड़ना है। हम तभी बच्चों को अच्छे समझते हैं जब हम उन्हें मौका देते हैं। वे खुलते हैं। बच्चों के परिवेश को उन्हें उनके नाम से जोड़कर उनकी दुनिया को स्थान देंगे तो बच्चे आगे बढ़ते हैं। लिखना-पढ़ना गतिविधि के साथ हो तो और भी आनंद आता है। बच्चों को जितना हम जानेंगे वह तभी हमें भी जान पाएंगे।

उत्तरकाशी से आए ओम बधाणी ने कहा कि मैं भौतिक विज्ञान का अध्यापक हू। अब सर्व शिक्षा अभियान में आ गया हूं। बीस साल की नौकरी के तौर पर मैं समझा हूं कि हमें काउंसलर के तौर पर भी काम करना होता है। उन्हें जो आता है उसे समझकर हमें पढ़ाना चाहिए। बच्चों के साथ जैसे वे हैं यदि हम बन जाएं तो और सुविधा हो जाती है। बच्चों को स्थान देना चाहिए। उनके भावों को समझें। उनका सम्मान करें।

चम्पावत से आए पूरन बिष्ट ने कहा कि मैं प्राइमरी स्कूल में पढ़ाता हूं। हल्द्वानी में रहता हूं। अल्मोड़ा से पढ़ा हूं। कभी किताबों को हाथ में ले जाकर शान हुआ करती थी। हमने नाटक भी किए। आज हल्द्वानी जैसे शहर आकार ले रहे हैं वह कंक्रीट के जंगल हैं। इन शहरों में पैसों की बात होती है। बच्चे पढ़ते हैं। हम आज जिन बच्चों को पढ़ा रहे हैं, वह पढ़ने की ललक से पहले अभावों में हैं।  बच्चों को स्कूल में लाने से पहले उनके परिजनों से बात करनी पड़ती है। उनकी दुनिया में पढ़ने के महत्व से पहले बहुत कुछ है। अभाव है। गरीबी है। समस्याएं हैं।

हल्द्वानी से आए शिक्षक नेता महेश बवाड़ी ने कहा कि मैं नैनीताल में पढ़ा हूं। अपने दौर में बहुत कुछ पढ़ा। शिक्षक बन गया। कुछ ऐसा पढ़ लिया जिसने प्रतिरोध करना सिखाया। हस्तक्षेप करना सिखाया। हमने विद्यालयी शिक्षा के हित के लिए अधिकारियों से बहसें की। विवाद भी हुए। मतभेद भी हुए। बीस साल से भाभर के क्षेत्र में रह रहा हूं। पढ़ना भी एक तरह की बीमारी है। यह लगनी जरूरी है। पढ़ने-लिखने की बातचीत जरूरी है। गणित पढ़ाता हूं। सामूहिक कक्षाएं भी चलता हूं। मैं सकारात्मकता में भरोसा करता हूं। बच्चे सकारात्मक हों। हम केवल स्कूली किताबों पर क्यों भरोसा करें। हम क्यों नहीं कविता, कहानी, मैच आदि पर बात करते? दरअसल हमारे केन्द्र में बच्चे नहीं हैं। हम में से अधिक आने-जाने वाली नौकरी कर रहे हैं।

भूपेन ने कहा कि मैं टीचिंग में नहीं हूं पर टीचिंग में रहा हूं। पढ़ने-लिखने के काम में रहा हूं। कविता की। नाटक किए। फिल्म भी की। सत्रह साल में बारह नौकरी की। हमारे सोचने-समझने का तरीका होता है, हम वैसे ही हो जाते हैं। साझा करने की आदत खत्म हो रही है। ज्ञान की राजनीति न हो। कक्षा-कक्ष में ज्ञान तभी फैलेगा जब कक्षा में भेदभाव न हो। बच्चों को सम्मानित करने का दायित्व भी हमारा है। पारम्परिक तरीके पर सवाल करने की जरूरत है। आलोचना करने का अधिकार दें। सीखने की प्रक्रिया कैसे आए। कक्षा कक्ष में हम सबको अवसर दें। ज़्यादा बेहतर इंसान दें। मेरे छात्रों में मैं लोकप्रिय हूं। वे मेरे दोस्त भी हैं। टीचर बहुत बदलता है। यदि सवाल करे वह बच्चों से। उन्हें सवाल करना सिखाए।

बाजपुर से आए सुरेश चन्द्र भटृट ने कहा कि ग्यारह साल से पढ़ा रहा हूं। उन्होंने कहा कि छात्रों के मन में मेरी क्या जगह है ये तो वे ही बता सकते हैं। लेकिन संस्थाध्यक्षों की आंखों में हमारे जैसे लोग खटकते हैं। हम हस्तक्षेप करते हैं। बच्चों के हितांे की बात करते हैं। इस हस्तक्षेप को बढ़ाए जाने की जरूरत है।  हमने स्कूल में वो सब करने की कोशिश की जो बच्चों को पसंद आए। पुस्तकालय को जीवंत किया। दीवार पत्रिका का काम किया। बच्चों में रचनात्मकता के काम करता हूं। परम्परागत अध्यापक से मैं अब नवाचारी काम करने लगा हूं। सीखता हूं। बच्चों को समझने की कोशिश करता हूं। बच्चों के संस्मरण आते हैं। उनमें लेखन कला का विकास करता हूं। लोक कथाओं, स्थानीय संस्कृति पर लेखन करवाता हूं। उन्हें समझते हुए करियर और काउंसलिंग करने की कोशिश भी करता हूं।

नैनीताल से आए विनोद जीना ने कहा कि यह सही है कि अधिकतर शिक्षक स्कूल आना और जाना ही अपना काम समझते हैं। अर्थशास्त्र पढ़ाते हुए मुझे लगता है कि यदि सन्दर्भ से बात करंे तो बच्चे खुलकर बातें करते हैं। बच्चों से सीखने को मिलता है। मैं सोचता हूं कि हम यहां आए सुझावों का कैसे अपने स्कूल में इस्तेमाल करें यह चुनौतीपूर्ण है और इसे करना ही होगा। भले ही यह समस्या के तौर पर देखना हमारी सोच है लेकिन मैं यह भी जानना चाहंूगा कि नवाचारों का आप सब लोग कैसे इस्तेमाल करते हैं। यह समझना भी अपने आप में सीखना है। बहुत सारी चुनौतियां हैं जिनमें यह सवाल हमें परेशान करता है कि हम और हमारे स्कूल यदि इतने गुणवत्तापूर्ण हैं तो हम अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ा पाते हैं।

कल्जीखाल पौड़ी से आए मनोधर नैनवाल ने कहा कि वह बुनियादी स्कूल में विज्ञान पढ़ाते हैं। अध्यापन से पहले पन्द्रह साल बेरोजगारी को बेहद करीब से देखा है। बहुत सारी असफलताएं देखी हैं। असफलताओं के साथ मेरी जिद भी बढ़ती गई। मैं लक्ष्य बनाता हूं तो पाता हूं कि मैं उन लक्ष्यों को हासिल भी कर लेता हूं। शायद जीवन में जो असफलताओं का सामना किया उन्हीं की वजह से मेरी जिद पूरी हो जाती होंगी। एससीईआरटी के सेवारत प्रशिक्षण लिए और दिए भी। कंप्यूटर के साथ शिक्षण कार्य किया। कंप्यूटर सीखते-सीखाते एक समूह की जरूरत पड़ी। मिल-जुल कर सृजन समूह का गठन किया। 2008 में सृजन समूह बनाया। तभी से हम कुछ शिक्षक बैठते हैं। शिक्षा के सरोकारों से जुड़े मसलों पर चिन्ता करते हैं। उन्हें साझा करते हैं।

रुद्रपुर महाविद्यालय की इतिहास प्रवक्ता अपर्णा सिंह ने कहा कि यह बात भी सही है कि बच्चे पढ़ते नहीं। लेकिन यह बात भी उतनी सही है कि उन्हें पढ़ने के अवसर कितने मिलते हैं। उन्हें पढ़ने के लिए विविधता से भरी पुस्तकें काॅलेज में मिलती भी है या नहीं। यह भी गौर करना जरूरी है कि यदि वे पढ़ने आते हैं तो अध्यापक उन्हें पढ़ाने के लिए कितना तत्पर हैं। हां यह बात भी सही है कि यदि हम उनसे जुड़ते हैं तो वे भी हमसे जुड़ने के लिए तैयार रहते हैं।

चकराता के भटाड़ से आए निरंजन सुयाल ने कहा कि मेरे अध्यापन में पहाड़ शामिल है। स्थानीय सरोकारों की पत्रिकाएं और पत्र शामिल है। पढ़ाने के साथ-साथ पहाड़ को पढ़ना मेरा काम है। यह के कामों को,पीड़ाओं को समझना भी मेरा काम है।

अगस्त्यमुनि से आए गजेन्द्र रौतेला ने कहा कि हमारे भीतर की आवारगी और घुमक्कड़ी जिन्दा रहनी चाहिए। जिंदगी तो बहती नदी है। इसे नहीं थमना होता है। हमारे पैरों को भी नहीं थकना चाहिए। हम जहां हैं वहां की जिंदगियों को समझना भी हमारा काम है। जड़ों से जुड़े रहना और उसे समझना भी जरूरी है। गजेन्द्र रौतेला जी ने कहा कि शिक्षक की भूमिका केवल विद्यालय में ही नहीं है। स्कूल से बाहर भी हमें काम करना होगा। संवाद समुदाय से हों तो कोई परेशानी नहीं होती। उन्होंने कहा कि यदि देखा जाए तो सुदूर गांव में अध्यापक अपने आप में एक सरकार है। वह केवल पढ़ाता ही नहीं है। वह सारे काम में सहयोग भी करता है।

रानीबाग से आए दिनेश कर्नाटक ने कहा कि जब सेवा में आया था तो बड़ी उम्मीदें लेकर आया था। लेकिन धीरे-धीरे लगा कि अधिकतर अध्यापकों में निराशा ज़्यादा है। लेकिन आशावादी नज़रिए वाले अध्यापकों की भी कमी नहीं है। हमने दख़ल प्रारंभ किया। पर्चा निकाला। धीरे-धीरे शैक्षिक दख़ल ने आकार लिया। आज 1300 से अधिक सदस्यों तक पत्रिका सीधे पहुंच रही है। हम यह समझ पाए हैं कि शिक्षा की भी राजनीति होती है। शिक्षा में भी राजनीति होती है। हां हम यह समझते हैं कि एक समान शिक्षा को लागू करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि शिक्षक का काम केवल पढ़ाना ही नहीं होता। वह शिक्षा से जुड़े और भी कामों में हस्तक्षेप करे। उन्हें समझे। जाने और विमर्श का हिस्सा बने।

 
पिथौरागढ़ से आए निर्मल ने कहा कि मैं दो हजार छह से शिक्षा में काम कर रहा हूं। बच्चों के साथ मिलकर काम किया। बच्चों को अपने आस-पास के बारे में जानने वाले काम किए। बच्चे अपने आस-पास के काम को करने में आनंद लेते हैं। आवासीय विद्यालय में काम करने का अलग आनंद है। छात्र में ग्रहण करने का भाव भी बेहद जरूरी है। वह उसके अंदर से होना चाहिए।    

टिहरी से आए सुनील डंगवाल ने कहा कि तेइस साल से पढ़ा रहा हूं। लेकिन जो उत्साह पहले था उसे आज भी बनाए रखा है। पढ़ने लिखने का काम कक्षा से बाहर भी करने की जरूरत है। पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ना और उनमें लिखना भी हमारे काम का हिस्सा होना चाहिए। सुनील डंगवाल ने कहा कि प्रातःकालीन सभा में बच्चों के साथ बेहतर ढंग से काम किया जा सकता है।

उत्तरकाशी से आए सुन्दर लाल नौटियाल ने कहा कि अभी सीखने का दौर है। आज समझ में आ रहा है।  उन्होंने कहा कि हमारी वैचारिक शून्यता को तोड़ने का समय है। हमारी कार्य संस्कृति में जनपक्षधरता दिखाई देनी चाहिए। निजी से अधिक हम सामूहिकता की ओर बढ़ें। शिक्षक का काम पढ़ाना है और लगातार पढ़ना भी है।
 
पिथौरागढ़ से आए चिन्तामणि जोशी ने कहा कि मुझे तो अपने अध्यापन कार्य पर गर्व होता है। उन्होंने बाल साहित्य में चस्का लगने का संस्मरण सुनाते हुए कहा कि मैंने एक खरगोश के बदले में पत्रिकाएं पढ़ने की शुरूआत की। जिन्दगी में सीखने-सीखाने का मौका हर बार हर समय मिलता रहता है। हमें अपने आस-पास के परिवेश को गहराई से समझने की जरूरत है।

पिथौरागढ़ से आए गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक ने कहा कि पिछले ग्यारह सालों से पढ़ा रहा हूं। मैं भी बदला हूं। बच्चों ने मुझे भी बदला है। बच्चों के साथ लगातार दूर्गम में रहने के कारण मैंने लोक को समझा है।

अगस्त्यमुनि से आए मनोज कंडियाल ने कहा कि दूर-दराज में रहने से हमने गांव को समझा, बच्चों की समस्याएं और मनस्थिति को समझा। मैं गणित पढ़ाता हूं। लेकिन केवल गणित नहीं पढ़ाता। गणित के किस्से भी सुनाता हूं। विज्ञान पढ़ाता हूं। विज्ञान नहीं पढ़ाता विज्ञान से जुडें व्यक्त्यिों,घटनाओं और बातों के किस्से सुनाता हूं। हमें बच्चों में लेखन को बढ़ाने के लिए नए-नए तरीकों को समझना होगा। हमें बच्चों को सपने दिखाने होंगे। उनके अपने सपने हों। वह उन सपनों को अपनी आंख से देंखें। उन्हें साकार करने के लिए आगे बढ़ें।

खजान सिंह ने समय को ध्यान में रखते हुए लगभग सात बजे से पूर्व एपीएफ के साथियों का परिचय भी दिया। जिनमें प्रतिभा कटियार, चन्द्रकला, भास्कर उप्रेती, विवेक सोनी, प्रमोद पैन्यूली, प्रियम्वद, मदन मोहन पाण्डे, कमलेश जोशी प्रमुख थे। सुबह ठीक छह बजे टिप एण्ड टाॅप घूमने जाने के संकल्प के साथ पहले दिन का समापन हो गया।

-मनोहर चमोली ‘मनु’
9412158688