23/06/2017

child story nandan नंदन : जुलाई 2017

'मैं हूं दोस्त तुम्हारी'


-मनोहर चमोली ‘मनु’


‘भारी बारिश के कारण स्कूल दो दिनों के लिए बंद रहेगा।’ टिन्नी की स्कूल बस के ड्राइवर अंकल का फोन था।

यह सुनकर टिन्नी और उसका छोटा भाई रोहन खुशी से उछल पड़े। मम्मी ने रसोई से ही आवाज़ लगाई-‘‘धमा-चैकड़ी बंद करो। पढ़ाई करो।’’

टिन्नी चहकते हुए बोली-‘‘ममा। होमवर्क कंपलीट है। अब दो दिनों तक नो होमवर्क, नो स्टडी।’’ मम्मी ने कहा-‘‘ठीक है। मैं रसोई की सफाई करती हूं। तब तक तुम दोनों रूम्स की सफाई करो। उसके बाद तुम्हें किशमिश वाला हलुवा बनाकर खिलाती हूं।’’


रोहन टिन्नी से बोला-‘‘मैं छोटा हूं। मैं छोटा रूम साफ करता हूं। आप बड़ी हो। आप बड़ा रूम साफ करोगी। ड्राइंगरूम भी। देखते हैं, कौन पहले कंपलीट करता है।’’


टिन्नी हंस पड़ी। आंखें मटकाते हुए बोली-‘‘अच्छा बच्चू। यहां भी होशियारी। चल फिर भी, मुझे तेरा चेलेंज स्वीकार है।’’ 

छोटे कमरे की सफाई करते-करते रोहन को कुर्सी के पीछे बाॅल मिल गई। वह सफाई छोड़कर बाॅल से खेलने लगा। टिन्नी ने पहले बड़ा कमरा साफ किया। अब वह ड्राइंगरूम को साफ करने लगी। तभी उसकी नज़र छत के एक कोने पर पड़ी। एक मकड़ी अपने जाले पर झूल रही थी।


‘‘संडे को तो मैंने झाड़ू से जाला साफ कर दिया था। इस मकड़ी ने फिर जाला बना डाला! आज इस मकड़ी की खैर नहीं।’’ 


टिन्नी ने हाथ में झाड़ू उठा लिया। ड्राइंगरूम की छत ऊंची थी। टिन्नी ने मेज सरकाई। मेज के ऊपर कुर्सी रखी और उस पर चढ़ गई। पर यह क्या! कुर्सी को मेज पर रखते-रखते वह झाड़ू फर्श पर ही छोड़ गई थी। टिन्नी संतुलन बनाते हुए वह कुर्सी से नीचे उतर ही रही थी कि उसके पैर डगमगा गए। वह धम्म से फर्श पर आ गिरी। फर्श पर कालीन बिछा था। टिन्नी ने दांये हाथ में झाड़ू पकड़ा और सावधानी से मेज पर चढ़ते हुए दोबारा कुर्सी पर चढ़ने लगी।


‘‘चोट तो नहीं लगी? ज़रा सावधानी से।’’
‘कौन?‘ टिन्नी बुदबुदाई।
‘मम्मी तो रसोई में है। रोहन छोटे वाले रूम में है। तो फिर मेरे कानों के नज़दीक ये कौन बोला?’ 


टिन्नी यहां-वहां देखने लगी। तभी कोने की दीवारों में बना जाला हिला और मकड़ी ने हवा में छलांग लगाई। 

वह किसी अदृश्य झूले में झूलते हुए फिर टिन्नी के कान के पास से गुजरी और धीरे से बोली-‘‘ये कि हम बोले। हम यानि वो, जिसका जाला तुम दो बार तोड़ चुकी हो। आज फिर से तोड़ने की तैयारी मे जुटी हो।’’ दूसरे ही क्षण मकड़ी अपने जाले में जाकर बैठ गई।


‘‘मैं तुम्हारा जाला तोड़ रही हूँ और तुम हो कि मेरी परवाह करते हुए पूछ रही हो कि चोट तो नहीं लगी। ज़रा सावधानी से। यही कहा था न तुमने?’’

‘‘हां। मैंने यही कहा था। मेरी तरह तुम्हारे पास मजबूत जाला तो है नहीं कि तुम इतनी ऊंचाई से आसानी से नीचे उतर सको। मेरा तो घर भी यही है और रसोई भी।’’

‘‘लेकिन तुम तो दूसरों को जाल में फंसाती हो और फिर उन्हें मारकर खा जाती हो। तुम बुरी हो इसलिए मैं तुम्हारा जाला बार-बार हटाती हूं। तुम हो कि बार-बार बना देती हो।’’

‘‘मैं जाल में किसी को नहीं फंसाती हूं। वो मेरे घर में आ घुसते हैं। बस मैं दौड़कर अपने शिकार को मार डालती हूं।’’

‘‘आप भी तो हमारे घर में आ घुसी हो। मैं आपको मार डालूं तो?’’

‘‘मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? वैसे मैं भी क्या करूं? मैं उस जगह में ही तो अपना जाला बनाऊंगी, जहां मुझे भोजन मिलेगा। आपके घर में मुझे कीट-पतंगे और मक्खियां मिलती हैं। मैं तो अपने शिकार के शरीर से पोषक रस ही चूस पाती हूं। मैं तुम्हारी तरह ठोस भोजन नहीं खा सकती। वैसे तुम मेरा जाला तोड़कर एक तरह से मुझे मार ही तो रही हो। जबकि मैं तुम्हारी दोस्त हूं।’’

‘‘दोस्त हो? तुमसे कौन दोस्ती करेगा? तुम तो विषैली हो?’’

‘‘हां मैं विषैली हूं। पर कीट-पंतगों और मक्खियों के लिए। तुम्हारी तरह बहुत हैं, जो यह नहीं जानते कि मेरी जैसी अधिकांश घरेलू मकड़ियों का विष तुम पर असर नहीं करता। फिर भी मुझे तुम मारना चाहती हो? जबकि मैं तुम्हारी दोस्त हूं।’’

‘‘तुम मेरी दोस्त कैसे हो सकती हो?’’

‘‘बताती हूं। मैं अगर कीट-पतंगों को अपना शिकार न बनाऊं तो वे बढ़ते चले जाएंगे। मैं मच्छरों और विषैले कीटों को खाती हूं। मेरे बारीक रेशमी तंतुओं से आॅप्टिकल उपकरणों के महीन तार बनते हैं। यही नहीं फसलों और तुम्हारे शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को भी तो मैं खाती हूं। तो बताओं, मैं तुम्हारी दुश्मन हुई कि दोस्त?’’

‘‘लेकिन, फिर भी। घर में जाले कोई क्यों पसंद करेगा?’’

‘‘अरे। साफ-सफाई रखने को कौन मना कर रहा है। मेरी जैसी मकड़ियां वहीं तो रहेंगी,जहां उन्हें शिकार मिलेगा। यदि यहां शिकार न मिले तो मैं कहीं ओर अपना डेरा बना लूंगी। लेकिन इतना समझ लो कि हम मकड़िया रीढ़ वाले जीवों की दोस्त हैं।’’

‘‘अरे! ये क्या कर रही हो। गिरोगी क्या? चलो छोड़ो इस झाड़ू को। हलुवा बन चुका है। साफ-सफाई मैं अपने आप करती हूं।’’

मम्मी रसोई से सीधे ड्राइंगरूम में आ गई। मम्मी मेज-कुर्सियां ठीक कर रही थी और टिन्नी मकड़ी को देखकर मुस्करा रही थी। वहीं रोहन रसोई में पहुंच चुका था। कमरों की सफाई करने का कंपीटीशन वे दोनों ही भूल चुके थे।


॰॰॰ 
-मनोहर चमोली ‘मनु’

-09412158688

12/06/2017

चुप न रहें गलत बात का विरोध करें

हस्तक्षेप: एक

‘चलो छोड़ो‘, ‘रहने दो‘ से काम नहीं चलता

-मनोहर चमोली ‘मनु’

मैंने उन दोनों की ओर देखते हुए कहा-‘‘आप भी हद करते हैं। बस धुएं से भरी पड़ी है।’’

यह सुनते ही कम उम्र का अपरिचित व्यक्ति बीड़ी का जलता हुआ ठंूठ खिड़की से बाहर फेंकते हुए बोला-‘‘स्टाॅफ के हैं। और फिर बस अभी चल नहीं रही है।’’

   पोस्ट की फोटो का हस्तक्षेप एक से सीधा कोई संबंध नहीं है। 
मैंने जवाब दिया-‘‘तो? ये सार्वजनिक जगह है। आप बस से उतर कर भी तो बीड़ी-सिगरेट पी सकते हैं।’’ मेरा इतना कहते ही दूसरे सज्ज्न जिनके हाथ पर सिगरेट अभी भी जल रही थी। वह चुपचाप नीचे उतर गए और मेरी आंखों से ओझल हो गए। हालांकि उन्होंने तब भी सिगरेट नहीं बुझाई।

मुझे बस के भीतर बैठे हुए सज्ज्न की बातों से थोड़ा तकलीफ हुई थी। मैंने कहा-‘‘यहां हर किसी को अपनी पड़ी है। दूसरे की कोई परवाह भी नहीं है।’’ मैंने यह बात महिला को देखते हुए कही थी। जो साड़ी के पल्लू से मुंह और नाक में धुएं को जाने से रोक रही थी। मैं हैरान था कि वह भद्र महिला मुझसे पहले से ही अकेली बस में बैठी थी। ज़ाहिर सी बात है कि धुएं का भभका उन्हें भी परेशान कर रहा था।

पहले सज्ज्न मुझे घूरते हुए बोले-‘‘सुबह-सुबह ड्रामा करने आ गए हैं।’’ यह कहते हुए वह तेजी से बस से बाहर निकल गए।  

मैंने अंदाज लगाया कि अभी बस में दो ही सवारी हैं। दस-पन्द्रह मिनट से पहले तो बस अड्डे में ही रहेगी। मैं सीट पर बैग रखकर बस से उतर गया। 
यह सुबह का समय था। लगभग नौ बज रहे थे। मैं बस अड्डा पहुँच गया था। राजकीय परिवहन निगम की दिल्ली जाने वाली बस सवारी से भर गई थी। सीट न होने की वजह से बस से उतर जाता हूँ। तभी मेरी नजर गढ़वाल मण्डल ओनर्स यूनियन लिमिटेड की बस पर पड़ती है। वह कोटद्वार जाने के लिए तैयार है। मैं उस बस की ओर लपकता हूँ। यह क्या बस खाली! परिचालक की सीट पर एक महिला यात्री बैठी है। बोनट के बायीं ओर दो अधेड़ उम्र के व्यक्ति बैठे हैं।

 मैंने अभी अपना एक अदद बैग सीट पर रखा ही था कि बस में सिगरेट और बीड़ी के भभके से मेरा जी मचल उठा। परिणाम यह था कि मैंने अपनी बात कही थी। अपनी बात कहने के एवज में इस तरह की प्रतिक्रया की मुझे कतई आशा नहीं थी। अब आगे मुझे कुछ करना ही था।

मैं सीधे गढ़वाल मण्डल ओनर्स यूनियन के कार्यालय जा पहुंचा। भीतर दो कार्मिक चाय पी रहे थे। मैंने सीधे कहा-‘‘एक शिकायत करनी है। कोरा काग़ज मिलेगा?’’

उनमें सीनियर कार्मिक बोले-‘‘क्या हुआ?’’ मैंने सारी बात बता दी। वह बोले-‘‘आप चाय पियेंगे?’’ मैंने न कहा। उन्होंने आलमारी से कागज निकाला। मैंने मोबाइल में खींची फोटो जो बस के पिछवाड़े का हिस्सा थी। फोटों से बस नंबर नोट किया और जल्दी-जल्दी में पूरा वाकया लिख दिया। यह भी लिखा कि मुझे इस शिकायत पर कार्रवाई की सूचना भी चाहिए। रबर स्टैम्प लगाने के बाद उन्होंने वो प्रार्थना-पत्र मुझे दे दिया। मैंने मूल प्रार्थना पत्र की इमेज मोाबाइल में कैद कर ली।

मैंने कहा-‘‘मैं फिलहाल उसी बस में कोटद्वार जा रहा हूं। पांच दिन बाद लौटकर आपके पास फिर आऊंगा।’’

अब कनिष्ट कार्मिक बोला-‘‘आप हमारे कोटद्वार सीनियर कार्यालय में इसे जमा करा सकते हैं। यदि हम पर भरोसा है तो हम भिजवा देंगे।’’

मैं मुस्कराया। बोला-‘‘यकीनन। मैं चाहता हूं कि बस का कंडक्टर माफी मांगे। लिखित में भविष्य में ऐसी घटना को न दोहराए। अन्यथा मैं कानूनी कार्रवाई भी करवाऊंगा।’’ 

यह कहकर मैं उसी बस में वापिस लौट आया। तब तक बस भर चुकी थी। मेरा बैग मेरी सीट पर न होकर नीचे रखा था। जो महिला मेरी सीट पर बैठ चुकी थी। मैंने उनसे ऐसा न करने की बात रखी। पहले से कंडक्टर की सीट पर बैठी महिला बोली-‘‘मैंने इनसे कहा भी था कि आप बाहर गए हैं।’’ बहरहाल मैं सबसे पीछे बची एक सीट पर जाकर बैठने से पहले उन भद्र महिला से इतना तो कहा-‘‘आज तो आपने ऐसा कर दिया। लेकिन भविष्य मैं ऐसा मत करना।’’ वह चुप ही रहीं।

बस चलने लगी। यह क्या! जिन सज्ज्न को मैं कंडक्टर समझ रहा था। वह तो चालक निकले। कंडक्टर कोई ओर थे। वह दूसरे सज्जन स्टाफ के थे यानि किसी दूसरी बस के कंडक्टर या चालक रहे होंगे। जब टिकट लेने की बारी मेरी आई तो मैंने धीरे से कंडक्टर से चालक का नाम पूछा। कंडक्टर ने नाम तो बताया पर यह भी पूछा कि क्यों पूछ रहे हो। मैंने टाल दिया। 

सवा नौ बजे चली बस धक्का परेड सी करती हुई अपने अनुमानित समय से दो घण्टा लेट कोटद्वार पहुंची। हैरानी की बात यह थी कि इस पूरी यात्रा के दौरान चालक साहब जिनसे मैं उलझ पड़ा था, पूरे रास्ते बीड़ी-दर-बीड़ी फूंकते रहे। हैरानी यह हुई कि ठसाठस भरी बस में किसी ने उन्हें टोकने की ज़हमत नहीं उठाई। मैं दोबारा उलझने से बचा। कारण था कि गाड़ी चलाते समय एक चालक से उलझने का मामला बेहद घातक साबित हुआ था। उस पर फिर कभी। 

बहरहाल जैसे-तैसे मैं नजीबाबाद लगभग चार बजे से थोड़ा पहले पहुँचा। वहां से रेल की यात्रा करता हुआ दिल्ली विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल गेस्टा हाउस पहुंचते-पहुंचते रात के बार बज गए। 

मैं तीन दिवसीय संगोष्ठी में व्यस्त हो गया। समापन के समय मेरा मोबाइल घनघनाता है। पारम्परिक फोन का नंबर देखकर एसटीडी कोड भी को मैं पहचान नहीं पा रहा था। सभागार से बाहर आया। फोन सुना तो फोन कोटद्वार के बस कार्यालय से आया था। उन्होंने फिर से पूरा मामला फोन पर जानना चाहा। मैंने सारा मामला बताया। यह भी जोड़ा कि वह साहेब कंडक्टर नहीं चालक थे। उनका नाम भी बता दिया। वह बोले-‘‘हमने बस पर जुर्माना लगाया है। चालक ने लिखित में माफी मांग ली है। वह दोबारा ऐसा नहीं करेंगे। आपको हुई असुविधा के लिए खेद है। जुर्माना भरने के बाद हम पुष्टि का पत्र भी आपको भेजेंगे।’’

मैंने इतना जोड़ा-‘‘गढ़वाल में जीएमओयू और कुमाऊँ में केएमओयू में सैकड़ों यात्री आज भी सफर करते हैं। लेकिन स्टाॅफ बेहद उपेक्षित व्यवहार यात्रियांे के साथ करते हैं। आप क्यों नहीं अपनी संचालित बसों का औचक निरीक्षण करते?’’ वह फोन पर अगर-मगर किन्तु-परन्तु करते रहे। चालक-परिचालकों की आर्थिक स्थिति, पारिवारिक स्थिति, बीमारी, दयनीयता, बेचारगी पुराण सुनाने लगे। जो मुझे भी अजीब-सा लगा।
 
इतना तो तय है कि बस संचालकों को ध्रूमपान निषेध अधिनियम पढ़ना पढ़ा होगा। न्यूनतम-अधिकतम जुर्माने के फेर में तीन दिन लगा दिए। बसों का एक पूरा फेरा अंगूठी के आकार में होता है। जिसके परिणामस्वरूप वही बस आज जिस रूट पर चल रही है, चार-पांच दिन बाद ही नंबर पर आती है। उन दिनों यात्रा सीजन चरम पर था। इनकी बहुत सारी बसें यात्रा पर चली जातीं हैं। इस पूरे अनुभव से मुझे भी बहुत कुछ जानने-सीखने को मिला।  

तो इस तरह इस यात्रा का एक हिस्सा जो मेरे विचार से रहा-बचा था, मेरे हिसाब से पूरा हो गया।

॰॰॰  -मनोहर चमोली ‘मनु’ 
(सन्दर्भ:शिक्षा के सरोकार-1,अम्बेडकर विश्वविद्यालय,दिल्ली में आयोजित होने जा रही राष्ट्रीय संगोष्ठी में भागीदारी हेतु बस से दिनांकित 22 मई 2017 को पौड़ी से कोटद्वार जाते समय।) 


06/06/2017

Meet to Ganesh Ghukhshal Gani

अपने भीतर के आदमी को बाहर लाएं: गणेश खुगशाल ‘गणी’

-Manohar Chamoli 'manu'

‘‘यह पहला मौका है कि मैं अपने ही शहर में ऐसे प्रबुद्ध श्रोताओं के समक्ष हूं जो उस पेशे से हैं जिस पेशे से मेरा बुनियादी बचपन जुड़ा है। मैं आज भी अपने उन गुरुजी को याद करता हूं जिनके घर हम दौड़ लगाते थे। ऐसी दौड़ कि जो पहले पहुंचेगा गुरुजी के घर में बचा हुआ भात खा सकेगा। मैं उस घर से हूं जिसके मुखिया ने हल जोत कर बच्चों को पढ़ाया। अपने पचासवें वसंत के आगमन पर पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि गरीबी की दिक़्कतों के साथ जीना संघर्ष को बनाए रखता है। उम्मीद और आशा को छोड़ने नहीं देता।’’
Ganesh Khughshal gani,Manohar Chamoli manu,Maheshanand and Jagmohan Khatait


अपने जीवन से जुड़े अनेकानेक संस्मरणों के साथ गणेश खुगशाल ‘गणी’ जी पौड़ी स्थित टीचर लर्निंग सेंटर में कार्यक्रम ‘इनसे मिलिए’ के तहत उपस्थित थे। लगभग पचास शिक्षकों की मौजूदगी इकतीस मई दो हजार सत्रह की शाम और अजी़म प्रेमजी फाउण्डेशन कार्यालय। तकरीबन सात बजे यह कार्यक्रम आरंभ हुआ। एक घण्टा सैंतालीस मिनट के अपने संबोधन में गणी जी ने लगभग बाईस सवालों का जवाब भी बड़ी सहजता से, रोचकता से और प्रभावपूर्ण तरीके से दिया।

एक कुशल संचालक,पत्रकार, उदघोषक, पत्रकार शिक्षक, संपादक, जल के जानकार, संदर्भ व्यक्ति, संस्कृतिकर्मी ने अपने पिछले छब्बीस साल के सामाजिक जीवन के साथ अपने बचपन,युवावस्था के कई खट्टे-मीठे-कड़वे अनुभव भी साझा किए। अपनी मुफलिसी और संघर्ष के दिनों को जिस सादगी और सच्चाई के साथ बगैर लाग-लपेट के गणी जी ने रखा वह चुपचाप सुन रहे श्रोताओं की सजगता स्पष्ट गवाही दे रही थी। 

उन्होंने बार-बार कहा कि हमारे पहाड़ के कई सच हैं। एक सच यह भी है कि हम में से अधिकतर गांव पढ़ाई और रोजगार के लिए छोड़ते हैं। पर वह ऐसा छूटता है कि फिर उन रास्तों पर लौटना सहज नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि जीवन के कई रास्ते यदि बंद होते हैं तो आपकी ही प्रतिबद्धता एक नया रास्ता भी सुझाती है। आज भी मुझे अपने बुनियादी शिक्षक के घर में पका हुआ भात याद आता है। हम पहाड़ियों के घर की रसोई में भात और चीनी तो बहुत बाद में पहुंची। 
उन्होंने कहा कि इस शहर में लगभग चार हजार शिक्षक हैं। जो आस-पास के गांव,शहर,कस्बों में सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन उनमें से कई ऐसे भी हैं जिन्हें उनके छात्र, अभिभावक और यह शहर आदर और सम्मान के भाव से आज भी देखता है जैसे सालों पहले देखा जाता रहा है। समाज ही हमारा मूल्यांकन करता है। हम कहीं भी खड़े हों। हमें हजारों आंखें हर समय देखती है। उन्होंने कहा कि जीवन कितना ही जटिल हो। आपाधापी कैसी भी हो। हमारी प्रतिबद्धता ही हमें पहचान दिलाती है। समय का सार्थक उपयोग करना भी अपने आप में चुनौती है। 

उन्होंने जोड़ा कि श्रोता के तौर पर यहां उपस्थित एक-एक अध्यापक कई विषयों के जानकार हैं। वे मानते हैं कि कक्षा-कक्ष में और विद्यालय में छात्रों के साथ जो सहज सम्बन्ध होना चाहिए, रखते होंगे। उन्होंने संस्मरणों के माध्यम से बताना चाहा कि जीवन में बहुत बार एक पल के ऐसे क्षण होते हैं जो हमारे रास्ते बदल देते हैं। दशा बदल देते हैं और दिशा भी बदल देते हैं। 

जनपक्षधर की पत्रकारिता के लिए लोकप्रिय गणेश खुगशाल ‘गणी’ ने कहा कि यदि सीखने-समझने की ललक हो और अपने काम के प्रति आशावादी नज़रिया हो तो आपको आपका काम ही स्थापित करता है। भले ही बाधाएं डालने वाले आपके आस-पास ही हों। बहुत छोटे-छोट पलों के हिस्से आपको बड़ी-बड़ी उपलब्धियां दे जाते हैं। बहुत छोटे-छोटे सफर आपको ऊंचाई भरी मंजिलों के पता देते हैं। यदि चलना ही लक्ष्य हो तो आपके सफर में आपको बेहतरीन इंसान भी मिलते हैं। जिनके साथ जुड़कर आप नया सीखते हैं।

उन्होंने गढ़वाली गायक नरेन्द्र सिंह नेगी जी के साथ पहली मुलाकात और फिर उनके अधिकतर कार्यक्रमों के संचालन तक के अनवरत् चल रहे सफर का संस्मरण भी सुनाया। उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी चीज़ें आपके जीवन का बड़ा हिस्सा बन जाती है और हमें पता ही नहीं चलता। 

पत्रकारिता के जीवंत और कसैले अनुभवों के साथ रेखांकित किए जाने वाले पलों को भी उन्होंने साझा किया। उन्होंने कहा कि बारहवीं तक की शिक्षा ठेठ ग्रामीण पृष्ठभूमि में हुई। एक छात्र की ग्रामीण पृष्ठभूमि की दुनिया बहुत छोटी होती है। ये ओर बात है कि उस छोटी सी दुनिया में मानवता,नैतिकता और प्रेम से भरी प्रकृति का बड़ा फलक ताकत देता है। उन्होंने पौड़ी से दिखाई देने वाली हिमालयी श्रंृखला को अपनी ताकत बताया। उन्होनंे कहा कि कई बार दिल और दिमाग से काम लेना होता है। कई बार मन-मस्तिष्क में संघर्ष चलता है। फैसला आपको करना होता है कि किसे सुना जाए और किसे माना जाए। 

हिन्दी भाषी राज्यों में विविधता से भरे संदर्भ व्यक्ति के तौर पर काम कर रहे गणी जी ने कहा कि यह दौर जीवट है। यदि अपना लक्ष्य निर्धारित है। उस पर चलने का हौसला और समर्पण है तो यह तय है कि सफलता धीरे-धीरे नजदीक आती है। उन्होंने कहा कि हर एक आदमी के भीतर एक आदमी होता है। जो बाहर आना चाहता है। उस भीतर के आदमी को पहचानना होता है। वही असल का आदमी है। यह तो आपको तय करना होता है कि आपके भीतर का आदमी कौन है। वह क्या चाहता है। हर आदमी खुद को बेहतर जानता है। वह जानता है कि वह क्या है? वह क्या कर सकता है। उसकी क्षमताएं क्या है? यह हमें ही खोजना होगा कि हम क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते। 

अपने अट्ठाइस साल की लेखन यात्रा में आकाशवाणी, पत्र,पत्रिकाएं, संपादन, यात्राएं, पारिवारिक दायित्व, बचपन, शिक्षा, समाज, राजनीतिक पक्ष पर भी वे खुलकर बोले। उन्होंने अपने अट्ठाईस साल के सार्वजनिक जीवन के कई पक्षों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि जीवन के कई मोड़ों पर विचलित होने का समय भी आया लेकिन हिमालय ने मुझे ताकत दी कि डटे रहो। अटल हिमालय मेरी ताकत बना। ये हिमालय मुझसे बात भी करता है। 

भाषा और संस्कृति के जानकार गणी जी ने कहा कि गढ़वाली भाषा के कारण ही मैंने भारत को जाना है। गढ़वाली भाषा ही है जो मुझे गणेष खुगशाल ‘गणी’ बनाती है। हमारी भाषा विश्व की सबसे असरदार भाषा है। हमारी शब्द संपदा बेमिसाल है। समृद्धशाली भाषा की वजह से मैं आगे बढ़ रहा हूं। मेरी भाषा ही मेरा गौरवा है। 

उन्होंने गढ़वाली भाषा, हिन्दी भाषा के साथ-साथ वैश्विक पटल के साहित्य,साहित्यकार और समाजसेवियों पर भी बात की। वे बार-बार इस बात पर केन्द्रित होते रहे कि अपने भीतर खुद को टटोलना होता है। अपने आप से बात करनी होती है। बार-बार खुद से पूछना होता है कि आपको करना क्या है। 

लगभग पचास शिक्षक और पौड़ी स्थित अज़ीम प्रेमजी कार्यालय के साथियों के मध्य गणेश खुगशाल ‘गणी’ जी ने लगभग दो घण्टे बिताए। लगभग चालीस मिनट उपस्थित शिक्षक साथियों ने विविधता से भरे सवाल पूछे। मसलन लोकभाषा पर काम करने का ख्याल कैसे आया? गढ़वाली कविता के प्रभाव क्या हैं?गढ़वाली भाषा प्रभावकारी है फिर भी वह स्थान क्यों नहीं हासिल कर पा रही है जिसकी वह हकदार है? गढ़वाली भाषा में एकरूपता नहीं है तो वह कैसे भाषा बन सकेगी? प्राथमिक स्तर पर हिन्दी माध्यम होने की वजह से गढ़वाली भाषा कैसे सम्मान पाएगी? जीवन के ऐसे कौन से मोड़ आए जब आपने स्वयं को बेहद कमजोर माना? ऐसे कौन से काम है जो आप अभी और करना चाहते हैं? आजीविका और परिवार से संबंधित कई सवाल भी पूछे गए। व्यक्तिगत तौर पर ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जिन्हें आप हासिल नहीं कर सके? 

इन सवालों के आलोक में और भी अनुभवों से जुड़ी सारगर्भित बातें गणी जी ने कही। जिन्हें बिन्दुवार इस तरह समझा जा सकता है।

इंसान कितना भी महत्वपूर्ण हो समाज में हर जगह पसंद नहीं किया जा सकता।
मानवीय कमजोरियां-स्थितियां और परिस्थितियां हर कदम पर परीक्षा लेने को तैयार रहती है। ऐसी स्थिति में अपने भीतर के आदमी की बात सुनो। 
हर परिवार की अपनी भाषा होती है। उस भाषा का महत्व है। उसका सम्मान और उसके साथ जीना भी आना चाहिए। 
असहमतियों की परवाह नहीं करनी चाहिए। अपने रास्ते चलें और स्वयं बाधाएं हटाते चलें। दूसरों के लिए बाधाएं न खड़ी करें।
अपनी जगह से प्यार करें। अपना आत्मबल बढ़ाएं। इसे होमसिकनेस भी कहा जा सकता है। यह कमजोरी भी है तो यह ताकत भी है।
हम विद्यालयी जीवन में जो पढ़ते हैं। वह हमारी समझ,सोच और विचार बढ़ाता है। यह जरूरी नहीं कि स्कूली किताबें हमारे जीवन में कदम-कदम पर काम आए।
स्कूली जीवन से इतर सामाजिक जीवन की पाठशाला में भी हमें कई परीक्षाएं देनी होती है। उसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए। आशावादी नज़रियां हमेशा कायम रहना चाहिए। 
जीवन के कई लक्ष्य हो सकते हैं। लेकिन एक बड़ा लक्ष्य भी खुद ही तय करना होता है। मुझे करना क्या है? यह सवाल हमेशा बना रहना चाहिए।
अपनी भाषा,संस्कृति और कला से प्रेम करें। उसे समझे। देश-दुनिया में कहीं भी जाएं आखिरकार हमें हमारी मूल जड़ से ही जोड़कर देखा जाएगा।
अपनी भाषा से इतर दूसरी भाषा का सम्मान करना भी जरूरी है। लिखने-पढ़ने की आदत अपनी भाषा में भी होनी चाहिए। 
यह तय है कि पारम्परिक ज्ञान,अनुभव और प्रकृति का ज्ञान स्थानीय भाषा में ही संभव है। अनुवाद की भी अपनी सीमाएं हैं। कमजोरियां हैं। भाव-प्रभाव अपनी भाषा में ही अधिक होता है।
व्यक्तिगत, पारिवारिक जीवन पहले हैं। लेकिन सामाजिक और राजनीतिक से हम अछूते नहीं रह सकते। लोक चेतना के साथ-साथ हमें तेजी से बदल रहे समाज का भी अध्ययन करते रहना चाहिए।

 गढ़वाली भाषा की पत्रिका ‘धाद’ के संपादक और लोकभाषा, संस्कृति के मर्मज्ञ गणेश खुगशाल गणी जी का परिचय मनोहर चमोली ‘मनु’ ने साझा किया। शिक्षा के सरोकार और शिक्षकों से जुड़ी गतिविधियों के बारे में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथी जगमोहन कठैत जी ने कहा कि समाज में सहजता, सरलता से उपलब्ध व्यक्तियों से, उनके अनुभव से और उनके जीवन के संघर्षाें को साझा करना भी इन कार्यक्रमों की प्रासंगिकता को सार्थक करता है। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम ‘इनसे मिलिए‘ के तहत कोशिश रहे कि हम आस-पास के सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, कला, साहित्य आदि क्षेत्रों में नायाब कोशिश कर रहे व्यक्तित्वों के साथ समय बिताएं। बातें करें। 

इस शाम गणेश खुगशाल ‘गणी’ पर तैयार किया गया छायाचित्र प्रजे़नटेशन भी साथियों ने देखा। शिक्षक साथियों की ओर से भेंटस्वरूप कलम के सिपाही को एक कलम भेंट में भी दी गई। इस अवसर पर आशीष नेगी, महेशानन्द, अशोक कुमार, प्रवीन, विनय,सुभाष, सूर्यप्रकाश, जयानन्द, गणेश बलूनी, कमलेश बलूनी, धमेन्द्र, राकेश मोहन, राजू नेगी सहित टिहरी, चमोली, पौड़ी के शिक्षक भी उपस्थित थे। बतातें चलें कि अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन के सतत् सहयोग से स्वैच्छिक शिक्षक मंच, पौड़ी के शिक्षक साथी समय-समय पर शैक्षिक संवाद गोष्ठियों का आयोजन करते रहते हैं। टीचर लर्निंग सेन्टर में भोजनोपरांत लगभग साढ़े नौ बजे यह आयोजन समाप्त हुआ। ॰॰॰
-मनोहर चमोली ‘मनु’,भितांई,पोस्ट बाॅक्स-23, पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड। 
मोबाइल-09412158688 व्हाटस एप-7579111144 

 

05/06/2017

फेसबुक मित्र नवीन नौटियाल जी Navin Notiyal and manohar

छोटी सी मुलाकात में बड़ी संभावनाएं होती हैं

-मनोहर चमोली ‘मनु’

जी हाँ। कभी-कभार नहीं अक्सर पल-दो-पल की मुलाकात मेरे जीवन के यादगार अहसासात में तब्दील हो जाती हैं। पहला प्यार भी तो बस क्षणिक मुलाकात का असर होता है। सैल्फी खींचने में स्क्रीन पर टच हुई मेरी तर्जनी। पता भी नहीं चलता कि मस्तिष्क ने कब कहा कि छूओ। मेरी उंगली मुझ से आदेश लेती भी नहीं कि दूसरे पल एक सैल्फी मेरे मोबाइल में कैद हो जाती है। 

बहरहाल ये फेसबुक भी कमाल करता है। अक्सर नहीं बार-बार करता है। मित्रता निवेदन आता नहीं कि कई बार फोटो देखकर और कई बार नाम देखकर मैं खुद से कहता हूँ- ‘‘हाँ।’’ 

फिर मेरी ओर से स्वीकार का निवेदन जा पहुँचता है नए-नए बनने जा रहे मित्र के पास। यही फेसबुक है जिसने असल जीवन में एक समय में मेरे अधिकतम बीस घनिष्ठ मित्रों की सूची को पाँच हजार की सूची तक ला खड़ा कर दिया है। अब ऐसे में मुश्किल यह होती है कि मैं फेसबुक के मित्रों को कई बार अच्छे से तब पहचान रहा होता हूँ जब मैं उसकी प्रोफाइल को, उसकी पोस्टों को बहुत नीचे तक खगालता चला जाता हूँ। तब मुझे पता चलता है कि ये मित्र तो नियमित मेरी पोस्टों पर आते हैं। टिप्पणी करते हैं। वहीं मैं कई-कई दिनों तक इन मित्र की प्रोफाइल पर जा ही नहीं पाता। तब लगता है कि ये एकतरफा मित्रता कितने दिनों तक चलेगी। फिर देखता हूं तो पता चलता है कि हमारी मित्रता को फेसबुक में चार साल हो गए हैं। पांच साल हो गए हैं। कई मित्र ऐसे हैं जो हैं तो पर उनसे दूर-दूर का ही रिश्ता बना हुआ है। न वो हमारी कुशल क्षेम पूछते हैं और न अपन। 

30 मई 2017 को फेसबुक मित्र नवीन नौटियाल जी मैसेन्जर में संदेश करते हैं। संदेश इस तरह-सा था- ‘‘आप पौड़ी में हैं? कब तक है? आपकी कहानियां पढ़ता रहता हूं। मैं पौड़ी में हूं। चार जून तक रहूंगा। क्या मुलाकात संभव है?’’

मैंने बेहद व्यस्तता के चलते जवाब दिया भी। फिर कुछ ऐसा होता रहा कि उनके पास समय था तो मेरे पास नहीं। मेरे पास समय था तो उनके पास नहीं। नवीन जी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ पौड़ी आए हुए हैं। वह अपने पैतृक गांव और ससुराल दोनों का लुत्फ उठा रहे थे। कण्डोलिया का भण्डारा उन्हें बुला रहा था। बच्चों को भी घुमा रहे थे। इस बीच अपन परीक्षाओं में व्यस्त थे। मेरे परचे एक जून,दो जून,तीन जून और पांच जून को होने तय थे। इकतीस की शाम गणी जी के नाम हो गई। उधर नवीन जी को चार को दिल्ली वापिस जाना भी था। तो दो की शाम मिलना तय हुआ। वहीं तीन को अपन का परचा भी था। मुझे लगा कि मिले भी नहीं तो मलाल रहेगा कि नहीं मिले। 
पौड़ी का एजेंसी चैक और अपन छह बजे से पहले नवीन जी से मिलने खड़े हो गए। नवीन जी आए सवा सात बजे के बाद। उन्होंने अपनी चैपहिया गाड़ी खड़ी की। हम दोनों में मुझे आगामी दिवस की चिन्ता भी थी और बातें करना भी जरूरी था। हम गढ़वाल कन्फैक्शनर्स में औपचारिक तौर पर ही बैठे। नवीन जी हिन्दी पढ़ाते हैं। दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामियां में शोध छात्र भी हैं। उनका गढ़वाली भाषा, लोक संस्कृति पर शोध चल रहा है। संवेदनशील हैं। दिल्ली में रह तो रहे हैं लेकिन अभी पहाड़ की सादगी और साधारणगी को त्याग नहीं पाए हैं। किसी काम को सम्पूर्णता के साथ और विश्वसनीयता के साथ करने का भरोसा कायम रखे हुए हैं। मैं किसी क्षेत्र विशेष की पूरी आदिम जाति को किसी खास सांचे के बरअक्स नहीं देखता। मैं न ही किसी वर्ग,जाति,धर्म और समुदाय को किसी खास उपाधि से देखे जाने पर यकीन भी नहीं करता लेकिन देशकाल,परिस्थिति,वातावरण और बचपन की परवरिश कहीं न कहीं आदमी के व्यक्तित्व में इस तरह जम जाती है जैसे घी से चुपड़ी रोटी खा लेने और हाथ धो लेने के बाद भी उंगलियों में घी की चिकनाई रह ही जाती है। साफ-सुथरे पानी से और साफ सुथरे तौलिये से बदन पोंछते रहने के बाद भी शरीर को स्नान की जरूरत रहती है और अच्छी तरह से स्नान करने के बाद भी तौलिये में बदल से मैल कहां से आ जाता है कि तौलिये को भी स्नान करना पड़ता है। 
हम भी अपने भीतर समाए खास इलाके के गुणों को सायास ही आत्मसात् करते चले जाते हैं। वह किसी घुट्टी की तरह हमें पिलाया नहीं जाता। वह उस इलाके की हवा,पानी,खाद,प्रकाश के साथ छनता-छनता हमारे भीतर पनपता होगा शायद। नवीन जी भी मुझे ऐसे ही लगे। वह बहुत आगे जाने की संभावनाओं से पूर्ण हैं। वह महानगर को रोजगार और जीवन यापन का स्रोत बना लेंगे तो भी पहाड़ को अपने भीतर से हटा नहीं सकेंगे। 
उनसे साहित्य पर बात हुई। बाल लेखन पर बात हुई। उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति पर बात हुई। उन्होंने जिन-जिन व्यक्तित्वों की बात की संयोग से वे मेरे भी अभिन्न मित्र हैं। चालीस मिनट के बाद हमने एक दूसरे से विदा ली। हम दोनों ने एक एक सेल्फी भी ली। यह कहकर हम एक दूसरे से मिलते हुए अलग हुए कि दोबारा फिर मिलेंगे।
नवीन जी पढ़ने-लिखने वाले व्यक्ति हैं। मैं इतना ही कहूंगा कि हमें सबसे पहले अपने को तरजीह देनी होगी। अपने काम को तरजीह देनी होगी। हमसे काम लेने वालों को हमारी अहमियत का भान होना चाहिए। यदि कोई मुझे औजार बनाकर अपना काम निकालना चाहता है और फिर हमें यहां-वहां रखकर भूल जाना चाहता है तो ऐसा किसी भी कीमत में नहीं होने देना चाहिए। शतरंज की बिसात जितनी खास है उतने ही शतरंज के मोहरे भी हैं। राजा-वजीर के साथ प्यादे भी उतने ही अहम हैं। कोई हमे प्यादा समझे तो समझे पर हमें यह समझना होगा कि हमारे बिना खेल खेल नहीं हो सकता। मज़ा आया। मुझे लगता है कि फेसबुक का साथ यथार्थ के जीवन में भी खूब फबेगा। यह उम्मीद मुझे खुद से भी है और नवीन जी से भी। ॰॰॰
 -मनोहर चमोली ‘मनु’
09412158688

बाल साहित्य: कहानी चित्रकथा के रूप में मई-जून 2017 बालवाणी में

सोचा अब 


-मनोहर चमोलीमनु






अचला राज्य में एक दिन मछुवारों सहित कई बच्चों को दरबार में लाया गया था। सेनापति ने राजा को बताया-‘‘ये मछुवारे मछली पकड़ रहे थे।’’ राजा ने मछुवारों से कहा-‘‘नदी जीवनदायिनी है। नदी का जल पीने योग्य नहीं रह गया है। जलचरों का जीवन संकट में है। सभी को कानून का पालन करना चाहिए।’’
 मछुवारों का मुखिया बोला-‘‘महाराज। हम मछुवारे पीढ़ियों से मछली पकड़ रहे हैं। हमारी आजीविका का एक मात्र साधनयही है।’’ राजा ने कहा-‘‘मेरे लिए राजधर्म सर्वोपरि है। तुम्हें नई पीढ़ी को इतना शिक्षित और प्रशिक्षित करना होगा कि वह राजहित में काम करे।’’ तभी मछुआरों की एक बच्ची बीच में बोल पड़ी-‘‘महाराज। मेरा नाम मिताली है। मैं पढ़ाई भी करती हूं और जाल भी बुनती हूं। हम मछलियों को जाल से पकड़ते हैं। नदी के जलचर हमारी वजह से नहीं मर रहे हैं।’’ नगर कोतवाल ने मिताली को चुप रहने का इशारा किया। मंत्री मछुवारों से बोला-‘‘एक तो अपराध करते हो, दूसरा राजा के मुंह लगते हो!’’ राजा बीच में बोल पड़ा-‘‘यह दरबार है। यहां प्रत्येक की बात सुनी जाती है। मिताली को अपनी बात कहने दी जाए।’’ मिताली कहने लगी-‘‘महाराज। कई अवसरों पर प्रतिमाएं नदी में बहाई जाती हैं। उस पर रोक लगाई जाए।’’ राजपुरोहित खड़ा हो गया। कहने लगा-‘‘मूर्ख लड़की ! बच्ची है तो इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म और आस्था पर प्रहार करेगी।’’ राजा ने इशारा किया तो राजपुरोहित चुप हो गया। राजा ने पूछा-‘‘कुछ ही अवसरों पर प्रतिमाएं विसर्जित होती हैं। प्रतिमाओं का नदी के प्रदूषित होने से क्या संबंध हैं?’’ 



मिताली ने कहा-‘‘है महाराज। पहले साधारण मिट्टी की प्रतिमांए नदी में बहा दी जाती थीं। लेकिन अब प्लास्टर की प्रतिमाएं बनाई जा रही हैं। यह प्लास्टर पानी में नहीं घुलता। रंग-बिरंगी प्रतिमाओं पर इनैमल पेंट किया जाता हैं। यह इनैमल पेंट कई हानिकारक रसायनों से बनता है। रसायनों में सीसा भी होता है। जलचरों के साथ-साथ सीसे से मिला पानी सिंचाई के लिए भी हानिकारक है। हमारी शाक-भाजी और फसलों में भी यह हानिकारक रसायन पंहुच रहा है। हर साल प्रतिमाओं की संख्या बढ़ती ही जा रही हैं।’’राजा बीच में ही बोल पड़ा-‘‘ये तो हमने कभी सोचा ही नहीं।’’ महारानी अब तक चुप थी। वह बोल पड़ी-‘‘आश्चर्य है। हां मिताली अपनी बात कहो।’’ मिताली बोलती रही-‘‘महारानी जी। मूर्तियों के विसर्जन के बाद पानी में एसिड की मात्रा बढ़ जाती है। पानी में आक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। नदी के भीतर खनिज तत्व की मात्रा दो सौ से तीन सौ फीसदी बढ़ जाती है। इससे छोटे-छोटे जीव-जंतु दम तोड़ देते हैं।’’ 
राजा ने पूछा-‘‘खनिज तत्व?’’ मिताली ने बताया-‘‘जैसे लोहा, तांबा आदि। नागरिक नदियों में धातु के सिक्के भी चढ़ाते हैं। आक्सीजन कम होने से मछलियों से छोटे जीव मरने लगते हैं। प्रतिमाओं का पेंट मर्करी और लेड से बनता है। यह रसायन पानी में तैरता रहता है। प्रतिमाएं बरसों तक जल के भीतर डूबी रहती हैं। उन्हें पूरी तरह से नष्ट होने में वर्षों लग जाते हैं। प्रतिमाओं के साथ फूल, कपड़े अन्य धातुओं का चढ़ावा भी नदी में भेंट कर दिया जाता है। यह सब प्रदूषण बढ़ाता है। नदी के तट पर राजमहल के सैकड़ों सैनिकों के वस्त्रों से लेकर आम नागरिकों के वस्त्र भी धुल रहे हैं। मवेशियों को स्नान भी कराया जा रहा है।’’ 




सेनापति ने कहा-‘‘महाराज। इस बच्ची की बात सही है। लेकिन समस्या गिनाना आसान है। समाधान क्या है?’’ मिताली ने निडरता से कहा-‘‘यह सबको सोचना होगा। सबसे पहले तो गोला नदी पर किसी भी प्रकार का मानवीय हस्तक्षेप हो। धार्मिक पूजा,अर्चना,अनुष्ठान कार्यो के लिए एक कृत्रिम नदी का निर्माण किया जाए। प्रतिमाएं केवल और केवल कच्ची मिट्टी की हों। ऐसी कि वे पानी में बहाते ही घुल जाएं।’’ राजा मुस्कराए। बोले-‘‘वाह ! मिताली वाह! लेकिन तुम मछुवारों के लिए क्या किया जाए?’’


मिताली ने कहा-‘‘हम मछुवारे जाल बुनते हैं। हमें सिलाई-बुनाई का प्रशिक्षण दिया जाए। मतस्य पालन के लिए छोटे-छोटे राजकीय तालाब बनाए जा सकते हैं। मछुवारों को मछली पालन का प्रशिक्षण दिया जाए।’’ राजा सिंहासन से उठ खड़ा हुआ। कहने लगा-‘‘हम आदेश देते हैं। राज्य के प्रत्येक मछुवारे परिवार को आत्मनिर्भर बनाने के लिए राजकोष से सहायता दी जाएगी। राजकीय तालाब बनाए जाएंगे। मछली पालन के लिए पड़ोसी राज्यों की सहायता ली जाएगी। गोला नदी के समानांतर एक कृत्रिम नदी और जलाशय का निर्माण किया जाएगा। सभी तरह के धर्म-कर्म उस कृत्रिम नदी में ही संपन्न कराएं जाएंगे।’’ 
महारानी ने मुस्कराते हुए राजा से कहा-‘‘बालिकाओं के लिए कुछ विशेष घोषणा भी तो कीजिए।’’ राजा मुस्कराते हुए बोला-‘‘हमने इस दिशा मंे पहले नहीं सोचा। आज सोचा है। राज्य प्रत्येक बालिका को निःशुल्क उच्च शिक्षा प्रदान करेगा। संपूर्ण राज्य शिक्षित हो। यह भावना सर्वोपरि होगी। आज से राज्य की सलाहकार समिति में बच्चे भी शामिल होंगे। मिताली सहित सभी मछुवारे आज राजभोज हमारे साथ करेंगे।’’ मछुवारों ने मिताली को गोद में उठा लिया। सबकी मिताली के लिए तालियां बजा रहे थे। ॰॰॰  -मनोहर चमोलीमनु’....पोस्ट बाॅक्स-23,भितांई,पौड़ी गढ़वाल 246001 (उत्तराखण्ड) मोबाइल-09412158688