16/05/2017

मैं, बाल लेखन और वैज्ञानिक नज़रिया

मैं, बाल लेखन और वैज्ञानिक नज़रिया


-मनोहर चमोली ‘मनु’


अपनी लेखन यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूँ कि एक दैनिक अखबार में मेरा एक पत्र काॅलम में पत्र छपा था जो डाक देर से मिलती है पर आधारित था। तब मैं कक्षा बारह का छात्र था। बस यहीं से मैंने लिखना आरंभ किया था। काॅलेज पत्रिकाओं में भी लिखा। अख़बारों में संपादकीय पेज पर पत्र काॅलम ने शब्दों को विस्तार दिया। याद करता हूं तो पाता हूं कि इसके बाद जन ज्ञान पत्रिका ने मेरे लेखन को बेहद विस्तार दिया। इसके लिए मैं राकेश पंत जी एवं पंकज बिष्ट जी का नाम कभी क्यों कर भूल सकता हूँ। उजाला नवसाक्षरों की मासिक पत्रिका ने भी मुझे स्थान दिया। फिर तो जैसे लिखने के लिए एक के बाद एक स्टेशन मिलते रहे। मैं एक यात्री की मानिंद उन स्टेशनों पर उतरता रहा। फिर यात्रा करता फिर दूसरे स्टेशन पर चढ़ता फिर अगले स्टेशन पर उतर जाता। नवसाक्षर लेखन ने मुझे सरल लेखन की ओर बढ़ाया। इसके लिए उत्तराखण्ड का राज्य संदर्भ केन्द्र हमेशा याद रहेगा। जनवाचन आंदोलन के तहत दो किताबों का आना और भी सुखद रहा। धीरे-धीरे यह समझ में आया कि लेखन तो मानदेय भी दिलाता है। नवसाक्षर साहित्य माला के तहत पांच-छह किताबें आईं। लेखन कार्यशालाओं में जाने का खूब अवसर मिला। इन कार्यशालाओं में एक साल आया। 

1997। कुछ लेखन कार्यशालाओं में बाल साहित्यकार कृष्ण शलभ एवं अश्वघोष जी भी बतौर लेखक रहे। इन दोनों ने मुझे कई बार कहा-‘‘बाल साहित्य के क्षेत्र में आओ। वहां बच्चों के लिए कारगर लिखने वाले कम ही हैं।’’ इधर मुकेश यादव जी एवं सुशील उपाध्याय की नज़र मुझ पर पड़ी। इन्होंने मुझे रुड़की से पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के लिए सलाह दी। इन्हीं दोनों की वजह से मैंने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार से पत्रकारिता का कोर्स किया। वहां मुझे स्वर्ण पदक मिला। मुकेश यादव जी ही थे जिन्होंने मुझे सीधे राष्ट्रीय अखबार राष्ट्रीय सहारा का रुड़की से संवाददाता काम करने का मौका दिलाया। दस साल पत्रकारिता में रुड़की से बहुत कुछ सीखा। रुड़की से मैंने ओमप्रकाश नूर जी के साथ गंग ज्योति साक्षरता पत्रिका का संपादन किया। यह हमने दो साल से अधिक प्रकाशित की। बहुत कुछ सीखा। इसी बीच ज्ञान विज्ञान बुलेटिन जगमोहन चोपता के साथ संपादित की। यहा ज्ञान विज्ञान बुलेटिन के आरंभिक दो साल से अधिक का संपादन ही मुझे वैज्ञानिक दृष्टिकोण की ओर ले गया। खूब लिखा। कहानी, नाटक, कविताएं, लेख, संस्मरण, व्यंग्य भी लिखे। आकाशवाणी के लिए नाटक लिखे। झलकियां लिखी। आकाशवाणी के अनिल भारती जी और विनय ध्यानी जी का सहयोग खूब रहा। इसी दौरान वर्ष 2000 में सार्वजनिक विद्यालयों की पाठ्यपुस्तक लेखन कार्यशाला में शिरकत करने का मौका मिला। वहां मैंने महसूस किया कि वाकई अध्यायों के तौर पर कक्षावार बहुत कुछ सार्थक पठन सामग्री खोजने से भी नहीं मिलतीं। बस यहीं से प्रेरणा मिली। अंततः 2005 से बच्चों के लिए साहित्य लिख ही रहा हूँ। बच्चों के लिए पहली बीज बना पेड छपी़। यह कहानी थी। संभवतः इसका प्रकाशन वर्ष 1997 था। बच्चों का साहित्य लिखते हुए मैंने कहानी को ही अपनी विधा बना लिया। जैसा पहले कहा कि यूँ तो कविताएँ,संस्मरण,नाटक,आलेख, फीचर, व्यंग्य भी लिखे हैं। लेकिन वर्ष 2005 से अमूमन बच्चों के लिए कहानियाँ ही लिखता हूँ। 

मैंने हमेशा स्वयं को आज भी छात्र समझा है। चन्दामामा, नंदन और चंपक से पढ़ने की आदत बनी। काॅमिक्स का भी खूब योगदान रहा। अध्ययन तो आज भी जारी है। इसे प्राथमिकता में रखने का प्रयास रहता है। वर्ष 2005 से अध्यापन कर रहा हूँ तो पढ़ना-पढ़ाना दैनिक गतिविधि है ही। पढ़ने-पढ़ाने से लिखने के लिए खुराक मिलती है। नित नए आयाम दिमाग में कौंधते हैं। जितने कौंधते हैं उतने कागज़ में जो नहीं उतर पाते। हर साल हर कक्षा में नई पौध आती है। नए विचारों के साथ, ऊर्जा भरे बच्चे। संभावना लिए बच्चे। फिलहाल कक्षा छह से दस में पढ़ने वाले बच्चों के सम्पर्क में हूं। लेखन का स्रोत भी यही बच्चे होते हैं। मुझे तो यह लगता है कि शिक्षण ही एक मात्र ऐसा व्यवसाय है जो किसी को भी व्यावहारिक लेखक बनाने की क्षमता रखता है। बच्चों के साथ पढ़ने-पढ़ाने के समय एक बात हमेशा मन में आती है। वह है पुस्तकें। बच्चों के बहुत कम ही पुस्तकें हैं जो कोर्स के तौर पर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के आलोक में तैयार हुई हैं। उन्हें अपवाद मान लूं तो कह सकता हूं कि नहीं। वैसे तो पाठ्यपुस्तकों की अपनी सीमाएं होती हैं। विवशता भी। वे अक्सर आनंद देने में असफल ही होती दिखाई देती हैं। आम धारणा यही है कि पाठ्यपुस्तकें सूचना, ज्ञान, जानकारी देने वाली होनी चाहिए। वे उपदेश से भरी होनी चाहिए। शिक्षाप्रद होनी चाहिए। जबकि मेरा मानना है कि वे इससे पहले पढ़ने की ललक जगाने वाली होनी चाहिए। ऐसी पुस्तकें हों जिनमें बच्चों के स्वर हों। बच्चों की दुनिया उन पुस्तकों में हो। उनकी दुनिया का चित्रण उनमें हो। बच्चों को उनके अनुभवों को विस्तार देने के अवसर उनमें हों। सवालों का जवाब देने की बजाय पाठ्यपुस्तकें बच्चों के भीतर सवाल करने की आदत विकसित करने वाली हों। अधिकतर पुस्तके पहले पेज से धार्मिक ग्रन्थ अधिक लगती हैं। मिथकों से भरी कहानियां और वर्णन पुस्तकों में होना ही नहीं चाहिए। अनुमान और कल्पना के नाम पर बच्चों में बेवजह के डर जगाती सामग्री पुस्तक में न हों। यदि कोई पाठ्य पुस्तक किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देती हो, ऐसे ही चित्रों से अटी पड़ी हो तो यह भयावह है। अंधविश्वास, पाखण्ड, भाग्यवाद को स्थापित करने वाले पाठ घातक हैं। बच्चों के स्कूल से इतर भी बहुत अच्छा कुछ पढ़ने के लिए नहीं मिल रहा है। इधर कुछ पत्रिकाएं हैं जिन्होंने बच्चों के लिए पठनीय सामग्री देनी आरंभ की हैं। रूम टू रीड, एनसीईआरटी, प्रथम, तूलिका, चकमक, प्लूटो जैसे नाम कुछ ही हैं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, चिल्ड्रन बुक्स आदि कुछ पत्रिकाएं हैं जो बच्चों के लिए जरूरी तत्वों को ध्यान में रखते हुए प्रकाशित हो रही हैं। मैं आनंद को सबसे जरूरी तत्व मानता हूं जो पढ़ने के लिए सबसे पहले चाहिए। यही वह तत्व है जो पढ़ने की ललक पैदा कर सकता है। पढ़ने को बचाए रख सकता है। आनंद। मस्ती की अनुभूति पहला अनिवार्य तत्व हो। बालपाठ्यक्रम में यही मूल और अनिवार्य तत्व अधिकतर गायब है। हाशिए पर है। अनिवार्य रूप से बच्चों के स्वर होने चाहिए। बच्चों की दुनिया को शामिल करते हुए अधिगम के रास्ते पर ले जाया जाना चाहिए। भाषा सरल हो। सहज हो। प्रवाहमय हो। सीख,सन्देश,उपेदश सुझाते आदर्श वाक्यों से इतर ऐसी रचना सामग्री पाठ्यक्रम में हो जो बच्चों की अस्मिता का सम्मान करती हो। बच्चों को सम्पूर्ण व्यक्तित्व मानने का बोध कराने वाली सामग्री से बना पाठयक्रम हो।

इसके बाद मैं कल्पना शीलता के साथ विज्ञान को लेखन में जरूरी समझता हूं। विज्ञान यानि विशिष्ट ज्ञान। इसे भौतिक-रसायन के खोल से बाहर रखकर समझने की आवश्यकता है। विज्ञान को तथ्यों की पढ़ाई मान लेना ही इसके साथ सबसे बड़ा अन्याय है। विज्ञान कुछ रसायनिक पदार्थों के प्रयोग तक सीमित नहीं है। इस ब्रह्माण्ड के ज्ञात सीमित तथ्यों को रट लेना भर विज्ञान नहीं है। विज्ञान का अध्ययन तो हमें जिज्ञासु बनाता है। जिज्ञासु बनाए रखता है। विज्ञान ही तो है जो हमारी जिज्ञासाओं को शांत करता है और फिर अनवरत् जिज्ञासु बनाए रखने की ललक भी पैदा करता है। विज्ञान ही तो है जो हमे कल,आज और कल की जानकारी भी देता है। विज्ञान का फलक बड़ा है। वह हमें भाईचारा, लोक कल्याण और सामाजिक भी बनाता है। उदाहरण के लिए कल के मानव यहां-वहां धूप में यूं ही विचरण किया करते थे। पेड़ों की छांव में खड़े हुए होंगे तो छांव की अहमियत का पता चला होगा। तेज धूप के प्रभाव से बचने का उपाय खोजना आरंभ किया होगा। विशिष्ट जानकारी हासिल की होगी और छतरी का आविष्कार हुआ होगा। धूप-बारिश से बचाव की आवश्यकता ही आविष्कार का कारण बनी। एक व्यक्ति का आविष्कार लोकोन्मुखी बना। आज हमें समझना होगा कि विज्ञान नज़र और उसके असर पर केन्द्रित होता है। 

मैं अपने आस-पास देखता हूं कि स्कूलों में भी और घर में भी विज्ञान के दायरे को समेट कर रखा हुआ है। मनुष्य महाबली कैसे बना? जवाब है विज्ञान के सहारे ही उसने अपनी सोच-समझ को विस्तार दिया। अन्य जीवों से वह आज श्रेष्ठ जीव बन गया है। मानव से पहले भी सैकड़ों जीव इस दुनिया में पैदा हुए और काल के गाल में समा गए। जो हैं भी वे अपने विकास के क्रम में गतिअनुसार बहुत पीछे हैं। मानव की प्रगति में विज्ञान सबसे धारदार और असरदार हथियार है। हम सब यह जानते ही हैं कि हमारे सर्वांगीण विकास में विज्ञान की भूमिक सर्वोपरि है। लेकिन फिर भी विज्ञान को पढ़ना और वैज्ञानिक नज़रिए को जीवन मंे उतारना दो अलग बातें हैं। आज भी विज्ञान विषय को अधिकतर तथ्यों और आविष्कारों का अंग माना जाता है। आज भी अधिकतर छात्र विज्ञान तो पढ़ रहे हैं लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जीवन में उतारने वाले छात्रों की संख्या बेहद कम है। समाज में विज्ञान का ठोस एवं क्रमिक अध्ययन का ठीक उलट परिणाम पसरा पड़ा है। वैसे तो विज्ञान के अध्ययन के ठोस एवं स्पष्ट उद्द्ेश्य हैं। जिन्हें मैं इस तरह से समझना चाहता हूँ-एक-हमें अपने आस-पास घट रही घटनाओं को गौर से देखने का सलीका आ जाता है।दो-गौर से देखने के सलीके के साथ उन घटनाओं के कारणों का अनुमान लगाने लगते हैं। तीन- अनुमान लगाने के साथ सही या गलत तक पहुँचने से पहले उत्पन्न परिस्थितियों की जांच करने लगते हैं। चार-जांच के कई तरीकों के बाद निकले निष्कर्षों से अपने नज़रिए में बदलाव लाते हैं। तो यह कहा जा सकता है कि यदि हमारे मन-मस्तिष्क में संदेह करने की आदत नहीं है। हमारे सोचने के ढंग में जानने की आदत विकसित नहीं है। जानने के साथ मानने के बीच की यात्रा में पुष्टि के लिए स्वयं के प्रयास नहीं हैं। असफलताएं फिर प्रयास फिर असफलताएं फिर सफलता की मशक्कत नहीं है तो हम विज्ञान के उद्देश्यों से परे हैं। खुद करके समझना ही विज्ञान का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। यह कौन नहीं जानता। 

बच्चों की स्कूली किताबें हो या स्कूल से बाहर उन्हें मिल रहा साहित्य हो। वह बहुत कम है जो बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करता हो। बच्चों से पहले तो बड़ों में ही अमूमन वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित नहीं है। यही नहीं विज्ञान पढ़ाने वाले अध्यापकों में (सब नहीं) भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित नहीं है। दरअसल हम बहुत कुछ अनुकरण से सीखते हैं। घर-परिवार-पड़ोस का अनुकरण हम पर हावी रहता है। बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टि तो बचपन से जगाने की जरूरत है। लेकिन वही तो जगाएगा जो खुद इसका पक्षधर हो। हम बच्चों के सामने मिथकों,अंधविश्वासों का ढेर जमाए रखते हैं। यह ढेर इतना विशाल है कि उसके पीछे खड़ा अटल विज्ञानरूपी सूरज का प्रकाश धूमिल हो गया लगता है। ऐसे कई उदाहरण मेरे समक्ष हैं जिन्हें सुनकर आम जानकार भी माथा पीट लेगा। ऐसे विज्ञान के परास्नातक छात्र हैं जो आज भी तंत्र-मंत्र, जादू-टोने,मिथक,अंधविश्वास के घेरे से बाहर नहीं हैं। आज ही बताएं। जुलाई-अगस्त के महीने में सांपों का बिल से निकलना आम बात है। ऐसे में किसी विद्यालय में विज्ञान पढ़ाने वाला अध्यापक छात्रों से साँप को मरवा दे और यह कहे कि इसकी आंखों को गोबर से ढक दो अन्यथा मादा सांप मरे हुए सांप की आंखों में देखकर मारने वालों को डस लेगी। जब शिक्षक ही सूर्यग्रहण जैसी खगोलीय घटना को देखना बुरा मानता हो। जब शिक्षक ही यह मानता हो कि जंगल में लगने वाली आग से आने वाली वनस्पिति और बेहतर होगी तो आप समझ सकती हैं कि बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहां से पनपेगा। यही स्थिति हमारे घरों में भी है। जब हम पूजा-पाठ में प्रतिदिन दो-दो घण्टे बिताते हों। दिन विशेष में हमारे बहुत सारे काम वर्जित हों। दिनों के हिसाब से हमारा भोजन हो रहा हो। समय के हिसाब से हमारा यात्रा करना, बाहर निकलना होता हो तो वैज्ञानिक नज़रिए की उम्मीद करना बेमानी है। सुनी-सुनाई बातों पर सालों से यकीन करने की नियति हमारी आदत है। जैसा चला आ रहा है उसे वैसा ही हम बच्चों में हस्तांतरिक कर रहे हैं तो वैज्ञानिक फैलाव की गति धीमी तो रहेगी ही। 

यह इतना कठिन भी नहीं है। हमें सबसे पहले बच्चों के विचारों को सुनना होगा। यह हमारा पहला काम हो। दूसरा उनके नज़रिए का सम्मान करना दूसरा काम हो। उनके अनुभव और उनकी समझ को वैज्ञानिक विश्लेषण की कसौटी पर कसने के अवसर देना तीसरा बड़ा काम हो। उन्हें खुद खोजने और प्रयोग करने का मौका देना चैथा बड़ा काम है। इसके लिए तमाम गतिविधियां है जो की जानी लाभदायक हो सकती हैं। विद्यालय इन गतिविधियों को कराने का सबसे सरल और कारगर प्लेटफार्म है। मसलन विद्यालय के आस-पास पनपे घरेलू पौधों की सहायता ली जा सकती है। कुछ पौधों को चुना जा सकता है। कुछ को पानी देना और कुछ को पानी न देने वाली गतिविधि बेहद सरल और लाभप्रद है। बच्चों को हर रोज की गतिविधि नोट करने का अभ्यास कराया जा सकता है। अब तो मोबाइल आम साधन है। हम हर रोज के फोटोग्राफ्स ले सकते हैं। इसी तरह दो पौधों को ले सकते हैं। एक विद्यालय परिसर में लगा हो और दूसरे को हम गमले में कक्ष के भीतर रख दें। बच्चों से कहें कि दोनों में आ रहे बदलाव को बीस से तीस दिन तक देखें। नोट करे और अपने अनुभव लिखें। छात्र अपने अनुभव से समझना, जानना और मानकर सीखना अधिक पसंद करते हैं। 

अध्यापकों की भूमिका भी इसमें सबसे खास और जरूरी हो जाती है। प्रातःकालीन सभा से लेकर छुट्टी का घण्टा बजने तलक कई ऐसे अवसर आते हैं जब हम छात्रों के साथ विज्ञानपरक रुचि जगाने का काम करते हैं। यहां तक कि खेल में भी समूचा विज्ञान छिपा है। मध्याह्न भोजन में भी हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण की दर्जनों बातें कर सकते हैं। हाथ धोने का विज्ञान हो या बैडमिन्टन खेलते समय हवा के रुख का शटल पर प्रभाव हो या अन्य विषय हों। हमारा मकसद स्पष्ट होता है। आज जब नागकन्या, अवतार, राक्षस, डायन, भूत-प्रेत जैसे धारावाहिकों की बाढ़ आ गई है। ज्योतिष में नफा-नुकसान बताने वाले बाबा सुबह-सुबह टीवी पर आ धमकते हैं। ऐसे समय में सत्य-असत्य की परख में बच्चों को समर्थ बनाना ही आज की पढाई है। जल स्रोतों-गदेरों में घटती जल धारा की चर्चा को बदलते मौसम के साथ-साथ ग्लोबल वार्मिंग तक ले जाना आसान है। धरती में पाए जाने वाले हर जीवों की महत्ता केंचुए से लेकर सांप-चूहे तक ले जाई जाती है। यह बताना कि कुछ कीड़े-मकौड़े जहरीले क्यों हैं? उनसे सावधान रहना ठीक है। उन्हंे मारना ठीक नहीं। वे कहीं न कहीं हमारे मित्र हैं। हमारे जिन्दा रहने के लिए उनका जिंदा रहना भी जरूरी है। चूहों का विद्यालय में आना आम बात है। चूहों की वजह से सांप का आना स्वाभाविक है। कहीं न कहीं विद्यालय में बन रहा भोजन और उसका भण्डारण विद्यालय में जमा हो रहा कूड़ा-करकट चूहों को बुलाने में सहायक है। यदि ये दोनों का उचित रख-रखाव ओर निपटारा हो तो संभव है कि चूहों का रहन बदल जाए। चूहा ऐसा जीव है जिसे बेवजह भी कुतरने को कुछ न कुछ चाहिए। कागज और विद्यालयी सामग्री उनके लिए सरल माध्यम बन जाती है। चूहों की गंध पाकर सांप आते हैं। कोई भी घटना, स्थिति और समस्या के पीछे कोई न कोई कारण है। हम उन कारणों का पता लगाने की ओर छात्रों को अग्रसर करें। कारणों का पता लगाकर निष्कर्ष के तौर पर समाधान भी छात्र खोज लेते हैं। 

मेरा स्पष्ट मानना है कि यह काम अध्यापक वर्ग बखूबी कर सकता है। मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वैज्ञानिक तथ्य और जानकारी देना मेरा काम नहीं है। कला भी अपने आप में विज्ञान है। रंगों का संयोजन और चित्रांकन भी अपने आप में सधा हुआ विज्ञान है। इसके लिए कोई तय वादन नहीं है। यह तो देशकाल और परिस्थिति के अनुसार स्वतः ही हो जाता है।  कई बार प्रातःकालीन सभा में बच्चे जो सामान्य ज्ञान के प्रश्न साझा करते हैं वहीं से वैज्ञानिक नज़रिए के आलोक में हमें अपनी बात कहने का मौका मिल जाता है। हमारा प्रयास होता है कि हम कुछ ऐसी चर्चा आरंभ करें जिसके बाद छात्र सोचें और समझने के लिए और अध्ययन करें। मसलन अपने आस-पास के कीड़े-मकोड़ों की दैनिक गतिविधियों को देखने का काम दे देते हैं। विद्यालय परिसर में मौसमवार पौधों-पेड़ों में आ रहे परिवर्तनों को गौर से देखने-समझने का काम दे देते हैं। सर्दी-गर्मी-बरसात से हम पृथ्वी और सूर्य पर चर्चा करने लगते हैं। गर्मियों में पत्तों के झुलसने की बात हो या नया अंकुरित कोई नन्हा पौधा हो। इनका दैनिक अध्ययन करना अपने आप में दिलचस्प गतिविधि है। एक हरी पत्ती के सूख जाने की पूरी प्रक्रिया मज़ेदार है। थर्मामीटर से प्रत्येक सप्ताह का तापमान आंकने की गतिविधि से बच्चे बहुत कुछ सीखते हैं। तुलना करना, आंकड़ों को इकट्ठा करना। जोड़-घटाओ। तापमान का घटता-बढ़ता क्रम वे समझ पाते हैं। हाल ही में एक समाचार प्रातःकालीन सभा में एक छात्रा ने पढ़कर सुनाया-‘अब समुद्र में शहर बसाएगा अमेरिका।’ हमने इस बहाने दो देशों के बच्चों के परिवेश,वातावरण,शिक्षा-दीक्षा पर प्रकाश डालने का अवसर मिल गया। हमने यह चर्चा की कि क्यों कुछ राष्ट्र सूचना,तकनीक,प्रौद्योगिकी और विकास में बहुत उन्नत हैं। वहीं कुछ राष्ट्र बेहद पिछड़े हुए हैं। हमने इसे स्कूल केन्द्रित किया। बाल केन्द्रित किया। एक और वे राष्ट्र जो आज भी धर्म, ज्योतिष, आस्था, अंधविश्वास, कुरीतियों, सामाजिक कुपरंपराओं, जादू-टोनों की जकड़न में हैं वहां के बच्चों में भी इन जड़ताओं का असर रहेगा। वहीं दूसरी ओर जहां बचपन से ही बालमन को उन्नत सुविधाओं और तकनीकीयों का लाभ मिल रहा है वह वयस्क होकर राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। ऐसा नहीं है कि बच्चों में तुलनात्मक अध्ययन करने की समझ नहीं होती। होती है वह अपनी कक्षा में भी अपना आकलन स्वयं कर लेते हैं। अपने घरों में अपने भाई बहिनों के साथ अपनी स्थिति का अंदाजा उन्हें होता है। वे पास-पड़ोस के परिवारों की तुलना अपने परिवार से बखूबी कर लेते हैं। तो फिर वे अपने ज़ेहन में खोजी प्रवृत्तियों को शामिल क्यों नहीं कर सकते? कर सकते हैं। यह पहल, यह रास्ता उन्हें बड़े ही तो सुझाएंगे। 

मैं यह भी नहीं कहता कि आज विज्ञान शिक्षण में सुधार नहीं आया है। बहुत कुछ विज्ञान की कक्षाओं में हो रहा है। बहुत बदलाव देखने को मिल रहे हैं। विज्ञान शिक्षण में परिवर्तन आए हैं। हालांकि ये परिवर्तन नाकाफी हैं। गति बेहद धीमी है। विविधता भरे विकल्पों को बढ़ाने की आवश्यकता है। आज मोबाइल एप्स हैं। गूगल जैसे कई सर्च इंजन हैं। इनकी सुविधा है। विज्ञान आधारित वीडियों,चित्रों सहित लिखित सामग्री का विपुल भण्डार अंतरजाल पर उपलब्ध है। यू-ट्यबू जैसे सुविधा है। व्हाट्स ऐप में तो सैकड़ों ग्रुपस हैं जिनके माध्यम से विज्ञान शिक्षण और सरल तथा प्रभावी हो गया है। वीडियों काॅलिंग के जरिए विज्ञान विशेषज्ञों से सीधे बातचीत कराना संभव हो गया है। प्रयोगशालाओं का प्रचलन बढ़ा है। विज्ञान हमारे हाथ में आ गया है। हालांकि विज्ञान को कॅरियर के तौर पर अपनाने का प्रतिशत लगातार घट रहा है। इंजीनियरिंग-चिकित्सा-तकनीकी क्षेत्रों की ओर छात्रों का आकर्षण अब भी बना हुआ है। यह स्वयं में हैरानी की बात है। 

बहुत सारी बातों का मैंने यहां उल्लेख किया है। लेकिन बच्चों से ही बात न हो तो सब व्यर्थ है। यह कहना तो बनता ही है कि छात्रों को हमेशा क्या,कैसे,क्यों,कौन,कब और कहां से जूझते रहना चाहिए। यह छह सवाल हैं जिनसे जवाब पाने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। प्राकृतिक हो या मनुष्यजनित। सभी घटनाओं,बातों, समस्याओं और परेशानियों के कुछ न कुछ कारण हैं। कारण है तो उनके समाधान भी हैं। उन समाधानों तक पहुंचने का माध्यम ही विज्ञान है। छात्रों का मौन रहना वैज्ञानिक नज़रिए की मौत है। संतुष्ट हो जाना थक जाना है। थकान हमेशा निराशा की ओर ले जाती है। वहीं प्रकृति न तो मौन है और न ही संतुष्ट। वह तो आशा का संचार करती है। अहा! धरती कितना देती है! यह वाक्य सनद रहना चाहिए। प्रकृति को तभी तो माँ कहा जाता है। माँ से कुछ नहीं सीखा तो क्या सीखा। सीखने का एक भी अवसर न जाने दें। जी हाँ। आपसे भी यह कहना तो बनता है कि आप पाठक, अध्यापक, अभिभावक, समाज के जिम्मेदार नागरिक आदि के तौर पर जैसे भी स्वयं को देख रहे हैं आज वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अपने व्यवहार की जरूर पड़ताल करेंगे। करेगें न?
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लेखक परिचय: मनोहर चमोली ‘मनु’: ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ और ‘पूछेरी’ पुस्तकें नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुई हैं। ‘चाँद का स्वेटर’ और ‘बादल क्यों बरसता है?’ ‘अब तुम गए काम से’, ‘चलता पहाड़,’‘जूते और मोजे’ सहित पांच पुस्तके ‘रूम टू रीड’ से प्रकाशित हुई हैं। बाल कहानियों का संग्रह ‘अन्तरिक्ष से आगे बचपन’ उत्तराखण्ड बालसाहित्य संस्थान से पुरस्कृत। बाल साहित्य में वर्ष 2011 का पं॰प्रताप नारायण मिश्र सम्मान मिल चुका है। जीवन में बचपन’ बाल कहानियों का संग्रह बहुचर्चित। बाल कहानियों की पच्चीस से अधिक पुस्तकें मराठी में अनुदित होकर प्रकाशित। उत्तराखण्ड में कहानी ‘फूलों वाले बाबा’ कक्षा पाँच की पाठ्य पुस्तक ‘बुराँश’ में शामिल। दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में हिन्दी की सहायक पुस्तक में नाटक ‘मस्ती की पाठशाला’ शामिल। हिमाचल सरकार के प्रेरणा कार्यक्रम सहित पढ़ने की आदत विकसित करने संबंधी कार्यक्रम के तहत छह राज्यों के बुनियादी स्कूलों में 13 कहानियां शामिल। बीस से अधिक बाल कहानियां असमियां और बंगला में अनुदित। उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में शिक्षक हैं। 
सम्पर्क: भितांई, पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल. 246001.उत्तराखण्ड. मोबाइलः09412158688.
ई-मेल: chamoli123456789@gmail.com

27/01/2017

Nandan child magzine feb 2017 manohar chamoli manu

'छोटी जो बड़ी वो'

-मनोहर चमोली ‘मनु’


रिनछिन के पेंसिल बाॅक्स में मिटनी, छिलनी और पेंसिल थी। रिनछिन ने दो और नई पेंसिल खरीदी। नई पेंसिलों को भी उसने बाॅक्स में रख दिया। एक नई पेंसिल बोली-‘‘मैं लाली हूं। ये हरियन हैं। आज से हम भी इस बाॅक्स में रहेंगे।’’

मिटनी ने जवाब दिया-‘‘स्वागत है। ये छिलनी है।’’

बाॅक्स की पेंसिल बोली-‘‘मैं नीलू हूं। कभी मैं भी तुम्हारी तरह नई थी। इतनी ही लंबी। आज देखो। मैं मिटनी की तरह छोटी हो गई हूं।’’
 यह कहकर नीलू सुबकने लगी। तभी रिनछिन ने लाली और हरियन को बाॅक्स से बाहर निकाला। छिलनी की मदद से उन्हें छिला और फिर बाॅक्स में रख दिया। बाॅक्स में वे सब अभी बातें कर ही रहे थे कि रिनछिन ने बाॅक्स खोला। लाली को बाहर निकाला। लाली से अपना होमवर्क पूरा किया। फिर उसने हरियन की मदद से ड्राइंग बनाई।

होमवर्क करने के बाद उसने लाली और हरियन को पेंसिलबाॅक्स में रख दिया। नीलू सिसकने लगी। कहने लगी-‘‘मैं अब यहां नहीं रहूंगी। रिनछिन मुझे अपने हाथ में नहीं लेगी तो मेरा यहां क्या काम। इस बार जैसे ही बाॅक्स खुलेगा, मैं छिटककर बाहर आ जाऊंगी।’’ छिलनी और मिटनी ने नीलू को समझाया। लेकिन वह नहीं मानी।

सुबह नीलू को मौका मिल ही गया। अचानक रिनछिन के हाथ से बैग क्या छूटा, पेंसिल बाॅक्स खुल गया। नीलू छिटककर किसी काॅपी के बीच में जा छिपी। रिनछिन ने स्कूल में नई पेंसिल से काम किया। इंटरवल के बाद पांचवा पीरीयड ड्राइंग का था। आसमां और सुहानी ने रिनछिन से ड्राइंग करने के लिए पेंसिलें मांगी। रिनछिन ने लाली और हरियन को दे दिया। संयोग से ड्राइंग पीरीयड के बाद पढ़ाई नहीं हुई। स्टूडेंट्स मस्ती करते रहे।
छुट्टी होने पर रिनछिन आसमां और सुहानी से अपनी पेंसिलें लेना भूल गई। घर लौटकर रिनछिन को देर रात याद आया कि सुबह अंग्रेजी, गणित के साथ-साथ हिन्दी में होमवर्क मिला है। उसने बैग खोला और होमवर्क करने बैठ गई। यह क्या! बाॅक्स में पेंसिल नहीं थी। रिनछिन ने स्कूल बैग उलट दिया। काॅपी किताबों के साथ नीलू भी बाहर आ गई। रिनछिन ने नीलू को चूमते हुए कहा-‘‘थैंक्यू। आज दोनों नई पेंसिल तो स्कूल में ही छूट गईं। तुम न होती तो मैं होमवर्क ही नहीं कर पाती। कल स्कूल में डांट भी पड़ती।’’
नीलू रोने लगी-‘‘अब मेरी जरूरत ही कहां हैं। अब मैं किसी काम की जो नहीं रही।’’ रिनछिन चैंकी। फिर नीलू को सहलाते हुए बोली-‘‘तुम आकार में जितनी घटोगी, तुम्हारी उम्र उतनी ही बड़ी मानी जाएगी।’’
नीलू ने चैंकते हुए पूछा-‘‘वो कैसे?’’
रिनछिन ने हंसते हुए जवाब दिया-‘‘सीधी सी बात है। तुमसे जितना काम लिया जाएगा, तुम उतनी घिसोगी। जब घिसोगी तो छीली जाओगी। छीली जाओगी तो आकार छोटा होगा ही।’’
नीलू सोचने लगी। रिनछिन ने बताया-‘‘नई पेंसिल तो लगभग पचास किलोमीटर लंबी लाइन खींचेगी। वहीं तुमने तो यह सफर तय कर ही लिया है। नई पेंसिल बार-बार घटने के लिए छीली जाएगी। वहीं तुमने छीले जाने की बहुत सी पीड़ा सहन कर ली है।’’ नीलू चुपचाप सुनती रही।
रिनछिन ने कहा-‘‘नई पेंसिल को पहली बार सारे अक्षर और संख्याओं को बनाना सीखना होता है। वहीं तुमने हजार-हजार बार उन अक्षरों को और संख्याओं को बनाया है। क्या नहीं बनाया?’’ नीलू क्या जवाब देती। वह चुप ही रही।
रिनछिन ने हंसते हुए बोला-‘‘याद करो, कई बार तुम्हारी वजह से किए गए स्कूल और होमवर्क में मुझे शाबासी मिली है। ऐसे कई मौके आए हैं जब तुम्हारी बनाई ड्राइंग में मुझे इनाम मिले हैं। मेरी कई काॅपियों पर तुम्हारा लिखा हुआ काम है। तुम मेरी दोस्त हो। सहयोगी हो।’’ यह सुनकर नीलू गर्व से भर गई। अब वह खुशी से होमवर्क करने के लिए तैयार थी। 
॰॰॰mobile -09412158688.7579111144

-मनोहर चमोली ‘मनु’,गुरु भवन, निकट: डिप्टी धारा, पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड।

31/12/2016

Folk and child literature लोक और बाल साहित्य manohar chamoli manu

लोक और बाल साहित्य 


-मनोहर चमोली ‘मनु’


उत्तराखण्ड का बाल साहित्य भी कला, संस्कृति और परंपरा की तरह अनूठा है। बेजोड़ भी है। यह लिखित से अधिक मौखिक-वाचिक परंपरा में अधिक समृद्ध रहा है। तब, जब पढ़ने का रिवाज़ ही खतरे में बताया जा रहा है। तब, जब वर्तमान उत्तराखण्ड के लोगों के बराबर एक और समाज अपने लोकजीवन सहित उत्तराखण्ड से बाहर रह रहा है। तब, जब उत्तराखण्ड में रह रहे बाशिंदांे में अधिकतर अंग्रेजियत के पक्षधर होते जा रहे हैं। ऐसी स्थितियों में कौन नहीं जानता कि अंग्रेजी ने जहां-जहां अपने पैर पसारे हैं, उसने मूलतः वहां का लोक और विश्वास तो लुप्त किया ही है। यह भी सही है कि उत्तराखण्ड का लोक इसीलिए भी खास और अनोखा है क्योंकि इस सर जमीं का लंबा चैड़ा इतिहास तो है ही साथ ही विदेशी संस्कृति का जनमानस किसी न किसी तौर पर यहां से जुड़ा रहा है।  
उत्तराखण्ड का रहा-बचा अधिकतर प्राचीन बाल साहित्य ज़बानी है और वह समय के साथ-साथ लुप्त होता जा रहा है। यह चिन्ता की बात है। अब तक लोक परंपरानुसार आंचलिक भाषाओं के अधिकाधिक प्रयोग से वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है, लेकिन अब यह भी पुरानी घुमन्तु पीढ़ीयों के गुजरने के साथ बीते समय की बात होता जा रहा है। 

हम सब जानते हैं कि ऋगवेद में उत्तराखण्ड हिमालय के इतिहास एवं संस्कृति के अल्प संकेत मिलते हैं। इसे सात सिन्धु प्रदेश मानने वालों का कहना है कि यही आर्यो का देश रहा है। शतपथ ब्राह्मण में इस प्रदेश का इतिहास एवं संस्कृति का सन्दर्भ मिलता है। शकुन्तलोपाख्यान भी इसी क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है। केदारखण्ड और मानसखण्ड का संबंध इसी भूमि से है। बौद्धों के पालि साहित्य का प्रभाव इस क्षेत्र में रहा है।राजतरंगिणी (1148 ई॰) में केदारमण्डल का उल्लेख मिलता है। विदेशी प्रभाव जिसमें खासकर चीनी, मुगल, यूरोपीय-पुर्तगाली यात्रियों का प्रवेश भी वहां के साहित्य को यहां लेकर आया। यही कारण है कि उत्तराखण्ड को साहित्य की उर्वरा भूमि कहा गया है। लोक साहित्य में वीर गाथाएं, लोक कथाएं और लोकगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी वाचिक परंपरा के अनुसार हस्तांतरित होता रहा है। 

आम तौर पर उत्तराखण्ड में पढ़ने-लिखने का माध्यम हिंदी भाषा ही रही है। राज-काज की भाषा का प्रभाव भी रहा तो राजे-रजवाड़ों की संस्कृति, आचार-व्यवहार और परम्राएं, तीज-त्योहार भी कथा-कहानियों का हिस्सा रहे हैं। सब जानते हैं कि उत्तराखण्ड का उल्लेख पुराणों में मिलता है। अंग्रेजों से पूर्व अनेक वंशजों का शासन राज्य के कई हिस्सों में रहा है। आबाद और गैर आबाद रहन-सहन के कारण भी यहां का लोक साहित्य वाचिक परंपरा के कारण हस्तांतरित होता रहा। श्रुत परंपरा के आधार पर संकलित साहित्य आगे बढ़ता रहा। देशकाल, परिस्थितियों और वातावरण पर दृष्टि डालने वाले मानते हैं कि सातवीं शताब्दी के पूर्व का लोकजीवन भी कथा-कहानियों में सुनने को मिलता है। जानकार बताते हैं कि कहानियों में इतनी विविधता है कि समग्रता से अध्ययन करने पर भी इसके आरंभ का सिरा पकड़ में नहीं आता। पुराणों की छाप तो इन कहानियों में मिलती ही है। इसके साथ-साथ राजा-रजवाड़ों का परिवेश भी कहानियों में शामिल है। पीढ़ी दर पीढ़ी वाचिक परंपरा के आधार पर सुनी जाती रहीं कहानियों के शिल्प और प्रवाह पर ध्यान देने से पता चलता है कि प्राचीन कहानियों में विदेशी लोक जीवन की महक भी मिलती है। 

कहानियों में इतने भाव, बोध, संवेग और संघर्ष शामिल हैं कि लगता है पहाड़ का लोक जीवन और लोक साहित्य का अध्ययन करने के लिए वर्षों का समय चाहिए। वृहद अनुसंधान के लिए चुनौतियां स्वीकार करने के लिए युवा साहस चााहिए। जीवन संघर्ष, युद्ध, वृहद प्रकृति, विदेशियों का आगमन, कृषि, वन्य जीव, पालतू पशु, राजशाही, राजदरबारी जीवन, विवाद, कचहरी, अपराध, आंदोलन, बेगारी, लूटपाट, राहजनी, हिमालय, सर्दी, गर्मी, बरसात पर बाल साहित्य-सा सुनने-पढ़ने को मिल जाएगा। जानकार मानते हैं कि हिंदी साहित्य जितना पुराना है, उतना ही पुराना बाल साहित्य है। 

पिछले एक शतक से ही साहित्य से बाल साहित्य को अलग करके देखने का नज़रिया बना है। अन्यथा प्राचीन समय में साहित्य से ही समय के अनुसार बाल मन को सुनाए जाने वाले लोक साहित्य से ही बच्चों का मनोरंजन किया जाता रहा है। मनोरंजन के साथ-साथ बच्चों में नैतिकता, साहस और आज्ञाकारिता का भाव भरने वाला लोक साहित्य भी मिलता है। जिसे बाल साहित्य के खांचे में भी रखा जा सकता है। उत्तराखण्ड के लोक साहित्य में बहुत सारा साहित्य बाल साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। भले ही इन रचनाओं का जन्म जिस काल के लोक ने किया हो, उन्होंने विशुद्ध रूप से बच्चों के मनोरंजनार्थ ये न रचा हो। लेकिन यह उतना ही प्राचीन है जितना मानव। यही कारण है कि लोक साहित्य में ऐसा साहित्य भी है जिसमें बालपन केन्द्र में है। दिलचस्प बात यह है कि इसे अधिकतर लोक कथा, लोक गाथाओं, वीर गाथाओं, लोकगीतों के तौर पर ही देखा जाता रहा है। ऐसा साहित्य विपुल मात्रा में है जिसकी छाप ग्रन्थों, पुराणों, पंचतंत्र, वेताल पचीसी, तिलस्म, भूत-प्रेत-डायन, परी, अंधविश्वास से मेल खाता प्रतीत होता है। लेकिन यह हमारे बीते लोक का हिस्सा है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता। जैसे चिट्ठी-पत्री बीते समय के हमारे लोक का हिस्सा रही है। आज वह नई सूचना तकनीक के आने से धीरे-धीरे हमारे गीतों, रोजमर्रा के हिस्सों से लुप्त होने लगी है। अब कोई यह नहीं कहता कि चिट्ठी लिखना। चिट्ठी भेजना। लेकिन क्या आगामी समय का समाज चिट्ठी-पत्री और डाकिया की कभी बात नहीं करेगा? 

समय के साथ-साथ पुरातन परंपरा का प्रवाह भले ही आज मंद हो गया हो। दूसरे शब्दों में थम गया हो या लुप्त हो गया हो। लेकिन वह बीते कल का हिस्सा तो माना ही जाएगा। यह भी तय है कि साधारण बच्चों के लिए साधारण जनजीवन के ताने-बाने में रचा लोक साहित्य ही बाल साहित्य ही है। आज बाल साहित्य की समझ यह भी इंगित करती है कि वह साहित्य बाल साहित्य कहां है जो बच्चों को बड़ा होने की दिशा में सहायक न हो। दिलचस्प बात यह है कि लोक कथाएं हों या बाल साहित्य, सभी में आदिकाल से अब तक के जीवन की छाप दिखाई देती है। उत्तराखण्ड का साहित्य इसीलिए भी विशिष्ट हो जाता है कि अब तक सुना और पढ़ा जाने वाला लोक साहित्य अन्य अंचलों में भी थोड़े बहुत संशोधन के साथ सुनने-पढ़ने को मिल जाता है। उत्तराखण्ड में लोक बाल साहित्य मौखिक है और अभी भी जिन्दा है। बस उसे संग्रहीत करने की आवश्यकता है। जहां यह भी सत्य है कि गांव-दर-गांव उजड़ते जा रहे हैं। लेकिन आज भी पहाड़ की संस्कृति और लोक का बहुत अधिक हिस्सा सामुदायिकता, सहभागिता और वाचिक परंपरा के चलते रहा-बचा है। 

समूची संस्कृति के अध्ययन के लिए यहां के लोक साहित्य का वृहद अध्ययन जरूरी हो जाता है। अभी तक उत्तराखण्ड के बाल साहित्य का समग्र रूप से लिखित संकलन नहीं हो सका है। घर-घर जाकर पाण्डुलिपियों को इकट्ठा करने का काम करना होगा। बड़े-बुजुर्गो के साथ बैठकर इसे सुनना होगा। कुछ लोरियां सुनने-पढ़ने को मिलती हैं। लोक कथाएं पढ़ने को मिलती हैं। लेकिन लोक बाल कथाओं का तो संकलन करना होगा ! बाल गीत असंख्य हैं। लेकिन लोक बाल गीतों का संकलन भी एक बड़ा काम होगा। बहुत सी लोरियों और लोकगीतों में भी बाल वर्णन मिलता है। लोक साहित्य में अप्रत्यक्ष तौर पर बच्चों को प्रकृति से प्रेम करने, पशु-पक्षियों से प्रेम करने, गलत संगत न करने पर अधिक बल दिया गया है। इस हेतु परियों, चुडै़लों, डायनों, भूतों और निरंकुश राजाओं का सहारा भी लिया गया है। बच्चों को बुराईयों से दूर रखना सबसे बड़ा मकसद नज़र आता है। इसके साथ-साथ मेहनत करने, सच्चाई का साथ देने, बड़ों का आदर करने, खेती-बाड़ी करने आदि पर जोर दिया गया है।

एक बात तो निश्चित है कि उत्तराखण्ड में श्रुति एवं स्मृति का अधिकाधिक प्रयोग होता रहा है। रचनाएं सैकड़ों की ज़बान से सुनती-सुनती बनती-बिगड़ती नए-नए रूप में आगे बढ़ती रही। यह आज तक जारी है। मुझे लगता है कि लोककथाओं और लोक साहित्य से बाल साहित्य को छांटा जा सकता है। इसे काल खंड के स्तर पर भी किया जा सकता है। यह भी संभव है कि यदि देशकाल और समय का आभास न हो रहा हो तो कथावस्तु के आधार पर हम इसे अलग श्रेणियों में बांट सकते हैं। मसलन रीति-रिवाज, खान-पान, अंधविश्वास, परंपरा, लोक जीवन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और यथार्थपरक बाल साहित्य तो अलग किया ही जा सकता है।         

गढ़वाल, कुमांऊं, जौनसार, बधाण, रवांई जौनपुर आदि क्षेत्रों में ‘तीलू रौतेली‘, ‘पंथ्या दादा‘, ‘रामी-बोराणी’ जैसे सच्चे प्रसंगों का अविस्मरणीय इतिहास है। लोककथाओं जैसे-‘चल तुमड़ी बाटे-बाट‘, ‘काफल पाको-मिन नि चाखो’ को याद करते हुए उसमें बाल मनोविज्ञान और बाल मनोव्यवहार के साथ-साथ बच्चों के साथ बड़ों के व्यवहार की पड़ताल नए सिरे से की जा सकती है। इस तरह का कोई विशेष और ठोस अध्ययन प्रकाश में नहीं आया है, जिसके आधार पर कहा जा सकता हो कि उत्तराखण्ड में बाल साहित्य की लिखित शुरूआत कब, कैसे और कहां से हुई है। 

पढ़ने-लिखने की समृद्ध परंपरा के बावजूद भी उत्तराखण्ड में बाल साहित्य को बचकाना साहित्य-फूहड़ साहित्य मानने वालों की कमी नहीं हैं। अपढ़ों का साहित्य कहने वाले इस बात से अनजान हैं कि बाल साहित्य रचना प्रौढ़ साहित्य की ही तरह है। बाल साहित्य अधिक परिश्रम मांगता है। बाल साहित्य को बचकाना साहित्य मानने वालों में अधिकतर वे हैं, जिन्होंने न स्वयं बाल साहित्य पढ़ा है न ही बच्चों को वे बाल साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करते दिखाई देते हैं। दिलचस्प बात यह है जब उनसे पत्र-पत्रिकाओं के बारे में चर्चा करेंगे तो पाएंगे वे दो-तीन पत्रिकाओं के नाम के अलावा कुछ भी नहीं बता सकंेगे। आखिरी बार बाल साहित्य कब पढ़ा? यह सवाल पूछे जाने पर वे इधर-उधर की बात करते नज़र आएंगे।

बाल साहित्य को प्रकाशित करने वाले पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो उत्तराखण्ड के अलमोड़ा से प्रकाशित नटखट सबसे प्राचीन बाल पत्रिका प्रकाश में आती है। हालांकि इसका एक भी अंक उपलब्ध नहीं है। बच्चों का नज़रिया, बच्चों का अख़बार, बाल प्रहरी, बाल बिगुल, सितारों से आगे बचपन, अंकुर आदि के अलावा कुछ संस्थाएं हैं जिन्होंने अनियतकालिक बाल पत्रिका-पत्र के सीमित अंक प्रकाशित किए। उत्तराखण्ड के बाल साहित्यकारों की रचनाओं में परीकथाएं, गुलीवर की यात्राएं, एलिस इन वंडरलैण्ड की छाप अधिक दिखाई पड़ती है। कई रचनाकार अभी भी लोककथाओं के फाॅरमेट से बाहर नहीं निकल सके हैं। वे आज भी साठ के दशक के बच्चों की मानिंद आज के बच्चों के लिए बाल साहित्य रच रहे हैं। यह हैरानी की बात है। हालांकि उत्तराखण्ड में उत्तराखण्ड बाल कल्याण साहित्य संस्थान, बाल साहित्य संस्थान, अल्मोड़ा, रूम टू रीड, प्रथम, भारत ज्ञान विज्ञान समिति, रूलक जैसी संस्थाओं ने बालसाहित्य विमर्श आरंभ किया है। इस विमर्श में बालसाहित्य को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से रचने की वकालत भी की गई है।

आज भी अधिकतर बाल साहित्यकार बच्चों के स्तर का लेखन करने में सक्षम नहीं हैं। वे उपदेश देने, बच्चों को सूचना और ज्ञान देने, आदेश और नसीहत देने से अधिक नहीं सोच पाए हैं। वह बच्चों को सदाचारी बनाने, आज्ञाकारी बनाने और राष्ट्र का सच्चा नागरिक बनाने पर तुले हुए हैं। अधिकतर बाल साहित्यकार मानते हैं कि बच्चों को आदर्शवादी बातें बताना ही बालसाहित्यकार का ध्येय होना चाहिए।

आज का समय सूचना तकनीक का है। तीन साल के बच्चे भी जानते हैं कि पेड़ चल नहीं सकते। ट्रेन को टाटा करने का फायदा नहीं क्योंकि वह टाटा के बदले टाटा नहीं कह सकती। वे जानते हैं कि चांद मामा नहीं हो सकता। फिर क्यो न हमारा बाल साहित्य दिशा देने वाला हो। बेहतर जीवन की बात करने वाला हो। बच्चों की दुनिया से जुड़ी बातें बाल साहित्य में हो। बच्चे जो पढ़ना चाहते हैं। बच्चे जो जानना चाहते हैं। साहित्य भी उसी के आस-पास रहे। बच्चों को गड़ा खजाना मिल सकता है। अलादीन का चिराग भी हो सकता है से इतर यथार्थ जीवन से परिचित कराया जाए। आखिरकार उसे इस यथार्थ जीवन में ही बड़ा होना है। फिर क्यों झूठी दुनिया उसे परोसी जाए?

हिंदी बाल साहित्य का लिखित आरंभ भारतेंदु युग से माना जाता है। उत्तराखण्डवासियों का पढ़ने-लिखने का माध्यम हिन्दी है। यही कारण है कि हम हिन्दी बाल साहित्य के आस-पास ही बाल साहित्य के विमर्श पर बात नए प्रतिमानों के हिसाब से बाल साहित्य की पड़ताल कर सकते हैं। उत्तराखण्ड में प्राचीन समय से लिखने वाले बाल साहित्यकारों का कालक्रम भी व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। आजादी से पहले और आजादी के बाद का बाल साहित्य व्यवस्थित किया जाना चाहिए। आजादी के बाद गौरा पंत शिवानी की बाल कहानी अल्मोड़ा से निकलने वाली बाल पत्रिका नटखट में छपी थी। मृणाल पाण्डे, रमेश चन्द्र शाह का बाल साहित्य पढ़ने को मिलता है। सत्तर और अस्सी के दशक की पीढ़ी से आज के बाल साहित्यकारों की लंबी सूची है। लोक जीवन के साथ-साथ यथार्थपरक बाल साहित्य रचनाकारों में अश्वघोष, अरुण बहुखंडी, अनीता चमोली ‘अनु’, आशा शैली, उमा तिवारी, उषा कटियार, कृष्ण शलभ, कमलेश जोशी ‘कमल’ कालिका प्रसाद सेमवाल,खुशाल सिंह खनी, गरिमा, जगदीश पंत, जगदीश जोशी, जीवन सिंह दानू, देवेन्द्र मेवाड़ी, दिनेश लखेड़ा, दीवान नगरकोटी, डाॅ॰ नन्द किशोर हटवाल, नवीन डिमरी ‘बादल‘, पुष्पा जोशी, प्रबोध उनियाल, प्रीतम अपच्छयाण, प्रमोद तिवारी, पंकज बिष्ट, प्रेम सिंह पापड़ा, प्रेमवल्लभ पुरोहित ‘राही’,पंकज बिष्ट, भगवत प्रसाद पाण्डेय, बद्री प्रसाद वर्मा ‘अनजान’, महावीर रंवाल्टा, मनोहर चमोली ‘मनु’ मदनमोहन पाण्डेय, मंजू पांडे ‘उदिता’, महेन्द्र ध्यानी, मथुरादत्त मठपाल, मनोज पांडे, मुकेश नौटियाल, महेन्द्र सिंह राणा, महेन्द्र प्रताप पाण्डे, माया जोशी, माया पांडे, रमेश चन्द्र  पन्त, रश्मि बड़थ्वाल, रतन सिंह किरमोलिया, रतनसिंह जौनसारी’, राजेश्वरी जोशी, राज सक्सेना ‘राज’, रावेन्द्र रवि, लक्ष्मण सिंह नेगी, रेखा रौतेला, विष्णुदत्त शास्त्री, विनिता जोशी वीरेन्द्र खंकरियाल, विमला जोशी, शशांक मिश्र ‘भारती’, हरिमोहन ‘मोहन’, खेमकरन सोमन, डाॅ॰ दीपा कांडपाल, डाॅ० नन्द किशोर हटवाल, डाॅ॰ महेन्द्र सिंह पांडेय, डाॅ॰ दिनेश चमोला शैलेश, डाॅ० उमेश चमोला, डाॅ॰ सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी,  डाॅ॰ यशोदा प्रसाद सेमल्टी, डाॅ० रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’  डाॅ० प्रभा पन्त, दयाशंकर नौटियाल, प्रकाश चन्द्र जोशी, बालेन्दु बडोला, भाष्करानंद डिमरी,  रमेश चन्द्र पंत, राजेश्वरी जोशी, शेरजंग गर्ग, शशि भूषण बडोनी, शांति प्रकाश ‘जिज्ञासु’,शशि शर्मा, संतोष किरौला, सरोजिनी कुकरेती, हंसा बिष्ट प्रमुख हैं।

उत्तराखण्ड के बाल साहित्यकारों को चाहिए कि वह साक्षरता दर में बेहतर स्थिति का लाभ उठाए। पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बचाए और बनाए रखने के लिए बेहतर बाल साहित्य का निर्माण करे। नए भाव बोध का साहित्य रचे। आखिर हम कब तक पचास के दशक के विषय, प्रकरण और प्रतीकों का इस्तेमाल करते रहेंगे। आए दिन हमारे साधन बदल रहे हैं फिर बाल साहित्य क्यों न बदले? ॰॰॰ 

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28/12/2016

Doon Literature Festival 2016 24-25 December 2016

साबित हुआ कि मरा नहीं है सब कुछ

 -मनोहर चमोली ‘मनु’

 साल दो हजार सोलह का अंतिम सप्ताह ‘दून साहित्य महोत्सव’ के नाम से लंबे समय तक याद किया जाएगा। द्रोण नगरी में यह पहला ऐतिहासिक मौका था जब जनपक्षीय सरोकार के पक्षधर कलमकार दो दिन जुटे। साहित्यका, पत्रकार, छायाकार, चित्रकार, पाठक और श्रोता के तौर पर इन दो दिनों में लगभग दो हजार आंखों का आंकड़ा आश्वस्त करता है कि पढ़ने-लिखने और सुनने समझने की आग अभी भी बाकी है। यदि मकसद मुनाफा और राजनीतिक संकीर्णता से परे हो तो आयोजन भले ही बहुत दूर हो तो भी जागरुक व संवेदनशील बुद्धिजीवी भी जुटते हैं और आम पाठकगण भी बिन बुलाए आ जाते हैं।

 यह आयोजन सिद्व करता है कि जनसरोकारों की चिंताएं भी विमर्श का हिस्सा बनती हैं और पाठक पढ़कर और सुनकर अपनी समझ का विस्तार भी करते हैं। दून पुस्तकालय एवं संस्कृति विभाग के सहयोग से सूबे में तेजी से अपनी धमक देने वाला प्रकाशक समय साक्ष्य ने इस आयोजन का जिम्मा लिया।

 दो दिवसीय साहित्यिक महोत्सव में ग्यारह सत्रों का सफल संचालन हुआ। अलग-अलग सत्रों को सुनने आए और दो दिवसीय पूर्ण आयोजन में जुटे श्रोता और दर्शकों का आंकड़ा एक हजार से भी आगे जा पहुंचा। पहले दिन के महत्वपूर्ण सत्रों में हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य और नया मीडिया, भूमण्डलीकरण और हिन्दी कहानी, हिन्दी कविता: चेतना और पक्षधरता, स्त्री और आधुनिकता, कवि और कविता के साथ खुले प्रागंण में पुस्तक मेला भी आयोजित हुआ।

दूसरे दिन लोक साहित्य: अतीत, वर्तमान और भविष्य, बाल साहित्य: चुनौतियां और संभावनाएं, बाज़ार, मीडिया और लोकतंत्र, कथेतर साहित्य: समय और समाज, आंचलिक साहित्यः चुनौतियां और संभावनाएं तथा सरला देवी: व्यावहारिक वेदान्त पर चर्चा हुई। इसी के साथ-साथ सुनील भट्ट कृत पुस्तक साहिर लुधियानवी की पुस्तक पर भी चर्चा हुई। भास्कर उप्रेती ने दिनेश कर्नाटक कृत पुस्तक मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां पुस्तक पर चर्चा की। दोनों दिन देर रात संचालित वृहद काव्य गोष्ठी भी श्रोता खूब जुटे। दोनों दिन कमल जोशी और भूमेश भारती की छायाचित्र प्रदर्शनी ने भी आयोजन में चार चांद लगाए। प्रख्यात चित्रकार बी॰मोहन नेगी की रेखाचित्र प्रदर्शनी ने भी विशिष्ट माहौल बनाया।

हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य और नया मीडिया सत्र का संचालन सुशील उपाध्याय ने किया। बतौर संचालन कर रहे सुशील उपाध्याय ने जन सरोकारों के साथ-साथ साहित्य के नामचीन नामों को याद किया तो इक्कीसवीं सदी के खतरों की ओर इशारा भी किया। प्रखर वक्ता एवं आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि भारत की औसत आयु पर गौर करें तो नौजवानों की दुनिया ही सामने आती है। लेकिन नौजवानों के लिए सबक और समझ बनाने वाला साहित्य हम रच पा रहे हैं? उन्होनें कहा कि आज सारा खेल भावनाओं का और झूठ का है। यह समय आहत हो रही भावनाओं का समय है। हम साहित्यकारों के साथ-साथ पाठकों और श्रोताओं को भी समझना होगा कि हम जिस समय में जी रहे हैं उस समय को समझने की भी आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि प्रतिक्रियावादी की निम्नतर सोच देखिए वह दूसरे की कही गई बात पर कुछ नहीं कहते वह बात कहने वाली की पहचान पर उतर जाते हैं। फिर चल पड़ता है जात, धर्म पर छंीटाकशी। उन्होने जोर देकर कहा कि चुनी हुई चुप्पियां, चुनी हुई चीखें और चुनौती के स्तर पर हमें समझना होगा कि हम सामथ्र्य के साथ मानवीय विवेक का प्रतिनिधित्व करें। उन्होंने कहा कि साहित्यकार किसी की उपेक्षा नहीं कर सकता। हमें जनपक्ष पर अपनी बात रखने का अधिकार है।

उन्होंने पूछा कि क्या बुद्धिजीवी होना अपराध हो गया है? शब्द ही है जो मनुष्य को मनुष्य बनाने की क्षमता रखता है। हम लेखक शब्दों के प्रयोग से ही शिक्षा समानता और शांति की बात करते हैं। बौद्धिक कर्म से जुड़ा होना आज की तारीख में अपराध हो गया है। लेकिन इस अपराध को करते रहने में ही हमारी सार्थकता है। हम और कर ही क्या सकते हैं। उन्होंने दण्डी का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने कहा था कि यदि शब्द और नाम न होते तो इस संसार में अंधेरा ही रहता।

 पुरुषोत्तम अग्रवाल जी ने कहा कि शब्द, संवेदना और ज्ञान को कलमकार ही बचाए और बनाए रख सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि एक ही वस्तु को देखने के लिए अलग अलग दृष्टियां हो सकती हैं। मेरी ही दृष्टि सही है। इस बात पर अड़ना गलत है। उन्होंने चेताया कि जानबूझकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि हम सूचनाओं के विस्फोट में उलझे रहें। हमारे पास सोचने का समय ही न रहे। स्मरण शक्ति को खत्म किया जा रहा है। समाज अब संक्षिप्त स्मृति में जीने की ओर बढ़ चला हैं। यह समय खतरनाक है। स्मृतिविहीन हो रहा जन। बुद्धि और तर्क से परे होती जा रही संवेदनाएं, सत्यातीत की ओर बढ़ता समाज। बस साहित्य ही है जो अपने भीतर सत्य को रखता है। भाषा ही है जो हमें बोध कराती है। साहित्य ही है जो सच दिखा सकता है। श्री अग्रवाल ने कहा कि अब वह इस बात की चिन्ता नहीं करते कि उनके लिखे को कौन पसंद करेगा और कौन नहीं। मेरे लिए कौन रोएगा, मैं नहीं जानता। बस मुझे अपना ध्येय पता होना चाहिए।

 इसी सत्र में बटरोही ने कहा कि हम पहाड़वासियों ने हिमालय की गोद में पहली सांस ली है। हमारे भाव और रचना प्रकृति की ही देन है। उन्होंने कहा कि साहित्य, कला और संस्कृति अपनी जड़ों से जुड़ने की यात्रा है। यह यात्रा जन सरोकारों की यात्रा हो। उन्होंने सवाल उठाया कि रचनाकार की सफलता क्या है? हमारी रचना किसी क्षेत्र की सरहद के भीतर रहती है या फैलती है। रचना लोकोन्मुखी होगी तो पंख पसारेगी। उन्होंने विदेशी धरती के कई उदाहरणों का संदर्भ भी दिया। क्षेत्रीयता और मातृभाषा की उन्होंने पुरजोर वकालत की।

 भूमण्डलीकरण और हिन्दी कहानी सत्र का संचालन अनिल कार्की ने किया। सुभाष पंत ने कहा कि हर युग में कहानी बदलती है। बदलना उसका स्वभाव है। प्रतिबद्ध लेखकों का दायित्व है कि वह देशकाल और परिस्थिति का सच कहानी के माध्यम से परोसे। हर एक अभिव्यक्ति कहानी ही है। उन्होंने कहा कि जिस तेजी से समाज बदल रहा है। बाजार बदल रहा है। दुनिया बदल रही है। यह सब हमारी कहानी का हिस्सा होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज यह समय है कि यदि कोई मध्यमवर्ग का इंसान कारपोरेट जगत के किसी अस्पताल में भर्ती हो जाए तो बीस दिनों में ही गरीबी रेखा के नीचे आ जाएगा। एक तो बाजार था कि जो आपको चाहिए वह बाजार में उपलब्ध है। आप अपने मुताबिक सामान ले लें। आज बाजार तय कर रहा है कि आप इसे लो। ले ही लो। मनुष्य आज चीज़ के रूप में परोसा जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह शुभ संकेत है कि पाठकों में साठ फीसदी पाठक महिलाएं हैं। हम सब जानते हैं कि आधी दुनिया पर काम, जिम्मेदारी की दोहरी भूमिका भी है। उन्होंने यह भी कहा कि रचनाकार को आत्ममुग्धता आगे नहीं बढ़ने देती। कहानियों की चमक में कहानीकार आगे नहीं बढ़ पाता। अपने बारे में और अपनी रचना के बारे में मिलने वाली प्रसन्नता कई बार कहानीकार को आगे नहीं बढ़ने देती। उन्होंने कहा कि संवेदनशील रचनाकार ही जीवन बचा सकता है। बचाता आया है। जीवन को बचाने का कारगर उपाय रचनाएं ही हैं।

संवेदना को बचाए और बनाए रखने के लिए कहानियां ही हैं जो हमें दर्पण दिखाने की ताकत रखती है। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि लिखना हमारी संवेदनशीलता है। छपना हमारा कौशल है। कहानियों का प्रचार हमारा मैनेजमेंट है। आज प्रचार अधिक है।

 जितेन ठाकुर ने कहा कि लेखक ही हैं जो हमारी दृष्टि विकसित करते हैं। परिवेश को समझते हैं। हालातों को करीब से देखते हैं। समाज के सामने लाते हैं। उन्होंने कहा कि भूख, बेकारी, लाचारी और भावपूर्ण कहानियां हर काल में अलग से रेखांकित होती रही है। आज सूचना तकनीक में कई बार अच्छी कहानियों की चर्चा पीछे रह जाती है और साधारण रचना प्रचार पा जाती है। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इस सत्र को कान्ता राॅय, मनीषा कुलश्रेष्ठ, दिव्य प्रकाश दुबे ने भी संबोधित किया।

 हिन्दी कविता चेतना और पक्षधरता का संचालन अरुण देव ने किया। लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि कविता का जन्म कथा कहने के लिए ही हुआ है। उन्होंने कहा कि कलमकार की भूमिका को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कविता में तुक मिलाना भी कविता मान लिया गया। तुक मिलाने के चलते कई बार बेतुकी बातें भी हुईं। उन्होंने कहा कि कविता एक से दूसरे की ओर नहीं ले जाती बल्कि दूसरे से दूसरे में जाने की परंपरा कविता है। यह गुणित अनुपात वृहद है। उन्होंने अपने विशाल अनुभवों के आलोक में भाषा, सौन्दर्य, लिपि, कविता के उद्देश्य पर भी दृष्टि डाली।

 राजेश सकलानी ने कहा कि चेतना हर समाज में प्रगतिशील ही होती है। हम अपने समय के सच को उजागर करते हुए समाज की भी चेतना जगाते हैं। शैलेय ने कहा कि हम सभी को वर्तमान समय के सच को सामने लाना चाहिए। अपनी चेतना और पक्षधरता को समाज के हित से ही देखना चाहिए। आशीष मिश्र ने कहा कि लोक जीवन का उभार ही हमारी चेतना का विषय नहीं हो पा रहे हैं। हमारा लोक हमसे दूर होता जा रहा है। गांव की तस्वीर धूमिल होती जा रही है। प्रतिभा कटियार ने कहा कि सवालों से लड़ना ही कवि का धर्म है। रचना हमें सोने नहीं देती। यह समाज के प्रति हमारी पक्षधरता है। इस सत्र में कविता के कई पक्षों पर विहंगम रूप से चर्चा हुई। अधिकतर वक्ताओं ने आज के समय को जटिल बताया और सतर्क रहना चेताया।

 स्त्री और आधुनिकता का संयोजन गीता गैरोला ने किया। शीबा असलम ने कहा कि नारीवादी आधुनिकता आयातित है। हम हमेशा से तर्क देते आए हैं कि प्रकृति ने ही महिला को दुर्बल बनाया है। जबकि यह सच नहीं है। औरतों की समस्याएं हर ओर एक जैसी नहीं है। उन्होंने कहा कि कमजोर उत्पादन हर जगह हारता है। आज भी महिला को प्रोडक्ट के तौर पर आगे रखा जाता है। हमारी अधिकतर परंपराएं महिला को कम करके आंकती रही हैं। आज महिला आंदोलन फैशन की तरह इकट्ठा होने के तौर पर देखे जाते रहे हैं।

 सुजाता तेवतिया ने कहा कि स्त्री पर बात करना कोई फनी नहीं है। रोमांटिक नहीं है। यह कहना कि आज की स्त्री कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। आधा सच ही है। आज भी अमूमन हर घर में एक सामन्तवादी सोच कायम है। उन्होंने कहा कि हर ओर ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि स्त्री को घर और घर के काम में निपुण होना प्राथमिक काम के तौर पर देखने की आदत बने। उसे रसोई और घर के काम को जीतने के लिए अप्रत्यक्ष तौर पर दौड़ाया जाता है। उन्होंने कहा कि एक महिला कांस्टेबल को ही लें। वह संघर्ष करती है। जनाना तो कभी मर्दाना बनती है। ऐसा पुरुष के साथ नहीं होता। उन्होंने कहा कि अधिकतर मामलों में घर के पुरुष ऐसा आवरण बना लेते है कि महिलाओं को यह लगे कि उसे क्या जरूरत धारा के विपरीत बहे। ज्यादा कष्ट उठाने की जरूरत नहीं है। यह सब योजनाबद्ध तरीके से चलता है।

उन्होंने कहा कि पहाड़ की महिलाओं के मुद्दे अलग हैं। दिल्ली की महिलाओं के मुद्दे अलग हैं। स्थानीय आवाज़ें मुद्दों के तौर पर सामने आनी चाहिए।

 गीता गैरोला ने कहा कि समानता के लिए सोचना और स्त्री हक के बारें में सोचना पूरे समाज की आवश्यकता है। पूरे समाज को सोचना होगा। महिला आंदोलन की अगुवा कमला पंत ने कहा कि कई सारे आंदोलन गवाह है कि वह बिना स्त्री के कभी सफल नहीं हो सकते थे। महिला से दूरी समाज से दूरी है। महिला को अलग खांचे में देखना गलत है। घर, गांव और परिवार से दूरी घातक है। आज भी महिला ही हर कुछ बचाए और बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। संघर्षरत है। उन्होंने कहा कि पूरे समाज का दायित्व है कि बातों को, विचारों को बांटे, तभी स्वस्थ समाज की स्थापना होगी।

 कवि और कविता की अध्यक्षता अतुल शर्मा ने की। स्वाति मेलकानी, रेखा चमोली, माया गोला, अंबर खरबंदा, मुनीश चन्द्र, राजेश आनन्द असीर, नदीम बर्नी, शादाब अली, प्रतिभा कटियार, सुभाष सहित बीस अन्य कवियों ने कविता पाठ किया।

 लोकसाहित्य अतीत वर्तमान और भविष्य का संयोजन उमेश चमोला ने किया। प्रभा पंत ने कहा कि हम सब लोक का हिस्सा हैं। जहां रचनाकार अनाम हो जाता है वहां वह रचना लोक की हो जाती है।

 प्रभात उप्रेती ने कहा कि लोक वह है जो हमें आनंद से भर दे। हमारे भीतर लोक बचा रहना चाहिए। प्रीतम अपच्छयाण ने कहा कि लोक में सामूहिकता ही लोक की ताकत है। नंद किशोर हटवाल ने लोक विमर्श को आज के सन्दर्भ में जोड़कर कहा कि साठ फीसदी लोक समय के साथ मौखिक परंपरा में होने के कारण लुप्त होने के कगार पर है। इसे कैसे बचाया जाए यह चिन्ता की बात है।

महावीर रंवाल्टा ने कहा कि साहित्य का प्राण तो लोक में है। हमें उसे सामने लाना चाहिए।

 बाल साहित्य चुनौतियां और संभावनाएं का संयोजन मनोहर चमोली मनु ने किया। राजेश उत्साही ने बाल साहित्य के विविध पक्षों पर विस्तार से बात की। राजेश उत्साही ने बाल साहित्य के विविध पक्षों पर विस्तार से बात की। 
उन्होंने जोर देकर कहा कि बाल साहित्य को अलग से खांचे में देखने के वे पक्षधर नहीं है। अच्छा हो कि हम ऐसा साहित्य रचें जो बच्चों को भी पसंद आए और बड़ों को भी। उन्होंने बच्चों के बालमन और बच्चों को पसंद आने साहित्य की भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने फेसबुक के साथ-साथ अन्य सूचना तकनीक के बढ़िया इस्तेमाल की बात भी कही। उन्होंने बच्चों के साहित्य को संवेदना के स्तर पर और मनोरंजन के स्तर पर पहली शर्त माना। 

दिनेश चमोला ने कहा कि यह पाठकों पर छोड़ देना चाहिए कि उन्हें क्या पसंद आ रहा है और क्या नहीं।

मुकेश नौटियाल ने कहा कि कल्पना के साथ-साथ हमें अब यर्थाथवादी साहित्य भी बच्चों के लिए लिखना होगा। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बच्चों के लिए रेखांकित साहित्य का सृजन करें।

शीशपाल ने कहा कि दुख इस बात का है कि आज भी बच्चों को अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। हम बड़े उन बच्चों की बात तक नहीं सुनते। घर हो या स्कूल, सब जगह यही हाल है। उन्होंने कहा कि बच्चों की अस्मिता की ओर ध्यान जाना अभी-अभी शुरू हुआ है।

उमेश चन्द्र सिरसवारी ने कहा कि माता-पिता भी बच्चों को पढ़ने लायक सामग्री देने से इतर अधिक खाने-पीने में खर्च करने की मानसिकता से नहीं उभर पाए हैं।


 मनोहर चमोली मनु ने कहा कि आनंद के साथ-साथ बच्चों में कल्पनाशक्ति का विस्तार करतीं और उन्हें संवेदनशील बनाती रचनाएं हर काल में पसंद की जाती रही हैं। उन्होंने कहा कि आदेश, निर्देश और उन्हें आदर्श नागरिक बनाने की तीव्र इच्छा को साहित्यकारों को छोड़ना होगा। उन्होंने कहा कि पूरी आबादी में बच्चों की संख्या के हिसाब से जो बाल साहित्य प्रकाशित हो रहा है वह बेहद कम है। विज्ञापन और टीवी ने बच्चों की अहमियत समझी है। पूरा बाजार बच्चों को भुना रहा है। लेकिन साहित्य ने पाठक के तौर पर बच्चों की उपेक्षा ही की है। हम यह कब समझेंगे कि यदि बच्चों में ही पढ़ने की ललक पैदा नहीं की जाएगी तो साहित्य के पाठक कहां से आएंगे। 

इस सत्र की अध्यक्षता उदय किरौला ने की। उन्होंने सबसे पहले वक्ताओं के विशेष कथनों को पुनः परिभाषित किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि बच्चों को स्पेस दिया जाना आज की सबसे बड़ी मांग है। बच्चों को खुश होता देख खिलखिलाता देख कौन प्रसन्न नहीं होगा। उन्होंने इस आयोजन पर बाल साहित्य को विमर्श का हिस्सा बताते हुए प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन बाल साहित्य की महिमा को भी रेखांकित करेंगे। 


बाल साहित्य से पूर्व लोक पर फोकस बाखली का लोकार्पण भी हुआ। इस अवसर पर संपादक गिरीश पाण्डेय 'प्रतीक' ने बाखली से जुड़ने का अनुरोध भी किया।

 बाजार मीडिया और लोकतंत्र का संयोजन भूपेन सिंह ने किया। कुशल कोठियाल ने कहा कि आज मीडिया को नकारात्मक ढंग से अधिक देखा जा रहा है। सुन्दर चन्द्र ठाकुर ने कहा कि मीडिया हर काल में सदैव सकारात्मक ही रहे, ऐसा नहीं कहा जा सकता लेकिन जनपक्षधर धर्म तो मीडिया का होना ही चाहिए।

सुशील उपाध्याय ने कहा कि चाहे कुछ भी हो लोकतंत्र को बचाए और बनाए रखने में मीडिया की भूमिका रही है और रहेगी। इस सत्र में त्रेपन सिंह ने भी अपने विचार रखे।

 कथेतर साहित्य समय और समाज सत्र को संबोधित करते हुए शेखर पाठक ने कहा कि विभिन्न विधाओं से इतर भी कई पुस्तकें और वर्णन जीवंत बन पड़े हैं। उन्हें पढ़ना रस घोलना जैसा होता है। उन्हें पढ़कर एक अलग तरह की अनुभूति होती ही है। देवेन मेवाड़ी ने कहा कि हम जो कुछ भी पढते है यदि वह सरल है सहज है। उसमें हमारे आस-पास की दुनिया समाहित है तो वह आनंद देता ही है।

उन्होंने वैज्ञानिक नज़रिए को भी सामने रखा। इस सत्र को एसपी सेमवाल ने भी संबोधित किया।  तापस ने भी अपने विचार रखे।

आंचलिक साहित्य चुनौतियां एवं संभावनाएं पर बोलते हुए रमाकांत बैंजवाल ने कहा कि हर भाषा का अपना महत्व है। कोई भी भाषा किसी दूसरी भाषा को कैसे मार सकती है। यह समझ से परे है। हर भाषा का अपना सौन्दर्य है। इसे बनाए और बचाए रखने का दायित्व उस समाज का भी है और साहित्यकारों का भी है।

 इस सत्र को अचलानंद जखमोला, देव सिंह पोखरिया, हयात सिंह, मदन मोहन डुकलाण, गिरीश सुन्द्रियाल और भारती पाण्डे ने संबोधित किया। दिलचस्प बात यह रही कि हर सत्र में श्रोताओं ने प्रश्न भी पूछे।

 दो दिन हुए सत्रवार विमर्शों में उपस्थित पाठकों, श्रोताओं और साहित्यकारों ने भी अपनी बात रखनी चाही लेकिन सधे हुए समय के चलते ऐसा संभव नहीं हो सका।

यह कहना जरूरी होगा कि सोचना आसान होता है। सोच को ज़मीन पर उतारना बेहद कठिन होता है। रानू बिष्ट, प्रवीन भट्ट, बी॰के॰ जोशी, एस॰ फारूख, सुमित्रा, भारती पांडे, योगेश भट्ट, अरुण कुकसाल, शेख अमीर अहमद, नन्द किशोर हटवाल, सुरेन्द्र पुण्डीर, संजय कोठियाल, कान्ता, बृज मोहन, सत्यानन्द बडोनी, मनोज इष्टवाल, गीता गैरोला सहित मसीही ध्यान केन्द्र के साथीगण सहित बीस से अधिक चेहरे ऐसे थे जो नेपथ्य में रहकर इस आयोजन को सफल बनाने में दिन-रात एक किए हुए थे। आयोजन से ठीक एक दिन पहले सोचा जा रहा था कि दून से बहुत दूर अस्सी के आस-पास श्रोता जुटेंगे। लेकिन यह क्या, अस्सी, सौ, दो सौ से लेकर दूसरे दिन यह संख्या एक हजार के आस-पास जा पहुुंची। पंजीकरण पंजिका को एक ओर रख दे ंतो सत्रों के हिसाब से आने वाले पाठक, अभिभावक, साहित्यकार, श्रोता, छात्रों की यह संख्या अनुमान के मुताबिक नहीं ही है।
च्लते-चलते उत्साही साथी इसे हर साल के दिसंबर में करने का मन बना रहे हैं। हालांकि यह कहना और लिखना जितना आसान है उस पर काम करना बेहद कठिन। लेकिन कठिनतम को सरलतम कराना और करना ही तो चुनौती है।

 चूंकि इस तरह की सामूहिक भागीदारी से हुआ आयोजन पहली बार हुआ। इस बार हुए आयोजन की खामियों से सबक़ लेकर फिर से ऐसा आयोजन और ठोस व व्यापक उद्देश्यों को पूरा कर सकेगा। यह आशा तो की ही जानी चाहिए। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एक बेहतरीन आरंभ इस आयोजन ने किया। यह आयोजन यह भी संकेत देता है कि पढ़ने-लिखने की संस्कृति को कोई खतरा नहीं है।

अलबत्ता इसकी समाजोन्मुखी दिशा पर चर्चा आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। यह भी कि इस पूरे आयोजन में तीन साल से सोलह साल के बच्चों की प्रतिभागिता भी देखने को मिली। यह सुखद संकेत तो कहा ही जा सकता है।
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 -मनोहर चमोली ‘मनु’
मोबाइल-09412158688

13/11/2016

children litrature वाहवाही का बाल साहित्य -मनोहर चमोली ‘मनु’

वाहवाही का बाल साहित्य

-मनोहर चमोली ‘मनु’

बाल साहित्यकार अपने वय वर्ग में अपने लिए कितने ही भक्त बना लें, आखिरकार उनका नाम लिवाने वाली रचना ही उनकी होगी। रचना ही बोलती है। लेकिन अपनी रचना तो सबको प्यारी लगती है। अपनी गाय के सींग सभी को सबसे पैने नज़र आते हैं। आनंद की अनुभूति तो तब होती है जब रचना किसी ओर की हो और उस रचना पर बोलने वाला कोई दूसरा हो। यह दूसरा कौन होगा? रचनाकार के मुरीद तो उसके पाठक हुए। भक्त तो रचना को समय की आंच पर रखकर आलोचना करने से रहे। तीसरा ही कोई होगा जिसे आलोचक कहा जाएगा। 


यह तय है कि रचना और रचनाकार में ही जब आलोचना सहन करने की ताकत नहीं होगी तो वह अल्पजीवन जीकर काल के गाल में समा जाएगी। मैं स्वयं बतौर पाठक तत्काल बाल साहित्य की चार-छह रचनाएं उंगलियों में नहीं गिना सकता। मैं यह तो कह सकता हूं कि बाल साहित्य में इन दिनों अमुक-अमुक बहुत अच्छा लिख रहे हैं। लेकिन वह बहुत अच्छा क्या है! इस पर विचार करते ही मेरे माथे पर बल पड़ने लग जाते हैं। कारण? मेरे ज़ेहन में बाल साहित्य की इतनी रचनाओं ने स्थाई जगह नहीं बनाई है। यही कारण है कि बाल साहित्य की अधिकतर रचनाएं काल के गाल में समा ही रही हैं। 

आखिरकार हम अपनी रचनाओं पर मनचाही स्तुतियों से फुरसत कब चाहेंगे? शायद कभी नहीं। अधिकतर बाल साहित्यकार अपने बारे में और अपनी रचनाओं के बारें में अच्छा ही सुनना चाहते हैं। वहीं स्वस्थ आलोचना का आधार हमेशा आलोचक के अपने तर्क, निष्कर्ष, समझ, अनुभव, विचार, रचना के औचित्य, कथ्य और रचना की बुनावट होती है। यह जरूरी नहीं कि आलोचक की आलोचना से पाठक भी सहमत हों। लेकिन रचनाकार? रचनाकार को तो चाहिए ही कि वह आलोचना सुनकर-पढ़कर कुपित न हों। आलोचना को सहजता और सरलता से सुनें, पढ़ें और समझें। उसे माने ही, यह कतई जरूरी नहीं। 

हम आलोचना में उदारता की उम्मीद क्यों करते हैं? क्या यह सही है? यदि ऐसा है तो यह हमारा हल्कापन ही है। पाठक तो उदारता के साथ रचनाएं पढ़ते ही हैं। न पसंद आए तो उस रचना को नहीं पढ़ेंगे। ऐसा प्रायः कम ही होता है कि अमुक रचनाकार की कोई रचना मुझे पसंद नहीं आती तो ऐसा नहीं है कि मैं कल, परसों या निकट भविष्य में उसकी कोई भी रचना नहीं पढ़ना चाहूंगा। लेकिन आलोचक के मामले में ऐसा नहीं होता। आलोचक क्यों कर किसी रचना के प्रति प्रेम और निर्ममता दिखाए? उसे तो वहीं करना चाहिए, जो उसे पढ़ते समय महसूस होता है। अलबत्ता आलोचक रचना को पढ़ते समय तिहरी भूमिका में होता है। एक तो वह पाठक होता है। दूसरा वह उसे बतौर रचनाकार भी देखता है कि यदि वह इस रचना का रचनाकार होता तो वह उसे कैसे और क्या आकार देता। तीसरा वह पाठक और रचनाकार से इतर तीसरे जीव के तौर पर उस रचना के गुण-देाष देखता है। उसी के आधार पर उसकी टिप्पणी रेखांकित होती है। 

ऐसा नहीं है कि आलोचक जानबूझकर किसी रचना को अच्छा या बुरा बता दे। कमियां होते हुए भी कमियां छिपा दे। अच्छाई होते हुए भी अच्छाई की चर्चा न करे। यदि ऐसा वह नहीं करता तो उस आलोचक की तटस्थता पर जल्दी ही सवाल खड़े होने लगेंगे। फिर एक दिन ऐसा आएगा कि उसकी आलोचनात्मक दृष्टि ही हास्यास्पद मानी जाएगी। उसकी आलोचना पर रचनाकार ध्यान नहीं देंगे। 

आखिर आलोचक की मंशा क्या है? यह हमें समझना होगा। क्या वह सिर्फ और सिर्फ कमियां निकालने के लिए होता है? क्या वह किसी रचना की तारीफ ही करता फिरे? तो फिर? आलोचक को उन पर भी दृष्टि डालनी होती है, जिस पर न तो रचनाकार का ध्यान गया, न ही आम पाठक का। यदि आलोचक ही उदारता बरतेगा तो यह संभव है कि रचनाकार अपनी रचनाओं के पुराने पाठकों को धीरे-धीरे खोते चले जाएंगे। फिर जब रचना पढ़ी ही नहीं जाएगी तो यह रचनाकर्म किस काम का? 

बगैर आलोचना के आत्ममुग्धता का कवच पहनकर और झूठी वाहवाही की चादर ओढ़कर भी किसी रचनाकार की रचनाएं छपती रह सकती हैं। पढ़ी और गुनी जाएंगी, ऐसा विश्वास करना भी गलतफहमी में रहना है। बाल साहित्य में अभी भी कमोबेश वाहवाही का प्रचलन अधिक दिखता है। कई रचनाकारों को यह गलतफहमी है कि अब तक उनकी दर्जनों रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं। फलां पत्रिका ने या पत्र ने उनकी रचना क्यों कर रोक रखी है? या क्यों अस्वीकृत कर दी है? कुछ रचनाकारों को यह गलतफहमी हो जाती है कि अब तक उनके दर्जनों संग्रह आ चुके हैं। वह स्थापित बाल साहित्यकार हैं। ऐसे बाल साहित्यकारों को अक्सर यह कहते सुना जा सकता है कि हमारी रचनाओं की कसौटी तो बच्चे हैं। आज तक बच्चों ने रचना पर कोई मीन-मेख नहीं निकाली है। ये आलोचक कौन होते हैं? 

बच्चों की पढ़ने की गति क्या है! वह कितना पढ़ते हैं! यह हम सब जानते हैं। रचना, रचनाकार, पाठक और आलोचक चारों स्वस्थ चित्त से अपना धर्म निभाएं तो हिन्दी बाल साहित्य आजादी के आस-पास के साहित्य से आगे बढ़ सकता है। वरना, बाल साहित्य का अंतिम ध्येय भी अखिल भारतीय स्तर के सम्मान-पुरस्कार पाना मात्र रह जाएगा। इससे अधिक हुआ तो पत्रिकाओं के संरक्षक मंडल में सदस्य बन जाएंगे। और अधिक हुआ तो नई पौध की पुस्तकों की समीक्षाएं लिखते रह जाएंगे। और अधिक हुआ तो पुस्तक मेलों के उदघाटनों में, पुस्तक विमोचनों में फोटो खींचते नज़र आएंगे। और अधिक हुआ तो पाठ्य पुस्तकों में एक अदद रचनाएं पढ़ाए जाने से प्रफुल्लित होते रहेंगे। क्या बाल साहित्य का मकसद यही है? इतना ही है?

मुझे लगता है कि आजादी के बाद से ही यदि संजीदगी से बाल साहित्य में उक्त चारों अपना धर्म निभाते तो तब से अब तक के बाल पाठक सजग पाठक बन जाते। साहित्यिक पत्रिकाओं के साथ पढ़ने का रिवाज़ बना रहता। और बढ़ता। पुस्तकालयों की संख्या बढ़ती। नित नए खुल रहे मोल्स, सुपर मार्केट्स में एक नहीं, कई दुकानें किताबों की भी होतीं। हर घर अंग्रेजी के एक अखबार के साथ हिन्दी का एक अखबार तक नहीं सिमटकर रह जाता। हर घर में हर माह बीस-पच्चीस पत्रिकाएं घर बैठे होकरों के माध्यम से आतीं। गली मुहल्लों में जागरण, भण्डारा, धार्मिक जमात-पंगतों की ही संख्या नहीं बढ़तीं। नई किताबों पर इस तरह चर्चा होती, जिस तरह दोपहिया-चैपहिया खरीदने की खबर बैठकों-रसोईयों का विषय बनती हैं। नई किताब और रचनाकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व पर बातें होतीं। किताबों-रचनाओं पर विचार गोष्ठियां बढ़तीं। 

इन सबसे आगे की बात यह होती कि संवेदनशीलता, मानवता, नैतिकता, सामुदायिकता, सहभागिता से भरे आयोजन हमें दिखाई देते। अब भी वक़्त है। बाल साहित्यकार को अब अपनी रचना छपने-छपाने से पहले एक-दो पाठकों को पढ़ानी चाहिए। हर रचना को छपने-छपाने से पहले एक-दो मित्रों को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़वानी चाहिए। हर बाल साहित्यकार को हर माह अपने एक मित्र की रचना पर आलोचनात्मक दृष्टि डालनी चाहिए। ज़रा सा वक़्त निकालकर उस रचना पर लिखित राय बनाकर मित्र को जरूर भेजनी चाहिए। यह स्वस्थ और जरूरी परंपरा हिन्दी बाल साहित्य में जब तक नहीं बनेगी तब तलक कई बाल साहित्यकार गफलत में रहेंगे कि वे बाल पाठकों के मन-मस्तिष्क में अपनी रचना के मार्फत सम्मानजनक जगह बनाए हुए हैं। 

यह भी कि आज के दौर में यह कहने से बाल साहित्यकारों को बचना चाहिए कि साहित्य तो स्वयं के आनंद के लिए लिखा जाता है। यदि ऐसा ही मानना है तो लिखिए और लिखकर सहेज लीजिए। यहां-वहां मत भेजिए। संग्रह भी छपवाना है तो छपवाइए। उसें यहां-वहां मत बांटिए। पुरस्कारों और सम्मानों के लिए गुहार मत लगाइए। अपनी पुस्तकें विचारार्थ मत भेजिए। जब स्वान्तः सुखाय लिखा है! बच्चों को, अभिभावकों को और शिक्षकों को दोष देना बंद कीजिए कि वे पढ़ने की आदत छोड़ चुके हैं। पढ़ने लायक उपलब्ध हो तो ये तीनों (बच्चे, अभिभावक, शिक्षक) हमारी और आपकी तरह खरीदे जाने वाली वस्तु के लिए सुपर मार्केट या आम मार्केट की दर्जनों दुकानें छान आते हैं। ओन लाईन मंगाते हैं। पांच सौ रुपए की वह फलां चीज के लिए पूरा दिन और हजार रुपए का पेट्रोल कुर्बान कर देते हैं! इसे पढ़ने मात्र से, सोचने-विचारने मात्र से काम नहीं चलेगा। इस दिशा में व्यावहारिक कदम भी उठाइए।
 ॰॰॰ chamoli123456789@gmail.com

-मनोहर चमोली ‘मनु’ भिताई, पोस्ट 23, पौड़ी उत्तराखण्ड 246001 मोबाइल 09412158688

11/11/2016

उड़ान अनोखी -मनोहर चमोली ‘मनु’ child literature


उड़ान अनोखी 

-मनोहर चमोली ‘मनु’


एक तितली रो रही थी। जुगनू ने पूछा तो वह कहने लगी-‘‘मैं आसमान में उड़ना चाहती हूं। सुना है आसमान से धरती नारंगी जैसी दिखाई देती है।’’ जुगनू हँसने लगा। कहने लगा-‘‘उड़ती तो हो। अब और किस तरह उड़ना चाहती हो?’’ 

तितली ने सिसकते हुए कहा-‘‘मेरा उड़ना भी कोई उड़ना है। मेरी उड़ान तो छोटी-सी होती है।’’ जुगनू ने समझाया-‘‘और मेरी? मेरी उड़ान तो बहुत ही छोटी है। लेकिन हम दोनों आसमान में ही उड़ते हैं। जमीन के नीचे नहीं। समझी।’’ 

तितली ने जवाब दिया-‘‘समझना तुम्हें चाहिए। ज़रा याद करो। हम छोटी सी उड़ान भरते हैं। थक जाते हैं। बार-बार हमें धरती की ओर लौटना पड़ता है। है न? अरे ! उड़ान हो तो गिद्ध जैसी।’’

यह क्या! गिद्ध की बात की तो गिद्ध सामने आ गया। दोनों को सिमटता देख गिद्ध हंसने लगा। कहने लगा-‘‘डरो मत। रोना बंद करो। मेरे पैर में बैठ जाओ।’’ तितली काँपने लगी और बोली, ‘‘तुम पंख फड़फड़ाओगे तो मैं डर जाऊँगी। तिनके की तरह उड़ जाऊँगी।’’ जुगनू बोला-‘‘तुम्हारी उड़ान तो बहुत ऊंची होती है। गिरे तो हड्डी-पसली भी न बचेगी।’’

तीनों की बातें बया सुन रही थी। वह बोली, ‘‘चाहो तो मेरा घोंसला ले लो। गिद्ध उसे पंजों में पकड़ लेगा। तुम घोंसले में बैठकर दुनिया की सैर करना।’’ तितली ने हँसते हुए कहा, ‘‘यह ठीक रहेगा। लेकिन।’’ गिद्ध ने पूछा, ‘‘लेकिन क्या?’’ 

तितली बोली, ‘‘बारिश आ गई तो? मुझे भीगने से जुकाम हो जाता है।’’ गिद्ध ने हसंते हुए कहा, ‘‘मेरे पंख किसी छतरी से कम नहीं।’’ तितली भी हँंसने लगी।

 तितली हँसते हुए बोली, ‘‘अरे हाँ। यह ठीक है, लेकिन।’’ बया ने पूछा, ‘‘फिर लेकिन?’’ तितली ने कहा, ‘‘मुझे भूख लगेगी तब क्या होगा?’’ बया ने सुझाया, ‘‘तुम फूलों का रस जमा कर लो।’’ तितली बोली, ‘‘हाँ, यह ठीक रहेगा, लेकिन।’’ 

गिद्ध ने पूछा, ‘‘अब क्या?’’ 

तितली कहने लगी, ‘‘मैं फूलों का रस जमा कैसे करूँगी? रस जमा करते-करते तो कई दिन यूं ही बीत जाएँगे।’’ पेड़ पर ही मधुमक्खियों का छत्ता था। रानी मधुमक्खी अब तक चुप थी। वह बोली, ‘‘तुम मेरा छत्ता ले जाओ। इसमें ख़ूब सारा शहद है। भूख लगे तो कुछ शहद तुम भी खा लेना। वापिस आकर छत्ता वापिस कर देना।’’

 तितली ख़ुश हो गई। कहने लगी, ‘‘यह ठीक है। अब आएगा मज़ा!’’ जुगनू तितली की पीठ पर जा बैठा। तितली घोंसले में जा बैठी। गिद्ध ने पंजों से घोंसला उठाया और चल दिया अपनी अनोखी उड़ान पर। बया और रानी मधुमक्खी सहित कई सारे जीव-जन्तु उचक-उचक कर आसमान की ओर देख रहे थे। ॰॰॰ 


लेखक परिचय: मनोहर चमोली ‘मनु’: ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ और ‘पूछेरी’ पुस्तकें नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुई हैं। ‘चाँद का स्वेटर’ और ‘बादल क्यों बरसता है?’ पुस्तके रूम टू रीड से प्रकाशित हुई हैं। तीन और पुस्तकंे शीघ्र प्रकाशित। बाल कहानियों का संग्रह ‘अन्तरिक्ष से आगे बचपन’ उत्तराखण्ड बालसाहित्य संस्थान से पुरस्कृत। बाल साहित्य में वर्ष 2011 का पं॰प्रताप नारायण मिश्र सम्मान मिल चुका है। जीवन में बचपन’ बाल कहानियों का संग्रह बहुचर्चित। बाल कहानियों की पच्चीस से अधिक पुस्तकें मराठी में अनुदित होकर प्रकाशित। उत्तराखण्ड में कहानी ‘फूलों वाले बाबा’ कक्षा पाँच की पाठ्य पुस्तक ‘बुराँश’ में शामिल। दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में हिन्दी की सहायक पुस्तक में नाटक ‘मस्ती की पाठशाला’ शामिल। हिमाचल सरकार के प्रेरणा कार्यक्रम के तहत बुनियादी स्कूलों में 13 कहानियां शामिल। उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में शिक्षक हैं।  सम्पर्क: भितांई, पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल. 246001.उत्तराखण्ड. मोबाइलः09412158688. 

30/10/2016

child literature बाल साहित्य बनाम बचकाना साहित्य

बाल साहित्य बनाम बचकाना साहित्य

-मनोहर चमोली ‘मनु’

आज भी साहित्यकारों में अधिकतर वे हैं जो यह मानते हैं कि बच्चों को सच्चा सामाजिक बनाने वाला साहित्य ही उत्तम साहित्य कहा जा सकता है। जो उन्हें सद्मार्ग की ओर ले जाए, वही बाल साहित्य सार्थक है, श्रेष्ठ है।

बतौर पाठक बच्चे ही क्यों, बड़े भी जब साहित्य का आस्वाद ले रहे हों, तो पढ़ने से पहले और पढ़ लेने के बाद खुद में बदलाव महसूस नहीं करते हैं तो वह साहित्य बेदम है। साहित्य में आनंद की अनुभूति पहला तत्व है। जब आनंद ही नहीं आएगा तो कोई पढ़ेगा ही कैसे। जब पढ़ेगा ही नहीं तो खुद में बदलाव क्या लाएगा, सोचेगा तक नहीं। 


बाल साहित्य में बच्चे को सशर्त, सीधे, तीव्र उपेदश और सीख के जरिए सामाजिक बनाने वाला साहित्य पढ़ा भी जाता होगा, मुझे संदेह है। किसी तरह पढ़वा भी लिया जाता होगा तो बाल पाठक खुद में बदलाव लाते होंगे, असंभव सा प्रतीत होता है। 

मेरी समझ तो फिलवक़्त यही बनी है कि कि मनोरंजन के कई साधन आज बच्चों के आस-पास पसरे हुए हैं। ऐसे में बाल साहित्य का मात्र मकसद मनोरंजन करना हो, यह भी अजीब सा लगता है। 

एक तो बाल साहित्य में बच्चों का नज़रिया हो। बच्चों की दुनिया हो। बच्चों की आवाज़ें गूंजती हों। अक्सर कहा जाता रहा है कि बाल साहित्य बच्चों के स्तर का हो। ये स्तर क्या बला है? दो साल से लेकर बारह साल के बच्चों के स्तर पर तो पल-प्रति-पल बदलाव आता रहता है! क्या हर वय वर्ग के बच्चे के लिए एक पत्रिका हो? या एक पत्रिका में हर स्तर के बच्चे के लिए पठन सामग्री हो? यह संभव है? या कई वय वर्ग को ध्यान में रखते हुए कई तरह की भिन्न-भिन्न बाल पत्रिकाएं हो?

बाल साहित्य अलग से होना ही नहीं चाहिए। यह भी अक्सर कहा जाता है। इसका अर्थ क्या यह हुआ कि बच्चे हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, विज्ञान प्रगति  (यहां इनका उल्लेख मात्र साहित्य सामग्री छपने से है ) समकालीन भारतीय साहित्य आदि से ही साहित्य का आस्वाद लें? 

बहरहाल बच्चों के लिए लिखा जाने वाला साहित्य उन्हें बालमन से आगे भी ले जाए। जो दुनिया उसके आस-पास है, उससे भी परिचय कराए। उस दुनिया से भी, जो आने वाले समय में उसकी दुनिया होने वाली है। बच्चों को साहित्य के नाम पर सामान्य ज्ञान परोसने से काम नहीं चलेगा। सूचनात्मक जानकारी देने से भी काम नहीं चलेगा। कपोल कल्पनाओं से भरा साहित्य पहले बहुत लिखा जा चुका है। पीसे हुए आटे को पीसना भी बंद करना होगा। 

आदर्शवाद से भरी रचनाएं बहुत हुईं। बच्चों को सच्चा नागरिक बनने, सामाजिक बनने, आज्ञाकारी बनने की सीधी अपील करती दर्जनों किताबें पुस्तकालयों और स्कूलों की शोभा बढ़ा रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले सत्तर सालों से बच्चों को जो साहित्य परोसा गया, उसमें उन्हें राष्ट्रभक्त बनने के जोर और प्रयासों से ही कई जाने-माने साहित्यकार बाल साहित्य को बचकाना साहित्य कहते हैं? ...

-मनोहर चमोली ‘मनु’, भितांई, पोस्ट-23, पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड।
 मोबाइल-09412158688 और 7579111144

23/10/2016

बाल साहित्य बच्चों को समझना होगा child literature

समझ रहा है साहित्य बालमन को !


-मनोहर चमोली ‘मनु’


एक अध्यापक मित्र हैं। वे बरसों से कक्षा छह से बारह के छात्रों को पढ़ा रहे हैं। हाल ही में उन्होंने फेसबुक में एक वक्तव्य दिया। वक्तव्य के साथ उस बालक को फोटों भी दी गई थी। यहां उस बालक का नाम और पहचान छिपाने के लिए बच्चे, उनके पिता और गांव का नाम बदल दिया गया है, बाकी एक-एक शब्द ज्यों का त्यों मंतव्य समझने के लिए दिया जा रहा है-
‘ये है दुरवा के मोस्ट वांटेड हीरो......... रायसन पुत्र श्री दयासन। बड़ी मुश्किल से मनाकर स्कूल लाया गया है। एक महीने की मेहनत के बाद मिला है ये जब संपर्क करने हम तीन शिक्षक इसके घर गये तब इसे गिरफ्तार कर सके। ये कक्षा 6 का हमारा विद्यार्थी बन गया है। अभी एक और गिरफ्त से बाहर है। नरेन्द्र पुत्र श्री केवल। अब उस पर फोकस किया जाएगा। वह कक्षा 9 का गत वर्ष का ड्राॅप आउट है। ये तो दाऊद के भी दादा हो गए।’
मैंने मित्र के इस कथन को औरों की तरह पढ़ा। मित्रों ने बधाई पर बधाई दी हुई थी। लेकिन मैंने बधाई देने से पहले एतराज जताया। अध्यापक जी मुझे गिरफ्तार ओर गिरफ्त का अर्थ समझाने लगे। मैंने कहा कि बच्चे के प्रति आपके प्रयास अतुलनीय हैं। लेकिन आप जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वे बच्चे को आपसे और भी दूर कर रहा है। वह चोर नहीं है। आप ने ‘मोस्ट वांटेड‘, ‘दाऊद‘ ‘गिरफ्तार‘ और ‘गिरफ्त‘ जैसे शब्दों का प्रयोग किया है। इनका प्रयोग किए बिना भी आप अपने प्रयासों को बेहद सरलता से जाहिर कर सकते थे। 
बहस चल पड़ी। मैंने शालीनता से जवाब दिया। बाद में वे मान गए और उन्होंने अपने वक्तव्य को बदल दिया।

अब उनका वक्तव्य यह था- ‘ये है दुरवा का मोस्ट वांटेड हीरो......... रायसन पुत्र श्री दयासन। बड़ी मुश्किल से मनाकर स्कूल लाया गया है। एक महीने की मेहनत के बाद मिला है ये जब संपर्क करने हम तीन शिक्षक इसके घर गये तब इसे स्कूल ला सके। ये कक्षा 6 का हमारा विद्यार्थी बन गया है। अभी एक और स्कूल से बाहर है। नरेन्द्र पुत्र श्री केवल। अब उस पर फोकस किया जाएगा। वह कक्षा 9 का गत वर्ष का ड्राॅप आउट है।’

अध्यापक मित्र ने फिर भी मोस्ट वांटेड का मोह नहीं छोड़ा। मैं चाहता तो कहता कि मोस्ट वांटेड का उपयोग देश-काल-परिस्थिति और संदर्भ के साथ फिर भी अखर रहा है। मैं चाहता तो उन्हें बताता कि जल,पानी,नीर और अश्रु का उपयोग करते समय हम सन्दर्भ और परिस्थिति के हिसाब से ही इनका उपयोग करते हैं। लेकिन यहां संदर्भ भाषा का नहीं था न ही व्याकरण का। यहां तो बालमन को समझने और बालक की अस्मिता का सवाल था। मैं तो बस इतना चाहता था कि हम बड़ों की दुनिया में जब भी बच्चों की बातें हों तो हम बच्चों के लिहाज़ से भी सोचे। हम यह जरूर समझने का प्रयास करें कि हमें बच्चों में जो शैतान नज़र आता है वह शैतान नहीं है। उस उम्र के स्तर पर वही उसका व्यक्तित्व है। अमूमन हर बच्चा अपनी उम्र और अनुभव के हिसाब से संपूर्ण मनुष्य है। उम्र के हिसाब से जैसे हम खुद को पूर्ण मानते हैं उसी स्तर पर बच्चे अपनी समझ और अनुभव से पूर्ण होते हैं। बशर्ते पूर्ण को सम्पूर्ण होते-होते तो हम बड़ों की उम्र ही बीत जाती है।

बाल साहित्य की भी यही स्थिति है। हम जो बड़े अपना बचपन याद करते हुए जो रच रहे हैं वो बाल साहित्य है ही नहीं। वह तो हम बड़ों का वह साहित्य है जिसे हम बीस-तीस साल बाद याद कर एक काल्पनिक दुनिया के लिए रच रहे हैं। कोई भी सजग पाठक इन दिनों छप रहे बाल साहित्य को इस लिहाज से पढ़ेगा तो माथा पीट लेगा। कारण? एक नहीं कई हैं। एक तो आज भी छप रहे अधिकतर बाल साहित्य में बच्चों की आवाजें ही नहीं हैं। आज के बच्चों की दुनिया भी उसमें शामिल नहीं हैं। हर दूसरी रचना बालमन का अपमान करती नजर आती है। बच्चों को बोदा समझना, बेवकूफ समझना, लल्लू समझना आज भी बदस्तूर चला आ रहा है।

ऐसा नहीं लगता कि बाल साहित्यकार बच्चों की दुनिया से वाकिफ हैं। बड़ों का बाल साहित्य पढ़कर लगता ही नहीं कि ये बच्चों के साथ दो पल भी बिताते हैं। अन्यथा उनके साहित्य में आदर्शवाद पढ़ने को नहीं मिलता। इक्कीसवीं सदी के बाल साहित्य की मुश्किलें और भी बड़ी हैं। सूचना और ज्ञान ठूंसने वाली सामग्री को भी बाल साहित्य माना जा रहा है। 

सूचनात्मक जानकारी देने के लिए कविताओं और कहानियों की मोटी-मोटी किताबें छप रही हैं। सब पढ़ेंगे पर बच्चे नहीं पढ़ेंगे। कारण ! बच्चों के मन का, बच्चों के मतलब का ही तो उसमें नहीं हैं। आदर्श की घुट्टी भी इतनी कड़वी है कि बच्चा जो जिद्दी, अड़ियल, चोर, शैतान, आलसी, झूठा, हिंसक बताया जा रहा है, एक-दो पंक्ति में दी गई छोटी सी घटना से वह सुधर जाता है। अबोध समझा जाने वाला दूसरे ही पल बदलकर होशियार हो जाता है। एक ही घर में दो भाई हैं। एक आलसी है दूसरा समझदार। बहन बुद्धिमान है और भाई बेवकूफ। फिर अचानक बेवकूफ भाई में बदलाव आ जाता है ओर वह बहन की तरह बुद्धिमान हो जाता है। बाल साहित्यकार समझते हैं कि बच्चों के लिए बेसिर-पैर का कुछ भी लिख दो, चलेगा। कल्पना के नाम पर सब कुछ संभव है। बाल साहित्य में असंभव सी बात दो पल में संभव हो जाती है।


बाल साहित्य के जानकार बताते हैं कि हर बच्चा अपने आप में अनोखा है। अदुभुत है। ऊर्जा से भरपूर है। खोजी है। जिज्ञासु है। किसी न किसी नज़रिए से उसमें मेधा है। वह अपने अनुभव से इस दुनिया को देखना चाहता है। समझना चाहता है। फिर ऐसे में क्या उपेदशात्मक, नैतिकता स्थापित करती रचनाएं से आदर्श नागरिकता का पाठ पढ़ाने की मशक्कत बाल साहित्य से ही क्यों? यदि ऐसा है तो क्यों स्वस्थ आचरण की सभ्यता अभी तक स्थापित नहीं हो सकी है। 

ऐसी स्थिति में बच्चे साहित्य से रिश्ता कैसे बना सकेंगे। अधिकतर शिक्षक भी और अभिभावकों का आज भी मानना है कि कक्षाओं में विषय की जो एक-एक किताबें हैं, वे ही बच्चे पढ़ ले गनीमत है। पढ़ने का रिवाज़ न स्कूलों में है न घर में। फिर पढ़ने के लिए जो सामग्री है भी वो बच्चों के स्तर पर ही बचकाना है। कहीं ऐसा तो नहीं कि बाल साहित्यकार यही समझते हैं कि बाल साहित्य यानि बचकाना साहित्य !


फिर वहीं लौटते हैं। एक अध्यापक जो हर साल, हर बार नए छात्रों के संपर्क में आता है। सालों शिक्षण करता है। लिखता है। पढ़ता है। छात्रों को आखर ज्ञान देता है। सीख-समझ और ज्ञान का विस्तार करता है। उनकी सोच और लहज़े पर मेरी तरह आप भी हैरान होते होंगे। यही हाल अधिकतर बाल साहित्यकारों का है। वे आज भी चालीस के दशक की सोच,परिस्थिति और वातावरण से अपने लेखन को मुक्त नहीं कर पा रहे हैं। कुछ ही बाल साहित्यकार हैं जो बच्चों में विज्ञान दृष्टि देने के लिए कलम उठाए हुए हैं। कुछ ही हैं जो बच्चों को उनकी दुनिया के आस-पास की रचनाएं उपलब्ध करा पा रहे हैं। गिनती के ही साहित्यकार हैं जो बच्चों को वह साहित्य उपलब्ध करा पा रहे हैं जिसमें उनकी आवाजें हैं। जिसमें बच्चों की भावनाएं हैं। ऐसा साहित्य बहुत कम है जो बच्चों को आगे की दुनिया की समझ को समझने की ताकत दे रहा है। ऐसा साहित्य बहुत ही कम हैं जो बच्चों में तर्क,विचार करने की ताकत देता है।

ठीक उलट आज भी बदस्तूर बेसिर-पैर की परी कथाएं, भूत-प्रेत-टोना-टोटका, अंधविश्वास, रूढ़ियों में जकड़े समाज की तसवीर पर आधारित बाल साहित्य ही देखने-पढ़ने को मिलता है। आदर्श अपनाने का आग्रह इतना तीव्र हैं कि बच्चे ऐसा बाल साहित्य क्यों पढ़ें? ऐसा साहित्य जिसमें उन्हें सीख, संदेश, आदेश, निर्देश देने पर ही जोर दिया जाता है। वीर बालक, सच्चा राष्ट्रभक्त बनने की पुरजोर वकालत करता साहित्य विपुल है। मजे़दार बात यह है कि अरबों रुपए कई अकादमियों पर हर साल खर्च हो रहे हैं। लेकिन एक राष्ट्रीय स्तर की बाल साहित्य अकादमी नहीं हैं। इससे बड़ी विडम्बना यह है कि बाल साहित्य के उन्ननयन के लिए अखिल भारतीय स्तर के सम्मान जिन्हें मिले हैं उनमें अधिकतर वे हैं जिन्हें बाल मनोविज्ञान और बालमन की समझ ही नहीं है। ऐसे सैकड़ों हैं जिनकी बाल साहित्य की एक नहीं, दो नहीं बीस-बीस पुस्तकें प्रकाशित हैं। लेकिन उनकी सभी रचनाओं को पढ़ते हुए बालमन की समझ रखने वाला कोई भी वयस्क ही अपना माथा पीट ले। फिर बालमन कैसे इनकी मोटी-मोटी पोथियां-ग्रन्थ पढ़ने को तैयार होगा !

कुछ ही बाल साहित्यकार हैं जो यह मानते और जानते हैं कि बच्चा भी अपनी उम्र के हिसाब से अपने अनुभव के स्तर पर हम बड़ों जैसा ही व्यक्तित्व है। हम बड़ों जैसा ही उसका स्तर है। वे ही बालमन को भाने वाली रचना लिख पाते हैं। इन दिनों बाल साहित्य की कई पत्रिकाएं बाजार में हैं। कई पत्र है, जो बाल साहित्य यदा-कदा प्रकाशित कर रहे हैं। इन सभी का औसत अनुपात निकाले तो मात्र तीन से दस फीसद सामग्री है जो बालमन के अनुरूप प्रकाश में आती है। ‘चकमक’ मासिक पत्रिका ही उम्मीद की एक किरण है, जो आस जगाती है कि भारत में, भारत के बच्चों के लिए कुछ मन-मस्तिष्क हैं जो सकारात्मकता के साथ उत्कृष्ट बाल साहित्य उपलब्ध करा रही है। रूम टू रीड, प्रथम बुक्स, एनसीईआरटी की बरखा सीरिज, तूलिका, भारत ज्ञान विज्ञान समिति ने कुछ किताबें पठनीय प्रकाशित की हैं।

भारत में बच्चे दोहरी मार झेल रहे हैं। अव्वल तो उनके मन को समझने वाले अधिकतर साहित्यकार ही नहीं हैं। दूसरा जो कुछ रहा-बचा छप रहा है तो वह बाजारवाद की चपेट में है। यानि यह बाजार तय कर रहा है कि कैसी सामग्री कैसे विज्ञापन और कैसी रचनाएं प्रकाशित हों। भारत में खासकर हिन्दी बाल साहित्य की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही है। अभी भारत के हिंदी भाषी राज्य अपने बच्चों को नागरिक के तौर पर देखने का मन ही नहीं पाए हैं। जब मन ही नहीं है तो उनके बारे में सोच कौन रहा है। जब उनके बारे में सोचा ही नहीं जा रहा है तो बालमन की नीतियां कैसे बनेंगी। जब कोई नीति ही नहीं हैं तो बच्चे कैसे साहित्य का आस्वाद ले रहे होंगे? 
क्या आप सोच पा रहे हैं?
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regional reporter,October 2016

-मनोहर चमोली ‘मनु’, पोस्ट बाॅक्स-23 पौड़ी 246001

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