31/03/2012

बाल कहानी - धूर्त की दोस्ती

धूर्त की दोस्ती

-मनोहर चमोली ‘मनु’

    बहुत पुरानी बात है। एक मुर्गा था। साँप उसका दोस्त था। मुर्गा समय का पाबंद था। सुबह के चार जैसे ही बजते। मुर्गा बांग दे देता। वो बांग देना कभी नहीं भूलता। गर्मी हो या बरसात। कड़ाके की सर्दी में भी मुर्गा चार बजते ही बांग दे देता। पशु-पक्षी ही नहीं मनुष्य भी मुर्गे की बांग सुनकर अनुमान लगा लेते कि सुबह के चार बज गए हैं। मुर्गे की बांग सुनकर ही सभी अपनी दिनचर्या शुरू करते।
    वहीं एक साँप बड़ा ही आलसी था। दिन भर वो अपने बिल में सोया रहता। भूख लगने पर ही वो उठता। शिकार करने में भी उसे आलस आता। कई बार तो वो मुर्गे के भोजन में से ही अपनी भूख मिटाता। मुर्गा साँप को समझाता। मगर साँप उसकी बात एक कान से सुनता और दूसरे कान से निकाल देता। मुर्गे की साँप से दोस्ती का सभी को पता था।
एक दिन तोते ने मुर्गे से कहा,-‘‘मुर्गे भाई। बुरा मत मानना। तुम बहुत ही भोले हो। बुजुर्गो का कहना है कि मित्रता अपने कुल और बिरादरी में ही फलती-फूलती है। साँप का और तुम्हारा कोई मेल है ही नहीं। डसना साँप की आदत में शामिल होता है। वो तुम्हें भी नुकसान पँहुचा सकता है।’’
मुर्गे को तोते की बात बुरी लगी। उसने पलट कर जवाब दिया,-‘‘तुम्हे हमारी दोस्ती भा नहीं रही होगी। तुम्हें क्या। मैं चाहे जो करूँ।’ यह सुनकर तोता चुप हो गया।
    समय गुजरता गया। सर्दी के दिन थे। मुर्गा एक-एक दाना चुगकर पेड़ की कोटर में जमा कर रहा था। ताकि बारिश के दिनों में खाने का गुजारा हो सके। शाम को जब मुर्गा चोंच में एक और दाना लेकर आया तो कोटर में साँप मुर्गे का जमा भोजन हड़प चुका था। मुर्गे को गुस्सा आ गया। वह साँप पर भड़क उठा। उसने साँप से कहा,-‘‘तुम मक्कार हो। आलसी कहीं के। ज़रा सी शर्म होती तो दिन भर शिकार करते और रात को आराम से सोते। मगर तुम्हें तो नींद प्यारी है। मेरे भोजन पर तुम्हारी हमेशा नजर रहती है। धूर्त कहीं के। दोस्ती के नाम पर तुम तो कलंक हो।’’
    साँप चुप रहा। मगर उसने ठान लिया कि इस अपमान का बदला एक दिन जरूर लेना है। उसने मन ही मन में संकल्प लेते हुए कहा,-‘‘मुर्गे। बहुत फड़फड़ाता है। तुझे ऐसा सबक सिखाऊंगा,कि तू ज़िंदगी भर याद रखेगा।’’ अब साँप मुर्गे को सबक सिखाने की युक्ति सोचने लगा। उसने मुर्गे के साथ दोस्ती का व्यवहार नहीं छोड़ा। बल्कि वो दिखावे के लिए मुर्गे के लिए भी शिकार पकड़ कर लाता। दोनों एक ही थाली में खाते। मुर्गा मन ही मन साँप की दोस्ती पर नाज़ करता। साँप जान चुका था कि मुर्गे को भोजन में मक्का के दाने बहुत पसंद हैं। एक दिन की बात है। दोनोें पेड़ की कोटर में बैठे सुस्ता रहे थे। साँप ने मुर्गे से कहा,-‘‘अगर ये कोटर मक्का के दानों से भर जाए तो?’’
    यह सुनकर मुर्गा उछल पड़ा। साँप ने आगे कहा,-‘‘हाँ। मैं सच कह रहा हूँ। इस पेड़ के नीचे चूहों का महल है। कल सुबह वो किसान के खेत में हमला बोल रहे हैं। तुम तो जानते हो। किसानों की मक्का की फसल पक चुकी है। चूहे मक्का की फसल कटने से पहले ही अपना भंडार भरने वाले हैं। कल सुबह जैसे ही तुम बांग दोगे, चूहों का झूण्ड किसानों के खेत से मक्का के दानों से अपना भंडार भरना शुरू कर देंगे। सुबह होने से पहले वो जितना अनाज अपने भंडार में भर लेंगे,उनके कई महीनों का प्रबंध तो हो ही जाएगा। अगर तुम रात के बारह बजे ही बांग दे दोगे,तो उन्हें सुबह तक काफी समय मिल जाएगा। जब वो अपना भंडार भर लेंगे। तब मैं उन पर हमला बोल दूंगा। मेरे डर से चूहे अपना भंडार क्या महल ही छोड़ कर भाग जांएगे। बस फिर क्या। उनके भंडार में हमारा कब्जा हो जाएगा।’’
    मुर्गा साँप की बातों में आ गया। वो बोला,-‘‘बस इतनी सी बात है। तुम कहो तो मैं रात के नौ बजे ही बांग दे देता हूँ।’’
    ‘अरे नहीं। इतनी भी जल्दी क्या है। जल्दी का काम शैतान का होता है। चूहे थके हुए होंगे। उन्हें कुछ घंटे आराम तो करने दो। तुम रात के बारह बजे ही जोर-जोर से बांग देना। अब तुम सो जाओ। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी ही नींद न खुले और हमारी योजना धरी की धरी रह जाए।’’
यह कह कर साँप सोने का नाटक करने लगा। उधर मुर्गे की आँख में नींद कहां थी। वो तो मक्का के दानों के भंडार की कल्पना में डूब चुका था।
    रात के बारह बज चुके थे। मुर्गे ने बांग देनी शुरू कर दी। आस-पास के पशु-पक्षियों ने सोचा कि सुबह हो गई। उधर मनुष्यों ने भी सोचा कि सुबह के चार बज चुके हैं। सभी अपनी दिनचर्या के लिए उठे। सभी ने अपने घरों से बाहर आकर देखा तो आसमान में तारे चमक रहे थे। मुर्गा अभी भी बांग दे रहा था। पशु-पक्षियों सहित मनुष्य भी बाहर अँध्ेारा देखकर समझ गए कि मुर्गे ने चार बजे की जगह रात के अंध्ेारे में ही बांग दे दी है। मुर्गे ने देखा कि एक भी चूहा बिल से बाहर नहीं आया। उसने साँप से कहा,-‘‘मुझे तो कोई चूहा नजर नहीं आ रहा है। चूहों को क्या मेरी बांग नहीं सुनाई दे रही होगी?’’
 साँप ने जवाब दिया,-‘‘तुम ठीक कहते हो। चूहे थके होंगे। तुम ऐसा करो। बीच चैराहे में जाकर जोर-जोर से बांग दो।’’
    बेचारा मुर्गा चैराहे पर जाकर बांग देने लगा। एक बार जागकर मनुष्य दोबारा सो चुके थे। मुर्गे की बेवक्त की बांग सुनकर मनुष्य लाठी लेकर चैराहे पर जमा हो गए। मुर्गा आँख मूँदे बांग देने में मस्त था। मनुष्यों ने मुर्गे को घेर कर लाठियों से पीटना शुरू कर दिया। बेचारा मुर्गा जान बचाकर भागा। किसी ने कहा,-‘‘ये मुर्गा पागल हो गया है। इसने रात को ही बांग देना शुरू कर दिया है। इसके भरोसे रहना बेकार है। अब समय देखने के लिए हमें कुछ और तरीका निकालना होगा।’’
    इस तरह मक्कार साँप ने अपने अपमान का बदला ले लिया। ध्ूार्त साँप से दोस्ती कर मुर्गे की बांग देने की साख भी गई। कहते हैं कि तभी मनुष्य ने समय देखने के लिए घड़ी का आविष्कार किया।

-मनोहर चमोली ‘मनु’. पोस्ट बाॅक्स-23,भितांई,पौड़ी,पौड़ी गढ़वाल। 246001.मोबाइल-09412158688.

29/03/2012

नंदन-अप्रैल, 2012. बाल कहानी..‘लोपू का तहखाना’..मनोहर चमोली ‘मनु’.

लोपू का तहखाना

-मनोहर चमोली ‘मनु’

    लोपू चूहा लोभी था। उसका लोभ बढ़ता ही जा रहा था। सब उसे सनकी कहते। एक दिन की बात है। एक गिलहरी ने पूछा-‘‘लोपू। कहाँ रहते हो? आजकल बिल से बाहर भी नहीं निकलते। बिल में तुम्हारा दम नहीं घुटता?’’ लोपू चुप रहा। बेचारी गिलहरी चुपचाप पेड़ पर चढ़ गई। लोपू मन ही मन मुस्कराया। उसने अपने आप से कहा-‘‘इन बेवकूफों को क्यों पता चले कि मैंने अपने बिल में बड़ा तहखाना बना डाला है। इतना बड़ा कि इस जंगल के सारे चूहे मेरे बिल में आसानी से रह सकते हैं। मैं आपातकाल के लिए भोजन जमा कर रहा हूँ। ये मूर्ख तो सारा समय खेल-मस्ती में बिता रहे हैं। आने वाले कल की चिंता तो कोई समझदार ही करता है।’’
    लोपू चूहे को लगता कि कभी भी खाने-पीने का संकट आ सकता है। दीवाली आई। जंगल में उत्साह था। सबने दीवाली धूम-धाम से मनाई। मगर लोपू को अपने बिल के तहखाने की ही चिंता थी। उसने सर्दियों की धूप का मज़ा भी नहीं लिया। एक दिन खीरू खरगोश ने लोपू से कहा-‘‘आजकल धूप सेकने का मज़ा है। कुछ देर तो धूप ताप लो।’’ लोपू टाल गया।
क्रिसमस के बाद नया वर्ष का पहला दिन भी आ गया। जंगलवासियों ने खूब मस्ती की। एक-दूसरे को बधाई दी। मगर लोपू चूहा बिल में ही दुबका रहा। उसका मन भी किया कि वो जमा किए गए भंडार से कुछ अच्छी चीज़ खा ले। मगर दूसरे ही पल उसे लगा कि ऐसे तो उसका जमा किया हुआ भोजन एक दिन खत्म ही हो जाएगा। लोपू अक्सर भूखा ही रहता। जब बहुत भूख लगती तो आधा भोजन ही करता। उसने अपने बिल में खाने-पीने का काफी सामान जोड़ लिया था। कई तरह के फल, बीज, धन, गेंहू, मक्का के दानों से उसका भंडार भरता ही जा रहा था।
    लोपू चूहा सुबह उठ जाता और देर रात तक खाने-पीने की चीज़े इकट्ठा करता रहता। सर्दियाँ बीत र्गईं। होली आई। सबने होली का भरपूर मज़ा लिया। मगर लोपू काम पर ही जुटा रहा। उसेे लगता कि उसका भंडार अभी भरा नहीं है। फिर बसंत का मौसम भी आया। चारों ओर हरियाली ही हरियाली छा गई थीं। सबने बसंत के नज़ारों का आनंद लिया। मगर लोपू ने तो प्रकृति के मनोरम दृश्यों की ओर आँखें मूंद ली थी। सब एक ही बात कहते-‘‘अरे लोपू। संतोष रखो। हर वक्त खाने-पीने की चिंता में लगे रहते हो। ज़रा देर हमारे साथ तो बैठो।’’
    लोपू भी एक ही जवाब देता-‘‘तुम लोग मेरे सुख से जलते हो। तुम्हें आने वाले कल की चिंता नहीं है। तुम लोग तो सिर्फ आज पर जीते हो। अरे! कल की भी तो चिंता करो।’’
जंगलवासी सुख-दुख में एक-दूसरे के काम आते। एक-दूसरे के घर जाते। मगर लोपू बिल में जमा किए भंडार की चैकीदारी करता। इस कारण वो कहीं जा भी नहीं पाता। सब उसे घमंडी कहने लगे। लोपू का विशाल तहखाना लगभग भर ही चुका था।
    एक दिन की बात है। लोपू ने अपने आप से कहा-‘‘मेरा बिल अनाज, फल और बीजों से भरने ही वाला है। आज शाम तक मैं इसे भरकर ही दम लूंगा।’’ लोपू फिर काम पर जुट गया। शाम तक उसने जी-तोड़ मेहनत की। लोपू थक कर चूर हो गया। लोभ के कारण उसने कुछ खाया भी नहीं। थकान के कारण उसे नींद आ गई। आषाढ़ का महीना था। अचानक आसमान में बादल छा गए। कुछ ही देर में घनघोर बारिश हुई। मूसलाधर बारिश से लोपू के बिल में पानी भर गया। सूखे बीज और अनाज के दानें पानी में तैरने लगे। लोपू बेखबर सोता ही रह गया। बारिश के कारण लोपू का तहखाना ढह गया। लोपू बड़ी मुश्किल से बच पाया। अगली सुबह लोपू के तहखाने का रहस्य जंगलवासियों का पता चला। लोपू के जमा किये हुए फल, तरह-तरह के बीज और अनाज के दानें बहकर जंगल में फैल गए थे। जंगलवासियों ने भरपेट भोजन किया। लोपू चुपचाप यह देख रहा था और सोच रहा था ज्यादा लोभ से कोई फायदा नहीं।


-मनोहर चमोली ‘मनु’, पो0बाॅ0-23, भितांई, पौड़ी ;गढ़वाल. उत्तराखंड ़पिन-246001 ़मो0-9412158688.

28/03/2012

बाल कविता- 'हवा आने दे' ... [-मनोहर चमोली ‘मनु’]



लूसी बोली म्याऊं म्याऊं
चूंचूं  चूहे    तुझको खाऊं
मैं   हूं   मौसी    शेर   की
मुझको  चिंता  काहे  की
पहले    चूहा      घबराया
बिल  में जाकर  इतराया
चूंचूं     बोला      रहने   दे
अंदर     हवा     आने   दे।

-मनोहर चमोली 'मनु' manuchamoli@gmail.com

बाल कहानी - 'कमाल चूहे का.'

कमाल चूहे का
 
 -मनोहर चमोली ‘मनु’
    
एक गांव था। गांव में राधा रहती थी। राधा की एक बच्ची थी। बच्ची छोटी थी। उसका नाम नेहा था। जब नेहा को भूख लगती, तो वह रोने लगती। राध उसे दूध दे देती। नेहा चुप हो जाती। गांव में बहुत काम होता है। महिलाएं घर के अलावा खेत में भी काम करती हैं। काम करते-करते सुबह से शाम हो जाती है। शाम के बाद रात आ जाती है, पर काम है कि कभी पूरा नहीं निपट पाता। रात कब ढल जाती है पता ही नहीं चलता।
    एक दिन की बात है। राधा घर की सफाई में लग गई। उसने नेहा के लिए दूध गरम किया। दूध गिलास में भरा। तभी नेहा सो गई। राधा ने नेहा के सिरहाने पर दूध से भरा गिलास रख दिया। नेहा जब भी जागती है तो उठ कर खुद ही दूध पी लेती है। राधा अपने काम में लग गई। तभी वहां एक चूहा आ गया। उसने गिलास में रखा हुआ दूध पी लिया। नेहा जाग गई। उसने खाली गिलास देखा। नेहा रोने लगी। राधा दौड़कर आई। उसने भी गिलास देखा। खाली गिलास देखकर राधा उदास हो गई।
    राधा चिल्लाई- ‘‘मेरी बच्ची के हिस्से का दूध कौन पी गया? अब और दूध कहां से लाऊँ। बड़ी मुश्किल से तो एक गिलास दूध जुटाया था।’’ चूहा सब सुन रहा था। वह भी उदास हो गया। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया। उसने अपने आप से कहा-‘‘मैंने नेहा के हिस्से का दूध पीकर गलती की है। कुछ भी हो। मुझे एक गिलास दूध कहीं से लाना ही होगा।’’
    चूहा ग्वाले के पास गया। ग्वाले से बोला-‘‘मुझे थोड़ा सा दूध चाहिए। एक बच्ची भूखी है।’’ ग्वाले ने कहा-‘‘मेरे पास दूध कहां? मैं तो गाय से दूध लेता हूं।’’ चूहा गाय के पास गया। चूहे ने गाय से दूध मांगा। गाय ने कहा-‘‘कई दिनों से मैंने हरी घास नहीं खायी। दूध कहां से लाऊँ। हरी घास होती तो मैं दूध देती।’’
     चूहा हरी घास के पास गया। उसने हरी घास से बात की। हरी घास ने कहा,‘‘पहले मैं पूरे मैदान में उगती थी। पानी नहीं है। मैं खुद पीली पड़ गई हूं। नदी के पानी से मैं हरी-भरी रहती थी।’
    चूहा नदी के पास गया। नदी को सारा हाल बताया। नदी ने कहा, ‘‘मैं खुद ही सूखती जा रही हूं। हिमालय में जमी बर्फ से मैं भरी रहती थी। पता नहीं क्यों हिमालय मुझसे रूठ गया है।’’ 
    चूहा हिमालय से जाकर मिला। उसने हिमालय को सारा किस्सा सुनाया। हिमालय बोला,‘अब बादल ही नहीं बरसते। जब बादल नहीं तो बर्फ नहीं। पहले मैं बारह महींने बर्फ से ढका रहता था। अब तो बर्फ ही नहीं पड़ती। पता नहीं बादल क्यों नाराज है।’’
    चूहा बादल के पास गया। बादल ने चूहे की सारी बात सुनी। वह बोला,‘‘मैं भी क्या कर सकता हूं। जहां जंगल ही नहीं बचा, वहां मैं कैसे बरस सकता हूं? इंसानों ने जंगल काट-काट कर इमारतंे बना दी हैं। इंसानों से कहो कि वे पेड़ लगाएं।’
    बेचारा चूहा सोच में पड़ गया। उसने बादल से कहा,‘‘इंसान तो बहुत खतरनाक होते हैं। मुझे इंसानों से डर लगता है।’ बादल बोला,‘इंसान तो जल, थल और नभ को नुकसान पंहुचा रहे हंै। अब तो बच्चे ही कुछ कर सकते हैं। तुम छोटे-छोटे बच्चों से दोस्ती करो। नन्हें-मुन्ने बच्चे ही पेड़ लगायेंगे। वे पेड़ों की देखभाल भी करेंगे।’’
     चूहे ने बच्चों से दोस्ती कर ली। नन्हें-मुन्ने बच्चों ने खूब सारे पेड़ लगाए। पेड़ों की देखभाल की। पेड़ हरे-भरे हो गए। आसमान में बादलों का जमघट लग गया। बादलों ने हिमालय में जम कर बर्फबारी की। हिमालय बर्फ से ढक गया। नदी पानी से भर गईं। खेत-खलिहान और मैदानों को पानी मिल गया।
    मैदानों में हरियाली छा गईं। गाय को हरी घास खाने को मिलने लगी। गाय दूध देने लगीं। ग्वाले दूध बेचने लगे। घर-घर में दूध पंहुचने लगा। नन्हें-मुन्नों का दूध मिलने लगा। चूहा दौड़ा और राधा के घर जा पहुंुचा। नेहा ने दोनो हाथ से गिलास पकड़ा हुआ था। वह दूध पी रही थी। राधा अपने काम में लगी हुई थी। चूहा खुश हो गया। वह नाचने लगा। नेहा भी चूहे को देखकर नाचने लगी।

-मनोहर चमोली ‘मनु’. पोस्ट बाॅक्स-23. भितांई, पौड़ी गढ़वाल. उत्तराखण्ड.

27/03/2012

उत्तराखण्ड युवा और जनान्दोलन

उत्तराखण्ड युवा और जनान्दोलन
-मनोहर चमोली ‘मनु’

    अपने हिस्से को लड़ कर, छिन कर, भिड़ कर या कैसे भी उसे हासिल करने की परिपाटी हर प्रकार की व्यवस्था में एक हिस्सा है। इतिहास गवाह है कि जब कभी भी लोगों के अधिकार छीने गये और तब-तब जनता जागी व जनसंघषों के माध्यम से उसे हासिल किया।
    आजाद भारत की लड़ाई एक लम्बा जनान्दोलन ही था। उत्तराखण्ड राज्य की मांग एक जबरदस्त क्षेत्रीय जनांदोलन था। यही नहीें समय समय पर राज्य में अनेक आन्दोलन हुये। उत्तराखण्ड में सड़क मार्गो के लिये हुये आन्दोलनों से लेकर, विश्वविद्यालय की मांग हेतु आन्दोलन, शराब बन्दी आन्दोलन, टिहरी बांध के खिलाफ आंदोलन कुछ बड़ेे आन्दोलन थे। किसी के चलते सरकार चेती तो कुछ में उसने यह दिखाया कि उसकी जनता के पक्ष में सहानुभति है। दरअसल आन्दोलन किसी बात की ओर ध्यान खींचने या मांग को मनवाने का एक कारगर हथियार है। इनसे काफी कुछ हासिल भी होता है। कोई भी आन्दोलन जनान्दोलन तब बनता है जब उसमें हर वर्ग की भागीदारी होती है।
    किसी भी जनान्दोलन की सफलता उसमें भागीदारी पर निर्भर करती है। जनान्दोलनों में नौजवानों की भूमिका सर्वाेपरि होती है। उत्तराखण्ड आन्दोलन में जब नौजवान कूदे तो सरकार भी हिल गई थी और तभी राज्य भी मिला। राज्य में दूसरे कई आन्दोलनों में जिनमें युवा नहीं जुटे, वे बाद में कंुद पड़ गये और किसी को कुछ न मिला। यदि राज्य का पिछला इतिहास देखें तों पाते हैं 1994 में चले ‘उत्तराखण्ड आंदोलन’ के बाद के राज्य में जनान्दोलनों की वह धार नहीे दिखी। आज भी कई मसले हैं किन्तु आज युवा आन्दोलनों में उस तरह से सामने नहीं आ रहे हैं जैसे कि पहले आते थे। पहले छात्र संघ सामाजिक मांगों के पक्ष में आगे आते थे। लेकिन आज ऐसा नहींे है। आज का युवा आन्दोलनों से दूर हो गया है। चाहे कुछ भी हो। उसे यह लगता है कि यह सड़क पर उतरना उसका काम नहीं है। यही कारण है कि आज अधिकतर आन्दोेलनों में युवा कम ही दिखते हैं और जनांदोलनों के नाम पर आवाज उठाने वालों में प्रौढ़ और बुजुर्ग ही दिखाई पड़ते हैं। यही कारण है कि अधिकतर आंदोलन कुछ समय चलने के बाद असफल हो जाते हैं। 
    आखिर क्यों आज युवा सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक सरोकारों से दूर हो रहा है? क्या युवा मौजूदा व्यवस्था से संतुष्ट है? क्या युवाओं को रोटी, कपड़ा और मकान नहीं चाहिए? क्या युवाओं के पास मूलभूत आवश्यकताएं पूर्ण हैं? कमोबेश उक्त सवालों का एक ही जवाब है-नहीं। फिर ऐसे कौन से कारण है कि युवा जनांदोलनों से ही नहीं रोजमर्रा की आम सामाजिक गतिविधियों से दूर हैं?
    मान लेते हैं कि पूरी आबादी में युवाओं का जो भी प्रतिशत है उसकी आधी आबादी का युवा सूबे से बाहर खट रहा है। लेकिन यह कहना कि सूबे में युवा शक्ति है ही नहीं। तर्क संगत नहीं होगा। आखिर युवा रोजमर्रा के जीवन में क्या कर रहा है? वैसे भी जनांदोलन रोज-ब-रोज तो नहीं होते। फिर भी जनांदोलनों का हाशिए पर जाना सोचनीय तो है ही। हम यह भी नहीं कह सकते कि जनता रामराज में जी रही है। सबको आम सुविधाएं मयस्सर हैं। फिर ऐसा क्या है कि आज कोई भी विषय युवाओं को आंदोलन के लिए उद्धेलित नहीं करता। राज्य के संदर्भ में देखें तो यहां आजीविका कहीं न कहीं खेती के इर्द-गिर्द घूमती है। सुबह से रात होने तक की दिनचर्या में बहुत कुछ ऐसा है जो मानवीय श्रम की अपेक्षा करता है। अन्य काम-धंधे भी ऐसे हैं जिसमें आदमी को खपना पड़ता है।
    भारत की जनगणना 2011 भी यही इंगित करती है कि हर परिवार औसतन चार-पांच सदस्य का है। उसमें भी बहुलता महिलाओं की है। महिलाएं घर-परिवार-चैका-चूल्हा और खेती सहित बाजार तक की भूमिका में मुखिया के रूप में है। अब महिलाएं काम करेंगी या रोज के काम में जिसमें वो केन्द्र में है, छोड़कर सड़कों पे आएगी? यह भी कहना ठीक होगा कि इसका यह अर्थ नहीं कि पहले हम अपने घर को देखेंगे और फिर जनांदोलनों की बात करेंगे। सूबे में समाज के स्वस्थ होने, पड़ोस में चूल्हा जलने की चिंता हर उत्तराखण्डी को है। फिर? युवाओं का जनांदोलनों से दूर होना किस बात का परिचायक है? आज का युवा पहले से अधिक शिक्षित है। उसके पास सूचना तकनीक से लेकर संपर्कों-संवादों को बढ़ाने-कायम रखने के प्रभावी माध्यम हैं। फिर ऐसे कौन से कारण हैं कि युवा शक्ति जनसरोकारों से विमुख हो रही है। सामाजिक मसलों को उठाने, नेतृत्व देने और मशाल उठाने से परहेज कर रही है।
    हालिया संपन्न हुए विधान सभा चुनाव में तो प्रत्याशियों की रणनीति बनाने में युवा ही सबसे आगे थे। ये युवा चुनाव में कैसे सक्रिय हो गए? अचानक ये युवा विधायक प्रत्याशियों के दाएं-बाएं चुनाव अभियान में क्यों थे? अब चुनाव खत्म हो गए हैं। विजय जुलूस भी निकल चुके हैं तो क्या ये युवा भी कहीं और निकल गए हैं। जी नहीं। ये यहीं हैं। हमारे और आपके आस-पास। लेकिन इनकी सक्रियता आम दिनों में निष्क्रिय क्यों हो जाती है? यह सोचनीय है। कारण जो भी हों, लेकिन दम-खम, मस्ती, दिन भर जो भी हो, शाम होते थोड़ा बहुत नशे की चाह और तनाव से दूर रखने वाले साधन संपन्न वर्ग के साथ समय बिताना आज के अधिकतर युवाओं का शगल हो गया है। या यूं कहें मजबूरी। यही कारण है कि आज जिस पीढ़ी को सबसे ज्यादा सामाजिक सरोकारों में व्यस्त होना चाहिए था, जिसे सबसे ज्यादा रचनात्मक होना चाहिए था, वह सबसे अधिक उदासीन हो गई है। यह नहीं कहा जा सकता कि उसे कॅरियर की चिंता नहीं है। उसे पता है कि दो जून की रोटी जुटाने को पापड़ बेलने होंगे। लेकिन वह ‘शार्टकट’ से कुछ बनने की चाह में किसी न किसी का पिछलग्गू बन रहा है। अपना काम निकालने की सोच उसके मन-मस्तिष्क में गहरे से पैठ गई है। वह अराजकों, ठगों और न जानें कितनों के साथ दरबारियों की तरह खड़ा है। आज वह सिद्धान्तविहीन होता चला जा रहा है। राजनीतिक दलों में यूथ बिग्रेडों को देखकर उसे लगता यह है कि वहां कुछ होता होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। दलों में रह कर युवा किसी भी मांग या आन्दोलन या सामाजिक सरोकारों को राजनीति के चश्में से देखने लगता है। अन्यथा स्वार्थ, झूठ, कपट, टालू रवैया, उदासीनता, निराशा और मक्कारी उसके युवा मन में कहां से आई? इन कथित ब्रिगेडों में कुछ समय रहकर आज का युवा जो सीख रहा है वह है- मूल्यों का अवमूल्यन। राजनीति में आदर्शवादिता होती तो कम से कम दलों में युवा दिग्भ्रमित होते। आज के युवाओं ने जिन्दगी के दूसरे मायने गढ़ लिये हैं। उनके लिये ‘बिंदास जिंदगी’ के मायने हैं -‘खाओ-पियो और मस्त रहो। सरोकारों या आन्दोलन से तभी जुड़ो जब उससे कुछ निजी लाभ हो। राज्य आन्दोलन ने यही तो सिखाया। जो मूल आन्दोलनकारी रहे वे आज भी हासिये पर है। कई चालाक किस्म के लोग आज आन्दोलनकारी के रूप में घोषित हो गये हंै। यह बात कमोबेश हर युवा के भीतर गहरे पैठ गई है।
    युवाओं में एक हिस्सा उन युवाओं का है जिन्हें सामाजिक सवाल कभी उद्वेलित नहीं करते है। यह युवा हरदम प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में ही दिखता है। नौकरी और पैसा कमाना ही उसकी जिन्दगी का मुख्य मकसद होता है। सफल होने पर जब वह अच्छी नौकरी पा जाता है,तब कहीं जाकर उसका ध्यान सामाजिक सरोकारों की ओर जाता तो है, लेकिन वह उसमें शामिल कम ही होता है। युवाओं का एक  छोटा सा हिस्सा उन युवाओं का भी है जो विरासत में मिली राजनीति के सहारे नेतृत्व  करना चाहते हैं। उनके लिये जनसंघर्ष का मतलब होता है वोट बैंक। कई युवा तो सूरज के उठने से पहले उठ जाते है और रात गहरा जाने पर ही घर लौटते हैं। उनकी सारी उम्र फिर घर को चलाने में बीत जाती है। एक हिस्सा वह है जो बाजार में कम साइबर कैफे में, अपने मोबाइलों में या अपने कंप्यूटरों में इंटरनेट में सिर खपाए बैठे रहते हैं।
    फिर कौन सा हिस्सा बचा युवाओं का? फिर क्यों युवा जनहित की सोचे? क्यों करे? कैसे करे? कब करे? ये तो वे ही जाने। लेकिन इतना तो तय है कि नीतिकारों ने, बाजारवाद ने और आज की शिक्षा ने जनांदोलनों से युवा को इतना दूर कर दिया है कि बड़ों की पुकार, समाज की पुकार, मूल्यों की पुकार उनकी कानों में पड़ती ही नहीं। यदि पड़ भी गई तो वह अनसुना कर और,बहुत दूर हो जाना चाहता है। कोई उनसे मूल्यों की बात करता है तों भी वह सिर तो हिलाता है, लेकिन न मन से न तन से वह अपने बड़ों के साथ होता है।
    ये निराशावाद की अति नहीं है। बल्कि वास्तविकता है। आज का युवा ज्यादा रचनाशील हो सकता है। उसमें असीम संभावना है। आज के युवा में सैकड़ों अखिलेश होंगे। लेकिन उनकों इसका भान कराने वाली परिस्थितियां उन्हें कौन देगा? साजिश करना, असामाजिक गतिविधियों में लिप्त रहना और आंख-कान बंद कर चलना, बाइक में स्टंट करना इन युवाओं को को किसने सिखाया? यह प्रश्न भी विमर्श के विषय हैं।
    जब कोई आंदोलन शुरू होता है तो उसके सही-गलत होने पर सवाल उठ खड़े होते हैं। लंबे समय तक बहस चलती है कि अमुक आंदोलन जायज भी था कि नहीं। इसे आंदोलन माना जाए या नहीं। समय के साथ-साथ आंदोलन की दिशा भी तय होती है और दशा भी। समय ही तय करता है कि जिसे आंदोलन माना जा रहा था वो आंदोलन था ही नहीं। समय ही तय करता है कि जनता द्वारा उठाया गया हर कदम सही नहीं होता। फिर उसे भेड़ चाल का नाम दे दिया जाता है। इतना तो तय है कि जनता के सरोकारों से जुड़ा, दमनकारी नीतियों के खिलाफ आम जन की लामबद्धता और उसमें सफलता ही जनांदोलन है। ये ओर बात है कि सभी जनांदोलन जिन मुद्दों-बातों और हकों के लिए शुरू हो उनका अंत हमेशा शत-प्रतिशत सफलता प्राप्त करने पर ही खत्म हो,जरूरी नहीं। आज का युवा शुरूआत करने से पहले ही उसके परिणाम पर सोचने लग जाता है। अगर-मगर, किन्तु-परन्तु में वह किसी भागीदारी में भाग नहीं लेता या पीछे रह जाता है।
    यह दौर संक्रमण का है। लेकिन कब तक? हम सब प्रयास करें और ऐसा माहौल बनायें कि आज के बच्चे युवा उम्र में कदम रखते समय महसूस करे कि सबसे पहले समाज का स्वस्थ रहना जरूरी है। हमारी खुशी में पड़ोस का शरीक होना भी महत्वपूर्ण है। क्षेत्र के साथ-साथ जिला और राज्य का खुशहाल होना भी जरूरी है। तभी आने वाली युवा पीढ़ी जनसरोकारों की और कान देगी। अन्यथा जैसा हम और आप कह रहे हैं। जैसा हमने अपने बड़ों से सुना है, वैसा ही हम बच्चों से न सुनें कि ‘इस देश का कुछ नहीं हो सकता।’ यह वाक्य अति निराशावाद से भरा है। आइए। हम कहें कि स्थितियां बदलेगी और आज जैसा है कल भी ऐसा नहीं रहेगा। यह कोई जरूरी नहीें कि जनसंघर्ष से कुछ मिलने के बाद सब सामान्य हो जाता है। हां। कुछ समय के लिये जनता का असंतोष कम जरूर हो जाता है। लेकिन फिर नये हालात में नयी मांगे जन्म लेती हंै। आंदोलन का स्वरूप-रूप समय के साथ बनता-बिगड़ता रहा है। फिलहाल तो यह कहना ही ठीक होगा कि युवा जन सरोकारों से खुद को कब तक दूर रख सकेगा। आज नहीं तो कल युवाओं को समझना ही होगा कि बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता। वो भी ऐसी लड़ाई जो जनहित के लिए लड़ी जाती है। उम्मीद की जाती है कि सूबे का युवा खुद को निराशावाद से जल्द ही उबार लेगा।
     
-मनोहर चमोली ‘मनु’
पोस्ट बाॅक्स -23 काण्डई रोड, पौड़ी। मोबा.09412158688.

बाल कहानी - ‘दूध चोर’

दूध चोर

-मनोहर चमोली ‘मनु’

    लूसी बिल्ली बहुत ही चालाक थी। लूसी एक ही बात कहती-‘‘मुझसे ज़्यादा होशियार कोई नहीं। राजा शेर भी मुझसे सलाह लेता है।’’
जंगलवासी लूसी की चालाकी से परेशान थे। उसकी धूर्तता और मक्कारी सभी जानते थे। एक दिन की बात है। सब जंगलवासी चैपाल में बैठे थे। गिलहरी ने खरगोश से कहा-‘‘लूसी है तो बहुत होशियार। मगर उसकी होशियारी किसी के काम की नहीं। वो एक कदम भी तभी बढ़ाती है, जब उसे कोई फायदा होने वाला हो।’’
गाय बकरी से बोली-‘‘वो चालाक नहीं मतलबी है।’’ तभी हैचू चूहा बोला-‘‘बातें बनाने से कुछ न होगा। उसे सबक सिखाना होगा। अगर तुम सब साथ दो, तो उसकी सारी हेकड़ी छूमंतर हो जाएगी।’’ सबने हैचू चूहे को सहयोग करने की बात कही। हैचू ने अपनी योजना सबके सामने रखी। सब खुश हो गए। सबने वादा किया कि लूसी को इस योजना का पता नहीं चलेगा।
    एक दिन की बात है। लूसी पानी पीने तालाब की ओर जा रही थी। गाय प्यार से बोली-‘‘लूसी जी आप और शेर एक ही खानदान के हो। मगर शेर जंगल का राजा है और आप! आप उसके आधीन हो। वैसे आप शेर से ज्यादा होशियार हो।’’ यह सुनकर लूसी चैंक पड़ी। वो तालाब की ओर चल पड़ी। उसने पानी में मुंह डाला। तालाब में कछुआ था। कछुआ बोला-‘‘अरे! लूसी जी। मैं तो डर गया था। पानी में आपकी छाया ऐसे लगी, जैसे शेर आ गया हो। मेरी तो जान ही निकल गई थी। आप तो शेर की तरह लग रही थीं।’’
    लूसी वापिस लौटी तो हिरनों का झुण्ड घास चर रहा था। लूसी बिल्ली को देखकर एक हिरन चिल्लाया-‘‘भागो! शेर आ रहा है।’’ लूसी चिल्लाई-‘‘अरे! भागो मत। मैं हूँ लूसी। बिल्ली।’’ लेकिन तब तक हिरनों का झुण्ड आंखों से ओझल हो चुका था। लूसी अपने घर के नजदीक पहुंच गई। एक गधा वहां घास चर रहा था। बिल्ली गधे से बोली-‘‘गधे भाई। सच बताना। मैं तुम्हें कैसी दीखती हूँ।’’ गधा बिल्ली को गौर से देखने लगा। फिर सब बातों से अनजान बनता हुआ बोला-‘‘अच्छी लगती हो। बस और क्या।’’
    ‘‘अरे नही! मेरा मतलब मैं किसकी तरह लगती हूँ? मेरी तुलना तुम किससे कर सकते हो?’’ गधा फिर लापरवाही से बोला-‘‘मैं तो गधा ठहरा। मेरे पास इतना दिमाग कहां। मगर लूसी जी। आप भले ही कद में छोटी हो। मगर आपका दिमाग तो बहुत बड़ा है। आप में गजब की फुर्ती है। काश! मेरे अंदर इतनी फुर्ती होती तो, मैं इस जंगल का राजा होता। वैसे एक बात कहता हूं। किसी से कहना मत। मेरा वश चले तो मैं आपको इस जंगल का राजा बना दूं।’’ यह कह कर गधा चला गया।
    यह सुनते ही लूसी हवा में उड़ने लगी। वो अपनी तुलना शेर से करने लगी। तभी हैचू चूहा आ गया। बिल्ली से बोला-‘‘लूसी बहिन। चारों ओर तुम्हारी ही चर्चा है। हर कोई तुम्हें जंगल का सबसे होशियार प्राणी मानता है। अब तुम्हारा मुकाबला सिर्फ शेर से है। शेर ताकतवर है। वो रोजा़ना दूध पीता है। ढेर सारा। अब तुम्हें भी दूध पीना चाहिए। जिस घर में भी तुम्हें दूध दिखाई दे, जाओ और पी जाओ। मगर चोरी से। किसी को कुछ भी बताने की जरूरत नहीं है। अगर तुम चाहो तो हम तुम्हें राजा बनाने में मदद कर सकते हैंै।’’
    लूसी बिल्ली हैचू चूहे की बातों में आ गई। उसने ठान लिया कि वो घर-घर जाकर दूध पी लिया करेगी। उसे जैसे ही मौका मिलता, वो चुपके से किसी के भी घर में घुस जाती और सारा दूध गटक जाती। लूसी की इस हरकत से सभी परेशान होने लगे। कई बार लूसी दूध पीते हुए रंगे हाथों पकड़ी गई। मगर लूसी थी कि दूध पीने की हरकत छोड़ नहीं पाई। बात राजा शेर के पास पहुंची। लूसी को हाजिर किया गया। दूध की चोरी का वो कारण नहीं बता पाई। आखिर बताती भी कैसे?
लेकिन हैचू चूहा बोल पड़ा-‘‘महाराज! मै बताता हूँ। दरअसल लूसी की नजर आपकी कुर्सी पर है। वो राजा बनना चाहती है। दूध पीकर वो आपकी तरह ताकतवर बनना चाहती है।’’
    यह सुनकर राजा शेर हँस पड़ा। फिर गुस्से में दहाड़ते हुए बोला-‘‘राजा से गद्दारी। मूर्ख। शेर कभी दूध नहीं पीता। अब मेरा आदेश सुन ले। तूझे और तेरी आने वाली पीढ़ी को अब आजीवन दूध चोरी से पीना होगा। देखना। तेरी नस्ल कभी भी वफादार नहीं हो पाएगी। अब जा यहां से और कभी मुझे अपना मुंह मत दिखाना।’’
बेचारी लूसी अपना सा मुंह लेकर रह गई। सब उसकी बेवकूफी पर हँस रहे थे। दरबार खत्म हुआ। जैसे ही हैचू चूहा बाहर आया। लूसी बोली-‘‘हैचू चूहे। ठहर। मैं तेरा खून पी जाऊँगी। ये सब तेरी साजिश थी।’’
यह सुनते ही हैचू चूहा बिल में दुबक गया। तभी से बिल्ली चूहे की दुश्मन बन गई। वहीं आज भी बिल्ली की चोरी से दूध पीने की आदत बरकरार है।

26/03/2012

पौड़ी में शिक्षा की अलख : रेव0 जे0एच0 मैसमोर....


-मनोहर चमोली ‘मनु’
    170 साल पहले जब ‘पौड़ी’ को गढ़वाल जिले का मुख्यालय बनाया गया होगा, तब पौड़ी और आस-पास की क्या आबादी रही होगी? शिक्षा का क्या स्तर रहा होगा? यह यक्ष प्रश्न हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पौड़ी में शिक्षा की अलख अमेरिकी मिशनरी ने जलाई थी। मिशनरी रेव0 हेनरी मेंसल ने सन् 1865 में यहां एक स्कूल खोला था। इस स्कूल का स्वागत उस समय भाषा-बोली के स्तर पर प्रभावपूर्ण नहीं रहा। स्थानीय शिक्षक पं0 पुरुषोत्तम दत्त चन्दोला के स्कूल से जुड़ने के बाद 1867 में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 30 हो गई। बाद में मिशनरी बिशप जे0एम0 थोवर्ण ने इस स्कूल के विकास में योगदान दिया।
 उन्होंने चोपड़ा टी इस्टेट से एक हजार रुपये में 14 एकड़ भूमि खरीदी। बाद में विस्तार के लिए और भूमि खरीदी गई। 1869 से 1872 तक हेनरी मैंसल ने स्कूल की बागडोर संभाली। बाद में पी0टी0 विल्सन और डा0 एस0एस0 डीस को स्कूल के संचालन का दायित्व मिला। 1871 में ही चोपड़ा कोठी का निर्माण हो चुका था। वर्ष 1920 तक मैसमोर स्कूल इसी चोपड़ा कोठी में संचालित हुआ।
    बिशप थोवर्न के बाद प्रसिद्व शिक्षक मिशनरी रेव0 जे0एच0 मैसमोर पौड़ी आये। मैसमोर ने ही इस स्कूल को वर्ष 1902 में हाई स्कूल किया। रेव0 डी0 ए0 चैफीन का सहयोग अविस्मरणीय है। वे पहले से ही स्कूल में हेड मास्टर थे। हाई स्कूल के पहले हेडमास्टर वे ही रहे। जे0एच0 मैसमोर कई वर्षों तक पौड़ी में ही रहे। मैसमोर ने बीमार रहते हुए भी सन् 1911 में चर्च का निर्माण करवाया। शिक्षा के प्रति उनका अदम्य उत्साह ही था कि बीमार रहते हुए भी छात्रों को पढ़ाते थे। मैसमोर की मृत्यु के बाद 1912 में पी0एस0 हाॅइड पौड़ी आये। हाईस्कूल भूकंप में क्षतिग्रस्त होने के कारण मिडिल में बदल दिया गया।
    मिशन सुपरिन्टेन्डेन्ट वीक्स ने सरकारी सहायता से स्कूल का पुननिर्माण कराया। 1922 में नया भवन तैयार हुआ। उस समय इस भव्य और अनोखे भवन के निर्माण पर 1 लाख 80 हजार रुपये की लागत आई। 1902 में सरकार ने इसे हाई स्कूल की मान्यता दी। पौड़ी ही नहीं चमोली और आस-पास के क्षेत्र से भी छात्र यहां पढ़ने के लिए आने लगे। पहले बैच में छात्र कुलानंद थपलियाल, दुर्गादत्त ममगाई, मनोहर जोशी और बख्तावर सिंह शामिल थे। शिक्षा की लोकप्रियता के कारण 1926 में इस विद्यालय में छात्र संख्या 4 से लेकर 400 तक पहुंच गई। उन्हें पढ़ाने के लिए 23 अध्यापक नियुक्त थे।
    मैसमोर स्कूल की काॅलेज की यात्रा का इतिहास स्वर्णिम रहा है। यहां के छात्र राजनीजि, प्रशासन, समाज, साहित्य और कला के क्षेत्र में प्रसिद्धि पा चुके हैं। 70 सालों तक इस स्कूल में सेवा देने वाले चैफीन परिवार के योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। वर्ष 1944 में स्थानीय जनता ने सरकार से इसे इण्टरमीडिएट काॅलेज की मान्यता देने की मांग की। 1950 में सरकार ने इण्टर संकाय मिशन को सौंप दिया। 1974 में इस स्कूल का प्रांतीयकरण हुआ।  

25/03/2012

ग़ज़ल....... ‘वज़ूद आदमी का गलने लगता है’....-मनोहर चमोली ‘मनु’

 ग़ज़ल....... ‘वज़ूद आदमी का गलने लगता है’....

-मनोहर चमोली ‘मनु’


झूठ ओढ़ा और चेहरा बदलने लगता है।
यकीनन वजूद आदमी का गलने लगता है।।


दोपहर का सूरज चाहे लाख आँख दिखाए।
शाम आते ही यारों वो तो ढलने लगता है।।


बुरा कहो ताना दो या जी दुखाओ माँ का।
माँ का दिल माँ का है फिर पिघलने लगता है।।


वो अकेला था चाहे आँख का तारा ‘मनु’।
बाद उसके घर उसका फिर संभलने लगता है।।

ग़ज़ल... 'पैसा पैसे को कमाता तो है.' -मनोहर चमोली ‘मनु’

 ग़ज़ल....... पैसा पैसे को कमाता तो है.....

-मनोहर चमोली ‘मनु’

वैसे पैसा पैसे को कमाता तो है।
पर आदमी को मशीन बनाता तो है।।


यूँ अपनों से नाहक ही दूर हो जाना।
ये दौलत का नशा है ये कराता तो है।।


कल रोटी मिले न मिले उसे फिर भी।
वो मस्ती में कहकहे लगाता तो है।।


दिल अभी लगा नहीं किसी से ‘मनु’ का।
मगर वो हसीन ख़्वाब सजाता तो है।।

19/03/2012

'बच्चे संयुक्त परिवार में ज्यादा सीखते हैं '

'बच्चे संयुक्त परिवार में ज्यादा सीखते हैं '

-मनोहर चमोली ‘मनु’
 
संयुक्त परिवार यानि मिला-जुला परिवार। जुड़ा हुआ परिवार। वह परिवार जिसमें कई रिश्ते-नाते एक छत के नीचे पलते-बढ़ते हैं। वे सभी एक साथ मिलकर रहते हैं। एक ही रसोई का खाना खाते हैं। वह परिवार जो अकेला न होकर कई छोटे-छोटे परिवारों से मिलकर रोजमर्रा के काम में जुटा रहता है, संयुक्त परिवार कहलाता है। बड़े-बुजुर्गांे के साथ कई रिश्तों का एक माला में पिरोया हुआ परिवार ही संयुक्त परिवार कहलाता है। इस परिवार में एक मुखिया होता है, जो सभी की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए कामों का बंटवारा करता है। संयुक्त परिवार की खास बात यह होती है कि यहाँ खून के रिश्ते को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। बूढ़ों को खास तवज्जो दी जाती है और बूढ़े अपने अनुभव के आधार पर घर-परिवार के बच्चों को संस्कारपरक शिक्षा-दीक्षा देते हैं। बच्चों को अच्छी-बुरी आदत का भान कराते हैं।  

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अकेला नहीं रह सकता। यही कारण है कि उसे साथ रहने और समूह में रहने की आदत है। ऐसे समूह के साथ जिनके आपसी हित और संबंध जुड़े हों। वह परिवार के रूप में स्थापित हो गए। आगे चलकर परिवार, संपत्ति, सुरक्षा-देखभाल और खेती-बाड़ी ने रिश्तों-नातों को जन्म दिया। फिर रक्त संबंधी रिश्तों को खास समझा गया।
 
दादा-दादी, ताऊ-तायी, चाचा-चाची, देवर-भाभी, देवरानी-जेठानी, जेठ-ननद, भतीजा-भतीजी, पोता-पोती आदि रिश्तों को संयुक्त परिवार का हिस्सा माना गया। ये रिश्ते समाज के साथ-साथ बनते-बिगड़ते रहे। पहले खेती प्रधान समाज था। हर परिवार में ज्यादा से ज्यादा लोगों की जरूरत पड़ती थी। यही कारण था कि एक ही चूल्हा हुआ करता था। सब लोग एक ही रसोई का पका हुआ भोजन खाते और मिलकर खेती करते थे। सेहत-चिकित्सा का विकास नहीं हुआ था। मृत्यु दर अधिक थी। परिवार में जन्मे बच्चे और बच्चे को जन्म देने वाली माता की मृत्यु दर अधिक थी। यही कारण था कि परिवार को बड़ा रखने की सोच ज्यादा प्रबल थी।
 
समाज के साथ-साथ मानव की सोच में बदलाव आया। जन्म दर बढ़ी और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ बड़ने लगी। मृत्यु दर कम हुई और रोजगार के साधन बड़े। जिस कारण बड़े परिवार का लालन-पालन करना कठिन होने लगा। खेती के सीमित होने से छोटे परिवारों की धारणा बढ़ने लगी। एक ही छत के नीचे कई छोटे-छोटे परिवारों का पालन एक ही मुखिया के सहारे चलने में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा तो एकल परिवार की सोच बढ़ी। संयुक्त परिवार बिखरने लगे। माता-पिता और उनके बच्चे ही एकल परिवार का हिस्सा माने गये। लंबे समय तक संयुक्त परिवार आदर्श परिवार माने गये। फिर एकल परिवार को अच्छा माना गया।
 
आज फिर से संयुक्त परिवार की धारणा समाज में अच्छी माने जाने लगी है। एकल परिवार में न ही दादा-दादी हैं और न ही चचेरे भाई-बहिन। अधिकतर एक संतान वाले परिवार में तो बच्चा या बच्ची बड़ी बहिन या छोटी बहिन क्या होती है। यह तक नहीं जानते हैं। कहीं बड़ा भाई या छोटा भाई किसे कहते हैं। लड़कियों को नहीं मालूम। चाचा-चाची या ताऊ-ताई किसे कहते हैं। वे ये नहीं जानते। दादा-दादी की देख-रेख से भी बच्चे वंचित हैं। इसी तरह एकल परिवार ने जेठानी-देवरानी और ननद-भाभी या देवर-भाभी के रिश्तों को भी मिटाने का काम किया है। जो दूरदर्शिता दादा-दादी और संयुक्त परिवार के और रिश्तों की वजह से थी, वह आज एकल परिवार के टूटने और बिखरने का कारण बन गई है। बच्चों की देख-रेख, परवरिश ठीक से नहीं हो पाती। बच्चों में संस्कार और मानवीय मूल्यों की कमी संयुक्त परिवार के न होने से है।
 
बच्चे समूह में ज़्यादा सीखते हैं। अपने संगी-साथियों से ज्यादा अपने घर में हम उम्र और बड़े बच्चों से बच्चे ज्यादा सीखते हैं। प्रेम, अपनापन, सहयोग, सहायता, साझेदारी और सामूहिकता तो संयुक्त परिवार का प्राण है। यही कारण है कि जिन बच्चों को दादा-दादी की देख-रेख मिली है। जहां बच्चों को बड़े भाई-बहिनों के साथ चाचा-चाची या ताऊ-ताई का प्यार मिला है, वे बच्चे हर क्षेत्र में सफल रहे हैं। वे सामाजिकता और मानवता में विनम्र और सहयोगी बने हैं। अन्यथा अकेले और एकाकी परिवार के बच्चे हिंसक, झगड़ालू और कुंठित हो जाते हैं। कामकाजी माता-पिता के बच्चों में कई विकृतियों से पूरा विश्व चिंतित है। आज के बच्चे कल का भविष्य हैं। आदर्श नागरिक बन कर वे देश के संचालक होंगे। यदि बच्चों को अच्छी परवरिश और संस्कार नहीं मिलेंगे तो वे आगे चलकर न ही अपना विकास कर पायेंगे और न ही परिवार का और न ही वे देश के विकास में सकारात्मक सहयोग दे सकंेगे।
 
आज फिर से संयुक्त परिवार की भावना को स्वीकार किया जा रहा है। हर कोई चाहता है कि उनका परिवार सुखी और खुशहाल हो। कहा भी गया है कि मानव न तो देवता है न ही दानव। मानवता भी यही कहती है कि अपने लिए न जीकर हम सबके लिए जियें। मिलकर रहने में जो सुख है वे अकेले रहने में कभी हो ही नहीं सकती। आप क्या सोचते हैं? बतलाइएगा जरूर। मैं प्रतीक्षा में रहूंगा।
 
मनोहर चमोली ‘मनु’ पोस्ट बाॅक्स-23, भितांई, पौड़ी गढ़वाल।  मोबाइल-09412158688.
 

18/03/2012

कंचन का पेड़......story

कंचन का पेड़

मनोहर चमोली ‘मनु’   

इस बार ठंड खूब पड़ी थी। हर कोई अनुमान लगा रहा था कि इस बार गरमी भी खूब पड़ेगी। अप्रैल में तपन शुरू हो गई थी। मगर प्रकृति से कौन जीत पाया है? सारे अनुमान धरे-के-धरे रह जाते हैं। यही हुआ। मई की शुरूआत हुई और घनघोर बारिश शुरू हो गई। पहली बारिश में बच्चे नाचने लगे। जोर-जोर से गाने लगे। कागज की नाव बनाने लगे। वहीं बुजुर्ग आसमान को शक की नजर से देखने लगे। ंकामिल ने जोर से आवाज लगाई,‘आयशा। इधर आ। सामान बांधना है। मनमसा बाढ़ लेकर गांव में आने वाली है।’

आयशा ने सुना और चुपचाप खड़ी हो गई। पास-पड़ोस के संगी-साथियों ने भी सुना। मगर वह फिर खेलने में मस्त हो गए। आयशा ने आसमान की ओर देखा। आसमान में घनघोर बादल छाए हुए थे। तेज बारिश की बूंदों के कारण आयशा ने अपनी आँखें बंद कर ली। क्षितिज काले रंग से रंगी हुई थी। आयशा अब्बू की घोषणा से परेशान हो गई। यह पहली बार नहीं था, जब अब्बू ने सामान बांधने की बात कही थी। मगर मई के महीने में तो कभी ऐसा नहीं हुआ था। आयशा का चेहरा बुझ गया। वह धीमे कदमों से अपने अब्बू के सामने खड़ी हो गई। उसने धीमे से कहा- ‘अब्बू। क्या हमें यह गांव भी छोड़ना होगा?’

    कामिल ने आयशा के सिर पर हाथ रखते हुए कहा,‘आसार तो यही लग रहे हैं। देख नहीं रही। मई का महीना और घनघोर बारिश। मैं इन काले, घने और गड़गड़ाते बादलों को अच्छी तरह जानता हूं। ये अब नहीं जाने वाले हैं। तू भूल गई क्या? दो साल पहले क्या हुआ था। मनमसा नदी हमारे घर में घुस आई थी। हम अपनी छत भी उखाड़ नहीं पाए थे। तेरी गौरी गाय भी बाढ़ में बह गई थी। इस बार हमें अपना जरूरी सामान तो बचाना ही है।’

आयशा की आंखों में आंसूओं की झलक देखते ही कामिल ने प्यार से कहा-‘ अरे। ज़िन्दा रहेंगे तो नया घर भी बना लेंगे। चल अब जल्दी से रस्सियों का ढेर ले आ। तेरी बनाई हुई रस्सियां अब काम आएंगी।’ आयशा ने पलक झपकते ही हथेली से आंसू पोंछे और दौड़कर अंदर गई। रस्सियां हाथ में लपेट कर उसने पूछा,‘अब्बू। हम फिर मनमसा की लोग पूजा क्यों करते हैं? जब मनमसा हमारे गांव तक उजाड़ देती है। क्या मनमसा को दया नहीं आती? उसे हर साल बाढ़ लाने में मज़ा क्यों आता है?’

‘बेटी। यह तो कुदरत है। मनमसा लाखों गांवों को सींचती भी तो है। शहरों को पानी देती है। अच्छा अब जा। अपनी नाव तो देख। उसके चप्पू ठीक से बंधे हैं कि नहीं? क्या लालटेन में किरासिन है ? जग और बाल्टियां नाव में रखी हैं कि नहीं। तब तक मैं छत की टीनों को बारी-बारी से उखाड़ता हूं।’ कामिल ने एक-एक कर बहुत सारे काम आयशा को सौंपते हुए कहा।

    वैसे मनमसा नदी ने इस ओर काफी समय से पलट कर नहीं देखा था। मगर कामिल को यकीन हो चला था कि अब मनमसा को कोई नहीं रोक पाएगा। दो साल पहले भी तो ऐसा ही कुछ हुआ था। मई के महीने में ही बारिश शुरू हो गई थी। दो दिन तक लगातार बारिश हुई थी। तीसरी रात बारिश ने अपनी गति बढ़ा दी। मनमसा अपने तटों को काटती हुई गांवों में तबाही मचाने आ गई। जो लोग सोए हुए थे, वे हमेशा के लिए मनमसा में समा गए। जो जागे हुए थे वे अपनी जान बचाने के अलावा कुछ भी नहीं बचा पाए थे। भारी तबाही के बाद अभी गांव दोबारा बस ही रहे थे। लोग अभी तक नई जगह में अपना बसेरा बसा ही ही रहे थे। अभी बिछुड़े हुए मिले भी नहीं थे। अपनो की खोज-खबर चल ही रही थी। वहीं कामिल को यह तेज बारिश मनमसा नदी में बाढ़ लाने का संकेत दे चुकी थी।
    कामिल मछुवारा था। मछली पकड़कर अपना और अपनी बेटी का पेट पाल रहा था। बीवी कई साल पहले मर गई थी। मनमसा में आई बाढ़ ने ही उसे निगल लिया था। उस समय आयशा आठ महीने की ही थी। कामिल का पहला गांव रजता, दूसरा गांव बोराहेरी, तीसरा हसनपुर, फिर लाछाना, और अब हरिपुर। अब तो कामिल ने गांव के नाम याद रखने ही छोड़ दिए। बारिश कब ठिकाना छोड़ने पर विवश कर दे, यह किसी को पता नहीं था। बाढ़ तो मानों हर साल आने लगी थी। कामिल जैसे सेकड़ों थे, जिन्हें हर बारिश में अपने ठिकाने को बदलने के बारे में सोचना पड़ता था।
    कामिल जैसे हजारों हैं जो मनमसा के कोप का अक्सर शिकार होते हैं। कोई कब तक याद रखे कि कौन-कौन से गांव छोड़कर नई जगह आया है। हर साल बाढ़ उनके घरों को निगल जाती है। यही कारण है कि लोगों को घर बनाने में दिलचस्पी ही नहीं रही। हजारों कामिल हैं, जो हर रोज कुआँ खोद कर प्यास बुझाते हैं। जहां कल की रोटी का अता-पता न हो, वहां अच्छा घर बनाने की बात कोई सोच भी कैसे सकता है। कामिल ने आयशा के सहयोग से जरूरी सामान बांध लिया था। बारिश की गति बढ़ती ही जा रही थी।
    आयशा केले के पेड़ पर बैठी हुई है। उसने पानी में काँटा फैंका। पल भर में ही मछली काँटे में फंस गई। वह खुशी से उछल पड़ी। उसने केले के पेड़ से ही पानी में छलांग लगाई। मछली काफी बड़ी थी। मनमसा अपने उफान पर है। नदी का पानी जब भी गांव में घुसता है तो घर के आधे लोग मछली पकड़ने का काम शुरू कर देते हैं। आधे लोग घर का सामान समेटने में लग जाते हैं। असुरक्षा भले ही कितनी बड़ी हो, जान-माल का संकट हो, तब भी एक सीमा के बाद तो पेट जलने ही लगता है। उसे बुझाने के लिए भोजन तो चाहिए ही। यही कारण था कि मनमसा की तबाही की आशंका भले ही कितनी प्रबल और पुख्ता हो, कहीं ओर जाने का मन बना चुके परिवार खाना तो बनाएंगे ही। फिर खाने में मछली बनेगी, तब भला कोई कैसे मन को बुझा हुआ रख सकता है।
    आयशा मछली को काँटे से निकाल चुकी थी। मनमसा दूर तटों को तोड़ चुकी थी। बाढ़ का पानी बस्ती में बढ़ रहा था। आयशा ने एक नजर अपने घर की ओर देखा। जिसकी दीवारें बांस और एक प्रकार के घास से बुन कर बनाई हुई थीं। घर की दीवारों को लगभग बाढ़ ने अपनी आगोश में ले लिया था। आयशा के अब्बू ने मोटे बांसों को गाढ़कर मचान बना लिया था। जरूरी सामान उस मचान पर रख लिया गया था। बारिश लगातार हो ही रही थी। अब ऐसे में चूल्हा कैसे जलेगा। यही आयशा सोच रही थी।
    कामिल ने आयशा को पुकारा,‘बेटी। यहां आ जाओ। कब तक भीगती रहोगी। मछली भात भी तभी बनेगा,जब ये बारिश थमेगी।’ आयशा तब तक तीन मछली पकड़ चुकी थी। उससे कम उम्र की लडकियां भी मछली पकड़ने में व्यस्त थीं। परिस्थितियां सब कुछ सीखा देती हैं। बाढ़ वाले क्षेत्रों में रहने वाले बच्चें जन्म से ही पानी से जूझना सीख लेते हैं। उन्हें बार-बार घर बदलने की आदत जो पड़ जाती है। बाढ़ से होने वाली तबाही के वे आदी हो जाते हैं। वे जानते हैं कि गांव कभी भी छूट सकता है। घर कभी भी टूट सकता है। ऐसे में वे बारिश में तैरने और मछली पकड़ने का आनंद वे नहीं छोड़ना चाहते। उनके चेहरें में किसी प्रकार की चिन्ता और डर के बादल भी नहीं दिखाई पड़ते।

    अचानक आयशा रोने लगी। कामिल ने सोचा कि शायद आयशा ने साँप देख लिया है। बाढ़ के पानी के साथ कीड़े-मकोड़े और सांप-बिच्छुओं का आना कोई नई बात नहीं है। आयशा के चेहरे में अजीब तरह की मायूसी और डर के भाव थे। जो किसी साँप को देखने से नहीं आते। रोने का कारण पूछने पर आयशा ने कहा-‘अब्बू हम ये जगह छोड़कर नहीं जाएंगे। कभी नहीं।’ कामिल समझ ही नहीं पाया। फिर भी वह बोला,‘बेटी। जाना कौन चाहता है। पर जाना तो होगा ही। हम सबसे बाद में जाएंगे। क्या पता पानी उतर जाए। पर यदि बारिश होती रही और पानी बढ़ता रहा तो जाना ही होगा न।’

    ‘अब्बू। मेरा यह कंचन का पेड़ तो यहीं छूट जाएगा।’ आयशा ने रोते हुए कहा। कामिल ने कंचन के पेड़ को देखा और थोड़ी देर बाद उदास होते हुए कहा- ‘हां बेटी। अब यह इतना बड़ा हो गया है कि इसे उखाड़ कर नहीं ले जा सकते। जब तू इसे पहले वाले गांव से लाई थी, तब यह बहुत छोटा था। यहां ये आसानी से पनप भी गया था। पर अब ये अपनी जड़े जमा चुका है। आयशा ये पेड़-पौधे हमारी तरह जगह नहीं बदलते।’

    आयशा पर तो जैसे बाल हठ सवार हो गया था। वह पैर पटकते हुए बोली-‘मैं यहां सेे नहीं जाऊंगी। मैं इसे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।’ कामिल को समझते देर नहीं लगी कि आखिर आयशा रो क्यों रही है। आयशा का कंचन के पेड़ से बेहद लगाव था। कंचन के पेड़ का पौधा आयशा ने पिछले से पिछले वाले गांव में रोपा था। बाढ़ आने से वह उसे अपने साथ ले आयी थी। नई जगह पर उसने उसे लगन से फिर रोपा था। अभी वह थोड़ा बड़ा ही हुआ था कि फिर बाढ़ आ गई। वह उसे फिर उखाड़ कर अपने साथ ले आयी थी। बीते दो साल में कंचन का पेड़ इतना बड़ा हो गया कि अब उसे उखाड़ना संभव नहीं था।

    ‘बेटी। ज़िद नहीं करते। हो सकता है कि बाढ़ तेरे कंचन के पेड़ का बाल भी बांका न कर सके। तुम ऐसे कंचन के कई पेड़ लगा सकती हो। हमारी किस्मत में एक जगह ठहर कर घर बनाना ही नहीं है। यह भी जरूरी नहीं कि हम जहां जा रहे हैं, वहां बाढ़ कभी नहीं आएगी। हम किसी जगह से मोह रख ही नहीं सकते। अपने आस-पास देखो। कितने हरे-भरे पेड़ हैं। ये भी किसी ने लगाएं हैं। ये लहराते हुए पेड़ हमंे यही तो सिखाते हैं कि मुश्किलों का सामना करो। जो सामना नहीं कर पाते, वो बह जाते हैं।’ कामिल ने आयशा के गालों में रूके हुए आँसूओं को पोंछते हुए कहा।

    आयशा दौड़ते हुए कंचन के पेड़ के पास गई। कंचन के पेड़ से लिपट गई। फिर उसे बार-बार चूमने लगी। आयशा सुबकते हुए बोल रही थी,‘मैं जा रही हूँ। कंचन। अपना ध्यान रखना। मनमसा के पानी से मत डरना। खड़े रहना। जब पानी उतर जाएगा न। फिर हम दोबारा यहीं आएंगे। अपना नया घर यहीं बनाएंगे। ठीक है न। अब्बू को छोड़कर मैं यहां कैसे रूक सकती हूँ। अब्बू को कौन देखेगा।’

      मछली पकड़ रहे बच्चों ने आयशा को घेर लिया। वह नहीं समझ पाए कि आखिर क्या माजरा है। आयशा कंचन के पेड़ से ऐसे लिपटी हुई थी, जैसे वह कोई ब्याहता हो, और अपना मायका छोड़कर जा रही हो। कंचन के पेड़ से लिपटी आयशा को देखकर कामिल की आँखों से भी आँसू बहने लगे।
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- मनोहर चमोली ‘मनु’  पोस्ट बाॅक्स-23. मुख्य डाकघर पौड़ी. भितांई, काण्डई रोड़, पौड़ी गढ़वाल 246001. उत्तराखण्ड. मोबाइल-09412158688.

gazal............आता तो होगा।


 कभी आँखों के सामने मेरा चेहरा आता तो होगा।
आपके अपनों में कभी ज़िक्र हमारा आता तो होगा।।

भुला दो मुझको मेरी यादें चाहे मिटा दो लेकिन।

कोई कभी न कभी मेरे नाम सा आता तो होगा।।

तुमने बेदर्दी से जला दिए ख़त मेरे और मैं समझा।

तुम्हें इश्क मुहब्बत का कायदा आता तो होगा।।

ये ओर बात है कि ये शहर है सादगी वाला लेकिन

इसे भी हुनर फरेब चालाकी का आता तो होगा।।

-मनोहर चमोली ‘मनु’

17/03/2012

छिप छिप के उसे देखना-----ग़ज़ल-

-मनोहर चमोली 'मनु' manuchamoli@gmail.com

छिप छिप के उसे देखना ऐसा भी क्या।
न उसके सामने जाना ऐसा भी क्या।।
कोंपलें फूटी हैं मुझ पर उसे है ख़बर।
खुद ही इतराना मुसकाना ऐसा भी क्या।।
शाम तलक रेत का घरौंदा बनाता रहा।
खुद ही फिर उजाड़ दिया ऐसा भी क्या।।
तुम बरसते रहे मैं सुनता रहा तुम्हें।
अपलक देखता तुम्हें रहा ऐसा भी क्या।।
शायद तुम्हारी बातों का असर है इतना।
तुमने कहा मैंने किया ऐसा भी क्या।।
-मनोहर चमोली ‘मनु’

12/03/2012

anubhav...march 2012

-मनोहर चमोली 'मनु' manuchamoli@gmail.com

anubhav-5-3-2012

-मनोहर चमोली 'मनु' manuchamoli@gmail.com

anubhav-feb-2012

-मनोहर चमोली 'मनु' manuchamoli@gmail.com
anubhav-june...2011-मनोहर चमोली 'मनु' manuchamoli@gmail.com

10/03/2012

दूसरी दुनिया -मनोहर चमोली ‘मनु’ 00एली हाथी सरपट दौड़ रहा था। चूंचूं चूहे ने एली को टोकते हुए पूछा-‘‘दादा ! कहां भागे जा रहे हो? क्या आसमान टूट रहा है?’’ ‘‘कोको मगर की शरण में जा रहा हूं। तुमने सुना नहीं कि 21 जून 2012 को प्रलय आने वाली है। ये धरती नष्ट हो जाएगी।’’ एली ने हांफते हुए कहा। ‘‘तो क्या हुआ? तुमने नहीं सुना नया ग्रह ढंूढ लिया गया है।’’ चूंचूं ने हंसते हुए कहा। एली रुक गया। चैंकते हुए कहने लगा-‘‘मगर हमें तो धरती चाहिए न।’’ ‘‘अरे! दादा हमारी धरती भी तो एक ग्रह ही है। वैसे भी कोको के पास जाने से क्या होगा। नदी, ताल और समुद्र भी तो धरती में ही है। फिर। कोको क्या कर लेगा, यदि धरती नष्ट होने जा रही है।’’ चूंचूं ने पूछा। यह सुनकर एली हाथी सिर खुजलाने लगा। चूंचूं ने मुस्कराते हुए कहा-‘‘मीकू खरगोश अंतरिक्ष विज्ञान संस्थान की सैर करके लौटा है। चलो उसके पास चलते हैं। वो बहुत कुछ जानता है, नई धरती के बारे में।’’ वे दोनों अभी बात ही कर रहे थे कि मीकू खरगोश उनके सामने आ गया। मीकू ने कहा-‘‘लो मैं आ गया। क्या बात है?’’ एली ने कहा-‘‘तुम्हारी लंबी उम्र है। हम अभी तुम्हारे बारे में ही बात कर रहे थे। ये बताओ क्या धरती 2012 में खत्म हो जाएगी?’’ मीकू ने हंसते हुए बताया-‘‘अंतरिक्ष में कई ग्रह हैं। सभी सूर्य के चक्कर काटते हैं। यह संभव है कि चक्कर काटते-काटते कोई पिण्ड या ग्रह धरती से कभी टकरा सकते हैं। लेकिन ये महज एक कयास ही है। सैकड़ों अंतरिक्ष विज्ञानी अंतरिक्ष में होने वाली खगोलीय घटनाओं पर नजर रखे रहते हैं। फिलहाल खतरे वाली किसी बात की पुष्टि तो नहीं हुई है।’’ ‘‘ओह! तो ये बात है। मैं नाहक ही परेशान हो रहा था। खैर कोई बात नहीं। और हां क्या किसी और धरती की भी संभावना है कहीं?’’ एली ने उत्सुकतावश पूछा। मीकू की आंखें चमकने लगी। उसने बताया-‘‘वैज्ञानिकों ने एक ग्रह खोज लिया है। इसे ग्लिज 581 डी नाम दिया गया है। यह ग्रह हमारी इस पृथ्वी से लगभग 20 प्रकाश वर्ष दूर दूसरे सौरमंडल में स्थित है।’’ ‘‘लेकिन वहां जीवन संभव है?’’ एली ने बीच में टोकते हुए पूछा। मीकू ने सिर हिलाते हुए कहा-‘‘हमें आशावादी होना चाहिए। वैज्ञानिकों ने इस ग्रह को जीवों के अनुकूल बताया है। पता चला है कि वहां विभिन्न गैसों से युक्त समृद्ध वायुमंडल भी है। ऐसा वायुमंडल है जिसकी उचाई करीब दो किलोमीटर है। यही नहीं वहां समुद्र और बरसात की भी पूरी संभावना जताई जा रही है। मनुष्यों के अलावा सभी जीवों के लिए पानी तो चाहिए ही। बस अब मानव और कुछ जीव भेजे जाने की तैयारी है। आप कहें तो आपको भेजने की तैयारी की जाए।’’ ऐली ने डरते हुए कहा-‘‘न बाबा न। सुना है कि हमारी धरती जैसी कई धरती इस ब्रहमाण्ड में है। हो सकता है कि वहां एलियंस हों। हां। जब उस धरती में बसावट की तैयारी हो जाए तो मेरा टिकट जरूर कटवा देना। इस धरती पर तो अब संकट के बादल मंडरा ही रहे हैं। मैं चला। अपने दोस्तों को भी खुशखबरी दे दूं कि परेशान होने की जरूरत नहीं है। दूसरी दुनिया भी संभव है।’’ यह सुनकर मीकू और चूंचूं हंसने लगे। 0000 -मनोहर चमोली ‘मनु’ - भितांईं, पोस्ट बाॅक्स-23, पौड़ी गढ़वाल उत्तराखण्ड.पिन-246001 सम्पर्क-09412158688.

अच्छा नहीं किया।

तुमने अपना रस्ता बदला अच्छा नहीं किया। उस पे अपना लहज़ा बदला अच्छा नहीं किया। मैं तेरा हूं बस तेरा ही, कल तक कहा तूने, लेकिन आज मुकर गया अच्छा नहीं किया। छोड़ के यारी यारों की, तू तो संभल गया। हमको यूं ही छोड़ दिया अच्छा नहीं किया। मैं तो समझा मेरा वास्ता सूरज तुझ से है। तू जा बादलों में छिपा अच्छा नहीं किया। पका हुआ फल तो नीचे गिर ही जाता है। तूने उसको मार गिराया अच्छा नहीं किया। हम तो हाथ में लिए गुलाल खड़े ही रह गए, तुमने ही मुंह फेर लिया अच्छा नहीं किया।.. -मनोहर चमोली ‘मनु’ .....02.02.2012