30/11/2014

मस्ती की पाठशाला बाल कहानी का नाट्य रुपान्तर

कक्षा 5 की सहायक पुस्तक के लिए मेरी कहानी का नाट्य रूपान्तर !
 मिली सूचना के मुताबिक दिल्ली के पब्लिक स्कूलों के लिए यह किताब तैयार हुई है।

किताब में क्रम कुछ इस प्रकार है-

1-रिमझिम-कविता-शेरजंग गर्ग

2-दोस्ती का कर्ज़-कहानी-ईशान गुप्ता

3-मस्ती की पाठशाला-नाटक-मनोहर चमोली ‘मनु’

4-भारतीय महीनों की कहानी-ज्ञान विज्ञान-गुणाकर मुले

5-मकड़ी का निराला जाला-प्राणी जगत-जगदीप सक्सेना

6-किस्सा शरारत का-कहानी- सूर्यबाला

7-इतनी बात-कविता-कृष्ण शलभ

8-दूसरी तसवीर-कहानी-उषा यादव

9-कब मिलेगी आजादी-संस्मरण-दीनदयाल शर्मा

10-आरवरदीप-कहानी-रेनू सैनी

11-मुवक्किल साथी बन गए-संस्मरण-महात्मा गांधी

12-फटे कुरते का गीत-कविता-दामोदर अग्रवाल

13-किताबें-कविता-श्याम सुशील

21/11/2014

चंपक, 2nd नवम्बर 2014 बाल कहानी

चंपक, 2nd नवम्बर 2014 बाल कहानी


'जिम्मेदारी हम सभी की' 

-मनोहर चमोली ‘मनु’

जंबो हाथी नल के नीचे नहा रहा था। चूंचूं चूहा चिल्लाया-‘‘अरे! अरे! जंबो दादा। यह क्या कर रहे हो?’’

जंबो हाथी ने चूंचूं चूहे को घूर कर देखा। फिर नहाते हुए बोला-‘‘देख नहीं रहा है। नहा रहा हूं। दर्जनों बाल्टी पानी डाल चुका हूं। गर्मी है कि लगती ही जा रही है। ’’

‘‘यही तो मैं कह रहा था कि क्या कर रहे हो। जब गर्मी है तो गर्मी लगेगी ही। दर्जनों बाल्टी पानी बेकार नहीं बहा रहे हो? इतने पानी से हजारों पक्षियों का नहाना हो जाता। चलो पहले कपड़े पहनो फिर बात करते हैं।’’

जंबो की सूंड हवा में ही रुक गई। उसने सूंड से पकड़ी बाल्टी को नल के नीचे रख दिया। नल का पेंच खुला था। बाल्टी भरने के बाद भी पानी नीचे गिर रहा था।

चूंचूं चूहा बोला-‘‘और ये देखो। पेंच खुला है। पानी बेकार बह रहा है। पहले नल का पेंच बंद करो।’’ 
जंबों ने पेंच को कस कर बंद कर दिया। 

फिर वह चूंचूं से बोला-‘‘हां अब बोलो।’’

चूंचूं चूहा बोला-‘‘बोलना क्या है। नहाने के लिए आपकों तालाब में जाना चाहिए। नल का पानी कितना बेकार बहा दिया।’’

‘‘एक मेरे अकेले पानी बहाने से क्या फर्क पड़ता है।’’
‘‘फर्क तो पड़ता है भाई।’’
‘‘मतलब?’’
‘‘मतलब यही है कि तुम्हारे जैसे कई होंगे जो नहाने के बहाने ढेरों लीटर पानी बहा देते हैं। वहीं कईयों को पीने का पानी तक नहीं मिल पाता।’’ चूंचूं ने कहा।

यह सुनकर जंबो हाथी हंसने लगा। कहने लगा-‘‘चूंचूं भाई। तुम कद-काठी में बहुत छोटे हो। लेकिन लगता है कि तुम दिमाग से भी छोटे हो। कुएं हैं। हैंडपंप हैं। ट्यूबवेल हैं। दिक्कत कहां हैं?’’
चूंचूं चूहा बोला-‘‘दिक्कत ही तो है। क्या तुम्हें नहीं पता कि बिन पानी सब सून। जंबो दादा। आबादी लगातार बढ़ती जा रही है। भूजल का अत्यधिक सेवन लगातार बढ़ रहा है। भारत की आधी आबादी भूजल के स्रोतों पर निर्भर है।’’
‘‘ये लो। कर लो गल। अब जल तो जल है। चाहे भूजल हो या कोई ओर। क्या फर्क पड़ता है?’’ जंबो नहाधोकर आराम से बैठ गया।

चूंचूं चूहा बोला-‘‘जमीन के भीतर का पानी भूजल है। नदी, नालों, हिमशिखरों और बारिश का पानी भूजल में नहीं आता है। पीने योग्य पानी तो संरक्षित होगा। खुद को ही देख लो। आप बजाए नदी में नहाने के नल के पानी से नहा रहे हैं। यह पानी तो पीने योग्य है। इसे बेकार में क्यों बहाए जा रहे हो? यह भूजल का दोहन कर सप्लाई किया जाता है।’’

जंबो हाथी बोला-‘‘ओह! ये तो मैने सोचा ही नहीं।’’

चूंचूं बोला-‘‘तो अब सोचो। तुम्हे पता है कि आज भी हमारे देश में नलों का पानी सभी को उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र की सत्तर फीसदी आबादी को नल का पानी उपलब्ध नहीं है। वहीं तीस फीसदी शहरी आबादी को भी नल का पानी उपलब्ध नहीं है। यही नहीं कुल मिलाकर देखें तो आज भी 11 फीसदी आबादी कुओं का पानी पीती है। 42 फीसदी आबादी हैंडपंप और ट्यूबवेल के पानी पर निर्भर है।’’

जंबों हाथी बोला-‘‘अरे! तो इसका मतलब यह है कि हर घर में अभी पानी नहीं पहुंचा है?’’

चूंचूं चूहा बोला-‘‘ठीक समझे। यही नहीं पूरी धरती में उपलब्ध पानी में केवल 1 फीसदी पानी ही पीने योग्य है। अब तुम ही बताओ। क्या हमें पीने योग्य पानी को इस तरह नालियों में बहाना चाहिए? नहीं न?’’

जबों हाथी ने सिर पकड़ लिया। फिर बोला-‘‘पीने का पानी क्यों? किसी भी तरह का पानी बेकार में नहीं बहाना चाहिए। थैंक्स मेरे सच्चे मित्र। मैं सुबह से ही नहा रहा हूं। कई मित्र यहां से गुजरे लेकिन किसी ने मुझे समझाने की कोशिश नहीं की। तुम ही मेरे सच्चे मित्र हो। चलो। इस खुशी में तुम्हें मोतीचूर के लड्डू खिलाता हूं। जंपी बंदर की दुकान के पास भी एक हैंडपंप लगा है। चलकर देखते हैं कि कहीं कोई वहां पानी का दुरुपयोग तो नहीं कर रहा!’’

यह सुनकर चूंचूं चूहा हंस पड़ा। दूसरे ही पल जंबो हाथी ने चूंचूं को सूंड से उठाया और अपनी पीठ पर बिठा लिया। दोनों जंपी बंदर की दुकान की ओर चल पड़े।  
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08/11/2014

'हवाई सैर' * *-मनोहर चमोली ‘मनु’ .साहित्य अमृत नवंबर 2014

हवाई सैर
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-मनोहर चमोली ‘मनु’

रगद का एक पेड़ था। वह बूढ़ा हो चला था। एक दिन बरगद सोचने लगा-‘‘सालों से एक जगह पर खड़ा हूँ। जिसे देखो। वह मेरी काया पर शरण लिए हुए है। मेरी किसी को चिन्ता नहीं है।’’ तभी उसे किसी के रोने की आवाज आई। एक तितली रो रही थी। 


एक गिद्ध का बसेरा भी इसी बरगद पर था। गिद्ध ने तितली से पूछा-‘‘नन्ही रानी। क्या हुआ?’’ यह सुनकर तितली दहाड़े मारकर रोने लगी। बरगद के पेड़ पर बया का घोंसला भी था। बया ने अपने घोंसले से झांका। 

गिद्ध ने फिर पूछा-‘‘अब रोती ही रहोगी या बताओगी भी कि हुआ क्या है?’’ तितली ने अपने आँसू पोंछे। फिर सुबकते हुए बोली-‘‘काश! मेरे पंख भी तुम्हारी तरह होते। मैं भी हवाई सैर करती।’’ गिद्ध को हंसी आ गई। वह बोला-‘‘ओह! तो यह बात है। लेकिन तुम्हारे भी तो पँख हैं। तुम्हें आसमान में उड़ने से भला किसी ने रोका है। उड़ो। खूब उड़ो।’’

तितली ने मुंह बिचकाया। कहा-‘‘मेरा उड़ना भी कोई उड़ना है। थोड़ा सा उड़ती हूँ। फिर थक जाती हूँ। उड़ान हो तो तुम्हारे जैसी। वाह! ऊपर, ऊपर और ऊपर।’’

गिद्ध ने कहा-‘‘ अच्छा। अब समझा। तो तुम आसमान की ऊँचाई देखना चाहती हो?’’

तितली ने कहा-‘‘हाँ। नहीं। हाँ। मैं आसमान से धरती को भी देखना चाहती हूँ। क्या धरती वाकई गोल है? समुद्र कैसा दिखता है? नदी, पहाड, पेड़ कैसे लगते होंगे? बड़ा मजा आता होगा न?’’ गिद्ध ने कहा-‘‘तो चलो। आओ। मेरे किसी एक पैर पर आराम से बैठ जाओ।’’ तितली ने डरते हुए कहा-‘‘न बाबा न। तुम जैसे ही अपने पंख फड़फड़ाओगे, वैसे ही मैं तिनके की तरह उड़ जाऊँगी।’’ 

बया सारा माजरा समझ चुकी थी। वह हंसते हुए तितली से बोली-‘‘तुम मेरा घोंसला ले लो। गिद्ध भाई उसे मजबूती से अपने पंजों में पकड़ लेगा। तुम मेरे घर की खिड़की से इस दुनिया को आराम से देखना।’’ तितली खुश हो गई। कहने लगी-‘‘यह ठीक रहेगा। लेकिन.......।’’ 
‘‘लेकिन क्या?’’ गिद्ध ने पूछा। तितली ने सोचते हुए कहा-‘‘अगर बारिश हो गई तो? मैं भीग गई तो? मुझे भीगने से जुकाम हो जाता है।’’ गिद्ध ने जवाब दिया-‘‘मेरे पंख किसी छतरी से कम नहीं। डरो मत। तुम पर बारिश की एक बूंद भी नहीं गिरने दूंगा। अब चलो।’’ तितली ने हंसते हुए कहा-‘‘अरे हाँ। यह तो मैंने सोचा ही नहीं। लेकिन........।’’

अब बया ने चैंकते हुए पूछा-‘‘लेकिन क्या?’’ तितली ने आँखंे मटकाते हुए कहा-‘‘घूमते-घूमते अगर मुझे भूख लग गई तो?’’ सब सोच में पड़ गए। बया ने सुझाव दिया-‘‘तो तुम फूलों का रस जमा कर लो।’’ 

‘‘हाँ। ये ठीक रहेगा। लेकिन.........।’’ तितली फिर सोच में पड़ गई। ‘‘अब क्या हुआ।’’ बया ने पूछा। तितली उदास हो गई। कहने लगी-‘‘मैं फूलों का रस कब जमा करूंगी? रस जमा करने में तो समय लगेगा न।’’

मधुमक्खियों का विशालकाय छत्ता भी बरगद की दूसरी शाख पर था। अब तलक रानी मधुमक्खी चुप थी। वह सब सुन रही थी। रानी मधुमक्खी भी तितली के पास मँडराने लगी। कहने लगी-‘‘ मैं बताती हूं। तुम मेरा छत्ता ले जाओ। इसमें खूब सारा शहद है।’’

तितली खुश हो गई। तालियां बजाते हुए कहने लगी-‘‘अब आएगा मजा! आप सब कितने अच्छे हो। ये बरगद का पेड़ ही तो है, जिसमें हम सभी मेल-जोल से रहते हैं।’’ 

सबने तितली की हवाई सैर का इंतजाम कर दिया। गिद्ध ने उड़ान भरी। तितली मुस्करा रही थी। बया के साथ-साथ रानी मधुमक्खी भी नाच रही थी।
 बरगद भी खुशी से झूमने लगा।