10/05/2014

जो देखा, उसे देखकर हैरानी होती है !

इक्कीसवीं सदी में शहरवासी शायद ही कल्पना कर पाएँ कि यदि उनके बच्चों को बुनियादी शिक्षा के लिए एक घण्टा ढलान पैदल चलना पड़े और छुट्टी का घण्टा बजने के बाद वापसी में दो घण्टा की चढ़ाई चढ़ना पड़े तो क्या होगा?

यही नहीं इस पैदल सफर में साँप बिच्छू ही नहीं भालू और जंगली सूअर दिखाई देना आम बात हो तो? कक्षा छह और उससे आगे की पढ़ाई के लिए छह कि0मी0 वो भी पैदल चलना अनिवार्य शर्त हो तो अभिभावक क्या करेंगे? यह यक्ष प्रश्न है।

 जी हाँ। मैं इक्कीसवीं सदी के भारत के कथित देवभूमि उत्तराखण्ड के एक गाँव की बात कर रहा हूँ। इस गाँव को नजदीक से देखने का मौका अभी सम्पन्न हुए लोक सभा निर्वाचन में चुनाव ड्यूट के दौरान मिला।  कोटद्वार तहसील के कानूनगो सर्किल पौखाल पट्टी डबरालस्यूँ का गाँव खेड़ा आज भी मूलभूत सुविधाओं की बाट जोह रहा है। इस गाँव के पोस्ट आॅफिस डबोलीखाल के लिए घण्टों पैदल का सफर करना पड़ता है।

लगभग साठ परिवारों के इस गाँव में आज भी एक बुनियादी स्कूल है। वह भी सन् 1951 में खुल गया था। तब से आज तक कक्षा छह में भर्ती होने वाले बच्चे मानों मीलों पैदल सफर करने को अभिशप्त हांे। हद तो इस बात की है कि गेहूं पिसवाने के लिए इन बाशिंदों को पूरे तीन घण्टे का पैदल सफर करना पड़ता है। अलबत्ता 1986 में बिजली आ गई थी। आज जो अक्सर घण्टों गुल रहती है।

दस-बारह साल पहले गाँव का बाँज का निजी जंगल में बह रहा प्राकृतिक स्रोत से पाईप लाईन बिछाई गई है, जिसके कारण अब गाँव वाले गाड-गदनों से पानी भरकर लाना भूल चुके हैं। लेकिन बूढ़ी महिलाएँ कहना नहीं भूलती कि उन्होंने लोटे भर पानी से पूरे परिवार के बरतन तक माँजे हैं। गुमखाल से चैलूसैंण होते हुए एक पक्की सड़क ऋषिकेश जाती है। यहाँ से ऋषिकेश 80 किलोमीटर पड़ता है।

यमकेश्वर विधानसभा का यह क्षेत्र सड़क के आस-पास बेहद रमणीक जान पड़ता है। हर एक दो कि0मी0 पर एक-दो दुकाने मिल जाती हैं। मल्टीनेशनल कम्पनियों की उत्पादित चीज़ें भी आसानी से दुकानों पर दीख जाती है। लेकिन सड़क के बांयी-दायीं और चढ़ाई या ढलान पर सुदूर दीखने वाले गाँवों की स्थिति आज भी विकास का रास्ता देख रही है। इन गाँव में पहुँचने के लिए पैदल मार्ग ही हैं। खच्चर हैं। आम सुविधाएँ आपको महीने भर के लिए घर पर जुटानी पड़ती है। एक माचिस के लिए नहीं तो तीन से चार घण्टे का सफर कीजिए।

मज़ेदार बात यह हैं कि डाण्डों और सुदूर पहाडि़यों पर मोबाइल टाॅवर ने गांव दर गांव सिगनल तो पहुँचा दिए। रिचार्ज कर लेने की सुविधा तो जुटा दी लेकिन नून तेल लकड़ी के लिए आज भी गांव वासी जद्दोजहद कर रहे हैं। एक खच्चर पर माल ढोने का एक चक्कर डेढ़ सौ रुपए से ढाई सौ रुपए है। पूरा दिन खपेगा वो भी अलग से। अब सोचिए तो ज़रा कि चार सौ पचास रुपए को सिलेण्डर घर तक कितने मूल्य का हो जाएगा। यही नहीं बीमार आदमी को पौखाल ले जाते और कोटद्वार ले जाते कांधों पर पालकी में ढोते चार आदमी रोगी की धड़कन दस बार टटोलते हैं कि थम तो नहीं गई। कारण यह नहीं कि वह भार से दुखी हो रहे हैं। कारण यह है कि रात-बिरात ले जाते समय सड़क तक पहुँचते-पहुँचते चार से पाँच घण्टे लग जाना आम समय है। बुरांशी, ढूंग्या, गड़कोट, माल्डू भी ऐसे ही नज़दीकी गांव हैं।

ऐसा भी नहीं है कि गाँव की भौगोलिक स्थिति अच्छी नहीं है। बांज,बुरांश का गांव है। ठण्डी-ठण्डी हवा बहती है। सर्दियों में चार-साढ़े चार बजे तक अच्छी और गुनगुनी धूप रहती है। सुबह ही सूरज पहाड़ों से झांकता हुआ जगाने आ जाता है। गांव के ठीक ऊपर बांज का घना जंगल है। काफल के अलावा बहुमूल्य लकड़ी देने वाले सैकड़ों प्रजाति वृक्षांे से लदा वन है। लगभग सौ परिवारों के मकान हैं। लेकिन आम सुविधाओं के न होने से पलायन का रोग इसे भी लगा है। घर-दर-घर टूटता जा रहा है। बच्चे आठवीं तक पढ़ते -पढ़ते टूट जाते हैं। लड़किया जल्दी ब्याही जाती हैं। बच्चे कुव्यसनी हो जाते हैं। रहे-बचे ग्रामीण दो-जून की रोटी के लिए जरूरत से ज्यादा मशक्कत करते रह जाते हैं। कुपोषण नई पौध पर हावी है।

गांव में बकरी पालन है। हर घर में गाय-भैंस बंधी है लेकिन अपने गुजारे भर के लिए ही। अन्यथा हम तीन दिन अमूल का पैकेट जो 90 दिन तक भी खराब नहीं होता कि चाय न पीते। रात,सुबह और दिन भर एक ही लौकी की सब्जी नहीं खाते। हमारे लिए आलू भी 12 किलोमीटर दूर देवीखेत के बाजार से मंगाए गए थे। वो भी दूसरे दिन की शाम को हमें दिखाई दिए।

 ये कैसा बाज़ारवाद है? यह कैसा विकास है? सड़के आ रही हैं, लेकिन तब जब आजाद हुए साठ साल हो चुके हैं। गांव आधा खाली हो चुका है। शिक्षा की कमर टूट गई है। बच्चे पढ़ना चाहते हैं तो उनकी पहुँच में स्कूल ही नहीं है। खच्चर पालन,मुर्गी पालन, भेड़-बकरी पालन और मनरेगा की मजदूरी कितना चलाएगी। समूचा गांव बूढ़ों से भरा पड़ा है। नई पीढ़ी दूर शहरों में खप रही है। जो हैं तो वे कच्ची शराब की लत में हैं।

नागरिक कहते हैं कि मन नहीं करता वोट देने का। लेकिन क्या करें? वोट देने पर यह हाल है। वोट नहीं देंगे तो सरकार एक मात्र सरकारी स्कूल भी छीन लेगी। पटवारी के पास छह-छह गांव है। इन गांवों की दूरी इतनी है कि पटवारी एक-एक कर सभी गांव मंे जाने की सोचे तो उसे पन्द्रह दिन चाहिए। यमकेश्वर विधान सभा से अब तक चुने विधायकों और गढ़वाल संसदीय सीट के सांसदों ने आजादी के बाद अपनी निधि से कुछ छींटे इस ओर फेंके होते तो यह बुजुर्गों का बसाया हुआ सुन्दर गांव उजाड़ न होता।

यहाँ की दूर-दूर तक फैली पहाडि़यों के सीने काट-काट कर बने लेकिन बंजड़ खेत साक्षी हैं कि कभी यहाँ मौसमी फसलंे लहलहाती थी। क्या इस गांव के और इस जैसे सैकड़ों गांवों के दिन बहुरेंगे?

काश!   

जब मैंने अन्तिम मतदाता के रूप में वोट दिया.

लोक सभा चुनाव 2014 में मुझे मतदान अधिकारी प्रथम की जिम्मेदारी मिली। पहला प्रशिक्षण नितांत व्यक्तिगत होता है। चुनाव की सामान्य जानकारी और ई0वी0एम0 की तकनीकी जानकारी हर किसी मतदान अधिकारी प्रथम को स्वयं लेनी होती है। दूसरे प्रशिक्षण में पूरी टोली से परिचय होता है।
मोटर मार्ग से एक घण्टा पैदल चलने के बाद हमें खेड़ा गाँव यूँ दिखाई दिया। यहाँ पहुँचने में एक घण्टा और लगना था.
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  पीठासीन अधिकारी सुमित्रानन्दन यादव के साथ-साथ द्वितीय, तृतीय मतदान अधिकारी भी प्रशिक्षण लेते हैं। पीठासीन अधिकारी बावन की उम्र से अधिक के थे। मशीन को लेकर वे कुछ आशंकित लगे। 

दूसरे मतदान अधिकारी मुकेश जुयाल ने बताया कि वो चार-पांच चुनाव कर चुके हैं।

तृतीय मतदान अधिकारी आर0 मुंशी ऐसे थे कि वे रिटायर होने वाले हैं और उनकी पहली बार किसी चुनाव में ड्यूटी लगी थी।

  रवानगी के दौरान हमें दो सुरक्षाकर्मी मिले। पहला दसवीं पास कर चुका सौरभ बेरोजगार अब प्रांतीय रक्षक दल का सदस्य था। वह भी पहली बार ड्यूटी कर रहा था। दूसरे वन विभाग के वन आरक्षी जगमोहन थे। वह दो-तीन बार चुनाव करा चुके थे। ये ओर बात है कि सुरक्षा के नाम पर इन दोनों के पास डण्डा तक न था।

यात्रा के दौरान पता चल गया था कि मैं,पीठासीन अधिकारी और जगमोहन जी पेयव्यसनी  नहीं हैं।

यानि पचास फीसदी टीम सामान्य है। भोजनमाता का आवास मतदेय स्थल से बेहद दूर था, सो पटवारी जी ने खच्चर वाले सुशील को हमारे भोजन को बनाने की जिम्मेदारी दी। सुशील जी अपने साथ चाचा-भतीजा सहायक के रूप में लेकर हमारे सामने था। साठ रुपए एक डाइट-एक व्यक्ति का तय हुआ। कुल मिलाकर हम तीन रात और चार सुबह के लिए नौ लोग बेहद बीहड़, वीरान और आम सड़क से लगभग सात कि0मी0 दूर 1951 को स्थापित बुनियादी स्कूल में रहने को चल पड़े।

पता चला कि वे तीनों भी अपने पेय पदार्थ के साथ मोमबत्ती, माचिस, ढिबरी के साथ तैयार हैं। लगभग ढाई घण्टा पैदल चलकर हम शाम साढ़े छह बजे बुनियादी स्कूल खेड़ा पहुँच गए। मजे़दार बात यह थी कि खेड़ा गाँव ऊँचाई पर बसा है। यहाँ बाँज,बुराँश और काफल हैं। लेकिन बुनियादी स्कूल बेहद नीचे है। यहाँ अमरूद, आम के पेड़ हैं। खैर....इस पूरी टीम में भाँति-भाँति के हम लोग इकट्ठा हुए थे। खेड़ा के सुशील और उनके चाचा-भतीजा ग्रामीण परिवेश के सज्जन व्यक्ति थे। सुबह से शाम तक वे हमारे खाने-पीने की व्यवस्था में लगे रहे। लेकिन रात हुई और उनके स्वर बदल जाते। सुर भी सप्तम हो जाता। हम लोगों से उनका खूब बात करने का मन करता। 

खेड़ा गांव से बुनियादी स्कूल का खींचा फोटो यहां मतदेय स्थल हैं.
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मुंशी जी रिटायर होने वाले थे। दो शादी किए हुए थे। उनके पास किस्सों का भण्डार था। लेकिन सामने के चार दाँत न होने की वजह से वह देहाती में बोल क्या रहे हैं, पता ही नहीं चल पाता। उन्होंने खूब हँसाया। वे बुरी तरह डरे हुए थे कि चुनाव कैसे निपटेगा। उन्हें इस बात का बहुत दुख था कि वे घर से 2000 एम0एल0 की व्यवस्था कर चुके थे। लेकिन रवानगी से ठीक पहले उनके साथियों ने चुनाव में पेय पदार्थों के साथ ले जाने-सेवन करने पर रहने वाली रोक के सम्बन्ध में उन्हें इतना डरा क्यों दिया?

सौरभ अभी लड़का है। लेकिन वह जहाँ रहता है। वहाँ नयार बहती है। मछली पकड़ने का बढि़या धंधा वहाँ चलता है। यातायात भी बेहद रहता है। वह भविष्य में एक अच्छा व्यवसायी बन सकता है। बस उसे भी दुःख इस बात का है कि वह हाई स्कूल से आगे क्यों नहीं पढ़ सका। उसे भी हमारे साथ अच्छा लगा।

 मुकेश जुयाल 2005 से सरकारी सेवा में हैं। अति दुर्गम में कार्यरत हैं। हँसी-मजाक में सिद्धहस्त हैं। हर काम को आसानी से लेते हैं। किसी काम के प्रति गंभीरता उन्हें खलती है। वह हो जाएगा पर यकीन करते हैं। कैसे होगा? इस पर तनाव लेने से वे बचते हैं।

 पीठासीन अधिकारी बेहद अंतर्मुखी हैं। कम बोलते हैं। नित्य नहाने वाले, पूजा पाठ करने वाले और अल्पाहारी हैं। हाँ मेरी तरह चाय के शौकीन है। बस काम को करने में जल्दीबाजी नहीं दिखाते। हर काम में आवश्यकता से अधिक समय लेते हैं। बात में पता चला कि उत्तर प्रदेश का दैनिक ई पेपर जनमोर्चा में वे निरन्तर लिखते हैं।      

जगमोहन जी वन विभाग से हैं। कई जगह रहे हैं। जीव-जन्तुओं की उन्हें अच्छी जानकारी है। बहुत जल्दी बोलते हैं। समाज की अत्याधुनिकता से खिन्न हैं। लेकिन गौर से देखना और सबसे बाद में टिप्पणी करना उनकी विशेषता है। यह बात ओर है कि पहले दिन वे दिन भर सोते रहे। हालांकि वह दिन हमारे आराम का ही दिन था।

इस खेड़ा गाँव में हमें आर0पी0जुयाल मिले। वह बीएलओ भी थे। पिछले दस सालों से इस बुनियादी स्कूल में पढ़ा रहे हैं। खेड़ा गाँव में रहते हैं। 47 के हो चुके हैं। लेकिन पूरी तरह से चुस्त दुरुस्त। कारण। रोज़ाना गांव से इस बुनियादी स्कूल में पढ़ाने आना और फिर नन्हें-मुन्नों को वापिस गाँव ले जाना। हमारी टीम विविधताओं से भरी थी।

मतदान के दिन हम पाँच बजे उठ गए थे। साढ़े छह बजे तक हमने सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली थीं। सात बजे से छह बजे तक की ड्यूटी बड़े आराम से कटी। मतदान बावन फीसदी रहा। एक भी अवसर ऐसा नहीं आया, जब कहीं किसी प्रकार की कोई दिक्कत आई हो। बस एक मतदाता ऐसा आया था, जिसका नाम मतदाता सूची में तो था, लेकिन बीएलओ द्वारा जारी पर्ची भी उसने कहीं खो दी थी। वह अपनी पहचान के लिए उल्लिखित 11 दस्तवेजों में कोई भी दस्तावेज नहीं लाया।

हाँ ! मैंने भी इस बार मतदान किया। ईडीसी के माध्यम से। वह भी शाम को ठीक छह बजे।

बतौर अन्तिम मतदाता के रूप में। अच्छा लगा।
ये Post मुलाकात के सन्दर्भ में था। खेड़ा से जुड़ी बातें-यादें फिर कभी।    



02/05/2014

काश..... ! स्कूल जाने वाले दुनिया के बच्चे एक साथ हड़ताल कर दें.....


 स्कूल जाने का पहला दिन था। बस इतना ही याद है कि मेरा पहला शिक्षक एक अध्यापिका थी। बच्चे टाट-पट्टी पर बैठे हुए थे। मुझे भी वहीं बैठना था। अध्यापिका के माथे पर पूर्णमासी के चाँद सरीखी, बड़ी-सी लेकिन सूर्ख लाल बिन्दी चमक रही थी। सिर के बीचों-बीच लंबी माँग करीने से निकाली गई थी। माँग में लाल सिन्दुर दूर से ही चमक रहा था। अध्यापिका के हाथ हलके से हिलते तो चुडि़या खनखनाती हुई बज रही थीं। अध्यापिका ने रंग-बिरंगी साड़ी पहनी हुई थी। पैरों में चमकीली पाजेब भी उनके चलने पर बज उठती। 

            मैं घर से स्कूल कैसे गया? मेरे साथ कौन था? मैंने पहला अक्षर कैसे और कब सीखा था? मैंने पढ़ना कैसे सीखा? इन सवालों का जवाब मैं नहीं दे सकूँगा। कारण? कुछ भी याद नहीं। हाँ। इतना जरुर याद है कि स्कूल जाने से पहले मैं अपने दो बड़े भाईयों को स्कूल जाते हुए देखता था। शायद उन्हें स्कूल जाते हुए देखकर, मेरे मन में विद्यालय की केाई प्यारी-सी छवि बन गई होगी।

            शायद यही कारण रहा होगा कि मैं भी अपने दोनों बड़े भाईयों की तरह बिना चीखे-चिल्लाए और रोए स्कूल जाने के लिए सहर्ष तैयार हो गया हूँगा। विद्यालय में मेरी पहली पिटाई कब हुई? यह भी याद नहीं है। हाँ। इतना जरूर याद है कि मुझे अक्षर ज्ञान कराने वाली स्कूल में दो अध्यापिकाएँ थीं। हैडमास्टर सरदार थे। उनकी पगड़ी हर रोज रंग बदल देती थी। लेकिन वह केवल कक्षा पाँच को ही पढ़ाते थे।

दोनों अध्यापिकाओं के बच्चे भी हमारे सहपाठी थे। अक्सर हमारी अध्यापिकाएँ पिटाई की शुरुआत अपने बच्चों से ही करती थीं। कई बार तो ऐसा होता था कि सुबह बड़ी अध्यापिका अपने बच्चों को पीटती तो मध्यांतर के बाद छोटी वाली अध्यापिका अपने बच्चों पर टूट पड़तीं। मुझे अच्छे से याद है कि दोनों अध्यापिकाएँ जब पीटती थीं तो इतना पीटती थीं कि उनकी कलाई पर पहनी रंग-बिरंगी चूडि़या जिनमें हरी और लाल ज्यादा होती थीं, टूट जाया करती थीं। कई बार चूडि़याँ टूटते समय या तो उनके हाथों को जख़्मी कर देती थीं या जिसकी पिटाई हो रही है उसके गाल, कान, गले आदि में चूडि़यों के टूकड़ों से छिटपुट घाव हो जाया करते थे।

            विद्यालय में मेरी पहली पिटाई कब हुई थी? यह भी याद नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि मेरी स्कूल में पिटाई ही नहीं हुई। हुई है। लेकिन मैं अन्य सहपाठियों की तरह अधिक नहीं पीटा गया हूँ। उन दिनों बुनियादी स्कूल में अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती थी। मैंने अंग्रेजी के वर्ण कक्षा छह में जाकर सीखे। फिर भी बुनियादी स्कूल सज़ा का केन्द्र था। मन-मस्तिष्क में यह गहरे पैठ गया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, स्कूल तो जाना ही पड़ेगा। मैंने स्कूल न जाने का कभी बहाना नहीं बनाया। यह मुझे याद है।

            हमारा स्कूल बहुत दूर था। अक्सर देर से स्कूल पहुँचने वाले छात्रों की प्रातःकालीन सभा में ही पिटाई हुआ करती थी। सजा देने से पहले देर से आने छात्रों की अलग से लाईन बन जाती थी। प्रातःकालीन सभा की समाप्ति पर देर से आने वालों को छोड़कर अन्य छात्र अपनी-अपनी कक्षाओं में चले जाते थे। सज़ा देने की जिम्मेदारी हैडमास्साब की हुआ करती थी। वह इस बहाने कभी हथौड़े (स्कूल का घण्टा बजाने वाला लकड़ी का हथौड़ा) से सिर पर गुठली बना दिया करते थे। दो-दो लड़कियों की चुटिया बाँधकर गोल-गोल घुमाते थे। रिंगाल (बाँस की एक जंगली प्रजाति) की बेंत से कभी हाथों में तो कभी पुटठों पर पिटाई होती थी। लड़कों को मुर्गा बनाकर उनकी पीठ पर ईंट रख दी जाती थी। यदि ईंट गिर गई तो फिर बेंत से पिटाई हुआ करती थी। सबसे मारक पिटाई कण्डाली से होती थी। कण्डाली को बिच्छू घास भी कहा जाता है। हाथों और पैरों में इस घास को छुआया जाता था। कण्डाली के काँटे शरीर में चुभ जाते थे। जिस पर कण्डाली लगती थी, वह 'सूसूसूसू' की आवाज निकालता। झनझनाहट तो कई बार चैबीस घण्टे तक रहता था। 

अध्यापिकाएँ तो थप्पड़ों और मुक्कों से पिटाई किया करती थी। कभी-कभी वे तर्जनी और अनामिका के बीच पेंसिल रखकर जोर से दबाया करती थीं। तब अंगुलियों में तीव्र दर्द हुआ करता था। हम सब बुनियादी स्कूलों में टाट पट्टी पर ही बैठा करते थे। एक सज़ा यह भी हुआ करती थी कि खड़े रहो। मध्यांतर तक भी लगातार खड़ा रहना अजीब सा लगता था। यदि दीवार के सहारे पीट टेक ली तो मुर्गा बनने की दूसरी सजा मिल जाया करती थी।

कक्षा एक से पाँच तक का बुनियादी स्कूल नए प्रवेशित बच्चों को देखा-देखी बहुत कुछ सीखा देती है। वरिष्ठ छात्रों को पीटता देख कर नवागंतुक छात्र तो वैसे ही सहम जाते थे। तब यही मनावैज्ञानिक तरीका था कि बड़ी कक्षा के एक-दो बच्चों को पीट दो, छोटी कक्षा के बच्चे खुद-ब-खुद चुप हो जाएँगे।

            मेरे बुनियादी स्कूल में कक्षा एक और दो के छात्रों को एक साथ बिठाया जाता था। कक्षा तीन और चार के छात्रों को एक साथ और कक्षा पाँच के छात्र दूसरी कक्षा में बिठाए जाते थे। उन दिनों समूचा स्कूल दो या तीन कक्षों में ही सिमटा होता था। सुबह का घण्टा बजने से स्कूल की छुट्टी का घण्टा बजने तलक स्कूल प्रांगण में बहुत कुछ ऐसा घटता था, जो सबके सामने घटता था। कक्षा पाँच के छात्रों की पिटाई हो रही है तो कक्षा चार से लेकर कक्षा तीन के छात्र भी सतर्क हो जाया करते थे। कक्षा एक और दो के बच्चे आँखें फाड़-फाड़कर देखते थे। मानो किसी खेल का सीधा प्रसारण देख रहे हों।

मुझे लगता है कि दब्बू, डरपोक, संकोची, अंतर्मुखी बच्चे स्कूल में अग्रेतर छात्रों के साथ घट रही घटनाओं से सबक ले लिया करते हैं। मैं भी ऐसा ही करता था। बावजूद उसके सज़ा मुझे भी मिलती थी। 

            एक दिन देर से आने वाले छात्रों की पिटाई हो रही थी। मैं कक्षा से उचक कर देख रहा था। हैडमास्साब की नज़र मुझ पर पड़ गई। वे दौड़ते हुए आए और सीधे मेरे सिर पर हथौड़े की एक चोट की। चोट बहुत तेज तो न थी, लेकिन सिर पर एक गुठली तो बन ही गई थी। मुझे याद है कि वह मध्यांतर के बाद तक भी वह गुठली सिर पर कायम रही।

            एक बार की बात है। मध्यांतर हुआ। उन दिनों क्रिकेट खेल देखना रोमांचकारी अनुभव हुआ करता था। दो बड़ी कक्षाओं के सहपाठी मुझे अपने साथ मैच दिखाने ले गए। हम मैच देखने में इतना रम गए कि समय का आभास ही नहीं रहा। उन दिनों कलाई घड़ी भी आम नहीं हुआ करती थी। सूरज के ढलने और उगने के हिसाब से समय का अनुमान लगाया जाता था। दौड़-दौड़ कर स्कूल पहुँचे तो स्कूल में छुट्टी हो चुकी थी। हमारे बस्ते भीतर ही कैद हो गए थे। घर पहुँचे तो खूब डाँट पड़ी। अगले दिन स्कूल तो जाना ही था। स्कूल में पूरा दिन मुर्गा बना रहा। मध्यांतर में भी हम मुर्गा बना रहे। कमर और घुटनों में दर्द कई दिनों तक रहा।

            एक दिन हैडमास्साब नहीं थे। दूसरी अध्यापिका भी नहीं थीं। कक्षा पाँच को छोड़कर अन्य कक्षाएँ एक साथ बैठी थीं। हम छात्रों की बातचीत शोरगुल में बदल गई। फिर कलम, लंच बाॅक्स और किताबें हम एक-दूसरे पर उछालने लगे। हम टाटपट्टी में कक्षावार लाईन से बैठे हुए थे। मेरे आगे बैठे सहपाठी ने दूर बैठी किसी छात्रा के पिता का नाम लेकर उसे चिढ़ाया। छात्रा ने चिढ़कर छोटा सा पत्थर मेरे सहपाठी को निशाना बनाकर फेंका। ठीक मेरे आगे बैठा सहपाठी झुक गया। परिणामस्वरूप पत्थर मेरी बाँयी आँख के ठीक ऊपर माथे पर जा लगा।

‘‘खून-खून!’’ मेरा सहपाठी चिल्लाया। दो-तीन बच्चे अध्यापिका को बुला लाए। मेरी आसमानी कमीज और खाकी पैण्ट में खून की बूँदे टपक-टपक कर उन्हें बदरंग बना चुकी थी। अध्यापिका आईं। अध्यापिका ने मुझे पकड़कर पानी की टंकी के नीचे खड़ा कर दिया। मेरा सिर धोया। अपने साड़ी के पल्लू से मेरा सिर पोंछा। माँ की तरह दुलारा। खून था कि रुक ही नहीं रहा था। अध्यापिका दौड़कर किसी डाॅक्टर से रुई, डिटाॅल और पट्टी ले आईं। मेरी मरहम-पट्टी की।

मध्यांतर हुआ। अध्यापिका ने मुझे अपने घर से लाए पराँठा और मेथी-सौंप की खुशबू से भरा आम का आचार खिलाया। सब कुछ सामान्य होने के बाद सब अपनी-अपनी कक्षा में चले आए। उस छात्रा को अध्यापिका ने दूसरे कमरे में बुलाया। उसकी खूब पिटाई हुई। वह जोर-जोर से चिल्ला रही थी। रो रही थी। मुझे अजीब सा लग रहा था। पिट वो रही थी और डर मैं रहा था। घर जाकर मेरी पिटाई तय है। मैं यही सोच रहा था। लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ। घरवालों को मेरी आँख बच जाने से संतोष था। उस दिन के बाद शायद ही उस छात्रा ने मेरे साथ कभी बात की हो। लेकिन मेरे आगे बैठने वाला वह सहपाठी उस छात्रा को कई दिनों तक चिढ़ाता रहा। कहता रहा-‘‘ले। पत्थर दूँ। लगा निशाना। लगा-लगा।’’

            कक्षा पाँच में पहुँचा तो हैडमास्साब का फरमान सुना-‘‘सब निब वाले पैन से ही लिखेंगे। किसी के पास डाॅट पैन होगा तो मैं उठा कर फैंक दूँगा।’’ वे ऐसा ही करते। यदि कोई डाॅटपैन से लिखता हुआ दिखाई देता तो वे सबके सामने पैन के दो टूकड़े कर दिया करते थे।

एक दिन हैडमास्साब स्कूल में नहीं थे। हमारी कक्षा खाली थी। खाली दिमाग शैतान का घर होता ही है। किसी छात्र ने निब के पैन से स्याही छिड़क दी। मेरी कमीज पर उसके धब्बों ने विचित्र सा आकार बना दिया। मुझे गुस्सा आया। मैंने अपना पैन निकाला और जोर से छिड़क दिया। उसके धब्बे दूर तक नहीं जा पाए। तभी मेरे दूसरे सहपाठी ने अपनी हथेली में स्याही की शीशी रख ली। वह एक टाँग पर चलने लगा। शीशी प्लास्टिक की थी। वह लुढ़ककर दूसरे सहपाठी के सिर पर जाकर फैल गई। स्याही गले से कालर और फिर कमीज की यात्रा पर चल पड़ी। मैंने वह स्याही की शीशी उसके काॅलर से निकालने की कोशिश की ही थी कि हैडमास्साब आ गए।

बस फिर क्या था। उन्होंने आव न देखा ताव और मुझ पर बरस पड़े। सिर पर, गले में,  गालों में, कानों पर चटाचट थप्पड़ों की बारिश से मैं अपने घुटनों पर जाकर सिमट गया। तभी स्याही से भीगा छात्र बोला-‘‘सरजी। ये नहीं, वो था।’’

हैडमास्साब का हाथ हवा में ही रुक गया। जो होना था, वो तो हो चुका था। मैं पीटा जा चुका था। हैडमास्साब के होंठो के किनारों पर सफेद थूक जम चुका था। उनकी सांसें जोर-जोर से बाहर आने का आतुर थी। बड़ी-बड़ी आँखें लिए वह कक्षा से बाहर निकल गए। फिर बेंत लेकर आए। पहाड़ा पूछने के बहाने से फिर उस दिन समूची कक्षा न जाने कितनी बार पिटी। मैं फिर पीटा गया।

            कक्षा छह के लिए मुझे दूसरे स्कूल में भर्ती कराया गया। यहाँ आकर जैसे हम एक ही दिन में बहुत बड़े हो गए थे। हमें बैठने के लिए स्टूल और डैस्क जो मिले थे। हिन्दी पढ़ाने के लिए एक नई अध्यापिका आईं। वे जैसे ही श्यामपट्ट पर लिखने के लिए चाॅक घुमाती, सहपाठी 'हूहूहूहू' की आवाजें निकालते। मैडम झट से छात्रों की ओर मुड़ती, ताकि 'हूहूहूहू' करने वाले को पहचाना जा सके। ये रोज की बात होती। तब बगल की कक्षा के गुरुजी आते और सबको डाँट पड़ती। तब जाकर कुछ देर पढ़ाई शुरू होती।

             एक दिन मैडम ने पढ़ाया। अब श्यामपट्ट पर लिखाने की बारी थी। वे जैसे ही श्यामपट्ट की ओर बढ़ी। सहपाठी चिल्लाए। तभी मेरे दाँयी ओर बैठे सहपाठी ने अपने बाँए हाथ के अँगूठे और तर्जनी से मेरी दाँयी जाँघ पर तीव्रता से चूँटी काटी। मैं उठकर चीखा। मैडम ने समझा मैं भी 'हूहूहूहू' करने वालों में शामिल हूँ। वो तेजी से मेरी ओर बढ़ी। मैडम के हाथ में डॅस्टर था। वही डस्टर मेरे सिर पर दे मारा। मैंने प्रहार वाली जगह पर दोनों हथेलियाँ रखी और सीट पर झुक गया। ‘धम्म। धम्म।’ तीन-चार मुक्के मेरी पीठ पर जा पड़े। गुस्से में तमतमाई मैडम सीधे स्टाॅफ रूम में चली गई। ऐसे कई किस्से हैं, जब मैं अकारण भी पीटा गया।

            दो-दो साल बड़े दो भाई के बाद में तीसरा था। मेरी छोटी बहिन मुझसे दो साल छोटी थी। मुझ पर दो भाईयों की निगाहें हमेशा रहती थीं। मेरी निगाह अपनी छोटी बहिन पर रहती थीं। यही कारण था कि पढ़ना भले ही अरुचिकर रहा हो, पढ़ने स्कूल जाना मजबूरी थी। अन्यथा मेरा वश चलता तो मैं भी औरों की तरह स्कूल जाते समय किसी पेड़ या झाड़ी में जा छिपता और छुट्टी के समय घर लौटता। मेरा वश चलता तो मैं भी कभी पेट दर्द, तो कभी दाँत दर्द का बहाना बनाता। मेरा वश चलता तो बीच-बीच में स्कूूल से बंक मार लिया करता।

यह सब तो हो नहीं सका। लेकिन हर रोज स्कूल जाते समय यह डर तो बना रहता था कि कहीं आज स्कूल में पिटाई न हो जाए। पिटाई से बचने के लिए हर वादन में सतर्क रहना बेहद कठिन काम था। यह सब कारण स्कूल में बेमज़ा के परिणाम ही तो थे। काश ! स्कूल आनंददायी होते। आज भी अपवादस्वरूप स्कूल सज़ा देने के स्थल हैं। अधिकतर मामलों में ऐसी सज़ाएँ उसे दी जाती है, जो उन सजाओं को पाने के लिए जि़म्मेदार ही नहीं होता। ऐसी सजा जो किसी एक को मिलनी थी, समूची कक्षा को मिलती है। ऐसी सज़ा जो बेहद सूक्ष्म हो सकती थी, लेकिन वृहद रूप में मिलती है।

अपवादस्वरूप आज भी पूरी दुनिया में स्कूल ही ऐसा केन्द्र है, जहाँ दुनिया के समूचे अभिभावकों के संभवतः नब्बे फीसद बच्चे पढ़ते हैं। अभिभावक की नज़र में आज भी स्कूल उनकी आस्था का केन्द्र हैं। उन्हें लगता है कि उनका पाल्य स्कूल में घर के बाद सबसे ज्यादा सहज और सुरक्षित है। उन्हें लगता है कि उनका पाल्य बहुत कुछ स्कूल में ही सीख सकता है। लेकिन अधिकतर स्कूल आज भी स्कूल को सज़ा देने के भयावह केन्द्र के रूप में पाल-पोस रहे हैं।

            विद्यालय तमाम सज़ाओं का पोषण केन्द्र है। कुण्ठा पाल लेना सीखने का केन्द्र है। अत्याचार को चुपचाप सहन करने का अभ्यास केन्द्र है। चुप्पी साध लेने का प्रशिक्षण स्कूलों में ही दिया जाता है। आत्मकेन्द्रित हो जाने का घोल यहीं पिलाया जाता है। तमाम खतरे पाल्यों के मन-मस्तिष्क में जाने-अनजाने में ही सही स्कूल से ही प्रवेश कर लेते हैं। यह तमाम अमिट निशान फिर जिन्दगी भर शरीर का, मन का और स्वभाव का साथ देते हैं।

            अपने अनुभवों के आधार पर तो अब मैं यही कहूँगा कि विद्यालय में छात्रों को किसी भी प्रकार सजा नहीं दी जानी चाहिए। सजा को पहले विकल्प में तो कतई नहीं लिया जाना चाहिए। यह अन्तिम विकल्प भी नहीं है। न जाने कितने बालमन सज़ा पाने के बाद कभी जीवन के विद्यालय में सफल न हुए होंगे। सज़ा कभी सफलता का मार्ग नहीं सुझाती। उलट कई ग्रन्थियाँ बनाने को बाध्य करती है।

            मुझे मेरे स्कूली जीवन में जब-जब सजा मिली। जिस प्रकार की भी सजा मिली। भले ही मैं गलती पर था। जब मैं गलती पर नहीं था, तब भी। मैं घण्टों मिली जा चुकी,भुगती जा चुकी सजा के बारे में सोचता रहता था। कई-कई दिनों तक वह समूचा चित्र मेरी आँखों के सामने घूमता रहता था। सजा का वाकया बार-बार सोचकर मैं म नही मन कुढ़ता था। खुद पर खीजता था। मेरा बहुत अनमोल समय जाया हुआ होगा। मैं आज जो कुछ हूँ, उससे इतर मैं जो कुछ हो सकता था, उसके पीछे स्कूल में मिली सजा ही जिम्मेदार है। काश ! प्रत्येक स्कूल के एक-एक कक्षा कक्ष में अत्याधुनिक कैमरे लग जाएँ। प्रत्येक स्कूल की एक-एक गतिविधि सार्वजनिक होनी चाहिए। ताकि दुनिया का कोई भी शिक्षक जानबूझकर या अनजाने में बालमन के कोमल मन-मस्तिष्क को ठेस न पहुँचाए।

            सोचता हूँ यदि दुनिया का हर स्कूल जाने वाला बच्चा हड़ताल कर दे तो क्या होगा? दुनिया का हर स्कूल जाने वाला छात्र हमेशा के लिए स्कूल की ओर पीठ कर ले तो क्या होगा? दुनिया जीते-जी मर जाएगी। सोचता हूँ कि स्कूल में मिलने वाली सजा ने न जाने कितने बचपन की परोक्ष रूप से हत्या कर दी होगी। संभवतः कहीं भी, किसी के पास स्कूल में मिलने वाली सजा के परिणामों का लेखा-जोखा नहीं है।

लेकिन फिर भी, विद्यालय का कोई विकल्प नहीं है। आज भी विद्यालय में बच्चे समूह में सीखते हैं। भिन्न परिवार, पड़ोस और स्थलों के भिन्न-भिन्न बच्चों के बीच रहकर ही तो एक छात्र संघर्ष करता है। सीखता है। समझता है। सहभागिता, सहयोग, प्रेम, सहिष्णुता, भाईचारा आदि यहीं तो सीखता है।

  यही कारण है कि आज भी एक-एक विद्यालय चाहे वह कैसा भी है। कहीं भी है। भले ही वह मज़ा का केन्द्र नहीं बन पाया है, लेकिन एक-एक स्कूल की मौन बरसों से खड़ी दीवारें यही तो कहती हैं-‘‘कुछ बात तो है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।’’