31/12/2016

Folk and child literature लोक और बाल साहित्य manohar chamoli manu

लोक और बाल साहित्य 


-मनोहर चमोली ‘मनु’


उत्तराखण्ड का बाल साहित्य भी कला, संस्कृति और परंपरा की तरह अनूठा है। बेजोड़ भी है। यह लिखित से अधिक मौखिक-वाचिक परंपरा में अधिक समृद्ध रहा है। तब, जब पढ़ने का रिवाज़ ही खतरे में बताया जा रहा है। तब, जब वर्तमान उत्तराखण्ड के लोगों के बराबर एक और समाज अपने लोकजीवन सहित उत्तराखण्ड से बाहर रह रहा है। तब, जब उत्तराखण्ड में रह रहे बाशिंदांे में अधिकतर अंग्रेजियत के पक्षधर होते जा रहे हैं। ऐसी स्थितियों में कौन नहीं जानता कि अंग्रेजी ने जहां-जहां अपने पैर पसारे हैं, उसने मूलतः वहां का लोक और विश्वास तो लुप्त किया ही है। यह भी सही है कि उत्तराखण्ड का लोक इसीलिए भी खास और अनोखा है क्योंकि इस सर जमीं का लंबा चैड़ा इतिहास तो है ही साथ ही विदेशी संस्कृति का जनमानस किसी न किसी तौर पर यहां से जुड़ा रहा है।  
उत्तराखण्ड का रहा-बचा अधिकतर प्राचीन बाल साहित्य ज़बानी है और वह समय के साथ-साथ लुप्त होता जा रहा है। यह चिन्ता की बात है। अब तक लोक परंपरानुसार आंचलिक भाषाओं के अधिकाधिक प्रयोग से वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है, लेकिन अब यह भी पुरानी घुमन्तु पीढ़ीयों के गुजरने के साथ बीते समय की बात होता जा रहा है। 

हम सब जानते हैं कि ऋगवेद में उत्तराखण्ड हिमालय के इतिहास एवं संस्कृति के अल्प संकेत मिलते हैं। इसे सात सिन्धु प्रदेश मानने वालों का कहना है कि यही आर्यो का देश रहा है। शतपथ ब्राह्मण में इस प्रदेश का इतिहास एवं संस्कृति का सन्दर्भ मिलता है। शकुन्तलोपाख्यान भी इसी क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है। केदारखण्ड और मानसखण्ड का संबंध इसी भूमि से है। बौद्धों के पालि साहित्य का प्रभाव इस क्षेत्र में रहा है।राजतरंगिणी (1148 ई॰) में केदारमण्डल का उल्लेख मिलता है। विदेशी प्रभाव जिसमें खासकर चीनी, मुगल, यूरोपीय-पुर्तगाली यात्रियों का प्रवेश भी वहां के साहित्य को यहां लेकर आया। यही कारण है कि उत्तराखण्ड को साहित्य की उर्वरा भूमि कहा गया है। लोक साहित्य में वीर गाथाएं, लोक कथाएं और लोकगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी वाचिक परंपरा के अनुसार हस्तांतरित होता रहा है। 

आम तौर पर उत्तराखण्ड में पढ़ने-लिखने का माध्यम हिंदी भाषा ही रही है। राज-काज की भाषा का प्रभाव भी रहा तो राजे-रजवाड़ों की संस्कृति, आचार-व्यवहार और परम्राएं, तीज-त्योहार भी कथा-कहानियों का हिस्सा रहे हैं। सब जानते हैं कि उत्तराखण्ड का उल्लेख पुराणों में मिलता है। अंग्रेजों से पूर्व अनेक वंशजों का शासन राज्य के कई हिस्सों में रहा है। आबाद और गैर आबाद रहन-सहन के कारण भी यहां का लोक साहित्य वाचिक परंपरा के कारण हस्तांतरित होता रहा। श्रुत परंपरा के आधार पर संकलित साहित्य आगे बढ़ता रहा। देशकाल, परिस्थितियों और वातावरण पर दृष्टि डालने वाले मानते हैं कि सातवीं शताब्दी के पूर्व का लोकजीवन भी कथा-कहानियों में सुनने को मिलता है। जानकार बताते हैं कि कहानियों में इतनी विविधता है कि समग्रता से अध्ययन करने पर भी इसके आरंभ का सिरा पकड़ में नहीं आता। पुराणों की छाप तो इन कहानियों में मिलती ही है। इसके साथ-साथ राजा-रजवाड़ों का परिवेश भी कहानियों में शामिल है। पीढ़ी दर पीढ़ी वाचिक परंपरा के आधार पर सुनी जाती रहीं कहानियों के शिल्प और प्रवाह पर ध्यान देने से पता चलता है कि प्राचीन कहानियों में विदेशी लोक जीवन की महक भी मिलती है। 

कहानियों में इतने भाव, बोध, संवेग और संघर्ष शामिल हैं कि लगता है पहाड़ का लोक जीवन और लोक साहित्य का अध्ययन करने के लिए वर्षों का समय चाहिए। वृहद अनुसंधान के लिए चुनौतियां स्वीकार करने के लिए युवा साहस चााहिए। जीवन संघर्ष, युद्ध, वृहद प्रकृति, विदेशियों का आगमन, कृषि, वन्य जीव, पालतू पशु, राजशाही, राजदरबारी जीवन, विवाद, कचहरी, अपराध, आंदोलन, बेगारी, लूटपाट, राहजनी, हिमालय, सर्दी, गर्मी, बरसात पर बाल साहित्य-सा सुनने-पढ़ने को मिल जाएगा। जानकार मानते हैं कि हिंदी साहित्य जितना पुराना है, उतना ही पुराना बाल साहित्य है। 

पिछले एक शतक से ही साहित्य से बाल साहित्य को अलग करके देखने का नज़रिया बना है। अन्यथा प्राचीन समय में साहित्य से ही समय के अनुसार बाल मन को सुनाए जाने वाले लोक साहित्य से ही बच्चों का मनोरंजन किया जाता रहा है। मनोरंजन के साथ-साथ बच्चों में नैतिकता, साहस और आज्ञाकारिता का भाव भरने वाला लोक साहित्य भी मिलता है। जिसे बाल साहित्य के खांचे में भी रखा जा सकता है। उत्तराखण्ड के लोक साहित्य में बहुत सारा साहित्य बाल साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। भले ही इन रचनाओं का जन्म जिस काल के लोक ने किया हो, उन्होंने विशुद्ध रूप से बच्चों के मनोरंजनार्थ ये न रचा हो। लेकिन यह उतना ही प्राचीन है जितना मानव। यही कारण है कि लोक साहित्य में ऐसा साहित्य भी है जिसमें बालपन केन्द्र में है। दिलचस्प बात यह है कि इसे अधिकतर लोक कथा, लोक गाथाओं, वीर गाथाओं, लोकगीतों के तौर पर ही देखा जाता रहा है। ऐसा साहित्य विपुल मात्रा में है जिसकी छाप ग्रन्थों, पुराणों, पंचतंत्र, वेताल पचीसी, तिलस्म, भूत-प्रेत-डायन, परी, अंधविश्वास से मेल खाता प्रतीत होता है। लेकिन यह हमारे बीते लोक का हिस्सा है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता। जैसे चिट्ठी-पत्री बीते समय के हमारे लोक का हिस्सा रही है। आज वह नई सूचना तकनीक के आने से धीरे-धीरे हमारे गीतों, रोजमर्रा के हिस्सों से लुप्त होने लगी है। अब कोई यह नहीं कहता कि चिट्ठी लिखना। चिट्ठी भेजना। लेकिन क्या आगामी समय का समाज चिट्ठी-पत्री और डाकिया की कभी बात नहीं करेगा? 

समय के साथ-साथ पुरातन परंपरा का प्रवाह भले ही आज मंद हो गया हो। दूसरे शब्दों में थम गया हो या लुप्त हो गया हो। लेकिन वह बीते कल का हिस्सा तो माना ही जाएगा। यह भी तय है कि साधारण बच्चों के लिए साधारण जनजीवन के ताने-बाने में रचा लोक साहित्य ही बाल साहित्य ही है। आज बाल साहित्य की समझ यह भी इंगित करती है कि वह साहित्य बाल साहित्य कहां है जो बच्चों को बड़ा होने की दिशा में सहायक न हो। दिलचस्प बात यह है कि लोक कथाएं हों या बाल साहित्य, सभी में आदिकाल से अब तक के जीवन की छाप दिखाई देती है। उत्तराखण्ड का साहित्य इसीलिए भी विशिष्ट हो जाता है कि अब तक सुना और पढ़ा जाने वाला लोक साहित्य अन्य अंचलों में भी थोड़े बहुत संशोधन के साथ सुनने-पढ़ने को मिल जाता है। उत्तराखण्ड में लोक बाल साहित्य मौखिक है और अभी भी जिन्दा है। बस उसे संग्रहीत करने की आवश्यकता है। जहां यह भी सत्य है कि गांव-दर-गांव उजड़ते जा रहे हैं। लेकिन आज भी पहाड़ की संस्कृति और लोक का बहुत अधिक हिस्सा सामुदायिकता, सहभागिता और वाचिक परंपरा के चलते रहा-बचा है। 

समूची संस्कृति के अध्ययन के लिए यहां के लोक साहित्य का वृहद अध्ययन जरूरी हो जाता है। अभी तक उत्तराखण्ड के बाल साहित्य का समग्र रूप से लिखित संकलन नहीं हो सका है। घर-घर जाकर पाण्डुलिपियों को इकट्ठा करने का काम करना होगा। बड़े-बुजुर्गो के साथ बैठकर इसे सुनना होगा। कुछ लोरियां सुनने-पढ़ने को मिलती हैं। लोक कथाएं पढ़ने को मिलती हैं। लेकिन लोक बाल कथाओं का तो संकलन करना होगा ! बाल गीत असंख्य हैं। लेकिन लोक बाल गीतों का संकलन भी एक बड़ा काम होगा। बहुत सी लोरियों और लोकगीतों में भी बाल वर्णन मिलता है। लोक साहित्य में अप्रत्यक्ष तौर पर बच्चों को प्रकृति से प्रेम करने, पशु-पक्षियों से प्रेम करने, गलत संगत न करने पर अधिक बल दिया गया है। इस हेतु परियों, चुडै़लों, डायनों, भूतों और निरंकुश राजाओं का सहारा भी लिया गया है। बच्चों को बुराईयों से दूर रखना सबसे बड़ा मकसद नज़र आता है। इसके साथ-साथ मेहनत करने, सच्चाई का साथ देने, बड़ों का आदर करने, खेती-बाड़ी करने आदि पर जोर दिया गया है।

एक बात तो निश्चित है कि उत्तराखण्ड में श्रुति एवं स्मृति का अधिकाधिक प्रयोग होता रहा है। रचनाएं सैकड़ों की ज़बान से सुनती-सुनती बनती-बिगड़ती नए-नए रूप में आगे बढ़ती रही। यह आज तक जारी है। मुझे लगता है कि लोककथाओं और लोक साहित्य से बाल साहित्य को छांटा जा सकता है। इसे काल खंड के स्तर पर भी किया जा सकता है। यह भी संभव है कि यदि देशकाल और समय का आभास न हो रहा हो तो कथावस्तु के आधार पर हम इसे अलग श्रेणियों में बांट सकते हैं। मसलन रीति-रिवाज, खान-पान, अंधविश्वास, परंपरा, लोक जीवन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और यथार्थपरक बाल साहित्य तो अलग किया ही जा सकता है।         

गढ़वाल, कुमांऊं, जौनसार, बधाण, रवांई जौनपुर आदि क्षेत्रों में ‘तीलू रौतेली‘, ‘पंथ्या दादा‘, ‘रामी-बोराणी’ जैसे सच्चे प्रसंगों का अविस्मरणीय इतिहास है। लोककथाओं जैसे-‘चल तुमड़ी बाटे-बाट‘, ‘काफल पाको-मिन नि चाखो’ को याद करते हुए उसमें बाल मनोविज्ञान और बाल मनोव्यवहार के साथ-साथ बच्चों के साथ बड़ों के व्यवहार की पड़ताल नए सिरे से की जा सकती है। इस तरह का कोई विशेष और ठोस अध्ययन प्रकाश में नहीं आया है, जिसके आधार पर कहा जा सकता हो कि उत्तराखण्ड में बाल साहित्य की लिखित शुरूआत कब, कैसे और कहां से हुई है। 

पढ़ने-लिखने की समृद्ध परंपरा के बावजूद भी उत्तराखण्ड में बाल साहित्य को बचकाना साहित्य-फूहड़ साहित्य मानने वालों की कमी नहीं हैं। अपढ़ों का साहित्य कहने वाले इस बात से अनजान हैं कि बाल साहित्य रचना प्रौढ़ साहित्य की ही तरह है। बाल साहित्य अधिक परिश्रम मांगता है। बाल साहित्य को बचकाना साहित्य मानने वालों में अधिकतर वे हैं, जिन्होंने न स्वयं बाल साहित्य पढ़ा है न ही बच्चों को वे बाल साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करते दिखाई देते हैं। दिलचस्प बात यह है जब उनसे पत्र-पत्रिकाओं के बारे में चर्चा करेंगे तो पाएंगे वे दो-तीन पत्रिकाओं के नाम के अलावा कुछ भी नहीं बता सकंेगे। आखिरी बार बाल साहित्य कब पढ़ा? यह सवाल पूछे जाने पर वे इधर-उधर की बात करते नज़र आएंगे।

बाल साहित्य को प्रकाशित करने वाले पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो उत्तराखण्ड के अलमोड़ा से प्रकाशित नटखट सबसे प्राचीन बाल पत्रिका प्रकाश में आती है। हालांकि इसका एक भी अंक उपलब्ध नहीं है। बच्चों का नज़रिया, बच्चों का अख़बार, बाल प्रहरी, बाल बिगुल, सितारों से आगे बचपन, अंकुर आदि के अलावा कुछ संस्थाएं हैं जिन्होंने अनियतकालिक बाल पत्रिका-पत्र के सीमित अंक प्रकाशित किए। उत्तराखण्ड के बाल साहित्यकारों की रचनाओं में परीकथाएं, गुलीवर की यात्राएं, एलिस इन वंडरलैण्ड की छाप अधिक दिखाई पड़ती है। कई रचनाकार अभी भी लोककथाओं के फाॅरमेट से बाहर नहीं निकल सके हैं। वे आज भी साठ के दशक के बच्चों की मानिंद आज के बच्चों के लिए बाल साहित्य रच रहे हैं। यह हैरानी की बात है। हालांकि उत्तराखण्ड में उत्तराखण्ड बाल कल्याण साहित्य संस्थान, बाल साहित्य संस्थान, अल्मोड़ा, रूम टू रीड, प्रथम, भारत ज्ञान विज्ञान समिति, रूलक जैसी संस्थाओं ने बालसाहित्य विमर्श आरंभ किया है। इस विमर्श में बालसाहित्य को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से रचने की वकालत भी की गई है।

आज भी अधिकतर बाल साहित्यकार बच्चों के स्तर का लेखन करने में सक्षम नहीं हैं। वे उपदेश देने, बच्चों को सूचना और ज्ञान देने, आदेश और नसीहत देने से अधिक नहीं सोच पाए हैं। वह बच्चों को सदाचारी बनाने, आज्ञाकारी बनाने और राष्ट्र का सच्चा नागरिक बनाने पर तुले हुए हैं। अधिकतर बाल साहित्यकार मानते हैं कि बच्चों को आदर्शवादी बातें बताना ही बालसाहित्यकार का ध्येय होना चाहिए।

आज का समय सूचना तकनीक का है। तीन साल के बच्चे भी जानते हैं कि पेड़ चल नहीं सकते। ट्रेन को टाटा करने का फायदा नहीं क्योंकि वह टाटा के बदले टाटा नहीं कह सकती। वे जानते हैं कि चांद मामा नहीं हो सकता। फिर क्यो न हमारा बाल साहित्य दिशा देने वाला हो। बेहतर जीवन की बात करने वाला हो। बच्चों की दुनिया से जुड़ी बातें बाल साहित्य में हो। बच्चे जो पढ़ना चाहते हैं। बच्चे जो जानना चाहते हैं। साहित्य भी उसी के आस-पास रहे। बच्चों को गड़ा खजाना मिल सकता है। अलादीन का चिराग भी हो सकता है से इतर यथार्थ जीवन से परिचित कराया जाए। आखिरकार उसे इस यथार्थ जीवन में ही बड़ा होना है। फिर क्यों झूठी दुनिया उसे परोसी जाए?

हिंदी बाल साहित्य का लिखित आरंभ भारतेंदु युग से माना जाता है। उत्तराखण्डवासियों का पढ़ने-लिखने का माध्यम हिन्दी है। यही कारण है कि हम हिन्दी बाल साहित्य के आस-पास ही बाल साहित्य के विमर्श पर बात नए प्रतिमानों के हिसाब से बाल साहित्य की पड़ताल कर सकते हैं। उत्तराखण्ड में प्राचीन समय से लिखने वाले बाल साहित्यकारों का कालक्रम भी व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। आजादी से पहले और आजादी के बाद का बाल साहित्य व्यवस्थित किया जाना चाहिए। आजादी के बाद गौरा पंत शिवानी की बाल कहानी अल्मोड़ा से निकलने वाली बाल पत्रिका नटखट में छपी थी। मृणाल पाण्डे, रमेश चन्द्र शाह का बाल साहित्य पढ़ने को मिलता है। सत्तर और अस्सी के दशक की पीढ़ी से आज के बाल साहित्यकारों की लंबी सूची है। लोक जीवन के साथ-साथ यथार्थपरक बाल साहित्य रचनाकारों में अश्वघोष, अरुण बहुखंडी, अनीता चमोली ‘अनु’, आशा शैली, उमा तिवारी, उषा कटियार, कृष्ण शलभ, कमलेश जोशी ‘कमल’ कालिका प्रसाद सेमवाल,खुशाल सिंह खनी, गरिमा, जगदीश पंत, जगदीश जोशी, जीवन सिंह दानू, देवेन्द्र मेवाड़ी, दिनेश लखेड़ा, दीवान नगरकोटी, डाॅ॰ नन्द किशोर हटवाल, नवीन डिमरी ‘बादल‘, पुष्पा जोशी, प्रबोध उनियाल, प्रीतम अपच्छयाण, प्रमोद तिवारी, पंकज बिष्ट, प्रेम सिंह पापड़ा, प्रेमवल्लभ पुरोहित ‘राही’,पंकज बिष्ट, भगवत प्रसाद पाण्डेय, बद्री प्रसाद वर्मा ‘अनजान’, महावीर रंवाल्टा, मनोहर चमोली ‘मनु’ मदनमोहन पाण्डेय, मंजू पांडे ‘उदिता’, महेन्द्र ध्यानी, मथुरादत्त मठपाल, मनोज पांडे, मुकेश नौटियाल, महेन्द्र सिंह राणा, महेन्द्र प्रताप पाण्डे, माया जोशी, माया पांडे, रमेश चन्द्र  पन्त, रश्मि बड़थ्वाल, रतन सिंह किरमोलिया, रतनसिंह जौनसारी’, राजेश्वरी जोशी, राज सक्सेना ‘राज’, रावेन्द्र रवि, लक्ष्मण सिंह नेगी, रेखा रौतेला, विष्णुदत्त शास्त्री, विनिता जोशी वीरेन्द्र खंकरियाल, विमला जोशी, शशांक मिश्र ‘भारती’, हरिमोहन ‘मोहन’, खेमकरन सोमन, डाॅ॰ दीपा कांडपाल, डाॅ० नन्द किशोर हटवाल, डाॅ॰ महेन्द्र सिंह पांडेय, डाॅ॰ दिनेश चमोला शैलेश, डाॅ० उमेश चमोला, डाॅ॰ सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी,  डाॅ॰ यशोदा प्रसाद सेमल्टी, डाॅ० रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’  डाॅ० प्रभा पन्त, दयाशंकर नौटियाल, प्रकाश चन्द्र जोशी, बालेन्दु बडोला, भाष्करानंद डिमरी,  रमेश चन्द्र पंत, राजेश्वरी जोशी, शेरजंग गर्ग, शशि भूषण बडोनी, शांति प्रकाश ‘जिज्ञासु’,शशि शर्मा, संतोष किरौला, सरोजिनी कुकरेती, हंसा बिष्ट प्रमुख हैं।

उत्तराखण्ड के बाल साहित्यकारों को चाहिए कि वह साक्षरता दर में बेहतर स्थिति का लाभ उठाए। पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बचाए और बनाए रखने के लिए बेहतर बाल साहित्य का निर्माण करे। नए भाव बोध का साहित्य रचे। आखिर हम कब तक पचास के दशक के विषय, प्रकरण और प्रतीकों का इस्तेमाल करते रहेंगे। आए दिन हमारे साधन बदल रहे हैं फिर बाल साहित्य क्यों न बदले? ॰॰॰ 

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28/12/2016

Doon Literature Festival 2016 24-25 December 2016

साबित हुआ कि मरा नहीं है सब कुछ

 -मनोहर चमोली ‘मनु’

 साल दो हजार सोलह का अंतिम सप्ताह ‘दून साहित्य महोत्सव’ के नाम से लंबे समय तक याद किया जाएगा। द्रोण नगरी में यह पहला ऐतिहासिक मौका था जब जनपक्षीय सरोकार के पक्षधर कलमकार दो दिन जुटे। साहित्यका, पत्रकार, छायाकार, चित्रकार, पाठक और श्रोता के तौर पर इन दो दिनों में लगभग दो हजार आंखों का आंकड़ा आश्वस्त करता है कि पढ़ने-लिखने और सुनने समझने की आग अभी भी बाकी है। यदि मकसद मुनाफा और राजनीतिक संकीर्णता से परे हो तो आयोजन भले ही बहुत दूर हो तो भी जागरुक व संवेदनशील बुद्धिजीवी भी जुटते हैं और आम पाठकगण भी बिन बुलाए आ जाते हैं।

 यह आयोजन सिद्व करता है कि जनसरोकारों की चिंताएं भी विमर्श का हिस्सा बनती हैं और पाठक पढ़कर और सुनकर अपनी समझ का विस्तार भी करते हैं। दून पुस्तकालय एवं संस्कृति विभाग के सहयोग से सूबे में तेजी से अपनी धमक देने वाला प्रकाशक समय साक्ष्य ने इस आयोजन का जिम्मा लिया।

 दो दिवसीय साहित्यिक महोत्सव में ग्यारह सत्रों का सफल संचालन हुआ। अलग-अलग सत्रों को सुनने आए और दो दिवसीय पूर्ण आयोजन में जुटे श्रोता और दर्शकों का आंकड़ा एक हजार से भी आगे जा पहुंचा। पहले दिन के महत्वपूर्ण सत्रों में हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य और नया मीडिया, भूमण्डलीकरण और हिन्दी कहानी, हिन्दी कविता: चेतना और पक्षधरता, स्त्री और आधुनिकता, कवि और कविता के साथ खुले प्रागंण में पुस्तक मेला भी आयोजित हुआ।

दूसरे दिन लोक साहित्य: अतीत, वर्तमान और भविष्य, बाल साहित्य: चुनौतियां और संभावनाएं, बाज़ार, मीडिया और लोकतंत्र, कथेतर साहित्य: समय और समाज, आंचलिक साहित्यः चुनौतियां और संभावनाएं तथा सरला देवी: व्यावहारिक वेदान्त पर चर्चा हुई। इसी के साथ-साथ सुनील भट्ट कृत पुस्तक साहिर लुधियानवी की पुस्तक पर भी चर्चा हुई। भास्कर उप्रेती ने दिनेश कर्नाटक कृत पुस्तक मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां पुस्तक पर चर्चा की। दोनों दिन देर रात संचालित वृहद काव्य गोष्ठी भी श्रोता खूब जुटे। दोनों दिन कमल जोशी और भूमेश भारती की छायाचित्र प्रदर्शनी ने भी आयोजन में चार चांद लगाए। प्रख्यात चित्रकार बी॰मोहन नेगी की रेखाचित्र प्रदर्शनी ने भी विशिष्ट माहौल बनाया।

हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य और नया मीडिया सत्र का संचालन सुशील उपाध्याय ने किया। बतौर संचालन कर रहे सुशील उपाध्याय ने जन सरोकारों के साथ-साथ साहित्य के नामचीन नामों को याद किया तो इक्कीसवीं सदी के खतरों की ओर इशारा भी किया। प्रखर वक्ता एवं आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि भारत की औसत आयु पर गौर करें तो नौजवानों की दुनिया ही सामने आती है। लेकिन नौजवानों के लिए सबक और समझ बनाने वाला साहित्य हम रच पा रहे हैं? उन्होनें कहा कि आज सारा खेल भावनाओं का और झूठ का है। यह समय आहत हो रही भावनाओं का समय है। हम साहित्यकारों के साथ-साथ पाठकों और श्रोताओं को भी समझना होगा कि हम जिस समय में जी रहे हैं उस समय को समझने की भी आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि प्रतिक्रियावादी की निम्नतर सोच देखिए वह दूसरे की कही गई बात पर कुछ नहीं कहते वह बात कहने वाली की पहचान पर उतर जाते हैं। फिर चल पड़ता है जात, धर्म पर छंीटाकशी। उन्होने जोर देकर कहा कि चुनी हुई चुप्पियां, चुनी हुई चीखें और चुनौती के स्तर पर हमें समझना होगा कि हम सामथ्र्य के साथ मानवीय विवेक का प्रतिनिधित्व करें। उन्होंने कहा कि साहित्यकार किसी की उपेक्षा नहीं कर सकता। हमें जनपक्ष पर अपनी बात रखने का अधिकार है।

उन्होंने पूछा कि क्या बुद्धिजीवी होना अपराध हो गया है? शब्द ही है जो मनुष्य को मनुष्य बनाने की क्षमता रखता है। हम लेखक शब्दों के प्रयोग से ही शिक्षा समानता और शांति की बात करते हैं। बौद्धिक कर्म से जुड़ा होना आज की तारीख में अपराध हो गया है। लेकिन इस अपराध को करते रहने में ही हमारी सार्थकता है। हम और कर ही क्या सकते हैं। उन्होंने दण्डी का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने कहा था कि यदि शब्द और नाम न होते तो इस संसार में अंधेरा ही रहता।

 पुरुषोत्तम अग्रवाल जी ने कहा कि शब्द, संवेदना और ज्ञान को कलमकार ही बचाए और बनाए रख सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि एक ही वस्तु को देखने के लिए अलग अलग दृष्टियां हो सकती हैं। मेरी ही दृष्टि सही है। इस बात पर अड़ना गलत है। उन्होंने चेताया कि जानबूझकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि हम सूचनाओं के विस्फोट में उलझे रहें। हमारे पास सोचने का समय ही न रहे। स्मरण शक्ति को खत्म किया जा रहा है। समाज अब संक्षिप्त स्मृति में जीने की ओर बढ़ चला हैं। यह समय खतरनाक है। स्मृतिविहीन हो रहा जन। बुद्धि और तर्क से परे होती जा रही संवेदनाएं, सत्यातीत की ओर बढ़ता समाज। बस साहित्य ही है जो अपने भीतर सत्य को रखता है। भाषा ही है जो हमें बोध कराती है। साहित्य ही है जो सच दिखा सकता है। श्री अग्रवाल ने कहा कि अब वह इस बात की चिन्ता नहीं करते कि उनके लिखे को कौन पसंद करेगा और कौन नहीं। मेरे लिए कौन रोएगा, मैं नहीं जानता। बस मुझे अपना ध्येय पता होना चाहिए।

 इसी सत्र में बटरोही ने कहा कि हम पहाड़वासियों ने हिमालय की गोद में पहली सांस ली है। हमारे भाव और रचना प्रकृति की ही देन है। उन्होंने कहा कि साहित्य, कला और संस्कृति अपनी जड़ों से जुड़ने की यात्रा है। यह यात्रा जन सरोकारों की यात्रा हो। उन्होंने सवाल उठाया कि रचनाकार की सफलता क्या है? हमारी रचना किसी क्षेत्र की सरहद के भीतर रहती है या फैलती है। रचना लोकोन्मुखी होगी तो पंख पसारेगी। उन्होंने विदेशी धरती के कई उदाहरणों का संदर्भ भी दिया। क्षेत्रीयता और मातृभाषा की उन्होंने पुरजोर वकालत की।

 भूमण्डलीकरण और हिन्दी कहानी सत्र का संचालन अनिल कार्की ने किया। सुभाष पंत ने कहा कि हर युग में कहानी बदलती है। बदलना उसका स्वभाव है। प्रतिबद्ध लेखकों का दायित्व है कि वह देशकाल और परिस्थिति का सच कहानी के माध्यम से परोसे। हर एक अभिव्यक्ति कहानी ही है। उन्होंने कहा कि जिस तेजी से समाज बदल रहा है। बाजार बदल रहा है। दुनिया बदल रही है। यह सब हमारी कहानी का हिस्सा होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज यह समय है कि यदि कोई मध्यमवर्ग का इंसान कारपोरेट जगत के किसी अस्पताल में भर्ती हो जाए तो बीस दिनों में ही गरीबी रेखा के नीचे आ जाएगा। एक तो बाजार था कि जो आपको चाहिए वह बाजार में उपलब्ध है। आप अपने मुताबिक सामान ले लें। आज बाजार तय कर रहा है कि आप इसे लो। ले ही लो। मनुष्य आज चीज़ के रूप में परोसा जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह शुभ संकेत है कि पाठकों में साठ फीसदी पाठक महिलाएं हैं। हम सब जानते हैं कि आधी दुनिया पर काम, जिम्मेदारी की दोहरी भूमिका भी है। उन्होंने यह भी कहा कि रचनाकार को आत्ममुग्धता आगे नहीं बढ़ने देती। कहानियों की चमक में कहानीकार आगे नहीं बढ़ पाता। अपने बारे में और अपनी रचना के बारे में मिलने वाली प्रसन्नता कई बार कहानीकार को आगे नहीं बढ़ने देती। उन्होंने कहा कि संवेदनशील रचनाकार ही जीवन बचा सकता है। बचाता आया है। जीवन को बचाने का कारगर उपाय रचनाएं ही हैं।

संवेदना को बचाए और बनाए रखने के लिए कहानियां ही हैं जो हमें दर्पण दिखाने की ताकत रखती है। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि लिखना हमारी संवेदनशीलता है। छपना हमारा कौशल है। कहानियों का प्रचार हमारा मैनेजमेंट है। आज प्रचार अधिक है।

 जितेन ठाकुर ने कहा कि लेखक ही हैं जो हमारी दृष्टि विकसित करते हैं। परिवेश को समझते हैं। हालातों को करीब से देखते हैं। समाज के सामने लाते हैं। उन्होंने कहा कि भूख, बेकारी, लाचारी और भावपूर्ण कहानियां हर काल में अलग से रेखांकित होती रही है। आज सूचना तकनीक में कई बार अच्छी कहानियों की चर्चा पीछे रह जाती है और साधारण रचना प्रचार पा जाती है। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इस सत्र को कान्ता राॅय, मनीषा कुलश्रेष्ठ, दिव्य प्रकाश दुबे ने भी संबोधित किया।

 हिन्दी कविता चेतना और पक्षधरता का संचालन अरुण देव ने किया। लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि कविता का जन्म कथा कहने के लिए ही हुआ है। उन्होंने कहा कि कलमकार की भूमिका को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कविता में तुक मिलाना भी कविता मान लिया गया। तुक मिलाने के चलते कई बार बेतुकी बातें भी हुईं। उन्होंने कहा कि कविता एक से दूसरे की ओर नहीं ले जाती बल्कि दूसरे से दूसरे में जाने की परंपरा कविता है। यह गुणित अनुपात वृहद है। उन्होंने अपने विशाल अनुभवों के आलोक में भाषा, सौन्दर्य, लिपि, कविता के उद्देश्य पर भी दृष्टि डाली।

 राजेश सकलानी ने कहा कि चेतना हर समाज में प्रगतिशील ही होती है। हम अपने समय के सच को उजागर करते हुए समाज की भी चेतना जगाते हैं। शैलेय ने कहा कि हम सभी को वर्तमान समय के सच को सामने लाना चाहिए। अपनी चेतना और पक्षधरता को समाज के हित से ही देखना चाहिए। आशीष मिश्र ने कहा कि लोक जीवन का उभार ही हमारी चेतना का विषय नहीं हो पा रहे हैं। हमारा लोक हमसे दूर होता जा रहा है। गांव की तस्वीर धूमिल होती जा रही है। प्रतिभा कटियार ने कहा कि सवालों से लड़ना ही कवि का धर्म है। रचना हमें सोने नहीं देती। यह समाज के प्रति हमारी पक्षधरता है। इस सत्र में कविता के कई पक्षों पर विहंगम रूप से चर्चा हुई। अधिकतर वक्ताओं ने आज के समय को जटिल बताया और सतर्क रहना चेताया।

 स्त्री और आधुनिकता का संयोजन गीता गैरोला ने किया। शीबा असलम ने कहा कि नारीवादी आधुनिकता आयातित है। हम हमेशा से तर्क देते आए हैं कि प्रकृति ने ही महिला को दुर्बल बनाया है। जबकि यह सच नहीं है। औरतों की समस्याएं हर ओर एक जैसी नहीं है। उन्होंने कहा कि कमजोर उत्पादन हर जगह हारता है। आज भी महिला को प्रोडक्ट के तौर पर आगे रखा जाता है। हमारी अधिकतर परंपराएं महिला को कम करके आंकती रही हैं। आज महिला आंदोलन फैशन की तरह इकट्ठा होने के तौर पर देखे जाते रहे हैं।

 सुजाता तेवतिया ने कहा कि स्त्री पर बात करना कोई फनी नहीं है। रोमांटिक नहीं है। यह कहना कि आज की स्त्री कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। आधा सच ही है। आज भी अमूमन हर घर में एक सामन्तवादी सोच कायम है। उन्होंने कहा कि हर ओर ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि स्त्री को घर और घर के काम में निपुण होना प्राथमिक काम के तौर पर देखने की आदत बने। उसे रसोई और घर के काम को जीतने के लिए अप्रत्यक्ष तौर पर दौड़ाया जाता है। उन्होंने कहा कि एक महिला कांस्टेबल को ही लें। वह संघर्ष करती है। जनाना तो कभी मर्दाना बनती है। ऐसा पुरुष के साथ नहीं होता। उन्होंने कहा कि अधिकतर मामलों में घर के पुरुष ऐसा आवरण बना लेते है कि महिलाओं को यह लगे कि उसे क्या जरूरत धारा के विपरीत बहे। ज्यादा कष्ट उठाने की जरूरत नहीं है। यह सब योजनाबद्ध तरीके से चलता है।

उन्होंने कहा कि पहाड़ की महिलाओं के मुद्दे अलग हैं। दिल्ली की महिलाओं के मुद्दे अलग हैं। स्थानीय आवाज़ें मुद्दों के तौर पर सामने आनी चाहिए।

 गीता गैरोला ने कहा कि समानता के लिए सोचना और स्त्री हक के बारें में सोचना पूरे समाज की आवश्यकता है। पूरे समाज को सोचना होगा। महिला आंदोलन की अगुवा कमला पंत ने कहा कि कई सारे आंदोलन गवाह है कि वह बिना स्त्री के कभी सफल नहीं हो सकते थे। महिला से दूरी समाज से दूरी है। महिला को अलग खांचे में देखना गलत है। घर, गांव और परिवार से दूरी घातक है। आज भी महिला ही हर कुछ बचाए और बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। संघर्षरत है। उन्होंने कहा कि पूरे समाज का दायित्व है कि बातों को, विचारों को बांटे, तभी स्वस्थ समाज की स्थापना होगी।

 कवि और कविता की अध्यक्षता अतुल शर्मा ने की। स्वाति मेलकानी, रेखा चमोली, माया गोला, अंबर खरबंदा, मुनीश चन्द्र, राजेश आनन्द असीर, नदीम बर्नी, शादाब अली, प्रतिभा कटियार, सुभाष सहित बीस अन्य कवियों ने कविता पाठ किया।

 लोकसाहित्य अतीत वर्तमान और भविष्य का संयोजन उमेश चमोला ने किया। प्रभा पंत ने कहा कि हम सब लोक का हिस्सा हैं। जहां रचनाकार अनाम हो जाता है वहां वह रचना लोक की हो जाती है।

 प्रभात उप्रेती ने कहा कि लोक वह है जो हमें आनंद से भर दे। हमारे भीतर लोक बचा रहना चाहिए। प्रीतम अपच्छयाण ने कहा कि लोक में सामूहिकता ही लोक की ताकत है। नंद किशोर हटवाल ने लोक विमर्श को आज के सन्दर्भ में जोड़कर कहा कि साठ फीसदी लोक समय के साथ मौखिक परंपरा में होने के कारण लुप्त होने के कगार पर है। इसे कैसे बचाया जाए यह चिन्ता की बात है।

महावीर रंवाल्टा ने कहा कि साहित्य का प्राण तो लोक में है। हमें उसे सामने लाना चाहिए।

 बाल साहित्य चुनौतियां और संभावनाएं का संयोजन मनोहर चमोली मनु ने किया। राजेश उत्साही ने बाल साहित्य के विविध पक्षों पर विस्तार से बात की। राजेश उत्साही ने बाल साहित्य के विविध पक्षों पर विस्तार से बात की। 
उन्होंने जोर देकर कहा कि बाल साहित्य को अलग से खांचे में देखने के वे पक्षधर नहीं है। अच्छा हो कि हम ऐसा साहित्य रचें जो बच्चों को भी पसंद आए और बड़ों को भी। उन्होंने बच्चों के बालमन और बच्चों को पसंद आने साहित्य की भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने फेसबुक के साथ-साथ अन्य सूचना तकनीक के बढ़िया इस्तेमाल की बात भी कही। उन्होंने बच्चों के साहित्य को संवेदना के स्तर पर और मनोरंजन के स्तर पर पहली शर्त माना। 

दिनेश चमोला ने कहा कि यह पाठकों पर छोड़ देना चाहिए कि उन्हें क्या पसंद आ रहा है और क्या नहीं।

मुकेश नौटियाल ने कहा कि कल्पना के साथ-साथ हमें अब यर्थाथवादी साहित्य भी बच्चों के लिए लिखना होगा। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बच्चों के लिए रेखांकित साहित्य का सृजन करें।

शीशपाल ने कहा कि दुख इस बात का है कि आज भी बच्चों को अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। हम बड़े उन बच्चों की बात तक नहीं सुनते। घर हो या स्कूल, सब जगह यही हाल है। उन्होंने कहा कि बच्चों की अस्मिता की ओर ध्यान जाना अभी-अभी शुरू हुआ है।

उमेश चन्द्र सिरसवारी ने कहा कि माता-पिता भी बच्चों को पढ़ने लायक सामग्री देने से इतर अधिक खाने-पीने में खर्च करने की मानसिकता से नहीं उभर पाए हैं।


 मनोहर चमोली मनु ने कहा कि आनंद के साथ-साथ बच्चों में कल्पनाशक्ति का विस्तार करतीं और उन्हें संवेदनशील बनाती रचनाएं हर काल में पसंद की जाती रही हैं। उन्होंने कहा कि आदेश, निर्देश और उन्हें आदर्श नागरिक बनाने की तीव्र इच्छा को साहित्यकारों को छोड़ना होगा। उन्होंने कहा कि पूरी आबादी में बच्चों की संख्या के हिसाब से जो बाल साहित्य प्रकाशित हो रहा है वह बेहद कम है। विज्ञापन और टीवी ने बच्चों की अहमियत समझी है। पूरा बाजार बच्चों को भुना रहा है। लेकिन साहित्य ने पाठक के तौर पर बच्चों की उपेक्षा ही की है। हम यह कब समझेंगे कि यदि बच्चों में ही पढ़ने की ललक पैदा नहीं की जाएगी तो साहित्य के पाठक कहां से आएंगे। 

इस सत्र की अध्यक्षता उदय किरौला ने की। उन्होंने सबसे पहले वक्ताओं के विशेष कथनों को पुनः परिभाषित किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि बच्चों को स्पेस दिया जाना आज की सबसे बड़ी मांग है। बच्चों को खुश होता देख खिलखिलाता देख कौन प्रसन्न नहीं होगा। उन्होंने इस आयोजन पर बाल साहित्य को विमर्श का हिस्सा बताते हुए प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन बाल साहित्य की महिमा को भी रेखांकित करेंगे। 


बाल साहित्य से पूर्व लोक पर फोकस बाखली का लोकार्पण भी हुआ। इस अवसर पर संपादक गिरीश पाण्डेय 'प्रतीक' ने बाखली से जुड़ने का अनुरोध भी किया।

 बाजार मीडिया और लोकतंत्र का संयोजन भूपेन सिंह ने किया। कुशल कोठियाल ने कहा कि आज मीडिया को नकारात्मक ढंग से अधिक देखा जा रहा है। सुन्दर चन्द्र ठाकुर ने कहा कि मीडिया हर काल में सदैव सकारात्मक ही रहे, ऐसा नहीं कहा जा सकता लेकिन जनपक्षधर धर्म तो मीडिया का होना ही चाहिए।

सुशील उपाध्याय ने कहा कि चाहे कुछ भी हो लोकतंत्र को बचाए और बनाए रखने में मीडिया की भूमिका रही है और रहेगी। इस सत्र में त्रेपन सिंह ने भी अपने विचार रखे।

 कथेतर साहित्य समय और समाज सत्र को संबोधित करते हुए शेखर पाठक ने कहा कि विभिन्न विधाओं से इतर भी कई पुस्तकें और वर्णन जीवंत बन पड़े हैं। उन्हें पढ़ना रस घोलना जैसा होता है। उन्हें पढ़कर एक अलग तरह की अनुभूति होती ही है। देवेन मेवाड़ी ने कहा कि हम जो कुछ भी पढते है यदि वह सरल है सहज है। उसमें हमारे आस-पास की दुनिया समाहित है तो वह आनंद देता ही है।

उन्होंने वैज्ञानिक नज़रिए को भी सामने रखा। इस सत्र को एसपी सेमवाल ने भी संबोधित किया।  तापस ने भी अपने विचार रखे।

आंचलिक साहित्य चुनौतियां एवं संभावनाएं पर बोलते हुए रमाकांत बैंजवाल ने कहा कि हर भाषा का अपना महत्व है। कोई भी भाषा किसी दूसरी भाषा को कैसे मार सकती है। यह समझ से परे है। हर भाषा का अपना सौन्दर्य है। इसे बनाए और बचाए रखने का दायित्व उस समाज का भी है और साहित्यकारों का भी है।

 इस सत्र को अचलानंद जखमोला, देव सिंह पोखरिया, हयात सिंह, मदन मोहन डुकलाण, गिरीश सुन्द्रियाल और भारती पाण्डे ने संबोधित किया। दिलचस्प बात यह रही कि हर सत्र में श्रोताओं ने प्रश्न भी पूछे।

 दो दिन हुए सत्रवार विमर्शों में उपस्थित पाठकों, श्रोताओं और साहित्यकारों ने भी अपनी बात रखनी चाही लेकिन सधे हुए समय के चलते ऐसा संभव नहीं हो सका।

यह कहना जरूरी होगा कि सोचना आसान होता है। सोच को ज़मीन पर उतारना बेहद कठिन होता है। रानू बिष्ट, प्रवीन भट्ट, बी॰के॰ जोशी, एस॰ फारूख, सुमित्रा, भारती पांडे, योगेश भट्ट, अरुण कुकसाल, शेख अमीर अहमद, नन्द किशोर हटवाल, सुरेन्द्र पुण्डीर, संजय कोठियाल, कान्ता, बृज मोहन, सत्यानन्द बडोनी, मनोज इष्टवाल, गीता गैरोला सहित मसीही ध्यान केन्द्र के साथीगण सहित बीस से अधिक चेहरे ऐसे थे जो नेपथ्य में रहकर इस आयोजन को सफल बनाने में दिन-रात एक किए हुए थे। आयोजन से ठीक एक दिन पहले सोचा जा रहा था कि दून से बहुत दूर अस्सी के आस-पास श्रोता जुटेंगे। लेकिन यह क्या, अस्सी, सौ, दो सौ से लेकर दूसरे दिन यह संख्या एक हजार के आस-पास जा पहुुंची। पंजीकरण पंजिका को एक ओर रख दे ंतो सत्रों के हिसाब से आने वाले पाठक, अभिभावक, साहित्यकार, श्रोता, छात्रों की यह संख्या अनुमान के मुताबिक नहीं ही है।
च्लते-चलते उत्साही साथी इसे हर साल के दिसंबर में करने का मन बना रहे हैं। हालांकि यह कहना और लिखना जितना आसान है उस पर काम करना बेहद कठिन। लेकिन कठिनतम को सरलतम कराना और करना ही तो चुनौती है।

 चूंकि इस तरह की सामूहिक भागीदारी से हुआ आयोजन पहली बार हुआ। इस बार हुए आयोजन की खामियों से सबक़ लेकर फिर से ऐसा आयोजन और ठोस व व्यापक उद्देश्यों को पूरा कर सकेगा। यह आशा तो की ही जानी चाहिए। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एक बेहतरीन आरंभ इस आयोजन ने किया। यह आयोजन यह भी संकेत देता है कि पढ़ने-लिखने की संस्कृति को कोई खतरा नहीं है।

अलबत्ता इसकी समाजोन्मुखी दिशा पर चर्चा आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। यह भी कि इस पूरे आयोजन में तीन साल से सोलह साल के बच्चों की प्रतिभागिता भी देखने को मिली। यह सुखद संकेत तो कहा ही जा सकता है।
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 -मनोहर चमोली ‘मनु’
मोबाइल-09412158688