31/12/2016

Folk and child literature लोक और बाल साहित्य manohar chamoli manu

लोक और बाल साहित्य 


-मनोहर चमोली ‘मनु’


उत्तराखण्ड का बाल साहित्य भी कला, संस्कृति और परंपरा की तरह अनूठा है। बेजोड़ भी है। यह लिखित से अधिक मौखिक-वाचिक परंपरा में अधिक समृद्ध रहा है। तब, जब पढ़ने का रिवाज़ ही खतरे में बताया जा रहा है। तब, जब वर्तमान उत्तराखण्ड के लोगों के बराबर एक और समाज अपने लोकजीवन सहित उत्तराखण्ड से बाहर रह रहा है। तब, जब उत्तराखण्ड में रह रहे बाशिंदांे में अधिकतर अंग्रेजियत के पक्षधर होते जा रहे हैं। ऐसी स्थितियों में कौन नहीं जानता कि अंग्रेजी ने जहां-जहां अपने पैर पसारे हैं, उसने मूलतः वहां का लोक और विश्वास तो लुप्त किया ही है। यह भी सही है कि उत्तराखण्ड का लोक इसीलिए भी खास और अनोखा है क्योंकि इस सर जमीं का लंबा चैड़ा इतिहास तो है ही साथ ही विदेशी संस्कृति का जनमानस किसी न किसी तौर पर यहां से जुड़ा रहा है।  
उत्तराखण्ड का रहा-बचा अधिकतर प्राचीन बाल साहित्य ज़बानी है और वह समय के साथ-साथ लुप्त होता जा रहा है। यह चिन्ता की बात है। अब तक लोक परंपरानुसार आंचलिक भाषाओं के अधिकाधिक प्रयोग से वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है, लेकिन अब यह भी पुरानी घुमन्तु पीढ़ीयों के गुजरने के साथ बीते समय की बात होता जा रहा है। 

हम सब जानते हैं कि ऋगवेद में उत्तराखण्ड हिमालय के इतिहास एवं संस्कृति के अल्प संकेत मिलते हैं। इसे सात सिन्धु प्रदेश मानने वालों का कहना है कि यही आर्यो का देश रहा है। शतपथ ब्राह्मण में इस प्रदेश का इतिहास एवं संस्कृति का सन्दर्भ मिलता है। शकुन्तलोपाख्यान भी इसी क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है। केदारखण्ड और मानसखण्ड का संबंध इसी भूमि से है। बौद्धों के पालि साहित्य का प्रभाव इस क्षेत्र में रहा है।राजतरंगिणी (1148 ई॰) में केदारमण्डल का उल्लेख मिलता है। विदेशी प्रभाव जिसमें खासकर चीनी, मुगल, यूरोपीय-पुर्तगाली यात्रियों का प्रवेश भी वहां के साहित्य को यहां लेकर आया। यही कारण है कि उत्तराखण्ड को साहित्य की उर्वरा भूमि कहा गया है। लोक साहित्य में वीर गाथाएं, लोक कथाएं और लोकगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी वाचिक परंपरा के अनुसार हस्तांतरित होता रहा है। 

आम तौर पर उत्तराखण्ड में पढ़ने-लिखने का माध्यम हिंदी भाषा ही रही है। राज-काज की भाषा का प्रभाव भी रहा तो राजे-रजवाड़ों की संस्कृति, आचार-व्यवहार और परम्राएं, तीज-त्योहार भी कथा-कहानियों का हिस्सा रहे हैं। सब जानते हैं कि उत्तराखण्ड का उल्लेख पुराणों में मिलता है। अंग्रेजों से पूर्व अनेक वंशजों का शासन राज्य के कई हिस्सों में रहा है। आबाद और गैर आबाद रहन-सहन के कारण भी यहां का लोक साहित्य वाचिक परंपरा के कारण हस्तांतरित होता रहा। श्रुत परंपरा के आधार पर संकलित साहित्य आगे बढ़ता रहा। देशकाल, परिस्थितियों और वातावरण पर दृष्टि डालने वाले मानते हैं कि सातवीं शताब्दी के पूर्व का लोकजीवन भी कथा-कहानियों में सुनने को मिलता है। जानकार बताते हैं कि कहानियों में इतनी विविधता है कि समग्रता से अध्ययन करने पर भी इसके आरंभ का सिरा पकड़ में नहीं आता। पुराणों की छाप तो इन कहानियों में मिलती ही है। इसके साथ-साथ राजा-रजवाड़ों का परिवेश भी कहानियों में शामिल है। पीढ़ी दर पीढ़ी वाचिक परंपरा के आधार पर सुनी जाती रहीं कहानियों के शिल्प और प्रवाह पर ध्यान देने से पता चलता है कि प्राचीन कहानियों में विदेशी लोक जीवन की महक भी मिलती है। 

कहानियों में इतने भाव, बोध, संवेग और संघर्ष शामिल हैं कि लगता है पहाड़ का लोक जीवन और लोक साहित्य का अध्ययन करने के लिए वर्षों का समय चाहिए। वृहद अनुसंधान के लिए चुनौतियां स्वीकार करने के लिए युवा साहस चााहिए। जीवन संघर्ष, युद्ध, वृहद प्रकृति, विदेशियों का आगमन, कृषि, वन्य जीव, पालतू पशु, राजशाही, राजदरबारी जीवन, विवाद, कचहरी, अपराध, आंदोलन, बेगारी, लूटपाट, राहजनी, हिमालय, सर्दी, गर्मी, बरसात पर बाल साहित्य-सा सुनने-पढ़ने को मिल जाएगा। जानकार मानते हैं कि हिंदी साहित्य जितना पुराना है, उतना ही पुराना बाल साहित्य है। 

पिछले एक शतक से ही साहित्य से बाल साहित्य को अलग करके देखने का नज़रिया बना है। अन्यथा प्राचीन समय में साहित्य से ही समय के अनुसार बाल मन को सुनाए जाने वाले लोक साहित्य से ही बच्चों का मनोरंजन किया जाता रहा है। मनोरंजन के साथ-साथ बच्चों में नैतिकता, साहस और आज्ञाकारिता का भाव भरने वाला लोक साहित्य भी मिलता है। जिसे बाल साहित्य के खांचे में भी रखा जा सकता है। उत्तराखण्ड के लोक साहित्य में बहुत सारा साहित्य बाल साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। भले ही इन रचनाओं का जन्म जिस काल के लोक ने किया हो, उन्होंने विशुद्ध रूप से बच्चों के मनोरंजनार्थ ये न रचा हो। लेकिन यह उतना ही प्राचीन है जितना मानव। यही कारण है कि लोक साहित्य में ऐसा साहित्य भी है जिसमें बालपन केन्द्र में है। दिलचस्प बात यह है कि इसे अधिकतर लोक कथा, लोक गाथाओं, वीर गाथाओं, लोकगीतों के तौर पर ही देखा जाता रहा है। ऐसा साहित्य विपुल मात्रा में है जिसकी छाप ग्रन्थों, पुराणों, पंचतंत्र, वेताल पचीसी, तिलस्म, भूत-प्रेत-डायन, परी, अंधविश्वास से मेल खाता प्रतीत होता है। लेकिन यह हमारे बीते लोक का हिस्सा है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता। जैसे चिट्ठी-पत्री बीते समय के हमारे लोक का हिस्सा रही है। आज वह नई सूचना तकनीक के आने से धीरे-धीरे हमारे गीतों, रोजमर्रा के हिस्सों से लुप्त होने लगी है। अब कोई यह नहीं कहता कि चिट्ठी लिखना। चिट्ठी भेजना। लेकिन क्या आगामी समय का समाज चिट्ठी-पत्री और डाकिया की कभी बात नहीं करेगा? 

समय के साथ-साथ पुरातन परंपरा का प्रवाह भले ही आज मंद हो गया हो। दूसरे शब्दों में थम गया हो या लुप्त हो गया हो। लेकिन वह बीते कल का हिस्सा तो माना ही जाएगा। यह भी तय है कि साधारण बच्चों के लिए साधारण जनजीवन के ताने-बाने में रचा लोक साहित्य ही बाल साहित्य ही है। आज बाल साहित्य की समझ यह भी इंगित करती है कि वह साहित्य बाल साहित्य कहां है जो बच्चों को बड़ा होने की दिशा में सहायक न हो। दिलचस्प बात यह है कि लोक कथाएं हों या बाल साहित्य, सभी में आदिकाल से अब तक के जीवन की छाप दिखाई देती है। उत्तराखण्ड का साहित्य इसीलिए भी विशिष्ट हो जाता है कि अब तक सुना और पढ़ा जाने वाला लोक साहित्य अन्य अंचलों में भी थोड़े बहुत संशोधन के साथ सुनने-पढ़ने को मिल जाता है। उत्तराखण्ड में लोक बाल साहित्य मौखिक है और अभी भी जिन्दा है। बस उसे संग्रहीत करने की आवश्यकता है। जहां यह भी सत्य है कि गांव-दर-गांव उजड़ते जा रहे हैं। लेकिन आज भी पहाड़ की संस्कृति और लोक का बहुत अधिक हिस्सा सामुदायिकता, सहभागिता और वाचिक परंपरा के चलते रहा-बचा है। 

समूची संस्कृति के अध्ययन के लिए यहां के लोक साहित्य का वृहद अध्ययन जरूरी हो जाता है। अभी तक उत्तराखण्ड के बाल साहित्य का समग्र रूप से लिखित संकलन नहीं हो सका है। घर-घर जाकर पाण्डुलिपियों को इकट्ठा करने का काम करना होगा। बड़े-बुजुर्गो के साथ बैठकर इसे सुनना होगा। कुछ लोरियां सुनने-पढ़ने को मिलती हैं। लोक कथाएं पढ़ने को मिलती हैं। लेकिन लोक बाल कथाओं का तो संकलन करना होगा ! बाल गीत असंख्य हैं। लेकिन लोक बाल गीतों का संकलन भी एक बड़ा काम होगा। बहुत सी लोरियों और लोकगीतों में भी बाल वर्णन मिलता है। लोक साहित्य में अप्रत्यक्ष तौर पर बच्चों को प्रकृति से प्रेम करने, पशु-पक्षियों से प्रेम करने, गलत संगत न करने पर अधिक बल दिया गया है। इस हेतु परियों, चुडै़लों, डायनों, भूतों और निरंकुश राजाओं का सहारा भी लिया गया है। बच्चों को बुराईयों से दूर रखना सबसे बड़ा मकसद नज़र आता है। इसके साथ-साथ मेहनत करने, सच्चाई का साथ देने, बड़ों का आदर करने, खेती-बाड़ी करने आदि पर जोर दिया गया है।

एक बात तो निश्चित है कि उत्तराखण्ड में श्रुति एवं स्मृति का अधिकाधिक प्रयोग होता रहा है। रचनाएं सैकड़ों की ज़बान से सुनती-सुनती बनती-बिगड़ती नए-नए रूप में आगे बढ़ती रही। यह आज तक जारी है। मुझे लगता है कि लोककथाओं और लोक साहित्य से बाल साहित्य को छांटा जा सकता है। इसे काल खंड के स्तर पर भी किया जा सकता है। यह भी संभव है कि यदि देशकाल और समय का आभास न हो रहा हो तो कथावस्तु के आधार पर हम इसे अलग श्रेणियों में बांट सकते हैं। मसलन रीति-रिवाज, खान-पान, अंधविश्वास, परंपरा, लोक जीवन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और यथार्थपरक बाल साहित्य तो अलग किया ही जा सकता है।         

गढ़वाल, कुमांऊं, जौनसार, बधाण, रवांई जौनपुर आदि क्षेत्रों में ‘तीलू रौतेली‘, ‘पंथ्या दादा‘, ‘रामी-बोराणी’ जैसे सच्चे प्रसंगों का अविस्मरणीय इतिहास है। लोककथाओं जैसे-‘चल तुमड़ी बाटे-बाट‘, ‘काफल पाको-मिन नि चाखो’ को याद करते हुए उसमें बाल मनोविज्ञान और बाल मनोव्यवहार के साथ-साथ बच्चों के साथ बड़ों के व्यवहार की पड़ताल नए सिरे से की जा सकती है। इस तरह का कोई विशेष और ठोस अध्ययन प्रकाश में नहीं आया है, जिसके आधार पर कहा जा सकता हो कि उत्तराखण्ड में बाल साहित्य की लिखित शुरूआत कब, कैसे और कहां से हुई है। 

पढ़ने-लिखने की समृद्ध परंपरा के बावजूद भी उत्तराखण्ड में बाल साहित्य को बचकाना साहित्य-फूहड़ साहित्य मानने वालों की कमी नहीं हैं। अपढ़ों का साहित्य कहने वाले इस बात से अनजान हैं कि बाल साहित्य रचना प्रौढ़ साहित्य की ही तरह है। बाल साहित्य अधिक परिश्रम मांगता है। बाल साहित्य को बचकाना साहित्य मानने वालों में अधिकतर वे हैं, जिन्होंने न स्वयं बाल साहित्य पढ़ा है न ही बच्चों को वे बाल साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करते दिखाई देते हैं। दिलचस्प बात यह है जब उनसे पत्र-पत्रिकाओं के बारे में चर्चा करेंगे तो पाएंगे वे दो-तीन पत्रिकाओं के नाम के अलावा कुछ भी नहीं बता सकंेगे। आखिरी बार बाल साहित्य कब पढ़ा? यह सवाल पूछे जाने पर वे इधर-उधर की बात करते नज़र आएंगे।

बाल साहित्य को प्रकाशित करने वाले पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो उत्तराखण्ड के अलमोड़ा से प्रकाशित नटखट सबसे प्राचीन बाल पत्रिका प्रकाश में आती है। हालांकि इसका एक भी अंक उपलब्ध नहीं है। बच्चों का नज़रिया, बच्चों का अख़बार, बाल प्रहरी, बाल बिगुल, सितारों से आगे बचपन, अंकुर आदि के अलावा कुछ संस्थाएं हैं जिन्होंने अनियतकालिक बाल पत्रिका-पत्र के सीमित अंक प्रकाशित किए। उत्तराखण्ड के बाल साहित्यकारों की रचनाओं में परीकथाएं, गुलीवर की यात्राएं, एलिस इन वंडरलैण्ड की छाप अधिक दिखाई पड़ती है। कई रचनाकार अभी भी लोककथाओं के फाॅरमेट से बाहर नहीं निकल सके हैं। वे आज भी साठ के दशक के बच्चों की मानिंद आज के बच्चों के लिए बाल साहित्य रच रहे हैं। यह हैरानी की बात है। हालांकि उत्तराखण्ड में उत्तराखण्ड बाल कल्याण साहित्य संस्थान, बाल साहित्य संस्थान, अल्मोड़ा, रूम टू रीड, प्रथम, भारत ज्ञान विज्ञान समिति, रूलक जैसी संस्थाओं ने बालसाहित्य विमर्श आरंभ किया है। इस विमर्श में बालसाहित्य को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से रचने की वकालत भी की गई है।

आज भी अधिकतर बाल साहित्यकार बच्चों के स्तर का लेखन करने में सक्षम नहीं हैं। वे उपदेश देने, बच्चों को सूचना और ज्ञान देने, आदेश और नसीहत देने से अधिक नहीं सोच पाए हैं। वह बच्चों को सदाचारी बनाने, आज्ञाकारी बनाने और राष्ट्र का सच्चा नागरिक बनाने पर तुले हुए हैं। अधिकतर बाल साहित्यकार मानते हैं कि बच्चों को आदर्शवादी बातें बताना ही बालसाहित्यकार का ध्येय होना चाहिए।

आज का समय सूचना तकनीक का है। तीन साल के बच्चे भी जानते हैं कि पेड़ चल नहीं सकते। ट्रेन को टाटा करने का फायदा नहीं क्योंकि वह टाटा के बदले टाटा नहीं कह सकती। वे जानते हैं कि चांद मामा नहीं हो सकता। फिर क्यो न हमारा बाल साहित्य दिशा देने वाला हो। बेहतर जीवन की बात करने वाला हो। बच्चों की दुनिया से जुड़ी बातें बाल साहित्य में हो। बच्चे जो पढ़ना चाहते हैं। बच्चे जो जानना चाहते हैं। साहित्य भी उसी के आस-पास रहे। बच्चों को गड़ा खजाना मिल सकता है। अलादीन का चिराग भी हो सकता है से इतर यथार्थ जीवन से परिचित कराया जाए। आखिरकार उसे इस यथार्थ जीवन में ही बड़ा होना है। फिर क्यों झूठी दुनिया उसे परोसी जाए?

हिंदी बाल साहित्य का लिखित आरंभ भारतेंदु युग से माना जाता है। उत्तराखण्डवासियों का पढ़ने-लिखने का माध्यम हिन्दी है। यही कारण है कि हम हिन्दी बाल साहित्य के आस-पास ही बाल साहित्य के विमर्श पर बात नए प्रतिमानों के हिसाब से बाल साहित्य की पड़ताल कर सकते हैं। उत्तराखण्ड में प्राचीन समय से लिखने वाले बाल साहित्यकारों का कालक्रम भी व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। आजादी से पहले और आजादी के बाद का बाल साहित्य व्यवस्थित किया जाना चाहिए। आजादी के बाद गौरा पंत शिवानी की बाल कहानी अल्मोड़ा से निकलने वाली बाल पत्रिका नटखट में छपी थी। मृणाल पाण्डे, रमेश चन्द्र शाह का बाल साहित्य पढ़ने को मिलता है। सत्तर और अस्सी के दशक की पीढ़ी से आज के बाल साहित्यकारों की लंबी सूची है। लोक जीवन के साथ-साथ यथार्थपरक बाल साहित्य रचनाकारों में अश्वघोष, अरुण बहुखंडी, अनीता चमोली ‘अनु’, आशा शैली, उमा तिवारी, उषा कटियार, कृष्ण शलभ, कमलेश जोशी ‘कमल’ कालिका प्रसाद सेमवाल,खुशाल सिंह खनी, गरिमा, जगदीश पंत, जगदीश जोशी, जीवन सिंह दानू, देवेन्द्र मेवाड़ी, दिनेश लखेड़ा, दीवान नगरकोटी, डाॅ॰ नन्द किशोर हटवाल, नवीन डिमरी ‘बादल‘, पुष्पा जोशी, प्रबोध उनियाल, प्रीतम अपच्छयाण, प्रमोद तिवारी, पंकज बिष्ट, प्रेम सिंह पापड़ा, प्रेमवल्लभ पुरोहित ‘राही’,पंकज बिष्ट, भगवत प्रसाद पाण्डेय, बद्री प्रसाद वर्मा ‘अनजान’, महावीर रंवाल्टा, मनोहर चमोली ‘मनु’ मदनमोहन पाण्डेय, मंजू पांडे ‘उदिता’, महेन्द्र ध्यानी, मथुरादत्त मठपाल, मनोज पांडे, मुकेश नौटियाल, महेन्द्र सिंह राणा, महेन्द्र प्रताप पाण्डे, माया जोशी, माया पांडे, रमेश चन्द्र  पन्त, रश्मि बड़थ्वाल, रतन सिंह किरमोलिया, रतनसिंह जौनसारी’, राजेश्वरी जोशी, राज सक्सेना ‘राज’, रावेन्द्र रवि, लक्ष्मण सिंह नेगी, रेखा रौतेला, विष्णुदत्त शास्त्री, विनिता जोशी वीरेन्द्र खंकरियाल, विमला जोशी, शशांक मिश्र ‘भारती’, हरिमोहन ‘मोहन’, खेमकरन सोमन, डाॅ॰ दीपा कांडपाल, डाॅ० नन्द किशोर हटवाल, डाॅ॰ महेन्द्र सिंह पांडेय, डाॅ॰ दिनेश चमोला शैलेश, डाॅ० उमेश चमोला, डाॅ॰ सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी,  डाॅ॰ यशोदा प्रसाद सेमल्टी, डाॅ० रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’  डाॅ० प्रभा पन्त, दयाशंकर नौटियाल, प्रकाश चन्द्र जोशी, बालेन्दु बडोला, भाष्करानंद डिमरी,  रमेश चन्द्र पंत, राजेश्वरी जोशी, शेरजंग गर्ग, शशि भूषण बडोनी, शांति प्रकाश ‘जिज्ञासु’,शशि शर्मा, संतोष किरौला, सरोजिनी कुकरेती, हंसा बिष्ट प्रमुख हैं।

उत्तराखण्ड के बाल साहित्यकारों को चाहिए कि वह साक्षरता दर में बेहतर स्थिति का लाभ उठाए। पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बचाए और बनाए रखने के लिए बेहतर बाल साहित्य का निर्माण करे। नए भाव बोध का साहित्य रचे। आखिर हम कब तक पचास के दशक के विषय, प्रकरण और प्रतीकों का इस्तेमाल करते रहेंगे। आए दिन हमारे साधन बदल रहे हैं फिर बाल साहित्य क्यों न बदले? ॰॰॰ 

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28/12/2016

Doon Literature Festival 2016 24-25 December 2016

साबित हुआ कि मरा नहीं है सब कुछ

 -मनोहर चमोली ‘मनु’

 साल दो हजार सोलह का अंतिम सप्ताह ‘दून साहित्य महोत्सव’ के नाम से लंबे समय तक याद किया जाएगा। द्रोण नगरी में यह पहला ऐतिहासिक मौका था जब जनपक्षीय सरोकार के पक्षधर कलमकार दो दिन जुटे। साहित्यका, पत्रकार, छायाकार, चित्रकार, पाठक और श्रोता के तौर पर इन दो दिनों में लगभग दो हजार आंखों का आंकड़ा आश्वस्त करता है कि पढ़ने-लिखने और सुनने समझने की आग अभी भी बाकी है। यदि मकसद मुनाफा और राजनीतिक संकीर्णता से परे हो तो आयोजन भले ही बहुत दूर हो तो भी जागरुक व संवेदनशील बुद्धिजीवी भी जुटते हैं और आम पाठकगण भी बिन बुलाए आ जाते हैं।

 यह आयोजन सिद्व करता है कि जनसरोकारों की चिंताएं भी विमर्श का हिस्सा बनती हैं और पाठक पढ़कर और सुनकर अपनी समझ का विस्तार भी करते हैं। दून पुस्तकालय एवं संस्कृति विभाग के सहयोग से सूबे में तेजी से अपनी धमक देने वाला प्रकाशक समय साक्ष्य ने इस आयोजन का जिम्मा लिया।

 दो दिवसीय साहित्यिक महोत्सव में ग्यारह सत्रों का सफल संचालन हुआ। अलग-अलग सत्रों को सुनने आए और दो दिवसीय पूर्ण आयोजन में जुटे श्रोता और दर्शकों का आंकड़ा एक हजार से भी आगे जा पहुंचा। पहले दिन के महत्वपूर्ण सत्रों में हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य और नया मीडिया, भूमण्डलीकरण और हिन्दी कहानी, हिन्दी कविता: चेतना और पक्षधरता, स्त्री और आधुनिकता, कवि और कविता के साथ खुले प्रागंण में पुस्तक मेला भी आयोजित हुआ।

दूसरे दिन लोक साहित्य: अतीत, वर्तमान और भविष्य, बाल साहित्य: चुनौतियां और संभावनाएं, बाज़ार, मीडिया और लोकतंत्र, कथेतर साहित्य: समय और समाज, आंचलिक साहित्यः चुनौतियां और संभावनाएं तथा सरला देवी: व्यावहारिक वेदान्त पर चर्चा हुई। इसी के साथ-साथ सुनील भट्ट कृत पुस्तक साहिर लुधियानवी की पुस्तक पर भी चर्चा हुई। भास्कर उप्रेती ने दिनेश कर्नाटक कृत पुस्तक मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां पुस्तक पर चर्चा की। दोनों दिन देर रात संचालित वृहद काव्य गोष्ठी भी श्रोता खूब जुटे। दोनों दिन कमल जोशी और भूमेश भारती की छायाचित्र प्रदर्शनी ने भी आयोजन में चार चांद लगाए। प्रख्यात चित्रकार बी॰मोहन नेगी की रेखाचित्र प्रदर्शनी ने भी विशिष्ट माहौल बनाया।

हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य और नया मीडिया सत्र का संचालन सुशील उपाध्याय ने किया। बतौर संचालन कर रहे सुशील उपाध्याय ने जन सरोकारों के साथ-साथ साहित्य के नामचीन नामों को याद किया तो इक्कीसवीं सदी के खतरों की ओर इशारा भी किया। प्रखर वक्ता एवं आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि भारत की औसत आयु पर गौर करें तो नौजवानों की दुनिया ही सामने आती है। लेकिन नौजवानों के लिए सबक और समझ बनाने वाला साहित्य हम रच पा रहे हैं? उन्होनें कहा कि आज सारा खेल भावनाओं का और झूठ का है। यह समय आहत हो रही भावनाओं का समय है। हम साहित्यकारों के साथ-साथ पाठकों और श्रोताओं को भी समझना होगा कि हम जिस समय में जी रहे हैं उस समय को समझने की भी आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि प्रतिक्रियावादी की निम्नतर सोच देखिए वह दूसरे की कही गई बात पर कुछ नहीं कहते वह बात कहने वाली की पहचान पर उतर जाते हैं। फिर चल पड़ता है जात, धर्म पर छंीटाकशी। उन्होने जोर देकर कहा कि चुनी हुई चुप्पियां, चुनी हुई चीखें और चुनौती के स्तर पर हमें समझना होगा कि हम सामथ्र्य के साथ मानवीय विवेक का प्रतिनिधित्व करें। उन्होंने कहा कि साहित्यकार किसी की उपेक्षा नहीं कर सकता। हमें जनपक्ष पर अपनी बात रखने का अधिकार है।

उन्होंने पूछा कि क्या बुद्धिजीवी होना अपराध हो गया है? शब्द ही है जो मनुष्य को मनुष्य बनाने की क्षमता रखता है। हम लेखक शब्दों के प्रयोग से ही शिक्षा समानता और शांति की बात करते हैं। बौद्धिक कर्म से जुड़ा होना आज की तारीख में अपराध हो गया है। लेकिन इस अपराध को करते रहने में ही हमारी सार्थकता है। हम और कर ही क्या सकते हैं। उन्होंने दण्डी का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने कहा था कि यदि शब्द और नाम न होते तो इस संसार में अंधेरा ही रहता।

 पुरुषोत्तम अग्रवाल जी ने कहा कि शब्द, संवेदना और ज्ञान को कलमकार ही बचाए और बनाए रख सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि एक ही वस्तु को देखने के लिए अलग अलग दृष्टियां हो सकती हैं। मेरी ही दृष्टि सही है। इस बात पर अड़ना गलत है। उन्होंने चेताया कि जानबूझकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि हम सूचनाओं के विस्फोट में उलझे रहें। हमारे पास सोचने का समय ही न रहे। स्मरण शक्ति को खत्म किया जा रहा है। समाज अब संक्षिप्त स्मृति में जीने की ओर बढ़ चला हैं। यह समय खतरनाक है। स्मृतिविहीन हो रहा जन। बुद्धि और तर्क से परे होती जा रही संवेदनाएं, सत्यातीत की ओर बढ़ता समाज। बस साहित्य ही है जो अपने भीतर सत्य को रखता है। भाषा ही है जो हमें बोध कराती है। साहित्य ही है जो सच दिखा सकता है। श्री अग्रवाल ने कहा कि अब वह इस बात की चिन्ता नहीं करते कि उनके लिखे को कौन पसंद करेगा और कौन नहीं। मेरे लिए कौन रोएगा, मैं नहीं जानता। बस मुझे अपना ध्येय पता होना चाहिए।

 इसी सत्र में बटरोही ने कहा कि हम पहाड़वासियों ने हिमालय की गोद में पहली सांस ली है। हमारे भाव और रचना प्रकृति की ही देन है। उन्होंने कहा कि साहित्य, कला और संस्कृति अपनी जड़ों से जुड़ने की यात्रा है। यह यात्रा जन सरोकारों की यात्रा हो। उन्होंने सवाल उठाया कि रचनाकार की सफलता क्या है? हमारी रचना किसी क्षेत्र की सरहद के भीतर रहती है या फैलती है। रचना लोकोन्मुखी होगी तो पंख पसारेगी। उन्होंने विदेशी धरती के कई उदाहरणों का संदर्भ भी दिया। क्षेत्रीयता और मातृभाषा की उन्होंने पुरजोर वकालत की।

 भूमण्डलीकरण और हिन्दी कहानी सत्र का संचालन अनिल कार्की ने किया। सुभाष पंत ने कहा कि हर युग में कहानी बदलती है। बदलना उसका स्वभाव है। प्रतिबद्ध लेखकों का दायित्व है कि वह देशकाल और परिस्थिति का सच कहानी के माध्यम से परोसे। हर एक अभिव्यक्ति कहानी ही है। उन्होंने कहा कि जिस तेजी से समाज बदल रहा है। बाजार बदल रहा है। दुनिया बदल रही है। यह सब हमारी कहानी का हिस्सा होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज यह समय है कि यदि कोई मध्यमवर्ग का इंसान कारपोरेट जगत के किसी अस्पताल में भर्ती हो जाए तो बीस दिनों में ही गरीबी रेखा के नीचे आ जाएगा। एक तो बाजार था कि जो आपको चाहिए वह बाजार में उपलब्ध है। आप अपने मुताबिक सामान ले लें। आज बाजार तय कर रहा है कि आप इसे लो। ले ही लो। मनुष्य आज चीज़ के रूप में परोसा जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह शुभ संकेत है कि पाठकों में साठ फीसदी पाठक महिलाएं हैं। हम सब जानते हैं कि आधी दुनिया पर काम, जिम्मेदारी की दोहरी भूमिका भी है। उन्होंने यह भी कहा कि रचनाकार को आत्ममुग्धता आगे नहीं बढ़ने देती। कहानियों की चमक में कहानीकार आगे नहीं बढ़ पाता। अपने बारे में और अपनी रचना के बारे में मिलने वाली प्रसन्नता कई बार कहानीकार को आगे नहीं बढ़ने देती। उन्होंने कहा कि संवेदनशील रचनाकार ही जीवन बचा सकता है। बचाता आया है। जीवन को बचाने का कारगर उपाय रचनाएं ही हैं।

संवेदना को बचाए और बनाए रखने के लिए कहानियां ही हैं जो हमें दर्पण दिखाने की ताकत रखती है। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि लिखना हमारी संवेदनशीलता है। छपना हमारा कौशल है। कहानियों का प्रचार हमारा मैनेजमेंट है। आज प्रचार अधिक है।

 जितेन ठाकुर ने कहा कि लेखक ही हैं जो हमारी दृष्टि विकसित करते हैं। परिवेश को समझते हैं। हालातों को करीब से देखते हैं। समाज के सामने लाते हैं। उन्होंने कहा कि भूख, बेकारी, लाचारी और भावपूर्ण कहानियां हर काल में अलग से रेखांकित होती रही है। आज सूचना तकनीक में कई बार अच्छी कहानियों की चर्चा पीछे रह जाती है और साधारण रचना प्रचार पा जाती है। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इस सत्र को कान्ता राॅय, मनीषा कुलश्रेष्ठ, दिव्य प्रकाश दुबे ने भी संबोधित किया।

 हिन्दी कविता चेतना और पक्षधरता का संचालन अरुण देव ने किया। लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि कविता का जन्म कथा कहने के लिए ही हुआ है। उन्होंने कहा कि कलमकार की भूमिका को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कविता में तुक मिलाना भी कविता मान लिया गया। तुक मिलाने के चलते कई बार बेतुकी बातें भी हुईं। उन्होंने कहा कि कविता एक से दूसरे की ओर नहीं ले जाती बल्कि दूसरे से दूसरे में जाने की परंपरा कविता है। यह गुणित अनुपात वृहद है। उन्होंने अपने विशाल अनुभवों के आलोक में भाषा, सौन्दर्य, लिपि, कविता के उद्देश्य पर भी दृष्टि डाली।

 राजेश सकलानी ने कहा कि चेतना हर समाज में प्रगतिशील ही होती है। हम अपने समय के सच को उजागर करते हुए समाज की भी चेतना जगाते हैं। शैलेय ने कहा कि हम सभी को वर्तमान समय के सच को सामने लाना चाहिए। अपनी चेतना और पक्षधरता को समाज के हित से ही देखना चाहिए। आशीष मिश्र ने कहा कि लोक जीवन का उभार ही हमारी चेतना का विषय नहीं हो पा रहे हैं। हमारा लोक हमसे दूर होता जा रहा है। गांव की तस्वीर धूमिल होती जा रही है। प्रतिभा कटियार ने कहा कि सवालों से लड़ना ही कवि का धर्म है। रचना हमें सोने नहीं देती। यह समाज के प्रति हमारी पक्षधरता है। इस सत्र में कविता के कई पक्षों पर विहंगम रूप से चर्चा हुई। अधिकतर वक्ताओं ने आज के समय को जटिल बताया और सतर्क रहना चेताया।

 स्त्री और आधुनिकता का संयोजन गीता गैरोला ने किया। शीबा असलम ने कहा कि नारीवादी आधुनिकता आयातित है। हम हमेशा से तर्क देते आए हैं कि प्रकृति ने ही महिला को दुर्बल बनाया है। जबकि यह सच नहीं है। औरतों की समस्याएं हर ओर एक जैसी नहीं है। उन्होंने कहा कि कमजोर उत्पादन हर जगह हारता है। आज भी महिला को प्रोडक्ट के तौर पर आगे रखा जाता है। हमारी अधिकतर परंपराएं महिला को कम करके आंकती रही हैं। आज महिला आंदोलन फैशन की तरह इकट्ठा होने के तौर पर देखे जाते रहे हैं।

 सुजाता तेवतिया ने कहा कि स्त्री पर बात करना कोई फनी नहीं है। रोमांटिक नहीं है। यह कहना कि आज की स्त्री कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। आधा सच ही है। आज भी अमूमन हर घर में एक सामन्तवादी सोच कायम है। उन्होंने कहा कि हर ओर ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि स्त्री को घर और घर के काम में निपुण होना प्राथमिक काम के तौर पर देखने की आदत बने। उसे रसोई और घर के काम को जीतने के लिए अप्रत्यक्ष तौर पर दौड़ाया जाता है। उन्होंने कहा कि एक महिला कांस्टेबल को ही लें। वह संघर्ष करती है। जनाना तो कभी मर्दाना बनती है। ऐसा पुरुष के साथ नहीं होता। उन्होंने कहा कि अधिकतर मामलों में घर के पुरुष ऐसा आवरण बना लेते है कि महिलाओं को यह लगे कि उसे क्या जरूरत धारा के विपरीत बहे। ज्यादा कष्ट उठाने की जरूरत नहीं है। यह सब योजनाबद्ध तरीके से चलता है।

उन्होंने कहा कि पहाड़ की महिलाओं के मुद्दे अलग हैं। दिल्ली की महिलाओं के मुद्दे अलग हैं। स्थानीय आवाज़ें मुद्दों के तौर पर सामने आनी चाहिए।

 गीता गैरोला ने कहा कि समानता के लिए सोचना और स्त्री हक के बारें में सोचना पूरे समाज की आवश्यकता है। पूरे समाज को सोचना होगा। महिला आंदोलन की अगुवा कमला पंत ने कहा कि कई सारे आंदोलन गवाह है कि वह बिना स्त्री के कभी सफल नहीं हो सकते थे। महिला से दूरी समाज से दूरी है। महिला को अलग खांचे में देखना गलत है। घर, गांव और परिवार से दूरी घातक है। आज भी महिला ही हर कुछ बचाए और बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। संघर्षरत है। उन्होंने कहा कि पूरे समाज का दायित्व है कि बातों को, विचारों को बांटे, तभी स्वस्थ समाज की स्थापना होगी।

 कवि और कविता की अध्यक्षता अतुल शर्मा ने की। स्वाति मेलकानी, रेखा चमोली, माया गोला, अंबर खरबंदा, मुनीश चन्द्र, राजेश आनन्द असीर, नदीम बर्नी, शादाब अली, प्रतिभा कटियार, सुभाष सहित बीस अन्य कवियों ने कविता पाठ किया।

 लोकसाहित्य अतीत वर्तमान और भविष्य का संयोजन उमेश चमोला ने किया। प्रभा पंत ने कहा कि हम सब लोक का हिस्सा हैं। जहां रचनाकार अनाम हो जाता है वहां वह रचना लोक की हो जाती है।

 प्रभात उप्रेती ने कहा कि लोक वह है जो हमें आनंद से भर दे। हमारे भीतर लोक बचा रहना चाहिए। प्रीतम अपच्छयाण ने कहा कि लोक में सामूहिकता ही लोक की ताकत है। नंद किशोर हटवाल ने लोक विमर्श को आज के सन्दर्भ में जोड़कर कहा कि साठ फीसदी लोक समय के साथ मौखिक परंपरा में होने के कारण लुप्त होने के कगार पर है। इसे कैसे बचाया जाए यह चिन्ता की बात है।

महावीर रंवाल्टा ने कहा कि साहित्य का प्राण तो लोक में है। हमें उसे सामने लाना चाहिए।

 बाल साहित्य चुनौतियां और संभावनाएं का संयोजन मनोहर चमोली मनु ने किया। राजेश उत्साही ने बाल साहित्य के विविध पक्षों पर विस्तार से बात की। राजेश उत्साही ने बाल साहित्य के विविध पक्षों पर विस्तार से बात की। 
उन्होंने जोर देकर कहा कि बाल साहित्य को अलग से खांचे में देखने के वे पक्षधर नहीं है। अच्छा हो कि हम ऐसा साहित्य रचें जो बच्चों को भी पसंद आए और बड़ों को भी। उन्होंने बच्चों के बालमन और बच्चों को पसंद आने साहित्य की भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने फेसबुक के साथ-साथ अन्य सूचना तकनीक के बढ़िया इस्तेमाल की बात भी कही। उन्होंने बच्चों के साहित्य को संवेदना के स्तर पर और मनोरंजन के स्तर पर पहली शर्त माना। 

दिनेश चमोला ने कहा कि यह पाठकों पर छोड़ देना चाहिए कि उन्हें क्या पसंद आ रहा है और क्या नहीं।

मुकेश नौटियाल ने कहा कि कल्पना के साथ-साथ हमें अब यर्थाथवादी साहित्य भी बच्चों के लिए लिखना होगा। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बच्चों के लिए रेखांकित साहित्य का सृजन करें।

शीशपाल ने कहा कि दुख इस बात का है कि आज भी बच्चों को अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। हम बड़े उन बच्चों की बात तक नहीं सुनते। घर हो या स्कूल, सब जगह यही हाल है। उन्होंने कहा कि बच्चों की अस्मिता की ओर ध्यान जाना अभी-अभी शुरू हुआ है।

उमेश चन्द्र सिरसवारी ने कहा कि माता-पिता भी बच्चों को पढ़ने लायक सामग्री देने से इतर अधिक खाने-पीने में खर्च करने की मानसिकता से नहीं उभर पाए हैं।


 मनोहर चमोली मनु ने कहा कि आनंद के साथ-साथ बच्चों में कल्पनाशक्ति का विस्तार करतीं और उन्हें संवेदनशील बनाती रचनाएं हर काल में पसंद की जाती रही हैं। उन्होंने कहा कि आदेश, निर्देश और उन्हें आदर्श नागरिक बनाने की तीव्र इच्छा को साहित्यकारों को छोड़ना होगा। उन्होंने कहा कि पूरी आबादी में बच्चों की संख्या के हिसाब से जो बाल साहित्य प्रकाशित हो रहा है वह बेहद कम है। विज्ञापन और टीवी ने बच्चों की अहमियत समझी है। पूरा बाजार बच्चों को भुना रहा है। लेकिन साहित्य ने पाठक के तौर पर बच्चों की उपेक्षा ही की है। हम यह कब समझेंगे कि यदि बच्चों में ही पढ़ने की ललक पैदा नहीं की जाएगी तो साहित्य के पाठक कहां से आएंगे। 

इस सत्र की अध्यक्षता उदय किरौला ने की। उन्होंने सबसे पहले वक्ताओं के विशेष कथनों को पुनः परिभाषित किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि बच्चों को स्पेस दिया जाना आज की सबसे बड़ी मांग है। बच्चों को खुश होता देख खिलखिलाता देख कौन प्रसन्न नहीं होगा। उन्होंने इस आयोजन पर बाल साहित्य को विमर्श का हिस्सा बताते हुए प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन बाल साहित्य की महिमा को भी रेखांकित करेंगे। 


बाल साहित्य से पूर्व लोक पर फोकस बाखली का लोकार्पण भी हुआ। इस अवसर पर संपादक गिरीश पाण्डेय 'प्रतीक' ने बाखली से जुड़ने का अनुरोध भी किया।

 बाजार मीडिया और लोकतंत्र का संयोजन भूपेन सिंह ने किया। कुशल कोठियाल ने कहा कि आज मीडिया को नकारात्मक ढंग से अधिक देखा जा रहा है। सुन्दर चन्द्र ठाकुर ने कहा कि मीडिया हर काल में सदैव सकारात्मक ही रहे, ऐसा नहीं कहा जा सकता लेकिन जनपक्षधर धर्म तो मीडिया का होना ही चाहिए।

सुशील उपाध्याय ने कहा कि चाहे कुछ भी हो लोकतंत्र को बचाए और बनाए रखने में मीडिया की भूमिका रही है और रहेगी। इस सत्र में त्रेपन सिंह ने भी अपने विचार रखे।

 कथेतर साहित्य समय और समाज सत्र को संबोधित करते हुए शेखर पाठक ने कहा कि विभिन्न विधाओं से इतर भी कई पुस्तकें और वर्णन जीवंत बन पड़े हैं। उन्हें पढ़ना रस घोलना जैसा होता है। उन्हें पढ़कर एक अलग तरह की अनुभूति होती ही है। देवेन मेवाड़ी ने कहा कि हम जो कुछ भी पढते है यदि वह सरल है सहज है। उसमें हमारे आस-पास की दुनिया समाहित है तो वह आनंद देता ही है।

उन्होंने वैज्ञानिक नज़रिए को भी सामने रखा। इस सत्र को एसपी सेमवाल ने भी संबोधित किया।  तापस ने भी अपने विचार रखे।

आंचलिक साहित्य चुनौतियां एवं संभावनाएं पर बोलते हुए रमाकांत बैंजवाल ने कहा कि हर भाषा का अपना महत्व है। कोई भी भाषा किसी दूसरी भाषा को कैसे मार सकती है। यह समझ से परे है। हर भाषा का अपना सौन्दर्य है। इसे बनाए और बचाए रखने का दायित्व उस समाज का भी है और साहित्यकारों का भी है।

 इस सत्र को अचलानंद जखमोला, देव सिंह पोखरिया, हयात सिंह, मदन मोहन डुकलाण, गिरीश सुन्द्रियाल और भारती पाण्डे ने संबोधित किया। दिलचस्प बात यह रही कि हर सत्र में श्रोताओं ने प्रश्न भी पूछे।

 दो दिन हुए सत्रवार विमर्शों में उपस्थित पाठकों, श्रोताओं और साहित्यकारों ने भी अपनी बात रखनी चाही लेकिन सधे हुए समय के चलते ऐसा संभव नहीं हो सका।

यह कहना जरूरी होगा कि सोचना आसान होता है। सोच को ज़मीन पर उतारना बेहद कठिन होता है। रानू बिष्ट, प्रवीन भट्ट, बी॰के॰ जोशी, एस॰ फारूख, सुमित्रा, भारती पांडे, योगेश भट्ट, अरुण कुकसाल, शेख अमीर अहमद, नन्द किशोर हटवाल, सुरेन्द्र पुण्डीर, संजय कोठियाल, कान्ता, बृज मोहन, सत्यानन्द बडोनी, मनोज इष्टवाल, गीता गैरोला सहित मसीही ध्यान केन्द्र के साथीगण सहित बीस से अधिक चेहरे ऐसे थे जो नेपथ्य में रहकर इस आयोजन को सफल बनाने में दिन-रात एक किए हुए थे। आयोजन से ठीक एक दिन पहले सोचा जा रहा था कि दून से बहुत दूर अस्सी के आस-पास श्रोता जुटेंगे। लेकिन यह क्या, अस्सी, सौ, दो सौ से लेकर दूसरे दिन यह संख्या एक हजार के आस-पास जा पहुुंची। पंजीकरण पंजिका को एक ओर रख दे ंतो सत्रों के हिसाब से आने वाले पाठक, अभिभावक, साहित्यकार, श्रोता, छात्रों की यह संख्या अनुमान के मुताबिक नहीं ही है।
च्लते-चलते उत्साही साथी इसे हर साल के दिसंबर में करने का मन बना रहे हैं। हालांकि यह कहना और लिखना जितना आसान है उस पर काम करना बेहद कठिन। लेकिन कठिनतम को सरलतम कराना और करना ही तो चुनौती है।

 चूंकि इस तरह की सामूहिक भागीदारी से हुआ आयोजन पहली बार हुआ। इस बार हुए आयोजन की खामियों से सबक़ लेकर फिर से ऐसा आयोजन और ठोस व व्यापक उद्देश्यों को पूरा कर सकेगा। यह आशा तो की ही जानी चाहिए। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एक बेहतरीन आरंभ इस आयोजन ने किया। यह आयोजन यह भी संकेत देता है कि पढ़ने-लिखने की संस्कृति को कोई खतरा नहीं है।

अलबत्ता इसकी समाजोन्मुखी दिशा पर चर्चा आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। यह भी कि इस पूरे आयोजन में तीन साल से सोलह साल के बच्चों की प्रतिभागिता भी देखने को मिली। यह सुखद संकेत तो कहा ही जा सकता है।
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 -मनोहर चमोली ‘मनु’
मोबाइल-09412158688

13/11/2016

children litrature वाहवाही का बाल साहित्य -मनोहर चमोली ‘मनु’

वाहवाही का बाल साहित्य

-मनोहर चमोली ‘मनु’

बाल साहित्यकार अपने वय वर्ग में अपने लिए कितने ही भक्त बना लें, आखिरकार उनका नाम लिवाने वाली रचना ही उनकी होगी। रचना ही बोलती है। लेकिन अपनी रचना तो सबको प्यारी लगती है। अपनी गाय के सींग सभी को सबसे पैने नज़र आते हैं। आनंद की अनुभूति तो तब होती है जब रचना किसी ओर की हो और उस रचना पर बोलने वाला कोई दूसरा हो। यह दूसरा कौन होगा? रचनाकार के मुरीद तो उसके पाठक हुए। भक्त तो रचना को समय की आंच पर रखकर आलोचना करने से रहे। तीसरा ही कोई होगा जिसे आलोचक कहा जाएगा। 


यह तय है कि रचना और रचनाकार में ही जब आलोचना सहन करने की ताकत नहीं होगी तो वह अल्पजीवन जीकर काल के गाल में समा जाएगी। मैं स्वयं बतौर पाठक तत्काल बाल साहित्य की चार-छह रचनाएं उंगलियों में नहीं गिना सकता। मैं यह तो कह सकता हूं कि बाल साहित्य में इन दिनों अमुक-अमुक बहुत अच्छा लिख रहे हैं। लेकिन वह बहुत अच्छा क्या है! इस पर विचार करते ही मेरे माथे पर बल पड़ने लग जाते हैं। कारण? मेरे ज़ेहन में बाल साहित्य की इतनी रचनाओं ने स्थाई जगह नहीं बनाई है। यही कारण है कि बाल साहित्य की अधिकतर रचनाएं काल के गाल में समा ही रही हैं। 

आखिरकार हम अपनी रचनाओं पर मनचाही स्तुतियों से फुरसत कब चाहेंगे? शायद कभी नहीं। अधिकतर बाल साहित्यकार अपने बारे में और अपनी रचनाओं के बारें में अच्छा ही सुनना चाहते हैं। वहीं स्वस्थ आलोचना का आधार हमेशा आलोचक के अपने तर्क, निष्कर्ष, समझ, अनुभव, विचार, रचना के औचित्य, कथ्य और रचना की बुनावट होती है। यह जरूरी नहीं कि आलोचक की आलोचना से पाठक भी सहमत हों। लेकिन रचनाकार? रचनाकार को तो चाहिए ही कि वह आलोचना सुनकर-पढ़कर कुपित न हों। आलोचना को सहजता और सरलता से सुनें, पढ़ें और समझें। उसे माने ही, यह कतई जरूरी नहीं। 

हम आलोचना में उदारता की उम्मीद क्यों करते हैं? क्या यह सही है? यदि ऐसा है तो यह हमारा हल्कापन ही है। पाठक तो उदारता के साथ रचनाएं पढ़ते ही हैं। न पसंद आए तो उस रचना को नहीं पढ़ेंगे। ऐसा प्रायः कम ही होता है कि अमुक रचनाकार की कोई रचना मुझे पसंद नहीं आती तो ऐसा नहीं है कि मैं कल, परसों या निकट भविष्य में उसकी कोई भी रचना नहीं पढ़ना चाहूंगा। लेकिन आलोचक के मामले में ऐसा नहीं होता। आलोचक क्यों कर किसी रचना के प्रति प्रेम और निर्ममता दिखाए? उसे तो वहीं करना चाहिए, जो उसे पढ़ते समय महसूस होता है। अलबत्ता आलोचक रचना को पढ़ते समय तिहरी भूमिका में होता है। एक तो वह पाठक होता है। दूसरा वह उसे बतौर रचनाकार भी देखता है कि यदि वह इस रचना का रचनाकार होता तो वह उसे कैसे और क्या आकार देता। तीसरा वह पाठक और रचनाकार से इतर तीसरे जीव के तौर पर उस रचना के गुण-देाष देखता है। उसी के आधार पर उसकी टिप्पणी रेखांकित होती है। 

ऐसा नहीं है कि आलोचक जानबूझकर किसी रचना को अच्छा या बुरा बता दे। कमियां होते हुए भी कमियां छिपा दे। अच्छाई होते हुए भी अच्छाई की चर्चा न करे। यदि ऐसा वह नहीं करता तो उस आलोचक की तटस्थता पर जल्दी ही सवाल खड़े होने लगेंगे। फिर एक दिन ऐसा आएगा कि उसकी आलोचनात्मक दृष्टि ही हास्यास्पद मानी जाएगी। उसकी आलोचना पर रचनाकार ध्यान नहीं देंगे। 

आखिर आलोचक की मंशा क्या है? यह हमें समझना होगा। क्या वह सिर्फ और सिर्फ कमियां निकालने के लिए होता है? क्या वह किसी रचना की तारीफ ही करता फिरे? तो फिर? आलोचक को उन पर भी दृष्टि डालनी होती है, जिस पर न तो रचनाकार का ध्यान गया, न ही आम पाठक का। यदि आलोचक ही उदारता बरतेगा तो यह संभव है कि रचनाकार अपनी रचनाओं के पुराने पाठकों को धीरे-धीरे खोते चले जाएंगे। फिर जब रचना पढ़ी ही नहीं जाएगी तो यह रचनाकर्म किस काम का? 

बगैर आलोचना के आत्ममुग्धता का कवच पहनकर और झूठी वाहवाही की चादर ओढ़कर भी किसी रचनाकार की रचनाएं छपती रह सकती हैं। पढ़ी और गुनी जाएंगी, ऐसा विश्वास करना भी गलतफहमी में रहना है। बाल साहित्य में अभी भी कमोबेश वाहवाही का प्रचलन अधिक दिखता है। कई रचनाकारों को यह गलतफहमी है कि अब तक उनकी दर्जनों रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं। फलां पत्रिका ने या पत्र ने उनकी रचना क्यों कर रोक रखी है? या क्यों अस्वीकृत कर दी है? कुछ रचनाकारों को यह गलतफहमी हो जाती है कि अब तक उनके दर्जनों संग्रह आ चुके हैं। वह स्थापित बाल साहित्यकार हैं। ऐसे बाल साहित्यकारों को अक्सर यह कहते सुना जा सकता है कि हमारी रचनाओं की कसौटी तो बच्चे हैं। आज तक बच्चों ने रचना पर कोई मीन-मेख नहीं निकाली है। ये आलोचक कौन होते हैं? 

बच्चों की पढ़ने की गति क्या है! वह कितना पढ़ते हैं! यह हम सब जानते हैं। रचना, रचनाकार, पाठक और आलोचक चारों स्वस्थ चित्त से अपना धर्म निभाएं तो हिन्दी बाल साहित्य आजादी के आस-पास के साहित्य से आगे बढ़ सकता है। वरना, बाल साहित्य का अंतिम ध्येय भी अखिल भारतीय स्तर के सम्मान-पुरस्कार पाना मात्र रह जाएगा। इससे अधिक हुआ तो पत्रिकाओं के संरक्षक मंडल में सदस्य बन जाएंगे। और अधिक हुआ तो नई पौध की पुस्तकों की समीक्षाएं लिखते रह जाएंगे। और अधिक हुआ तो पुस्तक मेलों के उदघाटनों में, पुस्तक विमोचनों में फोटो खींचते नज़र आएंगे। और अधिक हुआ तो पाठ्य पुस्तकों में एक अदद रचनाएं पढ़ाए जाने से प्रफुल्लित होते रहेंगे। क्या बाल साहित्य का मकसद यही है? इतना ही है?

मुझे लगता है कि आजादी के बाद से ही यदि संजीदगी से बाल साहित्य में उक्त चारों अपना धर्म निभाते तो तब से अब तक के बाल पाठक सजग पाठक बन जाते। साहित्यिक पत्रिकाओं के साथ पढ़ने का रिवाज़ बना रहता। और बढ़ता। पुस्तकालयों की संख्या बढ़ती। नित नए खुल रहे मोल्स, सुपर मार्केट्स में एक नहीं, कई दुकानें किताबों की भी होतीं। हर घर अंग्रेजी के एक अखबार के साथ हिन्दी का एक अखबार तक नहीं सिमटकर रह जाता। हर घर में हर माह बीस-पच्चीस पत्रिकाएं घर बैठे होकरों के माध्यम से आतीं। गली मुहल्लों में जागरण, भण्डारा, धार्मिक जमात-पंगतों की ही संख्या नहीं बढ़तीं। नई किताबों पर इस तरह चर्चा होती, जिस तरह दोपहिया-चैपहिया खरीदने की खबर बैठकों-रसोईयों का विषय बनती हैं। नई किताब और रचनाकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व पर बातें होतीं। किताबों-रचनाओं पर विचार गोष्ठियां बढ़तीं। 

इन सबसे आगे की बात यह होती कि संवेदनशीलता, मानवता, नैतिकता, सामुदायिकता, सहभागिता से भरे आयोजन हमें दिखाई देते। अब भी वक़्त है। बाल साहित्यकार को अब अपनी रचना छपने-छपाने से पहले एक-दो पाठकों को पढ़ानी चाहिए। हर रचना को छपने-छपाने से पहले एक-दो मित्रों को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़वानी चाहिए। हर बाल साहित्यकार को हर माह अपने एक मित्र की रचना पर आलोचनात्मक दृष्टि डालनी चाहिए। ज़रा सा वक़्त निकालकर उस रचना पर लिखित राय बनाकर मित्र को जरूर भेजनी चाहिए। यह स्वस्थ और जरूरी परंपरा हिन्दी बाल साहित्य में जब तक नहीं बनेगी तब तलक कई बाल साहित्यकार गफलत में रहेंगे कि वे बाल पाठकों के मन-मस्तिष्क में अपनी रचना के मार्फत सम्मानजनक जगह बनाए हुए हैं। 

यह भी कि आज के दौर में यह कहने से बाल साहित्यकारों को बचना चाहिए कि साहित्य तो स्वयं के आनंद के लिए लिखा जाता है। यदि ऐसा ही मानना है तो लिखिए और लिखकर सहेज लीजिए। यहां-वहां मत भेजिए। संग्रह भी छपवाना है तो छपवाइए। उसें यहां-वहां मत बांटिए। पुरस्कारों और सम्मानों के लिए गुहार मत लगाइए। अपनी पुस्तकें विचारार्थ मत भेजिए। जब स्वान्तः सुखाय लिखा है! बच्चों को, अभिभावकों को और शिक्षकों को दोष देना बंद कीजिए कि वे पढ़ने की आदत छोड़ चुके हैं। पढ़ने लायक उपलब्ध हो तो ये तीनों (बच्चे, अभिभावक, शिक्षक) हमारी और आपकी तरह खरीदे जाने वाली वस्तु के लिए सुपर मार्केट या आम मार्केट की दर्जनों दुकानें छान आते हैं। ओन लाईन मंगाते हैं। पांच सौ रुपए की वह फलां चीज के लिए पूरा दिन और हजार रुपए का पेट्रोल कुर्बान कर देते हैं! इसे पढ़ने मात्र से, सोचने-विचारने मात्र से काम नहीं चलेगा। इस दिशा में व्यावहारिक कदम भी उठाइए।
 ॰॰॰ chamoli123456789@gmail.com

-मनोहर चमोली ‘मनु’ भिताई, पोस्ट 23, पौड़ी उत्तराखण्ड 246001 मोबाइल 09412158688

11/11/2016

उड़ान अनोखी -मनोहर चमोली ‘मनु’ child literature


उड़ान अनोखी 

-मनोहर चमोली ‘मनु’


एक तितली रो रही थी। जुगनू ने पूछा तो वह कहने लगी-‘‘मैं आसमान में उड़ना चाहती हूं। सुना है आसमान से धरती नारंगी जैसी दिखाई देती है।’’ जुगनू हँसने लगा। कहने लगा-‘‘उड़ती तो हो। अब और किस तरह उड़ना चाहती हो?’’ 

तितली ने सिसकते हुए कहा-‘‘मेरा उड़ना भी कोई उड़ना है। मेरी उड़ान तो छोटी-सी होती है।’’ जुगनू ने समझाया-‘‘और मेरी? मेरी उड़ान तो बहुत ही छोटी है। लेकिन हम दोनों आसमान में ही उड़ते हैं। जमीन के नीचे नहीं। समझी।’’ 

तितली ने जवाब दिया-‘‘समझना तुम्हें चाहिए। ज़रा याद करो। हम छोटी सी उड़ान भरते हैं। थक जाते हैं। बार-बार हमें धरती की ओर लौटना पड़ता है। है न? अरे ! उड़ान हो तो गिद्ध जैसी।’’

यह क्या! गिद्ध की बात की तो गिद्ध सामने आ गया। दोनों को सिमटता देख गिद्ध हंसने लगा। कहने लगा-‘‘डरो मत। रोना बंद करो। मेरे पैर में बैठ जाओ।’’ तितली काँपने लगी और बोली, ‘‘तुम पंख फड़फड़ाओगे तो मैं डर जाऊँगी। तिनके की तरह उड़ जाऊँगी।’’ जुगनू बोला-‘‘तुम्हारी उड़ान तो बहुत ऊंची होती है। गिरे तो हड्डी-पसली भी न बचेगी।’’

तीनों की बातें बया सुन रही थी। वह बोली, ‘‘चाहो तो मेरा घोंसला ले लो। गिद्ध उसे पंजों में पकड़ लेगा। तुम घोंसले में बैठकर दुनिया की सैर करना।’’ तितली ने हँसते हुए कहा, ‘‘यह ठीक रहेगा। लेकिन।’’ गिद्ध ने पूछा, ‘‘लेकिन क्या?’’ 

तितली बोली, ‘‘बारिश आ गई तो? मुझे भीगने से जुकाम हो जाता है।’’ गिद्ध ने हसंते हुए कहा, ‘‘मेरे पंख किसी छतरी से कम नहीं।’’ तितली भी हँंसने लगी।

 तितली हँसते हुए बोली, ‘‘अरे हाँ। यह ठीक है, लेकिन।’’ बया ने पूछा, ‘‘फिर लेकिन?’’ तितली ने कहा, ‘‘मुझे भूख लगेगी तब क्या होगा?’’ बया ने सुझाया, ‘‘तुम फूलों का रस जमा कर लो।’’ तितली बोली, ‘‘हाँ, यह ठीक रहेगा, लेकिन।’’ 

गिद्ध ने पूछा, ‘‘अब क्या?’’ 

तितली कहने लगी, ‘‘मैं फूलों का रस जमा कैसे करूँगी? रस जमा करते-करते तो कई दिन यूं ही बीत जाएँगे।’’ पेड़ पर ही मधुमक्खियों का छत्ता था। रानी मधुमक्खी अब तक चुप थी। वह बोली, ‘‘तुम मेरा छत्ता ले जाओ। इसमें ख़ूब सारा शहद है। भूख लगे तो कुछ शहद तुम भी खा लेना। वापिस आकर छत्ता वापिस कर देना।’’

 तितली ख़ुश हो गई। कहने लगी, ‘‘यह ठीक है। अब आएगा मज़ा!’’ जुगनू तितली की पीठ पर जा बैठा। तितली घोंसले में जा बैठी। गिद्ध ने पंजों से घोंसला उठाया और चल दिया अपनी अनोखी उड़ान पर। बया और रानी मधुमक्खी सहित कई सारे जीव-जन्तु उचक-उचक कर आसमान की ओर देख रहे थे। ॰॰॰ 


लेखक परिचय: मनोहर चमोली ‘मनु’: ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ और ‘पूछेरी’ पुस्तकें नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुई हैं। ‘चाँद का स्वेटर’ और ‘बादल क्यों बरसता है?’ पुस्तके रूम टू रीड से प्रकाशित हुई हैं। तीन और पुस्तकंे शीघ्र प्रकाशित। बाल कहानियों का संग्रह ‘अन्तरिक्ष से आगे बचपन’ उत्तराखण्ड बालसाहित्य संस्थान से पुरस्कृत। बाल साहित्य में वर्ष 2011 का पं॰प्रताप नारायण मिश्र सम्मान मिल चुका है। जीवन में बचपन’ बाल कहानियों का संग्रह बहुचर्चित। बाल कहानियों की पच्चीस से अधिक पुस्तकें मराठी में अनुदित होकर प्रकाशित। उत्तराखण्ड में कहानी ‘फूलों वाले बाबा’ कक्षा पाँच की पाठ्य पुस्तक ‘बुराँश’ में शामिल। दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में हिन्दी की सहायक पुस्तक में नाटक ‘मस्ती की पाठशाला’ शामिल। हिमाचल सरकार के प्रेरणा कार्यक्रम के तहत बुनियादी स्कूलों में 13 कहानियां शामिल। उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में शिक्षक हैं।  सम्पर्क: भितांई, पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल. 246001.उत्तराखण्ड. मोबाइलः09412158688. 

30/10/2016

child literature बाल साहित्य बनाम बचकाना साहित्य

बाल साहित्य बनाम बचकाना साहित्य

-मनोहर चमोली ‘मनु’

आज भी साहित्यकारों में अधिकतर वे हैं जो यह मानते हैं कि बच्चों को सच्चा सामाजिक बनाने वाला साहित्य ही उत्तम साहित्य कहा जा सकता है। जो उन्हें सद्मार्ग की ओर ले जाए, वही बाल साहित्य सार्थक है, श्रेष्ठ है।

बतौर पाठक बच्चे ही क्यों, बड़े भी जब साहित्य का आस्वाद ले रहे हों, तो पढ़ने से पहले और पढ़ लेने के बाद खुद में बदलाव महसूस नहीं करते हैं तो वह साहित्य बेदम है। साहित्य में आनंद की अनुभूति पहला तत्व है। जब आनंद ही नहीं आएगा तो कोई पढ़ेगा ही कैसे। जब पढ़ेगा ही नहीं तो खुद में बदलाव क्या लाएगा, सोचेगा तक नहीं। 


बाल साहित्य में बच्चे को सशर्त, सीधे, तीव्र उपेदश और सीख के जरिए सामाजिक बनाने वाला साहित्य पढ़ा भी जाता होगा, मुझे संदेह है। किसी तरह पढ़वा भी लिया जाता होगा तो बाल पाठक खुद में बदलाव लाते होंगे, असंभव सा प्रतीत होता है। 

मेरी समझ तो फिलवक़्त यही बनी है कि कि मनोरंजन के कई साधन आज बच्चों के आस-पास पसरे हुए हैं। ऐसे में बाल साहित्य का मात्र मकसद मनोरंजन करना हो, यह भी अजीब सा लगता है। 

एक तो बाल साहित्य में बच्चों का नज़रिया हो। बच्चों की दुनिया हो। बच्चों की आवाज़ें गूंजती हों। अक्सर कहा जाता रहा है कि बाल साहित्य बच्चों के स्तर का हो। ये स्तर क्या बला है? दो साल से लेकर बारह साल के बच्चों के स्तर पर तो पल-प्रति-पल बदलाव आता रहता है! क्या हर वय वर्ग के बच्चे के लिए एक पत्रिका हो? या एक पत्रिका में हर स्तर के बच्चे के लिए पठन सामग्री हो? यह संभव है? या कई वय वर्ग को ध्यान में रखते हुए कई तरह की भिन्न-भिन्न बाल पत्रिकाएं हो?

बाल साहित्य अलग से होना ही नहीं चाहिए। यह भी अक्सर कहा जाता है। इसका अर्थ क्या यह हुआ कि बच्चे हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, विज्ञान प्रगति  (यहां इनका उल्लेख मात्र साहित्य सामग्री छपने से है ) समकालीन भारतीय साहित्य आदि से ही साहित्य का आस्वाद लें? 

बहरहाल बच्चों के लिए लिखा जाने वाला साहित्य उन्हें बालमन से आगे भी ले जाए। जो दुनिया उसके आस-पास है, उससे भी परिचय कराए। उस दुनिया से भी, जो आने वाले समय में उसकी दुनिया होने वाली है। बच्चों को साहित्य के नाम पर सामान्य ज्ञान परोसने से काम नहीं चलेगा। सूचनात्मक जानकारी देने से भी काम नहीं चलेगा। कपोल कल्पनाओं से भरा साहित्य पहले बहुत लिखा जा चुका है। पीसे हुए आटे को पीसना भी बंद करना होगा। 

आदर्शवाद से भरी रचनाएं बहुत हुईं। बच्चों को सच्चा नागरिक बनने, सामाजिक बनने, आज्ञाकारी बनने की सीधी अपील करती दर्जनों किताबें पुस्तकालयों और स्कूलों की शोभा बढ़ा रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले सत्तर सालों से बच्चों को जो साहित्य परोसा गया, उसमें उन्हें राष्ट्रभक्त बनने के जोर और प्रयासों से ही कई जाने-माने साहित्यकार बाल साहित्य को बचकाना साहित्य कहते हैं? ...

-मनोहर चमोली ‘मनु’, भितांई, पोस्ट-23, पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड।
 मोबाइल-09412158688 और 7579111144

23/10/2016

बाल साहित्य बच्चों को समझना होगा child literature

समझ रहा है साहित्य बालमन को !


-मनोहर चमोली ‘मनु’


एक अध्यापक मित्र हैं। वे बरसों से कक्षा छह से बारह के छात्रों को पढ़ा रहे हैं। हाल ही में उन्होंने फेसबुक में एक वक्तव्य दिया। वक्तव्य के साथ उस बालक को फोटों भी दी गई थी। यहां उस बालक का नाम और पहचान छिपाने के लिए बच्चे, उनके पिता और गांव का नाम बदल दिया गया है, बाकी एक-एक शब्द ज्यों का त्यों मंतव्य समझने के लिए दिया जा रहा है-
‘ये है दुरवा के मोस्ट वांटेड हीरो......... रायसन पुत्र श्री दयासन। बड़ी मुश्किल से मनाकर स्कूल लाया गया है। एक महीने की मेहनत के बाद मिला है ये जब संपर्क करने हम तीन शिक्षक इसके घर गये तब इसे गिरफ्तार कर सके। ये कक्षा 6 का हमारा विद्यार्थी बन गया है। अभी एक और गिरफ्त से बाहर है। नरेन्द्र पुत्र श्री केवल। अब उस पर फोकस किया जाएगा। वह कक्षा 9 का गत वर्ष का ड्राॅप आउट है। ये तो दाऊद के भी दादा हो गए।’
मैंने मित्र के इस कथन को औरों की तरह पढ़ा। मित्रों ने बधाई पर बधाई दी हुई थी। लेकिन मैंने बधाई देने से पहले एतराज जताया। अध्यापक जी मुझे गिरफ्तार ओर गिरफ्त का अर्थ समझाने लगे। मैंने कहा कि बच्चे के प्रति आपके प्रयास अतुलनीय हैं। लेकिन आप जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वे बच्चे को आपसे और भी दूर कर रहा है। वह चोर नहीं है। आप ने ‘मोस्ट वांटेड‘, ‘दाऊद‘ ‘गिरफ्तार‘ और ‘गिरफ्त‘ जैसे शब्दों का प्रयोग किया है। इनका प्रयोग किए बिना भी आप अपने प्रयासों को बेहद सरलता से जाहिर कर सकते थे। 
बहस चल पड़ी। मैंने शालीनता से जवाब दिया। बाद में वे मान गए और उन्होंने अपने वक्तव्य को बदल दिया।

अब उनका वक्तव्य यह था- ‘ये है दुरवा का मोस्ट वांटेड हीरो......... रायसन पुत्र श्री दयासन। बड़ी मुश्किल से मनाकर स्कूल लाया गया है। एक महीने की मेहनत के बाद मिला है ये जब संपर्क करने हम तीन शिक्षक इसके घर गये तब इसे स्कूल ला सके। ये कक्षा 6 का हमारा विद्यार्थी बन गया है। अभी एक और स्कूल से बाहर है। नरेन्द्र पुत्र श्री केवल। अब उस पर फोकस किया जाएगा। वह कक्षा 9 का गत वर्ष का ड्राॅप आउट है।’

अध्यापक मित्र ने फिर भी मोस्ट वांटेड का मोह नहीं छोड़ा। मैं चाहता तो कहता कि मोस्ट वांटेड का उपयोग देश-काल-परिस्थिति और संदर्भ के साथ फिर भी अखर रहा है। मैं चाहता तो उन्हें बताता कि जल,पानी,नीर और अश्रु का उपयोग करते समय हम सन्दर्भ और परिस्थिति के हिसाब से ही इनका उपयोग करते हैं। लेकिन यहां संदर्भ भाषा का नहीं था न ही व्याकरण का। यहां तो बालमन को समझने और बालक की अस्मिता का सवाल था। मैं तो बस इतना चाहता था कि हम बड़ों की दुनिया में जब भी बच्चों की बातें हों तो हम बच्चों के लिहाज़ से भी सोचे। हम यह जरूर समझने का प्रयास करें कि हमें बच्चों में जो शैतान नज़र आता है वह शैतान नहीं है। उस उम्र के स्तर पर वही उसका व्यक्तित्व है। अमूमन हर बच्चा अपनी उम्र और अनुभव के हिसाब से संपूर्ण मनुष्य है। उम्र के हिसाब से जैसे हम खुद को पूर्ण मानते हैं उसी स्तर पर बच्चे अपनी समझ और अनुभव से पूर्ण होते हैं। बशर्ते पूर्ण को सम्पूर्ण होते-होते तो हम बड़ों की उम्र ही बीत जाती है।

बाल साहित्य की भी यही स्थिति है। हम जो बड़े अपना बचपन याद करते हुए जो रच रहे हैं वो बाल साहित्य है ही नहीं। वह तो हम बड़ों का वह साहित्य है जिसे हम बीस-तीस साल बाद याद कर एक काल्पनिक दुनिया के लिए रच रहे हैं। कोई भी सजग पाठक इन दिनों छप रहे बाल साहित्य को इस लिहाज से पढ़ेगा तो माथा पीट लेगा। कारण? एक नहीं कई हैं। एक तो आज भी छप रहे अधिकतर बाल साहित्य में बच्चों की आवाजें ही नहीं हैं। आज के बच्चों की दुनिया भी उसमें शामिल नहीं हैं। हर दूसरी रचना बालमन का अपमान करती नजर आती है। बच्चों को बोदा समझना, बेवकूफ समझना, लल्लू समझना आज भी बदस्तूर चला आ रहा है।

ऐसा नहीं लगता कि बाल साहित्यकार बच्चों की दुनिया से वाकिफ हैं। बड़ों का बाल साहित्य पढ़कर लगता ही नहीं कि ये बच्चों के साथ दो पल भी बिताते हैं। अन्यथा उनके साहित्य में आदर्शवाद पढ़ने को नहीं मिलता। इक्कीसवीं सदी के बाल साहित्य की मुश्किलें और भी बड़ी हैं। सूचना और ज्ञान ठूंसने वाली सामग्री को भी बाल साहित्य माना जा रहा है। 

सूचनात्मक जानकारी देने के लिए कविताओं और कहानियों की मोटी-मोटी किताबें छप रही हैं। सब पढ़ेंगे पर बच्चे नहीं पढ़ेंगे। कारण ! बच्चों के मन का, बच्चों के मतलब का ही तो उसमें नहीं हैं। आदर्श की घुट्टी भी इतनी कड़वी है कि बच्चा जो जिद्दी, अड़ियल, चोर, शैतान, आलसी, झूठा, हिंसक बताया जा रहा है, एक-दो पंक्ति में दी गई छोटी सी घटना से वह सुधर जाता है। अबोध समझा जाने वाला दूसरे ही पल बदलकर होशियार हो जाता है। एक ही घर में दो भाई हैं। एक आलसी है दूसरा समझदार। बहन बुद्धिमान है और भाई बेवकूफ। फिर अचानक बेवकूफ भाई में बदलाव आ जाता है ओर वह बहन की तरह बुद्धिमान हो जाता है। बाल साहित्यकार समझते हैं कि बच्चों के लिए बेसिर-पैर का कुछ भी लिख दो, चलेगा। कल्पना के नाम पर सब कुछ संभव है। बाल साहित्य में असंभव सी बात दो पल में संभव हो जाती है।


बाल साहित्य के जानकार बताते हैं कि हर बच्चा अपने आप में अनोखा है। अदुभुत है। ऊर्जा से भरपूर है। खोजी है। जिज्ञासु है। किसी न किसी नज़रिए से उसमें मेधा है। वह अपने अनुभव से इस दुनिया को देखना चाहता है। समझना चाहता है। फिर ऐसे में क्या उपेदशात्मक, नैतिकता स्थापित करती रचनाएं से आदर्श नागरिकता का पाठ पढ़ाने की मशक्कत बाल साहित्य से ही क्यों? यदि ऐसा है तो क्यों स्वस्थ आचरण की सभ्यता अभी तक स्थापित नहीं हो सकी है। 

ऐसी स्थिति में बच्चे साहित्य से रिश्ता कैसे बना सकेंगे। अधिकतर शिक्षक भी और अभिभावकों का आज भी मानना है कि कक्षाओं में विषय की जो एक-एक किताबें हैं, वे ही बच्चे पढ़ ले गनीमत है। पढ़ने का रिवाज़ न स्कूलों में है न घर में। फिर पढ़ने के लिए जो सामग्री है भी वो बच्चों के स्तर पर ही बचकाना है। कहीं ऐसा तो नहीं कि बाल साहित्यकार यही समझते हैं कि बाल साहित्य यानि बचकाना साहित्य !


फिर वहीं लौटते हैं। एक अध्यापक जो हर साल, हर बार नए छात्रों के संपर्क में आता है। सालों शिक्षण करता है। लिखता है। पढ़ता है। छात्रों को आखर ज्ञान देता है। सीख-समझ और ज्ञान का विस्तार करता है। उनकी सोच और लहज़े पर मेरी तरह आप भी हैरान होते होंगे। यही हाल अधिकतर बाल साहित्यकारों का है। वे आज भी चालीस के दशक की सोच,परिस्थिति और वातावरण से अपने लेखन को मुक्त नहीं कर पा रहे हैं। कुछ ही बाल साहित्यकार हैं जो बच्चों में विज्ञान दृष्टि देने के लिए कलम उठाए हुए हैं। कुछ ही हैं जो बच्चों को उनकी दुनिया के आस-पास की रचनाएं उपलब्ध करा पा रहे हैं। गिनती के ही साहित्यकार हैं जो बच्चों को वह साहित्य उपलब्ध करा पा रहे हैं जिसमें उनकी आवाजें हैं। जिसमें बच्चों की भावनाएं हैं। ऐसा साहित्य बहुत कम है जो बच्चों को आगे की दुनिया की समझ को समझने की ताकत दे रहा है। ऐसा साहित्य बहुत ही कम हैं जो बच्चों में तर्क,विचार करने की ताकत देता है।

ठीक उलट आज भी बदस्तूर बेसिर-पैर की परी कथाएं, भूत-प्रेत-टोना-टोटका, अंधविश्वास, रूढ़ियों में जकड़े समाज की तसवीर पर आधारित बाल साहित्य ही देखने-पढ़ने को मिलता है। आदर्श अपनाने का आग्रह इतना तीव्र हैं कि बच्चे ऐसा बाल साहित्य क्यों पढ़ें? ऐसा साहित्य जिसमें उन्हें सीख, संदेश, आदेश, निर्देश देने पर ही जोर दिया जाता है। वीर बालक, सच्चा राष्ट्रभक्त बनने की पुरजोर वकालत करता साहित्य विपुल है। मजे़दार बात यह है कि अरबों रुपए कई अकादमियों पर हर साल खर्च हो रहे हैं। लेकिन एक राष्ट्रीय स्तर की बाल साहित्य अकादमी नहीं हैं। इससे बड़ी विडम्बना यह है कि बाल साहित्य के उन्ननयन के लिए अखिल भारतीय स्तर के सम्मान जिन्हें मिले हैं उनमें अधिकतर वे हैं जिन्हें बाल मनोविज्ञान और बालमन की समझ ही नहीं है। ऐसे सैकड़ों हैं जिनकी बाल साहित्य की एक नहीं, दो नहीं बीस-बीस पुस्तकें प्रकाशित हैं। लेकिन उनकी सभी रचनाओं को पढ़ते हुए बालमन की समझ रखने वाला कोई भी वयस्क ही अपना माथा पीट ले। फिर बालमन कैसे इनकी मोटी-मोटी पोथियां-ग्रन्थ पढ़ने को तैयार होगा !

कुछ ही बाल साहित्यकार हैं जो यह मानते और जानते हैं कि बच्चा भी अपनी उम्र के हिसाब से अपने अनुभव के स्तर पर हम बड़ों जैसा ही व्यक्तित्व है। हम बड़ों जैसा ही उसका स्तर है। वे ही बालमन को भाने वाली रचना लिख पाते हैं। इन दिनों बाल साहित्य की कई पत्रिकाएं बाजार में हैं। कई पत्र है, जो बाल साहित्य यदा-कदा प्रकाशित कर रहे हैं। इन सभी का औसत अनुपात निकाले तो मात्र तीन से दस फीसद सामग्री है जो बालमन के अनुरूप प्रकाश में आती है। ‘चकमक’ मासिक पत्रिका ही उम्मीद की एक किरण है, जो आस जगाती है कि भारत में, भारत के बच्चों के लिए कुछ मन-मस्तिष्क हैं जो सकारात्मकता के साथ उत्कृष्ट बाल साहित्य उपलब्ध करा रही है। रूम टू रीड, प्रथम बुक्स, एनसीईआरटी की बरखा सीरिज, तूलिका, भारत ज्ञान विज्ञान समिति ने कुछ किताबें पठनीय प्रकाशित की हैं।

भारत में बच्चे दोहरी मार झेल रहे हैं। अव्वल तो उनके मन को समझने वाले अधिकतर साहित्यकार ही नहीं हैं। दूसरा जो कुछ रहा-बचा छप रहा है तो वह बाजारवाद की चपेट में है। यानि यह बाजार तय कर रहा है कि कैसी सामग्री कैसे विज्ञापन और कैसी रचनाएं प्रकाशित हों। भारत में खासकर हिन्दी बाल साहित्य की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही है। अभी भारत के हिंदी भाषी राज्य अपने बच्चों को नागरिक के तौर पर देखने का मन ही नहीं पाए हैं। जब मन ही नहीं है तो उनके बारे में सोच कौन रहा है। जब उनके बारे में सोचा ही नहीं जा रहा है तो बालमन की नीतियां कैसे बनेंगी। जब कोई नीति ही नहीं हैं तो बच्चे कैसे साहित्य का आस्वाद ले रहे होंगे? 
क्या आप सोच पा रहे हैं?
॰॰॰
regional reporter,October 2016

-मनोहर चमोली ‘मनु’, पोस्ट बाॅक्स-23 पौड़ी 246001

mobile-09412158688
mail -chamoli123456789@gmail.com

22/10/2016

उत्तराखण्ड और बाल साहित्यकार manohar chamoli manu child literature

उत्तराखण्ड और बाल साहित्यकार

-रमेश चन्द्र पंत

राष्ट्रीय परिदृश्य में देखें, तो इस बीच बाल साहित्य ने अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है। एक समय था कि बाल साहित्य को बचकाना साहित्य से अभिहीत किया जाता था, किन्तु आज बड़ों के लिए अनेक वरिष्ठ एवं स्थापित साहित्यकारांे ने भी बाल साहित्य एवं रचनाधर्मिता से समृद्ध किया है। खड़ी बोली का विकास होने से पूर्व यह वर्षतः लोककथाओं, लोकगीतों एवं पहेलियों आदि के माध्यम से विभिन्न स्थानीय बोलियों में प्रस्फुटित होता रहा है। बाल साहित्य का उद्देश्य बाल मन का अनुरंजन होता है, तो किसी न किसी रूप में उसके व्यक्तित्व का विकास भी करना होता है। बालक के अन्तर्मन में मानवीय मूल्यों का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से बीजारोपण कर बाल साहित्य उच्चतर जीवन आदर्शों की ओर प्रेरित भी करता है।
श्रेष्ठ बाल साहित्य में किसी न किसी रूप में बच्चांे की विभिन्न मनोस्थितियों की अभिव्यक्ति होती है। उनकी रुचियों, छांव-आकांक्षाओं का अंकन या चित्रण होता है। विगत 2-3 दशकों में देखा जाए, तो हमारे सामाजिक जीवन में महत्तर परिवर्तन हो रहे हैं। इस परिवर्तन ने बाल मन को भी प्रभावित किया है। वैज्ञानिक प्रगति से कहीं न कहीं सोच में भी क्रान्तिकारी परिवर्तन आया है। बच्चों की बुद्धिलब्धि भी अकल्पनीय रूप से उच्चतर हुई है। प्रश्न उठता है, क्या समसामयिक सन्दर्भों के अनुरूप, बाल साहित्य भी परिवर्तित हो पाया है या कहें कि आधुनिक परिवेश के अनुरूप क्या बाल मन की अभिव्यक्ति संभव हो पाई है? उत्तर निश्चित ही ‘हां’ में है। बाल साहित्य ने इन सभी दृष्टियों से अपनी सार्थकता सिद्ध की हैै।
जहां तक उत्तराखण्ड में बाल साहित्य का प्रश्न है, तो परिदृश्य यदि अत्यन्त समृद्ध नहीं, आश्वस्तकारी तो है ही। आज हमारे मध्य अनेक ऐसे वरिष्ठ एवं युवा रचनाकार उपस्थित हैं, जिन्होंने अपनी महत्वपूर्ण रचनाधर्मिता के द्वारा राष्ट्रीय फलक पर एक ऐसी विशिष्ट पहचान बनाई है।
डाॅ.दिनेश चमोला ‘शैलेश’ इसमें एक महत्वपूर्ण नाम हैं। एक प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार के रूप में अपने बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भरपूर साहित्य का सृजन उन्होंने किया है। बच्चों के लिए 6 कविता संग्रह के साथ-साथ कहानियों की 44 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘टुकड़ा-टुकड़ा संघर्ष’ एवं ‘एक था राॅबिन’ बाल उपन्यास है। ‘पर्यावरण बचाओ’ एकांकी संग्रह। डाॅ.चमोला की रचनाओं में बाल मन की सहज स्वाभाविक उपस्थिति है। ‘‘गायें गीत ज्ञान-विज्ञान के लिए’ साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है। गीत एवं गजल केे लिए प्रख्यात डाॅ.अश्वघोष ने भी बच्चों के लिए काफी कुछ सार्थक एवं महत्वपूर्ण साहित्य रचा है। डाॅ.अश्वघोष में बाल मन के भीतर उतरने की अद्भुत सामथ्र्य है। ‘राजा हाथी’ एवं ‘वाइस्कोप निराला’ की कविताएं इसका प्रमाण हैं।
मुकेश नौटियाल की कहानियां, बच्चों के निर्मल एवं निश्छल मन की कहानियां हैं। लोकतत्व की उपस्थिति ने मुकेश नौटियाल की कहानियों को एक अतिरिक्त शक्ति दी है। समकालीन बाल साहित्य में आज यह गायब होता जा रहा है। आज इसे सहेजने की आवश्यकता है। बाल एवं किशोर वय बच्चों के लिए ‘हिमालय की कहानियांॅ’ संग्रह के अतिरिक्त ‘रूम टू रीड’ इंडिया, शैक्षणिक गतिविधियों के लिए समर्पित संस्था द्वारा कहानियों की चार चित्रात्मक पुस्तिकाएं प्रकाशित हो चुकीं हैं।
कहानियों के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण नाम है-मनोहर चमोली ‘मनु’। बाल साहित्य में एक दृष्टिसम्पन्न आलोचक के रूप में भी मनोहर चमोली ‘मनु’ ने एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है। बाल साहित्य के नाम पर इन दिनों काफी कुछ ऐसा लिखा जा रहा है, जिसकी कोई प्रांसंगिकता एवं उपादेयता नहीं। इन्हे प्रश्नांकित करना, आज के समय की जरूरत है और मनोहर चमोली ‘मनु’ इसे बखूबी कर रहे हैं। उनकी कहानियां भी नए भागों की महत्वपूर्ण कहानियां हैं। ‘अंतरिक्ष से आगे बचपन’ एवं ‘जीवन में बचपन’ कहानी संग्रह में इसे देखा जा सकता है। ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ एवं ‘पूछेरी’ नेशनल बुक ट्रस्ट दिल्ली से तथा ‘चाॅंद का स्वेटर’ ‘बादल क्यों बरसता है, ‘रूम टू रीड’ इंडिया द्वारा प्रकाशित चित्रात्मक पुस्तिकाएं हैं।
बाल साहित्य में रचनाकारों द्वारा नाटक एवं एकांकी कम ही लिखे जा रहे हैं। इस दृष्टि से महावीर रंवाल्टा ने अपनी समर्थ लेखनी के द्वारा एकांकी एवं कहानियों के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया है। ‘विनय का वादा’ कहानी संग्रह है।
शशि भूषण बडोनी की कहानियों में यथार्थ कहीं अधिक मुखर वाला बच्चों के जीवन के आस-पास, जो कुछ भी प्रिय-अप्रिय घट रहा है, उसे कहानी का रूप देना बडोनी की कथाओं की अपनी विशेषता है। कहानियां बच्चों को कहीं न कहीं बेहतर ढंग से जीने के लिए प्रेरित करती हैं। ‘लौटती मुस्कान’ 14 कहानियों का महत्वपूर्ण संग्रह है।
कविता हो या कहानी, दोनों ही विधाओं में बच्चों के मनोकूल नया, अर्थपूर्ण एवं मौलिक लिखने वालों में एक महत्वपूर्ण नाम है रविन्द्र रवि का। लीक से हटकर कुछ सार्थक लिखने की अपनी ही शैली है रवि की। सभी कुछ बच्चों की दृष्टि से देखने की कोशिश करते हैं वे और यही उन्हें बाल साहित्य के एक सफल रचनाकार के रूप में स्थापित करती है। ‘अधूरा सपना’ रतन सिंह किरमोलिया का कहानी संग्रह है। संग्रह में संकलित कहानियां, बच्चों में रचनात्मक ऊर्जा का संचार करने की दृष्टि से उपयोगी हैं। ‘गीते रसीले बच्चपन के’ एवं ‘बासन्ती गीत’ कविता संग्रह है।
‘राज बाल तरंगिणी’, ‘ममता बाल तरंग’, ‘ममता बाल वाटिका’, ‘ममता बाल चन्द्रिका’ एवं ‘ममता पद्य कथाएं’, ‘कभी सिखाएं कभी हसाएं’ राज किशोर सक्सेना ‘राज’ की प्रकाशित कविता संग्रह हैं। बाल मन की रुचियों के अनुरूप राज का रचना संसार अत्यन्त विस्तृत एंव वैविध्यपूर्ण है। बच्चों को मूल्यों के प्रति प्रेरित एवं उद्बोधित करने की दृष्टि से इन संग्रहों में प्रकाशित कविताओं की अपनी उपयोगिता है।
डाॅ.प्रीतम सिहं नेगी ‘अपछ्यांण’ ने बाल कविता के क्षेत्र में अभिनव प्रयोग किया है। बेटे पुलक पार्वत्य नेगी के द्वारा बनाए गए चित्रों पर उन्होंने बाल मन के अनुरूप सरस कविताओं की रचना की। ‘मेरी रचना’ कविता संग्रह इसी का प्रतिफल है
डाॅ.लक्ष्मी खन्ना ‘सुमन’ ने भी कविता, कहानी एवं उपन्यास द्वारा बाल साहित्य को अत्यन्त समृ( किया है। वरिष्ठ रचनाकार डाॅ.योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अक्षण’ की रचना धर्मिता भी अच्छे संस्कार एवं नैतिक मूल्यों के प्रति प्रेरित करती है। डाॅ.सुरेन्द्र दत्त सिमल्टी के कविता संग्रह भी प्रकाश में आ चुके हैं। ‘मीठे जामुन’ दय किरोला, ‘मेरा भारत देश महान’ विमला जोशी, ‘जीवन है अनमोल’ आनन्द सिंह बिष्ट के कविता संग्रह। ‘क्यों बोलते हैं बच्चे झूठ’ शशांग मिश्र ‘भारती’ का निबन्ध संग्रह है। अतुल शर्मा, रतन सिंह जौनसारी, विपिन बिहारी ‘सुमन’ एवं प्रभा किरण जैन की कृतियों ने भी उत्तराखण्ड के हिन्दी बाल साहित्य को दिशा दी है। ‘फूल’ डाॅ.उमेश चमोला एवं ‘बाल मन की सतरंगी कविताएं’, नवीन डिमरी ‘बादल’ कविता संग्रह भी इस दृष्टि से उलेखनीय है। डाॅ.नंदकिशोर हटवाल की कहानियों ने भी बाल साहित्य में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज की है।
उत्तराखण्ड के रचनाकार जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हिन्दी बाल साहित्य में अपनी रचना धर्मिता को रेखांकित कर रहे है, उनमें आशा शैली, डाॅ.प्रभा पंत, डाॅ.दीपा कांडपाल, के.रानी, डाॅ.पीताम्बर अवस्थी, वीणापाणी जोशी, रूप चंद्र शास्त्री, विनीता जोशी, मंजू पाण्डे, नीरज पंत, मोहन चंद्र पाण्डे, महेन्द्र प्रताप पाण्डे, सत्यानन्द बडोनी, शम्भू प्रसाद भट्ट ‘स्नेहिल’, भारती पाण्डे, हर प्रसाद रोशन, खुशाल सिंह, भगवत प्रसाद पांडे, गोकुलानन्द किमोठी, कालिका प्रसाद सेमवाल, डाॅ.यशोदा प्रसाद सिमल्टी आदि प्रमुख हैं।
स्पष्ट है कि इस समय विशेष में उत्तराखण्ड में सृजनरत अधिकांश रचनाकार महज कविता एवं कहानियों तक ही सीमित हैं। बाल साहित्य की अन्य विधाओं के प्रति रचनाकार उदासीन हैं। वैज्ञानिक सोच का विकास करने वाली रचनाएं भी कम ही लिखी जा रही हैं, जबकि आज जरूरत है कि इस दिशा में कुछ सार्थक सोचने व करने की।
 ॰॰॰
(मूल आलेख: प्रसिद्ध बाल साहित्यकार रमेश चन्द्र पंत, रीजनल रिपोर्टर, मासिक पत्रिका, अक्तूबर 2016)

-मनोहर चमोली ‘मनु’ मोबाइल-09412158688


मेल - chamoli123456789@gmail.com

19/10/2016

Pluto बचपन में ले जाने वाली प्लूटो बाल पत्रिका

प्लूटो का दूसरा अंक हाथ में है। जून-जुलाई 2016 का अंक। अमलतास से भरा आवरण। पूरा पेज अमलतास के फूलों से सराबोर।
कविता भी पढ़िएगा-
अ म ल ता स
तुम इतने पास
तुम इतने पास फूले
मैं तुम पर झूला
तुम मेरी आँखों में झूले!

पाँच से आठ बरस के बच्चों को ही ही नहीं यह हम सभी को बचपन में ले जाने वाली कविता है। यही नहीं इसे इस आवरण के साथ पढ़ें, महसूस करें और जिएँ तो खुशी तिगुनी हो जाती है। अन्तिम आवरण में भी प्रयाग शुक्ल की मज़ेदार कविता है। आप भी पढ़िए-
एक गमले में फूला फूल
हवा चली तो झूला फूल
फूल फूलकर फूला फूल
मोटा हो गया पतला फूल

बच्चों की मानिदं इस कविता का अपना ही मज़ा है। अपनी ही रंगत है और अपनी ही मस्ती है। 
भीतर के आवरण पर चित्रात्मक कविता प्रभात की है। छींक। 
आप भी पढ़िए-

मक्खी ने छींका आ छीं
मच्छर ने छींका मा छी
हाथी ने छींका ऊँ छी
चूहे ने छींका फूँ छीं 
चींटी ने छींका ऊँ ही
चींटे ने छींका फूँ हीं

तीन पेज पर छाई नन्हीं सी कथा ‘आँख खुली तो सपना गिर गया’ प्रकाशित है। चित्र बड़े मज़ेदार हैं। यह कहानी है शशि सबलोक की। चित्र बनाए हैं अंजता गुहाठाकुरता ने।
दो पेज की चित्रात्मक कहानी है चींटी की झपकी। इसे लिखा है विनता विश्वनाथन ने। यह तो और भी मज़ेदार बन पड़ी है। चित्र बनाए हैं वन्दना बिष्ट ने। 
दो पेज पर खोखल में दो महीने जानकारी सी देती कथा है। चित्र बनाए हैं सुजाशा दासगुप्ता ने। चिड़ा-चिड़ी।यह पक्षी धनेश है। चिड़ा मिटटी ला लाकर देता है। चिड़ी इस मिट्टी और अपनी बीट से खेखल को बद कर देती है। बस छोटी सी खिड़की खुली छोड़ देती है। चिड़ा खिड़की से चिड़ी को खाना लाकर दे रहा है। दो महीने अपने बच्चों के साथ अन्दर रहकर खोखल को तोड़क्र वह बाहर आती है। मज़ेदार।

इस अंक में चलो चिड़िया बनाएँ है। सात तरीकों के बाद आठवाँ प्रयास करने पर चिड़िया बनती है। रंगीन। बच्चों को भा जाने वाली गतिविधि है ये।
जी.ए. कुलकर्णी के बखर बिममची को याद करते हुए निमरा का बस्ता दी गई है। यह कहानी तो बेहद मज़ेदार है। बच्चों की सी कल्पनाएं निमरा की हैं। निमरा की माँ भी उसकी काल्पनिकता को पूरे पँख दे रही है। मस्त कहानी।
छोटी सी कहानी का एक अंश आप भी पढ़िए-
निमरा ने माँ से पूछा-‘‘ माँ, क्या हाथी की परछाईं हाथी से भी बड़ी दिखती होगी?’’, 
‘‘हाँ, पर हाथी की परछाई हाथी की तरह भारी नहीं होती।‘‘ माँ ने कहा। ‘‘हाथी की परछाईं हाथी की तरह ऊँची भी नहीं होती। और न ही उस पर बैठकर कहीं जा सकते हैं।’’

सुशील शुक्ल की कविता भी पढ़िए और आनन्द लीजिए -
एक थे भाई खट
एक थे भाई पट
कहीं पड़ी थी एक मटर
खट चिल्लाये खटर
पट चिल्लाये पटर
ही ही हू हू
हँसी के ठट्ठे
हट्टे कट्टे
लोग इकट्ठे
खट चिल्लाये पट 
पट चिल्लाये खट
भागो भाई झट
बिल में मटर
गई फिर बँट 
आधी खए खट
आधी खाए पट
वो देखो खट पट
सोये हैं सट सट।

इस अंक में मिट्टी के रंग की जानकरी विनता विश्वनाथन ने दी है। बीस पंक्तियों से भी कम। दो पेज में चित्रांकन के साथ संवारा है सुवजित सामन्ता ने । वाह !
चाँद पर चार पेज की चित्रकथा वो भी संवादहीन। कितने रंगों से भरी है यह! पर पता नहीं किसकी है। चित्र तो तापोशी घोषाल के ही हैं।
एक चित्रात्मक भरी कहानी और है -निडर चूहे। ये भी बड़ी मज़ेदार है। लगभग चालीन पंक्तियों की यह कहानी तीन पेज पर गई है। दो चूहों को एक मोबाइल मिलता है। मोबाइल में कुत्ते की आवाज है। वह बटन दबाते हैं तो आवाज से बिल्ली डर कर भागती है। 
एक संवाद आप भी पढ़िए-

‘‘कुत्ता अपनी आवाज़ को ढूँढ रहा होगा न?‘‘
‘‘हो सकता है।‘‘
‘‘पर उसकी आवाज़ तो हमारे पास है। अगर यह बिल में हमारे साथ रहेगी तो उसे कैसे मिलेगी?‘‘
‘‘तुम सही कह रहे हो भाई। हम इसे यही छोड़ देते हैं। क्या पता इस आवाज़ का कुत्ता इधर आए?‘‘
‘‘भाई, एक बात कहूँ?’’
बोल भाई, ‘‘हम चूहे ही अच्छे। हमारी आवाज़ हमारे साथ ही रहती है।’’

सुशील शुक्ल की कहानी रहमत दादा का झोला भी भावनापूर्ण और संवेदना से भरी है। एक बच्चा अपने दादा और दादा जी के दोस्त को याद करता है। दिलचस्प!
नीमगाँव भी एक सुन्दर कहानी है।
इस पत्रिका में चटनियाँ नियमित काॅलम बनाया गया है। इसमें छोटी-छोटी रोचक कहानियां-कविताएं हैं। जैमत काॅलम बनाया गया है। इसमें छोटी-छोटी रोचक कहानियां-कविताएं हैं। 
जैसे इस अंक में पढ़िएगा-
एक-

’अम्मी कहती हैं कि बैठा है’
ं पढ़िएगा-

एक-
अम्मी कहती हैं कि बैठा है
पर राशिद तो 
इस बात पर अड़ा है
कि कौआ खड़ा है।

दो-
कुछ खाने की ताक में
बाल घुस गया नाक में
ए आई आक छूँ
ज़ोर से छींक जूँ।
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आप ई ट्रांसफर के माध्यम से HDFC बैंक के खाता संख्या-50100067091186 
IFSC :HDFC0000134 पर सदस्यता शुल्क भेज सकते हैं। एक साल की सदस्यता 300 रुपए है। दो साल की 540 और तीन साल की 720 रुपए है। बैंक ड्राफ्ट या चेक तक्षशिला पब्लिकेशन के नाम से नई दिल्ली में देय होना चाहिए। तक्षशिला पब्लिकेशन सोसाइटी के लिए सुशील शुक्ल जी का साथ तापोशी घोषाल ने दिया है। पचास रुपए इसका मूल्य रखा गया है। भीतर कुछ चित्र शशि शेटये, जगदीश जोशी, शुद्धसत्व बसु और शोभा घारे ने बनाए हैं।

फिर से आपकी नज़र कि सम्पादक रीमा सिंह हैं। अतिथि सम्पादक के तौर पर सुशील शुक्ल हैं। पत्रिका का पता है- नाॅलेज सेण्टर, सी 404 बेसमेण्ट, डिफेंस काॅलोनी, नई दिल्ली 110024. 
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मनोहर चमोली ‘मनु’
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