19/09/2016

पत्रकार बनाम विकार

पत्रकार बनाम विकार

-मनोहर चमोली ‘मनु’


मैं लेखकों के सम्मान समारोह में पहुँचा तो वहां बतौर एक पत्रकार मेरा सहपाठी मिला। उसने मुझे पहचान लिया। कई सालों बाद वह मिला। अजनबी शहर था। उससे मिल मैं खुश हुआ। मैंने हैरानी जताई तो वह कहने लगा-‘‘भइए। पत्रकार हूँ। चील की नज़र रखते हैं हम पत्रकार।’’ 

हम एक ढाबे में बैठ गए। मैं लेखक हो गया हूँ। यह जानकर वह खुश हुआ। वह कहने लगा-‘‘सुना है लेखक बड़े काईयाँ होते हैं। क्या यह सही है?’’ मैंने जो तर्क दिए, वह उससे सहमत नहीं था। वह बोल पड़ा-‘‘एक-एक रचना को चार-छह जगह छपवाते हो। क्या यह ठीक है? पुरस्कार-सम्मान के लिए जुगत लगाते हो?’’


मुझे भी मौका मिल गया। मैंने कहा-‘‘एक जमाना था जब प्रिन्ट मीडिया के पत्रकार अपनी ख़बरों के छपने और छप जाने के बाद उन पर होने वाले विमर्श के लिए जाने जाते थे। वो दिन लद गए जब अव्यवस्था पर आधारित किसी भी ख़बर का तत्काल संज्ञान लिया जाता था। तब एक्सक्लूसिव ख़बर पर बाई-लाइन मिला करती थी।’’

यह शब्दावली सुनकर पत्रकार मित्र हैरान था। फिर उसे याद आया कि अपन तो तह तक कि जानकारी रखते हैं। 

मैंने अपनी बात बढ़ाई-‘‘एक बड़े क्षेत्र में अमुक ख़बर का पत्रकार कई दिनों तक जन सरोकारों की लड़ाई का वीर योद्धा माना जाता था। आज स्थिति उलट है। क्यों? कितना कमा लेते हो?’’ 

पत्रकार मित्र के शब्द थे-‘‘आज अख़बार चिथड़ा कंपनी हो चुके हैं। मिशनरी पत्रकारिता बनिए की नौकरी हो गई है। पत्रकार विकार हो गए हैं। गांधी आश्रम का झोला और गांधीगिरी का स्वभाव बीती बात हो चली है। खादी का कुर्ता पत्रकारों के आचरण से मलिन हो गया है। मैं जब आज की ख़बर भेजता हूं तो मुझे वह ख़बर आने वाले कल के अख़बार में मिले न मिले, इसका पक्का पता नहीं रहता। आने वाले कल के साथ सूरज तो आएगा लेकिन मेरी नौकरी का वह दिन भी होगा कि नहीं! यह संशय बना रहता है।’’

मैंने उदासी से पूछा-‘‘लेकिन पत्रकारों की जीवन शैली तो कहती है कि वे बहुत मज़े में हैं !’’

मित्र ने लंबी सांस छोड़ते हुए कहा-‘‘कब्र में मुर्दे का हाल मुर्दा ही जानता है। अधिकतर अख़बार में काम करने वाले पत्रकार तेल पंप में काम करने वाले कार्मिकों से भी बदतर स्थिति में वेतन पाते हैं। ये ओर बात है कि तेल पंप वाला गाड़ियों की टंकियों में तेल भरता तो नज़र आता है। लेकिन हम पत्रकार क्या भर रहे हैं, पता नहीं। अरे! निजी चालकों को मिलने वाला वेतन नहीं मानदेय मिलता है।’’

वह बोलता रहा-‘‘अख़बार मालिक जानते हैं कि कुछ पत्रकार कस्बाई पत्रकारिता करते हुए और प्रेस कार्ड का हवाला देते हुए गल्ले से चीनी ऐवें ही उठा लेते हैं। गेहूं की बोरियां तक उठा लेते हैं। किसी भी होटल में घुस कर जलपान, भोजन और डिनर भी कर लेते हैं। आबकारी विभाग के साथ-साथ कस्बें की अंग्रेजी-देसी की शराब की दुकान से बिना नागा बोतलें उठा लेते हैं। अधिकारियों-पुलिसकर्मियों के साथ रोज-रोज ख़बरों की पड़ताल के बहाने उठना-बैठना कर रोज की चाय आदि वहीं घुप्प कर लेते हैं। पत्रकार वार्ताओं के दौरान पिठाई-सा लिफाफा पकड़ लेते हैं। बार-त्योहार में मिठाई बटोरते हुए चारों ओर दिखाई देते हैं। पहले तो कलम-डायरी मांगते थे। अब पत्रकार विज्ञापन के साथ-साथ व्हाट्स एप और फेसबुक चलाने के लिए इंटरनेट पैक की मांग तक कर लेते हैं।’’

मैंने कहा-‘‘ये तो बढ़िया है।’’

मित्र ने फिर लंबी सांस छोड़ी-‘‘क्या खाक बढ़िया है। क्या हम नहीं जानते कि एक आम आदमी भी अख़बार पढ़ते समय दस में नौ गालियां हम पत्रकारों को देता है। हम जहां से गुजरते हैं। हमारे गुजरने के बाद ही पीठ पीछे वह गालियों की लड़िया जला देता है।’’

मैंने कहा-‘‘मान्यता प्राप्त पत्रकारों की क्या हालत है?’’

मित्र उदास हो गया। कहने लगा-‘‘वहां तो और गफलत है। वे कुछ हैं जो बड़ी मेहनत से स्वतंत्र पत्रकार का तमगा लगाए हुए हैं। अच्छी खबरें बनाते हैं। पर उन ख़बरों पर असर क्या खाक होता है। आजादी के बाद कोई भी पत्रकार अपनी पांच खबर बता दे जिस पर व्यवस्था ने संज्ञान लेकर स्थिति कायापलट कर दी हो। चोरी-चकारी, अपराध, लूट, अपराध, सामाजिक वैमनस्य सब बढ़ा ही तो है। स्वतंत्र पत्रकारों को अब अपनी सदस्यता बचाए बनाए रखने के लिए खूब मशक्कत करनी पड़ती है। सूचना विभाग के साथ-साथ सूबे के राज्य लोक सूचना संपर्क विभाग के आला अफसरों की हंसी के साथ बेमेल हंसना पड़ता है। उनकी हां में हां मिलानी होती है। हां बस रोडवेज में यहां वहां यात्रा करने का कार्ड फोकट का मिला हुआ है बस। कोई मानदेय थोड़े न मिलता है!’’

मैंने पूछा-‘‘लेकिन गली-मुहल्लों से प्रकाशित पत्र-पत्रिका के संपादक क्या और पत्रकार क्या ! गाड़ी-घोड़ा-बंगला, बच्चों को कान्वेंट में पढ़ा रहे हैं। दो से तीन जगह जमीने ली हुई हैं। यह सब कहां से? कैसे?’’

मित्र ठहाके लगाकर हंसने लगा। कहने लगा-‘‘सब भ्रम है। कुछ सच्चाई भी है। अब रहने दो।’’

मैंने मित्रता का वास्ता दिया तो कहने लगा-‘‘हम पत्रकार कमजोर नस पकड़ते हैं। मंत्रियों की, संत्रियों की, बड़े-बडे रसूखदारों की। अधिकारियों की। बस होल ही गोल हो जाता है। प्रभाव में न आया तो ख़बर। प्रभाव में आया तो अपन का अभाव खल्लास।’’

मैंने मज़ाक में कहा-‘‘यदि जिन्हें आप गली-मुहल्ले के पत्रकार कह रहे हो, उनकी संपत्ति की जांच हो जाए तो?’’

मित्र सतर्क हो गया। कहने लगा-‘‘नप जाएंगे। एक बात और हम पत्रकार तभी तक शेर हैं, जब तक हमारे पास पत्रकारिता का तमगा है। जैसे ही हम अख़बार से निकाले जाते हैं तब हम पर कुत्ता भी नहीं भौंकता। और हां जब हम नपते हैं तो पुलिस बाघ बनकर हम पर टूट पड़ती है। जब तक जमानत-छुड़वा-छुड़वाई होती है, तब तक खूब बज पड़ते हैं। अब जिसके बजते हैं वो कहां बतायेगा कि हुजूर आते-आते बहुत देर कर दी। बेचारा कई दिनों तक मलहम-सेक करता है वह भी चुपचाप।’’

मैंने कहा-‘‘तुम कुछ ज़्यादा ही बोल रहे हो। नाम-हाम तो खूब रहती है। आपके बजे क्या?’’

वो इधर-उधर देखते हुए चिल्ला-सा पड़ा। कहने लगा-‘‘क्या खाक नाम-हाम है हमारी ! क्या बकत है हमारी? वो तो अच्छा है कि मुर्दा अपनी मुर्दा-पड़ोसी में यह नहीं जान पाता कि कितने आते हैं और कौन आते हैं। नहीं तो हमारी शवयात्रा में शोकसंतप्त जुटाने वाले जुटाना एक्सक्लूसिव ख़बर जुटाने से कम नहीं।’’

मैं उठकर जाने लगा। मित्र कहने लगा-‘‘यार बुरा मान गए। जैसे कि तुम खुद पत्रकार होंगे। इतना तो बुरा मुझे भी नहीं लग रहा है जो मैं खुद पत्रकार हूं। वो भी बाकायदा पत्रकारिता में नंबर एक के विश्वविद्यालय की डिग्री लेकर प्रशिक्षण पाया हुआ हूं। अगर सूबे के सभी पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता खगाल ली जाए तो अधिकतर हाई-स्कूल-इण्टर फेल पाए जाएंगे।’’

मैंने फिर कहा-‘‘यार। बिना पड़ताल किए कैसे बोल रहे हो? शरम करो।’’

वह हंसा। हंसता ही रहा। कहने लगा-‘‘यूं ही पत्रकारिता को लोकतंत्र का सशक्त स्तंभ नहीं कहा गया। वो दिन लद गए।  आज तो पत्रकारिता करने वाले को संस्कार की नहीं, शिक्षा की नहीं, अध्ययन की नहीं, संयम की नहीं, संतोष की आवश्यकता नहीं। आज तो वह जितना नीचे गिर सकता है, उसे गिरना पड़ता है। तभी तो वह कुछ लिखेगा। बुराई पर लिखने के लिए बुरा भी तो बनना पड़ता है। बुरा भी होना पड़ता है। पत्रकारिता कोई न्यायपालिका तो नहीं है न कि सैकड़ों रातें जागकर, कानूनों की पोथियां पढ़कर उसके द्वार के भीतर के लायक बनना होता है। हर मुकदमें में पढ़ना पड़ता है।’’

वह कुछ याद करता हुआ बोला-‘‘आज तो पत्रकार बाबू सा काम भी नहीं करते। जो छपवाना है, वो लिखकर लाना होता है। चार बजे से पहले लाना होता है। अब ख़बर छपवाने वाले को पहले खुद समझना होता है कि इन्ट्रों क्या होता है। हैडलाइन क्या बनेगी। खबर में क्या, क्यों, कैसे, कौन, कब, कहां किस तरह फिट होगा। चलता हूं। मूड बनाने का वक्त हो गया है। देखता हूं किस दरवाजे खड़ा होना होगा। शाम होते ही पेट जलने लगता है। और हां चाय के पैसे दे देना। क्या जेब में एक लाल वाला गांधी पड़ा है? बच्चे की फीस देनी है कल।’’

उसे पांच-पांच सौ के दो नोट देकर विदा किया। लेकिन मैं अब तक सोच रहा हूं। क्या पीत पत्रकारिता के भी हिस्से हो गए हैं। वैसे मैं जितने पत्रकारों को जानता हूं, उनमें से अधिकतर दूसरी नौकरी में चले गए हैं। रहे-बचे समाज में अपनी हैसियत-इज्ज़्त को बचाते हुए छटपटाते दीखते हैं। कुछ शराबी हो गए हैं। लेकिन ऐसे भी हैं जो आज भी अध्ययनशील हैं। मननशील हैं। सामाजिक अव्यवस्थाओं पर पसीजते हैं। जिनका आज भी रुतबा है। जिन्हें देखकर लोग अदब से सिर झुकाते हैं।

एक पत्रकार मित्र से मिलने उसके घर गया। उसका परिवार ससुराल गया हुआ था। आवाज दी तो वह भीतर से बोला-‘‘चले आओ। खुला है।’’ मैं अंदर गया। देखा साहब बिना दरवाजा बंद किए हग रहे हैं। बदबू से घर सड़ांध मार रहा है। मैंने नाराजगी जताई। कहा-‘‘हद है, दरवाजा तो बंद रखो।’’

वह तपाक से बोला-‘‘बारह घंटे का किया-धरा खुद काहे सुंघूं?’’ 

मैंने उसके घर के सारे पंखें चालू किए। वह कहने लगा-‘‘रहने देता। अगरबत्ती जलाता हूं। क्या करें धन्धा ही ऐसा है। सुबह उठते समाचार में नकारात्मक ख़बरें पढ़ता हूं। नकारात्मक ही भेजता हूं। समाज के प्रति नकारात्मक सोचते-सोचते खुद भी नाकारा हो गया हूं। कभी-कभी अपने पेशे पर शरम आती है और खुद पर भी।’’

मैं क्या कहता। एक जनहित की ख़बर बताने उसके द्वार पर गया था। बताई भी। एक महीने बाद देखा पत्रकार उस संबंधित विभाग के आला अफसर की ही गाड़ी में बाजार में घूम रहा है।

अब तक सोच रहा हूं कि यह मित्र किन पत्रकारों की बात कर रहा था। क्या आप भी पत्रकारों से कुछ वास्ता रखते हैं? यदि हां तो आपका अनुभव क्या कहता है? 
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(विधा: व्यंग्य)
-मनोहर चमोली ‘मनु’,डिप्टी धारा मार्ग,पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड।