28/06/2013

आजकल के बच्चे न तो कहानी पढ़ रहे हैं न ही सुन रहे हैं

‘आजकल के बच्चे न तो कहानी पढ़ रहे हैं न ही सुन रहे हैं।’

 ‘बालपत्रिकाएं भी सिमटती जा रही हैं।’ 

‘बच्चे कार्टून ही पसंद करते हैं।’


 इस तरह के जुमले आए दिन सुनने को मिलते हैं। लेकिन यह तसवीर आधी-अधूरी है। हाल ही में मुझे तेरह से अठारह साल के लगभग एक सौ से अधिक बच्चों के साथ एक दिन बिताने का मौका मिला। यह बच्चे चार अलग-अलग सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले या पढ़ चुके बच्चे थे। कहानी लेखन एक दिन में तो हो नहीं सकता था। फिर भी मैंने कोशिश की कि बच्चों के साथ कहानी कला पर औपचारिक बात की जा सके। मैंने प्रख्यात लेखक रामदरश मिश्र की कहानी ‘पानी’ का खुद सस्वर वाचन किया। मैंने कोशिश की कि सभी बच्चों को कहानी के संवाद उसी लहज़े में सुनाई दें, जिस लहज़े में वे कहानी में कहे गए हैं। आप भी कहानी की कथावस्तु पढ़ लीजिए। 
'पानी' कहानी में मंगल और उसके बेटे रामहरख को रास्ते में साइकिल से गिरे परमेसर बाबू बेहोश पड़े हुए मिलते हैं। रामदेव गांव में ऊंची जाति के बड़े काश्तकार हैं। गांव के हर बड़े-छोटे उनकी चैपाल पर आकर बैठते हैं। परमेसर बाबू उन्ही का बेटा है। मंगल और उसका परिवार बरसों से रामदेव के यहां बेगार करता रहा है। तंग आकर जब मंगल ने रामदेव की हलवाही छोड़ दी तो गुंडों ने लाठी से पीटा अलग और उनकी झोपड़ी उजाड़ दी थी। ठाकुर बामन और छोटी जात का मसला गांव में है। रामहरख शहर में पढ़ने लगा है। वह पुरानी बात याद कर अपने पिता को परमेसर बाबू को इसी हाल में रहने देने के लिए राजी कर देता है और दोनों आगे बढ़ने लगते हैं।  फिर भी मंगल को लगता है कि प्यासा तड़प रहा कोई जानपहचान के आदमी को यूं ही छोड़कर आगे बढ़जाना अधर्म है। वह लौट पड़ता है और रामहरख भी पीछे-पीछे लौट पड़ता है। 

बेहोश परमेसर पानी मांगता है। जून की दोपहरी में अब पानी कहां से लाया जाए। उनके पास लोटा-डोरी था और पास में कुआं भी था। रामहरख कहता है कि एक तरफ इन्सानियत है और दूसरी तरफ उनकी छोटी जाति। अब क्या करें। मंगल जवाब देता है कि इन्सानियत जाति से बड़ी होती है। रामहरख कुएं से पानी भर कर ले आता है। फिर दोनांे उसे पानी पिलाते हैं। यही नहीं दोनों उसे किसी तरह उनके घर पहुंचाते हैं। 

रामदेव बाबू पूजा में बैठे हुए थे। दरवाजे पर गांव के कई लोग थे। पूछा तो मंगल ने सारा किस्सा सुना दिया। पानी का नाम सुनकर रामदेव खड़े हो जाते हैं और दोनों को धर्म नष्ट करने की बात कहते हैं। गुस्से में आकर वह मंगल पर अपनी खड़ाऊं खींच कर दे मारते हैं। रामहरख प्रतिकार करता है। रामदेव दाण्ेनों को भाग जाने की सलाह देता है।तभी परमेश्वर बाबू दोनों को अपने पास बुलाने की बात कहते हैं। वह मंगल को चाचा कहकर संबोधित करता है। ठाकुर रामदेव चिल्लाता है। रामदेव बहस करने लगता है और कहता है कि जान बचाने वाले के लिए यदि इस घर मंे कोई जगह नहीं है तो मैं भी इस घर में नहीं रह सकता।

 बुखार से तप रहा परमेश्वर धम्म से खाट पर से नीचे गिर पड़ता है। रामदेव का पुत्र मोह जागता है और वेदना भरी निगाहों से वह मंगल और रामहरख को देखता है। मंगल ओर रामहरख चुपचाप अपने रास्ते की ओर चल पड़ते हैं।  


मैंने इस कहानी का चयन बस इस लिहाज़ से किया था कि इसके वाक्य सरल हैं। पात्रों के लिहाज़ से भी यह मुझे उचित लगी। पृष्ठभूमि भी ग्रामीण थी। कहानी को पूर्व में पढ़ते समय मैंने अनुमान लगाया था कि बच्चों के साथ कहानी पर बातचीत शुरू करने में संभवतः थोड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

कहानी पढ़ लेने के बाद जब मैंने बच्चों से यह कहा कि अब इस कहानी पर बातचीत करनी है। एक-एक कर कई बच्चे अपनी बात रखने को आतुर दिखे। बताता चलूं कि अभी मैंने कहानी के शिल्प पर या कहानी की विशेषताओं पर कोई बात नहीं की थी। मैंने बच्चों के साथ चार घण्टे बिताए। बच्चों ने अंत में कई सारी कहानियों की विषयवस्तु मुझे बताई, जिसे वे कहानी की शक्ल देना चाहते हैं। लेकिन इससे अच्छा बच्चों को कहानी सुनना ज्यादा पसंद आता है। वे कहानियों पर तर्क करना चाहते हैं। अपने विचार व्यक्त करना चाहते है। 

बच्चों के पास अपना नजरिया होता है। वह इतना ठोस और तर्क से भरा होता है कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि जीवन को बच्चे भी बेहद गहराई से देखते हैं। महसूस करते हैं। मैं इस नतीजे पर पहूंचा हूं कि बच्चे चाहते हैं कि वे कहानी सुने और पढ़ें। वे यह भी चाहते हैं कि उनकी बात को सुना जाए। जब वे इतना सब चाहते हैं तो लिखना भी चाहेंगे। मैं जो थोड़ा बहुत बच्चों की मनःस्थिति को समझ पाया हूं, उनमें कुछ आपके सामने रखने की कोशिश करता हूं। 

ऽ    कहानी का कथ्य अच्छा हो और कहन स्पष्ट हो तो श्रोता अंत तक कहानी को धैर्य से सुनते हैं।

ऽ    कहानी यदि सरल और सहज हो। संवादांे में पिरोई हुई हो, तो श्रोता को आनंद आता है। 

ऽ    कहानी यदि किसी घटना या आकस्मिक कही गई रोचक बात से शुरू हो तो रोचकता बनी रहती है। 

ऽ    कहानी के पात्रों में यदि असहमतियां हों, विचारांे मंे भिन्नता हो तो जिज्ञासा बनी रहती है। 

ऽ    कहानी का परिवेश कुछ ऐसा हो कि श्रोता उसके देश काल और परिस्थितियों की कल्पना करने लगें तो कहानी पर बातचीत की संभावना बढ़ जाती है।

ऽ    कहानी के पात्रों के नाम और उनका स्वभाव भी चित्रित हो, तो रोचकता बनी रहती है। 

ऽ    भले ही कहानी सीधी और सपाट रास्ते से चल रही हो, लेकिन कहानी की कथा में जिज्ञासा बनी रहे तो कहानी की लोकप्रियता में कोई संशय नहीं हो सकता। 

ऽ    कहानी में कोई प्रकरण,बात,मुद्दा या पात्र केन्द्र में हो तो श्रोता कहानी के विविध पक्षों पर विचार करने लगता है। 

ऽ    कहानी में हर पात्र के चरित्र का चित्रण उसके संवादों से ही उभरे तो श्रोता को सीख देने और समझाने का भाव नहीं आता। श्रोता चरित्रों के आचरण और बातचीत से ही उनके गुणों का आकलन कर लेते हैं। 

ऽ    कहानी के शीर्षक पर श्रोता अपनी बेहतरीन राय देते हैं। एक कहानी के कई शीर्षक श्रोता रखे गए शीर्षक से अच्छा सुझा पाते हैं। इसका अर्थ यही हुआ कि श्रोता कहानी को गहरे से आत्मसातृ कर रहे होते हैं। यह जरूरी नहीं कि लेखक ही कहानी का सबसे सटीक और अंतिम शीर्षक रखने में माहिर हो।

ऽ    श्रोता कहानी के बाद बड़ी आसानी से और विचार कर पात्रांे के व्यवहार मंे गुण-दोष निकाल लेते हैं। वह यह भी सुझा देते हैं कि फलां पात्र को ऐसा नहीं कहना चाहिए था। फलां पात्र को ऐसा नहीं करना चाहिए था।

ऽ    श्रोता हर कहानी के सामाजिक यथार्थ का भी आकलन कर लेते हैं। कई बार लेखक के द्वारा किसी चरित्र के साथ भरपूर न्याय होता-सा नहीं दिखता। श्रोता कहानी के आगे की कहानी भी गढ़ लेते हैं। यह कहानी की सफलता ही मानी जानी चाहिए कि कहानी के अंत हो जाने के बाद भी श्रोता कहानी के भीतर और कहानियों को खोज लेते हैं और चर्चा में उसे रेखांकित करते हैं। 

ऽ    श्रोता कहानीकार से यदि पात्र ऐसा कहता, यदि कहानी में कुछ ऐसा हो जाता तो कैसा होता। ऐसी कई संभावनाओं को तार्किकता के साथ रखते हैं। यह बेहद महत्वपूर्ण है। यह जरूरी नहीं कि जब कहानी रची गई हो, तब भी और अब भी जब कहानी पढ़ी या सुनी जा रही हो, में समाज मंे सामाजिक-राजनैतिक और परम्परागत संस्कार एक जैसे रहे हों। दूसरे शब्दों में कहानी कभी मरती नहीं। हां उसके मायने आज के सन्दर्भ मंे कुछ बदल जाते हैं। या यह भी संभव है कि यदि कथा यथार्थ से मेल नहीं भी खाती है तो श्रोता उस देशकाल और परिस्थितियों की कल्पना कर लेते हैं। यह कहानी की विशेषता मानी जानी चाहिए। 

ऽ    तमाम मत-मतांतर के और कहानीकार की विहंगम दृष्टि के बाद भी श्रोता कहानी से जो आनंद ले पाया है उसे हमेशा संदेश-सीख और निष्कर्ष के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। हम आज जो कहानी एक समूह में सुनाते है वही कहानी कल किसी दूसरे समूह में सुनाते हैं तो एक ही कहानी पर जुदा-जदुा राय-मशविरा सामने आते हैं। लेकिन श्रोता की राय से हर बार इत्तफाक न रखना भी ठीक नहीं है। 

ऽ    श्रोता यह जानते हुए भी कि कहानी काल्पनिक हो सकती है। कहानी आनंद के लिए होती है। कहानी में जरूरी नहीं कि सब कुछ वास्तविक सा हो। फिर भी श्रोता चाहते हैं कि कहानी में आदर्शात्मकता से अधिक कुछ तो यथार्थ का अंश हो। यानि अधिकतर श्रोता चाहते हैं कि कहानी में किसी भी पात्र के साथ अन्याय न हो। इसका अर्थ यह हुआ कि कहानी मानवीय मूल्यों की रक्षा करती हुई होनी ही चाहिए। 
सही भी है कि यदि दुनिया में नैतिकता और मानवता ही न रहे तो यह समाज मानव समाज कहां कहलाएगा। लेकिन श्रोता इसे ठूंस गए जबरन थोपे जाने वाली शैली से स्वीकार करना नहीं चाहते।  

कुल मिलाकर यह कहना गलत न होगा कि हम बड़े बिना बच्चों से गहराई से बात किये बिना बालसाहित्य की दिशा और दशा पर विद्धता भरे विचार व्यक्त कर देते हैं। 
मुझे लगता है कि बालसाहित्य का भविष्य उज्जवल है और बच्चे साहित्य से विमुख हो ही नहीं सकते।

26/06/2013

उत्तराखण्ड के जनपद उत्तरकाशी में आयोजित राष्ट्रीय बालसाहित्य संगोष्ठी

     राष्ट्रीय बालसाहित्य संगोष्ठी 
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उत्तराखण्ड के जनपद उत्तरकाशी में आयोजित राष्ट्रीय बालसाहित्य संगोष्ठी में शामिल होने का मौका मिला। यह संगोष्ठी बाल प्रहरी और अजीम प्रेमजी फाउण्डेशन के तत्वाधान में सम्पन्न हुई। सात जून से प्रारम्भ हुई यह संगोष्ठी 9 जून 2013 को समाप्त हुई। बाल प्रहरी की बाल साहित्य संगोष्ठी में पहली बार शामिल होने का अवसर मिला। अच्छा लगा। तीन दिवसीय संगोष्ठी में बाल साहित्य में विज्ञान लेखन, बाल साहित्य में बाल पत्रिकाओं का योगदान, बालसाहित्य एवं शिक्षा, बाल विज्ञान कथा विश्लेषण के साथ-साथ अप्रत्यक्ष तौर पर बाल कविता पर भी चर्चा हुई।
अजीम प्रेमजी फाॅउण्डेशन के सहयोग से यह संगोष्ठी सम्पन्न हुई। बाल साहित्य में विज्ञान लेखन सत्र बेहद महत्वपूर्ण रहा। किन्तु इस सत्र में व्यापक बहस और चर्चा की आवश्यकता महसूस की गई। सभी सत्रों में दो-दो बाल साहित्यकारों को सत्रों पर अपनी बात रखने का अवसर दिया गया था। फिर अध्यक्षीय संबोधन भी था, किन्तु समयाभाव के कारण प्रत्येक सत्र में विशेषज्ञों और अध्यक्षीय संबोधन में अधिक प्रकाश डालने के कमी अवश्य खली। खुला सत्र में पर्याप्त समय के अभाव के चलते कई प्रश्न और जिज्ञासा बंद रह गए। उपस्थित बाल साहित्यकार हर सत्र में अपनी बात रखना चाह रहे थे, लेकिन सत्र संचालकों ने खुले सत्र को भी तीन चार प्रश्नों तक ही समेट दिया। कारण स्पष्ट था कि अगले सत्र के प्रारम्भ होने की भी चिंता थी।
इसके साथ-साथ एक बात और देखने को मिली कि संबंधित सत्रों के लिए पृच्छा विषय से इतर अनावश्यक अधिक रही। अपनी बात कहने वाले और प्रश्न पूछने वाले सहभागी विषय से भटकते रहे। यही कारण रहा कि अपेक्षित समय भी अनावश्यक चर्चाओं में जाया हुआ। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आगामी संगोष्ठियों में विभिन्न सत्रों के चलते एक मुख्य सत्र ही रखा जाए।
    यदि उपरोक्त सत्रों के हिसाब से नये और उदीयमान बाल साहित्यकारों की सहभागिता देखी जाए और निष्कर्ष के रूप में कुछ सार निकाला जाए तो संभवतः कोई भी सत्र अपने सार-निष्कर्ष तक नहीं पहंुच पाया। यानि हर सत्र के विषय और गंभीर चर्चा और बहस की दरकार रखते थे।
अमूमन संगोष्ठियों में ऐसा ही होता है, लेकिन व्यवस्थित और समयपूर्व यदि तैयारी हो तो सत्रों के विशेषज्ञों के विचार लिखित में सहभागियों को बंट जाएं। इससे सहभागी भी अपनी पूर्व धारणा और एक्सपर्ट के विचारों से मानसिक रूप से जुड़ सकते हैं और बहस-चर्चा के उपरांत एक राय तक पहुंच सकते हैं। संभव है कि कई बार विशेषज्ञों का आना ऐन वक्त पर टल जाता है, तो दूसरे विकल्प पर भी आयोजकों को विचार कर लेना चाहिए।
एक बात और है कि सहभागी भी कई बार मूल चर्चा-प्रश्न-बहस से इतर भटक कर चर्चा को नई और अतार्किक बहस की और ले जाते हैं। कई बार सहभागियों की इच्छा यह भी रहती है कि उन्हें भी सुना जाए, उनके काम और उपलब्धियों पर भी रोशनी पड़ जाए। लेकिन किसी समयबद्ध और तय सत्रों के मध्य ऐसा कर पाना और ऐसा हो पाना संभव नहीं होता।
    मुझे तो ये लगता है कि या तो संगोष्ठियों में सभी सहभागी अपना जीवन वृतांत और उपलब्धियों का विवरण सहभागियों की संख्या के अनुसार छायाप्रति लेकर आएं और सबको बांट दे। या फिर आयोजक ऐसा स्लाइड शो तैयार करे जिसमें उपस्थित सभी सहभागियों का विवरण सब देख लें। अधिकतर संगोष्ठियों में सहभागी सुनने कम सुनाने ज्यादा लगते हैं। वह भी विषय से हटकर और उद्देश्यविहीन बातों पर समय बिताने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि मुख्य सत्रांे के गंभीर व्याख्यान सारगर्भित होते हुए भी अपना वह असर नहीं छोड़ पाते जो उन्हें तय करते समय संभवतः आयोजकों ने सोचें हों या जिनकी संभावना रही हो। 
संगोष्ठियों को विधावार भी होना चाहिए। बाल कवि, बाल कथाकार को भी चाहिए कि वाह बाल नाटककार को सुने। महसूस करे। अन्य विधाओं पर भी संगोष्ठी हो सकती है। बालसाहित्य पर चर्चा विहंगम दृष्टिकोण चाहती है। अच्छा हो कि हम कहानी, कविता, नाटक, डायरी लेखन, उपन्यास, आदि विधाओं को अलग-अलग संगोष्ठियों का हिस्सा बनाएं। एक तो सहभागी अधिक हो सकेंगे और विशेषज्ञ कम। दूसरा अन्य विधाओं से भी परिचय हो सकेगा। अक्सर बाल साहित्यकार कविता और कहानी में खुद को बेहतर समझते हैं और इस पर अपनी अच्छी पकड़ मानकर चलते हैं। जबकि हम सब जानते हैं कि सीखने-जानने और खुद को तराशने की संभावना हमेशा बनी रहती है।
विषम परिस्थितियों में और उत्तरकाशी में तीन दिवसीय आयोजन होना अपने आप में उपलब्धि है। बाल प्रहरी के साथ-साथ अजीमप्रेमजी फाउण्डेशन भी और दूर-दूर से आने वाले बाल साहित्यकार बधाई के पात्र हैं।
संगोष्ठी में उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, बिहार , राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, झारखण्ड, गुजरात राज्यों के सौ से अधिक बालसाहित्यकारों एवं साहित्यप्रेमियों ने सहभाग किया। दस से अधिक बाल साहित्य पर केन्द्रित पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। बाल साहित्य संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा संग्रहीत नई-पुरानी बाल साहित्य पत्रिकाएं प्रदर्शनी में अवलोकनार्थ भी रखी गईं। बाल साहित्यकारों ने बाल कविताओं पर आधारित कवि सम्मेलन में भी सहभाग किया। बाल साहित्यकारों में प्रमुख रूप से डाॅ0 राष्ट्रबंधु, मुरलीधर वैष्णव, गुरुवचन सिंह,राजेश उत्साही, डाॅ0रामनिवास ‘मानव’, रमेश तैलंग, डाॅ0हरिश्चन्द्र बोरकर, गोविन्द भारद्वाज, डाॅ0 भैरूलाल गर्ग, डाॅ महावीर रंवाल्टा, डाॅ0 परशुराम शुक्ल, डाॅ0मधु भारतीय, डाॅ0अशोक गुलशन, मुरलीधर पाण्डेय, डाॅ प्रीतम अपच्छयाण, रेखा चमोली, विमला भण्डारी, अमरेन्द्र सिंह, खजान सिंह, डाॅ शेषपाल सिंह शेष, अखिलेश निगम, देश बन्धु शाहजहां पुरी, दयाशंकर कुशवाहा, गोविन्द शर्मा, रतन सिंह किरमोलिया, नीरज पंत, प्रमोद पैन्यूली, मंजू पाण्डे उदिता, जगमोहन कठैत, जगमोहन चोपता,  उदय किरौला, नवीन डिमरी बादल, मोहन चैहान, सतीश जोशी, प्रदीप बहुगुणा ‘दर्पण’ (सभी के नाम शामिल न करने का खेद है) आदि ने विभिन्न सत्रों में अपने विचार भी व्यक्त किये।
000 मनोहर चमोली ‘मनु’
काण्डई,पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी,पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड 246001.
सम्पर्कः 09412158688.
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