03/10/2012

बालहंस, अक्तूबर- प्रथम, 2012. : 'देनहार कोई ओर है.'


देनहार कोई ओर है

-कथा: मनोहर चमोली ‘मनु’

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     बहुत पुरानी बात है। एक राजा था। विजय प्रताप सिंह। विजय प्रताप सिंह दानवीर था। उसके दरबार में कोई याचक आता तो खाली हाथ न लौटता। धीरे-धीरे याचकों की संख्या बढ़ती गई।
एक दिन की बात है। राजा ने अपने विश्वासपात्र सेवक बनवीर को बुलाया। राजा ने कहा-‘‘बनवीर। राजमहल में कोई भी आए। वह खाली हाथ न लौटे। रोटी,वस्त्र और कुछ मुद्राएं तुम स्वयं अपने हाथ से प्रत्येक याचक के हाथ में सौंपोगे। ध्यान रहे कोई मायूस होकर न दरबार से न लौटे।’’
बनवीर आज्ञाकारी और अपने काम के प्रति निष्ठावान था। उसने राजा के कहे अनुसार दान देने का कार्य संभाल लिया।
अब तो हर रोज याचकों की भीड़ सुबह-सवेरे ही राजमहल के द्वार पर लग जाती। बनवीर एक-एक याचक को तय दान सामग्री देता। याचक हाथ जोड़कर बनवीर को ढेर सारा आशीर्वाद देते। राज कर्मचारी जहां भी जाते, प्रजा के मध्य बनवीर की ख्याति सुनते। यह बात सेनापति और मंत्री को अच्छी नहीं लगी। दोनों ने मिलकर राजा से बनवीर की शिकायत कर दी। राजा ने बनवीर को बुलाते हुए पूछा-‘‘बनवीर। यह मैं क्या सुन रहा हूं। सुना है तुम याचकों के चेहरा तक नहीं देखते। तुम्हें दान सामग्री निपटाने की जल्दी रहती है। क्या यह सच है?’’
बनवीर ने हाथ जोड़ते हुए जवाब दिया-‘‘महाराज। यह सच है कि मैं दान करते समय किसी याचक का चेहरा तक नहीं देखता।’’
‘‘सुना महाराज। बनवीर ने स्वयं स्वीकार कर लिया है। इसका अर्थ यह हुआ कि कई याचक कई बार राजमहल से दान सामग्री ले जाते होंगे।’’ मंत्री ने जोर देकर कहा।
‘‘हो सकता है महाराज। कुछ याचक दोबारा दान सामग्री ले जाते होंगे। लेकिन मैं याचकों से नज़रें नहीं मिला सकता।’’ बनवीर ने सिर झुकाते हुए कहा।
राजा ने पूछा-‘‘क्यों? तुम याचकों के चेहरे पर नजर क्यों नहीं डालना चाहते?’’
बनवीर का सिर झुका ही रहा। उसने धीरे से कहा-‘‘महाराज। देनहार कोई और है देत रहत दिन रैन। लोग भरम हम पर धरैं याते नीचे नैन।’’
    सेनापति बीच में ही बोल पड़ा-‘‘बनवीर इस समय विद्वता मत बघारो। सीधे जवाब दो।’’
    बनवीर ने मुस्कराते हुए जवाब दिया-‘‘राजन्। यह सही है कि दान मेरे हाथों से होता है। जिस कारण याचक मुझे ही दाता समझते हैं। वे दान लेते समय मुझे हाथ जोड़ते हैं। मगर मैं तो मात्र आपकी आज्ञा का ही पालन कर रहा हूं। वास्तव में दान तो आप कर रहे होते हैं। सच तो यह है कि दान देने वाले तो आप हैं। यही कारण है कि मेरा सिर नीचा रहता है। मैं शर्म के मारे याचकों से आंखें नहीं मिला पाता।’’
    राजा सारा माजरा समझ गए। वे मुस्कराते हुए बोले-‘‘हमारा आदेश है कि बनवीर की सहायता के लिए आज से ही मंत्री और सेनापति स्वयं याचकों पर कड़ी नज़र रखेंगे। मंत्री और सेनापति की ही ये जिम्मेदारी होगी कि कोई जरूरतमंद दान से वंचित न हो और कोई अपात्र अनावश्यक दान प्राप्त न कर ले। हम बनवीर की निष्ठा से प्रसन्न हैं। आज से ही बनवीर का वेतन बीस फीसदी बढ़ाया जाता है।’’
    राजा का आदेश सुनकर मंत्री और सेनापति बुरी तरह झेंप गए। 0000000
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-मनोहर चमोली ‘मनु’. पो0बाॅ0-23. भितांई,पौड़ी.जिला-पौड़ी गढ़वाल. उत्तराखंड.पिन-246001. सम्पर्कः09412158688.


1 टिप्पणी:

यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।