30/10/2016

child literature बाल साहित्य बनाम बचकाना साहित्य

बाल साहित्य बनाम बचकाना साहित्य

-मनोहर चमोली ‘मनु’

आज भी साहित्यकारों में अधिकतर वे हैं जो यह मानते हैं कि बच्चों को सच्चा सामाजिक बनाने वाला साहित्य ही उत्तम साहित्य कहा जा सकता है। जो उन्हें सद्मार्ग की ओर ले जाए, वही बाल साहित्य सार्थक है, श्रेष्ठ है।

बतौर पाठक बच्चे ही क्यों, बड़े भी जब साहित्य का आस्वाद ले रहे हों, तो पढ़ने से पहले और पढ़ लेने के बाद खुद में बदलाव महसूस नहीं करते हैं तो वह साहित्य बेदम है। साहित्य में आनंद की अनुभूति पहला तत्व है। जब आनंद ही नहीं आएगा तो कोई पढ़ेगा ही कैसे। जब पढ़ेगा ही नहीं तो खुद में बदलाव क्या लाएगा, सोचेगा तक नहीं। 


बाल साहित्य में बच्चे को सशर्त, सीधे, तीव्र उपेदश और सीख के जरिए सामाजिक बनाने वाला साहित्य पढ़ा भी जाता होगा, मुझे संदेह है। किसी तरह पढ़वा भी लिया जाता होगा तो बाल पाठक खुद में बदलाव लाते होंगे, असंभव सा प्रतीत होता है। 

मेरी समझ तो फिलवक़्त यही बनी है कि कि मनोरंजन के कई साधन आज बच्चों के आस-पास पसरे हुए हैं। ऐसे में बाल साहित्य का मात्र मकसद मनोरंजन करना हो, यह भी अजीब सा लगता है। 

एक तो बाल साहित्य में बच्चों का नज़रिया हो। बच्चों की दुनिया हो। बच्चों की आवाज़ें गूंजती हों। अक्सर कहा जाता रहा है कि बाल साहित्य बच्चों के स्तर का हो। ये स्तर क्या बला है? दो साल से लेकर बारह साल के बच्चों के स्तर पर तो पल-प्रति-पल बदलाव आता रहता है! क्या हर वय वर्ग के बच्चे के लिए एक पत्रिका हो? या एक पत्रिका में हर स्तर के बच्चे के लिए पठन सामग्री हो? यह संभव है? या कई वय वर्ग को ध्यान में रखते हुए कई तरह की भिन्न-भिन्न बाल पत्रिकाएं हो?

बाल साहित्य अलग से होना ही नहीं चाहिए। यह भी अक्सर कहा जाता है। इसका अर्थ क्या यह हुआ कि बच्चे हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, विज्ञान प्रगति  (यहां इनका उल्लेख मात्र साहित्य सामग्री छपने से है ) समकालीन भारतीय साहित्य आदि से ही साहित्य का आस्वाद लें? 

बहरहाल बच्चों के लिए लिखा जाने वाला साहित्य उन्हें बालमन से आगे भी ले जाए। जो दुनिया उसके आस-पास है, उससे भी परिचय कराए। उस दुनिया से भी, जो आने वाले समय में उसकी दुनिया होने वाली है। बच्चों को साहित्य के नाम पर सामान्य ज्ञान परोसने से काम नहीं चलेगा। सूचनात्मक जानकारी देने से भी काम नहीं चलेगा। कपोल कल्पनाओं से भरा साहित्य पहले बहुत लिखा जा चुका है। पीसे हुए आटे को पीसना भी बंद करना होगा। 

आदर्शवाद से भरी रचनाएं बहुत हुईं। बच्चों को सच्चा नागरिक बनने, सामाजिक बनने, आज्ञाकारी बनने की सीधी अपील करती दर्जनों किताबें पुस्तकालयों और स्कूलों की शोभा बढ़ा रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले सत्तर सालों से बच्चों को जो साहित्य परोसा गया, उसमें उन्हें राष्ट्रभक्त बनने के जोर और प्रयासों से ही कई जाने-माने साहित्यकार बाल साहित्य को बचकाना साहित्य कहते हैं? ...

-मनोहर चमोली ‘मनु’, भितांई, पोस्ट-23, पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड।
 मोबाइल-09412158688 और 7579111144

23/10/2016

बाल साहित्य बच्चों को समझना होगा child literature

समझ रहा है साहित्य बालमन को !


-मनोहर चमोली ‘मनु’


एक अध्यापक मित्र हैं। वे बरसों से कक्षा छह से बारह के छात्रों को पढ़ा रहे हैं। हाल ही में उन्होंने फेसबुक में एक वक्तव्य दिया। वक्तव्य के साथ उस बालक को फोटों भी दी गई थी। यहां उस बालक का नाम और पहचान छिपाने के लिए बच्चे, उनके पिता और गांव का नाम बदल दिया गया है, बाकी एक-एक शब्द ज्यों का त्यों मंतव्य समझने के लिए दिया जा रहा है-
‘ये है दुरवा के मोस्ट वांटेड हीरो......... रायसन पुत्र श्री दयासन। बड़ी मुश्किल से मनाकर स्कूल लाया गया है। एक महीने की मेहनत के बाद मिला है ये जब संपर्क करने हम तीन शिक्षक इसके घर गये तब इसे गिरफ्तार कर सके। ये कक्षा 6 का हमारा विद्यार्थी बन गया है। अभी एक और गिरफ्त से बाहर है। नरेन्द्र पुत्र श्री केवल। अब उस पर फोकस किया जाएगा। वह कक्षा 9 का गत वर्ष का ड्राॅप आउट है। ये तो दाऊद के भी दादा हो गए।’
मैंने मित्र के इस कथन को औरों की तरह पढ़ा। मित्रों ने बधाई पर बधाई दी हुई थी। लेकिन मैंने बधाई देने से पहले एतराज जताया। अध्यापक जी मुझे गिरफ्तार ओर गिरफ्त का अर्थ समझाने लगे। मैंने कहा कि बच्चे के प्रति आपके प्रयास अतुलनीय हैं। लेकिन आप जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वे बच्चे को आपसे और भी दूर कर रहा है। वह चोर नहीं है। आप ने ‘मोस्ट वांटेड‘, ‘दाऊद‘ ‘गिरफ्तार‘ और ‘गिरफ्त‘ जैसे शब्दों का प्रयोग किया है। इनका प्रयोग किए बिना भी आप अपने प्रयासों को बेहद सरलता से जाहिर कर सकते थे। 
बहस चल पड़ी। मैंने शालीनता से जवाब दिया। बाद में वे मान गए और उन्होंने अपने वक्तव्य को बदल दिया।

अब उनका वक्तव्य यह था- ‘ये है दुरवा का मोस्ट वांटेड हीरो......... रायसन पुत्र श्री दयासन। बड़ी मुश्किल से मनाकर स्कूल लाया गया है। एक महीने की मेहनत के बाद मिला है ये जब संपर्क करने हम तीन शिक्षक इसके घर गये तब इसे स्कूल ला सके। ये कक्षा 6 का हमारा विद्यार्थी बन गया है। अभी एक और स्कूल से बाहर है। नरेन्द्र पुत्र श्री केवल। अब उस पर फोकस किया जाएगा। वह कक्षा 9 का गत वर्ष का ड्राॅप आउट है।’

अध्यापक मित्र ने फिर भी मोस्ट वांटेड का मोह नहीं छोड़ा। मैं चाहता तो कहता कि मोस्ट वांटेड का उपयोग देश-काल-परिस्थिति और संदर्भ के साथ फिर भी अखर रहा है। मैं चाहता तो उन्हें बताता कि जल,पानी,नीर और अश्रु का उपयोग करते समय हम सन्दर्भ और परिस्थिति के हिसाब से ही इनका उपयोग करते हैं। लेकिन यहां संदर्भ भाषा का नहीं था न ही व्याकरण का। यहां तो बालमन को समझने और बालक की अस्मिता का सवाल था। मैं तो बस इतना चाहता था कि हम बड़ों की दुनिया में जब भी बच्चों की बातें हों तो हम बच्चों के लिहाज़ से भी सोचे। हम यह जरूर समझने का प्रयास करें कि हमें बच्चों में जो शैतान नज़र आता है वह शैतान नहीं है। उस उम्र के स्तर पर वही उसका व्यक्तित्व है। अमूमन हर बच्चा अपनी उम्र और अनुभव के हिसाब से संपूर्ण मनुष्य है। उम्र के हिसाब से जैसे हम खुद को पूर्ण मानते हैं उसी स्तर पर बच्चे अपनी समझ और अनुभव से पूर्ण होते हैं। बशर्ते पूर्ण को सम्पूर्ण होते-होते तो हम बड़ों की उम्र ही बीत जाती है।

बाल साहित्य की भी यही स्थिति है। हम जो बड़े अपना बचपन याद करते हुए जो रच रहे हैं वो बाल साहित्य है ही नहीं। वह तो हम बड़ों का वह साहित्य है जिसे हम बीस-तीस साल बाद याद कर एक काल्पनिक दुनिया के लिए रच रहे हैं। कोई भी सजग पाठक इन दिनों छप रहे बाल साहित्य को इस लिहाज से पढ़ेगा तो माथा पीट लेगा। कारण? एक नहीं कई हैं। एक तो आज भी छप रहे अधिकतर बाल साहित्य में बच्चों की आवाजें ही नहीं हैं। आज के बच्चों की दुनिया भी उसमें शामिल नहीं हैं। हर दूसरी रचना बालमन का अपमान करती नजर आती है। बच्चों को बोदा समझना, बेवकूफ समझना, लल्लू समझना आज भी बदस्तूर चला आ रहा है।

ऐसा नहीं लगता कि बाल साहित्यकार बच्चों की दुनिया से वाकिफ हैं। बड़ों का बाल साहित्य पढ़कर लगता ही नहीं कि ये बच्चों के साथ दो पल भी बिताते हैं। अन्यथा उनके साहित्य में आदर्शवाद पढ़ने को नहीं मिलता। इक्कीसवीं सदी के बाल साहित्य की मुश्किलें और भी बड़ी हैं। सूचना और ज्ञान ठूंसने वाली सामग्री को भी बाल साहित्य माना जा रहा है। 

सूचनात्मक जानकारी देने के लिए कविताओं और कहानियों की मोटी-मोटी किताबें छप रही हैं। सब पढ़ेंगे पर बच्चे नहीं पढ़ेंगे। कारण ! बच्चों के मन का, बच्चों के मतलब का ही तो उसमें नहीं हैं। आदर्श की घुट्टी भी इतनी कड़वी है कि बच्चा जो जिद्दी, अड़ियल, चोर, शैतान, आलसी, झूठा, हिंसक बताया जा रहा है, एक-दो पंक्ति में दी गई छोटी सी घटना से वह सुधर जाता है। अबोध समझा जाने वाला दूसरे ही पल बदलकर होशियार हो जाता है। एक ही घर में दो भाई हैं। एक आलसी है दूसरा समझदार। बहन बुद्धिमान है और भाई बेवकूफ। फिर अचानक बेवकूफ भाई में बदलाव आ जाता है ओर वह बहन की तरह बुद्धिमान हो जाता है। बाल साहित्यकार समझते हैं कि बच्चों के लिए बेसिर-पैर का कुछ भी लिख दो, चलेगा। कल्पना के नाम पर सब कुछ संभव है। बाल साहित्य में असंभव सी बात दो पल में संभव हो जाती है।


बाल साहित्य के जानकार बताते हैं कि हर बच्चा अपने आप में अनोखा है। अदुभुत है। ऊर्जा से भरपूर है। खोजी है। जिज्ञासु है। किसी न किसी नज़रिए से उसमें मेधा है। वह अपने अनुभव से इस दुनिया को देखना चाहता है। समझना चाहता है। फिर ऐसे में क्या उपेदशात्मक, नैतिकता स्थापित करती रचनाएं से आदर्श नागरिकता का पाठ पढ़ाने की मशक्कत बाल साहित्य से ही क्यों? यदि ऐसा है तो क्यों स्वस्थ आचरण की सभ्यता अभी तक स्थापित नहीं हो सकी है। 

ऐसी स्थिति में बच्चे साहित्य से रिश्ता कैसे बना सकेंगे। अधिकतर शिक्षक भी और अभिभावकों का आज भी मानना है कि कक्षाओं में विषय की जो एक-एक किताबें हैं, वे ही बच्चे पढ़ ले गनीमत है। पढ़ने का रिवाज़ न स्कूलों में है न घर में। फिर पढ़ने के लिए जो सामग्री है भी वो बच्चों के स्तर पर ही बचकाना है। कहीं ऐसा तो नहीं कि बाल साहित्यकार यही समझते हैं कि बाल साहित्य यानि बचकाना साहित्य !


फिर वहीं लौटते हैं। एक अध्यापक जो हर साल, हर बार नए छात्रों के संपर्क में आता है। सालों शिक्षण करता है। लिखता है। पढ़ता है। छात्रों को आखर ज्ञान देता है। सीख-समझ और ज्ञान का विस्तार करता है। उनकी सोच और लहज़े पर मेरी तरह आप भी हैरान होते होंगे। यही हाल अधिकतर बाल साहित्यकारों का है। वे आज भी चालीस के दशक की सोच,परिस्थिति और वातावरण से अपने लेखन को मुक्त नहीं कर पा रहे हैं। कुछ ही बाल साहित्यकार हैं जो बच्चों में विज्ञान दृष्टि देने के लिए कलम उठाए हुए हैं। कुछ ही हैं जो बच्चों को उनकी दुनिया के आस-पास की रचनाएं उपलब्ध करा पा रहे हैं। गिनती के ही साहित्यकार हैं जो बच्चों को वह साहित्य उपलब्ध करा पा रहे हैं जिसमें उनकी आवाजें हैं। जिसमें बच्चों की भावनाएं हैं। ऐसा साहित्य बहुत कम है जो बच्चों को आगे की दुनिया की समझ को समझने की ताकत दे रहा है। ऐसा साहित्य बहुत ही कम हैं जो बच्चों में तर्क,विचार करने की ताकत देता है।

ठीक उलट आज भी बदस्तूर बेसिर-पैर की परी कथाएं, भूत-प्रेत-टोना-टोटका, अंधविश्वास, रूढ़ियों में जकड़े समाज की तसवीर पर आधारित बाल साहित्य ही देखने-पढ़ने को मिलता है। आदर्श अपनाने का आग्रह इतना तीव्र हैं कि बच्चे ऐसा बाल साहित्य क्यों पढ़ें? ऐसा साहित्य जिसमें उन्हें सीख, संदेश, आदेश, निर्देश देने पर ही जोर दिया जाता है। वीर बालक, सच्चा राष्ट्रभक्त बनने की पुरजोर वकालत करता साहित्य विपुल है। मजे़दार बात यह है कि अरबों रुपए कई अकादमियों पर हर साल खर्च हो रहे हैं। लेकिन एक राष्ट्रीय स्तर की बाल साहित्य अकादमी नहीं हैं। इससे बड़ी विडम्बना यह है कि बाल साहित्य के उन्ननयन के लिए अखिल भारतीय स्तर के सम्मान जिन्हें मिले हैं उनमें अधिकतर वे हैं जिन्हें बाल मनोविज्ञान और बालमन की समझ ही नहीं है। ऐसे सैकड़ों हैं जिनकी बाल साहित्य की एक नहीं, दो नहीं बीस-बीस पुस्तकें प्रकाशित हैं। लेकिन उनकी सभी रचनाओं को पढ़ते हुए बालमन की समझ रखने वाला कोई भी वयस्क ही अपना माथा पीट ले। फिर बालमन कैसे इनकी मोटी-मोटी पोथियां-ग्रन्थ पढ़ने को तैयार होगा !

कुछ ही बाल साहित्यकार हैं जो यह मानते और जानते हैं कि बच्चा भी अपनी उम्र के हिसाब से अपने अनुभव के स्तर पर हम बड़ों जैसा ही व्यक्तित्व है। हम बड़ों जैसा ही उसका स्तर है। वे ही बालमन को भाने वाली रचना लिख पाते हैं। इन दिनों बाल साहित्य की कई पत्रिकाएं बाजार में हैं। कई पत्र है, जो बाल साहित्य यदा-कदा प्रकाशित कर रहे हैं। इन सभी का औसत अनुपात निकाले तो मात्र तीन से दस फीसद सामग्री है जो बालमन के अनुरूप प्रकाश में आती है। ‘चकमक’ मासिक पत्रिका ही उम्मीद की एक किरण है, जो आस जगाती है कि भारत में, भारत के बच्चों के लिए कुछ मन-मस्तिष्क हैं जो सकारात्मकता के साथ उत्कृष्ट बाल साहित्य उपलब्ध करा रही है। रूम टू रीड, प्रथम बुक्स, एनसीईआरटी की बरखा सीरिज, तूलिका, भारत ज्ञान विज्ञान समिति ने कुछ किताबें पठनीय प्रकाशित की हैं।

भारत में बच्चे दोहरी मार झेल रहे हैं। अव्वल तो उनके मन को समझने वाले अधिकतर साहित्यकार ही नहीं हैं। दूसरा जो कुछ रहा-बचा छप रहा है तो वह बाजारवाद की चपेट में है। यानि यह बाजार तय कर रहा है कि कैसी सामग्री कैसे विज्ञापन और कैसी रचनाएं प्रकाशित हों। भारत में खासकर हिन्दी बाल साहित्य की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही है। अभी भारत के हिंदी भाषी राज्य अपने बच्चों को नागरिक के तौर पर देखने का मन ही नहीं पाए हैं। जब मन ही नहीं है तो उनके बारे में सोच कौन रहा है। जब उनके बारे में सोचा ही नहीं जा रहा है तो बालमन की नीतियां कैसे बनेंगी। जब कोई नीति ही नहीं हैं तो बच्चे कैसे साहित्य का आस्वाद ले रहे होंगे? 
क्या आप सोच पा रहे हैं?
॰॰॰
regional reporter,October 2016

-मनोहर चमोली ‘मनु’, पोस्ट बाॅक्स-23 पौड़ी 246001

mobile-09412158688
mail -chamoli123456789@gmail.com

22/10/2016

उत्तराखण्ड और बाल साहित्यकार manohar chamoli manu child literature

उत्तराखण्ड और बाल साहित्यकार

-रमेश चन्द्र पंत

राष्ट्रीय परिदृश्य में देखें, तो इस बीच बाल साहित्य ने अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है। एक समय था कि बाल साहित्य को बचकाना साहित्य से अभिहीत किया जाता था, किन्तु आज बड़ों के लिए अनेक वरिष्ठ एवं स्थापित साहित्यकारांे ने भी बाल साहित्य एवं रचनाधर्मिता से समृद्ध किया है। खड़ी बोली का विकास होने से पूर्व यह वर्षतः लोककथाओं, लोकगीतों एवं पहेलियों आदि के माध्यम से विभिन्न स्थानीय बोलियों में प्रस्फुटित होता रहा है। बाल साहित्य का उद्देश्य बाल मन का अनुरंजन होता है, तो किसी न किसी रूप में उसके व्यक्तित्व का विकास भी करना होता है। बालक के अन्तर्मन में मानवीय मूल्यों का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से बीजारोपण कर बाल साहित्य उच्चतर जीवन आदर्शों की ओर प्रेरित भी करता है।
श्रेष्ठ बाल साहित्य में किसी न किसी रूप में बच्चांे की विभिन्न मनोस्थितियों की अभिव्यक्ति होती है। उनकी रुचियों, छांव-आकांक्षाओं का अंकन या चित्रण होता है। विगत 2-3 दशकों में देखा जाए, तो हमारे सामाजिक जीवन में महत्तर परिवर्तन हो रहे हैं। इस परिवर्तन ने बाल मन को भी प्रभावित किया है। वैज्ञानिक प्रगति से कहीं न कहीं सोच में भी क्रान्तिकारी परिवर्तन आया है। बच्चों की बुद्धिलब्धि भी अकल्पनीय रूप से उच्चतर हुई है। प्रश्न उठता है, क्या समसामयिक सन्दर्भों के अनुरूप, बाल साहित्य भी परिवर्तित हो पाया है या कहें कि आधुनिक परिवेश के अनुरूप क्या बाल मन की अभिव्यक्ति संभव हो पाई है? उत्तर निश्चित ही ‘हां’ में है। बाल साहित्य ने इन सभी दृष्टियों से अपनी सार्थकता सिद्ध की हैै।
जहां तक उत्तराखण्ड में बाल साहित्य का प्रश्न है, तो परिदृश्य यदि अत्यन्त समृद्ध नहीं, आश्वस्तकारी तो है ही। आज हमारे मध्य अनेक ऐसे वरिष्ठ एवं युवा रचनाकार उपस्थित हैं, जिन्होंने अपनी महत्वपूर्ण रचनाधर्मिता के द्वारा राष्ट्रीय फलक पर एक ऐसी विशिष्ट पहचान बनाई है।
डाॅ.दिनेश चमोला ‘शैलेश’ इसमें एक महत्वपूर्ण नाम हैं। एक प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार के रूप में अपने बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भरपूर साहित्य का सृजन उन्होंने किया है। बच्चों के लिए 6 कविता संग्रह के साथ-साथ कहानियों की 44 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘टुकड़ा-टुकड़ा संघर्ष’ एवं ‘एक था राॅबिन’ बाल उपन्यास है। ‘पर्यावरण बचाओ’ एकांकी संग्रह। डाॅ.चमोला की रचनाओं में बाल मन की सहज स्वाभाविक उपस्थिति है। ‘‘गायें गीत ज्ञान-विज्ञान के लिए’ साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है। गीत एवं गजल केे लिए प्रख्यात डाॅ.अश्वघोष ने भी बच्चों के लिए काफी कुछ सार्थक एवं महत्वपूर्ण साहित्य रचा है। डाॅ.अश्वघोष में बाल मन के भीतर उतरने की अद्भुत सामथ्र्य है। ‘राजा हाथी’ एवं ‘वाइस्कोप निराला’ की कविताएं इसका प्रमाण हैं।
मुकेश नौटियाल की कहानियां, बच्चों के निर्मल एवं निश्छल मन की कहानियां हैं। लोकतत्व की उपस्थिति ने मुकेश नौटियाल की कहानियों को एक अतिरिक्त शक्ति दी है। समकालीन बाल साहित्य में आज यह गायब होता जा रहा है। आज इसे सहेजने की आवश्यकता है। बाल एवं किशोर वय बच्चों के लिए ‘हिमालय की कहानियांॅ’ संग्रह के अतिरिक्त ‘रूम टू रीड’ इंडिया, शैक्षणिक गतिविधियों के लिए समर्पित संस्था द्वारा कहानियों की चार चित्रात्मक पुस्तिकाएं प्रकाशित हो चुकीं हैं।
कहानियों के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण नाम है-मनोहर चमोली ‘मनु’। बाल साहित्य में एक दृष्टिसम्पन्न आलोचक के रूप में भी मनोहर चमोली ‘मनु’ ने एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है। बाल साहित्य के नाम पर इन दिनों काफी कुछ ऐसा लिखा जा रहा है, जिसकी कोई प्रांसंगिकता एवं उपादेयता नहीं। इन्हे प्रश्नांकित करना, आज के समय की जरूरत है और मनोहर चमोली ‘मनु’ इसे बखूबी कर रहे हैं। उनकी कहानियां भी नए भागों की महत्वपूर्ण कहानियां हैं। ‘अंतरिक्ष से आगे बचपन’ एवं ‘जीवन में बचपन’ कहानी संग्रह में इसे देखा जा सकता है। ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ एवं ‘पूछेरी’ नेशनल बुक ट्रस्ट दिल्ली से तथा ‘चाॅंद का स्वेटर’ ‘बादल क्यों बरसता है, ‘रूम टू रीड’ इंडिया द्वारा प्रकाशित चित्रात्मक पुस्तिकाएं हैं।
बाल साहित्य में रचनाकारों द्वारा नाटक एवं एकांकी कम ही लिखे जा रहे हैं। इस दृष्टि से महावीर रंवाल्टा ने अपनी समर्थ लेखनी के द्वारा एकांकी एवं कहानियों के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया है। ‘विनय का वादा’ कहानी संग्रह है।
शशि भूषण बडोनी की कहानियों में यथार्थ कहीं अधिक मुखर वाला बच्चों के जीवन के आस-पास, जो कुछ भी प्रिय-अप्रिय घट रहा है, उसे कहानी का रूप देना बडोनी की कथाओं की अपनी विशेषता है। कहानियां बच्चों को कहीं न कहीं बेहतर ढंग से जीने के लिए प्रेरित करती हैं। ‘लौटती मुस्कान’ 14 कहानियों का महत्वपूर्ण संग्रह है।
कविता हो या कहानी, दोनों ही विधाओं में बच्चों के मनोकूल नया, अर्थपूर्ण एवं मौलिक लिखने वालों में एक महत्वपूर्ण नाम है रविन्द्र रवि का। लीक से हटकर कुछ सार्थक लिखने की अपनी ही शैली है रवि की। सभी कुछ बच्चों की दृष्टि से देखने की कोशिश करते हैं वे और यही उन्हें बाल साहित्य के एक सफल रचनाकार के रूप में स्थापित करती है। ‘अधूरा सपना’ रतन सिंह किरमोलिया का कहानी संग्रह है। संग्रह में संकलित कहानियां, बच्चों में रचनात्मक ऊर्जा का संचार करने की दृष्टि से उपयोगी हैं। ‘गीते रसीले बच्चपन के’ एवं ‘बासन्ती गीत’ कविता संग्रह है।
‘राज बाल तरंगिणी’, ‘ममता बाल तरंग’, ‘ममता बाल वाटिका’, ‘ममता बाल चन्द्रिका’ एवं ‘ममता पद्य कथाएं’, ‘कभी सिखाएं कभी हसाएं’ राज किशोर सक्सेना ‘राज’ की प्रकाशित कविता संग्रह हैं। बाल मन की रुचियों के अनुरूप राज का रचना संसार अत्यन्त विस्तृत एंव वैविध्यपूर्ण है। बच्चों को मूल्यों के प्रति प्रेरित एवं उद्बोधित करने की दृष्टि से इन संग्रहों में प्रकाशित कविताओं की अपनी उपयोगिता है।
डाॅ.प्रीतम सिहं नेगी ‘अपछ्यांण’ ने बाल कविता के क्षेत्र में अभिनव प्रयोग किया है। बेटे पुलक पार्वत्य नेगी के द्वारा बनाए गए चित्रों पर उन्होंने बाल मन के अनुरूप सरस कविताओं की रचना की। ‘मेरी रचना’ कविता संग्रह इसी का प्रतिफल है
डाॅ.लक्ष्मी खन्ना ‘सुमन’ ने भी कविता, कहानी एवं उपन्यास द्वारा बाल साहित्य को अत्यन्त समृ( किया है। वरिष्ठ रचनाकार डाॅ.योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अक्षण’ की रचना धर्मिता भी अच्छे संस्कार एवं नैतिक मूल्यों के प्रति प्रेरित करती है। डाॅ.सुरेन्द्र दत्त सिमल्टी के कविता संग्रह भी प्रकाश में आ चुके हैं। ‘मीठे जामुन’ दय किरोला, ‘मेरा भारत देश महान’ विमला जोशी, ‘जीवन है अनमोल’ आनन्द सिंह बिष्ट के कविता संग्रह। ‘क्यों बोलते हैं बच्चे झूठ’ शशांग मिश्र ‘भारती’ का निबन्ध संग्रह है। अतुल शर्मा, रतन सिंह जौनसारी, विपिन बिहारी ‘सुमन’ एवं प्रभा किरण जैन की कृतियों ने भी उत्तराखण्ड के हिन्दी बाल साहित्य को दिशा दी है। ‘फूल’ डाॅ.उमेश चमोला एवं ‘बाल मन की सतरंगी कविताएं’, नवीन डिमरी ‘बादल’ कविता संग्रह भी इस दृष्टि से उलेखनीय है। डाॅ.नंदकिशोर हटवाल की कहानियों ने भी बाल साहित्य में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज की है।
उत्तराखण्ड के रचनाकार जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हिन्दी बाल साहित्य में अपनी रचना धर्मिता को रेखांकित कर रहे है, उनमें आशा शैली, डाॅ.प्रभा पंत, डाॅ.दीपा कांडपाल, के.रानी, डाॅ.पीताम्बर अवस्थी, वीणापाणी जोशी, रूप चंद्र शास्त्री, विनीता जोशी, मंजू पाण्डे, नीरज पंत, मोहन चंद्र पाण्डे, महेन्द्र प्रताप पाण्डे, सत्यानन्द बडोनी, शम्भू प्रसाद भट्ट ‘स्नेहिल’, भारती पाण्डे, हर प्रसाद रोशन, खुशाल सिंह, भगवत प्रसाद पांडे, गोकुलानन्द किमोठी, कालिका प्रसाद सेमवाल, डाॅ.यशोदा प्रसाद सिमल्टी आदि प्रमुख हैं।
स्पष्ट है कि इस समय विशेष में उत्तराखण्ड में सृजनरत अधिकांश रचनाकार महज कविता एवं कहानियों तक ही सीमित हैं। बाल साहित्य की अन्य विधाओं के प्रति रचनाकार उदासीन हैं। वैज्ञानिक सोच का विकास करने वाली रचनाएं भी कम ही लिखी जा रही हैं, जबकि आज जरूरत है कि इस दिशा में कुछ सार्थक सोचने व करने की।
 ॰॰॰
(मूल आलेख: प्रसिद्ध बाल साहित्यकार रमेश चन्द्र पंत, रीजनल रिपोर्टर, मासिक पत्रिका, अक्तूबर 2016)

-मनोहर चमोली ‘मनु’ मोबाइल-09412158688


मेल - chamoli123456789@gmail.com

19/10/2016

Pluto बचपन में ले जाने वाली प्लूटो बाल पत्रिका

प्लूटो का दूसरा अंक हाथ में है। जून-जुलाई 2016 का अंक। अमलतास से भरा आवरण। पूरा पेज अमलतास के फूलों से सराबोर।
कविता भी पढ़िएगा-
अ म ल ता स
तुम इतने पास
तुम इतने पास फूले
मैं तुम पर झूला
तुम मेरी आँखों में झूले!

पाँच से आठ बरस के बच्चों को ही ही नहीं यह हम सभी को बचपन में ले जाने वाली कविता है। यही नहीं इसे इस आवरण के साथ पढ़ें, महसूस करें और जिएँ तो खुशी तिगुनी हो जाती है। अन्तिम आवरण में भी प्रयाग शुक्ल की मज़ेदार कविता है। आप भी पढ़िए-
एक गमले में फूला फूल
हवा चली तो झूला फूल
फूल फूलकर फूला फूल
मोटा हो गया पतला फूल

बच्चों की मानिदं इस कविता का अपना ही मज़ा है। अपनी ही रंगत है और अपनी ही मस्ती है। 
भीतर के आवरण पर चित्रात्मक कविता प्रभात की है। छींक। 
आप भी पढ़िए-

मक्खी ने छींका आ छीं
मच्छर ने छींका मा छी
हाथी ने छींका ऊँ छी
चूहे ने छींका फूँ छीं 
चींटी ने छींका ऊँ ही
चींटे ने छींका फूँ हीं

तीन पेज पर छाई नन्हीं सी कथा ‘आँख खुली तो सपना गिर गया’ प्रकाशित है। चित्र बड़े मज़ेदार हैं। यह कहानी है शशि सबलोक की। चित्र बनाए हैं अंजता गुहाठाकुरता ने।
दो पेज की चित्रात्मक कहानी है चींटी की झपकी। इसे लिखा है विनता विश्वनाथन ने। यह तो और भी मज़ेदार बन पड़ी है। चित्र बनाए हैं वन्दना बिष्ट ने। 
दो पेज पर खोखल में दो महीने जानकारी सी देती कथा है। चित्र बनाए हैं सुजाशा दासगुप्ता ने। चिड़ा-चिड़ी।यह पक्षी धनेश है। चिड़ा मिटटी ला लाकर देता है। चिड़ी इस मिट्टी और अपनी बीट से खेखल को बद कर देती है। बस छोटी सी खिड़की खुली छोड़ देती है। चिड़ा खिड़की से चिड़ी को खाना लाकर दे रहा है। दो महीने अपने बच्चों के साथ अन्दर रहकर खोखल को तोड़क्र वह बाहर आती है। मज़ेदार।

इस अंक में चलो चिड़िया बनाएँ है। सात तरीकों के बाद आठवाँ प्रयास करने पर चिड़िया बनती है। रंगीन। बच्चों को भा जाने वाली गतिविधि है ये।
जी.ए. कुलकर्णी के बखर बिममची को याद करते हुए निमरा का बस्ता दी गई है। यह कहानी तो बेहद मज़ेदार है। बच्चों की सी कल्पनाएं निमरा की हैं। निमरा की माँ भी उसकी काल्पनिकता को पूरे पँख दे रही है। मस्त कहानी।
छोटी सी कहानी का एक अंश आप भी पढ़िए-
निमरा ने माँ से पूछा-‘‘ माँ, क्या हाथी की परछाईं हाथी से भी बड़ी दिखती होगी?’’, 
‘‘हाँ, पर हाथी की परछाई हाथी की तरह भारी नहीं होती।‘‘ माँ ने कहा। ‘‘हाथी की परछाईं हाथी की तरह ऊँची भी नहीं होती। और न ही उस पर बैठकर कहीं जा सकते हैं।’’

सुशील शुक्ल की कविता भी पढ़िए और आनन्द लीजिए -
एक थे भाई खट
एक थे भाई पट
कहीं पड़ी थी एक मटर
खट चिल्लाये खटर
पट चिल्लाये पटर
ही ही हू हू
हँसी के ठट्ठे
हट्टे कट्टे
लोग इकट्ठे
खट चिल्लाये पट 
पट चिल्लाये खट
भागो भाई झट
बिल में मटर
गई फिर बँट 
आधी खए खट
आधी खाए पट
वो देखो खट पट
सोये हैं सट सट।

इस अंक में मिट्टी के रंग की जानकरी विनता विश्वनाथन ने दी है। बीस पंक्तियों से भी कम। दो पेज में चित्रांकन के साथ संवारा है सुवजित सामन्ता ने । वाह !
चाँद पर चार पेज की चित्रकथा वो भी संवादहीन। कितने रंगों से भरी है यह! पर पता नहीं किसकी है। चित्र तो तापोशी घोषाल के ही हैं।
एक चित्रात्मक भरी कहानी और है -निडर चूहे। ये भी बड़ी मज़ेदार है। लगभग चालीन पंक्तियों की यह कहानी तीन पेज पर गई है। दो चूहों को एक मोबाइल मिलता है। मोबाइल में कुत्ते की आवाज है। वह बटन दबाते हैं तो आवाज से बिल्ली डर कर भागती है। 
एक संवाद आप भी पढ़िए-

‘‘कुत्ता अपनी आवाज़ को ढूँढ रहा होगा न?‘‘
‘‘हो सकता है।‘‘
‘‘पर उसकी आवाज़ तो हमारे पास है। अगर यह बिल में हमारे साथ रहेगी तो उसे कैसे मिलेगी?‘‘
‘‘तुम सही कह रहे हो भाई। हम इसे यही छोड़ देते हैं। क्या पता इस आवाज़ का कुत्ता इधर आए?‘‘
‘‘भाई, एक बात कहूँ?’’
बोल भाई, ‘‘हम चूहे ही अच्छे। हमारी आवाज़ हमारे साथ ही रहती है।’’

सुशील शुक्ल की कहानी रहमत दादा का झोला भी भावनापूर्ण और संवेदना से भरी है। एक बच्चा अपने दादा और दादा जी के दोस्त को याद करता है। दिलचस्प!
नीमगाँव भी एक सुन्दर कहानी है।
इस पत्रिका में चटनियाँ नियमित काॅलम बनाया गया है। इसमें छोटी-छोटी रोचक कहानियां-कविताएं हैं। जैमत काॅलम बनाया गया है। इसमें छोटी-छोटी रोचक कहानियां-कविताएं हैं। 
जैसे इस अंक में पढ़िएगा-
एक-

’अम्मी कहती हैं कि बैठा है’
ं पढ़िएगा-

एक-
अम्मी कहती हैं कि बैठा है
पर राशिद तो 
इस बात पर अड़ा है
कि कौआ खड़ा है।

दो-
कुछ खाने की ताक में
बाल घुस गया नाक में
ए आई आक छूँ
ज़ोर से छींक जूँ।
॰॰॰
आप ई ट्रांसफर के माध्यम से HDFC बैंक के खाता संख्या-50100067091186 
IFSC :HDFC0000134 पर सदस्यता शुल्क भेज सकते हैं। एक साल की सदस्यता 300 रुपए है। दो साल की 540 और तीन साल की 720 रुपए है। बैंक ड्राफ्ट या चेक तक्षशिला पब्लिकेशन के नाम से नई दिल्ली में देय होना चाहिए। तक्षशिला पब्लिकेशन सोसाइटी के लिए सुशील शुक्ल जी का साथ तापोशी घोषाल ने दिया है। पचास रुपए इसका मूल्य रखा गया है। भीतर कुछ चित्र शशि शेटये, जगदीश जोशी, शुद्धसत्व बसु और शोभा घारे ने बनाए हैं।

फिर से आपकी नज़र कि सम्पादक रीमा सिंह हैं। अतिथि सम्पादक के तौर पर सुशील शुक्ल हैं। पत्रिका का पता है- नाॅलेज सेण्टर, सी 404 बेसमेण्ट, डिफेंस काॅलोनी, नई दिल्ली 110024. 
फोन नंबर है-011-41555418/428
मेल - Pluto@takshila.net 
॰॰॰
मनोहर चमोली ‘मनु’
मोबाइल -09412158688
मेल: chamoli123456789@gmail.com

18/10/2016

वैज्ञानिक नज़रिया और काल्पनिकता की सैर कराता प्लूटो : बाल पत्रिका

बच्चों में वैज्ञानिक नज़रिया और काल्पनिकता की सैर कराता प्लूटो
-मनोहर चमोली ‘मनु’
‘प्लूटो’ सिर्फ नाम ही काफी है। बाल साहित्य में एक नई दस्तक। जिसकी धमक पहले ही अंक से दिखाई देती है। शानदार, जबरदस्त, बेमिसाल,बेजोड़ और पठनीय। इससे बढ़कर बच्चों के लिए उनके क़रीब। मुफ़ीद। अप्रैल-मई 2016 का में पहला अंक पाठकों को समर्पित हो चुका है। वर्गाकार आकार। यानि नौ इंच चैड़ी और नौ इंच ही लंबी।

प्लूटो यानि बौना ग्रह। प्लूटो जिसे अभी तक ठीक से नहीं जाना गया। पहले नौ ग्रह में शामिल किया फिर कुछ तथ्यों-परीक्षणों और मान्यताओं के चलते ग्रहों से बाहर कर दिया गया। संभवतः बच्चों के साथ भी हम बड़े ऐसा ही करते हैं। बच्चों को बौना ही तो समझा जाता है। अक्.ल से भी और तन-मन से भी। शायद यही मंशा रही होगी, नन्हें-मुन्नों के लिए प्यारी-सी, अल्हड़-सी चुलबुली दुमाही पत्रिका प्रकाशित करने की।
आरंभिक तीन अंक के अतिथि संपादक सुशील शुक्ल हैं। बाल साहित्य में बचकाने प्रयोग करने के तौर पर विख्यात चकमक की संपादकीय टीम के अग्रणी साथी। निश्चित रूप से इस सोच के पीछे सुशील शुक्ल उन तमाम वैज्ञानिक नज़रिए को बच्चों के बीच में पहुंचाने वाली टीम के अगुवाओं में हैं जो इस महान सोच को लेकर बाल साहित्य की सैकड़ों मुश्किलों के बावजूद नए कलेवर, अंदाज और तेवर के साथ ‘प्लूटो’ को लेकर आए हैं। 
आवरण समेत 32 वर्गाकार बहुरंगीय पेजों का एक-एक पेज बच्चों को भा जाने वाला है। सम्पादक रीमा सिंह जी हैं।


मेरे जीवन के इतिहास में यह पहली पत्रिका है, जिसका प्रवेशांक ही बगैर संपादकीय लिए हुए है ! कहीं कोई संपादक के चेहरे-मोहरे का चित्र नहीं। लंबी सूची संपादकीय टीम की नहीं है। कहीं कोई सीख-संदेश-निर्देश-उलाहना नहीं। वरना, बाल साहित्य के नाम पर निकलने वाली कई पत्रिकाएं हैं जिनके संपादक अपने रंगीन चेहरे के साथ, पत्रिका में बारम्बार अपने नाम की आत्ममुग्धता के साथ, अपने अब डिजीटल हस्ताक्षर के साथ, अपने नाम और व्यक्तित्व की ख़बरों के साथ हर बार आ धमकते हैं। लंबे चैड़े संपादकीय के साथ। जिसमें रोना-चिल्लाना, सीख-सन्देश-आदर्श, राम-सीता बनने के संस्कारों का मुलम्मा लिए लंबी-थकाऊ रचनाओं बेस्वादी आचार अधिक फैला रहता है।
ऐसे में प्लूटो उम्मीद की किरण बनकर आई है। मनोरमा ने पिछले बरस अक्कड़-बक्कड़ आरंभ की है। वह मज़ेदार है लेकिन उसमें बच्चों को स्कूूली शिक्षा देने की कोशिश अधिक दिखाई देती है। वर्क बुक पैटर्न पर वो चली जा रही है। एक ओर कोशिश फिरकी की है। लेकिन वह त्रैमासिक है और एनसीईआरटी और सरकारी व्यवस्था के ताम-झाम के चलते बच्चों की पहुंच से अभी भी दूर है। यह तीसरी पत्रिका है जिसे मैं नन्हे-मुन्नों के लिए कारगर और जरूरी पत्रिका मानता हूं। 
गुलज़ार जी के हाथों आमुख पर ही सुन्दर कविता प्लूटों के नाम को चरितार्थ करती हुई। 
आप भी पढ़िए-

सैंकड़ों बार गिने थे मैंने
जेब में नौ ही कंचे थे
एक जेब से दूसरी जेब में रखते-रखते
एक कंचा खो बैठा हूँ!
न हारा न गिरा कहीं पर
‘‘प्लूटो’’ मेरे आसमान से गायब है!
अन्तिम आवरण पर ही गुलज़ार जी ने समय पर केन्द्रित दूसरी कविता लिखी है।

आप भी पढ़िए-
छोटा-सा प्लेनेट समझा था, पैदा हुआ है
मेरे सोलर सिस्टम में
मेरा नवासा-मेरा समय!
दो ही साल का है और यूँ महसूस होता है
सूरज है वो ओर हम सब
उसके प्लेनेट हैं
उसके गिर्द ही घूमा करते हैं
मोह में कैसी ग्रेविटी जैसी ताकत होती है!

भीतर सुन्दर-सुन्दर ग्रहों-सी कविताएं हैं। प्रयाग शुक्ल की कविता गिलहरी है। सूफी तबस्सुम की एक थी मुर्गी कविता है।
सुशील शुक्ल की चित्रात्मक और चर्चात्मक कविता चींटी चलती है। प्रयाग शुक्ल की केरल के केले मजे़दार ढंग से चित्रित हुई है। फोंट संभवतः अठारह के आकार है। बच्चों को ध्यान में रखकर इसका आकार तय किया गया है। प्रभात की कहानी कुतुब मीनार का पेड़ है। पूरे एक पेज पर नाव चलाती बच्ची है। नाव में एक नन्हा जानवर है। यह चित्र मरहूूम जगदीश जोशी जी का है। इस पर रंग भरने की पूरी-पूरी छूट है। चित्र भी ऐसा जिसमें कई जीव-जन्तु छिपे हैं। यह कहीं नहीं लिखा है कि रंग भरो। यह जरूर लिखा है कि क्या तुम इस चित्र में रंग भरना चाहोगे?
नरेश सक्सेना की कविता टिल्लू जी स्कूल गए है। चित्र ऐसे कि वे बोल रहे हैं। एक सुन्दर नन्हा लेख ‘तुमने हाथी देखा है?’ प्रभात की ही एक चित्रात्मक कहानी है। मज़ेदार। ये पूरे पांच पेज पर गई है। भैंस पर एक कविता है लेकिन पता नहीं किसकी है !
आप भी पढ़िए-
भैंस अकल से बहुत बड़ी
अकल बड़ी कि भैंस बड़ी
एक नहीं दो तीन बजाए
भैंस के आगे बीन बजाए
अकल की आनाकानी में
भैंस निकल ली पानी में
देख के भैंसों की एक टोली
नाक पकड़ के मछली बोली
पानी में पाॅटी मत करना।

हाहाहाहा।
एक ओर कहानी है-‘मकड़ी और मछुआरा’ मछुआरा मकड़ी के जाल को देखकर कहता है कि क्या तुम मुझे अपने जैसा जाल बनाना सिखा सकती हो?
सही है! मनुष्य ने प्रकृति से प्रकृति के जीवों से ही तो अपने जीवन को सुधारा है!

निरंकार देव सेवक की चार लाईन की कविता को पूरे दो पेज में विस्तार दिया गया है। दस फीसदी कविता और नब्बे फीसद जगह चित्र के लिए। भई वाह!
मुर्गी माँ। 
आप भी पढ़िए-

मुर्गी माँ घर से निकली
बस्ता ले बाज़ार चली
बच्चे बोले चें चें चे
अम्मा हम भी साथ चलें।
एक और कविता अनवारे इस्लाम की है।
यह भी नब्बे फीसद चित्राधारित है। यानि दस फीसद ही टैक्सट है और नब्बे फीसद चित्र से यह कविता और पुष्ट होती है। आप भी पढ़िए-
गली-गली में ठेले
केले ले लो केले
पैसे है न धेले
कैसे ले लूँ केले।

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फिर से आपकी नज़र कि सम्पादक रीमा सिंह हैं। अतिथि सम्पादक के तौर पर सुशील शुक्ल हैं। पत्रिका का पता है- नाॅलेज सेण्टर, सी 404 बेसमेण्ट, डिफेंस काॅलोनी, नई दिल्ली 110024. फोन नंबर है-011-41555418/428
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मनोहर चमोली ‘मनु’
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17/10/2016

स्थानीय से वैश्विक उपहार है 'ब्रेसलेट' BRACELET : SP SEMWAL by- Manohar hamoli 'manu'

स्थानीय से वैश्विक उपहार है 'ब्रेसलेट'


ज्ञान विज्ञान संस्कृतिकर्मी, शिक्षाविद् एवं लेखक एस॰पी॰ सेमवाल का पहला कहानी संग्रह ‘ब्रेसलेट’

-मनोहर चमोली ‘मनु’
हाल ही में ज्ञान विज्ञान संस्कृतिकर्मी, शिक्षाविद् एवं लेखक एस॰पी॰ सेमवाल का पहला कहानी संग्रह ‘ब्रेसलेट’ प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की सभी कहानियां पढ़ते समय अलग-अलग देशकाल की यात्रा पाठक आसानी से कर लेता है। ब्रेसलेट सहित अन्य पांचों कहानियां का आस्वाद अलग आनंद देता है। कुछ कहानियां बार-बार पढ़ने की मांग करती है।
ब्रेसलेट की सभी कहानियों में कमोबेश संवाद कम हैं। विवरणात्मक और व्याख्यात्मक शैली का कथाकार ने अधिकाधिक प्रयोग किया है। यही कारण है कि कुछ कहानियां में कथाकार का निजी अनुभव झलकने लगता है। कथाकार ने हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी, उर्दू, देशज शब्दों के साथ आंचलिक शब्दों का भी प्रयोग किया गया है।
ब्रेसलेट में अधिकतर वर्णनात्मक शैली का उपयोग किया गया है। संवाद कम ही हैं। बेहद लंबे वाक्य हैं। अनुच्छेद भी बहुत लंबे-लंबे हैं। सत्रह, इक्कीस, सत्ताइस और इकतीस लाइनों का एक-एक अनुच्छेद भी कहानियों में हैं। चार, पांच, छह, सात और आठ-आठ लाइनों के एक-एक वाक्य भी है। संभव है कि पाठक इतने लंबे अनुच्छेदों और लंबी-लंबी लाइनों के वाक्यों को तन्मयता के साथ पढ़ने में असहज हो सकते हैं। वैसे चुटीले संवाद भी हैं तो विचारात्मक भाव भी कहानियों में अनायास ही आ जाते हैं। एक कहानी में छोटी-छोटी और कहानियों की कथावस्तु भी देखने को मिलती है। दो-तीन अवसरों पर अंग्रेजी के शब्द नहीं पूरे वाक्य शामिल कर लिए गए हैं। वहीं उसी के साथ उसका हिंदी अनुवाद कोष्ठक में दिया गया है। यह गैर जरूरी लगता है।
स्वयं कथाकार एक गंभीर पाठक हैं। स्थानीय से लेकर विश्व साहित्य के वे अध्येता हैं। लेकिन वे कहानियों में अति साहित्यिकता के मोह को नहीं छोड़ सके हैं। हर कहानी में एक-दो नहीं बीस से अधिक ऐसे शब्दों का इस्तेमाल वे करते हैं जिनके विकल्प में सरल और आम बोलचाल के शब्द उनके निजी शब्दकोश का हिस्सा हैं।
’ब्रेसलेट’ में उन्होंने निस्तब्धता, स्वर्गिक, अधिवासी, प्रवृत्त्यिां, प्रत्युत्तर, अद्र्धांश, विन्यास, द्विविमीय, अनावृत, अग्रभाग, त्रिवीमीय, रोमांटिसिज़्म, अविच्छिन्न, सर्वसमावेशी, फासिज्म, निर्लिप्त, अवलम्बन, क्रन्दन, संक्षिप्त, निष्प्राण जैसे शब्दों का प्रयोग किया है।
‘युद्धमशीन‘ में उन्होंने वितृष्णा, अद्वितीय, एडवाइज़्ड, मनश्चिकित्सिक, उपहासपूर्ण दृष्टि, परिस्थितिजन्य, सन्देहास्पद, इन्टैरोगेशन, निरुद्ध, केन्द्रित जैसे कई शब्दों का प्रयोग किया है। ‘कथावाचक‘ में मंदस्मिति, दुखान्तयुक्त, अन्तर्गुम्फित, सौन्दर्यशास्त्र, विसर्जित, सरफैसियल इम्पैक्ट, एक्सटेम्पोर, प्रागैतिहासिक, पुर्नजन्म शब्द आए हैं।
‘एक वर्जित शोक गीत‘ में आत्माभिमानी, सम्मोहक, उत्पत्ति, रक्ताभ, प्रतिध्वनियां, मिश्रित, प्रदूषणमापक, लिपिबद्ध, उच्छवास आदि शब्द हैं।

‘पुस्तकालयाध्यक्ष का एक दिन‘ में प्रतिष्ठित, दुःस्वप्न, स्मृतिलोप, चेतनाशून्य, अपरिभाषित, स्पंदनहीन, यन्त्रवत्, अभीष्ट,सप्ताहान्त,गन्धमिश्रित, आर्तनाद जैसे शब्द हैं। ’शुक्रिया’ में नित्यकर्म, रूपान्तिरित, भ्रमित, प्रविष्ट, विद्रुप, भग्नावशेष, रक्तरंजित, अवसन्न, दुष्प्रचार, रक्तस्राव, पुनस्र्थापित, पुनर्नवा आदि शब्द हैं।

कथाकार एस॰पी॰ सेमवाल हर कहानी में एक ऐसे पात्र का रेखाचित्र खींचने में सफल हुए हैं जिसे पाठक पढ़ते हुए अपनी आंखों से अपने आस-पास महसूस करता है। प्रत्येक कहानी अपने देशकाल, वातावरण और परिस्थितियांे के चलते यथार्थ की कहानियां बन पड़ी हैं।
ब्रेसलेट को आज की भी कहानी कहा जा सकता है। काॅलेज का माहौल और समाज में बनती-बिगड़ती अमन-चैन और सांप्रदायिकता की स्थिति पुरानी बात नहीं लगती।
युद्धमशीन भले ही कई देशों के मध्य हुए युद्ध के आलोक में ध्यान खींचती है। लेकिन यह कहानी हमेशा समसामयिक रहेगी। मनुष्यों के साथ-साथ राज्य भी अपने को शक्तिशाली, दूसरे को कमजोर बनाने के साथ पड़ोसी और शक्तिशाली बन रहे देशों में जासूसी उनके नागरिकों के साथ की जाती रहीं बदसलूकियों से आए दिन अखबार भरे पड़े रहते हैं। कहीं न कहीं ये कथा युद्ध के मारक असर पर उसी राज्य के देशवासियों के दृष्टिकोण को समझने की ओर इशारा भी करती है।

कथावाचक को हर पाठक अपने समय के सन्दर्भ में देख सकता है। हिंदुस्तान में तो भीड़तंत्र को कहीं भी बरगलाया जा सकता है। धर्मान्धता और आस्तिकता वोट बैंक के साथ बहुत बड़ा व्यवसाय भी है। आदित्य ने यह कर दिखाया। एक वर्जित शोक विशुद्ध रूप से उत्तराखण्ड के लोकजीवन और यहां के हालातों पर कसता व्यंग्य भी है। कैसे और क्यों हम आज भी ठाकुर का कुआं ढो रहे हैं। यह अस्सी फीसदी पढ़ी-लिखी जनता के होने के बाद भी कायम क्यों हैं। कथाकार की यह कहानी बेहद विचलित कर देती है।

पुस्तकालयाध्यक्ष का एक दिन एक अजीब तरह की कहानी है जो कहीं न कहीं एक साथ कल, आज और कल के मनकों की पिरोई गई माला है। इसे विज्ञान गल्प के आस-पास देखा जा सकता है। इस बहाने पीढ़ीयों और समाज के अंतर को बेहद काल्पनिकता के साथ कहानी हमें 2021 के दर्शन कराती है।
शुक्रिया कहानी नए पुराने ठेकेदारों के साथ सुक्खी और तेरह साल का समझदार बच्चा जो बाद में बाल सुधारगृह की तीन साल की जीवन यात्रा के बाद कुछ ओर ही बन गया। आज के से ही हालातों पर यह कहानी हमारे आस-पास ऐसे अपराधी बन चुके बालकों की ही कहानी लगती है।
ब्रेसलेट 17 पेज की कहानी है। पात्रों में जतिन एक प्रगतिशील नौजवान है। कला, साहित्य और संस्कृति में गहरी नज़र रखता है। सामाजिक सरोकारों से उसका गहन रिश्ता है। वहीं माधव एक कट्टरपंथी विचारधारा का का पोषक है। संजय समृद्ध परिवार का सदस्य है। मध्यस्थ भाव रखता है। हर विचारधारा के फौरी तौर पर गुण-दोष देखने वाला, हर ओर सामंजस्य बिठाने वाला है। ज़ेबा हसन को दिया गया बे्रसलेट कहानी में तीव्र अन्त पैदा करने में सफल हुआ है। नियाज़ हसन एक तरक्क़ी पसंद इंसान हैं। कहानी युवावस्था, काॅलेज-हाॅस्टल के दिनों के आस-पास केन्द्रित है। सामाजिक समरसता के प्रयास कहानी के माध्यम से हुए हैं। धार्मिक, जातीय, नस्लीय भावों पर भी कथाकार ने इस कहानी के माध्यम से इशारा किया है। इसी कहानी में लंबे-लंबे वाक्य हैं। 
एक वाक्य पढ़िए -

अपनी विशिष्ट वास्तुकला के साथ, जो शहर ही नहीं राज्य के इस प्रतिष्ठिता काॅलेज की अन्य पुरानी इमारतों में भी प्रतिबिंबित होती थी, के साथ सामने इस छोर से उस छोर तक फैले हरे-भरे सुप्रबंधित लाॅन, उसके आगे पंक्तिबद्ध अशोक वृक्ष और छात्रावास की चहारदीवारी के बाहर शहर की ओर जाती सड़क से दो हिस्सों में बंटा बर्च वृक्षों का जंगल, जिसे इसी काॅलेज के एक वृक्षमित्र प्रोफेसर के एकदशकीय वृक्षारोपण अभियान के तहत यत्पूर्वक रोपा और विकसित किया गया था, पतझड़ के मौसम में कोलतार पुती सड़क और जंगल के बीच गिरे और गिरने को प्रतीक्षारत इस वृक्ष के पत्ते दोपहर की धूप में अपनी पीली रंगत के साथ इस तरह चमकते मानो किसी ने इस धरती पर सोना बिखेर दिया हो।(पेज 17 दूसरा अनुच्छेद: ‘ब्रेसलेट’)
दूसरी कहानी युद्ध मशीन है। यह कहानी 10 पेज की है। स्मिथ युवा तुर्क है। छात्रों का अगुवा। एमआईटी का परास्नातक। ओजस्वी वैचारिक भाषण देने वाला अमेरिका में एक महीने से बंद है। विकसित और विकासशील देशों के मध्य जो गैरबराबरी है। युद्ध ताकत के लिए या बेहतरी के लिए? यह सवाल कहानी में शिद्दत से आया है। कहीं न कहीं यह कहानी इस ओर भी इशारा करती है कि कैसे युद्ध को आगे कर कोई देश दूसरे देश को बरबाद कर सकता है।
इस कहानी में भी एक लंबे वाक्य का उदाहरण पढ़िए-
इस्पात के उस मज़बूत दरवाज़े की बग़ल में एक फीट लंबी और पांच इंच चैड़ी एक स्लिट बनी हुइ्र्र थी, पूरी जेल में सबसे खतरनाक हमलावर या मानिसिक असंतुलन से ग्रस्त कैदियों को बाहर ले जाने के लिए यह तरीका सबसे कारगर माना जता था कि कैदी दरवाज़ा खुलने से पहले अपने हाथ उस स्लिट से बाहर रखे जिनमें हथकड़ी पहना कर फिर दरवाजा खोलकर कैदी को बाहर निकाला जो और इस तरह सुरक्षाकर्मियो पर हमले की संभावना कम की जा सके। (पेज 34 पहला अनुच्छेद: युद्ध मशीन)
तीसरी कहानी कथावाचक है। यह 13 पेज की कहानी है। आदित्य जो कथावाचक बनता है और फिर एक भरी सभा में संत आदित्य महाराज का चोला उतारकर फेंक देता है। ये कहानी भी युवाओं के भीतर अपार उर्जा, क्षमता को प्रदर्शित करती है। आदित्य बहुमुखी प्रतिभा का धनी है। साहित्य, कला, संस्कृति और रंगमंच का जीवन में कितना महत्व है, यह इस कहानी में अच्छे से आया है। एक पात्र जो यहां मुख्यमंत्री का निजी सचिव है, उसकी गतिविधियां पाठक में गुस्सा पैदा करने में सफल हुई हैं।
 इस कहानी में भी एक लंबे वाक्य का उदाहरण पढ़िए-
मसलन सती का अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर अग्निकुंड में देह विसर्जित करना, शिव का दक्ष के खण्डित सिर की जगह बकरे का सिर प्रत्यारोपित करना और सती के शव को लेकर शोक संतप्त होकर ब्रहमाण्ड का चक्कर लगाना फिर समाधिस्थ हो जाना, इस नसबके बाद कामदेव का उनके त्रिनेत्र से भस्म हो जाना और शिव का वरदान कि द्वापर युग में कामदेव श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के रूप में और रति बाणासुर की पुत्री उषा के रूप में जन्म लेंगे और उनका पुनः मिलन होगा। (पेज 46-47 तीसरा अनुच्छेद: कथावाचक)

संग्रह की चैथी कहानी एक वर्जित शोकगीत है। यह कहानी 21 पेज की है। पहाड़, पहाड़ का परिवेश, यहां का लोक जीवन, यहां की विषमता अच्छे से आई है। एक प्रेम कथा जिसमें जात-बिरादरी हावी हो गई और दोनों को मार दिया गया। आज भी ठाकुर के कुएं की याद दिलाता है। यह कहानी कहीं सारी कहानियों के साथ पूरे प्रवाह में पाठकों को बांधे रखने में सहायक हुई है।

इस कहानी में एक लंबा वाक्य वाक्य पढ़िए-
दिन भर इस इलाके के सौन्दर्य, नीचे गांव के खेतों को छूकर बहती पहाड़ी नदी की हवा के साथ जुगलबंदी करती कल्लोल पीले माल्टो और सन्तरो के बोझ से दबे-दबे पेड़ों वाले घरों के आंगन केलोे के वृक्षों की हरियाली से ढके पनघट तक जाने वाले रास्ते और ऊपर बुरांश की लाली से दहकते जंगल और खेतों के पुश्तो पर इस छोर से उस छोर तक पीले फंयूली के फूलों के इस मंत्रमुग्ध कर देने वाले नज़ारे के बाद रात के लज़ीज खाने ने हमें ऐसे स्वर्गिक अनुभव से साक्षात्कार करवा दिया था जिसकी हम शहर में कभी सपने में भी उममीद नहीं कर सकते थे। (पेज 60 पहला अनुच्छेद: एक वर्जित शोकगीत)
संग्रह की पांचवी कहानी पुस्तकालयाध्यक्ष का एक दिन है। यह कहानी 16 पेज की है। भौतिकी का पूरा प्रभाव। विज्ञान फंतासी का-सा प्रभाव दिखता है। विष्णु पंढारकर का पात्र उभरकर सामने आता है। यह कहानी बाप-बेटे के संबंधों और दस साल के काल्पनिक अंतराल में आए बदलाव का भी चित्रण करता है। यह लीक से हटकर कहानी है। चमक-दमक, बड़ापन दिखाने की ठसक इस कहानी में दिखाई गई है।
 इस कहानी में भी एक लंबा वाक्य पढ़िए-
उसने फिर आंखें बंद कर जंग लगा लोहे का गेट थाम लिया और अपने भीतर एक गहरी गले को सूखी लकड़ी की तरह सुखा देने वाली प्यास महसूस की, उस पेय के विज्ञापन को देखने के बाद या एक अनजाने दौर तक की निश्चेतना की स्वाभाविक परिणति के तौर पर। (पेज 78 दूसरा अनुच्छेद: पुस्तकालयाध्यक्ष का एक दिन )
संग्रह की छठी कहानी शुक्रिया है। 20 पेज की यह कहानी बाल अपराधी और समाज के कथित ठेकेदारों का बखूबी चित्रण करती है। कैसे यह समाज किसी को भी अपराध की दुनिया में धकेलता है। एक अलग सा वर्णन करती यह कहानी विचारणीय प्रश्न उठाने में सफल हुई है। इस कहानी में भी कुछ लंबे वाक्य हैं।

एक उदाहरण पढ़िए-

उसके अतीत से अनजान तमाम बस्ती के लोग इसी बात पर सुकून कर लेते कि उसी की बदौलत उनके बेबस मायूस बच्चे उसकी दी हुइ्र चाॅकलेट या चाबी वाली कार या ढोलक बजाते जोकर के सााथ घर भर में खुषियों के मारे किलकिला रहे हैं और यह भी कि किसी बीमारी या लाचारी के मारे मर्द या औरत के हाथ में बिना गिने रुपये धर दे इस उममीद के बिना कि वे रुपये उसे वापस भी मिल पाएंगे या नहीं। (पेज 94 दूसरा अनुच्छेद: शुक्रिया)

लंबे वाक्यों से गुजरता हुआ पाठक पीछे के सन्दर्भ को जोड़ते हुए आसानी से आगे नहीं बढ़ पाता। फिर भी इन छह कहानियों में बहुत कुछ ऐसा है, जिसे बार-बार पढ़ने से बार-बार अलग सा स्वाद मिलता है। 

आप भी पढ़िए -

‘ब्रेसलेट’ कहानी से
एक-‘ताज़ा हवा को झोंका गर्मियों भर चादर तान कर सोते उस कमरे की आंखों से मानो नींद के जाले बहाकर ले गया।’
-दो- ‘बच्चों की वास्तविक ज़रूरते पूरी करने की बजाय उनकी अनाप-शनाप फरमाइशें पूरी की जाती हैं, जिससे समाज में अपनी समृद्धि और ठसक का सिक्का जमाया जा सके।’
-तीन-जो चीज़ आप बना नहीं सकते, उसे नष्ट करना आपका अधिकार भी नहीं।’
-चार-‘वह जतिन और माधव के द्विध्रुव के बीच एक निरन्तर संक्रमणशील न्यूट्रिनों की तरह डोलता रहता।’
-पांच-धुरविपरीत वैचारिक आधार के बावजूद दोनों एक ही कमरे में साथ-साथ रह रहे थे तो लगता है कि इनकी स्थिति नाभिक में अवस्थित प्रोटोनों के बीच इलैक्ट्रोनों का स्थानांतरण जिस तरह उन्हें बांधे रखता है, संजय इसी भूमिका के तहत इन दोनों को जो शायद उसकी अनुपस्थिति में छिटक कर दूर जा सकते थे, उन्हें साथ रखने की वजह बन गया था।’
छह-उसे लगता वह खुद से ही उकता गया है, वह हवा में, पेड़ों के जुदा रंगों में फूलों में और बादलों में बनने, बिगड़ने वाली असंख्य आकृतियों में नयापन ढूंढने की कोशिश करता लेकिन अगले ही पल वे उसे बासी और नीरस लगते लगते।’
सात-ऐसा कुछ करना होगा तो पहले हमें खुद के भीतर ही संबल और सहारा तलाश करना पड़ेगा संजय, ये लड़ाई है जो खुद की ताकत और हौसले से जीती जाती है।
आठ- लेकिन चीज़ें हमेशा हमारी आकांक्षा और मंशा के अनुरूप घटित होतीं तो शायद दुनिया सभी इंसानों के लिए या तो बेहद खुबसूरत जगह होती या एकरस, उबाऊ होती, कौन जाने?
नौ-गलियों में बस कुछ अवारा कुत्ते घूम रहे थे जो इसलिए बच गए कि उनका कोई नाम-पता और जात नहीं थी।
‘युद्ध मशीन’ कहानी से-
एक-किसी बात पर हंसते हुए उसके शरीर का ऊपरी हिस्सा भी एक बार दोलन करने लगता था।
दो-किन्तु अदालत स्मिथ एवंत माम सामाजिक कार्यकर्ताओं को सुझाव देती है कि वे युद्ध एवं शांति को एक निरपेक्ष परिघटना के तौर पर देखने के बजाय यह गौर करें कि किन्ही परिस्थितियों में जब जनतंत्र को, राज्य की जिनता के हितों को और जीवन को ख़तरा हो तो युद्ध एक अप्रिय अनिवार्यता के तौर पर सामने आता है।
कथावाचक कहानी से-
एक-जसविन्दर का ख़्याल दर्द के समन्दर में डूबी याद की एक लहर की तरह उसके ह्दय में उभर आया।
दो-उसके गालों के हल्के क्यूपिड सुनहरी धूप में कत्थई हो उठे।
तीन- वह हैरान होता कि यह कथा कितने युगों तक फैली हुई है और साथ ही यह भी सोचता कि भले ही इसकी रचना में विलक्षण कल्पनाशीलता झलकती है लेकिन ये तर्क और वैज्ञानिक मेधा को भी कुंठित करती है। मसलन सती का अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर अग्निकुण्ड में देह विसर्जित करना, शिव का दक्ष के खण्डित सिर की जगह बकरे का सिर प्रत्यारोपित करना........।
चार-हां और जरूरत के इस हिसाब किताब को तू प्यार समझता है? जिसे तुम प्यार समझते हो बहुत मामलों में वह अधिकार की भावना को व्यक्त करता है। वह मेरा है या मेरी है इस अहं की भावना को तुष्ट करता है। जिस पर दुनिया की नज़र है वो मेरे पहलू में है इस पागलपन में है।
‘एक वर्जित शोक गीत‘ कहानी से-
एक-यह गोधूलि की बेला ही थी जिसने मुझे जैसे शहर में रहने, शहर को समझने का दावा करने वाले शख़्स को कुछ ही लमहों में महसूस करा दिया कि शानदार चमचमाती टैªफिक लाइट की लाल,हरी और पीली लाइटों,शाॅपिंग माॅल्स, एलीट काॅलोनी, पांच सितारा होटल, पांच सितारा ख्याति के निजी स्कूल जहां शिक्षा के सिवा सब कुछ दर्शनीय होता है के बाहर भी एक दुनिया है, जीवन है।
दो-उनके बछड़ों ने अपनी ज़रूरत भर अपनी मांओं के थन से दूध पा लिया था और अब ग्वालिनें अपने घर के लिए अपने घुटनों के बीच दबाए घड़ों में उनका दूध उतार रही थीं। हर बकरी और भेड़ अपने भरे पेट के साथ चरागाह से लौटी थी।
‘पुस्तकालयाध्यक्ष का एक दिन’ कहानी से-
एक- उसने फिर आंखें बंद कर जंग लगा लोहे का गेट थाम लिया और अपने भीतर एक गहरी गले की सूखी लकड़ी की तरह सुखा देने वाली प्यास महसूस की, उस पेय के विज्ञापन को देखने के बाद या एक अनजाने दौर तक की निश्चेतना की स्वाभाविक परिणति के तौर पर।
दो- यह शहर भी उन्हीं पात्रों की मानिंद अपना होते हुए भी उसे बेगाना, दूसरे ग्रह का सा महसूस हुआ।
तीन- इसका दूसरा अभिप्राय था कि इस नश्वर जीवन की सच्चाई के बरअक्स वह अपने पति से पहले दुनिया से कूच कर जाए, मुझे यह क़तई बेतुका लगता है कि स्त्रियां अपने पति के दीर्घ जीवन की कामना करें, इसलिए इस देश में महिलाओं की औसत उम्र पुरुषों से कम है। भई अगर दुनिया से जाना ही है तो मैं पहले जाना चाहूंगा या हद से हद तुम्हारे साथ।
चार-अब उसके ह्दय से भावना के सभी स्थूल और सूक्ष्म तत्व अतीत की मधुर, कटु या तिक्त स्मृतियां, उसके जीवन की सार्थकता का बोध, निराशा और उत्साह सब कुछ जैसे भाप बन कर उड़ रहे थे।
‘शुक्रिया‘ कहानी से-
एक-काम से घर लौटते लोगों से अटी-सिटी बसों, रिक्शों, कारों और दुपहिए वाहनों ने सड़क का जैसे दम घोंट दिया हो।
दो-यहां से गुज़रने पर नाली पर बैठकर नित्यकर्म निपटाते नंग-धडंग बच्चे इस कैनवास पर चित्रित पेन्टिंग का अभिन्न हिस्सा थे।
तीन-इसी स्कूल में अपने बालों में दो चोटियों पर सुखऱ् रिबन के गुलाब लगाए कन्धे पर बस्ता रखे स्कूल जाती वो लड़की, जिसे देखकर उसकी ज़ुबान तालू से चिपक जाती। वो अम्बियां और नीम की दातुन इकट्ठा करना और क़स्बे में उन्हें बेचकर पांचेक रुपए के साथ अपनी आंखों में चमक लिए घर लौटना।
चार-इस व्यवस्था की अमानवीय विशालकाया मशीन में यह किशोर गृह तो एक कूड़ाघर की तरह था, जहां वो अपने इस्तेमाल की गई चीज़ों और अपनी ग़लतियों से बिगड़ गई चीज़ों को फेंककर सुकून से रह सकती थी। अनवरत्-याथवत्। लेकिन ये बेजान चीज़ों का कूड़ाघर नहीं था, वो व्यवस्था के शिखर पर बैठै सत्तासीनों को तब एहसास होता जब इसी कूड़ाघर से हाथों में वो हथियार लेकर बाग़ी बन इन्हीं की नीव हिलाने लगते।
पांच-नये निज़ाम ने पूरी दुनिया में मुनाफा़ख़ोर पूंजी के बड़ै प्रचारतंत्र के हुंआ-हुआं से प्रभावित होकर एलान कर दिया कि पुराने तरीक़े अब काम नहीं वाले।
छह-लहूलुहान होकर फर्श पर गिरे दिलीप की हैरत भरी आंखें उसकी ओर टंगी हैं। मृत्यु से एक क्षण पहले उन आंखों में ख़ामोशी के साथ हज़ारों सवाल तैर रहे हैं।
कुछ कहानियों में कथाकार ने कहानी के मध्य ही कोष्ठक में शब्दों और वाक्यों का तर्जुमा हिन्दी में दिया है। इसी तरह कुछ आंचलिक शब्दों का उपयोग कर वहीं उसका हिन्दी में अर्थ दिया गया है। इसे इस तरह कहानी के बीचोंबीच नहीं दिया जाना चाहिए। यह पाठक के कहानी के स्वाद में बाधा पहुंचाता है। इसे आखिरी पन्ने पर दिया जा सकता था, या नीचे बाॅटम पर अलग से रेखांकित किया जा सकता था। या नहीं भी देने से काम चल जाता।
मुझे लगता है कि कहानी भी एक गीत की मानिंद होती है। कहानी अपना अर्थ देने में सक्षम होती है। जैसे-जैसे गीत की एक-एक पंक्ति आगे बढ़ती है, वह अपने आगे-आगे उसके मायने को साथ लेकर चलता है। उदाहरण के लिए किसी भी आंचलिक गीतों को ले लीजिए। भोजपुरी हो या गढ़वाली। गीतकार ने ठेठ आंचलिक शब्दों का उपयोग गीतों में किया है। सुनने वाला और गाने वाला भी उन गीतों में आए उन वाक्यों, शब्दों-अपरिचित शब्दों के अर्थ स्वयं खोजता है। तलाशता है। पता करता है। साहित्य खोजबीन की यात्रा भी है। गढ़वाल और कुमाऊं के कई गीतकारों ने गीतों में आंचलिक शब्दों को उपयोग किया है। उनकी व्याख्या नहीं की है। व्याख्या पाठक करता रहे। पूछे। इससे दो फायदे होते हैं। लोक धर्म भी बचा रहता है और शब्द मरते नहीं। 
शब्दों को सन्दर्भ के साथ जोड़कर देखने,परखने और बरतने की आदत बनी रहती है।

मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि कथाकार का उद्देश्य साफ है। वह अपनी कथाओं के माध्यम से पाठक को झकझोरना चाहते हैं। वे समस्या रखते हैं। हालातों का बखूबी चित्रण करते हैं। समाधान नहीं जुटाते। समाधान की ओर प्रेरित करते हैं। उत्प्रेरक का काम करते हैं। वे सवाल-दर-सवाल खड़ा करते हैं। वे पाठक को तनाव देते हैं। बेचैन करते हैं। हर कहानी इस बात की ओर इशारा करती है कि जिस समाज में हम रह रहे हैं उसमें मानवता भी हो। नैतिकता भी हो। इंसानियत भी हो। हम इंसान को तरजीह दें न कि किसी के पद और उसकी मिल्क़ीयत को। इन कहानियों के पात्रों में अलग-सी छटपटाहट दिखाई देती है। आक्रोश दिखाई देता है। तनाव दिखाई देता है। पात्रों के माध्यम से समाज में जो नहीं होना चाहिए, उसका भी उल्लेख किया गया है। पात्रों के सहारे रचनाकार एक समतामूलक समाज चाहते हैं। पात्रों के सहारे गैर बराबरी से उपजा असंतोष भी बेहतरीन ढंग से रेखांकित हुआ है।
समय साक्ष्य प्रकाशन के क्षेत्र में तेजी से उभरता हुआ उत्तराखण्ड का अग्रणी प्रकाशक बन रहा है। लेकिन इस पुस्तक के प्रकाशन में कुछ लापरवाहियां दिखाईं देती हैं। स्वयं प्रकाशक को अपनी ओर से पुस्तक के ले आउट पर ध्यान देना चाहिए था। पेज संख्या 02, 06, 10, 16 और 112 खाली छोड़ दिए गए हैं। खाली पेज अखरते हैं। आवरण चित्र किसका है? इसका उल्लेख नहीं है। कागज बेहतरीन है। फोन्ट भी अच्छा है। आंखों का कष्ट नहीं देता। चंद्रबिन्दु को बरतने में लापरवाही खूब दिखाई देती है। कुछ जगह अंग्रेजी के शब्द फोंट बदलने से गड़बड़ा गए हैं।
आशा की जाती है कि इस संग्रह को पाठक बहुत पसंद करेंगे।

॰॰॰ -मनोहर चमोली ‘मनु’
Mobil-0941218688
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पुस्तक: ब्रेसलेट
पेज संख्या: 112
मूल्य: 120
आकार: डिमाई (अजिल्द)
प्रकाशक: समय साक्ष्य, 15 फालतू लाइन, देहरादून
मेल: mailssdun@gmail.com

फोन: 0135-2658894

लेखक: एस॰पी॰ सेमवाल
सम्पर्क: 11 मन्दाकिनी एन्कलेव,डिफेंस काॅलोनी,देहरादून
मोबाइल: 9758502569
मेल:spsemwalgvs@gmail.com
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BRACELET : SP SEMWAL 

by- Manohar hamoli 'manu'

07/10/2016

पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन बसा है मल्यो की डार में

पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन बसा है मल्यो की डार में

-मनोहर चमोली ‘मनु’

सुपरिचित लेखिका, संस्कृतिकर्मी, एक्टीविस्ट, जनांदोलनकारी गीता गैराला की किताब ‘मल्यो की डार’ महज़ एक रचनाधर्मिता का उदाहरण नहीं है। इस बहा
ने लेखिका बड़ी आसानी से और स्थाई तौर पर पाठक के अंतस में पहाड़ और खासकर पहाड़ी स्त्री के जीवन का समूचा रेखाचित्र अविस्मरणीय ढंग से अंकित करने में सफल हुई है।
160 पेज, डिमाई आकार, सुरक्षित कागज़, उम्दा छपाई, अक्षरों की बुनावट आँखों को भा जाने वाली है। अठारह संस्मरणनुमा रचनाएँ जो रवानगी के साथ-साथ पाठक के मन-मस्तिष्क में आसानी से पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन के आम पात्रों का चित्रण करने में सफल हुई हैं। बचपन को याद करते हुए बचपन का खिलंदड़पन यहां पढ़ने को मिलता है। लोक जीवन के साथ-साथ मास्टर जी का जीवंत चित्रण पूरे रेखाचित्र के साथ उभरा है। यह किताब लेखिका ने अपने जन्म स्थल भट्टी गाँव को समर्पित की है।
उन्हीं के शब्दों में-’भट्टी गाँव के पेड़-पौधों, पौन,पंछियों, ठुल दादी, दादी-दादाजी, माँ,चाचियों और भूली बिसरी सब सहेलियों के लिए जन्हें (जिन्हें) मैं साँस के साथ जीती हूँ।’
'ठीक ही कहती थी दादी हम बस मल्यों की डार ही तो हैं। चरने के लिए मैदानों की तरफ उड़ गए। पर मल्यो तो केवल जाड़े में भावर जाते हैं, घाम तापने। शीत रितु खत्म होते ही अपने डेरों में लौट आते हैं। ये हैं असली प्रवासी। हम खुद को प्रवासी किस मुंह से कहते हैं, हम भगोड़े हैं, भगोड़े, जो एक गए और दुबारा पलट के नहीं लौटे।’
यहां डार का अर्थ,प्रसंग और सन्दर्भ ही बदल गया। वाह! खैर समूची पुस्तक पठनीय है।
अठारह रचनाओं में विविधता है। यादें हैं। बचपन है। भोलापन है। माता-पिता के संस्कार दिखाई देत हैं। परवरिश के तौर-तरीके दिखते हैं। बचपन की मस्ती और मासूमियत में पाठक मुस्कराता है। ऐसे कई अवसर आते हैं कि पाठक भी लेखिका के भीतर जमी गहरी भावनात्मक संवेदनाओं के साथ खुद को खड़ा पाता है।
पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोकजीवन, जीवन के कष्ट, दुःख-दर्द, पीड़ाएँ, रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी दिक्कतें-संकट, भूख, घर में आम रोटी को मयस्सर घरेलू महिलाओं की दिनचर्या, पानी-घास-लकड़ी के साथ जूझता समूचा पहाड़ी जीवन और उसके घेरे में घूमती-घुमाती स्त्री। एक संघर्ष गाथा यहां पढ़ते हुए देखने को मिलती है।
एक हजार छःह सौ मीटर की ऊँचाई से अधिक के पहाड़ी जीवन को करीब से जानने वाला पाठक खुद-ब-खुद लेखिका के साथ यात्रा पर निकल पड़ता है। पहाड़ की फसलें, जंगली फल, खेत, लोकजीवन की रामलीला, गांव के शादी-ब्याह, पहाड़ की परम्पराएं, संगीत, गीत बारात, संस्कृति को लेखिका ने न जाने कब अपनी आंखों से इतना करीब से देखा। ऐसे जीवट और सूक्ष्म अनुभव ही किसी रचनाकार की रचनाओं में प्राण से फूंक देते हैं।
बहुत सारी खासियतों के साथ पाठक को कभी-कभी लेखिका जिद्दी भी दिखाई दे सकती है। कहीं-कहीं लेखिका भी मानवीय दुर्बलताओं के साथ खड़ी दिखती है। यह स्वाभाविक भी है। मास्टर जी अंथवाल के साथ-साथ नजीब दादा हर पाठक को अवश्य भाएगी। दोनों चरित्र समाज के आम चरित्र हैं।
एक ओर मास्टर जी स्कूल का, पढ़ाई का, गांव का पूरा माहौल बदलते हैं तो वहीं गंगा-जमुनी की संस्कृति का प्रतीक बने नजीब दादा समरसता, प्यार-मुहब्बत के पर्याय बन जाते हैं।
भूमिका प्रख्यात कथाकार सुभाष पंत ने लिखी है। उन्हीं के शब्दों में कुछ शब्द-‘जब उस अनचाही ठेट लड़की ने काॅपी पर स्याही से लिखना शुरु किया तो उसकी उंगलियां स्याही से नीली हो गई। बार-बार धोने के बाद भी, वह स्याही छूटती नहीं थी। मुझे लगता है कि वह स्याही उसकी उंगली से अब तक नहीं छूटी। छूट जाती तो ‘मल्यो की डार’ जैसी अनूठी रचना का जन्म नहीं होता।’
बतौर लेखिका गीता गैरोला लिखती हैं-‘जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है हर व्यक्ति अपने बचपन की तरफ बार-बार लौटता है, तो क्या मैं भी उम्र बढ़ने के साथ अपने बचपन की तरफ बार-बार लौटती हूं। बीते हुए लम्हों को फिर से जीने के लिए। नहीं जानती सच क्या है? पर मैंने उन सब यादों को लिखने की कोशिश की है।’
भाषा शैली बेहद सरल सहज है। कहीं-कहीं वह विस्तार लेती है। कहीं भावपूर्ण हो जाती है तो कहीं चुटीले अंदाज में पाठक को एकाग्र रखने में सफल रहती है। पहाड़ी शब्दों से लेखिका ने परहेज नहीं किया है।

सरलता इतनी कि ऐसे लगता है कि पाठक अपने आस-पास ही सारा वृतांत घटता हुआ देखकर पढ़ रहा हो। मल्यो की डार, वहीं पर पड़ा है समय, घने कोहरे के बीच, देवता का खेल, कुणाबूड, मेरे मास्टर जी, प्यारे चक्खू, कोटे की फंकी, नजीब दादा, चैमास, बिजी जा, स्याही की टिक्की, ओ ना मासी धंग, मौसम सुहाना है, एक रामलीला ऐसी भी, सामूहिकता का रिवाज, नखलिस्तान, गांव की तरफ शीर्षक से ही जाना जा सकता है कि इस एक पुस्तक में कितने रंग हैं।
कहन, शैली, भाव और तेवर के कुछ उदाहरण आपकी नज़र-
‘अचानक में ‘उई’ कह कर बैठ गई। उनीन्दी दादी को झकझोर कर बोली,‘‘दादी उठ तू अभी मेरी दो चोटी बना दे, सुबह चोटी बनाने में प्रभात फेरी के लिए देर हो जाएगी।’’ मेरा उतावलापन देा दादा जी जोर से हंसे और बोले, ‘‘बेटा अगर दादी तेरे बाल अभी बना देगी तो रात भर सोने के बाद सुबह तक बाल खराब हो जाएंगे। तू मुझ पर विश्वास करती है न, सो जो। मेरी चखुली (चिड़िया) सुबह तुझे जल्दी से उठा दूंगा। पभात फेरी में सबसे आगे तू ही झंडा उठाकर चलेगी।’’--- ’
‘मैं जब कभी बीमार होती, बड़ी दादी मेरी गुदगुदी पीठ में एक धौल जमा कर कहती,‘‘अरे इस गदोरी का कुछ नहीं होगा। लड़कियां जीने के मामले में बड़ी छित्ती होती हैं।’’---’
‘दूसरे प्रकार के मास्टर ऐसे होते कि मास्टर जी की बेंत हाथों पर पड़ती या पीठ पर, गहरी नीली लकीर उभर आती। पर हम आंखों के आंसू बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर पाते। गलती से आंसू बह गये और मास्टर जी ने देख लिया तो दूसरी बेंत लगनी निश्चित होती।----’
‘उनके हर काम में एक संगीतमय लय और रिदम होती। हम सब उनके चलने-बोलने, गाने-नाचने, काम के तरीकों की नकल करके उन्हें दिखाते। मास्टरजी हमारी नकल पर खूब हंसते और कमी होने पर सुधार करवाते। देखो मैं ऐसे नहीं, ऐसे चलता हूं। ऐसे गाता हूं, ऐसे बोलता हूं।---’
मल्यों टिहरी में मळयो (काले-सांवले जंगली कबूतर) कहलाए जाने वाले से जुड़ा शब्द और उसके साथ डार। मल्यों की डार किताब का शीर्षक चैंकाता है। कभी खेती किसानी में ये जंगली कबूतर अनगिनत झुण्ड के साथ फसल पर टूट पड़ते थे। कोदा,झंगोरा क्या और मुंगरी क्या या फिर खलिहान में रखी फसल क्या। चट कर जाते थे। तब इन्हें डार गाली की तरह देखा जाता था। यह प्रवासी पक्षी के तौर पर देखे जाते हैं। हालांकि ये पक्षी अधिकतर समय पहाड़ में ही बिताते हैं लेकिन घरेलू कतई नहीं है। पाठक मल्यों की डार को इस तौर पर भी आसानी से समझ सकते हैं कि स्वयं लेखिका ने एक जगह उल्लेख किया है-‘जब हम बहनें स्कूल जाती वो कहती ‘‘हे राम। चलगी मेरी मल्यों की डार।’’ उस दिन मल्यो भगाने के बाद मैंने पूछा-‘‘दादी तू हम बहनों को भी तो मल्यो की डर कहती है।’’ ‘‘हां बाबा, बेटियां मल्यों की डार ही होती है। अपने मैत में चार दिन रुकी और फिर चल देती हैं दूसरे मुलुक।’’
पुस्तक मल्यों की डार में आँचलिक शब्दों का वहीं पर कोष्ठक में देना बाधा पहुंचाता है। पाठक संदर्भ के साथ उनके अर्थ खोज लेते हैं। बेहद ठेट शब्दों की सूची नीचे या अंत के एक दो पेजों पर दी जा सकती थी। वहीं के वहीं देने पर कहीं-कहीं पठन के आनंद को कम महसूस किए जाने का अंदेशा होता है।
प्रथम संस्करण अजिल्द, 2015 है। मूल्य दो सौ रुपए है। आवरण चित्र प्रख्यात घुमंतू पत्रकार, छायाकार कमल जोशी जी का है। लेखिका चाहती तो पहाड़ और पहाड़ी जीवन से संबंधित कुछ जीवंत चित्र भी पुस्तक में शामिल कर सकती थीं। यदि कुछ चित्र शामिल होते तो वह चित्र किताब की यात्रा को ओर जीवंत कर देते। बहरहाल कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह किताब पाठकों को एक चिर-परिचित दुनिया में ले जाती है। कई अनुभूतियों का आस्वाद कराती है। ***
पुस्तक : मल्यो की डार
लेखिका : गीता गैरोला
सम्पर्क : 9412051745
मेल : gairolageeta11@gmail.com
मूल्य: 200 रुपए
पेज: 160
प्रकाशक : समय साक्ष्य, 15 फालतू लाइन, देहरादून 248001
दूरभाष : 0135-2658894
॰॰॰

-मनोहर चमोली ‘मनु’भितांई,पोस्ट बाॅक्स-23पौड़ी 246001मेल - chamoli123456789@gmail.com