12/04/2016

नन्हे सम्राट, मई 2016. वृक्ष कथा: कौन बढ़ेगा आगे कौन रहेगा पीछे?

नन्हे सम्राट, मई 2016.


वृक्ष कथा: कौन बढ़ेगा आगे कौन रहेगा पीछे?


-मनोहर चमोली ‘मनु’


हमेशा की तरह शहजादा सलीम किसी की मदद कर वापिस तिलस्मी नदी के किनारे आ पहुंचा। रात भर घोड़ पर सवार शहजादा सलीम थक चुका था। वह चाहता था कि भोर होने से पहले वह कुछ पल आराम कर ले। उसने अपने घोड़े को एक पेड़ के तने से बांधा और नदी किनारे आरामदायक घास पर आराम की मुद्रा में लेट गया। कुछ ही क्षणों में उसे नींद आ गई। वहीं अपने नियत समय पर पौ फटते ही समूचा वन क्षेत्र पक्षियों के कलरव से गूंजने लगा। पूरब की ओर क्षितिज लालिमा लिए हुई सुबह होने का संकेत दे चुका था। अचानक शहजादा सलीम का घोड़ा हिनहिनाने लगा। किसी खतरे की आशंका के चलते शहजादा उठ खड़ा हुआ। उसने झट से अपनी तलवार खींच ली। शहजादे ने यहां-वहां देखा लेकिन उसे कोई नहीं दिखाई दिया। वह उनींदी में उठा और नदी की ओर चल पड़ा। वह भूल गया था कि तिलस्मी नदी का जल पीना खतरे से खाली नहीं। वह पानी की छपकी अपने चेहरे पर डालकर तरोताज़ा होना चाहता था। वह जैसे ही नदी के तट पर पहुंचा और जल की ओर झुका ही था कि एक पुरुष स्वर ने उसे रोक दिया। स्वर था-‘‘हे युवक। यह तिलस्मी नदी है। जल को छूना खतरे से खाली नहीं है। मुझे देखो, मैं यहां वृक्ष बना खड़ा हूं। क्या तुम भी वृक्ष बनना चाहोगे।’’

शहजादा ठिठका और दूसरे ही क्षण उसने अपने कदम पीछे खींच लिए। वह बोला-‘‘ओह! थकान ने मेरे सोचने-समझने की ताकत भी छीन ली। मैं तो इस तिलस्मी नदी के स्वभाव को जानता हूं।’’ शहजादा वृक्षों की ओर देखकर बोला-‘‘हे वृक्ष बन चुके पुरुष अपना परिचय दो। यह भी बताओ कि तुम वृक्ष कैसे बन गए? मैं शहजादा सलीम हूं।’’

स्वर ने कहा-‘‘शहजादा सलीम मेरा अभिवादन स्वीकार करें। मैं चतुरसेन हूं। काशीपुर के राजा केशवराज का सलाहकार। मैं किसी बुद्धिमान की तलाश में यहां से गुजरा और प्यास के चलते इस तिलस्मी नदी का जल पीने से बरगद का वृक्ष बन बैठा। मैं जिस समस्या के चलते यहां तक पहुंचा, उसी समस्या के निराकरण के पश्चात ही मुझे वृक्ष रूप से मुक्ति मिल सकेगी।’’

शहजादा सलीम बोला-‘‘आप तो सलाहकार हैं। फिर किसी बुद्धिमान की तलाश क्यो?’’

बरगद के वृक्ष से आवाज आई-‘‘शहजादे। काशीपुर के राजा केशवराज के दो राजकुमार हैं। एक का नाम है उदयराज है। दूसरे का नाम कंवलराज है। काशीपुर के राजा केशवराज किसी एक को राजगद्दी सौंपना चाहते हैं। पिछले एक बरस से उदयराज और कंवलराज काशीपुर के भ्रमण पर थे। जव वे लौटे तो राजमहल के मुख्य मार्ग में आने से पूर्व दोनों के रथ आमने सामने आ गए। दोनों के सारथी एक दूसरे को रास्ता देने क अनुरोध करने लगे। रास्ते से एक को अपना रथ पीछे कर हटना होगा, तभी दूसरा रथ मार्ग पर आगे बढे़गा। दोनों राजकुमार एक दूसरे को रास्ता देने पर अड़ गए। ’’

शहजादा सलीम मुस्कराया। कहने लगा-‘‘फिर क्या हुआ?’’
बरगद के वृक्ष से आवाज आई-‘‘शहजादे। दोनों के रथ आमने-सामने आज भी खड़े हैं। उदयराज और कंवलराज रथ से उतर कर राजमहल जा पहुंचे लेकिन किसी को भी अपना रथ पीछे हटना मंजूर नहीं था। अब राजा केशवराज के समक्ष समस्या यह है कि वह यह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि मार्ग पर खड़े दोनों रथों के किस सारथी को अपना रथ पीछे करना होगा और किसे पहले आगे बढ़ने का सममान मिलेगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘ओह! तो यह वर्चस्व को लेकर प्रतिष्ठा-मान-समामान का प्रश्न बन गया है। मुझे इन दोनों राजकुमार के स्वभाव और विशेषताओं के बारे में विस्तार से बताओ।’’  

बरगद के वृक्ष के भीतर से चतुरसेन ने दोनों राजकुमारों के बारे में शहजादा सलीम को विस्तार से बताया। चतुरसेन ने कहा-‘‘शहजादे सलीम। मुझे यकीन है कि आप मुझे वृक्ष रूप से मुक्ति दिला सकोगे। इस तिलस्मी नदी ने मुझे शाप दिया है कि जब तक राजकुमारों के रथ न्यायसंगत और तर्कसंगत रूप से उन दोनों राजकुमारों के संतुष्ट होने पर आगे बढ़ेंगे तभी मैं वृक्ष काया से अपने असले रूप में आ सकूंगा। जैसे ही यह होगा, मैं चतुरसेन हो जाउंगा और आपके आने पर ही यहां से प्रस्थान करूंगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘आचार्य चतुरसेन। मैं पूरा यत्न करूंगा। आप तो मुझे शुभकामनाएं दें।’’
बरगद का वृक्ष झूम उठा। वृक्ष के भीतर से चतुरसेन बोला-‘‘मैंने जिस तरह से सारी कथा आपको सुनाई है। तत्पश्चात जिस कौतूहल और जिज्ञासा से आपने राजन और राजकुमारों के बारें में विस्तार से जानना चाहा है निश्चित रूप से आप संकरे मार्ग में रुके हुए उन दोनों राजकुमारों के रथ को उचित मान-सममान देकर आगे बढ़ने के लिए बाध्य कर देंगे। अविलंब जाओ। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। आप चतुरसेन का नाम लेंगे तो राजन आपको सीधे निजी कक्ष में बुलाएंगे। मुझे पूरा भरोसा है।’’

दूसरे ही क्षण शहजादा सलीम अपने घोड़े पर सवार था। सलीम का घोड़ा तेज गति से काशीपुर की ओर बढ़ने लगा। 
वही हुआ। शहजादा सलीम महल के द्वार पर पहुंचा ही था कि द्वारपाल ने रोकते हुए पूछा-‘‘हे। अजनबी घुड़सवार आप बिना राजा की अनुमति के राजमहल में प्रवेश नहीं कर सकते। कृपया पहले अपना परिचय दें।’’

शहजादा सलीम बोला-‘‘मुझे चतुरसेन ने भेजा है। मैं तिलस्मी नदी के तट पर बरगद का वृक्ष बन चुके चतुरसेन का मित्र सलीम हूं। समय कम है। मेरी सूचना राजन तक पहुंचा दें। यदि वे मिलना चाहेंगे तो उचित है अन्यथा मैं लौट जाउंगा।’’

द्वारपाल ने दौड़कर सूचना राजा केशवराज को दी। दूसरे ही क्षण महामंत्री दौड़ता हुआ द्वार पर आ पहुंचा। वह बोला-‘‘सलीम। अभिवादन। हमारे राज्य में आपका स्वागत है। राजन अपने शयनकक्ष में ही आपसे मिलना चाहते हैं। चलिए शयनकक्ष के द्वार तक मैं आपको छोड़ सकता हूं।’’ शहजादे का घोड़ा अस्तबल के रक्षक ने अस्तबल तक सुरक्षित पहुंचा दिया। वहीं दूसरे ही क्षण शहजादा सलीम राजा केशवराज के निजी शयनकक्ष में पहुंच गया था। राजा केशवराज ने बड़ी आत्मीयता से स्वागत किया। सारा किस्सा जानकर शहजादा सलीम ने राजन का ढाढस बंधाते हुए कहा-‘‘राजन। कल सुबह दोनों राजकुमारो सहित मुझे आपके राज्य के चारों दिशाओं के चालीस-चालीस प्रबुद्ध नागरिक भी उस संकरे मार्ग पर उपस्थित चाहिए, जो दोनों राजकुमारों के काम-काज से वाकिफ हों।’’ राजा केशवराज बोले-‘‘आप चिंता न करें शहजादे सलीम। सब कुछ आपके अनुसार ही होगा।’’

सुबह हुई तो उसी संकरे मार्ग पर राजकुमार उदयराज और कंवलराज अपने अपने रथ पर सवार हो गए। मंत्री,महामंत्री,राजपुरोहित,महारानी और स्वयं राजा केशवराज भी उस मार्गस्थल पर आ पहुंचे। दोनों सारथी पहले की तरह अपने-अपने रथों पर सवार हो गए। राज्य काशीपुर की चारों दिशाओं से आए नागरिक भी यहां-वहां खड़े हो गए। शहजादा सलीम भी अपने घोड़े पर सवार था। 
शहजादा सलीम ने सारथियों से कहा-‘‘अपने अपने रथ आगे बढ़ाइए।’’

राजकुमार उदयराज का सारथी बोला-‘‘रास्ता संकरा है। एक रथ को पीछे हटकर रास्ता छोड़ना होगा। तभी दूसरा रथ आगे बढ़ सकेगा।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘तो फिर एक रथ पीछे हटे और दूसरे को रास्ता दे दे।’’
अब कंवलराज का सारथी बोला-‘‘यही तो समस्या है। यही तो तय होना है कि किस राजकंुवर का रथ आगे बढ़े और किस राजकुंवर को अपना रथ पीछे करना होगा। समस्या तो जस की तस बनी है।’’
शहजादा सलीम बोला-‘‘जिस रथ की नक्काशी बेहतरीन है। बहुमूल्य है। उसे आगे बढ़ने दो।’’
स्वर्णकार बुलाए गए। आंकलन किया गया। यह क्या! दोनों ही रथ एक समान मूल्यवान निकले।
शहजादा सलीम बोला-‘‘जो राजकुमार सदाचारी है,उसका रथ आगे बढ़ेगा।’’

राजपुरोहित बुलाया गया। आचार्य बुलाए गए। उनके मूल्यांकन के आधार पर दोनों राजकुमार एक समान सदाचारी पाए गए। 
शहजादा सलीम बोला-‘‘जो आयु में छोटा है, वह बड़े को रास्ता दे। बड़े के रथ को रास्ता दिया जाएगा।’’
महारानी आगे आईं। कहने लगी-‘‘उदयराज और कंवलराज जुड़वा है। वह ठीक एक ही घड़ी में पैदा हुए हैं। रूप, भार और सौंदर्य में भी वे एक समान हैं।’’
शहजादा सलीम ने कहा-‘‘तो ठीक है। अब निर्णय रथ के सारथी करेंगे। पिछले एक मास से दोनों राजकुमार राज्य का भ्रमण कर रहे थे। सारथी पल-पल अपने-अपने राजकुमार के साथ थे। वे ही बताएं कि उनके राजकुमार की क्या खास विशेषता एक राजा के तौर पर वे देखते हैं।’’

राजकुमार उदयराज का सारथी कहने लगा-‘‘मेरे राजकुमार महान हैं। वे शठे शाठ्यं समाचरेत् की नीति का पालन करते हैं। दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करते हैं। भले के साथ भला और बुरे के साथ बुरा करते हैं।’’ उपस्थित जन समुदाय में कुछ ने करतल ध्वनि से राजकुमार उदयराज का पक्ष लिया। 
अब कंवलराज के सारथी ने कहा-‘‘मेरे राजकुमार अच्छे का साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और बुरे के साथ भी अच्छा व्यवहार करते हैं। यह बुरों को भी अच्छा बनाने का सफल प्रयास करते हैं। इन्होंने कई अपराधियों के साथ अच्छा व्यवहार कर उनका मन जीता है।’’ यह क्या! इतना सुनते ही चारो दिशाओं से आई प्रजा कंवलराज के पक्ष में जयकरे लगाने लगी। वहीं दूसरी विचित्र बात यह हुई कि उदयराज ने अपने सारथी को आज्ञा देते हुए कहा-‘‘सारथी। हमारा रथ पीछे करो। आगे बढ़ने का पहला हक भ्राता कंवलराज का है।’’
दूसरे ही पल उदयराज के सारथी ने रथ पीछे हटाया। संकरे रास्ते के एक किनारे पर रथ को खड़ा किया, वहीं राजकुमार कंवलराज के रथ को मार्ग खुला मिला और वह आगे बढ़ता चला गया। 

पूरे प्रकरण की साक्षी जनता शहजादे सलीम को आदर भाव से निहार रही थी। इससे पहले कि राजा केशवराज शहजादे सलीम को धन्यवाद कहते, वह तेज गति से अपने घोड़े पर सवार होकर तिलस्मी नदी की ओर बढ़ चुका था। शहजादा सलीम जानता था कि राजा केशवराज का सलाहकार चतुरसेन बरगद के वृक्ष का रूप त्यागकर अपने मनुष्य रूप में आ चुका होगा। इससे पहले कि तिलस्मी नदी के आस-पास चतुरसेन के साथ कोई और अप्रिय घटना घटे, वह उसे सुरक्षित उस तिलस्मी क्षेत्र से बाहर जो निकालना चाहता था।  
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Manohar Chamoli 'manu'

10/04/2016

जनवरी 2016 अपूर्व उड़ान

जनवरी 2016 अपूर्व उड़ान का दूसरा अंक है। आवरण देखते ही बनता है। चित्रांकन एवं ग्राफिक्स आशुतोष के हैं। विशुद्ध रूप से यह आवरण बालमन का ही है। बच्चों की दुनिया से लिया गया है। पतंग आज भी कौतूहल का विषय है। जो उड़ाना जानते हैं और जो नहीं भी। आवरण पत्रिका के नाम से मेल भी खाता है। 60 पेज की बहुरंगीय मासिक पत्रिका में नया साल 2016 का कैलेण्डर भी है। जिसमें तारें ज़मीन पर के दर्शिल को आसानी से पहचाना जा सकता है।

इस अंक में सात कहानियां,पांच कविताएं,दो चित्रकथाएं,छह स्थाई स्तंभ,आठ बच्चों के लिए खेल-खेल में सीखने विषयक गतिविधियां हैं। एक थीम स्टोरी भी है। छह विविध रचनाएं हैं, जिनमें से अधिकतर बाल सुलभ हैं।

संपादकीय सरल है। सहज है, आम भाषा में लिखा गया है। बच्चों से बात करता हुआ नज़र आता है। ठीक भी है। अपूर्व उड़ान ने मान लिया है कि यह पत्रिका बच्चों के लिए है बच्चों के लिए लिखने वालों के लिए नहीं। संपादकीय के बहाने संपादक राजेन्द्र प्रसाद तिवारी कई सारी बातों को आसानी से कह जाते हैं। वह अपनी बात सर्दी से शुरू करते हैं। नये साल की खुशबू भी संपादकीय में है। वहीं वह बच्चों को भारत के बारे में सोचने का सादा सा नज़रिया भी प्रस्तुत करते हैं। वह बच्चों को कमतर नहीं आंकते, न ही कुछ विशेष बनने की अपील करते हैं। वह तो बस इतना ही कहते हैं कि तुम्हारे भीतर प्रतिभा की कमी नहीं है। कहना होगा कि चुलबुली दुनिया के साथ-साथ पत्रिका अपने वैज्ञानिक नज़रिए के साथ बच्चों के मन में गहरी पैठ बनाएगी।

पांच पाठकों की चिट्ठी अंक में हैं। मज़ेदार बात यह है कि पांचों चिट्ठियां बच्चों ने लिखी हैं। कक्षा नौ तक पढ़ने वाले बच्चों के मन की आवाज़ चिट्ठियों में गूंजती है। पवन शर्मा ने अपनी थीम स्टोरी में सेवा के भाव को प्रमुखता दी है। दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चों में सेवा का भाव चरम पर होता है और सबसे अधिक होता है। वह खेल-खेल में ही घर के अंदर ही कई किलोमीटर की यात्रा कर लेते हैं। बिना थके और बिना रुके। पांच युगपुरुषों के परिचय के साथ सेवा का भाव करीने से संजोया गया है। तीन समाचार जो प्रत्यक्ष तौर पर बच्चों से ही जुड़े हुए हैं,शामिल किये गए हैं। एक चित्रकथा विवेकानंद पर गतांक से आगे चल रही है। चित्रकथा के चित्र बालमन के अनुरूप बने हैं। अक्षरों का आकार भी बालमन के अनुसार रखा गया है। मुस्कुराइये के तहत चार चुटकुले हैं। विज्ञान कथा कलैण्डर पर है। इसे जाने-माने बाल साहित्यकार एवं विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने सरल एवं रोचकता के साथ लिखा है।

मंगरूराम मिश्र, शांति अग्रवाल, डाॅ॰ फहीम अहमद, पूर्णिमा वर्मन, विनोद भृंग की कविताएं गुदगुदाती हैं। कहानियों में प्रख्यात बाल साहित्यकार डाॅ॰मंजरी शुक्ला, वरिष्ठ बाल साहित्यकार प्रकाश मनु, प्रख्यात बाल साहित्यकार डाॅ॰ नागेश पांडेय संजय, प्रखर बाल साहित्यकार अरविन्द कुमार साहु, स्कूली बच्चों की दुनिया को कहानी में विषय बनाने वाली बाल साहित्यकार अनीता चमोली ‘अनु’,बढ़ते बच्चों की तेजी से बदलती दुनिया की नब्ज़ पर गहरे हाथ रखने वाले बाल साहित्यकार डाॅ॰ मोहम्मद साजिद खान की नायाब कहानियां शामिल हैं। 

बच्चों ने भी अपने चित्र भेजे हैं। बच्चों की जीवंत फोटो भी पत्रिका में शामिल की गई है। इस तरह से लगभग बीस बच्चे प्रत्यक्ष रूप से इस अंक में जुड़ गए हैं। ज्ञानवर्धक बातें, सरल शब्द पहेली, कहानी पूरी करो, चित्र बनाओं प्रतियोगिता, मुहावरे ढूंढो, जनवरी क्विज़ शामिल हैं। बच्चों को ज्ञान-विज्ञान से हलके से सरलता से परिचित कराने के लिए भी स्तंभ रखे गए हैं। कुल मिलाकर पत्रिका बहुत जल्दी ही एक सशक्त बाल पत्रिका के तौर पर स्थापित होने की सम्पूर्ण क्षमता रखती है।
एक अनाम बाल नाटक भी पत्रिका में शामिल है। 

पवन शर्मा ने जनवरी को बड़े ही रोचक ढंग से बच्चों के लिहाज़ से प्रस्तुत किया है। हुनरमंद चार बच्चों की फोटो के साथ उनका विवरण भी पत्रिका में दिया गया है।

रंग संयोजन बालमन के अनुसार रखे गए हैं। कहीं-कहीं चटकीले रंगों ने आलेखों को मंद कर दिया है। कुल मिलाकर एक-एक पेज पर ध्यान रखने की भरपूर कोशिश की गई है। पत्रिका का कागज उम्दा है। ग्लैज़्ड पेपर वह भी एक-एक पेज रंगीन हैं। आवरण पेज और मोटा है, जिससे पत्रिका लंबे समय तक सुरक्षित रह सकेगी। 

e mail-apoorvudaan@gmail.com

अपूर्व उड़ान मासिक, 384, सेक्टर 36 नोएडा, गौतमबुद्धनगर
 उत्तर प्रदेश। 201301
। संपर्क-0120 4243133
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-मनोहर चमोली ‘मनु’

मोबाइल-09412158688

09/04/2016

यादगार बन पड़ा है हिमप्रस्थ का बाल साहित्य विशेषांक child literature

यादगार बन पड़ा है हिमप्रस्थ का बाल साहित्य विशेषांक

-मनोहर चमोली ‘मनु’

साठ बरसों से मासिक पत्रिका हिमप्रस्थ संभवतः निरंतर प्रकाशित हो रही है। यह भी कि इस पत्रिका ने पहली बार वृहद बाल विशेषांक के तौर पर पाठकों के समक्ष अपनी जगह बनाई है। सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग, हिमाचल प्रदेश का यह अंक जनवरी-फरवरी 2016 के रूप में बाल साहित्य विशेषांक के लिए अविस्मरणीय बन गया है। बाल साहित्य के क्षेत्र में यह कई मायनों में मील का पत्थर साबित होगा। हिमाचल प्रदेश से संभवतः यह पहला अवसर होगा जब समग्र रूप से हिन्दी बाल साहित्य पर इतनी विपुल सामग्री एक साथ प्रकाशित हुई है। कविताओं, कहानियों के साथ-साथ यात्रा कथा, बाल नाटक,ग़ज़ल,लघु कथाएं, लोक कथाएं, नीति कथाएं, आलेख, समीक्षाएं शामिल हैं। 

हिमप्रस्थ वैसे तो साहित्यिक पत्रिका के तौर पर मशहूर है। कई अवसरों पर बालमन से जुड़ी रचनाएं भी पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं। इस अंक में बेजोड़ बाल साहित्य यहां संकलित हो गया है। इस बाल साहित्य विशेषांक में 76 से अधिक बाल साहित्यकारों की नवरंगी रचनाओं को एक मंच पर स्थान दिया है। मज़ेदार बात यह है कि 144 पेजों पर यह सामग्री एक साथ आई है और कई प्रसिद्ध बाल साहित्यकारों की उपस्थिति अपनी उत्कृष्ट रचनाओं के साथ हुई है। मोटे तौर पर 21 बाल साहित्यकारों के आलेख शामिल किये गए हैं। एक यात्रा कथा है। दो बाल नाटक हैं। 17 बालसाहित्यकारों की कहानियां हैं। 24 बाल साहित्यकारों की 46 कविताएं हैं। 10 बाल साहित्यकारों की 16 लघु कथाएं,लोक कथाएं और नीति कथाएं शामिल हैं। एक समीक्षा है। 

संपादन इतना लाजवाब हुआ है कि बड़े लेखों और रचनाओं से बचा गया है। ठीक भी है। बहुत जरूरी हुआ तो अधिक स्थान घेरने वाली रचनाएं कम या सबसे बाद में पढ़ी जाती हैं। ऐसे में यदि बाल साहित्य विशेषांक लंबी रचनाओं से अटा पड़ा हो तो उसकी पठनीयता पर सवाल उठने लगते हैं। इस बहाने हम बाल साहित्यकारों को अब यह आत्मसात् कर लेना ही होगा कि लंबी रचनाएं बहुत जरूरत पर ही लिखी जाएं, अब गद्य हो पद्य विधा। वही रचनाएं अधिक पसंद की जाती हैं जो सरल, सुबोध और सहज हों। अनावश्यक विस्तार लेती रचनाएं चाहे कितने ही बड़े या स्थापित रचनाकार की हो, पत्र-पत्रिका में स्थान तो पा लेती हैं लेकिन पढ़ी नहीं जाती। 

पौने दो पेज का संपादकीय एक साथ कई सारी बातें और विमर्श के मुद्दे उठाता है। संपादकीय जहां कल,आज और कल की बात करता है वहीं वह यह भी बताता है कि बचपन-लड़कपन -किशोरावस्था-युवावस्था का फासला कम होता जा रहा है। स्मार्टफोन और इंटरनेट के अधिकाधिक प्रयोग से बच्चों में नकारात्मकता का के आगमन से संपादकीय भी चिंतित है। संपादक वेद प्रकाश जी की संवेदनशीलता का परिचय इस बात से आसानी से लगाया जा सकता है कि वह लिखते हैं-‘आज के बच्चे बेहतर परवरिश में पल रहे हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में उनमें जो कुछ मौलिक था,विशेष था,अनूठा था,वह गायब हो रहा है। वह जो सीख रहे हैं,पढ़ रहे हैं,वह उन्हें मशीनी बना रहा है। बेशक यह उनके जीवन स्तर को सुख-सुविधाओं से सम्पन्न करेगा,लेकिन बहुत कुछ ‘अपना’ छीन भी रहा है।’
बहरहाल सादगी से यह अंक निकला है। कागज की गुणवत्ता संग्रहणीय योग्य है। कवर पेज भी मोटा है। हर रचना के साथ हरसंभव कोशिश की गई है कि एक तो रेखांकन हो। यह और रोचक बन पड़ा है। कवर पेज भी बालमन के अनुरूप है। चूंकि इसमें बालसाहित्य भी है और बाल साहित्यकारों का हिस्सा भी है। विशेषांक है तो आवरण पर और अधिक परिश्रम की अपेक्षा थी। आकार भी बेहतरीन है। फोंट भी आंखों को थकाता नहीं है। सामग्री को पठनीय बनाने के लिए स्थान को बेहद संकुचित नहीं किया गया है। कहीं भी सामग्री ठंूस कर नहीं भरी गई है। 

बाल साहित्यकारों में देवेन्द्र मेवाड़ी, गोविंद शर्मा, अशोक अंजुम, द्विजेंद्र द्विज, रजनीकांत शुक्ल, डाॅ॰ सुशीलकुमार फुल्ल, सुमन शर्मा, डाॅ॰ सुनीता, डाॅ॰ फकीरचंद शुक्ला,मृदुला श्रीवास्तव, अरविंद कुमार साहू, रत्न चंद ‘रत्नेश’, डाॅ॰मंजरी शुक्ला,सुशांत सुप्रिय,प्रकाश मनु, कृष्ण चन्द्र महादेविया, अनंत आलोक, शैलेन्द्र सरस्वती,अंकुश्री, रितेंन्द्र अग्रवाल, नरेन्द्र देवांगन, सुनीता तिवारी, गंगाराम राजी, विनोद ध्रब्याल राही, सुदर्शन वशिष्ठ, उषा छाबड़ा, डाॅ॰दिनेश चमोला ‘शैलेश’,शशिभूषण बडोनी,मंजू महिमा, हेमंत भार्गव, संजय वर्मा,सुमन शर्मा, शादाब आलम, प्रतिभा शर्मा, दिविक रमेश, डाॅ॰ छवि निगम, अभिनव अरुण, डाॅ॰ देशबंधु शाहजहांपुरी,रोचिका शर्मा,कृष्णा ठाकुर ,गोपाल शर्मा,कृतिका ठाकुर,विजयपुरी, कुमार भमौता की रचनाएं शामिल हैं। 

हिमप्रस्थ के इस अंक में सैनी अशेष की पांच लघुकथाएं भी हैं। बाल कविताओं के बहुरंग हिमप्रस्थ में चार चांद लगाते हैं। समकालीन बाल समाज पर पैनी नज़र रखने वाले बाल साहित्यकार जितेश कुमार की दो कविताएं यहां हैं। नवीन हलदूणवी की बहुरंगी दो कविताएं भी शामिल की गई हैं। वरिष्ठ बाल साहित्यकार जयप्रकाश मानस की तीन कविताएं, मनीषा जैन की चार कविताएं, नए तेवर की कविताओं के विशेषज्ञ डाॅ॰ फहीम अहमद के चार खास बालगीत इस अंक को विशिष्ट बनाते हैं। चर्चित बाल साहित्यकार परशुराम शुक्ल की दो कविताएं अपनी विशिष्टता के साथ शामिल हैं। वरिष्ठ बाल साहित्यकार डाॅ॰ प्रत्यूष गुलेरी की पांच खास कविताएं अपनी उपस्थिति और लंबे अनुभव की याद दिलाती हैं। राजीव कुमार ‘त्रिगर्ती’ की तीन कविताएं विविधता लिए हुए है। मशहूर बाल साहित्यकार प्रभुदयाल श्रीवास्तव की दो कविताएं अपने रंग में रंगी हैं। बाल साहित्यकार के चिंतक,आलोचक,समीक्षक और अपनी विशिष्ट रचनाओं के लिए मशहूर डाॅ॰ नागेश पांडेय ‘संजय’ की दो कविताएं अपनी नायाब धमक के साथ अपनी ओर ध्यान खींचती हैं। संजीव कुमार की तीन कविताएं अच्छी बन पड़ी हैं। इसके अलावा तेरह जाने-माने बाल कवियों की कविताएं भले ही एक-एक हैं, लेकिन वह भी अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुए है। कविता,ग़ज़ल और हाइकू को भव्यता के साथ स्थान मिला है।

पुष्पा भारती का लेख ‘बाल साहित्य में रचना होगा नया संसार‘, डाॅ॰ संगीताश्री का लेख ‘चरित्र निर्माण में बालपन के संस्कार, उमा ठाकुर का लेख युवाओ में नैतिक शिक्षा, राजेन्द्र पालमपुरी का लेख बालपन को संवारता साहित्य, भगवती प्रसाद गौतम का लेख कहां खो गया चहकता बचपन, मंजू गुप्ता का लेख आओ! लौटा दें मुस्कराता बचपन, कंचन शर्मा का लेख बच्चों का बदलता स्वभाव व व्यवहार,मनोज चैहान का लेख बालमन को समझना होगा, डाॅ॰रजनीकांत का लेख वर्तमान पीढ़ी की बदलती मानसिकता, वंदना राणा का लेख युवाओं को अनुशासन का पाठ, रमेशचन्द्र मस्ताना का लेख आज का युवा कल का भविष्य, विनोद भारद्वाज का लेख लोक संस्कृति में बालोपयोगी साहित्य, मनोहर चमोली ‘मनु’ का लेख बाल साहित्य में कल्पना और यथार्थ, डाॅ॰ राकेश चक्र का लेख किसी को तो बनना होगा मार्गदर्शक, आशा शैली का लेख रोचक एवं प्रेरणाप्रद हो बाल साहित्य, उमेशचंद्र सिरसवारी का लेख हिंदी बाल कविताओं में राष्ट्रीय चेतना,प्रकाशचंद्र का लेख बाल कविता और भवानी प्रसाद मिश्र, पवन चैहान का लेख वर्तमान समय में बाल पत्रिकाएं एवं साहित्य, प्रो॰योगेशचंद्र शर्मा का लेख विद्या की देवी मां सरस्वती, योगराज शर्मा का लेख स्वस्थ व शिक्षित बचपन पठनीय बन पड़े हैं। 

पुष्पा भारती अपने लेख में लिखती हैं-‘हमें ऐसे बाल साहित्य का निर्माण करना है, जो आज के वर्तमान समाज से बच्चों को जोड़े,पर साथ ही साथ उनमें वह दृष्टि भी पैदा करे जो बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाए। पर यह सब हम अपनी भाषा में उपदेश की शैली में नहीं कर सकते।’
डाॅ॰ संगीताश्री अपने आलेख में एक जगह लिखती हैं-‘हिंदी में, बाल साहित्य को अभी समय की चाल, बच्चों/बालकों की बढ़ती बौद्धिक मांग के अनुसार अपना स्वरूप् निर्मित करना होगा।’ राजेन्द्र ‘पालमपुरी’ का आशावादी लेख पठनीय है। वह लिखते हैं-‘किंतु बच्चों से दूर होते बाल साहित्य के बावजूद आज भी अच्छा साहित्य लिखा जा रहा है। और यह उम्मीद की जा रही है कि देर-सवेर तकनीक की उस चमकीली दुनिया से बच्चों का मोहभंग होगा और किताबें फिर से उनकी संगी-साथी बनकर और उनके नए नायकों की उंगली पकड़कर बचपन की दहलीज से पार उतारने में अपनी विशेष भूमिका अदा करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगी।’

मंजू गुप्ता अपने आलेख में लिखती हैं-‘आज के बच्चों के बचपन में पचपन नज़र आ रहा है। उनमें मस्ती,शरारत,रूठना-मनाना,नादानियां,भोलापन आदि नहीं रहा। उनका बचपन इंटरनेट के इंद्रजाल में फंस कर नेट पिटारे मंे अपनी दुनिया की अच्छाई-बुराई देख रहा है।’

डाॅ॰ राकेश चक्र लिखते हैं-‘जो भी परिवार वर्तमान परिवेश में जितना अधिक सुविधाभोगिता दिखावा और फैशन में डूबा है, वह उतना ही सत् साहित्य और बाल साहित्य से दूर होता जा रहा है।’

उमेश चंद्र सिरसवारी जी ने आजादी के बाद से अब तक बाल साहित्यकारों की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना के स्वर की पड़ताल गहनता से की है। पवन चैहान जी ने बाल पत्रिकाओं और बाल साहित्य के बहाने गहन पड़ताल की है। वह भी बाल साहित्य में वैज्ञानिक चेतना के पक्षधर हैं। योगराज शर्मा बचपन के बहाने अपने लेख में लिखते हैं-‘स्वास्थ्य के साथ शिक्षा भी सभ्य समाज के निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण अंग है।’ देवेंद्र मेवाड़ी का यात्रा कथा बड़ा ही रोचक बन पड़ा है। कहानी और कविताओं को पढ़कर टिप्पणी फिर कभी। कुल मिलाकर यह अंक ऐसा बन पड़ा है कि कोई भी बाल साहित्य प्रेमी इस अंक को अपने संग्रहणीय अंक से या अपनी निजी लाइब्रेरी से अलग नहीं कर सकता। हिमप्रस्थ से उम्मीद की जाती है कि वह इस आगाज़ को बनाये रखे। निरंतर अंकों में नियमित कुछ न कुछ बाल साहित्य सामग्री प्रकाशित करती रहे। 

पत्रिका: हिमप्रस्थ, मासिक
प्रधान सम्पादक: डाॅ॰ एम॰पी॰सूद
वरिष्ठ सम्पादक: यादविन्दर सिंह चैहान
सम्पादक: वेद प्रकाश
एक प्रति: 15 रुपए
सालाना शुल्क: 150 रुपए
पृष्ठ: 144
mail -himparasthahp@gmail.com
सम्पर्क: 0177 2633145, 2830374
मुखपृष्ठ एवं रेखांकन: सर्वजीत
प्रकाशक: निदेशक, सूचना एवंज न सम्पर्क विभाग,शिमला, हिमाचल प्रदेश।
समीक्षक: मनोहर चमोली ‘मनु’, सम्पर्कः 09412158688 
मेलः chamoli123456789@gmail.com

03/04/2016

बाल कहानी, 'नया पुराना' : जनसत्ता, 6 March 2016 child literature

'नया-पुराना'

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-मनोहर चमोली ‘मनु’

बीस रुपए का पुराना नोट बटुए के भीतर आया।

उसे किसी ने टोका-‘‘अरे, अरे! जरा हट के। कहां चढ़े जा रहे हो?’’ 

बीस रुपए का एक नया नोट बटुए में पहले से था। वह गुस्से में था। 

पुराने नोट ने पैर पसारते हुए कहा-‘‘चढ़ नहीं रहा हूं भाई। अपने लिए जगह बना रहा हूं।’’
 नया नोट चिढ़ गया। बोला-‘‘उफ ! तुम कितने गंदे हो। मुड़े-तुड़े। दाग-धब्बों से भरे हुए हो। तुम्हारे शरीर पर तो कई छेद हैं। तुमसे से बदबू भी आ रही है। मुझे देखो। एकदम नया हूं। नोट की गड्डी से सीधे यहां आया हूं।’’

पुराना नोट हंसने लगा। नया नोट चैंका। बोला-‘‘हंस क्यों रहे हो?’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘मैं भी कभी नया था। मेरे शरीर में भी तुम्हारी तरह रंगों की खुशबू आती थी। मैं भी कभी करारा था। खूब फड़फड़ाता था। लेकिन याद रखो। तुम भी मेरे जैसे हो जाओगे।’’ 
नया नोट बोला-‘‘मेरे नयेपन से तुम्हें जलन हो रही है। मुझे तुम्हारी तरह नहीं होना है। मैं कई दिनों से इस बटुए में हूं। हमेशा यहीं रहूंगा। समझे तुम।’’

पुराना नोट चुप नहीं रहने वाला था। बोला-‘‘समझ गया। लेकिन तुम्हें भी समझा रहा हूं। माना कि मैं पुराना पड़ चुका हूं, लेकिन तुम्हारी कीमत और मेरी कीमत में कोई अंतर नहीं है।’’ 

बात अभी चल ही रही थी कि बटुए के सभी नोट सहम गए। हाथ का अंगूठा, तर्जनी और मध्यमा उंगली ने बटुए के भीतर झांका। पुराना नोट खींच लिया गया। नए नोट ने राहत की सांस ली और वह आराम से सो गया।

एक दिन अचानक फिर वही बीस रुपए का पुराना नोट बटुए में आ गया। 
नए नोट ने आंखें दिखाते हुए पूछा-‘‘तुम ! फिर आ गए?’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘मैं कहां आया। मुझे तो लाया गया। वैसे भी मुझे घुटन पसंद नहीं है।’’ 
नया नोट बोला-‘‘हैरान हूं। इस आरामदायक जगह में तुम्हें घुटन हो रही है! वैसे इतने दिन थे कहां?’’ 
पुराना नोट पैर पसारते हुए बोला-‘‘सबसे पहले मेरे बदले में दो चाॅकलेट ली गईं। मैं गया गल्ले पर।’’ 
नया नोट बोला-‘‘चाॅकलेट ! गल्ले पर ! ये गल्ला क्या होता है?’’ 
पुराने नोट ने हंसते हुए बताया-‘‘अरे, दुकानों पर हम नोटों के लिए एक गल्ला रखा होता है। हम सब वहां रखे जाते हैं। खैर छोड़ो। मैं गल्ले में रखे नोटों से बात कर ही रहा था कि दुकानदार ने मुझे एक ग्राहक को पकड़ा दिया। ग्राहक ने मुझे अपने बटुए में रख लिया।’’

नया नोट फिर चैंका। बोला-‘‘दुकानदार ! ग्राहक !’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘मुझे तुम पर दया आती है। अरे, हम नोट खरीददारी में बहुत काम आते हैं। हमारे बदले दुकानदार ग्राहकों को सामान देते हैं। जो हम नोटों से सामान खरीदता है, उसे ग्राहक कहते हैं। हद है। तुम्हारा जीना ही बेकार है। इस बटुए में पड़े रहोगे तो दुनिया कैसे देखोगे। अब यह मत पूछना कि दुनिया किसे कहते हैं।’’ 
नया नोट झेंपते हुए बोला-‘‘हां, मैं तो यही पूछने वाला था।’’ 

पुराना नोट बोला-‘‘हम नोट बनें ही इसलिए हैं कि हम चलें। चलना ही जिंदगी है। मैं हजारों किलोमीटर की यात्रा कर चुका हूं। सैकड़ों शहर घूम आया हूं। अनगिनत बार गिना जा चुका हूं। लेकिन तुम क्या जानों की चलना-ठहरना क्या होता है। सैकड़ा-हजार क्या होता है। यात्रा किसे कहते हैं।’’

नया नोट उदास हो गया। मायूस होकर धीरे से बोला-‘‘बड़े भाई। माफ करना। मैं तो मशीन में छपकर सीधे यहां लाया गया हूं। इस बटुए के अलावा मैंने कुछ देखा ही नहीं। तुम्हारी बातों से तो लगता है कि दुनिया बहुत बड़ी है। अब तुम ही कुछ करो। मुझे भी दुनिया दिखाओ।’’

पुराना नोट बोला-‘‘चिंता मत करो। इस बार मुझे जैसे ही इस बटुए से बाहर खींचा जाएगा। तुम मुझसे चिपके रहना। मैं बहुत चल गया हूं। कमजोर हो गया हूं। एक झटके से मेरे दो हिस्से हो जाएंगे। बस फिर मेरे बदले तुम्हें ही बाहर जाना होगा।’’ 

नया नोट चैंका। बोला-‘‘मैं समझा नहीं।’’ पुराना नोट हंसते हुए बोला-‘‘छोटे भाई। हमारा भी जीवन होता है। मेरे दो हिस्से हो जाने पर मुझे कोई नहीं लेगा। बस फिर बीस रुपए के लिए बटुए से दूसरा नोट निकाला जाएगा। फिलहाल तुम्हारे अलावा इस बटुए में दूसरा बीस का नोट है ही नहीं।’’ नया नोट बोला-‘‘नहीं-नहीं। मेरे लिए तुम भला अपनी जान क्यों दोगे।’’

तभी अंगूठा, तर्जनी और मध्यमा उंगली ने बटुए में झांका।

 यह क्या !  बटुए के सभी नोट बाहर निकाल लिए गए। सभी नोट एक मिठाई की दुकान के गल्ले में जा पहुंचे। बटुए के नोट गल्ले में रखे नोटों के साथ जा मिले। अच्छा हुआ कि पुराने नोट के दो हिस्से नहीं हुए। मैं भी बटुए से बाहर आ गया। बीस रुपए का नया नोट गल्ले में आकर यही सोच रहा था।


॰॰॰ -मनोहर चमोली ‘मनु’

02/04/2016

'बंद हुआ हंसना',-मनोहर चमोली ‘मनु’,बाल कहानी,जनसत्ता child literature

बंद हुआ हंसना 

-मनोहर चमोली ‘मनु’

जूते हंसने लगे तो जुराब ने पूछ लिया-‘‘हंस क्यों रहे हो?’’

 बांया जूता बोला-‘‘अपनी हालत तो देखो।’’

 दांये जूते ने इशारा किया-‘‘तुम्हारे भीतर से अंगूठा बाहर झांकने लगेगा। अब तुम पहनने लायक नहीं रहे।’’ जुराब ने खुद को देखा तो परेशान हो गया। जुराब बोला-‘‘दूसरों पर हंसना अच्छी बात नहीं।’’ 
तभी आशमां आई और जुराब पहनने लगी। जुराब के भीतर से अंगूठा झांक रहा था। आशमां ने जुराब उतारा और सुई-धागे से फटी जगह को सिल लिया। जुराब पहनकर उसने जूते पहन लिए।
 जुराब ने जूते से कहा-‘‘देख लो। आशमां ने हमें पहन लिया है।’’ जूते झेंप गए।
एक दिन जूते फिर हंसने लगे। जुराब ने पूछा-‘‘क्या हुआ?’’
 बांया जूता बोला-‘‘अपनी हालत देखो। ढीले हो गए हो। आशमां पहनेगी तो तुम लटककर एड़ी पर झूलने लगोगे।’’ 

जुराब खुद को देखने लगे और उदास हो गए। आशमां आई और जुराब पहनने लगी। दोनों जुराब वाकई पैरों की पिंडलियों से एड़ी पर आ गए। इस बार आशमां ने जुराब नहीं उतारे। वह रबड़बैंड ले आई। उसने जुराब के ऊपरी सिरों पर रबड़बैंड चढ़ा लिए। अब जुराब खिसक नहीं रहे थे। आशमां ने जूते पहने और घूमने चली गई। एक जुराब जूतों से बोला-‘‘देखा लिया ! आशमां ने हमें उतारा नहीं। हमारे ढीलेपन का उपाय खोज लिया गया।’’ जूते बगले झांकने लगे।

एक दिन फिर जूते हंसने लगे। जुराब ने पूछा-‘‘अब क्या हुआ?’’ 
दांया जूता बोला-‘‘खुद को देखो। तुम दोनों एड़ियों से फट चुके हो।’’ 
बांया जूता चिढ़ाते हुए बोला-‘‘अब तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता। आशमां तुम्हें नहीं पहनेगी। देख लेना।’’ 

आशमां आई और जुराब पहनने लगी। एड़ियों से जुराब वाकई फट चुके थे। आशमां ने जुराबों को उलटा। पलटा। कुछ देर सोचा। आशमां ने जुराबों को अच्छी तरह से धोया। सुखाया। रंग-बिरंगे-सुनहरे धागों से जुराबों मंे कड़ाई की। जुराबों में रुई भरी। अब जुराब आशमां के कमरे में सज-धज कर मुस्करा रहे थे। वहीं जूते दरवाजों के पीछे अंधेरे कोने में चुपचाप पड़े थे। अब जूतों ने जुराबों पर हंसना बंद कर दिया। ॰॰॰
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