10 जुल॰ 2013

बात खास भी नहीं तो आम भी नहीं है


बात कोई खास नहीं है तो मेरी नज़र में आम भी नहीं है। मेरे शहर का व्यस्तम बाजार और उसका एक तिराहा है। इस तिराहे पर समाचार पत्र-पत्रिकाओं और स्टेशनरी की एक दुकान है। अक्सर मैं इस दुकान पर कुछ देर ठहरता हूं। 

आज शाम हुआ यूं कि दुकान के बाहर से एक मां अपने बच्चे के साथ गुजरती है। अचानक मां की नज़र दुकान पर खड़े किसी सज्जन पर पड़ती है। वह उन्हें प्रणाम करती है और फिर पैर छूती है। फिर अपने नौ या दस साल के बच्चे से कहती है कि ये सज्जन वो हैं। प्रणाम करो। बच्चे के हाव-भाव बताते हैं कि वह असहज महसूस कर रहा है। मां अपने दांये हाथ से बच्चे के बांये कांधे के पीछे से जोर देकर झुकाते हुए कहती है कि प्रणाम करो। लेकिन बच्चा और तन कर खड़ा रहता है। मां झेप जाती है। वह सज्जन भी बुरी तरह झेंप जाते हैं, जिन्हंे वह अपने बच्चे से प्रणाम करने की आशा कर रही है। थोड़ी देर संवादहीनता बनी रहती है। फिर वो मां सिर झुकाकर अपने बच्चे के पीछे-पीछे आगे बढ़ जाती है। 
कल शाम का एक दूसरा वाकया भी सुनाता चलंू। इसी जगह पर पैंतीलीस-छियालीस वर्षीया मेरी परिचित एक महिला मिली। सड़क के दांयी ओर किनारें पर खड़े होकर हम बात करने लगे। दो हमउम्र बच्चे जिनकी उम्र बारह-तेरह साल के आस पास रही होगी। दोनों अलग-अलग साईकिल लेकर हमारे आगे खड़े हुए। दोनों ने साईकिल हमारे ठीक आगे झुके हुए स्टेण्ड पर खड़ी कर दी। 
एक बालक तो वहीं खड़ा रहा और दूसरा सामान खरीदने बगल की दुकान पर चला गया। हवा चल रही थी। मैं सोच ही रहा था कि हवा के झोंके से कहीं साईकिल गिर न जाए क्योंकि वह हिलने लगी थी और बच्चों ने उसे तिरछे तरीके से खड़े होने वाले स्टैण्ड पर ही खड़ी की थी। साईकिल गिर ही गई। जो साईकिल गिरी,वह ठीक उस महिला के आगे खड़ी थी, जिससे मैं बात कर रहा हूं। दूसरा बच्चा गिरी हुई साईकिल को उठाने के लिए झुकते हुए महिला से कहता है-‘‘क्या आंटी यार। आप भी न। साईकिल गिरा दी यार।’’
मैं भी और वह महिला भी हैरान। वो तो कुछ कह नहीं पाई लेकिन मैं चुप नहीं रह पाया। मैंने कहा-‘‘एक तो बीचों-बीच साईकिल खड़ी कर रहे हो। फिर साईकिल कैसे गिरी, यह देखा भी या यूं ही हवा में कह रहे हो। फिर ये आंटी तुम्हारी यार है।’’
बच्चा कहने लगा-‘‘अंकल यार मतलब सिम्पल बोला जाता है।’’
मैंने फिर कहा-‘‘तो तुम घर पर भी अपनी मम्मी को-दादी को यार कहोगे। स्कूल में मैडम को भी?’’ यह सुनकर वह चुप हो गया।

अब आप कह सकते हैं कि यह तो कोई बात नहीं। आजकल के बच्चे ऐसे ही हैं। लेकिन आजकल के बच्चे ऐसे क्यों हैं? ये तो एक बानगी भर है। बच्चों को गौर से देखें। उनकी बातें सुनें। उनकी गतिविधियों को गहरे से अवलोकन करें तो बहुत कुछ अच्छा नज़र नहीं आएगा। आप कह सकते हैं कि पहले वाले किस्से में जरूरी नहीं कि बच्चा अपरिचित को प्रणाम करे। पैर छुए। लेकिन जब मां भी अदब से पैर छू रही है, तब? मां कह भी रही है कि बेटा प्रणाम करो। तब भी? क्या माता-पिता बच्चों में रिश्ते-नातों-परिचितों से कैसे पेश आना है,इसकी नसीहत भी न दें? आखिर बच्चा असहज क्यों हो रहा था? बच्चे का इतना अंतर्मुखी हो जाना ठीक है? आप कह सकते हैं कि यह जरूरी नहीं कि माता-पिता जिस परिवेश में रहते आए हैं, बच्चों को भी जबरन उसी में ढाला जाए। क्या जीव-जंतुओं में बच्चों को स्वछंद और उन्मुक्त छोड़ दिया जाता है, आज की नई पौध भी ऐसा चाहती है?
दूसरे वाकये में बीचों-बीच सड़क पर वह भी दांयी ओर साईकिल खड़ी करना ठीक था? आप कह सकते हैं कि आप भी तो दांयी ओर ही खड़े थे। दुकान बांयी ओर थी और महिला दांयी ओर खड़ी थी, मैंने ठीक समझा कि मैं ही उन महिला के पास जाकर बात कर लूं बजाए कि वह सड़क के बाई ओर आए। फिर उस छोटे से बच्चे का बिना जाने उसकी अपनी मां की उम्र से ज्यादा उम्र की महिला से ऐसे लहजे में बात करना ठीक था?
आप कह सकते हैं कि बच्चे हैं? बच्चे धीरे-धीरे ही समझते हैं। मानता हूं लेकिन जिस तरह वह गरदन झटक कर चेहरे पर भाव लाकर कह चुका था, वह मुझे नागवार गुजरा। मैंने फिर भी बातचीत को हल्का-फुल्का माहौल देने की कोशिश की। ताकि वह महसूस करे कि कुछ ऐसा घटा है जो ठीक न था। आप क्या कहते हैं। कुछ कहेंगे?

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सार्थक व ज्वलन्त प्रश्न उठाया है आपने । वास्तव में अब बच्चों और अभिभावकों तथा शिक्षकों के बीच और भी बहुत कुछ ऐसा आगया है जो बच्चों को ज्यादा रोचक और आसान लगता है । लेकिन बच्चों को यह जताना बहुत ही जरूरी है कि जो है वह गलत है या बहुत अच्छा है ।
    हाँ जताने का तरीका क्या हो यह अवश्य ही बहुत महत्त्वपूर्ण है लेकिन जताना अत्यावश्यक है ।

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जनसंख्या विस्फोट से लड़ता विश्व जनसंख्या दिवस - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. बहुत सही कहा आप ने बच्चों को अभी से तहजी़ब तो सिखानी ही होगी आखिर ये कल के भारत हैं..

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  4. आजकल के बच्चों में संवाद हीनता तो निश्चित ही पनप गई है. अपरिचित से मां के कहने के बावजूद भी ऐसा व्यवहार अंतर्मुखता को ही दर्शाता है.

    यार शब्द आजकल के बच्चे भगवान के नाम की तरह प्रयोग में ला रहे हैं. पिता, मां, दादी, भुवा, बहन सभी को "अरे यार" के संबोधन से नवाजते हैं. स्कूल में शायद टीचर जी तो अभी तक बची होंगी इस संबोधन से.

    सुंदर आलेख.

    रामराम.
    ताऊ डाट इन

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यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।