08/11/2014

'हवाई सैर' * *-मनोहर चमोली ‘मनु’ .साहित्य अमृत नवंबर 2014

हवाई सैर
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-मनोहर चमोली ‘मनु’

रगद का एक पेड़ था। वह बूढ़ा हो चला था। एक दिन बरगद सोचने लगा-‘‘सालों से एक जगह पर खड़ा हूँ। जिसे देखो। वह मेरी काया पर शरण लिए हुए है। मेरी किसी को चिन्ता नहीं है।’’ तभी उसे किसी के रोने की आवाज आई। एक तितली रो रही थी। 


एक गिद्ध का बसेरा भी इसी बरगद पर था। गिद्ध ने तितली से पूछा-‘‘नन्ही रानी। क्या हुआ?’’ यह सुनकर तितली दहाड़े मारकर रोने लगी। बरगद के पेड़ पर बया का घोंसला भी था। बया ने अपने घोंसले से झांका। 

गिद्ध ने फिर पूछा-‘‘अब रोती ही रहोगी या बताओगी भी कि हुआ क्या है?’’ तितली ने अपने आँसू पोंछे। फिर सुबकते हुए बोली-‘‘काश! मेरे पंख भी तुम्हारी तरह होते। मैं भी हवाई सैर करती।’’ गिद्ध को हंसी आ गई। वह बोला-‘‘ओह! तो यह बात है। लेकिन तुम्हारे भी तो पँख हैं। तुम्हें आसमान में उड़ने से भला किसी ने रोका है। उड़ो। खूब उड़ो।’’

तितली ने मुंह बिचकाया। कहा-‘‘मेरा उड़ना भी कोई उड़ना है। थोड़ा सा उड़ती हूँ। फिर थक जाती हूँ। उड़ान हो तो तुम्हारे जैसी। वाह! ऊपर, ऊपर और ऊपर।’’

गिद्ध ने कहा-‘‘ अच्छा। अब समझा। तो तुम आसमान की ऊँचाई देखना चाहती हो?’’

तितली ने कहा-‘‘हाँ। नहीं। हाँ। मैं आसमान से धरती को भी देखना चाहती हूँ। क्या धरती वाकई गोल है? समुद्र कैसा दिखता है? नदी, पहाड, पेड़ कैसे लगते होंगे? बड़ा मजा आता होगा न?’’ गिद्ध ने कहा-‘‘तो चलो। आओ। मेरे किसी एक पैर पर आराम से बैठ जाओ।’’ तितली ने डरते हुए कहा-‘‘न बाबा न। तुम जैसे ही अपने पंख फड़फड़ाओगे, वैसे ही मैं तिनके की तरह उड़ जाऊँगी।’’ 

बया सारा माजरा समझ चुकी थी। वह हंसते हुए तितली से बोली-‘‘तुम मेरा घोंसला ले लो। गिद्ध भाई उसे मजबूती से अपने पंजों में पकड़ लेगा। तुम मेरे घर की खिड़की से इस दुनिया को आराम से देखना।’’ तितली खुश हो गई। कहने लगी-‘‘यह ठीक रहेगा। लेकिन.......।’’ 
‘‘लेकिन क्या?’’ गिद्ध ने पूछा। तितली ने सोचते हुए कहा-‘‘अगर बारिश हो गई तो? मैं भीग गई तो? मुझे भीगने से जुकाम हो जाता है।’’ गिद्ध ने जवाब दिया-‘‘मेरे पंख किसी छतरी से कम नहीं। डरो मत। तुम पर बारिश की एक बूंद भी नहीं गिरने दूंगा। अब चलो।’’ तितली ने हंसते हुए कहा-‘‘अरे हाँ। यह तो मैंने सोचा ही नहीं। लेकिन........।’’

अब बया ने चैंकते हुए पूछा-‘‘लेकिन क्या?’’ तितली ने आँखंे मटकाते हुए कहा-‘‘घूमते-घूमते अगर मुझे भूख लग गई तो?’’ सब सोच में पड़ गए। बया ने सुझाव दिया-‘‘तो तुम फूलों का रस जमा कर लो।’’ 

‘‘हाँ। ये ठीक रहेगा। लेकिन.........।’’ तितली फिर सोच में पड़ गई। ‘‘अब क्या हुआ।’’ बया ने पूछा। तितली उदास हो गई। कहने लगी-‘‘मैं फूलों का रस कब जमा करूंगी? रस जमा करने में तो समय लगेगा न।’’

मधुमक्खियों का विशालकाय छत्ता भी बरगद की दूसरी शाख पर था। अब तलक रानी मधुमक्खी चुप थी। वह सब सुन रही थी। रानी मधुमक्खी भी तितली के पास मँडराने लगी। कहने लगी-‘‘ मैं बताती हूं। तुम मेरा छत्ता ले जाओ। इसमें खूब सारा शहद है।’’

तितली खुश हो गई। तालियां बजाते हुए कहने लगी-‘‘अब आएगा मजा! आप सब कितने अच्छे हो। ये बरगद का पेड़ ही तो है, जिसमें हम सभी मेल-जोल से रहते हैं।’’ 

सबने तितली की हवाई सैर का इंतजाम कर दिया। गिद्ध ने उड़ान भरी। तितली मुस्करा रही थी। बया के साथ-साथ रानी मधुमक्खी भी नाच रही थी।
 बरगद भी खुशी से झूमने लगा। 

1 टिप्पणी:

  1. साहित्य और संस्कृति का संवाहक साहित्य अमृत मासिक पिछले कई बरसों से नवंबर का अंक बालसाहित्य को समर्पित करता आ रहा है। बीस वर्षाें से प्रकाशित यह पत्रिका साहित्य जगत में अपनी कई विशेषताओं के चलते रेखांकित होती रही है। अब जबसे यह बालसाहित्य विशेषांक निकालने लगी है,तब से बालसाहित्य से जुड़े रचनाकारों की मंडली में यह बेहद चर्चित है। यह भी कि अब हर माह एक-दो रचनाएं इस पत्रिका में बालकेंद्रित भी रहती ही हैं।
    बहरहाल इस वर्ष मात्र यह विशेषांक चैरासी पेज का ही है। मूल्य भी मात्र 30 रुपए ही है। आवरण हमेशा की तरह इस बार भी लुभाने वाला है। जेण्डर से इतर यह समाज के बच्चों का प्रतिनिधित्व करता है। सुप्रसिद्ध चित्रकार रामेश्वर वर्मा ने आवरण सहित कई चित्रांकन भीतर भी उकेरे हैं।
    इस अंक में 9 कहानियांे को शामिल किया गया है। कहानीकारों में राजेंद्र मोहन भटनागर,परदेशीराम वर्मा,श्रीप्रसाद, विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी,रश्मि गौड़,मदनमोहन सिंहल,क्षमा चतुर्वेदी,मंजरी शुक्ला जैसे सप्रसिद्ध बालसाहित्यकारों की मजेदार कहानियां हैं।
    तीन लघुकथाओं के साथ अमित शर्मा,मोहन उपाध्याय उपस्थित हैं। तीन महत्वपूर्ण आलेख बालसाहित्य पर केंद्रित हैं। एक आलेख वरिष्ठ बालसाहित्यकार प्रकाश मनु जी का है। यह सुप्रसिद्ध कवियों द्वारा लिखी बालकविताओं पर आधारित है। अक्सर नामी साहित्यकार बालसाहित्य या तो लिखते ही नहीं या लिखने से परहेज करते हैं। प्रकाश मनु जी ने इस दिग्गजों की कविताओं को इसलिए भी रेखांकित किया होगा कि संभवतः अन्य भी बालसाहित्य लिखे। बड़ा ही मजेदार,संग्रहणीय और मननीय आलेख बन पड़ा है। नागेश पांडेय ‘संजय’ जी ने रोचक और मन-मस्तिष्क में रची-बसी बाल पहेलियां खोज-खोज कर ढूंढ-खोज निकाली हैं। एक उपन्यास अंश के साथ मृदुला सिन्हा उपस्थित हैं। आठ कविताएं वह भी जाने-माने कवियों के परिचय के साथ इस बार शामिल हुई हैं। एक नाटक भी है। एक विदेशी और बेहद चर्चित कथा को भी शामिल किया गया है। पांच अन्य विमर्श भी हैं। नियमित स्तंभ तो शामिल हैं ही। कागज हमेशा की तरह नियमित से बेहतर उपयोग किया गया है। ताकि यह अंक लंबे समय तक सहेजते हुए भी रहा-बचा रहे।
    कुल मिलाकर यह अंक संग्रहणीय है और पठनीय भी। कहानियों पर फिर कभी बात करना चाहूंगा। यह अंक डाक से आज ही मिला है। अभी तो देखा भर ही है।

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