30/12/2014

गुरु दक्षिणा -मनोहर चमोली ‘मनु’... नंदन, जनवरी.2015.

गुरु दक्षिणा

-मनोहर चमोली ‘मनु’

नमन ने पूछा-‘‘मैम। ये गुरु दक्षिणा क्या होती है?’’

गीता मैडम यह सुनकर चैंकी। नमन अक्सर रोचक सवाल करता था। बात-बेबात पर कुछ न कुछ जरूर पूछता था। वह कार्टून फिल्मों का बड़ा शौकीन था। वीडियों गेम्स भी खूब खेलता था। चटोरा भी खूब था। लेकिन क्लास में वह छोटी-छोटी बातों पर गौर करता था। कई बार प्रातःकालीन सभा में रोचक विचार और जानकारी भी रखता था। उसके मासूम चेहरे और भोलेपन व्यवहार से हर कोई प्रभावित था।


कल की ही बात थी। नमन ने प्रातःकालीन सभा में प्रिंसीपल से पूछा था-‘‘बड़ी मैम। क्या कोई ऐसा भी त्यौहार है, जो हम सबका हो?’’ प्रिंसीपल को कुछ सूझा ही नहीं। वह कहने लगी-‘‘बच्चों। ईद, होली, बैशाखी और क्रिसमस तो हम सभी के त्योहार हैं।’’

नमन ने फिर कहा-‘‘फिर मैम। स्कूल बस के ड्राइवर अंकल ने यह क्यों कहा कि ईद मुसलमानों का त्योहार है?’’ प्रिंसीपल ने स्कूल बस के ड्राइवर को बुलाया और जमकर डांटा। बेचारा नमन सकपका गया। वह सोचता रह गया कि आखिर उसने ऐसा क्या पूछ लिया था, जिसकी वजह से प्रातःकालीन सभा में हंगामा हो गया। 

एक दिन नमन प्रिंसीपल के आॅफिस में चला गया। प्रिंसीपल ने मुस्कराते हुए कहा-‘‘हां नमन। क्या पूछना है। पूछो।’’ नमन धीरे से बोला-‘‘बड़ी मैम। मैं आपको गुरु दक्षिणा देना चाहता हूं।’’ प्रिंसिपल अवाक रह गई। सहज होकर बोली-‘‘तो ठीक है। लेकिन गुरु दक्षिणा तो गुरु तय करता है। मैं जो मांगूगी वो देना होगा। दोगे न।’’ नमन से हां में सिर हिलाया।

प्रिंसीपल ने कुछ देर सोचा फिर कहा-‘‘मेरे आॅफिस के ठीक पीछे की जगह बेकार पड़ी है। आप वहाँ एक फलदार और एक छायादार पेड़ लगा सकते हो। एक दिन आप हमारे स्कूल से पढ़ कर बड़े काॅलेज में पढ़ने जाओगे। आपके लगाए हुए पेड़ हमें तुम्हारी याद दिलाते रहेंगे। ठीक है न।’’

नमन मुस्कराया और अपनी क्लास में चला गया। घर आकर उसने सारा किस्सा अपनी मम्मी को सुनाया। नमन की मम्मी ने हंसते हुए कहा-‘‘ठीक है। तो चलो नर्सरी। एक आम का पेड़ और एक नीम का पेड़ लेकर आते हैं।’’

नमन झट से तैयार हो गया। अगले ही दिन वह पेड़ों की पौध लेकर स्कूल पहुंच गया। स्कूल के माली की सहायता से उसने वह दोनों पेड़ प्रिंसीपल के आॅफिस के पीछे की जमीन पर रोप दिये। माली ने नमन से कहा-‘‘नमन। इस बार सुना है बारिश नहीं होगी। इन्हें लगाने से क्या फायदा। ये तो सूख जाएंगे।’’ नमन ने माली की ओर देखते हुए कहा-‘‘मैं इन्हें पानी दूंगा।’’

माली ने फिर कहा-‘‘हर साल बच्चे स्कूल में वृक्षारोपण करते हैं। कुछ दिन पेड़ों को पानी भी देते हैं। फिर भूल जाते हैं। मैं भी हर पेड़-पौधे का ध्यान नहीं रख सकता।ये पेड़ तुमने लगाए हैं। इनका ध्यान भी तुमने ही रखना है। इन्हें लगाकर भूल मत जाना। समझे।’’ नमन ने कहा-‘‘समझ गया।’’

नमन अपने टिफिन के साथ वाॅटर बोतल लाता ही था। अब वह अपनी क्लास में बैठने से पहले आम और नीम के पेड़ पर थोड़ा-थोड़ा पानी जरूर डालता। छुट्टी के समय भी वह अपनी वाॅटर बोतल का बचा हुआ पानी पेड़ों पर छिड़क देता। नमन की मम्मी उससे पेड़ों के बारे में अक्सर पूछती। 
नमन का एक दोस्त था। उसका नाम अहमद था। अहमद अक्सर नमन से पूछता-‘‘ये काम तो माली का है। तुम स्कूल पढ़ने के लिए आए हो या पेड़ लगाने के लिए आये हो? क्या तुम बड़े होकर माली बनोगे?’’ नमन का दिल बैठ जाता। वह एक ही जवाब देता-‘‘बस मुझे अच्छा लगता है। मेरे लगाए गए पौधे धीरे-धीरे बड़े हो रहे हैं।’’

एक दिन की बात है। नमन उदास था। अहमद ने पूछा तो नमन ने बताया- ‘‘इस बार गर्मियों की छुट्टी में हम शिमला जा रहे हैं। मेरी छुट्टियां वहीं बीतेगी।’’ अहमद उछल पड़ा। कहने लगा-‘‘अरे वाह! शिमला में मेरे चाचू रहते हैं। पता है शिमला में सेब के बहुत सारे बागीचे हैं। वहां अखरोट भी खूब होता है। राज़मा की दाल भी। देखना तुम्हें बड़ा मज़ा आएगा। शिमला जाने का मेरा भी बड़ा मन है। लेकिन। मैं इस साल भी शिमला नहीं जा सकूंगा।’’

नमन ने पूछा-‘‘लेकिन क्यो?’’ अहमद ने बताया-‘‘मेरे अब्बू बीमार हैं। अब मेरी अम्मी को दुकान पर बैठना पड़ता है। इस बार मुझे गर्मियों की छुट्टियों में अम्मी की हेल्प करनी है। लेकिन, तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम शिमला घूमने जा रहे हो।’’ नमन ने कहा-‘‘स्कूल के माली अंकल भी गर्मियों की छुट्टी में अपने गांव जा रहे हैं। मेरे पेड़ों को पानी कौन देगा? छुट्टियों में उन्हें पानी नहीं मिला तो वे सूख जाएंगे।’’

अहमद ने कहा-‘‘स्कूल में कोई तो रहेगा। वो तेरे पेड़ों की देखभाल कर लेंगे।’’ नमन ने जवाब दिया-‘‘यही तो मुश्किल है। माली अंकल कह रहे थे कि स्कूल छुट्टियों में बंद रहता है। रात की चैकीदारी करने के लिए पड़ोस के कोई अंकल रहेंगे। लेकिन वे रात को रहेंगे और सुबह ही अपने काम पर कहीं दूर चले जाएंगे। वो अंकल भला मेरे पेड़ों की देखभाल क्यों करेंगें?’’

नमन के साथ-साथ अहमद भी सोच में पड़ गया। फिर अहमद ने कहा-‘‘नमन। तू टेंशन मत ले। मैं अम्मी से बात कर लूंगा। दुकान जाने से पहले मैं एक चक्कर स्कूल का लगा लिया करूंगा। पेड़ों को पानी देकर झट से दुकान में चला जाया करूंगा।’’ नमन का चेहरा खिल उठा। वह बोला-‘‘अहमद। तुम मेरे बेस्ट फरेंड हो।’’ 

छुट्टियों में नमन खुशी-खुशी अपने मम्मी-पापा के साथ शिमला चला गया। वहीं अहमद दुकान जाने से पहले स्कूल आता और पेड़ों पर पानी डाल देता। 

छुट्टियां खत्म हुई। स्कूल खुला तो नमन सबसे पहले स्कूल आ पहुंचा। माली गेट पर ही मिल गया। माली ने नमन से कहा-‘‘अरे नमन। अब पानी लाने की जरूरत नहीं है।’’ नमन ने घबराते हुए कहा-‘‘क्यों? क्या हुआ? आप गांव से कब आए? मेरे पेड़ ठीक तो है न?’’

माली ने हंसते हुए कहा-‘‘होना क्या है। मैं गांव नहीं गया। मेरे बच्चे यहीं आ गए थे। कल ही गांव वापिस गये हैं। तुम्हारे दोस्त अहमद ने और मेरे बच्चों ने मिलकर तुम्हारे पेड़ों की खूब देखभाल की। उन्होंने स्कूल के चारों ओर कई नए पेड़ भी लगाए हैं। और हां। इस बार छुट्टियों के दिनों में कई बार बारिश भी हुई। जाकर तो देखो। तुम्हारे पेड़ तुम्हारे बराबर हो गए हैं।’’
नमन दौड़ कर पेड़ों के पास जा पहुंचा। आम और नीम के नन्हें 
पौधे बड़े हो चुके थे। हरी पत्तियों  से लदे पेड़ हवा में झूम रहे थे। ‘हम ठीक हैं। कहो। घूमना-फिरना कैसा रहा ?’ पेड़ शायद नमन से यही कह रहे थे। नमन था कि खिल खिलाकर हंस रहा था। 

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