16 मई 2017

मैं, बाल लेखन और वैज्ञानिक नज़रिया

मैं, बाल लेखन और वैज्ञानिक नज़रिया


-मनोहर चमोली ‘मनु’


अपनी लेखन यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूँ कि एक दैनिक अखबार में मेरा एक पत्र काॅलम में पत्र छपा था जो डाक देर से मिलती है पर आधारित था। तब मैं कक्षा बारह का छात्र था। बस यहीं से मैंने लिखना आरंभ किया था। काॅलेज पत्रिकाओं में भी लिखा। अख़बारों में संपादकीय पेज पर पत्र काॅलम ने शब्दों को विस्तार दिया। याद करता हूं तो पाता हूं कि इसके बाद जन ज्ञान पत्रिका ने मेरे लेखन को बेहद विस्तार दिया। इसके लिए मैं राकेश पंत जी एवं पंकज बिष्ट जी का नाम कभी क्यों कर भूल सकता हूँ। उजाला नवसाक्षरों की मासिक पत्रिका ने भी मुझे स्थान दिया। फिर तो जैसे लिखने के लिए एक के बाद एक स्टेशन मिलते रहे। मैं एक यात्री की मानिंद उन स्टेशनों पर उतरता रहा। फिर यात्रा करता फिर दूसरे स्टेशन पर चढ़ता फिर अगले स्टेशन पर उतर जाता। नवसाक्षर लेखन ने मुझे सरल लेखन की ओर बढ़ाया। इसके लिए उत्तराखण्ड का राज्य संदर्भ केन्द्र हमेशा याद रहेगा। जनवाचन आंदोलन के तहत दो किताबों का आना और भी सुखद रहा। धीरे-धीरे यह समझ में आया कि लेखन तो मानदेय भी दिलाता है। नवसाक्षर साहित्य माला के तहत पांच-छह किताबें आईं। लेखन कार्यशालाओं में जाने का खूब अवसर मिला। इन कार्यशालाओं में एक साल आया। 

1997। कुछ लेखन कार्यशालाओं में बाल साहित्यकार कृष्ण शलभ एवं अश्वघोष जी भी बतौर लेखक रहे। इन दोनों ने मुझे कई बार कहा-‘‘बाल साहित्य के क्षेत्र में आओ। वहां बच्चों के लिए कारगर लिखने वाले कम ही हैं।’’ इधर मुकेश यादव जी एवं सुशील उपाध्याय की नज़र मुझ पर पड़ी। इन्होंने मुझे रुड़की से पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के लिए सलाह दी। इन्हीं दोनों की वजह से मैंने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार से पत्रकारिता का कोर्स किया। वहां मुझे स्वर्ण पदक मिला। मुकेश यादव जी ही थे जिन्होंने मुझे सीधे राष्ट्रीय अखबार राष्ट्रीय सहारा का रुड़की से संवाददाता काम करने का मौका दिलाया। दस साल पत्रकारिता में रुड़की से बहुत कुछ सीखा। रुड़की से मैंने ओमप्रकाश नूर जी के साथ गंग ज्योति साक्षरता पत्रिका का संपादन किया। यह हमने दो साल से अधिक प्रकाशित की। बहुत कुछ सीखा। इसी बीच ज्ञान विज्ञान बुलेटिन जगमोहन चोपता के साथ संपादित की। यहा ज्ञान विज्ञान बुलेटिन के आरंभिक दो साल से अधिक का संपादन ही मुझे वैज्ञानिक दृष्टिकोण की ओर ले गया। खूब लिखा। कहानी, नाटक, कविताएं, लेख, संस्मरण, व्यंग्य भी लिखे। आकाशवाणी के लिए नाटक लिखे। झलकियां लिखी। आकाशवाणी के अनिल भारती जी और विनय ध्यानी जी का सहयोग खूब रहा। इसी दौरान वर्ष 2000 में सार्वजनिक विद्यालयों की पाठ्यपुस्तक लेखन कार्यशाला में शिरकत करने का मौका मिला। वहां मैंने महसूस किया कि वाकई अध्यायों के तौर पर कक्षावार बहुत कुछ सार्थक पठन सामग्री खोजने से भी नहीं मिलतीं। बस यहीं से प्रेरणा मिली। अंततः 2005 से बच्चों के लिए साहित्य लिख ही रहा हूँ। बच्चों के लिए पहली बीज बना पेड छपी़। यह कहानी थी। संभवतः इसका प्रकाशन वर्ष 1997 था। बच्चों का साहित्य लिखते हुए मैंने कहानी को ही अपनी विधा बना लिया। जैसा पहले कहा कि यूँ तो कविताएँ,संस्मरण,नाटक,आलेख, फीचर, व्यंग्य भी लिखे हैं। लेकिन वर्ष 2005 से अमूमन बच्चों के लिए कहानियाँ ही लिखता हूँ। 

मैंने हमेशा स्वयं को आज भी छात्र समझा है। चन्दामामा, नंदन और चंपक से पढ़ने की आदत बनी। काॅमिक्स का भी खूब योगदान रहा। अध्ययन तो आज भी जारी है। इसे प्राथमिकता में रखने का प्रयास रहता है। वर्ष 2005 से अध्यापन कर रहा हूँ तो पढ़ना-पढ़ाना दैनिक गतिविधि है ही। पढ़ने-पढ़ाने से लिखने के लिए खुराक मिलती है। नित नए आयाम दिमाग में कौंधते हैं। जितने कौंधते हैं उतने कागज़ में जो नहीं उतर पाते। हर साल हर कक्षा में नई पौध आती है। नए विचारों के साथ, ऊर्जा भरे बच्चे। संभावना लिए बच्चे। फिलहाल कक्षा छह से दस में पढ़ने वाले बच्चों के सम्पर्क में हूं। लेखन का स्रोत भी यही बच्चे होते हैं। मुझे तो यह लगता है कि शिक्षण ही एक मात्र ऐसा व्यवसाय है जो किसी को भी व्यावहारिक लेखक बनाने की क्षमता रखता है। बच्चों के साथ पढ़ने-पढ़ाने के समय एक बात हमेशा मन में आती है। वह है पुस्तकें। बच्चों के बहुत कम ही पुस्तकें हैं जो कोर्स के तौर पर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के आलोक में तैयार हुई हैं। उन्हें अपवाद मान लूं तो कह सकता हूं कि नहीं। वैसे तो पाठ्यपुस्तकों की अपनी सीमाएं होती हैं। विवशता भी। वे अक्सर आनंद देने में असफल ही होती दिखाई देती हैं। आम धारणा यही है कि पाठ्यपुस्तकें सूचना, ज्ञान, जानकारी देने वाली होनी चाहिए। वे उपदेश से भरी होनी चाहिए। शिक्षाप्रद होनी चाहिए। जबकि मेरा मानना है कि वे इससे पहले पढ़ने की ललक जगाने वाली होनी चाहिए। ऐसी पुस्तकें हों जिनमें बच्चों के स्वर हों। बच्चों की दुनिया उन पुस्तकों में हो। उनकी दुनिया का चित्रण उनमें हो। बच्चों को उनके अनुभवों को विस्तार देने के अवसर उनमें हों। सवालों का जवाब देने की बजाय पाठ्यपुस्तकें बच्चों के भीतर सवाल करने की आदत विकसित करने वाली हों। अधिकतर पुस्तके पहले पेज से धार्मिक ग्रन्थ अधिक लगती हैं। मिथकों से भरी कहानियां और वर्णन पुस्तकों में होना ही नहीं चाहिए। अनुमान और कल्पना के नाम पर बच्चों में बेवजह के डर जगाती सामग्री पुस्तक में न हों। यदि कोई पाठ्य पुस्तक किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देती हो, ऐसे ही चित्रों से अटी पड़ी हो तो यह भयावह है। अंधविश्वास, पाखण्ड, भाग्यवाद को स्थापित करने वाले पाठ घातक हैं। बच्चों के स्कूल से इतर भी बहुत अच्छा कुछ पढ़ने के लिए नहीं मिल रहा है। इधर कुछ पत्रिकाएं हैं जिन्होंने बच्चों के लिए पठनीय सामग्री देनी आरंभ की हैं। रूम टू रीड, एनसीईआरटी, प्रथम, तूलिका, चकमक, प्लूटो जैसे नाम कुछ ही हैं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, चिल्ड्रन बुक्स आदि कुछ पत्रिकाएं हैं जो बच्चों के लिए जरूरी तत्वों को ध्यान में रखते हुए प्रकाशित हो रही हैं। मैं आनंद को सबसे जरूरी तत्व मानता हूं जो पढ़ने के लिए सबसे पहले चाहिए। यही वह तत्व है जो पढ़ने की ललक पैदा कर सकता है। पढ़ने को बचाए रख सकता है। आनंद। मस्ती की अनुभूति पहला अनिवार्य तत्व हो। बालपाठ्यक्रम में यही मूल और अनिवार्य तत्व अधिकतर गायब है। हाशिए पर है। अनिवार्य रूप से बच्चों के स्वर होने चाहिए। बच्चों की दुनिया को शामिल करते हुए अधिगम के रास्ते पर ले जाया जाना चाहिए। भाषा सरल हो। सहज हो। प्रवाहमय हो। सीख,सन्देश,उपेदश सुझाते आदर्श वाक्यों से इतर ऐसी रचना सामग्री पाठ्यक्रम में हो जो बच्चों की अस्मिता का सम्मान करती हो। बच्चों को सम्पूर्ण व्यक्तित्व मानने का बोध कराने वाली सामग्री से बना पाठयक्रम हो।

इसके बाद मैं कल्पना शीलता के साथ विज्ञान को लेखन में जरूरी समझता हूं। विज्ञान यानि विशिष्ट ज्ञान। इसे भौतिक-रसायन के खोल से बाहर रखकर समझने की आवश्यकता है। विज्ञान को तथ्यों की पढ़ाई मान लेना ही इसके साथ सबसे बड़ा अन्याय है। विज्ञान कुछ रसायनिक पदार्थों के प्रयोग तक सीमित नहीं है। इस ब्रह्माण्ड के ज्ञात सीमित तथ्यों को रट लेना भर विज्ञान नहीं है। विज्ञान का अध्ययन तो हमें जिज्ञासु बनाता है। जिज्ञासु बनाए रखता है। विज्ञान ही तो है जो हमारी जिज्ञासाओं को शांत करता है और फिर अनवरत् जिज्ञासु बनाए रखने की ललक भी पैदा करता है। विज्ञान ही तो है जो हमे कल,आज और कल की जानकारी भी देता है। विज्ञान का फलक बड़ा है। वह हमें भाईचारा, लोक कल्याण और सामाजिक भी बनाता है। उदाहरण के लिए कल के मानव यहां-वहां धूप में यूं ही विचरण किया करते थे। पेड़ों की छांव में खड़े हुए होंगे तो छांव की अहमियत का पता चला होगा। तेज धूप के प्रभाव से बचने का उपाय खोजना आरंभ किया होगा। विशिष्ट जानकारी हासिल की होगी और छतरी का आविष्कार हुआ होगा। धूप-बारिश से बचाव की आवश्यकता ही आविष्कार का कारण बनी। एक व्यक्ति का आविष्कार लोकोन्मुखी बना। आज हमें समझना होगा कि विज्ञान नज़र और उसके असर पर केन्द्रित होता है। 

मैं अपने आस-पास देखता हूं कि स्कूलों में भी और घर में भी विज्ञान के दायरे को समेट कर रखा हुआ है। मनुष्य महाबली कैसे बना? जवाब है विज्ञान के सहारे ही उसने अपनी सोच-समझ को विस्तार दिया। अन्य जीवों से वह आज श्रेष्ठ जीव बन गया है। मानव से पहले भी सैकड़ों जीव इस दुनिया में पैदा हुए और काल के गाल में समा गए। जो हैं भी वे अपने विकास के क्रम में गतिअनुसार बहुत पीछे हैं। मानव की प्रगति में विज्ञान सबसे धारदार और असरदार हथियार है। हम सब यह जानते ही हैं कि हमारे सर्वांगीण विकास में विज्ञान की भूमिक सर्वोपरि है। लेकिन फिर भी विज्ञान को पढ़ना और वैज्ञानिक नज़रिए को जीवन मंे उतारना दो अलग बातें हैं। आज भी विज्ञान विषय को अधिकतर तथ्यों और आविष्कारों का अंग माना जाता है। आज भी अधिकतर छात्र विज्ञान तो पढ़ रहे हैं लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जीवन में उतारने वाले छात्रों की संख्या बेहद कम है। समाज में विज्ञान का ठोस एवं क्रमिक अध्ययन का ठीक उलट परिणाम पसरा पड़ा है। वैसे तो विज्ञान के अध्ययन के ठोस एवं स्पष्ट उद्द्ेश्य हैं। जिन्हें मैं इस तरह से समझना चाहता हूँ-एक-हमें अपने आस-पास घट रही घटनाओं को गौर से देखने का सलीका आ जाता है।दो-गौर से देखने के सलीके के साथ उन घटनाओं के कारणों का अनुमान लगाने लगते हैं। तीन- अनुमान लगाने के साथ सही या गलत तक पहुँचने से पहले उत्पन्न परिस्थितियों की जांच करने लगते हैं। चार-जांच के कई तरीकों के बाद निकले निष्कर्षों से अपने नज़रिए में बदलाव लाते हैं। तो यह कहा जा सकता है कि यदि हमारे मन-मस्तिष्क में संदेह करने की आदत नहीं है। हमारे सोचने के ढंग में जानने की आदत विकसित नहीं है। जानने के साथ मानने के बीच की यात्रा में पुष्टि के लिए स्वयं के प्रयास नहीं हैं। असफलताएं फिर प्रयास फिर असफलताएं फिर सफलता की मशक्कत नहीं है तो हम विज्ञान के उद्देश्यों से परे हैं। खुद करके समझना ही विज्ञान का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। यह कौन नहीं जानता। 

बच्चों की स्कूली किताबें हो या स्कूल से बाहर उन्हें मिल रहा साहित्य हो। वह बहुत कम है जो बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करता हो। बच्चों से पहले तो बड़ों में ही अमूमन वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित नहीं है। यही नहीं विज्ञान पढ़ाने वाले अध्यापकों में (सब नहीं) भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित नहीं है। दरअसल हम बहुत कुछ अनुकरण से सीखते हैं। घर-परिवार-पड़ोस का अनुकरण हम पर हावी रहता है। बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टि तो बचपन से जगाने की जरूरत है। लेकिन वही तो जगाएगा जो खुद इसका पक्षधर हो। हम बच्चों के सामने मिथकों,अंधविश्वासों का ढेर जमाए रखते हैं। यह ढेर इतना विशाल है कि उसके पीछे खड़ा अटल विज्ञानरूपी सूरज का प्रकाश धूमिल हो गया लगता है। ऐसे कई उदाहरण मेरे समक्ष हैं जिन्हें सुनकर आम जानकार भी माथा पीट लेगा। ऐसे विज्ञान के परास्नातक छात्र हैं जो आज भी तंत्र-मंत्र, जादू-टोने,मिथक,अंधविश्वास के घेरे से बाहर नहीं हैं। आज ही बताएं। जुलाई-अगस्त के महीने में सांपों का बिल से निकलना आम बात है। ऐसे में किसी विद्यालय में विज्ञान पढ़ाने वाला अध्यापक छात्रों से साँप को मरवा दे और यह कहे कि इसकी आंखों को गोबर से ढक दो अन्यथा मादा सांप मरे हुए सांप की आंखों में देखकर मारने वालों को डस लेगी। जब शिक्षक ही सूर्यग्रहण जैसी खगोलीय घटना को देखना बुरा मानता हो। जब शिक्षक ही यह मानता हो कि जंगल में लगने वाली आग से आने वाली वनस्पिति और बेहतर होगी तो आप समझ सकती हैं कि बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहां से पनपेगा। यही स्थिति हमारे घरों में भी है। जब हम पूजा-पाठ में प्रतिदिन दो-दो घण्टे बिताते हों। दिन विशेष में हमारे बहुत सारे काम वर्जित हों। दिनों के हिसाब से हमारा भोजन हो रहा हो। समय के हिसाब से हमारा यात्रा करना, बाहर निकलना होता हो तो वैज्ञानिक नज़रिए की उम्मीद करना बेमानी है। सुनी-सुनाई बातों पर सालों से यकीन करने की नियति हमारी आदत है। जैसा चला आ रहा है उसे वैसा ही हम बच्चों में हस्तांतरिक कर रहे हैं तो वैज्ञानिक फैलाव की गति धीमी तो रहेगी ही। 

यह इतना कठिन भी नहीं है। हमें सबसे पहले बच्चों के विचारों को सुनना होगा। यह हमारा पहला काम हो। दूसरा उनके नज़रिए का सम्मान करना दूसरा काम हो। उनके अनुभव और उनकी समझ को वैज्ञानिक विश्लेषण की कसौटी पर कसने के अवसर देना तीसरा बड़ा काम हो। उन्हें खुद खोजने और प्रयोग करने का मौका देना चैथा बड़ा काम है। इसके लिए तमाम गतिविधियां है जो की जानी लाभदायक हो सकती हैं। विद्यालय इन गतिविधियों को कराने का सबसे सरल और कारगर प्लेटफार्म है। मसलन विद्यालय के आस-पास पनपे घरेलू पौधों की सहायता ली जा सकती है। कुछ पौधों को चुना जा सकता है। कुछ को पानी देना और कुछ को पानी न देने वाली गतिविधि बेहद सरल और लाभप्रद है। बच्चों को हर रोज की गतिविधि नोट करने का अभ्यास कराया जा सकता है। अब तो मोबाइल आम साधन है। हम हर रोज के फोटोग्राफ्स ले सकते हैं। इसी तरह दो पौधों को ले सकते हैं। एक विद्यालय परिसर में लगा हो और दूसरे को हम गमले में कक्ष के भीतर रख दें। बच्चों से कहें कि दोनों में आ रहे बदलाव को बीस से तीस दिन तक देखें। नोट करे और अपने अनुभव लिखें। छात्र अपने अनुभव से समझना, जानना और मानकर सीखना अधिक पसंद करते हैं। 

अध्यापकों की भूमिका भी इसमें सबसे खास और जरूरी हो जाती है। प्रातःकालीन सभा से लेकर छुट्टी का घण्टा बजने तलक कई ऐसे अवसर आते हैं जब हम छात्रों के साथ विज्ञानपरक रुचि जगाने का काम करते हैं। यहां तक कि खेल में भी समूचा विज्ञान छिपा है। मध्याह्न भोजन में भी हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण की दर्जनों बातें कर सकते हैं। हाथ धोने का विज्ञान हो या बैडमिन्टन खेलते समय हवा के रुख का शटल पर प्रभाव हो या अन्य विषय हों। हमारा मकसद स्पष्ट होता है। आज जब नागकन्या, अवतार, राक्षस, डायन, भूत-प्रेत जैसे धारावाहिकों की बाढ़ आ गई है। ज्योतिष में नफा-नुकसान बताने वाले बाबा सुबह-सुबह टीवी पर आ धमकते हैं। ऐसे समय में सत्य-असत्य की परख में बच्चों को समर्थ बनाना ही आज की पढाई है। जल स्रोतों-गदेरों में घटती जल धारा की चर्चा को बदलते मौसम के साथ-साथ ग्लोबल वार्मिंग तक ले जाना आसान है। धरती में पाए जाने वाले हर जीवों की महत्ता केंचुए से लेकर सांप-चूहे तक ले जाई जाती है। यह बताना कि कुछ कीड़े-मकौड़े जहरीले क्यों हैं? उनसे सावधान रहना ठीक है। उन्हंे मारना ठीक नहीं। वे कहीं न कहीं हमारे मित्र हैं। हमारे जिन्दा रहने के लिए उनका जिंदा रहना भी जरूरी है। चूहों का विद्यालय में आना आम बात है। चूहों की वजह से सांप का आना स्वाभाविक है। कहीं न कहीं विद्यालय में बन रहा भोजन और उसका भण्डारण विद्यालय में जमा हो रहा कूड़ा-करकट चूहों को बुलाने में सहायक है। यदि ये दोनों का उचित रख-रखाव ओर निपटारा हो तो संभव है कि चूहों का रहन बदल जाए। चूहा ऐसा जीव है जिसे बेवजह भी कुतरने को कुछ न कुछ चाहिए। कागज और विद्यालयी सामग्री उनके लिए सरल माध्यम बन जाती है। चूहों की गंध पाकर सांप आते हैं। कोई भी घटना, स्थिति और समस्या के पीछे कोई न कोई कारण है। हम उन कारणों का पता लगाने की ओर छात्रों को अग्रसर करें। कारणों का पता लगाकर निष्कर्ष के तौर पर समाधान भी छात्र खोज लेते हैं। 

मेरा स्पष्ट मानना है कि यह काम अध्यापक वर्ग बखूबी कर सकता है। मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वैज्ञानिक तथ्य और जानकारी देना मेरा काम नहीं है। कला भी अपने आप में विज्ञान है। रंगों का संयोजन और चित्रांकन भी अपने आप में सधा हुआ विज्ञान है। इसके लिए कोई तय वादन नहीं है। यह तो देशकाल और परिस्थिति के अनुसार स्वतः ही हो जाता है।  कई बार प्रातःकालीन सभा में बच्चे जो सामान्य ज्ञान के प्रश्न साझा करते हैं वहीं से वैज्ञानिक नज़रिए के आलोक में हमें अपनी बात कहने का मौका मिल जाता है। हमारा प्रयास होता है कि हम कुछ ऐसी चर्चा आरंभ करें जिसके बाद छात्र सोचें और समझने के लिए और अध्ययन करें। मसलन अपने आस-पास के कीड़े-मकोड़ों की दैनिक गतिविधियों को देखने का काम दे देते हैं। विद्यालय परिसर में मौसमवार पौधों-पेड़ों में आ रहे परिवर्तनों को गौर से देखने-समझने का काम दे देते हैं। सर्दी-गर्मी-बरसात से हम पृथ्वी और सूर्य पर चर्चा करने लगते हैं। गर्मियों में पत्तों के झुलसने की बात हो या नया अंकुरित कोई नन्हा पौधा हो। इनका दैनिक अध्ययन करना अपने आप में दिलचस्प गतिविधि है। एक हरी पत्ती के सूख जाने की पूरी प्रक्रिया मज़ेदार है। थर्मामीटर से प्रत्येक सप्ताह का तापमान आंकने की गतिविधि से बच्चे बहुत कुछ सीखते हैं। तुलना करना, आंकड़ों को इकट्ठा करना। जोड़-घटाओ। तापमान का घटता-बढ़ता क्रम वे समझ पाते हैं। हाल ही में एक समाचार प्रातःकालीन सभा में एक छात्रा ने पढ़कर सुनाया-‘अब समुद्र में शहर बसाएगा अमेरिका।’ हमने इस बहाने दो देशों के बच्चों के परिवेश,वातावरण,शिक्षा-दीक्षा पर प्रकाश डालने का अवसर मिल गया। हमने यह चर्चा की कि क्यों कुछ राष्ट्र सूचना,तकनीक,प्रौद्योगिकी और विकास में बहुत उन्नत हैं। वहीं कुछ राष्ट्र बेहद पिछड़े हुए हैं। हमने इसे स्कूल केन्द्रित किया। बाल केन्द्रित किया। एक और वे राष्ट्र जो आज भी धर्म, ज्योतिष, आस्था, अंधविश्वास, कुरीतियों, सामाजिक कुपरंपराओं, जादू-टोनों की जकड़न में हैं वहां के बच्चों में भी इन जड़ताओं का असर रहेगा। वहीं दूसरी ओर जहां बचपन से ही बालमन को उन्नत सुविधाओं और तकनीकीयों का लाभ मिल रहा है वह वयस्क होकर राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। ऐसा नहीं है कि बच्चों में तुलनात्मक अध्ययन करने की समझ नहीं होती। होती है वह अपनी कक्षा में भी अपना आकलन स्वयं कर लेते हैं। अपने घरों में अपने भाई बहिनों के साथ अपनी स्थिति का अंदाजा उन्हें होता है। वे पास-पड़ोस के परिवारों की तुलना अपने परिवार से बखूबी कर लेते हैं। तो फिर वे अपने ज़ेहन में खोजी प्रवृत्तियों को शामिल क्यों नहीं कर सकते? कर सकते हैं। यह पहल, यह रास्ता उन्हें बड़े ही तो सुझाएंगे। 

मैं यह भी नहीं कहता कि आज विज्ञान शिक्षण में सुधार नहीं आया है। बहुत कुछ विज्ञान की कक्षाओं में हो रहा है। बहुत बदलाव देखने को मिल रहे हैं। विज्ञान शिक्षण में परिवर्तन आए हैं। हालांकि ये परिवर्तन नाकाफी हैं। गति बेहद धीमी है। विविधता भरे विकल्पों को बढ़ाने की आवश्यकता है। आज मोबाइल एप्स हैं। गूगल जैसे कई सर्च इंजन हैं। इनकी सुविधा है। विज्ञान आधारित वीडियों,चित्रों सहित लिखित सामग्री का विपुल भण्डार अंतरजाल पर उपलब्ध है। यू-ट्यबू जैसे सुविधा है। व्हाट्स ऐप में तो सैकड़ों ग्रुपस हैं जिनके माध्यम से विज्ञान शिक्षण और सरल तथा प्रभावी हो गया है। वीडियों काॅलिंग के जरिए विज्ञान विशेषज्ञों से सीधे बातचीत कराना संभव हो गया है। प्रयोगशालाओं का प्रचलन बढ़ा है। विज्ञान हमारे हाथ में आ गया है। हालांकि विज्ञान को कॅरियर के तौर पर अपनाने का प्रतिशत लगातार घट रहा है। इंजीनियरिंग-चिकित्सा-तकनीकी क्षेत्रों की ओर छात्रों का आकर्षण अब भी बना हुआ है। यह स्वयं में हैरानी की बात है। 

बहुत सारी बातों का मैंने यहां उल्लेख किया है। लेकिन बच्चों से ही बात न हो तो सब व्यर्थ है। यह कहना तो बनता ही है कि छात्रों को हमेशा क्या,कैसे,क्यों,कौन,कब और कहां से जूझते रहना चाहिए। यह छह सवाल हैं जिनसे जवाब पाने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। प्राकृतिक हो या मनुष्यजनित। सभी घटनाओं,बातों, समस्याओं और परेशानियों के कुछ न कुछ कारण हैं। कारण है तो उनके समाधान भी हैं। उन समाधानों तक पहुंचने का माध्यम ही विज्ञान है। छात्रों का मौन रहना वैज्ञानिक नज़रिए की मौत है। संतुष्ट हो जाना थक जाना है। थकान हमेशा निराशा की ओर ले जाती है। वहीं प्रकृति न तो मौन है और न ही संतुष्ट। वह तो आशा का संचार करती है। अहा! धरती कितना देती है! यह वाक्य सनद रहना चाहिए। प्रकृति को तभी तो माँ कहा जाता है। माँ से कुछ नहीं सीखा तो क्या सीखा। सीखने का एक भी अवसर न जाने दें। जी हाँ। आपसे भी यह कहना तो बनता है कि आप पाठक, अध्यापक, अभिभावक, समाज के जिम्मेदार नागरिक आदि के तौर पर जैसे भी स्वयं को देख रहे हैं आज वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अपने व्यवहार की जरूर पड़ताल करेंगे। करेगें न?
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लेखक परिचय: मनोहर चमोली ‘मनु’: ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ और ‘पूछेरी’ पुस्तकें नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुई हैं। ‘चाँद का स्वेटर’ और ‘बादल क्यों बरसता है?’ ‘अब तुम गए काम से’, ‘चलता पहाड़,’‘जूते और मोजे’ सहित पांच पुस्तके ‘रूम टू रीड’ से प्रकाशित हुई हैं। बाल कहानियों का संग्रह ‘अन्तरिक्ष से आगे बचपन’ उत्तराखण्ड बालसाहित्य संस्थान से पुरस्कृत। बाल साहित्य में वर्ष 2011 का पं॰प्रताप नारायण मिश्र सम्मान मिल चुका है। जीवन में बचपन’ बाल कहानियों का संग्रह बहुचर्चित। बाल कहानियों की पच्चीस से अधिक पुस्तकें मराठी में अनुदित होकर प्रकाशित। उत्तराखण्ड में कहानी ‘फूलों वाले बाबा’ कक्षा पाँच की पाठ्य पुस्तक ‘बुराँश’ में शामिल। दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में हिन्दी की सहायक पुस्तक में नाटक ‘मस्ती की पाठशाला’ शामिल। हिमाचल सरकार के प्रेरणा कार्यक्रम सहित पढ़ने की आदत विकसित करने संबंधी कार्यक्रम के तहत छह राज्यों के बुनियादी स्कूलों में 13 कहानियां शामिल। बीस से अधिक बाल कहानियां असमियां और बंगला में अनुदित। उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में शिक्षक हैं। 
सम्पर्क: भितांई, पोस्ट बाॅक्स-23,पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल. 246001.उत्तराखण्ड. मोबाइलः09412158688.
ई-मेल: chamoli123456789@gmail.com

4 टिप्‍पणियां:

  1. मनोहर जी, बढ़िया है आलेख। हालाँकि इसकी कुछेक बातों से मैं सहमत नहीं हूँ। मसलन, सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कुछ नहीं होगा। विज्ञान यह बता सकता है कि एक रोटी में कितनी कैलोरी है। एक रोटी के हर सम्भव वैज्ञानिक विश्लेषण किए जा सकेंगे। पर यह वह नहीं बताएगा कि यह रोटी कितने लोगों में बँटनी चाहिए। इसका उत्तर हमें कहीं और से मिलेगा। पर आप जैसे सचेत, पढ़ने वाले शिक्षक हमारे समूचे समाज की आशा के दीप हैं। आप सबको पढ़कर सुनकर आशा बँधती है। इसलिए भी कि मैं मानता हूँ कि बेहतर दुनिया बनाने में सबसे अधिक हाथ शिक्षक बँटाएँगे।

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