13/09/2012

बाल कहानी-'इन्द्रधनुष'. चंपक, सितंबर- प्रथम अंक, 2012.



 बाल कहानी----
'इन्द्रधनुष'-मनोहर चमोली ‘मनु’
जंबो हाथी ने आवाज लगाई-‘‘अरे चूंचूं बाहर तो निकल। देख इंद्रधनुष निकल आया है ! कितना सुंदर कितना प्यारा!’’
चूंचूं चूहा पलक झपकते ही बाहर निकल आया। आसमान में सतरंगी इन्द्रधनुष को देखकर चूंचूं खुशी से चिल्ला उठा-‘‘वाह ! हाथी दादा। क्या बात है ! काश! मैं भी तुम्हारी तरह लंबी-चैड़ी काठी वाला होता तो एकझटके में तुम्हारे गाल चूम लेता।’’

जंबो हाथी ने हवा में सूंड हिलाते हुए कहा-‘‘इसमें कौन सी मुश्किल है। ये लो। अपनी इच्छा पूरी करो। मेरी ये बीस फुट की सूंड कब काम आएगी।’’ जंबो हाथी ने दूसरे ही क्षण चूंचूं को सूंड से उठा कर अपने गाल पर रख दिया। दोनों हंसने लगे।
चूंचूं ने इंद्रधनुष की ओर देखते हुए पूछा-‘‘दादा। एक बात तो बताओ। ये इंद्रधनुष हर रोज क्यों नहीं निकलता?’’
जंबों ने सिर हिलाते हुए जवाब दिया-‘‘चूंचूं तुम्हारे सवाल में जान है। दरअसल इंद्रधनुष बारिश के बाद ही निकलता है। कारण साफ है। बारिश होने के बाद हवा में पानी के नन्हें कण रह जाते हैं। जैसे ही सूर्य की किरणें उनमें से होकर गुजरती है तो वे सार रंग के इंद्रधनुष का आकार ले लेती हैं।’’
‘‘ओह ! समझ गया। तो ये बात है। लेकिन इनमें सात रंग कौन-कौन से होते हैं? मुझे तो सात नहीं दिखाई दे रहे हैं।’’
‘‘तुम पिद्दी भर के तो हो। अरे! सात रंग तो मुझे भी अपनी आंख से नहीं दिखाई दे रहे हैं। इंद्रधनुष के सातों रंगों को देखने के लिए दूरबीन लानी पड़ती है। समझे। लेकिन मुझे इसके रंग पता हैं। पहला लाल फिर दूसरा नारंगी फिर पीला, हरा,नीला,आसमानी और बैंगनी रंग होता है। आया समझ में। इन्हें याद कर लेना।’’
चूंचूं सिर हिलाते हुए कहने लगा-‘‘समझ गया। लेकिन जंबों दादा। ये पश्चिम दिशा में ही क्यों निकला हुआ है?’’
जंबो हाथी ने हंसते हुए कहा-‘‘आज तो तेरा दिमाग खूब चल रहा है। सही बात तो ये है कि ये सूर्य के ठीक विपरीत दिशा में ही दिखाई देता है। सूरज की रोशनी बूंदों पर पड़ने से सूरज की ओर खड़े होने से ही हमकों ये इंद्रधनुष दिखाई देता है। सुबह पश्चिम में और शाम को पूरब में। समझे। ’’
‘‘समझ गया।’’
जंबो ने कहा-‘‘आसमान में दिखाई देने वाला इंद्रधनुष प्राकृतिक है। तुम चाहो तो कृत्रिम इंद्रधनुष भी देख सकते हो।’’
चूहा बोला-‘‘वो कैसे भला?’’
जंबो ने बताया-‘‘किसी फव्वारे के पास जाओ। सूरज की ओर पीठ करो। यदि फव्वारे के पानी में फैलाव होगा। तो तुम्हें सूरज की विपरीत दिशा की ओर यानि पश्चिम में छोटा सा इंद्रधनुष दिखाई देगा। बहुत ऊंचाई से गिरने वाले झरने के पास भी हम इंद्रधनुष को देख सकते हैं। लेकिन इसके लिए हमें सूरज और पानी की बूंदों के बीच खुद को सही जगह पर खड़ा करना होगा।’’
‘‘समझ गया। ये कृत्रिम इंद्रधनुष को देखने के लिए थोड़ा मेहनत करनी होगी न दादा।’’
तभी जंबो हाथी ने घात लगाती हुई पूसी बिल्ली को देख लिया। पूसी चंचंू पर झपटने ही वाली थी कि जंबो हाथी ने चूंचूं को इशारा कर दिया।
चूंचूं बोला-‘‘समझ गया। मैं चला बिल में।’’ यह कहकर चूंचूं बिल में जा घुस गया। बेचारी पूसी बिल्ली हाथ मलती रह गई।
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-मनोहर चमोली ‘मनु’. पोस्ट बाॅक्स-23, भितांईं, पौड़ी , पौड़ी गढ़वाल.246001 मोबाइल-09412158688. उत्तराखण्ड।





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