09/04/2016

यादगार बन पड़ा है हिमप्रस्थ का बाल साहित्य विशेषांक child literature

यादगार बन पड़ा है हिमप्रस्थ का बाल साहित्य विशेषांक

-मनोहर चमोली ‘मनु’

साठ बरसों से मासिक पत्रिका हिमप्रस्थ संभवतः निरंतर प्रकाशित हो रही है। यह भी कि इस पत्रिका ने पहली बार वृहद बाल विशेषांक के तौर पर पाठकों के समक्ष अपनी जगह बनाई है। सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग, हिमाचल प्रदेश का यह अंक जनवरी-फरवरी 2016 के रूप में बाल साहित्य विशेषांक के लिए अविस्मरणीय बन गया है। बाल साहित्य के क्षेत्र में यह कई मायनों में मील का पत्थर साबित होगा। हिमाचल प्रदेश से संभवतः यह पहला अवसर होगा जब समग्र रूप से हिन्दी बाल साहित्य पर इतनी विपुल सामग्री एक साथ प्रकाशित हुई है। कविताओं, कहानियों के साथ-साथ यात्रा कथा, बाल नाटक,ग़ज़ल,लघु कथाएं, लोक कथाएं, नीति कथाएं, आलेख, समीक्षाएं शामिल हैं। 

हिमप्रस्थ वैसे तो साहित्यिक पत्रिका के तौर पर मशहूर है। कई अवसरों पर बालमन से जुड़ी रचनाएं भी पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं। इस अंक में बेजोड़ बाल साहित्य यहां संकलित हो गया है। इस बाल साहित्य विशेषांक में 76 से अधिक बाल साहित्यकारों की नवरंगी रचनाओं को एक मंच पर स्थान दिया है। मज़ेदार बात यह है कि 144 पेजों पर यह सामग्री एक साथ आई है और कई प्रसिद्ध बाल साहित्यकारों की उपस्थिति अपनी उत्कृष्ट रचनाओं के साथ हुई है। मोटे तौर पर 21 बाल साहित्यकारों के आलेख शामिल किये गए हैं। एक यात्रा कथा है। दो बाल नाटक हैं। 17 बालसाहित्यकारों की कहानियां हैं। 24 बाल साहित्यकारों की 46 कविताएं हैं। 10 बाल साहित्यकारों की 16 लघु कथाएं,लोक कथाएं और नीति कथाएं शामिल हैं। एक समीक्षा है। 

संपादन इतना लाजवाब हुआ है कि बड़े लेखों और रचनाओं से बचा गया है। ठीक भी है। बहुत जरूरी हुआ तो अधिक स्थान घेरने वाली रचनाएं कम या सबसे बाद में पढ़ी जाती हैं। ऐसे में यदि बाल साहित्य विशेषांक लंबी रचनाओं से अटा पड़ा हो तो उसकी पठनीयता पर सवाल उठने लगते हैं। इस बहाने हम बाल साहित्यकारों को अब यह आत्मसात् कर लेना ही होगा कि लंबी रचनाएं बहुत जरूरत पर ही लिखी जाएं, अब गद्य हो पद्य विधा। वही रचनाएं अधिक पसंद की जाती हैं जो सरल, सुबोध और सहज हों। अनावश्यक विस्तार लेती रचनाएं चाहे कितने ही बड़े या स्थापित रचनाकार की हो, पत्र-पत्रिका में स्थान तो पा लेती हैं लेकिन पढ़ी नहीं जाती। 

पौने दो पेज का संपादकीय एक साथ कई सारी बातें और विमर्श के मुद्दे उठाता है। संपादकीय जहां कल,आज और कल की बात करता है वहीं वह यह भी बताता है कि बचपन-लड़कपन -किशोरावस्था-युवावस्था का फासला कम होता जा रहा है। स्मार्टफोन और इंटरनेट के अधिकाधिक प्रयोग से बच्चों में नकारात्मकता का के आगमन से संपादकीय भी चिंतित है। संपादक वेद प्रकाश जी की संवेदनशीलता का परिचय इस बात से आसानी से लगाया जा सकता है कि वह लिखते हैं-‘आज के बच्चे बेहतर परवरिश में पल रहे हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में उनमें जो कुछ मौलिक था,विशेष था,अनूठा था,वह गायब हो रहा है। वह जो सीख रहे हैं,पढ़ रहे हैं,वह उन्हें मशीनी बना रहा है। बेशक यह उनके जीवन स्तर को सुख-सुविधाओं से सम्पन्न करेगा,लेकिन बहुत कुछ ‘अपना’ छीन भी रहा है।’
बहरहाल सादगी से यह अंक निकला है। कागज की गुणवत्ता संग्रहणीय योग्य है। कवर पेज भी मोटा है। हर रचना के साथ हरसंभव कोशिश की गई है कि एक तो रेखांकन हो। यह और रोचक बन पड़ा है। कवर पेज भी बालमन के अनुरूप है। चूंकि इसमें बालसाहित्य भी है और बाल साहित्यकारों का हिस्सा भी है। विशेषांक है तो आवरण पर और अधिक परिश्रम की अपेक्षा थी। आकार भी बेहतरीन है। फोंट भी आंखों को थकाता नहीं है। सामग्री को पठनीय बनाने के लिए स्थान को बेहद संकुचित नहीं किया गया है। कहीं भी सामग्री ठंूस कर नहीं भरी गई है। 

बाल साहित्यकारों में देवेन्द्र मेवाड़ी, गोविंद शर्मा, अशोक अंजुम, द्विजेंद्र द्विज, रजनीकांत शुक्ल, डाॅ॰ सुशीलकुमार फुल्ल, सुमन शर्मा, डाॅ॰ सुनीता, डाॅ॰ फकीरचंद शुक्ला,मृदुला श्रीवास्तव, अरविंद कुमार साहू, रत्न चंद ‘रत्नेश’, डाॅ॰मंजरी शुक्ला,सुशांत सुप्रिय,प्रकाश मनु, कृष्ण चन्द्र महादेविया, अनंत आलोक, शैलेन्द्र सरस्वती,अंकुश्री, रितेंन्द्र अग्रवाल, नरेन्द्र देवांगन, सुनीता तिवारी, गंगाराम राजी, विनोद ध्रब्याल राही, सुदर्शन वशिष्ठ, उषा छाबड़ा, डाॅ॰दिनेश चमोला ‘शैलेश’,शशिभूषण बडोनी,मंजू महिमा, हेमंत भार्गव, संजय वर्मा,सुमन शर्मा, शादाब आलम, प्रतिभा शर्मा, दिविक रमेश, डाॅ॰ छवि निगम, अभिनव अरुण, डाॅ॰ देशबंधु शाहजहांपुरी,रोचिका शर्मा,कृष्णा ठाकुर ,गोपाल शर्मा,कृतिका ठाकुर,विजयपुरी, कुमार भमौता की रचनाएं शामिल हैं। 

हिमप्रस्थ के इस अंक में सैनी अशेष की पांच लघुकथाएं भी हैं। बाल कविताओं के बहुरंग हिमप्रस्थ में चार चांद लगाते हैं। समकालीन बाल समाज पर पैनी नज़र रखने वाले बाल साहित्यकार जितेश कुमार की दो कविताएं यहां हैं। नवीन हलदूणवी की बहुरंगी दो कविताएं भी शामिल की गई हैं। वरिष्ठ बाल साहित्यकार जयप्रकाश मानस की तीन कविताएं, मनीषा जैन की चार कविताएं, नए तेवर की कविताओं के विशेषज्ञ डाॅ॰ फहीम अहमद के चार खास बालगीत इस अंक को विशिष्ट बनाते हैं। चर्चित बाल साहित्यकार परशुराम शुक्ल की दो कविताएं अपनी विशिष्टता के साथ शामिल हैं। वरिष्ठ बाल साहित्यकार डाॅ॰ प्रत्यूष गुलेरी की पांच खास कविताएं अपनी उपस्थिति और लंबे अनुभव की याद दिलाती हैं। राजीव कुमार ‘त्रिगर्ती’ की तीन कविताएं विविधता लिए हुए है। मशहूर बाल साहित्यकार प्रभुदयाल श्रीवास्तव की दो कविताएं अपने रंग में रंगी हैं। बाल साहित्यकार के चिंतक,आलोचक,समीक्षक और अपनी विशिष्ट रचनाओं के लिए मशहूर डाॅ॰ नागेश पांडेय ‘संजय’ की दो कविताएं अपनी नायाब धमक के साथ अपनी ओर ध्यान खींचती हैं। संजीव कुमार की तीन कविताएं अच्छी बन पड़ी हैं। इसके अलावा तेरह जाने-माने बाल कवियों की कविताएं भले ही एक-एक हैं, लेकिन वह भी अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुए है। कविता,ग़ज़ल और हाइकू को भव्यता के साथ स्थान मिला है।

पुष्पा भारती का लेख ‘बाल साहित्य में रचना होगा नया संसार‘, डाॅ॰ संगीताश्री का लेख ‘चरित्र निर्माण में बालपन के संस्कार, उमा ठाकुर का लेख युवाओ में नैतिक शिक्षा, राजेन्द्र पालमपुरी का लेख बालपन को संवारता साहित्य, भगवती प्रसाद गौतम का लेख कहां खो गया चहकता बचपन, मंजू गुप्ता का लेख आओ! लौटा दें मुस्कराता बचपन, कंचन शर्मा का लेख बच्चों का बदलता स्वभाव व व्यवहार,मनोज चैहान का लेख बालमन को समझना होगा, डाॅ॰रजनीकांत का लेख वर्तमान पीढ़ी की बदलती मानसिकता, वंदना राणा का लेख युवाओं को अनुशासन का पाठ, रमेशचन्द्र मस्ताना का लेख आज का युवा कल का भविष्य, विनोद भारद्वाज का लेख लोक संस्कृति में बालोपयोगी साहित्य, मनोहर चमोली ‘मनु’ का लेख बाल साहित्य में कल्पना और यथार्थ, डाॅ॰ राकेश चक्र का लेख किसी को तो बनना होगा मार्गदर्शक, आशा शैली का लेख रोचक एवं प्रेरणाप्रद हो बाल साहित्य, उमेशचंद्र सिरसवारी का लेख हिंदी बाल कविताओं में राष्ट्रीय चेतना,प्रकाशचंद्र का लेख बाल कविता और भवानी प्रसाद मिश्र, पवन चैहान का लेख वर्तमान समय में बाल पत्रिकाएं एवं साहित्य, प्रो॰योगेशचंद्र शर्मा का लेख विद्या की देवी मां सरस्वती, योगराज शर्मा का लेख स्वस्थ व शिक्षित बचपन पठनीय बन पड़े हैं। 

पुष्पा भारती अपने लेख में लिखती हैं-‘हमें ऐसे बाल साहित्य का निर्माण करना है, जो आज के वर्तमान समाज से बच्चों को जोड़े,पर साथ ही साथ उनमें वह दृष्टि भी पैदा करे जो बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाए। पर यह सब हम अपनी भाषा में उपदेश की शैली में नहीं कर सकते।’
डाॅ॰ संगीताश्री अपने आलेख में एक जगह लिखती हैं-‘हिंदी में, बाल साहित्य को अभी समय की चाल, बच्चों/बालकों की बढ़ती बौद्धिक मांग के अनुसार अपना स्वरूप् निर्मित करना होगा।’ राजेन्द्र ‘पालमपुरी’ का आशावादी लेख पठनीय है। वह लिखते हैं-‘किंतु बच्चों से दूर होते बाल साहित्य के बावजूद आज भी अच्छा साहित्य लिखा जा रहा है। और यह उम्मीद की जा रही है कि देर-सवेर तकनीक की उस चमकीली दुनिया से बच्चों का मोहभंग होगा और किताबें फिर से उनकी संगी-साथी बनकर और उनके नए नायकों की उंगली पकड़कर बचपन की दहलीज से पार उतारने में अपनी विशेष भूमिका अदा करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगी।’

मंजू गुप्ता अपने आलेख में लिखती हैं-‘आज के बच्चों के बचपन में पचपन नज़र आ रहा है। उनमें मस्ती,शरारत,रूठना-मनाना,नादानियां,भोलापन आदि नहीं रहा। उनका बचपन इंटरनेट के इंद्रजाल में फंस कर नेट पिटारे मंे अपनी दुनिया की अच्छाई-बुराई देख रहा है।’

डाॅ॰ राकेश चक्र लिखते हैं-‘जो भी परिवार वर्तमान परिवेश में जितना अधिक सुविधाभोगिता दिखावा और फैशन में डूबा है, वह उतना ही सत् साहित्य और बाल साहित्य से दूर होता जा रहा है।’

उमेश चंद्र सिरसवारी जी ने आजादी के बाद से अब तक बाल साहित्यकारों की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना के स्वर की पड़ताल गहनता से की है। पवन चैहान जी ने बाल पत्रिकाओं और बाल साहित्य के बहाने गहन पड़ताल की है। वह भी बाल साहित्य में वैज्ञानिक चेतना के पक्षधर हैं। योगराज शर्मा बचपन के बहाने अपने लेख में लिखते हैं-‘स्वास्थ्य के साथ शिक्षा भी सभ्य समाज के निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण अंग है।’ देवेंद्र मेवाड़ी का यात्रा कथा बड़ा ही रोचक बन पड़ा है। कहानी और कविताओं को पढ़कर टिप्पणी फिर कभी। कुल मिलाकर यह अंक ऐसा बन पड़ा है कि कोई भी बाल साहित्य प्रेमी इस अंक को अपने संग्रहणीय अंक से या अपनी निजी लाइब्रेरी से अलग नहीं कर सकता। हिमप्रस्थ से उम्मीद की जाती है कि वह इस आगाज़ को बनाये रखे। निरंतर अंकों में नियमित कुछ न कुछ बाल साहित्य सामग्री प्रकाशित करती रहे। 

पत्रिका: हिमप्रस्थ, मासिक
प्रधान सम्पादक: डाॅ॰ एम॰पी॰सूद
वरिष्ठ सम्पादक: यादविन्दर सिंह चैहान
सम्पादक: वेद प्रकाश
एक प्रति: 15 रुपए
सालाना शुल्क: 150 रुपए
पृष्ठ: 144
mail -himparasthahp@gmail.com
सम्पर्क: 0177 2633145, 2830374
मुखपृष्ठ एवं रेखांकन: सर्वजीत
प्रकाशक: निदेशक, सूचना एवंज न सम्पर्क विभाग,शिमला, हिमाचल प्रदेश।
समीक्षक: मनोहर चमोली ‘मनु’, सम्पर्कः 09412158688 
मेलः chamoli123456789@gmail.com

1 टिप्पणी:

यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।