8 अप्रैल 2019

सेहत के प्रति हम कितने गंभीर हैं बापू ! #महात्मा गांधी

भारत की एक पाती बापू के नाम  : 1

सेहत के प्रति हम कितने गंभीर हैं बापू !

-मनोहर चमोली ‘मनु’

परम पूज्य बापू को मेरा सलाम पहुँचे। उम्मीद करता हूँ कि आप जहाँ भी होंगे, मेरी तरह व्यथित न होंगे। बापू पत्र लिखने का ख़ास कारण कुछ नहीं है। बस ! पिछले दिनों कुछ घटनाएं घटी हैं, जिनकी वजह से मन आहत है। बापू वैसे तो आपके सामने ही मुझे अंग्रेजी दासता से मुक्ति मिल गई थी। पर, आप मेरा लिखित संविधान नहीं पढ़ सके। यूँ तो भारतीय संविधान में स्वास्थ्य के लिए अनुच्छेद 21 में उल्लेख मिलता है। इस जीने के अधिकार में ही स्वास्थ्य का अधिकार निहित है। बावजूद इसके, बावन साल बाद साल दो हजार दो में भारतीय चिकित्सा परिषद् को अपनी नीति और नियमावली में कुछ खास उल्लेख करने पड़े।

बापू आप होते तो इस मुद्दे पर ‘यंग इंडिया‘ या ‘हरिजन‘ में लेख लिखते। आप हैरान होते कि भारतीय अस्पतालों में धर्म, जाति, लिंग या आर्थिक आधार पर भेदभाव न करते हुए स्वास्थ्य सेवाएँ दी जानी चाहिए। हर भारतीय मरीज़ को सभी अस्पताल में आपातकालीन चिकित्सा लेने का हक़ है। कोई भी डाॅक्टर और अस्तपताल प्रशासन इमरजेंसी सेवा देने से मना नहीं कर सकता। हर मरीज़ को अपनी बीमारी जानने का हक़ है। मरीज़ के तीमारदारों को भी इलाज़ का ख़र्च, चिकित्सा अभिलेख, दवाईयाँ ,डाॅक्टर आदि के बारे में पूरी जानकारी पाने का अधिकार है।
यह सब भारतीय चिकित्सा परिषद् को अपनी नीति और नियमावली में क्यों जोड़ना पड़ा? सीधी-सी बात है कि यह सब नहीं है, सो हो, इसीलिए लिखना पड़ा।
बापू । मैं आबादी से दुनिया में चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा देश हूँ। लेकिन मैं लज्जा से झुका जा रहा हूँ। अपने नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने में कई छोटे देश मेरे से बहुत आगे हैं। मेरे कामचीन और नामचीन कहते रहते हैं कि देश झूकने नहीं देंगे। देश मिटने नहीं देंगे। लेकिन बापू । जब भी मैं बांग्लादेश, भूटान, चीन, श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों की ओर देखता हूँ तो ग्लानि से भर जाता हूँ। वे अपने नागरिकों को मुझसे बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ दे रहे हैं। छब्बीस जनवरी और पन्द्रह अगस्त को मेरे नामदार और कामदार भी जब यह कहते हैं कि उन्होंने मेरी छवि और साख दुनिया में शक्तिशाली देश के रूप में स्थापित कर दी है तो मैं भावुक हो उठता हूँ।
बापू। आप भी मेरी तरह दुःखी होंगे। मैं सेहत के मामले में दुनिया के 195 मुल्क़ों में 145 वें स्थान पर हूँ। आप चाहें भारत को सोने की चिड़िया कहते रहे। लेकिन आजादी के सत्तर सालों के बाद भी हमारे अधिकांश दल अपने घोषणा-पत्रों में वादे कर रहे हैं कि हर जिले में एक मेडिकल काॅलेज होगा। मतलब बापू । अभी तक मेरे 719 जिलों में यह नहीं है। क्या एक साल में 10 मेडिकल काॅलेज बहुत बड़ा लक्ष्य था? हास्यास्पद स्थिति तो यह है कि इसे भी 2022 तक खिसकाया जा रहा है।
बापू , जिस घटना से मन खिन्न था, उसका ज़िक्र करने का मन भी नहीं है। लेकिन आपको बताना ज़रूरी है। मलेरिया, चेचक, हैजा आदि बीमारी के बारे में तो आपको पता है। डेंगू बुख़ार एक संक्रमण है। डेंगू एक मच्छर है। डेंगू वायरस के कारण होता है और इसे हड्डी तोड़ बुख़ार भी कहते हैं। हम गंदगी पर काबू नहीं कर सके हैं। हर साल डेंगू से मेरे सैकड़ों नागरिक मर रहे हैं। सरकारी अस्पतालों की हालत इतनी खराब है कि मरीज प्राइवेट अस्पतालों में मजबूरी में जाते हैं। कुछ महीनों पहले एक अस्पताल में डेंगू पीड़ित सात साल की बच्ची का पन्द्रह दिन इलाज चला। बिल आया सोलह लाख रुपए। बच्ची बची भी नहीं। आज उस बच्ची के परिवार पर क्या बीत रही होगी। आप महसूस कर सकते हैं?
बापू आप ही बताइए। आपके सपनों का भारत यही था? क्या इस दिन के लिए आपने धोती-लाठी धारण की थी? एक दूसरा पहलू भी है। अभी पिछले साल की ही तो बात है। पहली बार एक साल में प्रसव के दौरान मरने वाले बच्चों की संख्या दस लाख से कम हुई है। आज भी दुनिया के 18 फीसदी बच्चे भारत में मरते हैं। पर क्या एक साल में दस लाख नवजातों का मरना दुःखदायी नहीं?
बापू , काश ! मैं मूर्त होता। बोल सकता। तो ज़रूर बोलता। ये जो मेरे नीति-नियंता बनते हैं न, उनसे पूछता कि सकल घरेलू उत्पाद का केवल 1.3 फ़ीसदी खर्च कर रहे हो? क्यों? क्या जीवन रक्षा से बड़ा कुछ ओर है? ऊँट के मुँह में जीरा ! ब्राजील जैसा देश 8.3 खर्च करता है। रूस 7.1 खर्च कर रहा है। अफ़गानिस्तान 8.3 खर्च कर रहा है। मालदीव 13.7 खर्च कर रहा है। नेपाल 5.8 खर्च कर रहा है। पड़ोसी पाकिस्तान का सेहत पर बजट हमसे अधिक है।
बापू ! देश में लगभग 15 लाख डाॅक्टरों की कमी है। एक हजार की आबादी पर एक डाॅक्टर होना चाहिए। मेरे सात हजार नागरिकों के लिए भी एक डाॅक्टर नहीं है। आप हमेशा से सेहत को सबसे बड़ी पूंजी मानते थे। बापू आपको याद है न। आजादी के समय में सौ में आठ अस्पताल निजी थे। आज स्थिति बेहद भयावह है। आज सौ में तिरानवे अस्पताल निजी हैं। 
बापू ! आप सोच सकते हैं कि जहाँ मुझे हर नागरिक को निःशुल्क इलाज दिलाना था, वहाँ उलट रोगी लाखों रुपए देकर भी अपनी जान नहीं बचा पा रहा है। क्या अस्पताल भी मुनाफा बटोरने वाली जगह बन गए हैं? हर साल मेरे चार करोड़ से अधिक नागरिक आम बीमारी की चपेट में आते हैं और बीमारी में इतना रुपया खर्च करते हैं कि अचानक गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। पूरी जिंदगी उबर नहीं पाते हैं।

बापू । मेरे नागरिक अपना जीवन स्तर कैसे ऊपर उठाएँगे ! अस्सी फीसदी परिवार की सालाना कमाई का आधा हिस्सा तो तीमारदारी में खप जाता है। हम बुलेट ट्रैन की वकालत करेंगे। पड़ोसी को उसके घर में घुसकर मारेंगे। पर अपने यहाँ साफ पानी के अभाव में होने वाली मौतों का ग्राफ कम नहीं कर पाएँगे। हम डेंगू से हार जाएँगे। हम प्रसव पीड़ा के दौरान जच्चा-बच्चा का जीवन बचाने में नाकम हो जाएंगे। हम युद्ध के हथियार खरीदने वाले सबसे बड़ा मुल्क बन जाएंगे। लेकिन प्रसवपूर्व आवश्यक तैयारी का सामान खरीदने के लिए बजट मुहैया नहीं करा पाएँगे। बापू ये विसंगति है या कोई साजिश? आप तो गाहे-बगाहे जंत्री दिया करते थे। कुछ जंत्री मुझे भी सुझाएँ। कैसे मेरे नागरिकों को साफ पीने का पानी मुहैया हो सके? कैसे सस्ती चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हों? क्या यह इतना मुश्किल है? क्या यह राज्य की ज़िम्मेदारी नहीं होनी चाहिए? बापू चेचक, पोलियो, कुष्ठ रोग जैसी बीमारिया लगभग समाप्त हो गई हैं। लेकिन कुपोषण, मलेरिया और तपेदिक से सौ मैं तीस मौतें आज भी हो रही हैं। कई संक्रामक रोग आज भी मुझे जकड़े हुए हैं।
भारतीय बैंकों में बचत खातों की संख्या चालीस करोड़ बताई जाती है। पर इससे क्या? अभी भी प्रति माह हर व्यक्ति को 10,000 रुपए की आय भी नहीं जुट सकी है। मेरे पास कुल 35416 सरकारी अस्तपताल हैं। इस तरह एक जिले में मात्र पचास अस्पताल भी नहीं हैं। औसतन एक जिले की आबादी सत्रह लाख के आस-पास है। अब आप ही बताइए कि सत्रह लाख नागरिकों के लिए पचास अस्पताल बहुत हैं? आप ही अंदाजा लगा लीजिए कि एक जिले के सत्रह लाख नागरिकों के लिए कितने डाॅक्टरों की ज़रूरत होगी? यह सब कैसे होगा? क्यों नहीं हो सकता?
बापू पत्र समाप्त करते-करते आपको यह भी बताना चाहूंगा कि मैं अपनी उन सभी माताओं को वे ज़रूरी टीके नहीं लगवा पा रहा हूँ जिनके लगने से जच्चा-बच्चा सुरक्षित रह सकें। सन् 2022 तक ऐसा हो सके, इसके लिए आपके पास कोई जंत्री हो तो बताना।
आपके जवाब की प्रतीक्षा में,

आपका अपना
भारत
॰॰॰

पत्र लेखक: मनोहर चमोली ‘मनु’

1 टिप्पणी:

यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।