8 अप्रैल 2019

पाप और अत्याचार की जननी है शराब

भारत की एक पाती बापू के नाम  : 3


आदरणीय बापू । मेरा प्रणाम आप तलक पहुँचे। आशा है सानंद होंगे। मैं यहाँ पर कुशल पूर्वक हूँ। यह लिखने का मन नहीं है।
आप अक्सर कहते थे,‘‘शराब पाप और अत्याचार की जननी है।’’ लेकिन बापू मेरे कई जिलों में आपके नाम से प्रेक्षागृह बने हुए हैं। उन्हीं प्रेक्षागृहों में शराब के ठेकों के टेण्डर हर साल होते हैं। आपके चित्र पीछे लगा रहता है और आगे कुर्सियों पर आला अफ़सर बैठकर शराब के ठेकों के ठेकेदार तय कर रहे होते हैं।

प्रिय बापू ! कहते हैं कि शराब बेचकर राज्यों को राजस्व मिलता है। वह राजस्व विकास के कामों पर खर्च होता है। पर बापू मैं आपकी नैतिकता को याद करता हूँ। आप तो कहते थे,‘‘पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।’’ यहाँ तो ठीक उलट स्थिति है। शराब पर प्रेम बरसाया जा रहा है और शराबियों पर लाठी भांज दी जाती है। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। यह कहाँ चरितार्थ हो रही है?
बापू। जैसे-जैसे दिन ढलता है मेरा दिल बैठता चला जाता है। अब तो दिन-रात का अन्तर भी कहाँ रह गया है? ऐसे कई महानगर हैं जो कभी सोते ही नहीं। ऐसी हजारों शराब की दुकानें हैं जिनके किवाड़ के पट कभी बंद नहीं होते। हैरानी तो इस बात की है कि इन शराब की दुकानों में आने वाले किसी मन्दिर,मस्जिद,गुरुद्वारे और चर्च के अनुयायियों से कम नहीं हैं। कुछ तो ऐसे हैं कि जिनकी सुबह शराबखाने से ही शुरू होती है। ऐसे भी हैं जिनकी रात की सुबह कभी होती ही नहीं।
बापू जब आप जीवित थे तो नशा मुक्ति की ख़ूब बात किया करते थे। तब मेरे लोगों में एक ही जुनून था-दासता से मुक्ति। वह मिल गई। लेकिन शराब की गुलामी में मेरे लोग जकड़ते जा रहे हैं। शराब के प्रचलन को जैसे सामाजिक स्वीकृति मिल गई हो।
बापू आप तो कहते थे कि आदर्श रामराज्य की तरह आपके सपनों के भारत में जनता को पोषक भोजन मिले। सम्मानजनक जीवन निर्वाह के अवसर मिले। सेहत में सुधार हो।
बापू आपके नशा मुक्ति अभियान को ध्यान में रखते हुए मेरे संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद सेंतालीस में साफ उल्लेख किया है। वह यह है-राज्य अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कत्र्तव्यों में मानेगा और राज्य,विशिष्टतया मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के, औषधिय प्रयोजनों से भिन्न, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा।’
मुझे दुःख के साथ लिखना पड़ रहा है कि बापू ऐसा कोई प्रयास धरातल पर नहीं दिखाई देता। आपने कहा था,‘‘जो राष्ट्र शराब की आदत का शिकार है, उसके सामने विनाश मुँह बायें खड़ा है। इतिहास में इसके कितने ही प्रमाण हैं कि इस बुराई के कारण कितने ही राष्ट्र मिट्टी में मिल गए।’’ लेकिन बापू मुझे दुःख है कि हम इतिहास से भी सबक नहीं लेना चाहते।
आजादी के इकहत्तर साल बाद भी मैं मलेरिया से मुक़्त नहीं हो पाया हूँ। आपने एक बार कहा था,‘‘मद्यपान एवं अन्य नशीले पेयों का व्यसन अनेक दृष्टियों से मलेरिया एवं ऐसे ही अन्य रोगों से उत्पन्न व्याधि से भी बुरा है। क्योंकि जहाँ मलेरिया आदि से केवल शरीर को ही क्षति पहुंचती है वहां मद्यपान से शरीर एवं आत्मा दोनों ही क्षतिग्रसत होते हैं।’’
बापू ,जब आप ज़िन्दा थे तब मेरे नागरिक छत्तीस करोड़ थे। आज ये एक सौ पचास करोड़ होने वाले हैं। यदि सौ के सिर पर चोट लगी है तो बीस से अधिक चोटें शराब की वजह से लगती हैं। सौ में पैंतीस आत्महत्या का कारण शराब होती है। चालीस फीसदी दुर्घटनाएं शराब के नशे की वजह से होती हैं। हर साल मेरे तेंतीस लाख नागरिक शराब की वजह से दम तोड़ देते हैं। सड़क हादसों में शराब की वजह से हर साल एक लाख अड़तीस हजार नागरिक मारे जाते हैं। पति द्वारा घरेलू हिंसा के मामलों में सत्तासी फीसदी मामलों में शराब प्रमुख वजह है।
बापू , काश ! मैं भी इंसानों की तरह शराब चख सकता। मैं भी देखता कि इस शराब में ऐसा क्या है कि मेरे अधिकतर राज्यों का राजस्व इस पर निर्भर होता जा रहा है। मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूँ कि आज अरबों रुपए का राजस्व यदि शराब से इकट्ठा हो रहा है तो उस रुपयों से किया गया विकास मुझे क्यों नहीं दिखाई दे रहा? आपको दिखाई दिया तो मुझे भी बताना।
आपका प्रिय 
भारत
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पत्र लेखक: मनोहर चमोली ‘मनु’

 #महात्मा गांधी

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