01/06/2012

'तुम हो प्राण'......Kavita

'तुम हो प्राण'

___________

केश तुम्हारे बरगद की छाँह

देते मुझको छाया
जब भी झुलसा जीवन में
आराम यहीं तो पाया
धुंधलाता है जीवन जब भी
छाती है निराशा
आशाओं की भोर लाकर
तुमने मुझे जगाया
जब भी भूखा प्यासा तड़फा
आया मुझको रोना
तुमने पुकारा बाँह फैलाईं
मुझको गले लगाया
जब भी उधड़ा मन का कोना
और फट जाता मैं
प्यार की तुलपन कर कर के
तुमने मुझे सजाया
मानव हूँ तो मन में आते
बारम्बार विकार
मानस हो भलमानस बनना
तुमने मुझे चेताया
जब भी मुझको तुमने पुकारा
दौड़ के मैं हूँ आया
मेरे प्राण बसे हैं तुम पर
मुझको बोध कराया।
__________
-मनोहर चमोली ‘मनु
_________

मेल-manuchamoli@gmail.com । ब्लाॅग लिंक है- http://alwidaa.blogspot.in

6 टिप्‍पणियां:

यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।