22/10/2016

उत्तराखण्ड और बाल साहित्यकार manohar chamoli manu child literature

उत्तराखण्ड और बाल साहित्यकार

-रमेश चन्द्र पंत

राष्ट्रीय परिदृश्य में देखें, तो इस बीच बाल साहित्य ने अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है। एक समय था कि बाल साहित्य को बचकाना साहित्य से अभिहीत किया जाता था, किन्तु आज बड़ों के लिए अनेक वरिष्ठ एवं स्थापित साहित्यकारांे ने भी बाल साहित्य एवं रचनाधर्मिता से समृद्ध किया है। खड़ी बोली का विकास होने से पूर्व यह वर्षतः लोककथाओं, लोकगीतों एवं पहेलियों आदि के माध्यम से विभिन्न स्थानीय बोलियों में प्रस्फुटित होता रहा है। बाल साहित्य का उद्देश्य बाल मन का अनुरंजन होता है, तो किसी न किसी रूप में उसके व्यक्तित्व का विकास भी करना होता है। बालक के अन्तर्मन में मानवीय मूल्यों का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से बीजारोपण कर बाल साहित्य उच्चतर जीवन आदर्शों की ओर प्रेरित भी करता है।
श्रेष्ठ बाल साहित्य में किसी न किसी रूप में बच्चांे की विभिन्न मनोस्थितियों की अभिव्यक्ति होती है। उनकी रुचियों, छांव-आकांक्षाओं का अंकन या चित्रण होता है। विगत 2-3 दशकों में देखा जाए, तो हमारे सामाजिक जीवन में महत्तर परिवर्तन हो रहे हैं। इस परिवर्तन ने बाल मन को भी प्रभावित किया है। वैज्ञानिक प्रगति से कहीं न कहीं सोच में भी क्रान्तिकारी परिवर्तन आया है। बच्चों की बुद्धिलब्धि भी अकल्पनीय रूप से उच्चतर हुई है। प्रश्न उठता है, क्या समसामयिक सन्दर्भों के अनुरूप, बाल साहित्य भी परिवर्तित हो पाया है या कहें कि आधुनिक परिवेश के अनुरूप क्या बाल मन की अभिव्यक्ति संभव हो पाई है? उत्तर निश्चित ही ‘हां’ में है। बाल साहित्य ने इन सभी दृष्टियों से अपनी सार्थकता सिद्ध की हैै।
जहां तक उत्तराखण्ड में बाल साहित्य का प्रश्न है, तो परिदृश्य यदि अत्यन्त समृद्ध नहीं, आश्वस्तकारी तो है ही। आज हमारे मध्य अनेक ऐसे वरिष्ठ एवं युवा रचनाकार उपस्थित हैं, जिन्होंने अपनी महत्वपूर्ण रचनाधर्मिता के द्वारा राष्ट्रीय फलक पर एक ऐसी विशिष्ट पहचान बनाई है।
डाॅ.दिनेश चमोला ‘शैलेश’ इसमें एक महत्वपूर्ण नाम हैं। एक प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार के रूप में अपने बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भरपूर साहित्य का सृजन उन्होंने किया है। बच्चों के लिए 6 कविता संग्रह के साथ-साथ कहानियों की 44 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘टुकड़ा-टुकड़ा संघर्ष’ एवं ‘एक था राॅबिन’ बाल उपन्यास है। ‘पर्यावरण बचाओ’ एकांकी संग्रह। डाॅ.चमोला की रचनाओं में बाल मन की सहज स्वाभाविक उपस्थिति है। ‘‘गायें गीत ज्ञान-विज्ञान के लिए’ साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है। गीत एवं गजल केे लिए प्रख्यात डाॅ.अश्वघोष ने भी बच्चों के लिए काफी कुछ सार्थक एवं महत्वपूर्ण साहित्य रचा है। डाॅ.अश्वघोष में बाल मन के भीतर उतरने की अद्भुत सामथ्र्य है। ‘राजा हाथी’ एवं ‘वाइस्कोप निराला’ की कविताएं इसका प्रमाण हैं।
मुकेश नौटियाल की कहानियां, बच्चों के निर्मल एवं निश्छल मन की कहानियां हैं। लोकतत्व की उपस्थिति ने मुकेश नौटियाल की कहानियों को एक अतिरिक्त शक्ति दी है। समकालीन बाल साहित्य में आज यह गायब होता जा रहा है। आज इसे सहेजने की आवश्यकता है। बाल एवं किशोर वय बच्चों के लिए ‘हिमालय की कहानियांॅ’ संग्रह के अतिरिक्त ‘रूम टू रीड’ इंडिया, शैक्षणिक गतिविधियों के लिए समर्पित संस्था द्वारा कहानियों की चार चित्रात्मक पुस्तिकाएं प्रकाशित हो चुकीं हैं।
कहानियों के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण नाम है-मनोहर चमोली ‘मनु’। बाल साहित्य में एक दृष्टिसम्पन्न आलोचक के रूप में भी मनोहर चमोली ‘मनु’ ने एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है। बाल साहित्य के नाम पर इन दिनों काफी कुछ ऐसा लिखा जा रहा है, जिसकी कोई प्रांसंगिकता एवं उपादेयता नहीं। इन्हे प्रश्नांकित करना, आज के समय की जरूरत है और मनोहर चमोली ‘मनु’ इसे बखूबी कर रहे हैं। उनकी कहानियां भी नए भागों की महत्वपूर्ण कहानियां हैं। ‘अंतरिक्ष से आगे बचपन’ एवं ‘जीवन में बचपन’ कहानी संग्रह में इसे देखा जा सकता है। ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ एवं ‘पूछेरी’ नेशनल बुक ट्रस्ट दिल्ली से तथा ‘चाॅंद का स्वेटर’ ‘बादल क्यों बरसता है, ‘रूम टू रीड’ इंडिया द्वारा प्रकाशित चित्रात्मक पुस्तिकाएं हैं।
बाल साहित्य में रचनाकारों द्वारा नाटक एवं एकांकी कम ही लिखे जा रहे हैं। इस दृष्टि से महावीर रंवाल्टा ने अपनी समर्थ लेखनी के द्वारा एकांकी एवं कहानियों के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया है। ‘विनय का वादा’ कहानी संग्रह है।
शशि भूषण बडोनी की कहानियों में यथार्थ कहीं अधिक मुखर वाला बच्चों के जीवन के आस-पास, जो कुछ भी प्रिय-अप्रिय घट रहा है, उसे कहानी का रूप देना बडोनी की कथाओं की अपनी विशेषता है। कहानियां बच्चों को कहीं न कहीं बेहतर ढंग से जीने के लिए प्रेरित करती हैं। ‘लौटती मुस्कान’ 14 कहानियों का महत्वपूर्ण संग्रह है।
कविता हो या कहानी, दोनों ही विधाओं में बच्चों के मनोकूल नया, अर्थपूर्ण एवं मौलिक लिखने वालों में एक महत्वपूर्ण नाम है रविन्द्र रवि का। लीक से हटकर कुछ सार्थक लिखने की अपनी ही शैली है रवि की। सभी कुछ बच्चों की दृष्टि से देखने की कोशिश करते हैं वे और यही उन्हें बाल साहित्य के एक सफल रचनाकार के रूप में स्थापित करती है। ‘अधूरा सपना’ रतन सिंह किरमोलिया का कहानी संग्रह है। संग्रह में संकलित कहानियां, बच्चों में रचनात्मक ऊर्जा का संचार करने की दृष्टि से उपयोगी हैं। ‘गीते रसीले बच्चपन के’ एवं ‘बासन्ती गीत’ कविता संग्रह है।
‘राज बाल तरंगिणी’, ‘ममता बाल तरंग’, ‘ममता बाल वाटिका’, ‘ममता बाल चन्द्रिका’ एवं ‘ममता पद्य कथाएं’, ‘कभी सिखाएं कभी हसाएं’ राज किशोर सक्सेना ‘राज’ की प्रकाशित कविता संग्रह हैं। बाल मन की रुचियों के अनुरूप राज का रचना संसार अत्यन्त विस्तृत एंव वैविध्यपूर्ण है। बच्चों को मूल्यों के प्रति प्रेरित एवं उद्बोधित करने की दृष्टि से इन संग्रहों में प्रकाशित कविताओं की अपनी उपयोगिता है।
डाॅ.प्रीतम सिहं नेगी ‘अपछ्यांण’ ने बाल कविता के क्षेत्र में अभिनव प्रयोग किया है। बेटे पुलक पार्वत्य नेगी के द्वारा बनाए गए चित्रों पर उन्होंने बाल मन के अनुरूप सरस कविताओं की रचना की। ‘मेरी रचना’ कविता संग्रह इसी का प्रतिफल है
डाॅ.लक्ष्मी खन्ना ‘सुमन’ ने भी कविता, कहानी एवं उपन्यास द्वारा बाल साहित्य को अत्यन्त समृ( किया है। वरिष्ठ रचनाकार डाॅ.योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अक्षण’ की रचना धर्मिता भी अच्छे संस्कार एवं नैतिक मूल्यों के प्रति प्रेरित करती है। डाॅ.सुरेन्द्र दत्त सिमल्टी के कविता संग्रह भी प्रकाश में आ चुके हैं। ‘मीठे जामुन’ दय किरोला, ‘मेरा भारत देश महान’ विमला जोशी, ‘जीवन है अनमोल’ आनन्द सिंह बिष्ट के कविता संग्रह। ‘क्यों बोलते हैं बच्चे झूठ’ शशांग मिश्र ‘भारती’ का निबन्ध संग्रह है। अतुल शर्मा, रतन सिंह जौनसारी, विपिन बिहारी ‘सुमन’ एवं प्रभा किरण जैन की कृतियों ने भी उत्तराखण्ड के हिन्दी बाल साहित्य को दिशा दी है। ‘फूल’ डाॅ.उमेश चमोला एवं ‘बाल मन की सतरंगी कविताएं’, नवीन डिमरी ‘बादल’ कविता संग्रह भी इस दृष्टि से उलेखनीय है। डाॅ.नंदकिशोर हटवाल की कहानियों ने भी बाल साहित्य में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज की है।
उत्तराखण्ड के रचनाकार जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हिन्दी बाल साहित्य में अपनी रचना धर्मिता को रेखांकित कर रहे है, उनमें आशा शैली, डाॅ.प्रभा पंत, डाॅ.दीपा कांडपाल, के.रानी, डाॅ.पीताम्बर अवस्थी, वीणापाणी जोशी, रूप चंद्र शास्त्री, विनीता जोशी, मंजू पाण्डे, नीरज पंत, मोहन चंद्र पाण्डे, महेन्द्र प्रताप पाण्डे, सत्यानन्द बडोनी, शम्भू प्रसाद भट्ट ‘स्नेहिल’, भारती पाण्डे, हर प्रसाद रोशन, खुशाल सिंह, भगवत प्रसाद पांडे, गोकुलानन्द किमोठी, कालिका प्रसाद सेमवाल, डाॅ.यशोदा प्रसाद सिमल्टी आदि प्रमुख हैं।
स्पष्ट है कि इस समय विशेष में उत्तराखण्ड में सृजनरत अधिकांश रचनाकार महज कविता एवं कहानियों तक ही सीमित हैं। बाल साहित्य की अन्य विधाओं के प्रति रचनाकार उदासीन हैं। वैज्ञानिक सोच का विकास करने वाली रचनाएं भी कम ही लिखी जा रही हैं, जबकि आज जरूरत है कि इस दिशा में कुछ सार्थक सोचने व करने की।
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(मूल आलेख: प्रसिद्ध बाल साहित्यकार रमेश चन्द्र पंत, रीजनल रिपोर्टर, मासिक पत्रिका, अक्तूबर 2016)

-मनोहर चमोली ‘मनु’ मोबाइल-09412158688


मेल - chamoli123456789@gmail.com

1 टिप्पणी:

यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।