07/10/2016

पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन बसा है मल्यो की डार में

पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन बसा है मल्यो की डार में

-मनोहर चमोली ‘मनु’

सुपरिचित लेखिका, संस्कृतिकर्मी, एक्टीविस्ट, जनांदोलनकारी गीता गैराला की किताब ‘मल्यो की डार’ महज़ एक रचनाधर्मिता का उदाहरण नहीं है। इस बहा
ने लेखिका बड़ी आसानी से और स्थाई तौर पर पाठक के अंतस में पहाड़ और खासकर पहाड़ी स्त्री के जीवन का समूचा रेखाचित्र अविस्मरणीय ढंग से अंकित करने में सफल हुई है।
160 पेज, डिमाई आकार, सुरक्षित कागज़, उम्दा छपाई, अक्षरों की बुनावट आँखों को भा जाने वाली है। अठारह संस्मरणनुमा रचनाएँ जो रवानगी के साथ-साथ पाठक के मन-मस्तिष्क में आसानी से पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोक जीवन के आम पात्रों का चित्रण करने में सफल हुई हैं। बचपन को याद करते हुए बचपन का खिलंदड़पन यहां पढ़ने को मिलता है। लोक जीवन के साथ-साथ मास्टर जी का जीवंत चित्रण पूरे रेखाचित्र के साथ उभरा है। यह किताब लेखिका ने अपने जन्म स्थल भट्टी गाँव को समर्पित की है।
उन्हीं के शब्दों में-’भट्टी गाँव के पेड़-पौधों, पौन,पंछियों, ठुल दादी, दादी-दादाजी, माँ,चाचियों और भूली बिसरी सब सहेलियों के लिए जन्हें (जिन्हें) मैं साँस के साथ जीती हूँ।’
'ठीक ही कहती थी दादी हम बस मल्यों की डार ही तो हैं। चरने के लिए मैदानों की तरफ उड़ गए। पर मल्यो तो केवल जाड़े में भावर जाते हैं, घाम तापने। शीत रितु खत्म होते ही अपने डेरों में लौट आते हैं। ये हैं असली प्रवासी। हम खुद को प्रवासी किस मुंह से कहते हैं, हम भगोड़े हैं, भगोड़े, जो एक गए और दुबारा पलट के नहीं लौटे।’
यहां डार का अर्थ,प्रसंग और सन्दर्भ ही बदल गया। वाह! खैर समूची पुस्तक पठनीय है।
अठारह रचनाओं में विविधता है। यादें हैं। बचपन है। भोलापन है। माता-पिता के संस्कार दिखाई देत हैं। परवरिश के तौर-तरीके दिखते हैं। बचपन की मस्ती और मासूमियत में पाठक मुस्कराता है। ऐसे कई अवसर आते हैं कि पाठक भी लेखिका के भीतर जमी गहरी भावनात्मक संवेदनाओं के साथ खुद को खड़ा पाता है।
पहाड़, पहाड़ी स्त्री, लोकजीवन, जीवन के कष्ट, दुःख-दर्द, पीड़ाएँ, रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी दिक्कतें-संकट, भूख, घर में आम रोटी को मयस्सर घरेलू महिलाओं की दिनचर्या, पानी-घास-लकड़ी के साथ जूझता समूचा पहाड़ी जीवन और उसके घेरे में घूमती-घुमाती स्त्री। एक संघर्ष गाथा यहां पढ़ते हुए देखने को मिलती है।
एक हजार छःह सौ मीटर की ऊँचाई से अधिक के पहाड़ी जीवन को करीब से जानने वाला पाठक खुद-ब-खुद लेखिका के साथ यात्रा पर निकल पड़ता है। पहाड़ की फसलें, जंगली फल, खेत, लोकजीवन की रामलीला, गांव के शादी-ब्याह, पहाड़ की परम्पराएं, संगीत, गीत बारात, संस्कृति को लेखिका ने न जाने कब अपनी आंखों से इतना करीब से देखा। ऐसे जीवट और सूक्ष्म अनुभव ही किसी रचनाकार की रचनाओं में प्राण से फूंक देते हैं।
बहुत सारी खासियतों के साथ पाठक को कभी-कभी लेखिका जिद्दी भी दिखाई दे सकती है। कहीं-कहीं लेखिका भी मानवीय दुर्बलताओं के साथ खड़ी दिखती है। यह स्वाभाविक भी है। मास्टर जी अंथवाल के साथ-साथ नजीब दादा हर पाठक को अवश्य भाएगी। दोनों चरित्र समाज के आम चरित्र हैं।
एक ओर मास्टर जी स्कूल का, पढ़ाई का, गांव का पूरा माहौल बदलते हैं तो वहीं गंगा-जमुनी की संस्कृति का प्रतीक बने नजीब दादा समरसता, प्यार-मुहब्बत के पर्याय बन जाते हैं।
भूमिका प्रख्यात कथाकार सुभाष पंत ने लिखी है। उन्हीं के शब्दों में कुछ शब्द-‘जब उस अनचाही ठेट लड़की ने काॅपी पर स्याही से लिखना शुरु किया तो उसकी उंगलियां स्याही से नीली हो गई। बार-बार धोने के बाद भी, वह स्याही छूटती नहीं थी। मुझे लगता है कि वह स्याही उसकी उंगली से अब तक नहीं छूटी। छूट जाती तो ‘मल्यो की डार’ जैसी अनूठी रचना का जन्म नहीं होता।’
बतौर लेखिका गीता गैरोला लिखती हैं-‘जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है हर व्यक्ति अपने बचपन की तरफ बार-बार लौटता है, तो क्या मैं भी उम्र बढ़ने के साथ अपने बचपन की तरफ बार-बार लौटती हूं। बीते हुए लम्हों को फिर से जीने के लिए। नहीं जानती सच क्या है? पर मैंने उन सब यादों को लिखने की कोशिश की है।’
भाषा शैली बेहद सरल सहज है। कहीं-कहीं वह विस्तार लेती है। कहीं भावपूर्ण हो जाती है तो कहीं चुटीले अंदाज में पाठक को एकाग्र रखने में सफल रहती है। पहाड़ी शब्दों से लेखिका ने परहेज नहीं किया है।

सरलता इतनी कि ऐसे लगता है कि पाठक अपने आस-पास ही सारा वृतांत घटता हुआ देखकर पढ़ रहा हो। मल्यो की डार, वहीं पर पड़ा है समय, घने कोहरे के बीच, देवता का खेल, कुणाबूड, मेरे मास्टर जी, प्यारे चक्खू, कोटे की फंकी, नजीब दादा, चैमास, बिजी जा, स्याही की टिक्की, ओ ना मासी धंग, मौसम सुहाना है, एक रामलीला ऐसी भी, सामूहिकता का रिवाज, नखलिस्तान, गांव की तरफ शीर्षक से ही जाना जा सकता है कि इस एक पुस्तक में कितने रंग हैं।
कहन, शैली, भाव और तेवर के कुछ उदाहरण आपकी नज़र-
‘अचानक में ‘उई’ कह कर बैठ गई। उनीन्दी दादी को झकझोर कर बोली,‘‘दादी उठ तू अभी मेरी दो चोटी बना दे, सुबह चोटी बनाने में प्रभात फेरी के लिए देर हो जाएगी।’’ मेरा उतावलापन देा दादा जी जोर से हंसे और बोले, ‘‘बेटा अगर दादी तेरे बाल अभी बना देगी तो रात भर सोने के बाद सुबह तक बाल खराब हो जाएंगे। तू मुझ पर विश्वास करती है न, सो जो। मेरी चखुली (चिड़िया) सुबह तुझे जल्दी से उठा दूंगा। पभात फेरी में सबसे आगे तू ही झंडा उठाकर चलेगी।’’--- ’
‘मैं जब कभी बीमार होती, बड़ी दादी मेरी गुदगुदी पीठ में एक धौल जमा कर कहती,‘‘अरे इस गदोरी का कुछ नहीं होगा। लड़कियां जीने के मामले में बड़ी छित्ती होती हैं।’’---’
‘दूसरे प्रकार के मास्टर ऐसे होते कि मास्टर जी की बेंत हाथों पर पड़ती या पीठ पर, गहरी नीली लकीर उभर आती। पर हम आंखों के आंसू बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर पाते। गलती से आंसू बह गये और मास्टर जी ने देख लिया तो दूसरी बेंत लगनी निश्चित होती।----’
‘उनके हर काम में एक संगीतमय लय और रिदम होती। हम सब उनके चलने-बोलने, गाने-नाचने, काम के तरीकों की नकल करके उन्हें दिखाते। मास्टरजी हमारी नकल पर खूब हंसते और कमी होने पर सुधार करवाते। देखो मैं ऐसे नहीं, ऐसे चलता हूं। ऐसे गाता हूं, ऐसे बोलता हूं।---’
मल्यों टिहरी में मळयो (काले-सांवले जंगली कबूतर) कहलाए जाने वाले से जुड़ा शब्द और उसके साथ डार। मल्यों की डार किताब का शीर्षक चैंकाता है। कभी खेती किसानी में ये जंगली कबूतर अनगिनत झुण्ड के साथ फसल पर टूट पड़ते थे। कोदा,झंगोरा क्या और मुंगरी क्या या फिर खलिहान में रखी फसल क्या। चट कर जाते थे। तब इन्हें डार गाली की तरह देखा जाता था। यह प्रवासी पक्षी के तौर पर देखे जाते हैं। हालांकि ये पक्षी अधिकतर समय पहाड़ में ही बिताते हैं लेकिन घरेलू कतई नहीं है। पाठक मल्यों की डार को इस तौर पर भी आसानी से समझ सकते हैं कि स्वयं लेखिका ने एक जगह उल्लेख किया है-‘जब हम बहनें स्कूल जाती वो कहती ‘‘हे राम। चलगी मेरी मल्यों की डार।’’ उस दिन मल्यो भगाने के बाद मैंने पूछा-‘‘दादी तू हम बहनों को भी तो मल्यो की डर कहती है।’’ ‘‘हां बाबा, बेटियां मल्यों की डार ही होती है। अपने मैत में चार दिन रुकी और फिर चल देती हैं दूसरे मुलुक।’’
पुस्तक मल्यों की डार में आँचलिक शब्दों का वहीं पर कोष्ठक में देना बाधा पहुंचाता है। पाठक संदर्भ के साथ उनके अर्थ खोज लेते हैं। बेहद ठेट शब्दों की सूची नीचे या अंत के एक दो पेजों पर दी जा सकती थी। वहीं के वहीं देने पर कहीं-कहीं पठन के आनंद को कम महसूस किए जाने का अंदेशा होता है।
प्रथम संस्करण अजिल्द, 2015 है। मूल्य दो सौ रुपए है। आवरण चित्र प्रख्यात घुमंतू पत्रकार, छायाकार कमल जोशी जी का है। लेखिका चाहती तो पहाड़ और पहाड़ी जीवन से संबंधित कुछ जीवंत चित्र भी पुस्तक में शामिल कर सकती थीं। यदि कुछ चित्र शामिल होते तो वह चित्र किताब की यात्रा को ओर जीवंत कर देते। बहरहाल कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह किताब पाठकों को एक चिर-परिचित दुनिया में ले जाती है। कई अनुभूतियों का आस्वाद कराती है। ***
पुस्तक : मल्यो की डार
लेखिका : गीता गैरोला
सम्पर्क : 9412051745
मेल : gairolageeta11@gmail.com
मूल्य: 200 रुपए
पेज: 160
प्रकाशक : समय साक्ष्य, 15 फालतू लाइन, देहरादून 248001
दूरभाष : 0135-2658894
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-मनोहर चमोली ‘मनु’भितांई,पोस्ट बाॅक्स-23पौड़ी 246001मेल - chamoli123456789@gmail.com

2 टिप्‍पणियां:

  1. इन्हीं गर्मियों में गढ़वाल घूमकर आई थी.गीता की पुस्तक ने एक बार फिर पहाड़ पहुंचा दिया, किन्तु इस बार अलग अलग काल खण्डों के पहाड़. हम जैसे प्रवासियों को इसे पढ़ पहाड़ की और अधिक नराई/खुद लग गयी.
    मनोहर चमोली की समीक्षा बहुत अच्छी है.मैं भी गढ़वाली शब्दों के अर्थ पुस्तक के अंत में चाहती हूँ. आशा है एक और संस्करण आएगा और उसमे यह बदलाव होगा.
    कमल से सहमत. यह पुस्तक ,'भूले जा रहे पहाड़ी जीवन शैली और पात्रों पर, परम्पराओं पर ( एक महत्वपूर्ण) दस्तावेज है.

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यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।