01/11/2010

बाल कथा -................. चाँद का शॉल

आसमान में बादल छाए हुए थे। सावन के बादलों की गड़गड़ाहट सुनकर नन्ही चींटी रोने लगी।

तितली ने पूछा तो चींटी ने सुबकते हुए कहा-‘‘अब बारिश आएगी। चांद का क्या होगा? वो तो भीग जाएगा न। फिर सर्दियां आएंगी, बेचारा ठिठुरता ही रह जाएगा।’’

तितली ने हंसते हुए कहा-‘‘तो यह बात है। कोई बात नहीं चांद के लिए छतरी और शॉल का इंतज़ाम हो जाएगा।’’

चींटी ने होते हुए कहा-‘‘सच्ची। आप कितनी अच्छी हैं। ये तो मज़ा आ गया। चलो फिर चांद के पास चलते हैं। छतरी और शॉल लेकर।’’

तितली सोच में पड़ गई। फिर तितली भी रोने लगी। एक भेड़ ने दोनों का रोना सुना। पूछा तो उसे भी सारे मामले का पता चल गया। भेड़ ने कहा-‘‘तुम्हारा रोना भी सही है। मुझे भी रोना आ रहा है। मगर रोने से क्या होगा। कुछ सोचते हैं।’’

तीनों को रोता देख मकड़ी रानी आ गई। मकड़ी रानी के पूछने पर भेड़ ने सारा क़िस्सा उसे भी बता दिया।

मकड़ी रानी ने कहा-‘‘भेड़ तुम अपनी ऊन दे दो। मैं ऊन से चांद के लिए शाल बुन देती हूं।’’ भेड़ ने ख़ुशी-ख़ुशी अपने बदन से ढेर सारी ऊन निकालकर दे दी। मकड़ी रानी ने पलक झपकते ही सुंदर ऊन बुनकर नन्ही चींटी को दे दी।

चींटी फिर रोने लगी। कहने लगी-‘‘चांद के लिए छाता भी तो चाहिए।’’ मकड़ी ने कहा-‘‘इतना बड़ा छाता कहां से आएगा। अगर कोई मुझे चांद पर पहुंचा दे तो मैं चांद के चारों ओर ऐसा जाला बुन दूंगी कि वो भीगने से बच जाएगा।’’

तितली ने हिम्मत से काम लिया। वह बोली-‘‘तो ठीक है मकड़ी रानी। तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ। हम दोनों चाद को शॉल भी दे आएंगे और तुम वहां चांद के लिए छतरी भी बुन देना।’’

मकड़ी रानी तैयार हो गई। तितली ने मकड़ी रानी को पीठ पर बिठाया। मकड़ी ने शॉल को कस कर पकड़ लिया। दोनों आसमान की ओर चल पड़े। उन्हें आसमान में उड़ता देखकर नन्ही चींटी ताली बजाने लगी। भेड़ उछल-उछल कर नाचने लगी।
मनोहर चमोली 'मनु'
पोस्ट बॉक्स-23, पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड - 246001 मो.- 9412158688
manuchamoli@gmail.com

2 टिप्‍पणियां:

यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।