02/11/2010

धनदान नहीं श्रमदान- .......प्रेरक प्रसंग

प्रसिद्ध सेवाग्राम आश्रम बन रहा था। यह आश्रम वर्धा से पाँच मील दूरी पर था। हर कोई सेवाग्राम आश्रम बनाने में सहयोग करना गौरव की बात मान रहा था। गांधीजी सेवाग्राम स्थल पर ही झोपड़ी बना कर रह रहे थे। कई लोग शाम को वापिस वर्धा लौट जाते। वर्धा से आश्रम स्थल आने-जाने का रास्ता बेहद ख़राब था। कहीं ऊबड़-खाबड़ तो कहीं ऊँचा-नीचा।

एक दिन की बात है। किसी ने कहा-‘‘बापू। यदि आप प्रशासन को एक पत्रा लिख दें, तो ये रास्ता ठीक बन सकता है।’’ अन्य लोगों ने भी इस सुझाव का समर्थन किया। गांधी जी ने मुस्कराते हुए कहा-‘‘प्रशासन को लिखे बग़ैर भी ये रास्ता ठीक हो सकता है।’’ कोई समझ नहीं पाया। गांधी जी बोले-‘‘यदि हर कोई वर्धा से आते-जाते समय इधर-उधर पड़े पत्थरों को रास्ते में बिछाता जाए तो रास्ता ठीक हो सकता है।’’

अगले दिन से यह काम शुरू हो गया। आते-जाते समय लोग पत्थरों को रास्ते के लिए डालते और गांधीजी उसे समतल करते जाते। देखते ही देखते रास्ता बनने की स्थिति में आने लगा।

गांधीजी के एक प्रशंसक थे। बृजकृष्ण चाँदीवाल। वे भी आश्रम देखने आए। उनका शरीर काफ़ी भारी था। पाँच मील का ख़राब रास्ता तय करते हुए हांफते हुए चाँदीवाल किसी तरह आश्रम पंहुचे। गाँधीजी आदत के अनुसार उन्हें आदर से बिठाने लगे। बृजकृष्ण चाँदीवाल अपना पसीना पोंछते हुए गाँधीजी से बोले-‘‘क्या दो-दो पत्थरों को इधर-उधर करने से ये रास्ता बन जाएगा? यदि आप रास्ते का काम प्रशासन से नहीं करवा सकते तो बताइए, इस रास्ते के लिए कितने धन की आवश्यकता है? मैं ही दे दूंगा।’’

गाँधी जी मुस्कराते हुए बोले-‘‘आपके दान से हमें लाभ होगा। लेकिन धनदान नहीं, हमें आपका श्रमदान चाहिए। बूंद-बूंद से घड़ा भरता है। यदि आप हमारे साथ जुड़ेंगे तो इसके तीन फायदे होंगे। एक तो हमारा आश्रम ठीक होगा। दूसरा आपका धन बचेगा। तीसरा आपका मोटापा कम होगा और आप निरोगी भी हो जाएंगे।’’

यह सुनकर चाँदीवाल ठहाका मारकर हँसने लगे। वे समझ गए कि गांधी जी धन की जगह सहयोग और श्रमदान को अधिक महत्व देते हैं।


मनोहर चमोली 'मनु'
पोस्ट बॉक्स-23, पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड - 246001 मो.- 9412158688
manuchamoli@gmail.com

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