28/06/2017

पढ़ने-लिखने की संस्कृति की ओर.... का तीसरा दिन child literature

पढ़ने-लिखने की संस्कृति की ओर.... का तीसरा दिन

बच्चों को नागरिक के तौर पर देखें

-मनोहर चमोली ‘मनु’

तीसरे दिन के पहले सत्र का आरंभ खजान सिंह ने किया। उन्होंने कहा कि पिछले दो दिन बेहद खास रहे हैं। हम जिन बातों से, यादों से और घटनाओं से खुद को समृद्ध करते हैं उसके लिए ऐसे आयोजन मील का पत्थर साबित होते हैं। उन्होंने कहा कि पहले दिन आपसी परिचय में हम एक-दूसरे को पहचान रहे थे। दूसरे दिन विज्ञान कथाकार और साहित्यकार देवेन्द्र मेवाड़ी जी ने पढ़ाई-लिखाई और विज्ञान को जीवन से जोड़ा। उन्होंने कहा कि हम पूरी प्रकृति को भी हम किताब के तौर पर देख सकते हैं। हम हर रोज प्रकृति के विशाल अनुभव से पन्ने-दर-पन्ने पढ़ सकते हैं। खजान सिंह ने कहा कि जीवन में यादें हमें रंग देती हैं। ताकत देती हैं। उन्होंने कहा कि देवेन्द्र मेवाड़ी जी ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बेहतर ढंग से रखा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण कोई अलग से कोण नहीं है। यह जीवन को जीते हुए अनुभव के साथ समग्रता के साथ आता है। जो निरर्थक होता है हम उसे छोड़ते चले जाते हैं। 

खजान सिंह बोले कि शाम का सत्र शेखर पाठक ने लिया तो हमने सूबे का इतिहास, कला, संस्कृति, रहन-सहन, आचार-विचार को महसूस किया। इतिहास, भूगोल को रोचकता के साथ शेखर पाठक ने लगभग तीन घंटे तक हम सबको बांधे रखा। लगा ही नहीं कि एक व्यक्ति लगातार एक ओर से बोल रहा है। हमने धैर्य से बड़ी सरलता और सहजता से हमें समृ़द्ध किया।

तीसरे दिन के पहले सत्र का व्याख्यान मनोज कुमार ने लिया। पढ़ने-लिखने की संस्कृति की ओर विषयक पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान और साहित्य में स्कूली शिक्षा में जो रेखाएं खींची जाती है तो वह दृष्टि की बात है। मानवीय दृष्टि है जो वह हमसे बाहर नहीं है। गणित के छात्र कहते हैं कि गणित आनंद की चीज़ है। गणित काम की चीज़ तब होती है जब हम उसे प्रयोग करते हैं। दृष्टि ही होती है जब आप प्रकृति को देख रहे होते हैं तो यह साहित्य का क्षेत्र भी हो सकता है और यह विज्ञान का भी क्षेत्र हो सकता है। बदलते हुए मौसम को देखें तो आज बारहमासा रह नहीं गया है। तो बारहमासा को हम विज्ञान और साहित्य से जोड़कर भी देख सकते हैं। 

अज़ीम प्रेमजी बंगुलुरू विश्वविद्यालय सेे आए मनोज कुमार बोले कि साहित्य के अध्यापक की कोई खास पहचान नहीं बन सकी है। वह यदि आलोचनात्मक दृष्टि रखता है तो इस वजह से ही वह अलग से पहचाना जा सकता है। साहित्य के क्षेे अध्यापन करने वाले  कक्षा में रोचकता प्रस्तुत नहीं कर पाते। अच्छे लेखक और कवि जरूरी नहीं है कि अच्छे अध्यापक साबित हों। शिक्षा सिद्वान्त और साहित्य सिद्वान्त को साझा कर समझने की जरूरत है। मनोज कुमार ने कहा कि स्मृति के उपकरण देखें तो हमारे हाथ, पैर, कान हैं, जिससे हम दुनिया से संवाद इस्तेमाल करते हैं। चश्मा और दूरबीन हमारी आंख का विस्तार हैं। हमारे पास बहुत सारे औजार हैं जो हमारे आंख, कान, हाथ का विस्तार हैं। हम जानते हैं कि कुछ चीज़ें प्रकृति प्रदत्त हैं दुनिया से संवाद करने के लिए हमें मिली हैं। हमने कुछ का विस्तार किया है जिससे हमें सुविधा तो मिली लेकिन इन सुविधाओं ने हमें अन्य प्राणियों से विशिष्ट बना दिया। वायगोत्सकी का उदाहरण देते हुए मनोज कुमार ने कहा कि हमारे पास कुछ औजार हैं जिससे हम अपने मस्तिष्क का विस्तार करते हैं। देखकर याद रखना अलग बात है। चीजों को याद करने के औजार मानसिक उपकरण हैं। गांठ बांधना का उदाहरण देते हुए मनोज कुमार ने गांठ बांधना को याद आने के उपकरण के तौर पर बताया।  भाषा एक ऐसा उपकरण है वह एक व्यक्ति को नहीं समुदाय को भी समृद्व करती है। 

भूपेन्द्र जी ने सवाल किया कि बाहर के टूल और मानसिक टूल हैं। टूल को नियत्रिंत करेंगे। विकल्पहीन हैं तो आप नैतिक चुनाव नहीं कर सकेंगे। सामाजिक नैतिक दायरे में जाना होगा। भाषा के माध्यम से हम मानसिक प्रक्रियाओं के मामले में विचार को सामने लेकर आते हैं। हम फिर दोबारा सोचने लगते है। बार-बार लौटकर सोचना होने लगता है। मौखिक बातचीत में बार-बार लौटकर हम नहीं आ सकते है। 

मनोज ने कहा कि सचेत भाषिक व्यवहार अपनी मानसिक प्रक्रियाओं के बारे में सचेत होता है। बोलने और सुनने की सचेत क्रिया से अधिक लिखना और पढ़ना हमें और सचेत करता है। मौखिक परंपरा में पद्य अधिक रहा है। कारण यही है कि गद्य में कहने बोलने में लगने वाला समय अधिक है। जब मुद्रण का आविष्कार हुआ तो पद्य से अधिक गद्य लिखा जाने लगा। 

इसी बीच देवेन्द्र मेवाड़ी ने सवाल किया। सवाल था - दो व्यक्ति हैं अलग-अलग भाषाओं के हैं। वे संवाद करना चाहते हैं। कैसे करेंगे?
मनोज कुमार ने जवाब देते हुए कहा कि भाषा का अर्थ सिर्फ वाक्य निर्माण करना मात्र नहीं होता। एक वाक्य में कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। जैसे-पापा ने केले लाए। पप्पू ने केले खाए।

एक नज़र में देखें तो पापा और पप्पू का वाक्यों को देखते हुए सीधा संबंध नहीं बनता। लेकिन जब हम इसके अर्थ में जाते हैं। गहराई से सोचते हैं। तो कई अर्थ निकलते हैं। जब इसे विस्तार करें और देखेंगे कि हमें संबंध देना होगा। वे बाप बेटे भी हो सकते हैं। कुछ और रिश्ते भी बन सकते हैं। भाषा को समृद्व करने की बात करें तो पहले कोष बनने लगते हैं। भाषा का अर्थ कई बार व्यवहार से प्रदर्शित होता है। धन्यवाद कहने का मकसद हमेशा कृतज्ञ बोध में नहीं हो सकता। आप जो संवाद करना चाहते हैं वह संप्रेषित भी हो। बोलते समय शायद सचेत होना इतना नहीं होगा पर लिखते समय आपको सचेत होना होगा। थैंक्स। व्यवहार में अलग-अलग भाव से दिखाई देगा। लेकिन लेखन में हम कैसे कहेंगे कि यह किस रूप में आया।  

मनोज कुमार ने कहा कि बोलते समय आप इतना सचेत नहीं होंगे तो चलेगा। पर लिखते समय हमें सचेत होना ही होगा। मैं आम खाता हूं। इसे बोलते समय कई अर्थों में देखा जा सकता है। ज्यादा सचेत भाषिक व्यवहार लिखने-पढ़ने पर कम ध्यान दिया जाता है। काॅपी जांचते समय वर्तनी सुधारने का काम हम करते रहते हैं। व्याकरण सुधारते रहते हैं। लेकिन किस बात पर प्रभाव रखना चाहते हैं उस पर कम ध्यान दिया जाता है। हम में अधिकतर अध्यापक इस ओर ध्यान नहीं देते कि किसी भी वाक्य के निहितार्थ क्यों और कैसे बदलते हैं। पढ़ने-लिखने की क्षमता का विकास करने के लिए हमें चाहिए कि हम भाषा के बारे में छात्रों को सजग भी करें। 

उन्होंने एक अनुच्छेद पर चर्चा करने के लिए इशारा किया। अनुच्छेद यह था-
भाषा वह शीशा है जिससे हम बाहर की दुनिया देखते हैं। जब हम बाहर की दुनिया को देख रहे होते है तो हमारा ध्यान शीशे पर नहीं होता है। जब हमारा ध्यान शीशे पर जाता है तो तब हम समझ पाते है कि जो शीशे से दिख रहा है उसमें शीशे का भी योगदान है। 

इस अनुच्छेद में लंबी चर्चा हुई। मनोज कुमार ने कहा कि भाषा केवल वाक्यों का निर्माण ही नहीं करती वह वास्तविकता का निर्माण भी करती है। मेरी बहुत सारी धारणाएं साहित्य से बनी हैं। मनोज कुमार जी कहा कि आखिर हम साहित्य को कैसे देखें। काव्य को गढ़ने में शब्द और अर्थ दोनों की बराबर की भागीदारी है। काव्य या साहित्य में शब्द महज़ साधन नहीं है। भामह ने कहा है कि शब्दार्थो सहितौ काव्यम। वाणी शब्द व अर्थ में जल व धारा की तरह है। साहित्य की जब भी बात करे साहित्य का पठन-पाठन में भाषा के पक्ष को छोड़ नहीं सकते हैं। चीजों को पढ़ने का नज़रिया होता है। कार्यालय से नोटिस आते हैं तो उसमें अनुप्रास अलंकार और वर्तनी हम नहीं देखते हैं। साहित्य पढ़ते हुए भाषा की ओर जाएगा। साहित्य के माध्यम से समाज विज्ञान पढ़ाने का चलन बढ़ गया है। साहित्य में चीज़ें कैसे गढ़ी गई हैं। यह हमें देखना होगा। शिवमंगल सिंह सुमन की यह कविता है- हम पंछी उन्मुक्त गगन के। पिंजरबन्द न गा पांएगें। 

इस कविता को बार-बार पढ़ने से कई अर्थ खुलते हैं। यह ऐसी कविता है जो खूब बातें करने के आयाम खोलती है। उन्होंने कहा कि ऐसा क्यों होता है कि हमें किसी लेखक का गद्य याद नहीं रहता लेकिन उसका पद्य बहुत कुछ याद रहता है। छंद है। मुक्ति का भाव है। वे फिर सुमन की उपरोक्त कविता के संबंध में बोले कि अर्थ के साथ यह कविता लय से आगे बढ़ती है। रिदम से कविता बनती है। इस कविता में पक्षी और पंछी के उपयोग पर बातें करें तो यह सोचा जा सकता है कि सुमन ने पंछी का ही उपयोग क्यों किया होगा। शायद पक्षी में उलझ रही हो जाती ये कविता। हर ध्वनि का अपना भाव है। यह चुनाव क्यों हुआ होगा। कविता मुक्ति के लिए काम भी करती है। ध्वनियों, भाव,लय के साथ वाक्य रचना का भी काम करती है। कविता को देशकाल से परिचय कराते हुए मात्र से काम नहीं चलेगा। कविता अपने शब्दों में भी है भाषा में भी है। कठिन काव्य के प्रेत केशवदास थे लेकिन उन्हीं के काल में तुलसीदास अधिक लोकप्रिय हुए है। शिक्षा में भाषा को पढ़ाने का मकसद यह भी है कि वह सजग भाषिक प्रयोग को भी सीखें। 

मनोज कुमार ने कहा कि साहित्य का अध्यापन अगर साहित्य शब्द और अर्थ दोनों की साझेदारी साहित्य है तो क्या साहित्य के अध्यापन से विद्यार्थियों को भाषा के सजग और सधे हुए प्रयोग की और ध्यान दिलाया जा सकता है? आम भाषा में भी रूपक का इस्तेमाल हो सकता है। विचार और अनुभव दोनों का महत्व शिक्षा में है। धारणा को बनाने में रूपक का महत्व होता है। वह धारणा बनाने में लाभ देते हैं। स्वतंत्रता अधिक वहां कारगर है जहां विकल्प हैं। रचनात्मकता की पहली शर्त यही है कि विकल्प हों। रूपक हमारी सोच को बांधते हैं लेकिन गौर से देखें तो हम रूपकों से बंधे होते हैं। साहित्य में नए-नए रूपक गढ़े जाते हैं। कोई रूपक यदि बार-बार इस्तेमाल हो तो नए रूपक इस्तेमाल करने होते हैं। नही ंतो दोहराव आने लगता है।

मनोज जी ने अज्ञेय की कविता का उल्लेख किया। कविता ‘अगर मैं तुम को ललाती सांझ के नभ की अकेली तारिका अब नहीं कहता, या शरद के भोर की नीहार-नहायी कुंई की’ चर्चा करते हुए कहा कि अज्ञेय प्रयोगवादी कवि रहे हैं। चांद की तरह सुन्दर होना, कमल की तरह कोमल होना। ऐसे रूपक खूब इस्तेमाल हुए हैं। बाद में चांद का मुंह टेढ़ा है। यह प्रयोग भी देखने में आया। भाषा को देखना होता है। भाषा का व्याकरण नहीं बदल सकते हैं। लेकिन हम कैसे पहचानते हैं कि ये लेखन किसका है। आम इस्तेमाल कैसे करते हैं। पुराने शब्दों को नए अर्थों में गड़ा जा सकता है। छायावाद में दीपक का इस्तेमाल खूब हुआ है। विशिष्टता व्याकरण के भीतर ही होता है। भाषा का ऐसा प्रयोग जब आप शीशे को भी देखने लगते हैं। भाषा के प्रयोग के विकल्प में हमें जितना अवसर मिलेगा, हम उतने समृद्व होंगे। भाषा का रोल निर्माण भी करना होता है। भाषा कैसे काम करती है। यह समझ लें तो हम इसका निर्माण भी करते हैं। नए-नए रूपक गढ़ सकते हैं। 

मनोज ने कहा कि कोई रचना क्यों सराही जाती है? इसके कई कारण हो सकते हैं? क्या साहित्य के अध्यापन का एक मात्र उद्देश्य भाषिक प्रयोगों के बारें में विद्यार्थियों को सजग करना भर है? यह एक मकसद है। पर यही एक मकसद नहीं है। लेकिन बाल की खाल निकालना होगा तो रचना समग्रता के साथ नहीं जन्म लेगी। साहित्य के मकसद को समझना शब्द और अर्थ दोनों के विस्तार में जाना होगा। साहित्य का आनंद बचेगा नहीं यदि बाल की खाल निकालना ही हमारी आदत हो जाएगी। हम विचार करें कि आनंद की अनुभूति और सौन्दर्यबोध ही साहित्य का मकसद है तो यह क्या शिक्षा का मकसद भी यही हो सकता है? मूल्यों का मसला केवल भाषा का ही मकसद नहीं है। इस पर सहभागियों ने चर्चा की। साहित्य में मूल्य भी है सौन्दर्य भी है। साहित्य को पढ़ाने के लिए ही रखा जाए, यह समग्र मकसद नहीं हो सकता। एनसीएफ में भी साहित्य को कैसे पढ़ाया जाना चाहिए इस में वह मौन है। प्लेटो ने कहा था कि उसके आइडियल रिपब्लिक में कवि लेखकों को जगह नहीं मिलेगी। उसका कहना था कि ये लोग नकल की नकल करने वाले होते हैं। ये लोगों को बरगलाते हैं। यथार्थ से दूर ले जाते हैं। लेकिन प्लेटो के शिष्य ने दूसरी ही बात कही। उन्होंने कहा कि जीवन को साहित्य में ढालने वाले गौर से देखने वाले आनंदित करने वाले होते हैं। 

मनोज कुमार ने कहा कि इसे देखें-‘राजा मर गए। रानी मर गई।‘ 
‘राजा मरा और रानी उसके दुख में मर गई।‘ ये प्लाॅट है। 
घटनाओं की श्रृंखला बनाते हुए संबंध भी बनाना होता है। अरस्तू ने साहित्य कलाओं को खास माना है। साहित्य आपको अच्छा इंसान बनाता है। साहित्य नैतिक विवेचन के नए द्वार खोलता है। बंधी-बंधाई नैतिकता से इतर भी दूसरे ढांचे हो सकते हैं। आदि, मध्य, अंत को आप किसी भी विधा में देख सकते हैं। मनोज कुमार ने कहा कि साहित्य को पढ़ाने के मकसद को देखने की तीन पद्धतियां मानी जा सकती हैं। एक साहित्य के माध्यम से भाषा सिखाने पर जोर रहता है। दूसरा साहित्य के विषयवस्तु के और स्थापित परम्परा के बारे में बताने पर जोर रहता है। तीसरा विद्यार्थी को भावनात्मक और विवेचनात्मक दृष्टि से समृद्ध बनाने पर जोर देता है। ये तीनों पद्धतियां गलत नहीं हैं। ये जरूरी हैं पर तीसरा बेहद जरूरी है। यह साहित्य का सबसे बड़ा मकसद होना चाहिए कि कल का साहित्य भी आज का साहित्य लगे। साहित्य को इस तरह से पढ़ाना कि जिससे निजी संवाद सामने आए। अध्यापक के तौर पर हमारे सामने निजी उदाहरण प्रकट होते हैं। हर बार हर संदर्भ में अलग अलग साहित्य के प्रसंग चर्चा में आए। यह निजी सन्दर्भ से आते हैं। 

कमलेश चन्द्र जोशी ने सवाल किया कि साहित्यकार भी तो अपने साहित्य में भाषा को साधता है। दूसरा सवाल आनन्द, सौन्दर्य और अनुभूति के साथ साथ सामाजिक जागरूकता भी आए। कैसे सामंजस्य आए? मनोज ने जवाब दिया कि रचना का जो व्यक्तित्व है उसे समझा जाना चाहिए। इस ओर ध्यान तो जाना ही चाहिए। अलग-अलग तरह की रचनाएं तो अलग-अलग तरह के पाठकों को आमंत्रित करती हैं। प्रेमचन्द का गोदान समाजविज्ञानियों को आमंत्रित करती है। पर्सनल कनेक्ट ही नहीं चलेगा। तीसरा मकसद आए। साहित्य से मिलने वाला आनन्द है यह विशिष्ट तरह का आनन्द है। सौन्दर्यबोध को लेकर वस्तुनिष्ठ है या आत्मनिष्ठ है? पाठक की भूमिका को कैसे कहेंगे? यह सवाल महेश पुनेठा ने उठाया।
मनोज जी ने जवाब दिया। कहा कि सौन्दर्यबोध जरूरी है। साहित्य सोच है तो कोई आम नोटिस भी आपको कविता लग सकती है। साहित्य की विधाएं आपको आमंत्रित करती हैं। रचनाएं स्वयं में अपने अपने अर्थ नए अर्थ तलाशती हैं। भाषा को बरतने में सचेत रहने की बात भी कही। भाषा को लेकर अधिक सचेत रहेंगे तो वह बाधक भी बनती है? भाषा को ठीक भी करना है और बदलना भी है। स्वयं आकलन, समूह में आकलन में और फिर अध्यापक के द्वारा आकलन भी पढ़ने-लिखने के स्तर को समृद्ध कर सकते हैं। यह भाषा के प्रति सजग करने का तरीका हो सकता है। खुले प्रश्नों पर काम हो। अपने लिखे हुए को बार-बार पढ़ना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि हिन्दी की कक्षा में पढ़कर आने से बेहतर हो कि साहित्य कक्षा में घटित होता हुआ दिखाई दे। यह मुश्किल तो है। जैसे कुम्हार के द्वारा घड़ा बनाने की प्रक्रिया को साक्षात देखना होता है। नई रचनाओं को पढ़ना भी जरूरी है। छन्दबद्ध और मुक्तछन्द को समझना आवश्यक है। छन्द की विशेषता है लय। निराला ने कहा कि छन्द हम लिखेंगे या छन्द हमें लिखेगा। बातचीत की भी लय होती है। हवा के बहने की लय होती है। बाहर कोई घटना घटती है। आप बता रहे हैं तो एक लय होती है। छन्दमुक्त कविता लयमुक्त होती है क्या? नहीं। उत्तरछायावादी प्रभाव से मुक्त नहीं हुए हैं हम। यही कारण है कि हम अभी भी अपने समय की रचनाओं से मुक्त नहीं हुए हैं। 

भोजनोपरांत सत्र का आरंभ प्रतिभा कटियार ने किया। उन्होंने कहा कि साहित्य के अध्यापन को लेकर जो बातचीत हुई तो कई सारे सवाल उठते हैं। हिन्दी कई छात्रों का साहित्य की वजह से लगाव रहता रहा है। कुछ कविताएं जिनका आनंद पाठक के तौर पर लेते हैं पर पता नहीं क्यों कविताएं कक्षा कक्षों में डरावनी हो जाती हैं? साहित्य से सब प्रेम करते हैं लेकिन कक्षा में वह प्रेम दिखाई नहीं देता। साहित्य का अध्यापन क्या अन्य विषयों के अध्यापन से भिन्न होता है क्या? जब कहीं लिखा होता है बारिश तो हम भीगने लगते हैं। यह अहसास साहित्य ही तो देता है। यह स्मृतियों का संसार साहित्य ही तो बार-बार अहसास करता है। साहित्य ही तो है जो हमारे सोचे हुए को स्थापित करता है। साहित्य में आप बार-बार नया रच सकते हैं। पाठ वाचन अच्छे साहित्य की भी हत्या कर सकता है। चेतना, संवेदना, भाषा और समझ साहित्य से अधिक कारगर तरीके से स्थापित हो सकती हैं।   

खजान सिंह ने दूसरे सत्र के व्याख्याता गुरवचन सिंह का परिचय दिया। बाल साहित्य के मर्मज्ञ, शैक्षिक पलाश और गुल्लक के संपादक रहे गुरवचन सिंह बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। गुरवचन सिंह ने बाल साहित्य के मायने और इसका शैक्षिक उपयोग पर विहंगम बातचीत की। उन्होंने अपनी बात आरंभ करते हुए कहा कि आज सारा द्वन्द्व ही बच्चों ओर सयानों के मध्य का है। बाल साहित्य को लेकर गहरी बात कम ही होती है। शिक्षा में बाल साहित्य को अवरोध के तौर पर देखा जाता है। इसे सहयोगी के तौर पर कम और आग्रह के तौर पर ही देखा जाता है। ऐसा आग्रह जो थोपा हुआ दिखाई देता है। जब साहित्य को कक्षा में लाने की बात करते हों तो बाल साहित्य की बात भी आएगी। जरूरत का गहरा आग्रह पहले नहीं था। अब दिखाई देने लगा है। शिक्षा के इतिहास में खगालें तो शिक्षा के काम में बाल साहित्य की बात होने लगी है। साहित्य में दो नाव है। एक पैर साहित्य में और दूसरा बाल साहित्य में। पिछले बीस एक सालों में कई संस्थाएं बनी हैं जो बाल साहित्य और कक्षा में साहित्य की बात करने लगी हैं। लेकिन आज भी चिन्ताएं गहरी और मुश्किल है। 
गुरबचन सिंह ने कहा कि किसी भी देश या समाज का बचपन देखना चाहें तो वहां के खिलौने और बाल साहित्य को देख लें। यहां से आपको उस समाज की स्थिति पता चल जाएगी। हम यहां सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली में पढ़ रहे बच्चों की ही बात करेंगे। उनका बचपन कैसा है? यह सोचने का समय है। यही नहीं बच्चों का एक बड़ा समूह वंचित समूह है। यहां स्कूल आने वाली पीढी पहली पीढ़ी है। इनमें बहुत से बच्चे ऐसे हैं जहां पढ़ने-लिखने की पठन सामग्री पहले कभी नहीं आई। गरीब परीवारों से हैं। आरंभिक बचपन में छपी हुई सामग्री उन्होंने पहले कभी देखी ही नहीं। ऐसे बच्चों के बाल साहित्य की बात करना और भी मुश्किल है।  एक बड़ी बात है बड़ों में बच्चों के नज़रिए को देखने की दृष्टि। इसका प्रायः अभाव है। जो घर किताब खरीद सकते हैं। वहां भी किताबें नहीं हैं। बचपन में जो खाद पानी और रोशनी की जरूरत है वे क्यों नहीं। समृद्ध परिवारों में भी नहीं है। एक आदत ही नहीं है।   

गुरबचन सिंह ने कहा कि बाल साहित्य को दस्तावेज के तौर पर देखा जा सकता है। आज बड़ी चिन्ता का विषय है जहां बाल साहित्य का प्रयोग हो रहा है तो वह यांत्रिक तरीके से ही रखा जा रहा है। वह गहरी समझ जिसकी जरूरत है उसका अभाव है। साहित्य को बांटने काम भी बड़ा अजीब सा है। साहित्य को बांटने का मसला भी अजीब सा है। ये बच्चों का साहित्य है ये बड़ों का साहित्य कहेंगे। किसे बाल साहित्य कहेंगे। स्कूल में पढ़ना दबाव वाला कर्म है। जबकि साहित्य आनंद के लिए है। मुक्त रहकर पढ़ने का कर्म ही साहित्य हैं। एनसीएफ 2005 ऐतिहासिक दस्तावेज है। जो स्कूल को बाहरी ज्ञान से जोड़ना बताता है।  पढ़ाई को रटन्त प्रणाली से मुक्त करना कहता है। परीक्षा को लचीला बनाना कहता है। भयमुक्त परीक्षा की वकालत करता है। प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना कहता है। पाठ्यचर्या का निरूपण ऐसा हो कि बच्चे के चहुर्मुखी विकास के अवसर दें। संवेदनात्मक विकास कैसे करोगे। संज्ञानात्मक विकास कहां से होगा। यह केवल और केवल बाल साहित्य से ही संभव है। 

गुरबचन सिंह ने कहा कि एक ऐसी पाठ्य पुस्तक से यह संभव है? वह ऐसी पाठ्य पुस्तक जिसके अपने ढांचे हैं। क्या भाषा की पढ़ाई एक किताब से संभव है? पाठ्य पुस्तक से इतर जो भी स्रोत ज्ञान के हैं उनसे संपर्क कराएं बच्चों का। यह कहने भर से काम नहीं चलने वाला है। क्या ऐसी तैयारी है? बच्चे का समग्र विकास करने के लिए कोई तैयारी है? आज भावों की कमी है। संवेदनाओं की कमी है। बच्चों से बहुत शिकायतें हैं। कहानी और कविताएं ही वह जरिया हैं जो बच्चों में भावनाएं और संवेदनाएं भाव संवेदीकरण से शिक्षित करती हैं। इसे जरूरत के तौर पर देखेंगे। पूरक पठन सामग्री ही नहीं है। तो कैसे होगा?

गुरबचन सिंह ने कहा कि हर स्कूल में एक पुस्तकालय होगा। पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें होंगी। सरकार का दृष्टिकोण बाल पत्रिकाओं को लेकर स्पष्ट नहीं है। आपरेशन ब्लैकबोर्ड में यह व्यवस्था आई थी। बुनियादी स्कूलों के लिए 3000 रुपए और जूनियर स्कूलों के पहली बार 5000 रुपए की किताबें बच्चों की किताबों के तौर पर स्कूल में रखी जाएंगी। यह बड़ा काम हुआ था। लेकिन क्या वह स्कूलों में आदत के तौर पर है? 

गुरबचन सिंह ने कहा किएनसीएफ 2005 यह कहता है कि स्कूल में हर स्तर का पुस्तकालय होगा। यह ऐसे स्थान होंगे जो पाठक समुदाय, बच्चे, शिक्षक और समुदाय ज्ञान के गहरे अर्थों के निर्माण में सहयोगी होगा। बुनियादी, जूनियर, माध्यमिक, इंटरमीडीएट स्कूलों में अलग-अलग पुस्तकालय होंगे। कितनी व्यवस्थाएं हैं? हर बच्चे को हर कहानी नहीं सुनाई जा सकती। बच्चा अपना बचपन खोजता है। अच्छे बाल साहित्य की कुछ कसौटियां बच्चों के अनुभव,स्वर,उनकी भागीदारी, सामान्य जिंदगी का स्पंदन दिखाई दे।

गुरबचन सिंह ने कहा कि ऐसा साहित्य जो बच्चों में सक्रियता, रचनात्मक सामथ्र्य अभिरूचियां उत्सुकता, रोमांच, बच्चे के प्रति सम्मान, कौतूहल, बच्चे की भाषा और ज्ञान का समृद्व, सौन्दर्यबोध, कल्पनाशीलता, रचनाशीलता, बहुभाषिकता, बहु संस्कृति,बहुस्तरीय बहुलतावादी बच्चों की अस्मिताएं शामिल करता है वहीं बाल साहित्य है। जो हैं उनमें सकारात्मक दृष्टिकोण प्रायः कम ही दिखता है। बच्चों का साहित्य जो मौजूद है प्रायः उनमें सोचने के अवसर ही नहीं है।  समझने का अवसर देती हांे ऐसी रचनाएं कम हैं।  

गुरबचन सिंह ने कहा कि सहूलियत से पढ़ने का अवसर और दबाव में पढ़ना में अन्तर है। उन्होंने बुढ़िया की रोटी कहानी का उदाहरण दिया। बाल साहित्य को समझने के कई नज़रिए है। बच्चों की दुनिया वाला साहित्य बाल साहित्य है। आनंद और खुशी देने के लिए ही बाल साहित्य है। सीखने के लिए दिया जाने वाला साहित्य बाल साहित्य है। हम किसी पक्ष में नहीं जा रहे है। हमंे ओर समझना होगा। क्या पढ़ने को दिया जाए और क्या नहीं दिया जाए। यह भी द्वन्द्व है। ऐसी मुश्किलें हैं। बच्चे की स्वायत्ता है। बाल साहित्य के सामाजिक निहितार्थ को समझना जरूरी है। 
गुरबचन सिंह ने कहा कि पन्द्रह मिनट हम कुछ बाल साहित्य की पड़ताल पढ़ कर करते हैं।  मार्टी की किताब पेड़ और काकाझुओ इवामूरा की किताब 14 चूहे घर बनाने चले का उल्लेख हुआ।

गुरबचन सिंह ने कहा कि हमारा साहित्य ऐसा हो जो भावनात्मक विकास में सहायक हो। बच्चों की अस्मिता और अस्तित्व को पोषित करने वाला हो। बच्चों की गरिमा को सम्मान देने वाला हो। बचपनरूपी अवस्था को फलने-फूलने के लिए खाद-पानी उपलब्ध कराता हो। बच्चों को सपने देखने व कल्पना करने के अवसर देता हो। संज्ञानात्मक और भावनात्मक जरूरतों को पूरा करने वाला हो। उनके स्वाभाविक गुणों जैसे जिज्ञासा, खोज, अन्वेषण, अनुकरण, कौतूहल के भाव जगाता हो व पोषित करता हो। बच्चों में चीजों और घटनाओं के बारे में जानने, सवाल पूछने की इच्छा पैदा करता हो। बाल सुलभ गुणों आदतों और व्यवहार को रेखांकित करता हो। बच्चो के लिए सोचने-विचारने, तर्क करने, विश्लेषण और व्याख्या व संवाद करने के लिए अवसर जुटाता हो। अबोध मानने का गहरा आग्रह गलत है। इसे समझने की जरूरत है। 

गुरबचन सिंह ने कहा कि यदि हम बच्चों की प्रवृत्तियों को जगह नहीं देंगे तो कैसे चलेगा? भाषा में सरलता, विविधता, अपनापन हो। बच्चों के अनुरूप भाषा समृद्ध और ताजगी लिए हो। बोलचाल की भाषा और देशज शब्दों को खुले मन से जगह दी गई हो। बाल साहित्य की विविध विधाओं और भाषा रूपों के अनुभव देने वाला हों चित्र रुचिकर और प्रभावशाली हो। 
गुरबचन सिंह ने कहा कि बाल साहित्य कदापि भी निर्देशित ओैर नियोजित न हो। बच्चों को अबोध मानने का आग्रह न हो। उपेदशात्मक न हो। आदर्शवादी अतिरंजनाएं तो न ही हों। बड़ों के काम ही न दिखाई दें। पात्रों की रूढ़ छवियां न हों। किसी व्यक्ति विशेष, धर्म समुदाय आदि की गलत छवि न प्रस्तुत की गई हो। धर्म समुदाय, मान्यताओं, विश्वासों का उपहास और दुराग्रह न हो। सहभागिता की चुनौती मिलने का आग्रह न हो। उपदेशों की खुराक न हो। बड़ों के काम बड़े होते हैं और बच्चों के काम छोटे होते हैं। इस तरह का आग्रह न हो। बाल साहित्य में बच्चों को बेवकूफ न कहा जाए। बच्चे भी इस देश के नागरिक हैं। यह भाव बाल साहित्य का हो। डेढ़ घण्टे से अधिक बाल साहित्य पर चले इस सत्र में कई सवाल आए लेकिन समयाभाव के चलते उन सवालों पर समग्रता से बात न हो सकी।
रात को काव्य गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। 

-मनोहर चमोली ‘मनु’


1 टिप्पणी:

यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।