6 जून 2017

Meet to Ganesh Ghukhshal Gani

अपने भीतर के आदमी को बाहर लाएं: गणेश खुगशाल ‘गणी’

-Manohar Chamoli 'manu'

‘‘यह पहला मौका है कि मैं अपने ही शहर में ऐसे प्रबुद्ध श्रोताओं के समक्ष हूं जो उस पेशे से हैं जिस पेशे से मेरा बुनियादी बचपन जुड़ा है। मैं आज भी अपने उन गुरुजी को याद करता हूं जिनके घर हम दौड़ लगाते थे। ऐसी दौड़ कि जो पहले पहुंचेगा गुरुजी के घर में बचा हुआ भात खा सकेगा। मैं उस घर से हूं जिसके मुखिया ने हल जोत कर बच्चों को पढ़ाया। अपने पचासवें वसंत के आगमन पर पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि गरीबी की दिक़्कतों के साथ जीना संघर्ष को बनाए रखता है। उम्मीद और आशा को छोड़ने नहीं देता।’’
Ganesh Khughshal gani,Manohar Chamoli manu,Maheshanand and Jagmohan Khatait


अपने जीवन से जुड़े अनेकानेक संस्मरणों के साथ गणेश खुगशाल ‘गणी’ जी पौड़ी स्थित टीचर लर्निंग सेंटर में कार्यक्रम ‘इनसे मिलिए’ के तहत उपस्थित थे। लगभग पचास शिक्षकों की मौजूदगी इकतीस मई दो हजार सत्रह की शाम और अजी़म प्रेमजी फाउण्डेशन कार्यालय। तकरीबन सात बजे यह कार्यक्रम आरंभ हुआ। एक घण्टा सैंतालीस मिनट के अपने संबोधन में गणी जी ने लगभग बाईस सवालों का जवाब भी बड़ी सहजता से, रोचकता से और प्रभावपूर्ण तरीके से दिया।

एक कुशल संचालक,पत्रकार, उदघोषक, पत्रकार शिक्षक, संपादक, जल के जानकार, संदर्भ व्यक्ति, संस्कृतिकर्मी ने अपने पिछले छब्बीस साल के सामाजिक जीवन के साथ अपने बचपन,युवावस्था के कई खट्टे-मीठे-कड़वे अनुभव भी साझा किए। अपनी मुफलिसी और संघर्ष के दिनों को जिस सादगी और सच्चाई के साथ बगैर लाग-लपेट के गणी जी ने रखा वह चुपचाप सुन रहे श्रोताओं की सजगता स्पष्ट गवाही दे रही थी। 

उन्होंने बार-बार कहा कि हमारे पहाड़ के कई सच हैं। एक सच यह भी है कि हम में से अधिकतर गांव पढ़ाई और रोजगार के लिए छोड़ते हैं। पर वह ऐसा छूटता है कि फिर उन रास्तों पर लौटना सहज नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि जीवन के कई रास्ते यदि बंद होते हैं तो आपकी ही प्रतिबद्धता एक नया रास्ता भी सुझाती है। आज भी मुझे अपने बुनियादी शिक्षक के घर में पका हुआ भात याद आता है। हम पहाड़ियों के घर की रसोई में भात और चीनी तो बहुत बाद में पहुंची। 
उन्होंने कहा कि इस शहर में लगभग चार हजार शिक्षक हैं। जो आस-पास के गांव,शहर,कस्बों में सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन उनमें से कई ऐसे भी हैं जिन्हें उनके छात्र, अभिभावक और यह शहर आदर और सम्मान के भाव से आज भी देखता है जैसे सालों पहले देखा जाता रहा है। समाज ही हमारा मूल्यांकन करता है। हम कहीं भी खड़े हों। हमें हजारों आंखें हर समय देखती है। उन्होंने कहा कि जीवन कितना ही जटिल हो। आपाधापी कैसी भी हो। हमारी प्रतिबद्धता ही हमें पहचान दिलाती है। समय का सार्थक उपयोग करना भी अपने आप में चुनौती है। 

उन्होंने जोड़ा कि श्रोता के तौर पर यहां उपस्थित एक-एक अध्यापक कई विषयों के जानकार हैं। वे मानते हैं कि कक्षा-कक्ष में और विद्यालय में छात्रों के साथ जो सहज सम्बन्ध होना चाहिए, रखते होंगे। उन्होंने संस्मरणों के माध्यम से बताना चाहा कि जीवन में बहुत बार एक पल के ऐसे क्षण होते हैं जो हमारे रास्ते बदल देते हैं। दशा बदल देते हैं और दिशा भी बदल देते हैं। 

जनपक्षधर की पत्रकारिता के लिए लोकप्रिय गणेश खुगशाल ‘गणी’ ने कहा कि यदि सीखने-समझने की ललक हो और अपने काम के प्रति आशावादी नज़रिया हो तो आपको आपका काम ही स्थापित करता है। भले ही बाधाएं डालने वाले आपके आस-पास ही हों। बहुत छोटे-छोट पलों के हिस्से आपको बड़ी-बड़ी उपलब्धियां दे जाते हैं। बहुत छोटे-छोटे सफर आपको ऊंचाई भरी मंजिलों के पता देते हैं। यदि चलना ही लक्ष्य हो तो आपके सफर में आपको बेहतरीन इंसान भी मिलते हैं। जिनके साथ जुड़कर आप नया सीखते हैं।

उन्होंने गढ़वाली गायक नरेन्द्र सिंह नेगी जी के साथ पहली मुलाकात और फिर उनके अधिकतर कार्यक्रमों के संचालन तक के अनवरत् चल रहे सफर का संस्मरण भी सुनाया। उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी चीज़ें आपके जीवन का बड़ा हिस्सा बन जाती है और हमें पता ही नहीं चलता। 

पत्रकारिता के जीवंत और कसैले अनुभवों के साथ रेखांकित किए जाने वाले पलों को भी उन्होंने साझा किया। उन्होंने कहा कि बारहवीं तक की शिक्षा ठेठ ग्रामीण पृष्ठभूमि में हुई। एक छात्र की ग्रामीण पृष्ठभूमि की दुनिया बहुत छोटी होती है। ये ओर बात है कि उस छोटी सी दुनिया में मानवता,नैतिकता और प्रेम से भरी प्रकृति का बड़ा फलक ताकत देता है। उन्होंने पौड़ी से दिखाई देने वाली हिमालयी श्रंृखला को अपनी ताकत बताया। उन्होनंे कहा कि कई बार दिल और दिमाग से काम लेना होता है। कई बार मन-मस्तिष्क में संघर्ष चलता है। फैसला आपको करना होता है कि किसे सुना जाए और किसे माना जाए। 

हिन्दी भाषी राज्यों में विविधता से भरे संदर्भ व्यक्ति के तौर पर काम कर रहे गणी जी ने कहा कि यह दौर जीवट है। यदि अपना लक्ष्य निर्धारित है। उस पर चलने का हौसला और समर्पण है तो यह तय है कि सफलता धीरे-धीरे नजदीक आती है। उन्होंने कहा कि हर एक आदमी के भीतर एक आदमी होता है। जो बाहर आना चाहता है। उस भीतर के आदमी को पहचानना होता है। वही असल का आदमी है। यह तो आपको तय करना होता है कि आपके भीतर का आदमी कौन है। वह क्या चाहता है। हर आदमी खुद को बेहतर जानता है। वह जानता है कि वह क्या है? वह क्या कर सकता है। उसकी क्षमताएं क्या है? यह हमें ही खोजना होगा कि हम क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते। 

अपने अट्ठाइस साल की लेखन यात्रा में आकाशवाणी, पत्र,पत्रिकाएं, संपादन, यात्राएं, पारिवारिक दायित्व, बचपन, शिक्षा, समाज, राजनीतिक पक्ष पर भी वे खुलकर बोले। उन्होंने अपने अट्ठाईस साल के सार्वजनिक जीवन के कई पक्षों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि जीवन के कई मोड़ों पर विचलित होने का समय भी आया लेकिन हिमालय ने मुझे ताकत दी कि डटे रहो। अटल हिमालय मेरी ताकत बना। ये हिमालय मुझसे बात भी करता है। 

भाषा और संस्कृति के जानकार गणी जी ने कहा कि गढ़वाली भाषा के कारण ही मैंने भारत को जाना है। गढ़वाली भाषा ही है जो मुझे गणेष खुगशाल ‘गणी’ बनाती है। हमारी भाषा विश्व की सबसे असरदार भाषा है। हमारी शब्द संपदा बेमिसाल है। समृद्धशाली भाषा की वजह से मैं आगे बढ़ रहा हूं। मेरी भाषा ही मेरा गौरवा है। 

उन्होंने गढ़वाली भाषा, हिन्दी भाषा के साथ-साथ वैश्विक पटल के साहित्य,साहित्यकार और समाजसेवियों पर भी बात की। वे बार-बार इस बात पर केन्द्रित होते रहे कि अपने भीतर खुद को टटोलना होता है। अपने आप से बात करनी होती है। बार-बार खुद से पूछना होता है कि आपको करना क्या है। 

लगभग पचास शिक्षक और पौड़ी स्थित अज़ीम प्रेमजी कार्यालय के साथियों के मध्य गणेश खुगशाल ‘गणी’ जी ने लगभग दो घण्टे बिताए। लगभग चालीस मिनट उपस्थित शिक्षक साथियों ने विविधता से भरे सवाल पूछे। मसलन लोकभाषा पर काम करने का ख्याल कैसे आया? गढ़वाली कविता के प्रभाव क्या हैं?गढ़वाली भाषा प्रभावकारी है फिर भी वह स्थान क्यों नहीं हासिल कर पा रही है जिसकी वह हकदार है? गढ़वाली भाषा में एकरूपता नहीं है तो वह कैसे भाषा बन सकेगी? प्राथमिक स्तर पर हिन्दी माध्यम होने की वजह से गढ़वाली भाषा कैसे सम्मान पाएगी? जीवन के ऐसे कौन से मोड़ आए जब आपने स्वयं को बेहद कमजोर माना? ऐसे कौन से काम है जो आप अभी और करना चाहते हैं? आजीविका और परिवार से संबंधित कई सवाल भी पूछे गए। व्यक्तिगत तौर पर ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जिन्हें आप हासिल नहीं कर सके? 

इन सवालों के आलोक में और भी अनुभवों से जुड़ी सारगर्भित बातें गणी जी ने कही। जिन्हें बिन्दुवार इस तरह समझा जा सकता है।

इंसान कितना भी महत्वपूर्ण हो समाज में हर जगह पसंद नहीं किया जा सकता।
मानवीय कमजोरियां-स्थितियां और परिस्थितियां हर कदम पर परीक्षा लेने को तैयार रहती है। ऐसी स्थिति में अपने भीतर के आदमी की बात सुनो। 
हर परिवार की अपनी भाषा होती है। उस भाषा का महत्व है। उसका सम्मान और उसके साथ जीना भी आना चाहिए। 
असहमतियों की परवाह नहीं करनी चाहिए। अपने रास्ते चलें और स्वयं बाधाएं हटाते चलें। दूसरों के लिए बाधाएं न खड़ी करें।
अपनी जगह से प्यार करें। अपना आत्मबल बढ़ाएं। इसे होमसिकनेस भी कहा जा सकता है। यह कमजोरी भी है तो यह ताकत भी है।
हम विद्यालयी जीवन में जो पढ़ते हैं। वह हमारी समझ,सोच और विचार बढ़ाता है। यह जरूरी नहीं कि स्कूली किताबें हमारे जीवन में कदम-कदम पर काम आए।
स्कूली जीवन से इतर सामाजिक जीवन की पाठशाला में भी हमें कई परीक्षाएं देनी होती है। उसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए। आशावादी नज़रियां हमेशा कायम रहना चाहिए। 
जीवन के कई लक्ष्य हो सकते हैं। लेकिन एक बड़ा लक्ष्य भी खुद ही तय करना होता है। मुझे करना क्या है? यह सवाल हमेशा बना रहना चाहिए।
अपनी भाषा,संस्कृति और कला से प्रेम करें। उसे समझे। देश-दुनिया में कहीं भी जाएं आखिरकार हमें हमारी मूल जड़ से ही जोड़कर देखा जाएगा।
अपनी भाषा से इतर दूसरी भाषा का सम्मान करना भी जरूरी है। लिखने-पढ़ने की आदत अपनी भाषा में भी होनी चाहिए। 
यह तय है कि पारम्परिक ज्ञान,अनुभव और प्रकृति का ज्ञान स्थानीय भाषा में ही संभव है। अनुवाद की भी अपनी सीमाएं हैं। कमजोरियां हैं। भाव-प्रभाव अपनी भाषा में ही अधिक होता है।
व्यक्तिगत, पारिवारिक जीवन पहले हैं। लेकिन सामाजिक और राजनीतिक से हम अछूते नहीं रह सकते। लोक चेतना के साथ-साथ हमें तेजी से बदल रहे समाज का भी अध्ययन करते रहना चाहिए।

 गढ़वाली भाषा की पत्रिका ‘धाद’ के संपादक और लोकभाषा, संस्कृति के मर्मज्ञ गणेश खुगशाल गणी जी का परिचय मनोहर चमोली ‘मनु’ ने साझा किया। शिक्षा के सरोकार और शिक्षकों से जुड़ी गतिविधियों के बारे में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथी जगमोहन कठैत जी ने कहा कि समाज में सहजता, सरलता से उपलब्ध व्यक्तियों से, उनके अनुभव से और उनके जीवन के संघर्षाें को साझा करना भी इन कार्यक्रमों की प्रासंगिकता को सार्थक करता है। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम ‘इनसे मिलिए‘ के तहत कोशिश रहे कि हम आस-पास के सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, कला, साहित्य आदि क्षेत्रों में नायाब कोशिश कर रहे व्यक्तित्वों के साथ समय बिताएं। बातें करें। 

इस शाम गणेश खुगशाल ‘गणी’ पर तैयार किया गया छायाचित्र प्रजे़नटेशन भी साथियों ने देखा। शिक्षक साथियों की ओर से भेंटस्वरूप कलम के सिपाही को एक कलम भेंट में भी दी गई। इस अवसर पर आशीष नेगी, महेशानन्द, अशोक कुमार, प्रवीन, विनय,सुभाष, सूर्यप्रकाश, जयानन्द, गणेश बलूनी, कमलेश बलूनी, धमेन्द्र, राकेश मोहन, राजू नेगी सहित टिहरी, चमोली, पौड़ी के शिक्षक भी उपस्थित थे। बतातें चलें कि अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन के सतत् सहयोग से स्वैच्छिक शिक्षक मंच, पौड़ी के शिक्षक साथी समय-समय पर शैक्षिक संवाद गोष्ठियों का आयोजन करते रहते हैं। टीचर लर्निंग सेन्टर में भोजनोपरांत लगभग साढ़े नौ बजे यह आयोजन समाप्त हुआ। ॰॰॰
-मनोहर चमोली ‘मनु’,भितांई,पोस्ट बाॅक्स-23, पौड़ी 246001 उत्तराखण्ड। 
मोबाइल-09412158688 व्हाटस एप-7579111144 

 

1 टिप्पणी:

यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।