17/03/2012

छिप छिप के उसे देखना-----ग़ज़ल-

-मनोहर चमोली 'मनु' manuchamoli@gmail.com

छिप छिप के उसे देखना ऐसा भी क्या।
न उसके सामने जाना ऐसा भी क्या।।
कोंपलें फूटी हैं मुझ पर उसे है ख़बर।
खुद ही इतराना मुसकाना ऐसा भी क्या।।
शाम तलक रेत का घरौंदा बनाता रहा।
खुद ही फिर उजाड़ दिया ऐसा भी क्या।।
तुम बरसते रहे मैं सुनता रहा तुम्हें।
अपलक देखता तुम्हें रहा ऐसा भी क्या।।
शायद तुम्हारी बातों का असर है इतना।
तुमने कहा मैंने किया ऐसा भी क्या।।
-मनोहर चमोली ‘मनु’

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