11/10/2010

जाना जीवन का रहस्य- मनोहर चमोली ‘मनु’

एक पहलवान था। कुश्ती में उसका कोई सानी नहीं था। जैसे ही उसे पता चलता कि कोई और व्यक्ति भी पहलवानी करता है, तो वह सीधे उस पहलवान के घर जा धमकता। उसे ललकारता और कुश्ती के लिए चुनौती देता। उसे कुश्ती में हरा कर ही दम लेता। पहलवान को दूसरों को हराने में बड़ा आनंद आता। दूसरे को पछाड़ कर वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता। पहलवान कहता-‘‘मेरे जैसा पहलवान कोई नहीं है। यदि कोई है तो आए मेरे सामने।’’

यही कारण था कि अब कोई भी पहलवान उससे कुश्ती लड़ने के लिए तैयार नहीं होता। पहलवान अकेले ही अभ्यास में जुटा रहता। वह दूसरों को कुश्ती लड़ने के लिए ललकारता रहता। मगर कोई उससे कुश्ती तो क्या बात करना भी पसंद नहीं करता।

दिन गुज़रते गए। पहलवान का अकेले में दम घुटने लगा। वह परेशान रहने लगा। पहलवान जहाँ भी जाता, लोग उठ कर चले जाते। एक दिन की बात है। गांव के दूसरे छोर पर एक संत आए। वह कुटिया बनाकर वहीं रहने लगे। लोग दूर-दूर से संत के पास आने लगे। अपनी शंकाओं को मिटाने लगे। पहलवान भी संत के पास पहुँचा। पहलवान बोला-‘‘स्वामी जी। मैं मशहूर पहलवान हूँ। कोई भी पहलवान मुझे हरा नहीं पाया है। मेरे पास धन, मान-सम्मान और वैभव है। लेकिन मन है कि शांत नहीं है। मन बार-बार बैचेन हो उठता है।’’

संत मुस्कराए। बोले-‘‘मैंने भी तुम्हारा नाम सुना है। चलो आज तुमसे मुलाक़ात भी हो गई है। पहलवानी एक कला है। पहलवानी को तुमने अभ्यास और साधना से हासिल किया है।’’

पहलवान बीच में ही बोल पड़ा-‘‘स्वामी। मैंने कड़ी मेहनत की है। चारों दिशाओं में मेरे जैसा कोई पहलवान है ही नहीं।’’

संत फिर मुस्कराए। बोले-‘‘अहंकार तो रावण का भी नहीं रहा। अहंकार ने रावण की शक्ति को भी छीन लिया था। ज़रा सोचो। तुम जिसे भी पराजित करते हो, क्या उसके हृदय को चोट नहीं पहुँचती होगी? तुम कभी हारे नहीं हो न। हमेशा जीत का स्वाद ही चखा है। तुम्हारी हर जीत ने तुम्हारे अहंकार को और बढ़ाया है। पहलवान। जीवन की सपफलता हमेशा विजय पाने से नहीं होती। कल तुम्हारा शरीर जर्जर हो जाएगा। मजबूत बाहें कांपने लगेंगी। तब तुम्हारा अहंकार चूर-चूर हो जाएगा। अब भी वक़्त है। अपने अशांत मन को शांत करो। अब तुम्हारा अर्जित धन, मान-सम्मान और वैभव यहीं रह जाएगा। अच्छा होगा कि ग़रीबों, वंचितों और असहायों की सेवा करो। तब देखना। तुम एक अच्छे पहलवान के साथ-साथ एक सच्चे साधक के रूप में भी जाने जाओगे। लोग तुम्हारा यशगान करेंगे।’’

पहलवान ने अपना सिर झुका लिया। उसने संत को दण्डवत प्रणाम किया। पहलवाल बोला-‘‘आपने मुझे नया रास्ता दिखाया है। मैं जीवन का रहस्य अब समझ पाया हूं। आपने मेरी आँखें खोल दी।’’ यह कहकर पहलवान अपने गाँव की ओर चल पड़ा। अब उसकी चाल में अहंकार गायब था.
- मनोहर चमोली ‘मनु’
(उत्तराखंड की लोक कथा पर आधरित)

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