16/10/2010

सफ़ेदपोश आवरण में मीडिया

ज का युग सूचना तकनीक का युग है। उच्च तकनीक के इस ज़माने में ख़ुद को अत्याधुनिक बनाए रखना एक विवशता-सी हो गई लगती है। बाज़ार नई संचार-तकनीक से अटा पड़ा है। आज कोई भी रोटी, कपड़ा, मकान सहित अन्य रोज़मर्रा की ज़रूरतों पर चर्चा करता कमोबेश कम ही दिखाई देता है। हाँ ! नए उत्पादों-सेवाओं पर सबकी नज़]र अवश्य रहती है। ऐसी नज़र रखने वाला हमें किसने बनाया ? मीडिया ने! यही नहीं, नित नये टी.वी.चैनलों की समीक्षा भी आम चौराहों पर हो रही है। कल रात और आज सुबह किस चैनल ने क्या दिखाया और किस चैनल में क्या मज़ेदार रहा। ऐसा विश्लेषण करना हमें किसने सिखाया ? मीडिया ने! देखने-पढ़ने में तो यह सब बातें विकसित होने का सूचक नज़र आती हैं। मगर यह तसवीर का एक ही पहलू है। दूसरी ओर की स्थिति भयावह नहीं तो चौंकाने वाली तो है ही।
आज का दौर भागम-भाग का है। ऐसा लगता है कि किसी के पास समय ही नहीं है। ये और बात है कि चाय पीने के बहाने रेस्तरा में घंटों गपियाया जा सकता है। देर सुबह आराम से उठा जा सकता है। चार से छह घंटे टी.वी. देखा जा सकता है। बेवजह के कुतर्को और पर निन्दा में घंटों बरबाद किये जा सकते हैं। साठ और सत्तर के दशक में ऐसा नहीं था। हमारे पास समय ही समय था। हम आराम से अपनी दिनचर्या शुरू करते थे। बिना किसी लाग-लपेट के आराम से रात्रि विश्राम होता था। अपना काम-काज, खेती-किसानी, पढ़ाई-लिखाई, सामाजिक सरोकार सहित आस-पड़ोस के सुख-दुख में भी हम शरीक़ हो जाते थे। मगर आज का दौर ऐसी दिनचर्या को आलसी और गँवई लोगों की लाईफ़ स्टाईल क़रार देता है।
यह सब अचानक तो नहीं हुआ। किसने किया? क्यों किया? इस पर विमर्श करना आवश्यक है। एक ख़ास वर्ग की रणनीति नहीं तो अपना लबादा छोड़ कर दूसरों के पहनावे की नक़ल करने की आदत करना हमें सिखाया जा रहा है। हमें अपनी संस्कृति और जीवन शैली से अलग करने में मुनाफ़ाखोर सफल तो हुए ही हैं। टी.वी. जिसे बुद्धू बक्सा भी कहा गया है ने सबसे अहम् भूमिका निभाई। उससे पहले तो रेडियो स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ सूचनाओं का संप्रेषण बख़ूबी निभा रहा था। आज भी रेडियो; जो सुनते हैं, जो जानकार हैं, जानते हैं कि आवश्यक बदलाव के साथ रेडियो आज भी जन हिताय साबित हो रहा है। वे मानते हैं कि टी.वी. ने बहुत कुछ बरबाद ही किया है। आबाद नहीं किया है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। हाँ। बीते चार दशकों में टी.वी. और चैनलों ने सारी परंपरा, तमीज़-तहज़ीब, मान-सम्मान, नक़ल-दिखावा, लम्पट राजनीति, मानवीय गुण, राग-द्वेष आदि सबको एक छतरी के नीचे लाकर तो रख ही दिया है।
आज का दौर ‘बूढ़े आदमी को नए जूते पहनाने से धावक नहीं बनाया जा सकता’ यह जुमला उन लोगों पर कसता है, जो मीडिया को उसके धर्म की याद दिलाते हैं। जो मीडिया को लताड़ते हैं। अपवाद को छोड़ दें तो आज मीडिया ;प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों में एक दशक से भी कम समय से जुड़े पत्रकारों की फ़ौज है। जो दस साल पहले के पत्रकारों को दूसरी पीढ़ी के पत्रकार मानते हैं। अपवादस्वरूप ये एक दशक के अधिकांश पत्रकार वरिष्ठ पत्रकारों से उलझ पड़ते हैं। हाँ। स्वस्थ बहस-तर्क नहीं कर पाते। चिल्लाने लगते हैं। क़स्बाई पत्रकार जो अधिकांश स्ट्रिंगर हैं। वे तो जिला स्तरीय अधिकारी-जन प्रतिनिधियों से वार्ता इस लहज़े में करते हैं जैसे वे उनके लँगोटिया यार हों। जनता से कैसा व्यवहार करते हैं। यह हम सब जानते हैं। यह सब किसकी शह पर, किस बैनर की तड़ी पर और किसने सिखाया? मीडिया ने!
जिनकी पत्रकारिता दस साल से अधिक की हो गई है, वे मीडिया की व्यवस्था में जकड़ गए दिखते लगते हैं। अधिकांश तो न कुछ बोलते हैं न उनकी क़लम बोलती है। अति स्वाभिमानी और अति महत्वकांक्षी पत्रकारों ने अपनी ज़मीन छोड़ दी या मीडिया संचालकों ने उन्हें दिशा बदलने पर विवश कर दिया। अच्छे और नामी पत्रकार कहाँ है ? क्या कर रहे हैं ? इस पर भी सोचा जाना चाहिए। अगर वे आज भी पत्रकार हैं, तो क्या उनकी समाचार शैली वैसी ही धारदार है? असरदार है ? जैसी उनके शुरूआती दौर पर हुआ करती थी। यह विमर्श का विषय है।
आज का मीडिया सफ़ेदपोश आवरण ओढ़ चुका है। जिसका कुहासा मिटता ही नहीं। पाठक और श्रोता नयापन चाहते हैं। बदलाव नहीं। पाठक को हर सुबह अख़बार की प्रतीक्षा रहती है। अब उसे कहाँ फ़ुरसत की किसी ख़बर पर मौखिक प्रतिक्रिया करे, चर्चा करे या लिखित टिप्पणी संपादक को भेजे। संपादक ऐसे कि उन्हें ख़ुद कल की सुबह के अख़बार में अपना नाम कायम रहने की फ़िक्र रहती है। वो प्रबंधतंत्र-मालिक,व्यवसायी के रूख को ही भाँपते रहते हैं। अगर रूख को भाँपने में चूक हो गई तो घोड़ा-गाड़ी छीनी गई हाथ से समझो। व्यवसायी ‘और लाभ पर लाभ’ की चिंता में है। उसे बाज़ार चाहिए और बिक्री चाहिए। चैनल जूतों की दुकान की तरह हो गए हैं। पहले तो एक ही दुकान में अपनी नाप का जूता पहन लो। नहीं समझ में आया। छोटा-बड़ा हो रहा है या अंदेशा हो कि काट रहा है तो दूसरी दुकान में जाओ। चैनल मानो एक-दूसरे में ताक-झाँक करते नज़र आते हैं कि उसके पास कौन सी कंपनी का नया जूता आया है। वो उनके पास क्यों नहीं आया। नहीं आ सकता तो उससे बेहतर दिखने वाला तो हो। बस चैनली पत्रकार इसी जुगत में लगे रहते हैं।
जानकारों से पूछ लें तो पाएँगे कि मीडिया के दस-दस पत्रकारों के नाम तक अधिकांश को याद तक नहीं हैं। अलबत्ता वे ये टोह लेते ज़रूर मिल जायेंगे कि फलां पत्रकार आजकल कहाँ होंगे। या फिर कि कोई नया स्कोप है या स्पेस है। जो जहाँ है, उसे वहाँ से हटाने की मुहिम जारी रहती है। जो जहाँ हैं, वो वहाँ ख़ुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। उनकी सारी उर्जा अपने लिए नई ज़मीन तलाशने की रहती है। प्रिंट वाले इलैक्ट्रानिक में और इलैक्ट्रानिक वाले विदेशी चैनलों में हाथ-पैर मारते नज़र आते हैं। अपनी बेहतरी के लिए नहीं, अपने को बचाए रखने के लिए। कितने ख़ुद को बचा पाते हैं। बचाने की एवज में क्या गँवाते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में जन सरोकारों को उठाना और जन समस्याओं की तह में जाना कैसे संभव है। बाज़ारवाद इस क़दर हावी हो चुका है कि जहाँ से ख़बर उठती है और जहाँ से छपती या प्रसारित होती है, उसके बीच इतने झोल आ गए हैं कि पत्रकार को ख़ुद पता नहीं होता कि उसकी किस ख़बर को लगाया जाएगा, किसे छोटा किया जाएगा, किसे कभी नहीं लगाया जाएगा और किस ख़बर पर ये टिप्पणी हो कि ‘ये क्या भेज दिया?’ क़स्बों में मीडिया के मुख्य कार्यालय और केंद्र हो गए हैं। अति स्थानीयता को परोसा जा रहा है। पाठकों को पहले दुनिया से, फिर देश से और अब अपने राज्य से काटा जा रहा है।
हमें ऐसा दिखाया और पढ़ाया जा रहा है कि हम कुएँ के मेंढक से भी अधिक संकुचित हो गए हैं। ऐसा बाज़ारवाद कि आपकी अपनी चीज़ सड़ जाए, मगर आपको आपके मुहल्ले की दुकानों में विदेशी चीज़ें मिल जायें। मीडिया मुनाफ़ाखोरों को अच्छा स्थान देता है। क्यों? ये आप और हम भी जानते हैं। अब जनता भी समझ गई है। वह आज मीडिया को ‘दिल बहलाने का साधन मात्र’ मानने लगी है। ‘समय बिताने के लिए देखना और पढ़ना क्या बुरा है’ यह सोच विकसित हो गई है। जनता ‘ख़बरों में विज्ञापन है या विज्ञापन में ख़बर है’ का अंतर भी समझ गई है। यही कारण है कि आज पत्रकार ख़ुद कहने लगे हैं कि अब बात निकलती तो है, पर दूर तक नहीं जाती। क्यों? इस सवाल पर वो भी विमर्श नहीं करना चाहते हैं। आख़िर विमर्श करें तो होगा क्या। पत्रकार ख़ुद कहते हैं कि हम आज के दौर में कठपुतली मात्र बन गए हैं। हम वही लिखेंगे, जो संस्थान लिखवाएगा। हम वहीं दिखाएँगे जो संस्थान दिखवाना चाहता है। हम वही बोलेंगे, जो संस्थान बुलवाना चाहता है। ऐसा लिखना, दिखाना और बोलना जो ख़ुद का ही नहीं है, तो क्या लेखन और क्या रिपोर्टिंग? ‘मिशनरी भावना’ और ‘अपनापन’ आज की मीडिया के शब्दकोश में नहीं हैं।
पत्रकार ख़ुद भी कहते हैं कि वे भी तो इंसान हैं। उनकी भी इच्छाएँ हैं, अभिलाषाएँ हैं, बच्चे हैं, परिवार है। वे ही क्यों अभाव में रहें। वे ही क्यों सत्ता से, समाज से और दबंगइयों से पँगा लें। वे ही क्यों जो होना चाहिए पर सवाल खड़ा करें। जिन्हें करना चाहिए था, उन्हें क्यों उनका धर्म याद दिलाएँ। आम आदमी की तरह वे भी तो पिस रहे हैं। जन सरोकारों को उठाने और जन समस्याओं को चर्चा में लाने के लिए उन्हें क्या मिल रहा है। हम ही ठेकेदार नहीं हैं। जनता अपने मुद्दों को लेकर ख़ुद मुखर हो। ऐसा अधिकांश मीडियावाले कहने लगे हैं।
समाचार चाहे वो टी.वी के हों या अख़बार के। कुछ ही पलों में बासी हो जाते हैं। हर कोई आज क्या हुआ है, बस यही जानना चाहता है। कल जो घट चुका था, उस पर और क्या होना शेष था, इसे जानने और विश्लेषण करने का न तो समय किसी के पास है और न ही रूचि। मीडिया ने हमें अपने घर नहीं, अपने-अपने कमरों में क़ैद-सा कर दिया है। जब भी हम अपने कमरे से बाहर आते हैं,तब भी हम अपने निजी काम के लिए निकलते हैं। अगर ऐसी कोई व्यवस्था हो जाए कि हमें जो चाहिए दाम चुकाकर घर के भीतर ही मिल जाएगी, तो हम पड़ोस में लगी आग को भी चैनल में देखना चाहेंगे। यह अति व्यक्तिवादी संस्कृति हमें किसने दी? यह भी विमर्श का विषय है।     आज के दौर और मीडिया के चरित्र को इस उदाहरण से समझा जाना चाहिए। जन सरोकारों की गठरी लिए एक हाथी चला जा रहा है। हाथी किसका है। यह पता नहीं चल पा रहा है। कुत्ते हाथी पर लदी गठरी और हाथी को देखकर लगातार भौंक रहे हैं। तमाशबीन कभी हाथी को देख रहे हैं तो कभी कुत्तों को। हाथी पर लदी गठरी को भी सभी उचक-उचक कर देख रहे हैं। सब देख रहे हैं और सुन भी रहे हैं। पर सब ख़ामोश है। हाथी कहाँ जा रहा है? हाथी आख़िर है किसका? किसी को पता नहीं। कोई जानना भी नहीं चाहता है। जिसके घर से आगे हाथी निकल गया, उसके घर के द्वार बंद हो गए और देखने वाले कमरे में फिर अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए। यह सोचकर कि कुछ ही घंटों में पता चल जाएगा, नहीं तो कल अख़बार में देख लेंगे। मीडिया ने हमारी ऐसी स्थिति बना दी है कि यदि हम अपने घर पर सकुशल हैं, तो सब कुछ ठीक है। अगर हमें असुविधा है तो सारा समाज, तंत्र और व्यवस्था ख़राब है।
एक समय था जब हमारे क्षेत्र में कोई बीमार हो जाता था, तो सारा क्षेत्र बीमार का हौसला बढ़ाता था। उसकी तीमारदारी के लिए उपलब्ध हो जाता था। आज हम बीमार को देखने तक नहीं जा पाते। अर्थी में भी शामिल नहीं हो पाते। शोक संवेदना प्रकट करने के अलावा हम कुछ नहीं कर पाते। वो दिन दूर नहीं जब हमें अपने घर-परिवार में होने वाली मौत की ख़बर भी चैनल से मिलेगी। वो इसलिए की सारी दुनिया को जानने के लिए चौबीस घंटे टी.वी. हमारे कमरे में जागता है और हम टी.वी. देखते-देखते सोते हैं। टी.वी. को देखते-देखते और आँख मलते-मलते हमारी सुबह होती है। केवल कोसने भर से तो काम चलने वाला नहीं है। हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। वह अत्याधुनिकता, वह बाज़ार और वह सुविधाएँ जो हमे ऐसा आदमी बना रही है,जो ख़ुद को छोड़कर अन्य को आदमी नहीं समझता, इससे बचना होगा। अन्यथा जंगल तो दूर होते ही जा रहे हैं। जंगली लुप्त हो रहे हैं। शायद हम ऐसा कंकरीट का जंगल बना रहे हैं, जिसमें मानव जाति के जंगली रहते हैं।
जन सरोकार के पक्षध्र पत्राकारों और लेखकों को हर कोई जानता है। वे कल भी,आज भी और कल भी सर-आँखों में बिठाए गए हैं और बिठाए जाएँगे। मगर ऐसो की संख्या बढ़ने की जगह घट रही है। मीडिया वाले तो बताने से रहे कि ऐसा क्यों? किंतु आज नहीं तो कल इसकी पड़ताल होनी चाहिए।

-मनोहर चमोली 'मनु' manuchamoli@gmail.com

2 टिप्‍पणियां:

यहाँ तक आएँ हैं तो दो शब्द लिख भी दीजिएगा। क्या पता आपके दो शब्द मेरे लिए प्रकाश पुंज बने। क्या पता आपकी सलाह मुझे सही राह दिखाए. मेरा लिखना और आप से जुड़ना सार्थक हो जाए। आभार! मित्रों धन्यवाद।